Monday, 11 January 2021

किसान आन्दोलन : विघ्नसंतोषियों का पर्दाफाश जरूरी



हरियाणा में गत दिवस किसानों के  विरोध के कारण मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर को सभा रद्द करना पड़ी। आन्दोलनकारियों ने मंच और हैलीपेड को भी नुकसान पहुँचाया। हालांकि सरकारी दावे के अनुसार मौसम की वजह से सभा रद्द की गई किन्तु सही बात ये है कि किसानों के विरोध के चलते ही मुख्यमंत्री का कार्यक्रम नहीं हुआ।  सर्वोच्च न्यायालय  विभिन्न मामलों में कह चुका है कि लोकतंत्र में विरोध के लिए आन्दोलन का अधिकार सभी को है लेकिन उसकी भी कोई सीमा होनी चाहिए। किसानों का जो आन्दोलन दिल्ली की सीमा पर चल रहा है उसकी वजह से व्यस्त मार्ग को अवरुद्ध कर रखा गया है जिससे लोगों को असुविधा हो रही है। चूंकि अब तक आन्दोलनकारी शान्ति के साथ डटे हुए हैं इसलिए सरकार ने भी उन्हें हटाने का प्रयास नहीं किया किन्तु पंजाब और अब हरियाणा से जैसी  खबरें आ रही हैं उनसे लगता है कि किसानों की आड़ में असामाजिक और उपद्रवी किस्म के लोग भी आन्दोलन में घुस आये हैं। पहले निजी मोबाइल कम्पनी के टावरों तथा रिटेल स्टोर्स में तोड़फोड़ और अब मुख्यमंत्री सहित दूसरे राजनीतिक आयोजनों में हंगामा करने की घटनाएँ आन्दोलन के रास्ते से भटकने  का संकेत है। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत द्वारा भी गत दिवस सार्वजनिक  रूप से ये स्वीकार किया गया कि सरकार के साथ हो रही बातचीत में दो-चार लोग ऐसे हैं जो सहमति का आसार बनते देख दूध में नींबू निचोड़ने से बाज नहीं आते। यद्यपि उन्होंने ऐसे लोगों का नाम नहीं लिया परन्तु उनकी बात से ये स्पष्ट हो जाता है कि किसान संगठनों में कुछ विघ्नसंतोषी है जो समाधान नहीं चाहते। श्री टिकैत की बात पर इसलिए विश्वास किया जा सकता है क्योंकि कानून वापिसी के बिना किसी भी मुद्दे पर बातचीत करने से साफ़ इंकार किये जाने के बावजूद किसान संगठन एक वार्ता विफल होने के बाद भी  अगली के लिए तैयार हो जाते हैं। इसे लेकर पूरे देश में ये सवाल उठने लगा है कि जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए हैं और बार-बार बातचीत  बेनतीजा खत्म हो जाती है तब दोबारा बातचीत की तारीख तय करने का मतलब क्या है ? लेकिन अब श्री टिकैत की टिप्पणी से ऐसा लगता है कि चाहते तो किसान संगठन भी हैं कि समाधान निकल आये क्योंकि बातें चाहे कितनी भी बड़ी-बड़ी हो रही हैं लेकिन आन्दोलन को पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उप्र और राजस्थान के कुछ हिस्से सहित उत्तराखंड से ही कुछ समर्थन अब तक हासिल हो सका है। ये भी सही है कि किसानों का कोई गैर राजनीतिक संगठन ऐसा नहीं है जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर पहिचान हो। यही वजह है कि 40 संगठन मिलकर भी सरकार पर मनमाफिक दबाव नहीं बना पा रहे। ये भी साफ़ हो चला है कि आन्दोलन को मुख्य सहायता पंजाब से मिल रही है और जिसका कारण अकाली दल और बादल परिवार है जिनका गुरुद्वारों पर खासा प्रभाव है। श्री टिकैत के पहले भी इस तरह की बात दूसरे लोगों द्वारा कही जा चुकी है कि जब सरकार  सुझाव मांग रही है तब अड़ियलपन दिखाते हुए बातचीत को विफल करना नुकसानदेह हो सकता है। लेकिन आन्दोलन के साथ कुछ ऐसे लोग जुड़ गए हैं जिनका खेती और किसानों से कुछ लेना-देना नहीं है। बीते कुछ वर्षों में ये देखने में आया है कि अव्यवस्था फ़ैलाने वाले किसी भी प्रयास को समर्थन देने में कुछ जाने-पहिचाने चेहरे बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर शामिल हो जाते हैं। फिर चाहे छात्र आन्दोलन हो या कश्मीर से 370 और 35 ए हटाने का मामला। सीएए का विरोध करने के लिए शाहीन बाग़ जैसे जो आन्दोलन हुए उनके पीछे भी यही तत्व सक्रिय थे। इनका काम दरअसल किसी न किसी विवाद को जीवित रखना है जिससे इनको तवज्जो मिलती रहे। शाहीन बाग़ नामक मुहिम तो कोरोना के कारण अपनी मौत मर गई जिससे विघ्नसंतोषियों का तबका खुद को बेकार महसूस कर रहा था। और इसीलिये उसने किसानों के बीच घुसकर उन्हें ऐसी लड़ाई में उलझा दिया जिसका अंजाम उन्हें खुद समझ नहीं आ रहा। आन्दोलन के जो मुद्दे हैं उन पर सहमति बनना बड़ी बात नहीं थी किन्तु जब भी आग ठंडी होने की उम्मीद दिखी तब-तब उसमें पेट्रोल डालने का काम जो लोग कर रहे हैं वे ही पंजाब और हरियाणा में हो रही तोड़फोड़ के पीछे  हैं। बेहतर होगा किसान संगठनों में जो समझदार और सुलझे हुए नेता हैं वे अनिर्णय की स्थिति से बाहर निकलकर सरकार के सामने अपने सुझाव पेश करें। दिल्ली के दरवाजे पर धरना दिए बैठे रहने या गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकालने जैसे निर्णय आन्दोलन को भटकाव के रास्ते पर ले जायेंगे जिससे अंतत: किसानों का नुकसान होगा। इसलिए जरूरी है  श्री टिकैत उन लोगों का पर्दाफ़ाश करें जो वार्ता को विफल करवाने की कुटिलता दिखाते हैं। किसान संगठनों को भी ये समझना चाहिए कि  हवा में लाठी भांजने से कुछ हासिल नहीं होगा। पिछली बैठक के बारे में ये बात प्रचारित हुई कि उसमें किसान नेताओं ने कृषि मंत्री  की एक नहीं सुनी। दूसरी ओर बैठक से बाहर निकलकर कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पत्रकारों को बताया कि  बातचीत जारी है  और  अगली बैठक की तिथि किसान संगठनों की सहमति से ही तय की गई। उससे पहले बेहतर होगा किसान संगठन अपने बीच बैठे  उन तत्वों को बाहर करें जो किसानों के नाम पर पर अपनी कुंठाएं निकाल रहे हैं। यदि ऐसा नहीं किया गया तब बड़ी बात नहीं आन्दोलन पर  विघटनकारी मानसिकता वालों का कब्जा हो जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 January 2021

