Wednesday, 20 January 2021

जितनी जरूरत भारत को अमेरिका की है उतनी ही उसे भी हमारी है



अमेरिका में आज सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की जगह जो वाईडन राष्ट्रपति होंगे।वैसे तो चुनाव जीतने के बाद उनका व्हाईट हाउस में प्रवेश एक साधारण लोकतांत्रिक प्रक्रिया है लेकिन निवर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप ने चुनाव परिणामों को लेकर जिस तरह का फूहड़पन दिखाया और ठेठ गुंडागर्दी की शैली में संसद पर बलात कब्जे जैसे हालात पैदा किये उसकी वजह से सत्ता  हस्तांतरण  के पहले जो कुछ भी घटा उससे अमेरिका की छवि तो खराब हुई ही अन्य प्रजातांत्रिक देशों में भी उसी तरह के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति का खतरा पैदा हो गया।यहाँ तक कि भारत के बारे में भी अनेक लोगों ने ऐसी  ही आशंका व्यक्त करने  में देर नहीं लगाई।इस समूचे प्रकरण में  सबसे उल्लेखनीय और प्रशंसनीय बात रही अमेरिका के जनप्रतिनिधियों के साथ ही वहां के समाचार माध्यमों और  बुद्धिजीवियों की सकारात्मक भूमिका जिन्होंने बिना लागलपेट के ट्रंप की हर कोशिश को नाकाम कर दिया।यहाँ तक कि अपनी पार्टी के भीतर भी उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा।आखिरकार वे मुंह काला  करने के बाद व्हाइट हॉउस से निकलने को मजबूर हो गये।इतिहास उन्हें  अमेरिका के  सबसे कलंकित राष्ट्रपति के तौर पर ही याद रखेगा इसमें कोई संदेह नहीं है।जहां तक  वाइडन का प्रश्न है तो वे काफी अनुभवी हैं। बराक ओबामा के साथ उपराष्ट्रपति रहने के अलावा अमेरिकी संसद की विदेशी नीति संबंधी समिति के मुखिया रहने के कारण भी वे  वैश्विक मामलों के अच्छे जानकार हैं। शुरुवात में उन्हें लेकर भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक सशंकित थे किन्तु वाइडन ने चतुराई दिखाते हुए  कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति बनाने का ऐलान कर अप्रवासी भारतीयों के बड़े हिस्से  को अपने पक्ष में कर लिया। हालांकि अतीत में अनेक मसलों पर कमला का रवैया भारत विरोधी रहा है लेकिन अब उनकी भूमिका स्वतंत्र न होकर वाइडन के सहयोगी की होगी।अपने स्टाफ में महत्वपूर्ण पदों पर भारतीय मूल के 20 लोगों की नियुक्ति कर वाइडन ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय भी दे दिया।यूँ तो अमेरिका के हर राष्ट्रपति के मन में पूरी दुनिया की चिंता रहती है लेकिन वाइडन की ताजपोशी ऐसे हालातों  में हो रही है जब कोरोना के कारण सिर्फ अमेरिका ही नहीं वरन समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था डगमगाने की स्थिति में है। संक्रमण का पलटवार नई आशंकाओं को जन्म दे रहा है। अमेरिका में कोरोना ने जिस तरह का कहर बरपाया उससे इस महाशक्ति की छवि को काफी धक्का पहुंचा है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि वैश्विक शक्ति संतुलन नए सिरे से निर्धारित होने के असार बढ़ गये हैं।बीते दो - तीन दशक निश्चित रूप से चीन के उभार के माने  जा सकते हैं किन्तु कोरोना के बाद से उसके प्रभाव में जबर्दस्त कमी आने से भारत की महत्ता विश्व मंच पर सहज रूप से बढ़ गई।कोरोना संकट से सफलतापूर्वक निपटने के बाद टीकाकरण में भी बाजी मार लेने की वजह से विकसित देश तक अब चीन की बजाय भारत में संभावनाएं देखने लगे हैं। अमेरिका द्वारा चीन को विश्व बिरादरी में लाकर बिठाने की जो गलती 1972 में की गयी  थी उसका एहसास उसे बीते एक साल में बखूबी हो गया। और यही कारण है कि बतौर राष्ट्रपति वाइडन ने अपनी टीम में उपराष्ट्रपति कमला के अलावा  भारतीय मूल के काफी लोगों को स्थान दिया। यही नहीं अप्रवासियों के प्रति उनका लचीला रुख भी अप्रवासी भारतीयों का दिल जीतने की दिशा में बढ़ाया कदम है। लेकिन  इसका ये अर्थ कदापि न लगाया जाए कि वाइडन प्रशासन पूरी तरह भारतीय हितों के अनुरूप काम करेगा। कमला हैरिस को लेकर भी जरूरत से ज्यादा  आशावाद  ठीक नहीं होगा। इसका कारण ये है कि अमेरिका में चाहे डेमोक्रेट राज करें या रिपब्लिक किन्तु वे  अमेरिकी हितों से लेशमात्र भी समझौता नहीं करते और उनकी  विदेश नीति विशुद्ध उपयोगितावाद पर आधारित रहती है।पाकिस्तान इसका उदाहरण है जिसे अपने घोर विरोधी चीन का दुमछल्ला होने के बावजूद लम्बे समय तक अमेरिका दूध पिलाकर पालता रहा। रही बात  प्रशासन में भारतीय मूल के लोगों के मौजदगी की तो वह बिल क्लिंटन , बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप सभी के कार्यकाल में  देखने मिली। जाहिर तौर पर भारत के प्रति   अमेरिका की बेरुखी को खत्म करने में अप्रवासी भारतीयों  की महती भूमिका रही है जिसका अनुभव क्लिंटन , ओबामा और ट्रम्प तीनों के कार्यकाल में हुआ भी  किन्तु उसका सबसे बड़ा कारण इस्लामी आतंकवाद है जिससे निपटने में अमेरिका को भारत की बेहद जरूरत महसूस हुई। इसके साथ ही एशिया में चीन के एकाधिकार को रोकने के लिए भी उसके पास भारत से अच्छा सहयोगी नहीं हो सकता। ये देखते हुए नए राष्ट्रपति के तौर पर वाइडन से बहुत ज्यादा उम्मीदें न लगाने के बाद भी कम से कम ये तो माना ही  जा सकता है कि वे  ट्रंप जैसी अस्थिरता से बचते हुए भारत के प्रति  क्लिंटन और ओबामा के दौर की गंभीर और  परिपक्व नीति का परिचय देंगे जिनके कार्यकाल में भारत और अमेरिका के सम्बन्ध काफी मजबूत हुए। इस बारे में एक बात ये भी ध्यान देने लायक है कि भारत को अमेरिका के समर्थन और सहयोग की  जरूरत तो है लेकिन वह  इस महाशक्ति पर पूरी तरह निर्भर न होकर अपना रास्ता खुद चुनने की हैसियत और काबलियत अर्जित कर चुका है। ज्ञान - विज्ञान के साथ ही आर्थिक  क्षेत्र में भी भारत विश्व के अग्रणी देशों की कगार में शामिल हो गया है। जी - 8 और जी - 20 जैसे  समूहों  में उसे ससम्मान बुलाया जाने लगा है। बीते दो साल के झटके से उबरकर  भारतीय अर्थव्यवस्था दोबारा ऊंची उड़ान के लिए तैयार है। पूरी दुनिया ये  मान बैठी है कि चीन का सर्वश्रेष्ठ दौर खत्म होने के बाद  अब भारत विश्व मंच पर अपनी सशक्त भूमिका के निर्वहन को तैयार है। और इसीलिये ये सोचना गलत न होगा कि वाइडन चाहकर भी भारत की उपेक्षा नहीं कर सकेंगे क्योंकि भारत अमेरिका  के लिए जरूरी भी है और मजबूरी भी। और ताजा घटनाक्रम के  बाद ये भी साबित हो गया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया  के पालन को लेकर भारत की प्रतिबद्धता किसी भी दृष्टि से अमेरिका से कम नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 19 January 2021

