Wednesday, 10 March 2021

रोहिंग्या भारत में भी फ़्रांस जैसे हालात बना देंगें



म्यांमार में राष्ट्रविरोधी गतिविधयों के कारण भगाये गये रोहिंग्या मुस्लिम मूलतः बांग्ला देश के हैं लेकिन बजाय वहां जाने के  बजाय वे अवैध रूप से भारत में घुस आये और बँगला देशी शरणार्थियों की तरह से ही देश के विभिन्न हिस्सों में डेरा जमाकर बैठ गये | हाल ही में जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्रों में बने शिविरों से हटाकर उन्हें वापिस  भेजने की कार्रवाई शुरू किये जाने पर उनकी तरफ से उत्पात मचाया जाने लगा | इसी के साथ ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि म्यांमार से चलकर ये जम्मू कैसे जा पहुंचे और पिछली केंद्र सरकार ने आतंकवादी छवि वाले इन विदेशी  मुस्लिमों को पाकिस्तान की सीमा के नजदीक बसाने की गलती क्या सोचकर की थी ? रोहिंग्या के विरुद्ध वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा दिखाई गई सख्ती का भी उन लोगों  ने विरोध किया जो नागरिकता कानून के विरुद्ध  आसमान सिर पर उठाये घूमते रहे | कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने तो अख़बारों में लेख लिखकर रोहिंग्या के पक्ष में ये दलील दे डाली कि शरणार्थी को पनाह देना प्राचीन भारतीय परम्परा रही है | 1971 में बांग्ला देश से आये शरणार्थियों के पास तो वहां छिड़े गृह युद्ध का बहाना था लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार ने जिस कारण से निकाल बाहर किया था उस पर ध्यान दिए बिना ही भारत में उन्हें मानवीयता के आधार  पर क्यों  स्वीकार किया गया ये बड़ा सवाल है | जम्मू से उनके निकाले जाने के दौरान  ये खबर भी आ गयी कि उप्र के अनेक इलाकों में  रोहिंग्या मुसलमान फ़ैल गए हैं और भ्रष्ट शासन तंत्र का लाभ उठाते हुए आधार कार्ड जैसे दस्तावेज हासिल करने में सफल हो गए | यही नहीं बांगला देश से अपने बाकी परिजनोँ को बुलाने की व्यवस्था भी  वे कर रहे हैं | कुछ तो भारतीय  पासपोर्ट बनवाकर खाड़ी देशों में नौकरी हसिल करने में भी  सफल हो गए | हवाला कारोबार के अलावा अन्य अपराधिक गतिविधियों से उनका सम्बन्ध भी उजागर हो रहा है | धीरे - धीरे ये बात भी सामने आ रही है कि पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवादी गतिविधियों से भी ये जुड़ते जा रहे हैं | सबसे बड़ी बात ये है कि म्यांमार में देश विरोधी गतिविधियों के कारण भगाए गए रोहिंग्या को भारत में पनाह देने के मामले में इतनी उदारता क्यों बरती गई और उन्हें जम्मू जैसे सीमावर्ती क्षेत्र में बसाये जाने की मूर्खता के पीछे क्या सोच रही ? बांग्ला देशी शरणार्थियों के रूप में पैदा हुई समस्या  नासूर बन चुकी है | वोट बैंक की राजनीति ने पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत की जनसंख्या में बड़ा असंतुलन पैदा कर  दिया है | बंगाल और असम में होने जा रहे विधानसभा  चुनाव में मतदाता बन चुके  बांगला देशी घुसपैठिये बड़ी भूमिका निभाएंगे जिनकी मिजाजपुर्सी में धर्म निरपेक्षता के झंडाबरदार जुटे हुए हैं | इन्हें वापिस भेजे जाने की चर्चा मात्र से ममता बैनर्जी भड़क उठती हैं | ऐसे में अब रोहिंग्या मुस्लिमों को भी बर्दाश्त किया जाना समझ से परे है और जो पार्टियां और नेता मानवीयता का हवाला देकर इनको शरण देने की वकालत कर रहे हैं वे राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति पूरी तरह से लापरवाह हैं | भारत में करोड़ों बँगला देशी पहले ही नागरिकता ले चुके हैं | बंगाल की वामपंथी सरकार ने भी उनको मतदाता बनाने में मदद की जिसके कारण असम , बंगाल , बिहार , उड़ीसा जैसे राज्यों के अनेक इलाकों में ये चुनाव को प्रभावित  करने की हैसियत हासिल कर चुके हैं | रोहिंग्या को लेकर भी वही गलती दोहराने  से बचना चाहिए क्योंकि  उनका अभी तक का आचरण  दर्शाता है कि वे पूरी तरह से विघटनकारी  और मानवीय संवेदनाओं से  परे हैं | कुछ लोगों का ये भी कहना है कि जम्मू और उप्र में रोहिंग्या के विरुद्ध की जा रही कार्रवाई के पीछे बंगाल और असम के विधानसभा चुनाव हैं लेकिन इस तरह के कदम को राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में देखा जाना ज्यादा सही होगा | रोहिंग्या मुस्लिमों के हमदर्दों से भी  अपेक्षा है कि वे भारत को धर्मशाला बनने से रोकने में सहायक बनें न कि क्षणिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करें | बांगला देशी शरणार्थी जिस तरह देश भर में फैलकर लाइलाज समस्या बन गये उसकी पुनरावृत्ति न हो ये ध्यान रखना नितांत जरूरी है वरना फ्रांस जैसे हालात अपने देश में कभी  भी बन सकते हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Tuesday, 9 March 2021