राजनीतिक परिपक्वता के बिना आर्थिक सुधार लागू करना असम्भव




 आखिऱकार ममता बैनर्जी ने केंद्र सरकार द्वारा किसान सम्मान योजना के अंतर्गत  किसानों के खाते में सीधे जमा की जाने वाली राशि का लाभ बंगाल के किसानों को भी दिए जाने का रास्ता साफ़ कर दिया ।  इस योजना के अंतर्गत किसानों के बैंक खाते में सालाना दो - दो हजार की तीन किश्तें जमा की जाती हैं ।  राज्य सरकारों द्वारा दी गई सूची के आधार पर केंद्र राशि जमा करवाता है ।   बंगाल की ममता सरकार ने केंद्र की उस योजना को लागू करने से इंकार कर  दिया और अपनी सरकार की तरफ से किसी और योजना को शुरू किया ।  राज्य विधानसभा के आगामी चुनाव के लिए राजनीतिक गतिविधियाँ तेज होते ही भाजपा ने ममता सरकार पर ये हमला किया कि वह प्रदेश के किसानों को उस लाभ से वंचित रख  रही है ।  हाल ही में  प्रधानमंत्री ने भी ये कटाक्ष किया कि कुछ राज्य राजनीतिक द्वेष के वशीभूत किसानों को केंद्र से मिल रही सहायता में रोड़ा अटका रहे हैं ।  और कोई समय होता तो ममता दाना - पानी लेकर भाजपा और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री तक पर  चढ़ बैठतीं ।  लेकिन विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा के आक्रामक प्रचार अभियान का मुकाबला करने के लिए  उन्होंने किसान सम्मान योजना को लागू करने पर सहमति दे दी ।   निश्चित रूप से ये एक अच्छा फैसला है ।  जनता के किसी भी वर्ग को मिलने वाली सुविधा को राजनीति से उपर रखकर लागू किया जाना चाहिए ।  और फिर संघीय ढांचे की व्यवस्था में केंद्र द्वारा लागू की गईं नीतियां और कार्यक्रम चंद अपवाद छोड़कर सभी राज्यों पर लागू होते हैं ।  किसान सम्मान योजना भी उनमें से ही है ।  ममता बैनर्जी और केंद्र की मोदी सरकार के बीच रिश्ते शुरुवात से ही तल्खी भरे रहे क्योंकि भाजपा ने अपना फैलाव बंगाल में करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी ।  भले ही 2016 के विधानसभा चुनाव में उसे बुरी तरह हार मिली लेकिन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का जादू  बंगाल में भी जमकर चला जिससे ममता को अपने राजनीतिक भविष्य के लिए खतरा महसूस होने लगा ।  मणिपुर , असम अरुणाचल और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में सरकार बना लेने के बाद भाजपा बंगाल में भी अपना परचम लहराने के प्रति आशान्वित हो चली है ।  ममता सरकार के विरुद्ध जिस तरह की मोर्चेबंदी उसकी तरफ से की जा रही है उसकी वजह से राज्य और केंद्र सरकार के बीच के रिश्ते कटुता की चरम सीमा पर जा पहुंचे ।  लेकिन इसका नुकसान आम जनता को होना संघीय ढांचे के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है ।  हालाँकि दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों की राज्य  सरकारों के साथ भी केंद्र के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं  लेकिन बंगाल के मामले में कड़वाहट  कुछ ज्यादा ही देखी जा रही है ।  वैसे सुश्री बैनर्जी के स्वभाव को देखते हुए इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होता ।  लेकिन देखा सीखी अन्य राज्य सरकारें भी केंद्र के साथ तनातनी की राह पर चल पड़ती हैं तब व्यर्थ की खींचातानी होती है ।  इसका ताजा उदाहरण कृषि संशोधन कानून हैं ।  कांग्रेस शासित पंजाब , छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने बिना  देर लगाये इन्हें बेअसर करने वाला कानून अपनी विधानसभा में पारित करवा लिया ।  हालाँकि इसके बावजूद वे किसानों की नाराजगी को दूर नहीं कर सके किन्तु इससे किसानों को भड़काने में  वह कदम सहायक जरूर बन गया ।  शुरू - शुरू में जीएसटी को लेकर भी इसी तरह की तनातनी रही ।  गत दिवस ये सुनने में आया कि केंद्र सरकार किसान आन्दोलन को ठंडा  करने के लिए कृषि कानूनों को ऐच्छिक करने जैसा फैसला ले  सकती है ।  अर्थात जो राज्य चाहें वे इनको लागू करें और जिन्हें ऐतराज हो वे न करें ।  हालाँकि इसकी पुष्टि नहीं हुई किन्तु यदि ऐसा होता है तो इससे  एक नई तरह की  राजनीति शुरु होगी ।  मसलन केंद्र का कानून किसान को अपना उत्पाद कहीं भी बेचने की छूट दे वहीं दूसरी तरफ राज्य उनकी निकासी पर रोक लगा दे तब शोचनीय स्थिति बने बिना नहीं रहेगी ।  ये विसंगति मौजूदा  कर प्रणाली में भी  है ।  एक देश , एक टैक्स  की भावना से लागू जीएसटी के बावजूद विभिन्न राज्यों में  करों की दरें अलग - अलग हैं ।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पेट्रोल और डीजल जिसे जीएसटी के अंतर्गत लाने के लिए कोई राज्य सरकार राजी नहीं है ।  आज अधिकतर  राजनीतिक दल आर्थिक सुधार की माला जपते हैं  लेकिन जब तक राजनीतिक परिपक्वता नहीं  आएगी तब तक आर्थिक सुधारों का भविष्य अंधकारमय रहेगा ।  यही वजह है कि तीन दशक पहले प्रारम्भ हुई आर्थिक नीतियाँ आज तक पूरी तरह लागू नहीं हो सकीं क्योंकि केंद्र और राज्य की सत्ता में बैठने वाले लोगों के लिए   देश का दूरगामी लाभ उतना महत्वपूर्ण नहीं जितनी उनके  राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति ।  इसीलिये  ममता अब तक किसान  सम्मान योजना को लागू होने से रोके रहीं जिससे उसका लाभ भाजपा को न मिल सके ।  लेकिन जब उन्हें इस बात का डर सताने लगा कि ऐसा करने से उनकी पार्टी को आगामी विधानसभा  चुनाव में नुकसान हो सकता है तो  फटाफट उसके लिए हामी भर दी ।  राजनीति में प्रतिस्पर्धा का अपना स्थान  है ।  सही मायनों में  वह  है ही जीत - हार का खेल  किन्तु जब जनहित सामने हो तब  राजनीतिक नफे - नुकसान को ताक पर रखना  लोकतंत्र के भविष्य के लिए जरूरी  है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 January 2021