नये मेडीकल कालेजों का स्वागत लेकिन पढ़ाने वाले प्राध्यापक कहाँ से आएंगे



 

मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत दिवस दिल्ली में केन्द्रीय मंत्रियों से मिलकर प्रदेश की अनेक योजनाओं को शुरू करने के साथ ही बजट में नये प्रकल्पों की स्वीकृति हेतु आग्रह किया | इनमें लघु और मध्यम उद्योगों के साथ ही , राजमार्ग विकास और सैनिक स्कूल के साथ ही सिवनी में मेडिकल कालेज आदि हैं | लेकिन श्री सिंह द्वारा जो सबसे  महत्वपूर्ण मांग की गयी वह थी दमोह अथवा छतरपुर में एम्स  ( अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ) की स्थापना | कोरोना काल में  चिकित्सा  सुविधाओं का जाल पूरे देश में फ़ैलाने की जरूरत महसूस की गई | भले ही हम इस बात पर इतरा लें कि भारत  कोरोना के विरुद्ध जंग में  न्यूनतम जनहानि के साथ जीत की देहलीज पर आ पहुंचा है और रिकॉर्ड समय में उसने टीकाकरण का महाभियान भी प्रारम्भ कर  दिया है लेकिन जैसी कि खबरें आ रही हैं उनसे लगता है कि कोरोना भले ही जाता हुआ दिखाई दे रहा है किन्तु उस जैसे या उससे भी ज्यादा खतरनाक वायरस मानव जाति को चुनौती देने को तैयार हैं | कोरोना को लेकर अभी भी ये आशंका है कि वह चीन की शरारत थी लेकिन ये मान लेने के बाद भी ऐसी किसी  भी आपदा से निपटने के लिए उसी तरह की मुस्तैदी आवश्यक है जैसी  सीमा पर तैनात सैनिक सदैव दिखाते  हैं | उस दृष्टि से ये आवश्यक हो गया है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का उन्नयन तो हो ही लेकिन उनका विकेन्द्रीकरण भी किया जावे | एक ज़माना था जब एम्स केवल दिल्ली में था | उसके समकक्ष समझे जाने वाले पीजीआई की स्थापना चंडीगढ़ में की गई | उक्त दोनों  संस्थान उच्च स्तरीय चिकित्सा शिक्षा और इलाज के सबसे बड़े सरकारी संस्थान बन गये | एम्स की स्थापना के पीछे उद्देश्य दिल्ली में रहने वाले अति विशिष्ट महानुभावों को अच्छा इलाज उपलब्ध करवाना था | हालाँकि कालान्तर में अधिकाँश वीआईपी इलाज हेतु सरकारी खर्च पर विदेश जाने  लगे लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि एम्स तथा पीजीआई देश में उच्च स्तरीय चिकित्सा और इलाज के पहले सरकारी प्रतीक बन गये | लेकिन देश के बाकी हिस्सों को ये सुविधा मिलने में दशकों लगे | केंद्र में अटलबिहारी  वाजपेयी की सरकार का राजनीतिक मूल्यांकन अलग - अलग हो सकता है किन्तु एक बात निर्विवाद तौर पर मानी जा सकती है कि देश में  अत्याधुनिक राजमार्गों के अतिरिक्त पक्की ग्रामीण सड़कों का जाल बिछाने का जो काम अटल जी  की सरकार ने किया वह ऐतिहासिक बन गया | लेकिन उनके कार्यकाल की एक और उपलब्धि जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम ही होती है वह है आईआईटी और आईआईएम के अलावा  नये एम्स और पीजीआई खोलने  का निर्णय | उसका जबर्दस्त लाभ भी हुआ | देश में उच्च शिक्षित इंजीनियरों के अलावा विश्वस्तरीय प्रबन्धक तैयार करने में जहाँ आआईटी और आईआईएम का उल्लेखनीय योगदान रहा वहीं उच्च स्तरीय चिकित्सा शिक्षा और  इलाज के क्षेत्र में एम्स और पीजीआई की भूमिका को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता |  उस दृष्टि से श्री चौहान द्वारा मप्र के अति पिछड़े कहे जाने वाले बुन्देलखंड के दमोह अथवा छतरपुर में एम्स खोलने का आग्रह स्वागतयोग्य है |  सिवनी में मेडिकल कालेज खोलने का फैसला भी इस आदिवासी अंचल  के लिए बड़ी सौगात होगी | हालांकि नजदीकी  जिले छिंदवाड़ा को मेडिकल कालेज पहले ही मिल चुका था | लेकिन चिकित्सा सुविधाओं का जाल बिछाने में सबसे बड़ी परेशानी चिकित्सकों की कमी है | उसकी वजह से जो मेडिकल कालेज पहले से ही चल रहे हैं उनमें मेडिकल काउन्सिल के मापदंडों के आधार पर सीटें बढ़ाना संभव नहीं होता | प्रोफेसरों की किल्लत एमबीबीएस के बाद एमएस या एमडी करने वाले छात्रों के लिए बाधा  बन जाती है | ऐसे में ये प्रश्न उठता रहा है कि चाहे एम्स हो या मेडीकल कालेज , जब तक उनमें पढ़ाने के लिए योग्य और समर्पित शिक्षक नहीं मिलते तब तक वे गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाते | ये देखते हुए बेहतर होगा कि नए संस्थान खोलने की बजाय सरकार अपने वर्तमान मेडीकल कालेजों का ही उन्नयन करते हुए आगामी पांच सालों की कार्ययोजना बनाकर देश में चिकित्सकों की कमी  दूर करने का अभियान चलाये | सरकार के समानांतर निजी क्षेत्र में भी  चिकित्सा शिक्षा और इलाज के बड़े - बड़े केंद्र खुल गये हैं लेकिन उनका असली मकसद पैसा बटोरना है | ऐसे में सरकार के लिए यही उचित होगा कि नए मेडिकल कालेज  खोलने से पूर्व  वर्तमान की दशा सुधारे | देश के हर व्यक्ति को  प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध करवाना समय की मांग है | कोरोना ने इसकी जरूरत को और प्रतिपादित कर दिया है किन्तु चिकित्सकों की कमी के चलते ग्रामीण तो छोड़िये कस्बों तक में साधारण  चिकित्सा उपलब्ध नहीं है | सरकार झोला छाप चिकित्सकों के विरुद्ध अभियान चलाती है लेकिन कटु सत्य ये है कि सुदूर इलाकों में जरूरत पड़ने पर वे ही लोगों को प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध करवाते हैं | हाल ही में जिला स्तर पर मेडीकल कालेज खोलने की चर्चा भी सुनने में  आई | निश्चित रूप से ये बड़ा क्रांतिकारी कदम होगा किन्तु उसके पहले पढ़ाने वाले प्राध्यापकों के बारे में सोचा जाना चाहिए | हालंकि एक विकल्प मेडीकल कालेजों से सेवा निवृत्त हो चुके प्राध्यापकों की सेवाएं लेना भी है | विकास की राह पर तेजी से बढ़ रहे देश में जब तक चिकित्सा सुलभ नहीं होती तब तक सारी उपलब्धियां अधूरी रहेंगीं | कोरोना काल के बाद इस दिशा में महत्वाकांक्षी प्रयास जरूरी हो गए हैं लेकिन उसके लिए व्यवहारिक सोच भी जरूरी है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 18 January 2021