आरक्षण : आखिर 70 साल कम नहीं होते



आरक्षण एक ऐसा  मुद्दा है जिस पर लोगों  के सार्वजनिक विचार कुछ होते हैं और निजी कुछ और | इसकी वजह है उससे होने वाले   फायदे और नुकसान | सीधे - सीधे वोट बैंक से जुड़ा होने की वजह से राजनीतिक क्षेत्र के लोग इसके बारे में कुछ भी कहने से सौ बार सोचते हैं | बीते कुछ दशकों से देश में धार्मिक आधार पर राजनीतिक चर्चाएँ खुलकर होने लगी हैं लेकिन जातिगत आरक्षण को लेकर पक्ष - विपक्ष के आमने - सामने होने की नौबत नहीं आती क्योंकि ये विषय इतना  संवेदनशील है जिस पर लीक से हटकर की  गई  किसी भी तरह की टिप्पणी बवाल मचा देती है | आरक्षण का प्रावधान संविधान में सीमित समय के लिए किया गया था किन्तु कालान्तर में ये महसूस किया गया कि जिस उद्देश्य से इसे लागू किया गया था वह चूँकि हासिल नहीं हो सका इसलिए उसे आगे बढ़ाया जावे और ये सिलसिला स्थायी हो गया | पहले केवल अनु. जाति और जनजाति ही इससे लाभान्वित होती थीं  किन्तु वीपी सिंह की सरकार के समय ओबीसी ( अन्य पिछड़ी जातियों ) को भी  आरक्षण की परिधि में ले लिया गया | उसके बाद जब ये लगा कि आरक्षण का दायरा बढ़ने से गैर आरक्षित वर्ग में असंतोष बढ़ रहा है तब उसकी सीमा तय करने का विचार सामने आया और सर्वोच्च  न्यायालय ने 50 फीसदी की बंदिश लगा दी | हालाँकि अनेक राज्यों ने उसकी परवाह नहीं करते हुए आरक्षण का प्रतिशत 75 और 85 तक बढ़ा दिया | मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किये जाने के बाद जबसे ओबीसी आरक्षण शुरू हुआ तबसे इसे लेकर बहस और विवादों का दौर  शुरू हो गया | पदोन्नति में आरक्षण को लेकर भी विभिन्न राज्यों में विवाद बना हुआ है | गैर आरक्षित पद पर  आरक्षित्त वर्ग के लोगों की नियुक्ति से भी  ऐतराज होने लगे | क्रीमी लेयर का सवाल भी गाहे - बगाहे उठता रहता है | जिस जाति प्रथा को मिटाकर सामाजिक समरसता का सपना देखा गया था वह आरक्षण के कारण और मजबूत होने लगी जिसका प्रमाण जातियों के भीतर से निकल  आई उप जातियां हैं |  राजनीतिक पार्टियां उम्मीदवारी देते समय जातिगत समीकरणों का पूरी तरह ध्यान रखती हैं | चुनाव सर्वेक्षण करने वाली संस्थाए भी जाति  को आधार बनाकर ही अपने निष्कर्ष निकालती हैं | ये कहना अभी काफी हद तक सही है कि जातिगत समीकरण भारतीय राजनीति को गहराई तक प्रभावित करते हैं | शासन - प्रशासन सभी पर इसकी छाया देखी जा सकती है | आरक्षित वर्ग के अलग कर्मचारी संगठन भी बड़ी संख्या में बन गये हैं | यहाँ तक कि आरक्षित जातियों के उद्योग - व्यापार संगठन भी जन्म लेते जा रहे हैं | इस तरह आरक्षण का प्रभाव केवल सरकारी नौकरियों तक ही सीमित न रहकर सामाजिक और राजनीतिक सभी स्तरों पर साफ़ दिखाई देने लगा है | गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की सीमा तय करने संबंधी मामले में लगातार सुनवाई करते हुए उसकी स्थायी व्यवस्था करने की दिशा में कदम उठाया | विभिन्न राज्यों द्वारा चुनावी लाभ हेतु आरक्षण की सीमा को लांघने का जो फैसला किया गया उसके कारण लम्बे समय से ये अपेक्षा की जा रही थी कि न्याय पालिका  ऐसा कुछ करे जिसका पालन करने सभी राज्य बाध्य हों और उससे जुड़े विवाद भी खत्म हो सकें | सही बात तो ये हैं कि आरक्षण का आकर्षण केवल सरकारी सेवाओं  तक सीमित होकर रह गया है | लेकिन बीते कुछ वर्षों से शासकीय नौकरियों में निरंतर कमी आने से उससे जुड़ा ये लाभ भी संकुचित हो रहा है | बढ़ते निजीकरण के कारण सरकारी नौकरियों के अवसर लगातार घटते जाने से बेरोजगारी में भी वृद्धि हुई है | प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में साफ़ कर दिया कि निजीकरण एक अनिवार्यता बन गई है | उन्होंने सरकार द्वारा व्यवसायिक गतिविधियों से पिंड छुडाने का साफ संकेत दे दिया | विभिन्न सेवाओं से सरकार ने अपना हाथ खींच लिया  है | विनिवेश के जरिये सरकारी उपक्रमों में से अपनी हिस्सेदारी वह कम करती जा रही है | बावजूद इसके राजनीतिक लाभ के लिए राज्य सरकारों द्वारा चुनाव के पहले आरक्षण की खैरात बाँटने का क्रम अनवरत जारी है | इसीलिये सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शुरू की जा रही सुनवाई से ये अपेक्षा उत्पन्न हुई है कि आरक्षण के बारे में न्यायपालिका जो सीमा रेखा  तय करेगी उसे लांघने का साहस करना गैर कानूनी होगा | हालांकि राजनीतिक दल इसे लेकर कितने गंभीर रहेंगे ये कह पाना कठिन है लेकिन आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक , शैक्षणिक और सामाजिक दृष्टि से लाभान्वित वर्ग को  अब उस लाभ से वंचित करने पर ठोस निर्णय करना भी  समय की मांग है | जिस तरह सरकार ने रसोई गैस और रेल टिकिट पर मिलने वाली  सब्सिडी छोड़ने का आह्वान किया  उसी तरह उसे  क्रीमी लेयर की  श्रेणी में आ चुके आरक्षित वर्ग के लोगों से उसका  लाभ छोड़ने की अपील करनी चाहिए | ऐसा होने से नए लोगों को अवसर मिलेंगे और आरक्षित  वर्ग के भीतर बढ़ रहा वर्ग भेद भी कम किया जा सकेगा | वैसे ये कहना भी  गलत न होगा कि आरक्षण अब सामाजिक भेदभाव दूर करने से ज्यादा वोटों की दुकानदारी पर आकर केन्द्रित हो गया है | उसका लाभ लेकर नौकरी और नेतागिरी में ऊपर उठ चुके लोग अपने समाज के उन्नयन की बजाय अपने परिवारों के कल्याण में लगे रहते हैं | सर्वोच्च न्यायालय की ताजा पहल का क्या अंजाम होता है ये तो वही जाने लेकिन आरक्षण के जरिये समाज के दलित और वंचित वर्ग के उत्थान की प्रक्रिया का समुचित  लाभ नहीं हो सका तो इसके कारणों पर विचार होना चाहिए  | आखिर 70 साल कम नहीं होते |