अमेरिका में दूसरे गृहयुद्ध का बीजारोपण हो चुका



हालाँकि बीते चार साल में पूरी दुनिया जान चुकी थी कि डोनाल्ड ट्रंप  अस्थिर दिमाग के साथ ही अदूरदर्शी राजनेता हैं लेकिन वे इतने गिरे हुए होंगे इसका अंदाज बीते कुछ समय से लगने के बावजूद  विश्वास करना कठिन था कि चुनावी हार उन्हें  पागलपन की हद तक पहुंचा देगी और वे महानता के आधुनिक प्रतीक कहलाने वाले अपने देश की छवि इस तरह तार - तार कर देंगे | लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि उसमें सत्ता का हस्तांतरण  संवैधानिक तरीके से शान्ति और शालीनता के साथ होता है | अमेरिका आज की दुनिया में लोकतंत्र का सबसे बड़ा उपदेशक बन बैठा था | अब्राहम लिंकन ने  लोकतंत्र को जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए जैसी परिभाषा देकर पूरे विश्व में अमेरिका के प्रति सम्मान की  जो भावना जगाई थी वह गत दिवस वाशिंगटन में हुए हादसे के बाद सवालों के घेरे में आ गयी | जनता के फैसले को सिर झुकाकर स्वीकार करने की बजाय ट्रंप ने जिस तरह की अड़ंगेबाजी की उसे उनकी  स्वभावगत विशेषता मानकर भले ही उपेक्षित कर दिया जाए लेकिन  कल अमेरिकी संसद में जो कुछ हुआ उसके बाद विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक महाशक्ति के भविष्य के बारे में पूरी दुनिया सोचने को बाध्य हो गयी | अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों के लिए पूरी दुनिया को नसीहत देने वाले देश के समाज का खुलापन पूरी दुनिया को आकर्षित करता रहा है | नेशन ऑफ नेशंस कहलाने वाले सवा दो सौ वर्ष पुराने इस देश की अपनी कोई मौलिक राष्ट्रीयता नहीं है | शायद वह  एकमात्र ऐसा देश है जिसमें दुनिया भर के लोग आकर बसते गए | अमेरिका के राष्ट्र निर्माताओं का ये नारा उसकी तरक्की का आधार बन गया कि आओ , बसो और पनपो | जिससे प्रभावित होकर दुनिया भर के उद्यमी , वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी यहाँ आकर बसे और उन्होंने इस देश की प्रगति को उच्चतम  शिखर तक पहुंचा दिया | लेकिन शक्ति और समृद्धि की दौड़ में अमेरिकी समाज में स्वछ्न्दता  का समावेश भी होता चला गया | अब्राहम लिंकन , जॉन. एफ. कैनेडी और डा. मार्टिन लूथर किंग जैसी हस्तियों की हत्या इस देश के माथे पर कलंक की तरह हैं | बीते कुछ वर्षों में छोटे बच्चों द्वारा शालाओं में अपने साथी विद्यार्थियों की हत्या की दर्जनों वारदातें इस बात का सांकेतिक प्रमाण रहीं कि भौतिक प्रगति के कारण  अमेरिका में पारिवारिक संस्कार अपनी मौत मरते जा रहे हैं | हालिया चुनाव के पहले हुए नस्लीय दंगे ट्रंप द्वारा करवाए गये या नहीं इस पर विवाद हो सकता है लेकिन उनसे ये बात तो साफ़ हो गई कि अमेरिका  आज भी मानवीय संवेदनाओं को लेकर दो फाड़ है | कल जो कुछ हुआ उसे क्षणिक आवेश मानकर भुला देना ठीक न होगा | भले ही हर तरह से असफल रहने के बाद ट्रंप ने शांतिपूर्वक सत्ता के हस्तांतरण का आश्वासन दे दिया लेकिन  चुनाव के पहले से अब तक उनका आचरण अमेरिकी समाज में आ रही विकृति का ताजा संकेत है | यद्यपि उनकी अपनी पार्टी और यहाँ तक कि उपराष्ट्रपति तक ने उनकी बात मानने से इनकार करते हुए लोकतान्त्रिक मर्यादा की रक्षा की लेकिन कहना गलत न होगा कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के बाद अमेरिका को अपने घरेलू मोर्चे पर ही अनेकानेक ऐसी समस्याओं से जूझना पड़ सकता है जो अकल्पनीय हैं | अमेरिका में आकर बसे अप्रवासियों के विरुद्ध  समय - समय पर राष्ट्रवाद और नस्लीय श्रेष्ठता का भाव व्यक्त होता रहा है | लेकिन आज का अमेरिका केवल यूरोप से आये गोरी चमड़ी वालों का नहीं  रहा | उसमें अफ्रीका  , चीन , भारत  और लैटिन अमेरिकी देशों के करोड़ों  लोग नागरिकता ले चुके हैं| अमेरिका में  ज्ञान - विज्ञान ही नहीं अपितु आर्थिक क्षेत्र में भी अप्रवासियों का जबरदस्त आधिपत्य है | ये वर्ग सरकारी नीतियों को भी प्रभावित करने की स्थिति में आ चुका है | राष्ट्रपति चुनाव में ये अप्रवासी  उलटफेर करने की हैसियत में आ चुके हैं | यही वजह रही कि ट्रंप के प्रतिद्वन्दी जो वाईडेन ने उपराष्ट्रपति प्रत्याशी के तौर पर भारतीय मूल की कमला हैरिस को चुना | विदेशी मूल के लोग अब वहां सांसद  और गवर्नर बनने  लगे हैं |  व्हाईट  हॉउस के स्टाफ सहित अमेरिकी प्रशासन की  नीति  निर्धारण से जुड़े  अनेक महत्वपूर्ण पदों पर भारतीय मूल के लोगों की नियुक्ति अपने आप में बहुत कुछ कहती है | ये सब देखते हुए माना  जा सकता है कि दुनिया  का चौधरी बनने के फेर में अमेरिका अपने घर को सँभालने के प्रति लापरवाह हो चला जिसके कारण डोनाल्ड ट्रंप सरीखे व्यक्ति राष्ट्रपति बन बैठे | यद्यपि उनके अपने सहयोगियों ने  जिस परिपक्वता का परिचय दिया वह अच्छा  संकेत है | 100 रिपब्लिकन सांसद तक उनके खिलाफ खड़े हैं | महाभियोग की चर्चा चल रही है | यहाँ तक कि कार्यकाल के अंतिम 10 - 12 दिन भी उनको पद पर न रहने देने की बातें हो रही हैं | हालांकि इस सबके बीच ये भी  जानकारी मिल रही है कि अमेरिकी  संविधान के विशेष प्रावधान का लाभ लेते हुए ट्रंप खुद को माफ़ करने के अधिकार का उपयोग करने जा रहे हैं | बावजूद इसके वे अमेरिका के  ऐसे  राष्ट्रपति  हैं जो बड़े बेआबरू होकर व्हाईट हाउस से निकलने जा रहे हैं | गत दिवस वहां की संसद में जो कुछ भी हुआ उसके बाद ये मान लेना गलत न होगा कि अमेरिका में लोकतंत्र के समानांतर अब दूसरी मानसिकता भी जन्म ले चुकी है | आधुनिक अमेरिका का जन्म गृहयुद्ध के बाद हुआ था | ऐसा लगता है उसकी पुनरावृत्ति का बीजारोपण हो चुका है | दुनिया भर में चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने के साथ ही ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को पालने - पोसने वाला अमेरिका भी अस्थिरता और अराजकता की ओर बढ़ रहा है | अमेरिका की ताजा घटनाओं के संदर्भ में भारत की देसी  कहावत प्रासंगिक हो गयी कि बुढ़िया मर गई इसकी चिंता नहीं लेकिन मौत ने घर देख लिया | वैसे भी समृद्धि और शक्ति का अहंकार पतन का कारण बन जाता है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 January 2021