बजट : अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार का सुनहरा अवसर



मोदी सरकार व्यवस्था में सुधार हेतु कड़े निर्णय लेकर उन पर अडिग रहने के लिए जानी जाती है | लोकप्रियता घटने के डर से यथास्थिति बनाए रखने की बजाय प्रधानमंत्री साहसिक फैसले लेने का कोई अवसर नहीं छोड़ते | पिछले कार्यकाल में  जब उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले लिए तब भाजपा के भीतर भी एक तबका उन्हें आत्मघाती मानकर भयभीत था |  लेकिन चुनाव परिणामों ने ये साबित कर दिया कि जनता कड़े फैसलों को समर्थन देती है , बशर्ते मंशा साफ़ हो | श्री मोदी के पूर्ववर्ती डा. मनमोहन सिंह बहुत ही अनुभवी , सुयोग्य और ईमानदार नेता थे किन्तु वे अपने गुणों के अनुरूप फैसले नहीं कर सके  | सत्तर के दशक में स्व. इंदिरा गांधी ने सत्ता सँभालते ही  बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रिवीपर्स समाप्ति जैसे निर्णय लेकर जनता को आकर्षित किया था | स्व. पीवी नरसिम्हा राव को भी इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिये कि उन्होंने देश को आर्थिक उदारीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ाकर   वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए प्रेरित किया | हॉलांकि किसी भी फैसले को पूरी तरह दोषरहित नहीं माना जा सकता किन्तु जो काम करता है गलती भी उसी से होती है | उस दृष्टि से देखें तो मनमोहन सिंह जी ने राव सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर जो हिम्मत दिखाई वह बतौर प्रधानमन्त्री न दिखा सके  | श्री मोदी इस बात को अच्छी तरह  समझते  थे और इसीलिये उन्होंने सत्ता सँभालने के बाद ही ताबड़तोड़ फैसले लेने शुरू किये | शासन - प्रशासन को ढर्रे से निकालकर निर्णय प्रक्रिया को त्वरित और प्रभावशाली बनाने का प्रयास उन्होंने पहले दिन से ही शुरू कर दिया था | | जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 और 35 ए से बाहर निकालकर भारत के अन्य राज्यों जैसा बनाना साहस की पराकाष्ठा कही जा सकती है | नागरिकता संबंधी कानूनी प्रावधान भी उसी श्रेणी में रखने लायक हैं | लेकिन अपार जनसमर्थन के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर केंद्र  सरकार की नीतियों को लेकर असंतोष है | इसकी वजह करों के  भारी  - भरकम  बोझ के अलावा वे पेचीदगियां हैं जो कारोबारी जगत को परेशान करती हैं |  जैसे - जैसे  स्थिति सामान्य होती जा रही है वैसे - वैसे  सरकार से वैसी ही उदारता  की उम्मीद की जा रही है जैसी कि कोरोना  से निपटने में उसने दिखाई | लॉक डाउन के दौरान व्यापार और उद्योग जगत को दी गई राहतें अब अपर्याप्त लगने लगी हैं | इसकी वजह बैंकों द्वारा  एनपीए को लेकर  बनाया जा रहा दबाव है | व्यापार जगत को ये भी चाहत  है कि सरकार ने लॉक डाउन के दौरान जो सहूलियतें और रियायतें  दी थीं उनको जारी रखा जाना चाहिए था किन्तु जैसे  ही लॉक डाउन शिथिल हुआ वैसे ही सरकारी विभाग पठानी शैली में नजर आने लगे | ये बात पूरी तरह सही है कि अर्थव्यवस्था तेजी से पटरी पर लौट रही है लेकिन वास्तविकता ये है कि अभी भी उसे संबल दिया जाना ज्ररूरी है | बाजार में पूंजी का प्रवाह भी उम्मीद के मुताबिक नहीं होने से व्यापार - उद्योग जगत को परेशानी हो रही है और वह पूरी तरह से सरकार और बैंकों पर निर्भर है | ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि करों के ढांचे और वसूली के दबाव को कुछ कम किया जाए | बैंकों की स्थानीय शाखाओं पर ऊपरी दबाव पड़ता है जिसकी वजह से वे अपने कर्जदारों को हलाकान कर रहे हैं | बिजली विभाग के साथ ही स्थानीय निकाय भी  वसूली को लेकर बेरहम हैं | ये सब देखते हुए जरूरी है कि केंद्र  सरकार के आगामी बजट में आयकर के साथ ही जीएसटी जैसे करों को लेकर बड़ी रियायतें देने के अलावा कारोबारी जगत से की जाने वाली कर वसूली को भी समयानुसार व्यवहारिक बनाया जाए | कोरोना काल में सरकारी खजाने पर बुरा असर तो  जरूर  पड़ा  लेकिन अभी भी स्थितियां पूरी तरह से सामान्य चूँकि नहीं हुईं इसलिए सरकार को चाहिए वह करों के बोझ को तो कम करे ही वसूली प्रक्रिया में भी जरूरत से ज्यादा सख्ती से बचे जिससे कि आर्थिक गतिविधियाँ गति  पकड़ सकें | भले ही बीते महीने जीएसटी संग्रह ने पिछले आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया हो लेकिन अभी तक कुछ विशेष क्षेत्रों में ही तेजी नजर आ रही है जबकि बाकी में मांग जोर नहीं पकड़ पा रही | कोरोना का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव आम उपभोक्ता पर है उसकी वजह से बाजार में उठाव अपेक्षनुसार न होने से अर्थव्यवस्था अब तक दौड़ पाने की स्थिति में नहीं आई | ऐसे में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को चाहिए वे बजट को करों में अधिकतम रियायत पर केन्द्रित रखें जिससे कारोबारी जगत को प्राणवायु मिले और वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से पांव टिका सके | कोरोना के बाद दुनिया के बाजारों में चीन के प्रति जिस तरह की घृणा का भाव देखा जा रहा है उसके कारण भारत के लिए निर्यात बढ़ाने  का सुनहरा अवसर है | लेकिन करों की दरें और व्यवस्थाजनित कठिनाइयों के चलते उसमें सफलता नहीं मिल पाती | प्रधानमन्त्री ने कोरोना से निपटने के कठिनतम अभियान का बड़ी ही कुशलता के साथ नेतृत्व करते हुए अपनी और भारत दोनों  की छवि को उज्जवल किया है | इस बजट में मोदी सरकार  साहस का परिचय देते हुए कर ढांचे को आपदा में अवसर तलाशने के मद्देनजर नया रूप दे सके तो आगामी वित्तीय वर्ष में अकल्पनीय परिणाम आ सकते हैं | हाल ही में हुए कुछ अध्ययनों में एक बात उभरकर आई है कि भारत में सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार जिसका एक प्रमुख कारण  कर ढांचा है | सरकार के अपने वैचारिक सहयोगी  संगठनों ने इस विसंगति में सुधार हेतु कुछ उपाय सुझाए हैं जिनमें आयकर समाप्त करते हुए उसकी जगह ट्रांजेक्शन टेक्स लगाना है | कहा जाता है नोटबंदी के पीछे भी वही सोच थी किन्तु वह सिलसिला आगे नहीं बढ़ सका | अच्छा होगा इस बजट में प्रधानमंत्री एक बार पुनः साहस दिखाते हुए अर्थव्यस्था में ऐसे क्रांतिकारी  सुधार की नींव रखें  जो भ्रष्टाचार रूपी गाजर घास को जड़ से उखाड़ फेंकने में सहायक बन सके | 