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 March 2021

मनोरंजन की आड़ में नग्नता के फैलाव पर रोक जरूरी



एक समय था जब भारत में माँ - बाप बच्चों को सिनेमा देखने तक से  रोकते थे | लेकिन पहले टेलीविजन और उसके बाद इंटरनेट के उदय ने मनोरंजन को सर्वसुलभ कर दिया | जिन बच्चों को रेडियो पर गाने सुनने से भी  रोका जाता था उनके हाथ में मोबाइल फोन आते ही वे अपनी उम्र से ज्यादा  बड़े होने लगे | इन दिनों जिस ओटीटी की सर्वत्र चर्चा हो रही है वह  सिनेमा के नये विकल्प के तौर  पर आ धमका है | बीते दो दशक में परम्परागत सिनेमाघरों की जगह तेजी से मल्टीप्लेक्स खुले लेकिन ओटीटी ने उस व्यवसाय को भी खतरे में  डाल दिया है | वेब सीरीज नामक नई विधा आजकल सामान्य चर्चाओं का विषय बनने लगी है | इसके कारण मनोरंजन उद्योग में जबरदस्त बदलाव आने लगा है | लेकिन इसके जरिये  भारतीय दर्शकों के समक्ष जो कुछ परोसा जा रहा है उससे समाज में एक हलचल भी है | भारतीय संदर्भों में खुलेपन को लेकर एक विशिष्ट सोच है जिसमें अश्लील दृश्यों और संवादों के बारे में मर्यादाओं की  रेखा  भले ही सदियों पुरानी है किन्तु औसत भारतीय परिवारों में आज भी  न सिर्फ बच्चों अपितु वयस्क सदस्यों के बीच भी खुलेपन के बारे में संकोच देखा जा सकता है | यही वजह है कि जिस ओटीटी का सस्ते और सहज मनोरंजन के रूप  में स्वागत किया गया अब उसके सामने लक्ष्मण रेखाएं खींचने का प्रयास हो रहा है | गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार को लताड़ते हुए कहा कि केवल नियम बनने से काम नहीं  बनने वाला | न्यायालय ने इंटरनेट , ओटीटी  के साथ डिजिटल मीडिया पर परोसी जा रही अश्लीलता को रोकने के लिए सख्त कानून बनाने के निर्देश भी दिए जिसके लिए सरकार ने समय मांग लिया | बीते एक वर्ष में कोरोना की वजह से फिल्मों के निर्माण में बहुत बाधा आई | सिनेमाघरों के बंद हो जाने से मनोरंजन उद्योग का कारोबार ठप्प हो गया | लेकिन इसी दौरान लघु फिल्मों ओर वेब सीरीज ने जोर पकड़ा और देखते - देखते  ये नया तरीका जनता को रास आने लगा | टीवी धारावाहिकों की जगह वेब सीरीज चर्चा में शुमार होने लगी | लेकिन मनोरंजन के नाम पर ठेठ पश्चिमी शैली में जिस तरह से नंगापन मनोरंजन की आड़ में पेश किया जाने लगा  और उसे नियंत्रित करने में सरकार की असमर्थता  सामने आई इसके बाद से ही मामला अदालत की देहलीज पर जा पहुंचा | हिंसा और अन्तरंग दृश्यों के अलावा गालियों से भरे संवादों की वजह से ओटीटी प्लेटफार्म नामक मनोरंजन का ये साधन समाज के एक बड़े वर्ग विशेष रूप से युवा पीढी को अपने मोहपाश में जकड़ता जा रहा है | सर्वोच्च न्यायालय में एक कम्पनी का बचाव करते हुए एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा  कि मेरे घर चलिए , ऐसी सैकड़ों फ़िल्में हैं जिनमें नग्नता ( पोर्न ) नहीं है | उनकी बात पूरी तरह गलत नहीं है लेकिन ये भी सच है कि ओटीटी के रूप में जो नया छोटा पर्दा मनोरंजन का नया जरिया बन गया उस पर नियन्त्रण कर पाने में मौजूदा नियम कानून पूरी तरह असहाय साबित हुए हैं | इसीलिये न्यायालय को ये कहना पडा कि अश्लील सामग्री रोकने के लिए सरकार कानून बनाये | लेकिन सवाल ये है कि सरकार इस बारे में अभी तक इतनी उदासीन क्यों रही ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मनोरंजन उद्योग के माध्यम से  भारतीय समाज में मानसिक विकृति को जन्म देने का जो घिनौना कार्य किया गया  उसकी वजह से यौन अपराधों में अकल्पनीय वृद्धि हुई | सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि किशोरावस्था में प्रविष्ट बच्चे तक ऐसी वारदातों में शामिल देखे जा रहे हैं | पारिवारिक रिश्तों की पवित्रता नष्ट किये जाने की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि के पीछे भी मनोरंजन की शक्ल में फ़ैल रही अश्लीलता ही है | अभी तक तो केवल इन्टरनेट के जरिये फैले पोर्नोग्राफी के कारोबार को लेकर ही चिंता व्यक्त की जाती थी किन्तु अब ओटीटी रूपी इस माध्यम ने डरावनी स्थित उत्पन्न कर दी है | इसके पहले कि अश्लीलता के  कारोबारी समाज की सोच को पूरी तरह विकृत करने में सफल हो जाएँ , सरकार और समाज के जिम्मेदार लोगों को आगे बढकर उसे रोकने की दृढ़ता दिखानी चाहिए | भारत भले ही  कितना भी आधुनिक और  पश्चिमपरस्त हो जाए लेकिन वह नग्नता को संस्कृति मानने के लिए कभी तैयार नहीं होगा | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 March 2021