किसान आन्दोलन : सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता से ही निकलेगा रास्ता




कृषि कानूनों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने  सरकार के अनुरोध पर सुनवाई कुछ दिन और आगे बढ़ा दी। हालाँकि सरकार द्वारा आन्दोलनकारियों के साथ बातचीत जारी रहने की दलील पर अदालत ने ये टिप्पणी भी की कि लेकिन हो कुछ नहीं रहा। इससे आशय यही था कि बीते सवा महीने के दौरान किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच आधा दर्जन से ज्यादा बैठकों के बावजूद गतिरोध यथावत है। वैसे सर्वोच्च न्यायालय का अब तक का रवैया हस्तक्षेप से बचने का रहा है। कानूनों पर रोक लगाने की मांग को भी अभी तक उसने स्वीकार न करते हुए  दोनों पक्षों को आपसी सहमति से विवाद सुलझाने का अवसर प्रदान किया। बीच में अपनी तरफ से एक समिति गठित करने जैसी बात भी कही थी। उसके बाद शीतकालीन अवकाश की वजह से सुनवाई रुकी रही। सरकार और किसान नेताओं  के बीच होने वाली आगामी बैठक में भी  अगर बात न बनी तब न्यायालय मामले की सुनवाई करेगा। लेकिन इस बीच जो कुछ भी हुआ उससे एक बात तो साफ़ है कि किसान संगठनों की शर्तें मान लेना सरकार के लिए संभव नहीं है। कानूनों को वापिस लिए जाने की जिद बेमानी लगती है क्योंकि उनमें संशोधन किया जाना ही तरीका होता है जिसके लिए किसान संगठन तैयार नहीं हैं। दूसरी बात जिस पर गतिरोध बना है वह है न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप  देना। सरकार इस बात की लिखित गारंटी देने को तो राजी है कि न तो मंडियां खत्म होंगी और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की मौजूदा व्यवस्था में कोई व्यवधान आयेगा किन्तु उसे कानूनी बनाने से उत्पन्न होने वाली समस्या का अंदाज लगाकर वह ऐसा करने का साहस शायद ही जुटा सके।  किसान आन्दोलन का समर्थन कर रहे  तमाम विशेषज्ञ भी दबी जुबान ये स्वीकार करते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी बनाने के फलस्वरूप सरकार दिवालिया हो जायेगी।  जिस तरह मुफ्त बिजली ने लगभग सभी राज्यों के बिजली मंडलों को कंगाली की दशा में पहुंचा दिया ठीक उससे भी बुरी हालत न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी स्वरूप प्रदान करने से होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। पिछली बैठक शुरू होते ही जब सरकार की तरफ से  एक - एक मुद्दे पर सिलसिलेवार बात का प्रस्ताव रखा गया  त्योंही किसान नेताओं ने दो  टूक कह दिया कि कानून वापिस लिए बिना कोई चर्चा नहीं होगी।  हालांकि इसके बाद भी घंटों चली बैठक में क्या होता रहा ये समझ से परे है।  अगली बैठक की तारीख तय करने का औचित्य क्या था ये भी कोई बता नहीं पा रहा। देश भर में जो चर्चाएँ हो रही हैं उनसे एक बात तो स्पष्ट है  कि नए कानून कृषि  सुधारों की दिशा में उठे कदम हैं  और इससे किसानों को दूरगामी लाभ भी होंगे। लेकिन सरकार की विफलता ये है कि वह किसानों को अपनी बात समझा नहीं पा रही। ये तर्क भी दिया  जा रहा है कि जब किसानों को ये कानून नहीं चाहिए तब सरकार जबरन उन्हें लादने पर क्यों  आमादा है ?  लेकिन ये तर्क इसलिए गले नहीं उतरता क्योंकि केंद्र और राज्य  सरकारों द्वारा  आये दिन ऐसे  कानून बनाए  जाते हैं जिनको आम जनता पसंद नहीं करती तो क्या वे भी वापिस ले लिए जाएँ ?  किसानों की चिंता गैर वाजिब है ये मान लेना तो उनके साथ अन्याय होगा लेकिन  वे पूरी तरह सही भी नहीं कहे जा सकते। टेबिल पर आते ही बातचीत में अड़ंगे डालने वाली शर्तें रख देना इस बात का प्रमाण है कि किसान संगठन जोर - जबरदस्ती से अपनी बात मनवाना चाह रहे हैं जिसके लिए सरकार राजी नहीं है। कृषि मंत्री कह भी चुके हैं कि  ताली दोनों हाथों से बजती है। ऐसी हालत में आन्दोलन कितना भी खिंचे किन्तु वह अपनी  मांगें पूरी नहीं करवा सकेगा। सरकार हर बैठक में आग्रह करती है कि वह  किसानों द्वारा सुझाये गए संशोधनों पर विचार करने तैयार है लेकिन किसान संगठनों को लगता है सरकार  समय व्यतीत करने की चाल चल रही है जिससे आन्दोलन थककर दम तोड़ दे। दूसरी तरफ सरकार भी राष्ट्रीय राजधानी के चारों तरफ के व्यस्त मार्गों पर कब्जा जमाये बैठे हजारों किसानों को बलपूर्वक हटाये जाने पर होने वाली प्रतिक्रिया से  पूरी तरह वाकिफ है। किसान संगठन भी इस बात को जानते हैं कि आन्दोलन में हिंसा की  छोटी सी घटना उनके प्रति सहानुभूति को खत्म कर देगी। लेकिन सवाल ये है कि गतिरोध आखिर कब तक चलेगा क्योंकि ये सरकार और किसानों से हटकर  एक राष्ट्रीय मुद्दा है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन की भी रीढ़ है। देश की बड़ी आबादी अभी भी ग्रामीण इलाकों में रहती है। शहरों में बढ़ती बेरोजगारी को दूर करने में आज भी गाँव सहायक बन सकते हैं। इसके लिए कृषि सुधार समय की मांग है। मोदी सरकार द्वारा लाये गये कानूनों को सुधार के रूप में तो देखा   जा रहा है लेकिन किसानों के मन में इसे लेकर ये धारणा है कि इससे उनको नुकसान हो जाएगा। ऐसे में समस्या ये हैं कि इस गतिरोध को सुलझाए कौन ? चूँकि राजनीतिक दल अपने चुनावी फायदे से आगे बढ़कर कुछ और सोचते नहीं हैं इसलिए उनसे अपेक्षा करना बेकार है। ऐसी हालत में सर्वोच्च न्यायालय ही एकमात्र आशा की किरण बच रहती है। बेहतर हो सरकार और किसान संगठन दोनों सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता स्वीकार करने के लिए राजी हों। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय को भी एक  समय सीमा में  निर्णय की गारंटी देनी होगी। मौजूदा विवाद में न तो कानूनों को सीधे - सीधे वापिस लेना कोई विकल्प है और न ही किसानों को नजरंदाज करते  हुए आगे बढ़ जाना। लोकतंत्र नियन्त्रण और संतुलन के सिद्धांत से संचालित होता है। दोनों पक्ष उस भावना को समझकर आगे बढ़ें तो समाधान तक पहुँच सकते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 6 January 2021