-रवीन्द्र वाजपेयी



Saturday, 16 January 2021

किसान और सरकार दोनों अपने -अपने समर्थन को प्रमाणित करें



किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच दसवीं वार्ता भी बेनतीजा खत्म हो गई ।  गत दिवस चार घंटे चली बैठक के बाद केवल इस बात पर दोनों एकमत हुए कि अगली बैठक 19 जनवरी  को होगी ।  कल हुई  बैठक में केंद्र सरकार और किसान संगठन दोनों  अपनी - अपनी बात पर अड़े रहे ।  किसान न तो सर्वोच्च न्यायालय  द्वारा बनाई समिति के सामने जाने राजी हैं और न ही केंद्र सरकार के आग्रह पर उसे किसी भी प्रकार का सुझाव देने के लिए ।  दूसरी तरफ सरकार भी कानून वापिस लेने से इंकार करने के बावजूद किसान संगठनों के नेताओं से लगातार अनुरोध कर  रही है कि वे भी  थोड़ा लचीला रुख दिखाते हुए आगे बढ़ें तो बीच का रास्ता निकाला जा सके ।  लेकिन वे एक इंच भी पीछे हटने राजी नहीं हैं ।  ऐसे में पूरे देश में ये सवाल पूछा जाने लगा है कि दोनों पक्ष दो - चार दिन की तैयारी के बाद  घंटों बैठकर  आखिरकार करते क्या हैं ? एक वार्ता छोड़कर जिसमें पराली  और नये बिजली बिल पर  सहमति के अलावा ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे  लगता कि  कुछ नतीजा निकल रहा है ।  किसानों का धरना 52 दिन पुराना हो चुका है ।  भले ही वे नित नये आयोजनों के जरिये अपनी सक्रियता दिखाते हों  लेकिन आन्दोलन एक मेले जैसा होकर रह गया हैं जिसकी  बेहतर प्रबन्ध के कारण सर्वत्र चर्चा है ।  ये भी सही है कि दिल्ली में होने के कारण उसे जो प्रचार मिल रहा है वह अन्यत्र नहीं मिलता ।  सीएए के विरोध में शाहीन बाग़ में  सड़क रोककर किया गया धरना भी इसीलिए सुर्खियाँ बटोर सका क्योंकि वह राष्ट्रीय राजधानी में था ।  किसान आन्दोलन के कर्ता - धर्ता इस बात को भांप चुके थे और फिर उनके साथ कुछ वे लोग भी जुड़ गये जो पहले भी सरकार के विरुद्ध इसी तरह के आयोजनों की रूपरेखा बनाते रहे ।  सरकार ने शाहीन बाग के आन्दोलनकारियों से तो बात तक नहीं की लेकिन किसान आन्दोलन के नेताओं से वह शुरुवात से ही चर्चा करती आ रही है ।  सबसे रोचक बात ये है कि दोनों पक्ष पीछे नहीं हटने का इरादा जताने के बाद भी दोबारा बातचीत के लिए तैयार हो जाते हैं ।  कल की वार्ता के पहले भी अनेक किसान नेताओं को ये कहते सुना गया कि उम्मीद तो कुछ भी नहीं है लेकिन जा रहे हैं ।  दूसरी तरफ सरकार की तरफ से ये कहा जाता है कि आगामी बैठक में बात बन ही जायेगी ।  ये सब देखते हुए बैठक नामक ये धारावहिक अब उबाऊ लगने लगा है ।  किसान संगठन डींग कितनी भी हांकें लेकिन वे अपनी मजबूरी समझ गए हैं ।  राजनीतिक दलों को दूर रखने का जो दिखावा उनकी तरफ से हुआ अब वह उनके गले पड़ गया है ।  कांग्रेस ने गत दिवस देश भर में प्रदर्शन किया जरूर लेकिन उसमें किसानों की भागीदारी नगण्य ही थी ।  अन्य गैर भाजपाई पार्टियां भी किसानों के पक्ष में घड़ियाली आंसू बहा रही हैं ।  रही बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाई गई समिति की तो उसके एक सदस्य द्वारा खुद को अलग कर लिए जाने  के बाद ये सुनने में आया कि और एक सदस्य स्तीफा दे देंगे किन्तु बाकी की तरफ से काम शुरू करने के संकेत आने से अब ये लग रहा है कि भले ही आन्दोलनकारी समिति को भाव न दें लेकिन वह कृषि कानूनों के समर्थकों को अपनी  बात कहने का अवसर प्रदान करेगी ।  और उस सूरत में किसान विरुद्ध किसान वाली स्थिति बन जाये तो आश्चर्य नहीं होगा ।  