सरकार के विरोध की छूट लेकिन देश विरोध असहनीय



सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी  में कुछ भी  गलत नहीं है कि सरकार से असहमति को  देशद्रोह नहीं माना जा सकता  | जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में  लोकसभा  सदस्य डा. फारुख अब्दुल्ला द्वारा दिये  गये किसी बयान पर दायर एक याचिका को गत दिवस न्यायालय ने ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 50 हजार का अर्थदंड भी लगाया | याचिका में डा. अब्दुल्ला द्वारा अनुच्छेद 370 हटाये जाने के विरोध में दिए बयान के आधार पर उन पर देशद्रोह का प्रकरण दर्ज करने के साथ ही उनकी संसद सदस्यता खत्म करने की मांग की गई थी | इस फैसले के पहले भी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय सहित कुछ और अदालतों ने भी इसी आशय की राय व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार की  आलोचना अभिव्यक्ति के अधिकार के अंतर्गत आती है  जिसे आपत्तिजनक नहीं माना  जाना चाहिये | लोकतंत्र में आलोचना और असहमति का सम्मान किया जाना जरूरी है | आज जो लोग सत्ता में हैं उन्होंने भी आधी  सदी तक सरकार की जमकर आलोचना की | उस आधार पर ये अपेक्षा किया जाना पूरी तरह सही है कि जनादेश की ताकत पर सरकार में आने के बाद उन्हें भी  अपनी आलोचना सुनते समय उदार रहना चाहिए | दरअसल बीते सात सालों में ये वातावरण बनाया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमन्त्री बन जाने के बाद अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है और विरोध करने वालों का दमन किया जा रहा है | असहिष्णुता का भी खूब ढोल पीटा गया जिसके अंतर्गत अनेक लोगों ने अपने अवार्ड और पुरस्कार भी लौटा दिए | ये अवधारणा भी मजबूत की जा रही है कि विरोध करने वाले को देशद्रोही करार दिया जाता है और सरकारी एजेंसियों का सहारा लेकर उन्हें परेशान  करने का खेल चल रहा है | गत दिवस फिल्म उद्योग के कुछ लोगों के यहाँ आयकर छापे के बाद भी ये प्रतिक्रया सुनने मिल रही हैं कि विभिन्न मुद्दों पर  उनके द्वारा सरकार के विरोध में दिए गये बयानों से नाराज होकर ये छापेमारी की जा रही है | सीबीआई , ईडी और आयकर विभाग का  राजनीतिक प्रतिशोध के लिए दुरूपयोग किये जाने का आरोप भी केंद्र  सरकार पर लगाया जाता है | विभिन्न अदालतों द्वारा की गईं  तदाशय की टिप्पणियों में भी उक्त एजेंसियीं की कार्रवाई पर ऐतराज जताया गया | चूँकि अतीत में भी उक्त संस्थाओं का राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग होता रहा इसलिए मौजूदा केंद्र सरकार के बारे में भी ऐसा कहा जाने पर सहसा विश्वास  हो जाता है | लेकिन राजनीति से परे हटकर देखें तो देशद्रोह संबंधी मामलों में तो बहुत ही संजीदगी होनी चाहिए | डा. अब्दुल्ला ने 370 संबंधी जो बयान दिए वे भले ही अदालत को देशद्रोह न लगे हों जिसकी कानूनी परिभाषा निश्चित रूप से व्यापक होगी किन्त्तु अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हाल के वर्षों में जिस तरह की उच्छश्रंखलता देखने मिली उस पर अंकुश लगाना जरूरी है | बात दिल्ली  स्थित  जेएनयू में भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारों के साथ आजादी - आजादी के  शोर से शुरू हुई जिसका फैलाव बाद में जामिया मिलिया , जादवपुर , उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम विवि तक जा पहुंचा | कश्मीर घाटी में तो देशविरोधी नारे नई बात नहीं रही | डा. अब्दुल्ला भी श्रीनगर में बैठकर भारत विरोधी बयान देने में तनिक भी संकोच नहीं करते लेकिन दिल्ली में भारत माता के भक्त होने का स्वांग रचते रहे हैं | इसी तरह का रवैया महबूबा मुफ्ती का है जिन्होंने 370 हटाये जाने को लेकर जिस तरह का  धमकी भरा बयान दिया था वह देशद्रोह नहीं तो और क्या था ? अब्दुल्ला परिवार के अन्य सदस्य भी समय - समय पर पाकिस्तान के पक्ष में बोलते रहे हैं | चीन के साथ सैन्य मुठभेड़ के बाद फारुख ने चीन को लाभ पहुँचाने वाला बयान दे डाला | बेहतर हो सर्वोच्च न्यायालय ऐसे बयानों पर स्वतः संज्ञान लेकर प्रकरण दर्ज करते हुए दोषियों को दण्डित करे | असहिष्णुता का हौआ खड़ा  किये जाने के बाद कुछ फिल्म अभिनेताओं को ये देश रहने लायक नहीं लगा था | क्या ऐसे लोगों की देशभक्ति पर सवाल उठाना भी  अभिव्यक्ति की आजादी पर आघात माना जाना चाहिए | किसान आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में कतिपय विदेशी हस्तियों द्वारा भारत के घरेलू हालातों पर की गई टिप्पणियों को जिस तरह महिमामंडित किया गया वह अभिव्यक्ति के नाम पर देश की छवि खराब करने का प्रयास नहीं तो और क्या था ? गत दिवस राहुल गांधी ने अपनी दादी द्वारा  लगाये गए आपातकाल को तो गलत ठहराया लेकिन मौजूदा हालात की आलोचना  करने में भी नहीं चूके  किन्तु श्री गांधी जिस तरह की निजी और नीतिगत आलोचना प्रधानमन्त्री और भाजपा की करते हैं क्या ऐसी कल्पना इन्दिरा जी द्वारा लगाये गए आपातकाल में सम्भव थी ? आज सोशल मीडिया का दौर है जिसकी मदद से देश के बाहर बैठकर भी भारत और सरकार विरोधी बात कही जा सकती है | किसान आन्दोलन की आड़  में कैंनेडा और ब्रिटेन में खलिस्तान समर्थक अनेक संगठनों की गतिविधियाँ इसका प्रमाण हैं | सर्वोच्च न्यायालय देशहित के अनेक मुद्दों पर खुद होकर पहल करता आया है लेकिन शाहीन बाग़ जैसे प्रकरण पर उसका फैसला जब तक आया तब तक वह मुद्दा ही खत्म हो चुका था | फारुख अब्दुल्ला के संदर्भित बयान में भले ही अदालत को कुछ भी ऐतराज करने लायक न लगा हो परन्तु बीते कुछ सालों में उनकी जिस तरह बाढ़ आई वह किसी सुनियोजित कार्ययोजना का हिस्सा लगता है | अभिव्यक्ति की आजादी को हर हाल में अक्षुण्ण रखना होगा लेकिन उसका दुरूपयोग करने वालों के प्रति न्यायपालिका को भी कठोर होना पड़ेगा क्योंकि देश के विरोध में सोचने और बोलने वाले किसी रहम या रियायत के हकदार नहीं हो सकते |   