नेपाल संबंधी प्रणव दा का खुलासा शोध का विषय




पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न  स्व. प्रणव मुखर्ज़ी की विद्वता और अनुभव से उनके विरोधी भी प्रभावित थे। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक उनसे सलाह लेने में नहीं हिचके  जबकि दोनों की राजनीतिक विचारधारा परस्पर विरोधी थी। राष्ट्रपति पद से हटने के बाद प्रणव दा उस रास्वसंघ के वार्षिक आयोजन में बतौर अतिथि नागपुर भी गये थे जिसे सक्रिय राजनीति में रहते हुए उन्होंने जी भर के कोसा।  राष्ट्रपति बनाए जाने के बाद उनकी महत्वाकांक्षाओं पर चूंकि  पूर्णविराम लग गया था इसीलिये वे उन बातों को कहने का साहस जुटा सके जो अन्यथा कभी बाहर नहीं आतीं। उनकी पुस्तक दि प्रेसीडेंशियल इयर्स गत दिवस बाजार में आ गयी। हालांकि उसके कतिपय अंश पहले ही सार्वजानिक किये जा चुके थे जो ऐसी पुस्तकों की बिक्री बढ़ाने का चिर-परिचित तरीका होता है। पुस्तक का वह  अंश पूर्व में ही चर्चा का विषय  बन गया था जिसमें उन्होंने ये कटाक्ष किया था कि कांग्रेस के पास चमत्कारिक नेतृत्व का अभाव 2014 में उसकी हार का कारण बना। हालांकि राष्ट्रपति पद से हटने के बाद  ऐसा कहने के लिए उन्हें  पुस्तक का सहारा लेना पड़ा। उनका इशारा सोनिया गांधी और राहुल के अलावा डा. मनमोहन सिंह पर मुख्य रूप से था क्योंकि यही तीनों कांग्रेस के चेहरे के तौर पर जनता के सामने थे। चूँकि पुस्तक उनकी मृत्यु के बाद बाजार में आई है इसलिए उससे उठने वाले विवादों में स्पष्टीकरण देने वे मौजूद नहीं हैं। और जैसा सुनने में आया कि पुस्तक से इस तरह के अंश निकालने को लेकर प्रणव दा की बेटी शर्मिष्ठा और पुत्र अभिजीत के बीच मतभेद भी सामने आये। कांग्रेस की प्रवक्ता रहने के कारण शर्मिष्ठा नहीं चाहती थीं कि पुस्तक के कारण उनके राजनीतिक भविष्य पर बुरा प्रभाव पड़े। उल्लेखनीय है वे दिल्ली विधानसभा चुनाव में बतौर कांग्रेस प्रत्याशी बनकर बुरी तरह हार चुकी थीं। वहीं बंगाल में  अपने स्व.पिता द्वारा रिक्त की गई लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद रह चुके अभिजीत पुस्तक को जस का तस प्रकाशित करने के पक्षधर थे।  इस सम्बन्ध में ये भी  उल्लेखनीय है कि स्व. मुखर्जी के संघ मुख्यालय के आयोजन में जाने से शर्मिष्ठा काफी नाराज  थीं। हालांकि पुस्तक में प्रधानमन्त्री श्री मोदी की प्रशंसा और आलोचना दोनों हैं किन्तु 2014 की पराजय के लिए कांग्रेस के पास सक्षम नेतृत्व के अभाव का जिक्र स्व. राष्ट्रपति के मन में दबे उस दर्द की अभिव्यक्ति मानी जा रही है जो पहले 1984 और फिर 2004 में उन्हें प्रधानमन्त्री पद से वंचित रखने  से पैदा हुआ था। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि 2012 में राष्ट्रपति बनने की उनकी इच्छा कतई नहीं थी क्योंकि उस समय वे कांग्रेस और मनमोहन सरकार दोनों के विघ्नहर्ता की भूमिका में काफी सफल माने जा रहे थे। पुस्तक के बाजार में आने के बाद नेपाल संबंधी जिस रहस्य पर से पर्दा उठा वह आने वाले दिनों में बड़ी बहस का मुद्दा बन सकता है। भारत और नेपाल के बीच बीते कुछ समय से चल रहे सीमा विवाद के बाद आपसी रिश्तों में आये तनाव के चलते  मोदी सरकार की विदेश नीति पर जमकर सवाल उठे। उसके पहले भाजपा के राज्यसभा सदस्य डा. सुब्रमण्यम स्वामी ये कहकर सनसनी  पैदा कर चुके थे कि नेपाल के महाराजा स्व. त्रिभुवन वीर विक्रम शाह ने भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित नेहरु के सामने नेपाल के भारत में विलय का प्रस्ताव रखा था किन्तु उन्होंने उससे इंकार कर दिया। डा. स्वामी के उस दावे को इस आधार पर अविश्वसनीय करार दिया गया क्योंकि विदेश मंत्रालय में तत्संबंधी कोई दस्तावेज नहीं था। इस बारे में ये भी कहा गया था कि सरदार पटेल नेपाल का भारत में  विलय चाहते थे किन्तु नेहरु जी  राजी  नहीं हुए। लेकिन अब प्रणव दा की संदर्भित पुस्तक में डा. स्वामी द्वारा छेड़ी गई बात की पुष्टि होने के बाद नेहरु युग की विदेश नीति पर नए सिरे से सवाल उठना स्वाभाविक होगा। इस सम्बन्ध में सबसे बड़ी बात स्व. मुखर्जी ने ये लिखी कि यदि इंदिरा जी होतीं तब वे सिक्किम की तरह नेपाल का भी भारत में विलय करवा लेतीं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रणव दा देश के विदेश मंत्री भी रह चुके थे और उस आधार पर उनकी बात को आसानी से नकार देना भी कठिन होगा। हालाँकि इस तरह की पुस्तकें और उनसे उठने वाले विवाद उससे जुड़े पात्रों के अलावा लेखक के न रहने पर कुछ दिन तक चर्चित रहकर भुला दिए जाते हैं, फिर भी  नेपाल संबंधी स्व. मुखर्जी का दावा वैदेशिक मामलों के शोधकर्ताओं के लिए एक ज्वलंत विषय है। हालाँकि उसकी पुष्टि अथवा खंडन दस्तावेज ही कर सकते हैं क्योंकि नेपाल के तत्कालीन महाराजा के अलावा इस विषय से जुड़े पंडित नेहरु और पुस्तक के लेखक में से कोई भी जीवित  नहीं है। यदि प्रणव दा के रहते हुए उक्त पुस्तक प्रक़ाशित हो ज़ाती तब उसमें जुड़े मुद्दों पर उनसे सवाल हो सकते थें। लेकिन लेखक की छवि और प्रतिष्ठा के देखते हुए उनकी बात को झुठलाना भी आसान नहीं होगा। पंडित नेहरु के सामने नेपाल के विलय का प्रस्ताव यदि आया था और उन्होंने उससे अस्वीकर कर दिया तो उसके पीछे के कारणों से भी देश को अवगत करवाना जरूरी है जिससे भावी पीढ़ी को इतिहास की सही जानकरी हासिल हो सके।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 January 2021