इस सम्बन्ध में एक बात और जो गम्भीर चिंता का विषय है और वह है आन्दोलनकारी  संगठनों द्वारा गणतंत्र दिवस की परेड में अपने ट्रैक्टर निकलने की घोषणा ।  हालाँकि इस बारे में अभी भी स्थित अस्पष्ट है क्योंकि कुछ नेता राष्ट्रीय पर्व की गरिमा नष्ट न होने देने का आश्वासन भी दे रहे हैं ।  लेकिन राकेश टिकैत ने लालकिले से इंडिया गेट तक ट्रैक्टर रैली निकालने की बात कहकर चिंता पैदा कर दी है ।  भले ही सरकार के सूत्र गतिरोध दूर होने को लेकर अभी भी आशावादी हैं लेकिन उसका आधार स्पष्ट नहीं है ।  इसी तरह किसान संगठनों की तरफ से आन्दोलन के राष्ट्रव्यापी होने की जो  धमकी आये दिन दी जाती है वह भी बहुत असरकारक नहीं लग रही  ।  ऐसा लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाये जाने से आन्दोलन में मानसिक तौर पर शिथिलता आने लगी है वरना इतनी तनातनी के बावजूद किसान संगठन कल की वार्ता में शामिल न होते और बिना किसी नतीजे के समाप्त हुई बैठक के बाद अगली बातचीत के लिए रजामंद होकर बाहर न निकलते ।  हालाँकि  ये बात सरकार पर भी लागू होती है कि जब किसान संगठन उसके प्रति पूरी तरह अविश्वास व्यक्त कर चुके हैं तब वह  बार - बार वार्ता की टेबिल क्यों सजाती है ? किसानों ने अब तक सरकार का लिहाज करने का कोई संकेत नहीं दिया और न ही आन्दोलन में शामिल संगठनों में से कोई भी टूटकर अलग हुआ ।   लेकिन सरकार अपनी सौम्य छवि साबित करने के लिए कड़वी बातें सुनने के बाद भी बातचीत के सिलसिले को जारी रखने की नीति पर चल रही है ।  किसान संगठनों की तरफ से प्रधानमन्त्री की मध्यस्थता की मांग उठने से जरूर एक संकेत मिला है कि वे पीछे हटने के लिए राजी हो सकते हैं बशर्ते प्रधानमन्त्री उनसे बात करें ।  लेकिन उनकी इस मांग को सरकार इसलिए वजन नहीं दे रही क्योंकि प्रधानमन्त्री द्वारा  सार्वजनिक तौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद  और सरकारी मंडियां जारी रखने का आश्वासन  दिए जाने के बाद किसान संगठनों की प्रतिक्रिया में उपहास और अविश्वास खुलकर सामने आया ।  ऐसे में अगर प्रधानमन्त्री बातचीत करने को राजी हों और किसान संगठन उनके आश्वासन पर भरोसा न करें तब वह स्थिति सरकार के लिये अच्छी नहीं होगी ।  अगली बातचीत के पहले बेहतर हो सरकार और किसान संगठनों के कुछ चुने हुए नेताओं के बीच अनौपचारिक चर्चा के दौरान ये साफ़ हो जाये कि समझौते की कुछ गुंजाईश है भी या नहीं ? यदि नहीं है तब फिर बातचीत का सिलसिला बंद कर देना चाहिए ।  किसान संगठनों के पास यदि वाकई राष्ट्रव्यापी समर्थन है तब उन्हें उसे साबित करना चाहिए और सरकार को लगता है कि दो - तीन राज्यों के अलावा बाकी किसान नए कानूनों को लेकर संतुष्ट हैं तब उसे भी इससे देश को आश्वस्त करना चाहिए क्योंकि जिस तरह से आन्दोलनकारी संगठनों ने इसे अपनी नाक का सवाल बना लिया है वैसी ही स्थिति सरकार के सामने भी है ।  इस तरह के दबावों के कारण संसद द्वारा पारित कानूनों को  वापिस लेने के बाद उसके लिए नये फैसले करना मुश्किल  हो जाएगा क्योंकि नए - नये दबाव समूह सामने आते देर नहीं लगेगी ।  हाँ , एक सवाल और कि किसी कानून के विरोध में कुछ हजार लोग दिल्ली के दरवाजे पर आकर डेरा जमा लें तब क्या सर्वोच्च न्यायालय उसको लागू करने पर भी कुछ समय के लिए रोक लगाएगा ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 15 January 2021