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 3 March 2021

मप्र का बजट : कर्जे के बोझ के साथ ऊंची उड़ान का सपना




मप्र सरकार के बजट में  शिवराज सिंह चौहान  सरकार ने समाज के हर वर्ग को संतुष्ट करने का दावा किया है। चौतरफा विकास की गंगा बहाने के  आश्वासन के साथ  शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार-उद्योग, अधोसंरचना, कर्मचारियों के वेतन-भत्ते जैसी मदों में भारी-भरकम आवंटन किये जाने की घोषणा भी  की गई है। प्रदेश के वर्तमान मेडिकल कालेजों की बदहाली के बावजूद  नए मेडिकल कालेज खोलने जैसा दुस्साहस भी बजट  घोषणाओं में है। वेतन बाँटने के लाले के बीच पुराने एरियर्स बाँटने का ऐलान कर्मचारी वर्ग के तुष्टीकरण का परम्परागत प्रयास है। शिक्षकों और पुलिस की  नयी भर्ती की घोषणा से बेरोजगारों में उम्मीद जगाने का प्रयास भी वित्तमंत्री ने  किया है। आंकड़ों की फसल इतनी  जबरदस्त है कि अच्छे - अच्छे अर्थशास्त्री भी भ्रमित  हो जाएँ। भाजपा के लिए ये सपने साकार करने वाला बजट है जो आत्मनिर्भर मप्र की राह प्रशस्त करेगा। उसे जनहितकारी भी  बताया जा रहा है क्योंकि उसमें  नया कर लगाने से परहेज किया गया  है। लेकिन  पेट्रोल-डीजल पर लगाये गये करों में राहत देने से भी सरकार ने कन्नी काट ली । उल्लेखनीय है मप्र देश के उन राज्यों में से है जहां  पेट्रोल - डीजल सबसे महंगा है। सत्ता  पक्ष ये  दावा भी कर रहा है कि कोरोना के कारण उत्पन्न परिस्थितियों के मद्देनजर इससे बढ़िया बजट बन ही नहीं सकता था। अपनी विफलताओं के लिए पिछली सरकार को कठघरे में खड़ा करने के रिवाज  को  दोहराने से भी परहेज नहीं किया जा रहा। दूसरी तरफ विपक्ष के लिए ये निराशा पैदा करने वाला जनविरोधी बजट है। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ से लेकर छोटे-छोटे विपक्षी नेता तक इसकी आलोचना  करते हुए कह रहे हैं कि इसमें  बेरोजगारों , किसानों , कर्मचारियों के अलावा व्यापारियों और उद्योगपतियों के लिए राहत की कोई बात  नहीं है। समाज के विभिन्न  वर्गों से  बजट को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। उद्योग - व्यापार जगत नए कर नहीं लगने पर तो राहत का अनुभव कर रहा है परन्तु पुराने बोझ में कमी नहीं किये जाने को लेकर नाराजगी भरी निराशा भी है। अर्थशास्त्र के जानकारों की राय भी अलग-अलग है। इस सबसे हटकर देखें तो बजट में आत्मनिर्भर प्रदेश का जो संकल्प प्रदर्शित किया गया है वह तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक  कर्जे लेकर लोक-लुभावन घोषणाएं करने की नीति  बंद नहीं की जाती। महज चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने 2018 में सत्ता सँभालने के दस दिन के भीतर किसानों के  2 लाख तक के कर्जे माफ करने का वायदा किया था। लेकिन  कमलनाथ सरकार  उसे पूरा नहीं कर पाई। उसके बाद आई  शिवराज सरकार के लिये तो सिर मुड़ाते ही ओले गिरने जैसी  स्थिति बन गयी क्योंकि सत्ता संभालते ही लॉक डाउन आ टपका जिससे जूझने में शासन - प्रशासन की समूची शक्ति और संसाधन झोंकने पड़े। करों की उगाही ठप्प पड़ जाने से राज्य सरकार द्वारा रिजर्व बैंक से कर्ज पर कर्ज लिया जाना मजबूरी बन गई जो बढ़ते - बढ़ते प्रदेश के बजट से ज्यादा हो गया। इसके बाद बजट में किये गये वायदे और विकास के  काम किस तरह पूरे होंगे ये यक्ष प्रश्न है जो आत्मनिर्भर मप्र के लक्ष्य को ऐसे सुंदर सपने में तब्दील कर देगा जिसे  साकार करना असंम्भव है। हालांकि  इसे निराशावाद कहने वाले भी बहुत मिल जायेंगे लेकिन कटु बात यही है कि पैसे का व्यवहार पैसे से ही होता है नमस्कार से नहीं। शिवराज सिंह ने मप्र के विकास  के लिए काफी कुछ किया है। 2003  में दिग्विजय सिंह की सरकार जिस बिजली , पानी और सड़क के मुद्दे पर जनता द्वारा परास्त की गई थी उनमें  काफी सुधार हुआ है। बिजली ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच चुकी है। किसानों को सिचाई के लिए अब उसके इन्तजार में बैठे नहीं  रहना पड़ता। इसी तरह जल की व्यवस्था में भी  उल्लेखनीय  सुधार हुआ है और सड़कों की दशा तो चमत्कारिक रूप से सुधरी है। लेकिन बिजली की दरें  जिस तरह बढ़ती जा रही हैं वह जनता के लिए बोझ है। पेट्रोल - डीजल पर प्रदेश सरकार ने जितना करारोपण कर रखा है वह उसकी तमाम उपलब्धियों पर पानी फेरने के लिये काफी है। नए मेडिकल कालेज खोलने के इरादों पर भी तब सवाल खड़े हो जाते हैं जब मौजूदा में ही पढ़ाने वाले कम पड़ रहे हों। हालाँकि सीटें बढ़ाने का निर्णय स्वागतयोग्य है। वैसे बजट किसी  भी सरकार का हो वह देखने में तो आकर्षक ही  लगता है। लेकिन वास्तविकता ये है कि उसमें की गयी घोषणाओं को अमल में लाने के लिए संसाधनों का प्रबंध करने के लिए न तो कोई  ठोस कार्ययोजना होती है और न ही दूरदृष्टि। मप्र को वाकई आत्मनिर्भर बनाना है तो कर्ज के बोझ को कम करते हुए राहत और विकास के काम कैसे होंगे ये स्पष्ट होना चाहिए। कर्ज लेकर घी पीने की पुरानी कहावत की तर्ज पर  सरकार चलाने की नीति भारतीय  शासन प्रणाली का प्रतीक बनकर रह गया है। जबरदस्त घाटे के बोझ  के साथ  आकाश को छू लेने का प्रयास करना कितना व्यवहारिक होगा, ये विश्लेषण का विषय है। विपक्ष बजट की आलोचना करते हुए अपने धर्म का निर्वहन कर रहा है लेकिन सरकार उसकी होती तब वह भी ऐसे ही  सपने दिखाता जो कभी पूरे नहीं  होते।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 March 2021