वैक्सीन के विकास ने भारत का सिर गौरव से ऊँचा किया




बीते वर्ष की शुरुवात में जब कोरोना की आहट सुनाई दी तब ये लगा था कि शायद भारत में उसका प्रकोप ज्यादा नहीं होगा लेकिन विदेशों से लौटे  यात्रियों के माध्यम से अंतत: उसने भारत में न सिर्फ प्रवेश ही किया अपितु देश के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया। जिसके बाद लम्बा लॉक डाउन लगाना पड़ा। यदि वह न लगता तब प्रारम्भिक दौर में ही कोरोना का सामुदायिक फैलाव होना तय था। लॉक डाउन के उन दो-तीन महीनों में देश में चिकित्सा व्यवस्था में समुचित सुधार किये गए जिसके अच्छे परिणाम पूरी दुनिया ने देखे। यही वजह रही  कि 135 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले  देश में कोरोना के कारण हुई मौतों का आंकड़ा विकसित कहे जाने वाले अनेक देशों की तुलना में बहुत कम रहा। शुरुवात में कोई सोच भी नहीं सकता था कि भारत कोरोना से लड़ भी पायेगा। चिकित्सकों के साथ ही जरूरी उपकरणों और यहाँ तक कि ऑक्सीजन जैसी प्राथमिक आवश्यकता से वंचित सरकारी अस्पतालों के भरोसे इतने बड़ी महामारी से जूझने की क्षमता को लेकर संदेह होना स्वाभाविक था। लेकिन संकट के समय भारत ने सदैव दुनिया को चौंकाया है और वही कोरोना को लेकर भी हुआ। जून में जब लॉक डाउन शिथिल किया गया  तब  कोरोना का विस्फोटक अंदाज सामने आया। लेकिन जल्द ही उस पर काबू पाया जाने लगा। इसके लिये केंद्र से लेकर ग्रामीण स्तर तक जो प्रयास और प्रबंध किये गए वे रंग लाये और साल खत्म होते-होते तक भारत कोरोना को मात देने की स्थिति में आ गया। नये संक्रमितों की संख्या में लगातार कमी आने के साथ ही अस्पतालों से स्वस्थ होकर घर लौटने वाले नित्यप्रति ज्यादा हो रहे हैं। मृत्युदर भी 4 प्रतिशत से कम रह गई है। और ये भी तब जब अमेरिका सहित यूरोप के अनेक संपन्न देश कोरोना की दूसरी लहर के अलावा उसके नए रूप से जूझने मजबूर हैं। नए साल की शुरुवात में देश को ये खुशखबरी मिली कि भारत में ही विकसित एक वैक्सीन के उपयोग की अनुमति दे दी गई है और कुछ ही दिनों बाद दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरु कर दिया जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के साथ मिलकर जो व्यवस्था की जा रही हैं वह उम्मीदों के साथ ही आत्मविश्वास का संचार करने वाली है। पूरी दुनिया को ये देखकर आश्चर्य हो रहा है कि जिस भारत को वे पिछड़ा मानते रहे वह न सिर्फ अपने वरन समूची दुनिया के लिए वैक्सीन बना रहा है। हालांकि  चीन, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका ने भी वैक्सीन विकसित कर ली है लेकिन भारत जैसे देश के  लिए नि:संदेह ये बड़ी उपलब्धि है। वैसे तो वैक्सीन के उत्पादन में भारत पहले से ही दुनिया का  अग्रणी देश रहा है , लेकिन एक अपरिचित संक्रमण की वैक्सीन इतनी जल्दी विकसित करने के बाद बड़े पैमाने पर उसका उत्पादन कर लेना निश्चित रूप से बड़ा कारनामा है जिसके लिए सीरम इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक अभिनन्दन के पात्र हैं। निश्चित रूप से ये समूचे देश के लिए गौरव का विषय है और पूरी दुनिया को ये संदेश  भी कि भारत बड़ी से बड़ी मुसीबत से लड़ने का आत्मविश्वास अर्जित कर चुका है और जरूरत पड़ने पर वह दुनिया की सहायता करने की क्षमता से युक्त है। कोरोना भले ही एक महामारी के तौर पर आया लेकिन उसने समूची मानव जाति के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया। विकसित देश तक उसके सामने असहाय खड़े रहकर मौत का मंजर देखते रहे। जिन्हें अपनी चिकित्सा सुविधाओं का घमंड था उन देशों में तो कब्रिस्तान तक  छोटे पड़ गए। उस आधार पर देखा जाये तो कुपोषण और गरीबी के शिकार करोड़ों लोगों के हमारे  देश में कोरोना को नियंत्रित कर लेना मानवीय संकल्प का उत्कृष्ट उदाहरण कहा जाएगा। जितने कम समय में वैक्सीन का विकास और उत्पादन किया गया वह निश्चित रूप से चमत्कृत करने वाला है। और उससे भी बड़ी बात है केंद्र सरकार द्वारा समय रहते टीकाकरण संबंधी विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर लेना, जिसकी वजह से वैक्सीन को तकनीकी स्वीकृति मिलते ही उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जा सकी। आने वाले कुछ महीनों तक जो टीकाकरण अभियान चलेगा वह भारत के  प्रबंधन कौशल और  क्षमता का अभूतपूर्व प्रगटीकरण होगा। लेकिन इस उपलब्धि की खुशी में किसी भी प्रकार की लापरवाही खतरनाक हो सकती है क्योंकि जब तक दुनिया में एक भी संक्रमित रहेगा तब तक कोरोना को विदा मान लेना मूर्खता होगी। और फिर अब तो उसका दूसरा रूप भी सामने आ चुका है जिसके लगभग दो दर्जन मरीज भारत में भी मिल चुके हैं जो हाल ही में विदेशों से आये थे। जैसी कि उम्मीद व्यक्त की जा रही है उसके अनुसार आगामी छह माह में भारत में टीकाकरण का महत्वाकांक्षी अभियान प्रभावी रूप ले लेगा। लेकिन आगे पाट-पीछे सपाट की स्थिति को रोकने में जनसहयोग जरूरी होगा। भारत की जनता ने लॉकडाउन को सफल बनाकर जिस अनुशासन का परिचय दिया उसे राष्ट्रीय स्वभाव बनाना समय की  मांग है। आगामी कुछ महीने उस दृष्टि से बेहद संवेदनशील होंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 January 2021

21 वीं सदी का 21 वां वर्ष भारत के लिए नई उम्मीदें लेकर आया



21 वीं सदी का 20 वां साल बहुत ही दर्दनाक यादों के साथ समाप्त हुआ । पहले आर्थिक मंदी और उसके बाद कोरोना नामक वैश्विक महामारी ने हर खासो - आम को भय और तनावग्रस्त कर दिया । पूरी दुनिया ठहर सी गई ।  एक अदृश्य वायरस ने अपने शोध और  ज्ञान - विज्ञान पर इतराने वाले दोपाये इंसान को  साफ़ शब्दों में समझा दिया कि अपने को सर्वशक्तिमान समझने की मूर्खता बंद कर दो । वह वायरस कैसे और कहाँ से आया ये आज भी रहस्य है । मानव जाति ने भले ही उसको रोकने का उपाय तलाश लिया हो लेकिन सुना है कोरोना के अन्य परिजन भी धीरे - धीरे चले आ रहे हैं और जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार तो वे सब लम्बे समय तक पृथ्वीवासियों को को हर समय मौत की आशंका से ग्रसित करते रहेंगे । लेकिन यहीं मानवीय संकल्प की भूमिका शुरू होती है जिसने बीते करोड़ों वर्षों में अपनी दृढ इच्छाशक्ति से हर असंभव को सम्भव कर दिखाया । और इसी आधार पर ये उम्मीद करना गलत न होगा कि बीते साल में समूची मानव जाति पर जो संकट आया उससे उबरने में भी  सफलता हासिल होगी जिसमें भारत की  भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहेगी । कोरोना की वैक्सीन के अलावा आर्थिक क्षेत्र में भी पूरे विश्व की निगाहें भारत पर टिकी रहेंगी । इसका कारण चीन को लेकर पूरी दुनिया में व्याप्त वितृष्णा है । कोरोना वायरस के फैलाव का संदेह उसी पर जाता है । ताजा रिपोर्टों से इस आरोप को एक बार फिर बल मिल रहा है कि वुहान नामक अपने शहर में कोरोना की शुरुवात की  जानकारी उसने पूरी दुनिया से छिपाई । यही नहीं तो अपने नागरिकों को देश से बाहर जाने से भी नहीं रोका जिसके परिणामस्वरूप कोरोना पूरी दुनिया में फ़ैल गया । हालांकि इस बात को साबित करना बेहद कठिन है कि कोरोना वायरस चीन द्वारा विकसित कर पूरी दुनिया में फैलाया गया लेकिन ये मान लेना सौ फीसदी सही है कि उसने इसकी जानकारी छिपाकर इसे विश्वव्यापी बना दिया और इस लिहाज से चीन और वहां के शासक एक तरह से पूरी मानवता के दुश्मन के तौर पर सामने आये हैं । यही वजह है कि कोरोना का कहर झेलने के साथ ही दुनिया भर ने चीन से  अपने - अपने तरीके से दूरी बनाना शुरू कर दिया । और यहीं से भारत के लिए 2021 को  अपार संभावनाओं वाले साल के तौर पर देखा जाने लगा है । 2020 का तीन चौथाई समय कोरोना की बलि चढ़ गया । अनेक महीनों तक पूरा देश ठहराव की स्थिति में रहने मजबूर था । वे दिन अनगिनत दर्दनाक और डरावनी यादें छोड़कर चले गए किन्तु  उसके बाद देश ने नए उत्साह और ऊर्जा के साथ जि़न्दगी को पटरी  पर लौटाने का जो पुरुषार्थ प्रदर्शित किया वही इस देश  की प्रबल इच्छाशक्ति का परिचायक है । हालांकि अभी भी धुंध पूरी तरह छंटी नहीं है लेकिन उसके पीछे से आ रही रश्मियाँ उत्साहित भी कर रही हैं । भारत मनीषियों और तपस्वियों की पुण्य भूमि है और उन्हीं में से दो स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविन्द ने पिछली शताब्दि में ही ये भविष्यवाणी कर दी थी कि 21 वीं सदी भारत की होगी और उसकी गौरव पताका एक बार फिर पूरे विश्व में फहरायेगी । उक्त महापुरुषों ने आध्यात्म के क्षेत्र में रहकर भी  पराधीन भारत की पीड़ा को महसूस करते हुए अपने तपोबल से भविष्य को देखकर आशाओं का जो दीप जलाया था उसका प्रकाश अब देश की सीमाओं से निकलकर  समूचे विश्व को आलोकित करने की स्थिति में आ  गया है । 2021 का प्रथम दिवस सही मायनों में संकल्प करने का अवसर है । बीते साल की अकल्पनीय परेशानियों से उबरकर प्रयासों की पराकाष्ठा अपेक्षित भी है और आवश्यक भी । और इसके लिए समन्वित प्रयास और भावनात्मक एकता  सबसे बड़ी जरूरत है । लोकतान्त्रिक देश होने से हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है । लेकिन दूसरी तरफ ये भी ध्यान रखना होगा कि वैचारिक स्वतंत्रता का उपयोग जनहित में हो न कि निजी स्वार्थों के लिए । उस दृष्टि से 2021 को राष्ट्रीय पुनरुत्थान का वर्ष बनाना हम सभी का दायित्व है । विश्व गुरु बनने के लिए जरूरी है कि हमारा आचरण भी गुरुवत  हो ।
21 वीं सदी का 21 वां वर्ष भारत और उसमें रहने वालों के लिए हर दृष्टि से मंगलकारी हो यही प्रभु से प्रार्थना है ।

- रवीन्द्र वाजपेयी