कोरोना के बाद भारत के प्रति दुनिया का नजरिया बदलना बड़ी उपलब्धि



गत वर्ष जब कोरोना का संक्रमण भारत में आया था तब उसे लेकर दो तरह की बातें हुईं ।   प्रारम्भ में ये माना जा रहा था कि भारत में इसका प्रकोप ज्यादा नहीं होगा ।    इसके पक्ष में यहाँ के गर्म मौसम के साथ , खान - पान और बचपन में लगने वाले बीसीजी के टीके का तर्क दिया गया ।   ये भी कहा गया कि प्रदूषित वातावरण में रहने  के कारण  आम भारतीय की रोग प्रतिरोधक क्षमता संपन्न देशों की तुलना में ज्यादा होती है ।   कोरोना के पहले भी अनेक ऐसे संक्रमण आये जिन्होंने दूसरे देशों में तो कहर ढाया लेकिन भारत उनसे अछूता रहा ।   दूसरी तरफ कुछ लोग इस बात के प्रति आगाह करते रहे कि केंद्र सरकार को बिना देर किये आपातकालीन कदम उठाने चाहिए जिससे कि कोरोना को भारत में आने से रोका जा सके ।   इसी उहापोह के बीच विदेश से आये किसी व्यक्ति के जरिये कोरोना का आगमन हो गया ।   इस पर भी स्थिति की गंभीरता समझ में नहीं आई  ।   फरवरी के अंतिम सप्ताह में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आगमन की वजह से अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों पर प्रतिबंध न लगाने का आरोप भी केंद्र सरकार पर लगा जो गलत नहीं था ।   विदेशों से आने वाले यात्रियों की हवाई अड्डे पर समुचित जाँच नहीं  किये जाने की वजह से कोरोना  संक्रमित आते गए जिससे वह देश के अनेक हिस्सों में पैर जमाने में सफल हो गया ।   ये बात पूरी तरह सही है कि शुरुवात में किसी को स्थिति की भयावहता का अंदाज नहीं था ।   इसी कारण संक्रमण के उद्गम स्थल चीन के वुहान शहर में फंसे सैकड़ों भारतीयों को लेने भारत सरकार ने विशेष विमान भेजे ।   उस अभियान में शरीक पायलटों एवं विमान परिचारिकाओं में से भी कुछ कोरोना संक्रमित हुए ।   इसी दौरान दिल्ली में तबलीगी जमात के जमावड़े में बड़ी संख्या में कोरोना फैलने से हड़कंप मचा और अंत में जाकर लॉक डाउन लगाना पड़ा ।   इसके बाद का घटनाक्रम सभी जानते हैं ।   दो माह के बाद जब लॉक डाउन हटाया गया तब जैसी कि आशंका थी कोरोना का जबरदस्त विस्फोट हुआ और नए संक्रमणों की संख्या एक लाख तक पार करने लगी ।   इसका कारण  बड़े पैमाने पर जाँच होना बताया गया ।   उल्लेखनीय है लॉक डाउन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से प्रवासी श्रमिकों के पलायन की अभूतपूर्व स्थिति भी उत्पन्न हुई और ये माना  जाने लगा कि अपने गाँव या कस्बे में लौटकर वे संक्रमण को महामारी में बदल देंगे जिससे हमारे यहाँ  भी इटली  जैसे हालात बन जायेंगे ।   लेकिन अब जबकि भारत में कोरोना प्रतिरोधक टीकाकरण शुरू होने जा रहा है और  प्रतिदिन पाए जाने वाले नए मरीजों की संख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है तब चिकित्सा विज्ञान के लिए ये शोध का विषय है कि वे कौन सी वजहें थीं जिनके कारण भारत जैसी बड़ी आबादी और घनी बसाहट वाला देश कोरोना को महामारी में बदलने से रोकने में  कामयाब हो सका ? यद्यपि ये मान लेना मूर्खता होगी  कि कोरोना  पूरी तरह विलुप्त हो चुका है क्योंकि एक भी संक्रमित के रहते वह दोबारा तेजी से फ़ैल सकता है और  उसका टीका आम जनता तक पहुँचने में अभी काफी  समय लगेगा ।   बावजूद उसके पूरी दुनिया में इसे लेकर कौतुहल है कि भारत में जहाँ मलेरिया और डेंगू जैसे बीमारियों की रोकथाम संभव नहीं हो पाई वहां कोरोना जैसे अपरिचित  वायरस से बचाव कैसे संभव हो सका ? यही नहीं उसका टीका बनाने के बारे में भी जिस  तेजी से काम हुआ वह भी  चौंकाने वाला रहा ।   भारत में बनी वैक्सीन की मांग दुनिया के वे विकसित देश भी कर रहे हैं जहां हमारे नेता और धन्ना सेठ अपना इलाज करवाने जाते हैं ।   ये देखते हुए चिकित्सा विज्ञान को आम भारतीय की जीवन शैली , खान - पान , आवासीय परिस्थितियों , जलवायु  आदि का अध्ययन करना चाहिये ।   सबसे बड़ी बात ये है कि इन सभी में जबरदस्त विभिन्नता भी है ।   जिसके कारण भारत को विविधताओं का देश कहा जाता है ।   दुनिया के लिए ये अचरज की  बात है कि जो गरीब तबका बहुत ही दयनीय स्थितियों में रहते हुए कुपोषण का शिकार हो और जिसे न्यूनतम चिकित्सा सुविधाएँ तक उपलब्ध न हों , वह इस जानलेवा संक्रमण से कैसे सुरक्षित रह सका ?   आज जब भारत में कोरोना के नए मामले निरंतर घटते जा रहे हैं और ठीक होने वालों का प्रतिशत भी लगातार बढ़ रहा है तब अमेरिका जैसे देश में प्रतिदिन लाखों नए मरीज सामने आ रहे हैं और ब्रिटेन , फ्रांस तथा जर्मनी आदि में लॉक डाउन का नया दौर शुरू करना पड़ा ।   कहने का आशय ये है कि बात - बात में भारत के पिछड़ेपन का हवाला  देने वालों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ऐसा कुछ न कुछ तो हमारे यहाँ है जिसकी वजह से जबरदस्त विकट परिस्थिति को भी भारत झेल गया जबकि उसकी क्षमता पर उसी के लोगों को संदेह था ।   कोरोना अभी भी बना हुआ है ।   टीकाकरण की प्राथमिकताओं के अनुसार आम जनता तक पहुंचने में समय भी लगेगा लेकिन ये देश के आत्मविश्वास  का ही परिचायक है कि उसे लेकर किसी भी तरह की  आपाधापी नजर नहीं आ रही ।   आपदा के ऐसे समय में ही किसी समाज और देश के अन्त्तर्निहित गुण- दोष उजागर होते हैं ।   उस दृष्टि से ये कहना गलत न होगा कि 135 करोड़ की विशाल आबादी को इस अप्रत्याशित विपदा से न्यूनतम  नुकसान के साथ निकाल लाना मामूली बात नहीं थी ।   शासकीय इंतजाम , चिकित्सा तंत्र की मुस्तैदी और जरूरत के मुताबिक प्रबन्धन में सुधार की वजह से आपदा को सीमित और नियंत्रित रखा  जा सका किन्तु भारतीय जीवन शैली भी इस सफलता के पीछे कहीं न कहीं जरूर रही ।   बेहतर हो विकसित देशों की चमक और दमक से नजर हटाकर हम एक बार फिर भारत की ताकत को पहिचानें ।   कोरोना के बाद पूरी दुनिया भारत के प्रति अपना नजरिया बदलने को मजबूर हुई है ।   अब ये हमारे ऊपर निर्भर है कि हम उसका कितना लाभ उठा पाते हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 13 January 2021

कृषि कानूनों पर मुद्देवार चर्चा से इंकार बड़ी रणनीतिक भूल थी





दिल्ली में केन्द्रित होकर रह गया किसान आन्दोलन अब ऐसे मुकाम  पर आ गया है जहाँ से उसके लिए  न तो आसानी से लौटना  संभव है और न ही आगे बढ़ पाना | सर्वोच्च न्यायालय दारा  दी गई व्यवस्था के बाद आन्दोलनरत किसान संगठन अपने ही बनाये जाल में फंसते नजर आ रहे हैं | इस तरह की किसी भी बड़ी लड़ाई  में एक से अधिक मोर्चे खोलना जरूरी होता है | लेकिन आन्दोलन का नेतृत्व  कर रहे कथित नेताओं में से एक भी ऐसा नहीं है जिसने समझदारी दिखाई हो | केंद्र सरकार के साथ  बातचीत में पहले  दिन से ही अड़ियलपन दिखाने से वातावरण में तल्खी आ गई | सरकार ने संदर्भित कृषि कानूनों में   संशोधन हेतु प्रस्ताव मांगकर जो लचीलापन दिखाया था किसान संगठन यदि उस अवसर को लपक लेते तो वे  अपने माफिक काफी बदलाव करवाने का  दबाव बना  सकते थे किन्तु वे उन्हें रद्द  करने की जो जिद पकड़कर बैठ गये उसके कारण उनकी शक्ति , समय और संसाधन तीनों का अपव्यय होता रहा | सर्वोच्च न्यायालय के प्रति भी उनका रवैया बेहद लापरवाही भरा रहा | गत दिवस अपने फैसले का संकेत न्यायालय ने पहले ही दे दिया था लेकिन किसान संगठनों के नेताओं ने चिल्लाना शुरू कर दिया कि वे उसके कहने पर भी आन्दोलन स्थल से नहीं हटेंगे | अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने एक व्यवस्था दे दी है तब उससे दूरी बनाकर किसान संगठन क्या हासिल कर सकेंगे ये बड़ा सवाल है | न्यायालय ने कृषि कानूनों के अमल पर फ़िलहाल रोक लगाकर किसान संगठनों को अपनी रणनीति  पर पुनर्विचार की मोहलत तो दे दी लेकिन  आन्दोलन पर रोक न लगाकर  उत्तेजित होने का अवसर नहीं दिया | सरकार के बाद सर्वोच्च न्यायालय के  प्रति अविश्वास व्यक्त करने में किसान नेताओं ने जिस तरह की जल्दबाजी दिखाई उससे ये साफ़ हो गया कि वे दुराग्रह से ग्रसित हैं | न्यायालय ने इस मामले में तब हस्तक्षेप किया जब महीने भर से ज्यादा बीत जाने के बाद भी किसान संगठनों और सरकार के बीच बातचीत का कोई परिणाम नहीं निकला | सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया कि वह कानूनों को रद्द नहीं करेगा और उसके द्वारा गठित समिति के प्रतिवेदन को भी किसी पर बंधनकारी नहीं माना जाएगा | समिति को दो माह का  समय दिया गया है | आन्दोलनकारी  संगठनों के नेताओं ने  फैसले से पहले ही समिति को नकार दिया था और गठन के बाद उसके सदस्यों को क़ानून  समर्थक और सरकार का पक्षधर बताकर निष्पक्षता पर भी सवाल उठा दिए |उधर  न्यायालय ने भी  सख्त  रुख अपनाते हुए कह दिया कि समाधान चाहने वालों को समिति के सामने आकर अपनी बात कहनी होगी | इस मामले में नया मोड़ ये आता दिख रहा है कि कानून समर्थक कहे जाने वाले अनेक किसान संगठनों ने समिति के  समक्ष  जाने की सहमति देकर आन्दोलनकारी संगठनों के लिए नई चुनौती पेश कर दी है | इन संगठनों को अब तक  वार्ताओं से दूर रखा गया जिससे कि कानून विरोधी और समर्थक आपस में भिड़ न जाएँ | लेकिन जो समिति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाई गयी वह खुले मंच जैसी है जिसमें दोनों पक्ष  अपनी  बात कह सकेंगे | वरना अभी तक तो आंदोलन कर रहे संगठन अपने को पूरे देश के किसान समुदाय की आवाज बताकर  अपनी शर्तें रखते आ रहे थे | इसके साथ ही किसानों के नाम पर बने संगठनों की प्रामाणिकता भी मुद्दा बनेगी | हाल ही में जब कुछ संगठनों ने कानूनों के समर्थन में बयान दिया तब आन्दोलनकारियों ने उन्हें नकली संगठन कहकर उनका उपहास किया लेकिन अब ये देखने में आ रहा है कि कानून के समर्थन में भी आवाजें उठने लगी हैं |  समिति का बहिष्कार करने वाले  संगठनों को भी देर - सवेर ये लगेगा कि सरकार और सर्वोच्च न्यायालय दोनों से अलग होकर वे अकेले पड़ गए | वैसे भी मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाला राग पसंद नहीं किया जाता | उस दृष्टि से आन्दोलनकारी चाहे सरकार को कोसें   या फिर सर्वोच्च न्यायालय को किन्तु जो प्रचलित तौर तरीके हैं उनके जरिये ही वे अपनी बात रखते हुए कुछ हासिल कर सकते हैं | उन्हें ये भी  समझना होगा कि जो नेता आन्दोलन की अगुआई कर रहे हैं उनकी शैली बातचीत की कम और बाहें चढ़ाने की ज्यादा रही है | भले ही वे सरकार पर चालाकी का आरोप लगायें लेकिन ये बात बिलकुल सही है कि सरकार ने शुरू से वातावरण को सौहाद्रपूर्ण बनाये रखा जबकि किसान  नेताओं ने अकड़ दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी | आगामी 15 तारीख को होने वाली बातचीत का अब कोई लाभ इसलिए नहीं है क्योंकि सरकार द्वारा  कानूनों को वापिस लेने से साफ इंकार करने  के बाद  सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल उनके अमल को भी रोक दिया है | न्यायालय द्वारा गठित समिति 10 दिन में क़ाम शुरू कर  देगी जिसके सामने क़ानून समर्थक संगठनों की बात तो आयेगी लेकिन विरोधियों की नहीं  | ऐसे में आन्दोलन हवा में लाठी घुमाने जैसा बनकर रह जाए तो आश्चर्य नहीं होगा | सरकार द्वारा दिए गये कृषि कानूनों पर मुद्देवार चर्चा के प्रस्ताव को ठुकराना अन्दोलनकारियों की  बड़ी रणनीतिक भूल थी | आगामी  दिनों में कानून समर्थक तर्क सामने आने से अब तक हो रहा इकतरफा प्रचार भी  रुक जाएगा | ये सब देखते हुए आन्दोलन कर रहे संगठन यदि चाहते हैं कि उनको राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिले तो उन्हें  अपने नेताओं को देश भर में  भेजकर हवा का रुख पहिचानना चाहिए जिससे उन्हें अपनी ताकत का सही एहसास हो सके |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 January 2021

अब भी अड़े रहे तो अलग-थलग पड़ जायेंगे किसान संगठन



सर्वोच्च न्यायालय आज क्या फैसला सुनाता है इस पर सबकी निगाहें लगी रहेंगी। गत दिवस उसने जो रवैया अपनाया उसमें कानूनी  कम और व्यवस्था के सवाल ज्यादा थे। किसान आन्दोलन से उत्पन्न गतिरोध को उसने जहां सरकार की विफलता माना वहीं  कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को भी अनसुना कर दिया। किसानों की आपत्तियों पर न्यायालय का रुख एक अभिभावक जैसा प्रतीत हुआ जो नाराजगी के बावजूद भी बच्चों की कुशलता के प्रति चिंतित रहता है। यही वजह रही कि उसने सर्दी में सड़क पर बैठे किसानों की तकलीफों का संज्ञान तो लिया वहीं केंद्र सरकार को भी राहत देते हुए बजाय रद्द करने के कानूनों का क्रियान्वयन रोकने का प्रस्ताव दे दिया। केंद्र सरकार के प्रयासों को अपर्याप्त बताते हुए न्यायालय ने अपने हस्तक्षेप की जरूरत बताई तो किसानों को पुचकारते हुए समिति बनाकर विवाद हल करने के लिए तैयार रहने का संकेत भी  दे दिया। उल्लेखनीय है किसान संगठनों के साथ पहली बातचीत में ही कृषि मंत्री ने ये सुझाव रखा था कि किसानों और सरकार के प्रातिनिधियों सहित कुछ विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर कृषि कानूनों संबंधी आपत्तियों का निराकरण किया जाए। सरकार की ओर से अब तक हुई सभी बैठकों में उक्त सुझाव को दोहराया जाता रहा लेकिन किसान संगठनों ने उसे टालमटोली करने की कोशिश बताते हुए पूरी तरह नकार दिया। सरकार ने किसान संगठनों से कानूनों में संशोधन हेतु सुझाव भी मांगे लेकिन उनकी तरफ से कानूनों को वापिस लेने की जिद ही प्रदर्शित की जाती रही। इस बारे में ये बात ध्यान रखने वाली है कि किसान आन्दोलन का समर्थन कर रही अनेक हस्तियों  ने भी कृषि कानूनों की अहमियत को स्वीकार करते हुए उन्हें वापिस लिए जाने की शर्त को अव्यवहारिक बताया। सर्वोच्च न्यायालय ने किसानों से हमदर्दी दिखाकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय तो दिया किन्तु साथ ही साथ उनके सामने दो ऐसी बातें भी रख दीं जो उगलत - निगलत पीर घनेरी जैसी हैं। अदालत ने एक तरफ तो समिति के लिए नाम मांग लिए और साथ ही साथ ये गारंटी भी कि कानूनों पर अमल रोक देने के बाद क्या किसान संगठन अपने आन्दोलन को सड़क से हटाकर अन्य किसी जगह ले जायेंगे जिससे जनता को हो रही असुविधा दूर  हो सके । दो घंटे चली सुनवाई के दौरान अदालत ने जो टिप्पणियाँ कीं वे उपदेशात्मक होने के साथ ही समझाइश भरी ज्यादा थीं। हालांकि उसने सरकार द्वारा कानूनों को मिल रहे समर्थन के दावे पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उसके पास एक भी याचिका नहीं आई जो कानूनों के फायदे बताती हो लेकिन तब भी उसने  यदि कानूनों को रद्द नहीं करने की बात कही तो उसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये है कि किसान संगठन सरकार द्वारा सर्वोच्च न्ययालय जाने की  सलाह को सिरे से ठुकरा चुके थे। संसद द्वारा पारित कानून को स्वप्रेरित होकर रद्द करने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय अपनी सीमायें जानता है इसलिए वह किसानों के प्रति सहानुभूति जताने के बाद भी ऐसा कुछ  करने से बच रहा है जिससे उसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाये जाने लगें। गत दिवस हुई  बहस में सरकार के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय को उसकी सीमाओं का स्मरण भी करवाया। आज वह जो भी निर्णय देता है उसके बाद किसान संगठनों और सरकार दोनों को हठधर्मिता छोड़कर सहमति के बिंदु तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि गतिरोध जारी रहने से केवल कानून व्यवस्था और जनता की असुविधा का सवाल ही नहीं उठेगा अपितु दिल्ली के पड़ोसी राज्यों सहित राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत असर पडऩे लगा है। इस बारे में किसान संगठनों की ओर से बड़ी रणनीतिक गलती ये हो गई कि जब सरकार ने उनसे कानूनों में संशोधन हेतु सुझाव एवं समिति हेतु नाम मांगे थे तब वे कानूनों को रद्द करने की जिद पालकर बैठ गये जिसकी वजह से बातचीत जारी रहने के बाद भी बेनतीजा रही। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी  वैसी ही समझाइश दे दी है तब किसान संगठनों को लचीलापन दिखाते हुए आगे आना चाहिए। सरकार की  अवहेलना करने पर तो उन्हें विपक्ष का राजनीतिक समर्थन मिलता रहा लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की बातों को अनसुना करने  से वे अलग - थलग पड़ जायेंगे।

नोट:- उक्त सम्पादकीय आज के न्यायालयीन फैसले के पूर्व लिखा गया था।

-रवीन्द्र वाजपेयी