भाजपा शासित राज्य सस्ता कर दें तो बाकी भी मजबूर होंगे



 लगातार तीसरे महीने जीएसटी संग्रह एक लाख करोड़ से अधिक होना इस बात का सूचक है कि कारोबारी जगत कोरोना संकटकाल से बाहर निकल आया है | हालाँकि अभी भी अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जिनकी पुरानी रफ्तार अभी तक नहीं लौटी किन्तु ये बात बिलकुल सही है कि लॉकडाउन हटने के बाद से उद्योग - व्यापार  ने तेजी से गति पकड़ी |  चूँकि लॉक डाउन के दौरान रबी और उसके बाद खरीफ फसल में भी कृषि क्षेत्र  ने अच्छा प्रदर्शन  किया इसलिए ग्रामीण इलाकों से भी बाजार में मांग आने लगी  जिसका सबसे बड़ा सबूत था रिकॉर्ड संख्या  में ट्रैक्टर की बिक्री | इसी के साथ ही  ऑटोमोबाइल उद्योग को भी उपभोक्ताओं का आशातीत  प्रतिसाद मिला | सूचना तकनीक का  व्यवसाय तो लॉक डाउन के दौरान भी अपनी रफ़्तार से चलता रहा | घर में  बैठे - बैठे  काम करने की जो नई कार्य संस्कृति इस दौरान प्रचलित हुई उसने इस उद्योग में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया जिससे स्थापना व्यय घटाने में मदद मिली | मनोरंजन और पर्यटन उद्योग भी धीरे - धीरे ही सही किन्तु पटरी पर लौटता नजर आ रहां  है | रेलगाड़ियों का परिचालन निरंतर बढ़ने की तरफ है | सड़क मार्ग से यात्रा भी अब पहले जैसी हो चली है | ताजा  आंकड़ों के अनुसार हवाई जहाज से यात्रा करने वालों का दैनिक आंकड़ा तीन लाख से ऊपर चला गया है | इस प्रकार ये कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था बीमारी के बाद अब चलने - फिरने की  स्थिति में आने लगी है और उस आधार पर ये सोचना  गलत न होगा कि नये  वित्तीय वर्ष में वह ऊंची छलांग लगाने में कामयाब  हो सकेगी | इसका संकेत पूंजी बाजार में आ रही उछाल है जिसका कारण बड़ी संख्या में विदेशी निवेशकों का भारत के प्रति बढ़ता हुआ भरोसा है | ये बात भी इस बारे में जोड़ी जा सकती है  कि गत वर्ष की गर्मियों में  लद्दाख सेक्टर में चीन द्वारा उत्पन्न युद्द की स्थिति का भारत ने जिस दृढ़ता से सामना किया उससे वैश्विक स्तर पर ये अवधारणा मजबूत हुई कि वह चीन को चुनौती देने में सक्षम है | उसी के बाद से विदेशी पूंजी का प्रवाह हमारे शेयर बाजार में बढ़ने लगा | यद्यपि लॉक डाउन हटने के बाद किसान आन्दोलन के रूप में उत्पन्न गतिरोध ने अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचाने का काम किया | चूँकि वह राष्ट्रव्यापी रूप नहीं ले पाया इसलिए धीरे - धीरे उस झटके से भी  कारोबारी जगत उबर रहा है | उम्मीद है उत्तर भारत में रबी फसल की सरकारी खरीद शुरू होते ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पैसे का आगमन बढ़ेगा जिससे उपभोक्ता बाजार को संबल मिलना तय है | हालाँकि कोरोना के दूसरे हमले ने महाराष्ट्र और केरल में चिंता के कारण पैदा कर दिए  हैं लेकिन गत दिवस आम जनता के लिए टीकाकरण प्रारम्भ हो जाने के बाद जिस तरह का आत्मविश्वास देखा जा रहा है उसके कारण ये उम्मीद हो चली है कि आगामी गर्मियीं में आने वाला शादी सीजन बीते साल की मुर्दानगी को दूर करते हुए बाजारों को गुलजार कर देगा | निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था को लेकर चारों तरफ से शुभ संकेत मिल रहे हैं | लेकिन पेट्रोल और डीजल के दामों में लगी आग से  आम उपभोक्ता का बजट गड़बड़ा गया है | इसकी वजह से निजी और सार्वजानिक परिवहन खर्च बढ़ जाने से चीजे महंगी होने लगी हैं | हालाँकि केंद्र सरकार लगातार ये संकेत दे रही है कि वह इनके दाम घटाने के प्रयास कर रही है | राज्यों से भी ये कहा जा रहा है कि वे अपने कर घटाने के साथ ही  पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाकर उनकी कीमतों पर अंकुश लगाये जाने में मददगार बनें | केंद्र  सरकार ने गत दिवस जो संकेत दिये उनके अनुसार जल्द ही वह पेट्रोल- डीजल पर केन्द्रीय कर घटाने जा रही है | हालांकि इसके पीछे पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव भी हैं लेकिन  पेट्रोल और डीजल सहित रसोई गैस जैसी आम उपभोक्ता की जरूरत वाली चीजों पर जिस तरह का जजिया कर केंद्र और राज्यों की सरकारें थोप रही हैं वह संवेदनशीलता के अभाव को दर्शाता है | यदि केंद्र सरकार वास्तव में चाहती है कि पेट्रोल - डीजल सस्ते हों तो उसे कम से भाजपा शासित राज्य सरकारों पर दबाव डालकर वहां इन पर करों में कमी करवाना चाहिए जिसके बाद बाकी राज्य भी वैसा करने बाध्य होंगे और तभी पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाने की परिस्थिति बन सकेगी | ये बात भी सौ फीसदी सच है कि पेट्रोल - डीजल सस्ते होने से महंगाई कम होने के बाद उपभोक्ता बाजार में कारोबार बढ़ेगा जिसके फलस्वरूप सरकार के पास घूम फिरकर उतना ही राजस्व आ जाएगा |  कम कराधान से आधिक आय का ये सूत्र पूरे विश्व में मान्य और सफल है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 1 March 2021

वरना कोरोना का दूसरा हमला अर्थव्यवस्था को चौपट कर देगा




भले ही हमारे देश में कोरोना को लेकर भी खूब राजनीति हुई हो और आगे भी होती रहेगी लेकिन उसका जो टीकाकरण अभियान शुरू हुआ है वह देश के लिए बड़ी उपलब्धि है | भारत सरीखे देश में जहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ बेहद सामान्य स्तर की समझी जाती हैं वहां करोड़ों लोगों को कोरोना जैसी बीमारी का टीका रिकॉर्ड समय में बनाकर उपलब्ध करवाना मामूली बात नहीं थी | सबसे बड़ी बात ये हुई कि दुनिया के विकसित देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए भारत ने करोड़ों टीके न सिर्फ घरेलू उपयोग के लिए बना लिए अपितु उनके निर्यात की गुंजाईश भी निकाल ली | पहले चरण में स्वास्थ्य कर्मियों से टीकाकरण शुरू हुआ जो आज से आम जनता के लिए भी उपलब्ध करवाया जा रहा है | शासकीय केन्द्रों  में निःशुल्क और निजी में सशुल्क टीकाकरण की व्यवस्था संतुलित सोच का अच्छा  उदाहरण है | समाज का एक वर्ग ऐसा है जिसके लिये मात्र 250 रु. देकर कोरोना का टीका लगवाना बेहद सहज है लेकिन शासकीय स्तर पर उसका निःशुल्क होना जनकल्याणकारी है | लेकिन जैसा अभी तक का अनुभव आया है उसके अनुसार टीकाकरण को लेकर भी उदासीनता या लापरवाही दिखाई दे रही है | कोरोना का ये टीका दो चरणों में लगता है | पहले टीकाकरण के बाद एक निश्चित अवधि में उसकी दूसरी खुराक लेना अनिवार्य है अन्यथा वह असरहीन होकर रह जाएगा | इस बारे में जो जानकारी मिल रही है वह चौंकाने वाली होने के साथ ही चिंता का कारण भी है | फ्रंट लाइन कोरोना कार्यकर्ताओं की सूची में जिन लोगों को शामिल किया गया था उनमें से बड़ी संख्या में ऐसे निकले जो तय तिथि पर टीका लगवाने आये ही नहीं | इनमें चिकित्सा क्षेत्र के भी काफी लोग थे | इसी तरह के उदाहरण अन्य वर्गों में भी देखने मिले | उसके बाद ये सुनने में आ रहा है कि पहली खुराक लेने के बाद बड़ी संख्या में लोग दूसरी खुराक हेतु  नहीं लौटे जिसकी वजह से उनका टीकाकरण बेकार साबित हुआ | इन लोगों की गैर जिम्मेदारी समाज के लिए कितनी खतरनाक साबित हो सकती है इसका अंदाज लगाना कठिन नहीं है | विशेष रूप से जब कोरोना का संक्रमण तेजी से वापिस लौट रहा है तब टीकाकरण को लेकर बरती जाने वाली लापरवाही न सिर्फ सम्बन्धित व्यक्ति वरन  उसके परिवार और सम्पर्क में आने वाले बाकी लोगों को भी संकट में डालने वाली हो सकती है | इस बारे में रोचक बात ये है कि जब तक टीका नहीं आया था तब तक तो जिसे देखो वह उसके आने का बेसब्री से  इंतजार करता दिखता था | टीके के आम जनता को उपलब्ध होने के बारे में भी खूब विमर्श होता था | जिन्हें इस बारे में लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है वे भी बढ़ - चढ़कर जानकारी प्रसारित करते हुए खुद को विशेषज्ञ साबित करने में जुटे रहते थे |  लेकिन  टीका आ जाने के बाद उसके प्रति अपेक्षित उत्साह नहीं  दिखाई देना ये साबित  करता है कि वह सब बुद्धि विलास था | अब जबकि आज से आम जनता के लिए टीकाकरण शासकीय और निजी दोनों केन्द्रों पर उपलब्ध होने लगा है तब हर किसी से ये अपेक्षा है कि इस सुविधा का समय पर प्राथमिकता के साथ उपयोग करे | जिन्हें सरकारी चिकित्सा केंद्र जाने में समय और सुविधा की समस्या हो वे निजी केन्द्रों में जाकर टीका लगवा सकते हैं  जिसका शुल्क बहुत ही कम है | उसी के साथ ये भी जरूरी है कि टीके की अगली खुराक लेने के प्रति पूरी गम्भीरता एवं जिम्मेदारी रखी जाए क्योंकि उसके बिना पहली खुराक तो बेकार जायेगी ही कोई जरूरतमंद  उससे वंचित रह जाएगा | राजनीतिक दलों का भी ये फर्ज है कि वे जिस तरह अपने अभियानों के लिए जनता के बीच  जाते हैं उसी तरह कोरोना टीकाकरण को लेकर जनता को जागरूक करते हुए  टीका लगवाने  प्रेरित करें | कोरोना ने बीते कुछ दिनों में जिस तरह से दोबारा दस्तक दी है उसे देखते हुए  जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लोग जल्दी से जल्दी टीका लगवाकर खुद भी सुरक्षित हों और दूसरों के लिए भी खतरा पैदा न करें | ये टीका कितने समय तक प्रभावशाली रहेगा इसे लेकर भले ही पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा कहा जा रहा लेकिन ये कारगर और नुकसान रहित है ये बात तमाम परीक्षणों में साबित हो चुकी है | देश की अनेक जानी - मानी  हस्तियों के अलावा  चिकित्सकों और अधिकारियों ने टीका लगवाकर उसके प्रति उत्पन्न शंका को भी को दूर किया है | अभी तक जितने लोगों को टीका लगवाया गया उनमें बहुत ही कम ऐसे रहे जिन्हें किसी तरह की समस्या हुई हो ,  जो चिकित्सा विज्ञान  के मानदंडों के लिहाज से बहुत ही मामूली कही  जाएगी | कोरोना की भयावहता को भारत की  जनता ने अपने अनुशासन और धैर्य से जिस तरह सीमित किया उसे पूरे विश्व में सराहा गया | अब टीकाकरण में भी वैसी ही आवश्यकता है | ये अभियान देश के भविष्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है | कोरोना के दूसरे हमले को किसी भी हाल में रोकना होगा क्योंकि उसकी पुनरावृत्ति समूची अर्थव्यवस्था को चौपट कर देगी | समाज के सुशिक्षित और   संपन्न वर्ग को भी चाहिये कि वह अपने से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को टीकाकरण के लिए तैयार करते हुए इस कार्य में उसकी हरसंभव सहायता करे क्योंकि ऐसा करना हर किसी का नैतिक और मानवीय दायित्व है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी