Friday, 19 March 2021

टोल नाकों का खात्मा एक क्रांतिकारी कदम होगा



परिवहन मंत्री नितिन गडकरी उन मंत्रियों में से हैं जो सदैव अपने काम में तल्लीन रहते हुए भविष्य के मद्देनजर योजनाएं बनाते ही नहीं अपितु उनको क्रियान्वित करने के लिए भी ईमानदारी से प्रयास करते हैं | राजमार्गों सहित अधो संरचना के अनेक प्रकल्पों पर चल रहे कार्य उनकी प्रशासनिक क्षमता का जीवंत  उदहारण हैं | देश में सड़क परिवहन के साथ ही जलमार्गों के विकास में भी उनकी रूचि उल्लेखनीय है | पिछले कुछ समय  से वे पुराने वाहनों के पंजीयन का नवीनीकरण कराये जाने संबंधी  बयान दे रहे हैं | तत्संबंधी कानून भी बन गया है | इसके अनुसार निजी और व्यवसायिक वाहनों को  निर्धारित कालावधि के उपरान्त फिटनेस परीक्षण करवाना  होगा जिसमें सफल होने के बाद ही उनका नए सिरे से पंजीयन हो सकेगा  | अन्यथा पुराने वाहन को स्क्रैप ( कबाड़ ) में  बेचने के बाद  नया वाहन  खरीदने वालों को  कीमत के साथ ही करों में छूट दी जावेगी | श्री गडकरी का मानना है कि पुराने वाहन को स्क्रैप किये जाने से ऑटोमोबाइल उद्योग द्वारा किये जाने वाले आयात में कमी आयेगी जिससे भारत में उत्पादित वाहन सस्ते होने  से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकेंगे | पुराने वाहनों के सड़कों से बाहर होने पर वायु प्रदूषण में भी कमी आयेगी | उनकी ताजा घोषणा और भी महत्वपूर्ण है जिसके अनुसार एक साल के भीतर देश भर में टोल नाके खत्म कर  दिये  जायेंगे तथा टोल टैक्स की वसूली वाहनों  में लगी  जीपीएस प्रणाली के जरिये वाहन  स्वामी के बैंक खाते से अपने आप होती रहेगी | यही नहीं तो वह राजमार्ग का उपयोग  जितनी दूरी के लिए करेगा उसे उतने के लिए ही टोल टैक्स देना पड़ेगा | ये बात किसी से छिपी नहीं है कि हमारे देश में टोल नाके भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के जीते - जागते अड्डे हैं | व्यवसायिक वाहनों के लिए  तो ये किसी मुसीबत से कम नहीं हैं | इनके ठेके अधिकतर नेताओं और नौकरशाहों के नजदीकी लोगों के पास होने से इनकी ज्यादतियों को सरकारी संरक्षण भी मिलता है | इसके अलावा उन पर समय भी बहुत नष्ट होता था | इसको हल करने के लिए शुरू की गई फ़ास्ट टैग प्रणाली बीती 15 फरवरी से लागू हो गई जिसके कारण टोल नाकों पर होने वाली दादागिरी और समय की बर्बादी तो रुकी ही सरकार को मिलने वाले राजस्व में भी अच्छी - खासी वृद्धि हुई |  फ़ास्ट टैग एक पूर्व भुगतान प्रणाली है जिसमें टोल टैक्स का अग्रिम भुगतान सरकार के ख़जाने में आ जाता है | मात्र एक महीने के भीतर ये साबित हो गया कि यह बहुत ही प्रगतिशील और पारदर्शी व्यवस्था है | लेकिन इसके कारण उन लोगों को परेशानी होने लगी जिनका निवास राजमार्ग के करीब है | ऐसे लोगों को रोजमर्रे के काम से अपने आसपास के क्षेत्र तक आने - जाने के लिए भी लम्बी दूरी के लिए निर्धारित टोल टैक्स चुकाना पड़ रहा है जिसकी वजह से जन असंतोष बढ़ा है | इस समस्या का हल टोल टैक्स की वसूली जीपीएस प्रणाली से किये जाने से हो जायेगी क्योंकि तब वाहन चालक को उतनी ही दूरी का टैक्स देना पड़ेगा जितनी की उसने यात्रा की | स्मरणीय है कि देश के ट्रक चालकों के संगठन लम्बे अरसे से मांग करते आ रहे थे कि टोल नाके खत्म कर दिए जाएँ तो वे टोल टैक्स से होने वाली आय के बराबर राशि सरकार को एकमुश्त देने को राजी हैं | नाकों पर होने वाली जबरिया वसूली और समय की बर्बादी को देखते हुए उनकी वह मांग सरकार को जमी किन्तु अब जाकर उसे अमल में लाये जाने की शुरुवात हुई है | इसमें दो राय नहीं है कि राजमार्गों के उन्नयन और विकास ने भारत में परिवहन क्रांति का सूत्रपात किया | स्व. अटलबिहारी वाजपेयी की दूरदर्शिता और श्री गडकरी की अद्भुत कार्यशैली ने जो चमत्कार किया उसकी वजह से देश में सडक परिवहन में तेजी से वृद्धि हुई है | कोरोना काल में लगे लॉक डाउन के दौरान लाखों लोग निजी वाहनों से अपने गंतव्य तक पहुँच सके | विश्वस्तरीय राजमार्ग पर चलते हुए टोल टैक्स देना वाहन स्वामी को अखरता नहीं  है  क्योंकि  समय बचने के साथ ही वाहन के रखरखाव पर होने वाला खर्च भी बचता है | अमेरिका में ये उक्ति बड़ी प्रचलित है कि आर्थिक विकास राजमार्गों से होकर ही  आता है | आजाद भारत में इसे समझने में आधी सदी खर्च कर दी गई | अटल जी ने जब स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना प्रारम्भ की तब मुलायम सिंह यादव ने तंज कसा था कि राजमार्गों का विकास भारत में  विदेशी कार निर्माताओं के  पैर ज़माने के लिए किया जा रहा है | श्री गडकरी पुराने वाहनों को स्क्रैप करने पर जिस तरह जोर दे रहे हैं  उसे लेकर भी ये आरोप लग रहे हैं कि भारत में बैटरी चलित वाहनों का बाजार विकसित करने के लिए ऐसा किया जा रहा है | टोल नाकों को खत्म किये जाने से भी राजनेताओं और उनके चहेते नौकरशाहों को भारी तकलीफ होगी | लेकिन देश को आगे बढ़ाना है तो क्षणिक राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर सोचने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी | सौभाग्य से श्री गडकरी उन नेताओं में से हैं जो अगले चुनाव की नहीं अपितु अगली पीढ़ी की चिंता कर रहे हैं | टोल नाकों पर पहले फास्ट टैग और एक साल के भीतर उनको पूरी तरह खत्म करते हुए जीपीएस प्रणाली से टोल टैक्स की वसूली एक बड़ा सुधार होगा जिससे देश में सड़क परिवहन और सुविधाजनक बनेगा | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घरेलू पर्यटन  को विकसित करने पर लगातार जोर देते हैं | कोरोना के कारण बीते एक वर्ष में पर्यटन उद्योग को भारी  क्षति हुई है | लेकिन राजमार्गों पर  यात्रा जितनी आसान होती जायेगी , घरेलू पर्यटन का विकास उतनी ही तेजी से होगा क्योंकि भारत का विशाल मध्यम वर्ग भी अब चौपहिया वाहन पर चलने को लेकर बहुत ही उत्साहित   है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 March 2021

कोरोना की दूसरी लहर हमारी लापरवाही का नतीजा



गत वर्ष  इन्हीं दिनों भारत में कोरोना का आगमन हो चुका था | देश के अनेक हिस्सों में संक्रमण के प्रमाण मिलने लगे | उसका वायरस  चीन से निकलकर  अन्य देशों में  होता हुआ भारत आ धमका | विदेशों से आये भारतीय और विदेशी दोनों इसको आयात  में सहायक बने | शुरुवात में ये अवधारणा थी कि भारत के मौसम  और स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता इतनी ज्यादा है कि उन्हें  कोरोना शायद ही  दबोच सकेगा | लेकिन मार्च के अंतिम सप्ताह तक ये तय हो गया  कि  संक्रमण भारत में भी पाँव पसार चुका था  और जल्द नियंत्रण न किया गया तो इसके महामारी का रूप लेने में देर नहीं लगेगी | अंततः देशव्यापी  लॉक डाउन की घोषणा  प्रधानमंत्री ने स्वयं टीवी पर आकर की जिसके बाद का घटनाक्रम सर्वविदित है | भारत सरीखी घनी आबादी  वाले देश में जहां 80 फीसदी आबादी गरीब हो , वहां सब कुछ रुक जाना अप्रत्याशित ही नहीं अकल्पनीय भी था | इसका अर्थव्यवस्था पर  हुआ  असर  भी किसी से छिपा नहीं है | लॉक डाउन का उद्देश्य लोगों के मेलजोल को रोककर संक्रमण के फैलाव पर काबू पाना था जो तमाम अड़चनों के बाद भी पूरा हुआ । वरना भारत में भी इटली , ईरान , स्पेन और अमेरिका की तरह मौत का तांडव दिखाई देता | जिस देश में प्राथमिक चिकित्सा तक सभी नागरिकों तक नहीं पहुँच सकी हो उसमें एक अनजान वायरस के हमले का सामना करने की व्यवस्था करना कल्पनातीत था किन्तु संकट के समय भारत एक नया रूप ले लेता है और वही कोरोना से की गई जंग में देखने मिला  | सरकार और समाज के समन्वित प्रयासों और 135 करोड़ देशवसियों द्वारा  अनुशासन का पालन किये जाने का सुपरिणाम ये हुआ कि लगभग छह माह बाद सितम्बर से कोरोना के संक्रमण में कमी आने लगी और साल खत्म होते तक हम  स्वदेश में निर्मित टीका बनाने में भी कामयाब हो गए | ऐसे समय जब अमेरिका , ब्रिटेन सहित अनेक देशों  में कोरोना की दूसरी  और कहीं - कहीं तो तीसरी लहर से एक वर्ष पहले के हालात फिर लौट आये तब  भारत में कुछ को छोड़कर अधिकतर राज्यों में  कोरोना दम तोड़ने लगा था  | लॉक डाउन समाप्त किये जाने के बाद से क्रमशः व्यापारिक और सामाजिक गतिविधियाँ भी शुरू हो गईं | होटल , रेस्टारेंट , सिनेमा , सांस्कृतिक - साहित्यिक समारोह आदि की भी अनुमति दी जाने लगी | हवाई और रेल यातायात को  शुरू किये जाने से आवागमन ने जोर पकड़ा | सुस्त पड़े पर्यटन उद्योग को भी प्राणवायु मिलने लगी | शादी - विवाह पर लगे प्रतिबंध शिथिल कर दिए गए | धार्मिक स्थल  भी खोल दिए गए  | हाल ही में हरिद्वार में तो कुम्भ मेला प्रारंभ हो गया |  गत वर्ष  बिहार में विधानसभा चुनाव के बाद  अनेक राज्यों में उपचुनाव और स्थानीय  निकायों के  चुनाव सफलता पूर्वक संपन्न हुए | संसद और विधानसभा के सत्र भी इस बीच हुए | कुल मिलाकर देश सामान्य स्थिति में लौट चला था | यद्यपि शारीरिक दूरी , मास्क और सैनिटाईजर जैसी सावधानियों की आवश्यकता पर जोर दिया जाता रहा | लेकिन यहीं लापरवाही हो गयी | लोगों ने संक्रमण में आई कमी को उसकी विदाई मान लिया | बाजारों में भीड़ बढ़ने लगी | किसान आन्दोलन जैसे छोटे - बड़े आयोजन भी सर्वत्र दिखाई देने लगे | राजनीतिक रैलियों में  कोरोना संबंधी शिष्टाचार की  धज्जियां खुलकर उडाई जाती रहीं | इन सबका परिणाम ये हुआ कि  बीते कुछ दिनों से संक्रमण की संख्या में तेजी से वृद्धि होने लगी जिससे  अनेक शहरों में रात्रिकालीन कर्फ्यू और लॉक डाउन की नौबत आ गई | कल का आंकड़ा 35 हजार के पार चले   जाने के बाद ये कहना कतई गलत न होगा कि कोरोना की  वापिसी हो गई है | असम , बंगाल , तमिलनाडु , पुडुचेरी और केरल में विधानसभा  चुनाव की  प्रक्रिया चल ही रही है | मार्च के अंत में होली का उत्सव होगा | ऐसे में शारीरिक दूरी के साथ ही कोरोना संबंधी अन्य सावधानियों के प्रति लापरवाही पूरी तरह संभावित है | दीपावली के समय से ही लोग ये मान बैठे थे कि कोरोना की वापिसी हो चली है और  टीका आते ही वह अंतिम सांसें लेने लगेगा | लेकिन इस आशावाद पर बीते कुछ दिनों में पानी फिर गया  | अब जबकि उसके दूसरे हमले की पुष्टि हो चुकी है  तब ये मानकर चलना निरी मूर्खता होगी कि अधिकतर नए मामले महाराष्ट्र या दूसरे किसी राज्य में हैं | संयोगवश भारत में सामुदायिक संक्रमण के हालात नहीं आये लेकिन उसकी वापिसी पहले से ज्यादा खतरनाक हो सकती है | और इसके लिए न चीन पर  दोषारोपण किया जा सकता है और न ही सरकार पर  | बीते एक साल में सरकार ने जो कुछ किया वह उम्मीद से ज्यादा था | भारत में टीके का विकास निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि कही  जायेगी |  उसका निर्यात किये जाने से भारत की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई है लेकिन कोरोना की वापिसी सारे  किये - धरे पर पानी फेर रही है | प्रधानमन्त्री ने इस बारे में जो कटाक्ष किया वह कुछ लोगों को भले बुरा लगे लेकिन ये बात बिलकुल सही है कि दूसरी लहर का कारण आम जनता द्वारा दिखाई गई लापरवाही है | इस बारे में एक बात अच्छी तरह समझ लेनी  चाहिए कि कोरोना भी  मलेरिया , डेंगू , पीलिया , टाइफ़ाइड की तरह हमारे साथ रहने आ चुका है | उसका इलाज भले ही खोज लिया गया है और सरकार मुफ्त में टीका भी लगवा रही है लेकिन जरा सी असावधानी प्राणलेवा हो सकती है | ये देखते हुए शारीरिक दूरी , भीड़भाड़ से बचाव , मास्क और हाथ धोने जैसी बातों को अपने दैनिक आचरण में शुमार  करना होगा | कोरोना के खतरे के बारे में किसी को कुछ बताने की  जरूरत नहीं बची है | गत दिवस प्रधानमंत्री ने  ग्रामीण इलाकों में कोरोना के फैलाव को रोकने संबंधी जो समझाइश दी वह बेहद महतवपूर्ण है | पिछले दौर में भारत के ग्रामीण और  आदिवासी बहुल इलाके कोरोना की मार से काफी हद तक अछूते रहे लेकिन आगे भी  ऐसा होता रहेगा ये मानकर बैठे रहना आत्मघाती होगा |  लॉक डाउन हटने के बाद अर्थव्यवस्था किसी तरह पटरी  पर लौटती दिख रही थी लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के कारण चिंता के काले बादल फिर आसमान पर मंडराते दिख रहे हैं |  गत वर्ष कोरोना से  हम अनजान थे लेकिन आज के हालात में उसके खतरे और बचाव के प्रति सब जानते हुए भी  लापरवाही की गई तो फिर कहने को और कुछ बचता ही नहीं है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 17 March 2021

गोविन्द सिंह किसी और के पति होते तो .......



 मप्र पुलिस के तमाम अधिकारी हत्या के एक आरोपी की तलाश में जुटे हैं  | उस पर ईनाम भी रखा गया है | जगह - जगह दबिश देने पर भी  उसका पता नहीं चल रहा | वैसे अन्य कोई आरोपी इस तरह पुलिस के साथ  आँख - मिचौली करता होता तो अभी तक उसके पूरे कुनबे को थाने में बिठाकर आवभगत शुरू हो जाती | लेकिन फरार बन्दा कोई मामूली इंसान नहीं मप्र विधानसभा की माननीय सदस्या  का परम सम्मानीय पति है | इसलिए खाकी वर्दी वाले पूरी सौजन्यता बरत  रहे हैं | 2018 के चुनाव में दमोह के पास पथरिया सीट से बसपा की टिकिट पर जीतकर आईं रामबाई के पति गोविन्द सिंह कुछ महीनों बाद ही क़त्ल के एक मामले में फंस गये | चूंकि उस समय बनी कमलनाथ सरकार के पास पूर्ण बहुमत नहीं था इसलिए  रामबाई महत्वपूर्ण बन गईं | बाद में उनके पति का नाम प्राथमिकी से हटा दिया गया |  लेकिन पीड़ित परिवार की याचिका  पर अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में गोविन्द सिंह की गिरफ्तारी का फरमान सुना   दिया | जिसके बाद उनकी खोज शुरू हुई जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पूरी नहीं हो सकी | सुना है राजधानी भोपाल से दिग्गज पुलिस अधिकारी इस काम में लगाये गये हैं | कमलनाथ सरकार गिरने के बाद रामबाई भी  जहां बम वहां हम की नीति पर चलते हुए सत्ता प्रतिष्ठान की  प्रिय बन गईं | हालांकि पति के अपराधिक कृत्य के लिए विधायक महोदया को दोषी ठहराना अनुचित होगा किन्तु लाख टके का सवाल ये है कि गोविन्द सिंह किसी और का पति रहा होता तब भी क्या मप्र की पुलिस इतनी आराम तलबी दिखाती | वैसे भी जो मुस्तैदी दिखाई जा रही है उसका कारण सर्वोच्च न्यायालय का डंडा है , वरना तो न जाने कितने हत्या के आरोपी पुलिस की आँखों के सामने बिना डरे  घूमा करते हैं | आम तौर पर संगीन मामलों में  पुलिस आरोपी के फरार होने पर उसके परिवारजनों को थाने में  बुलाकर बिठा लेती है जिससे उस पर आत्मसमर्पण का दबाव बनाया जा सके | ये फार्मूला अक्सर कारगर होता है | फरार व्यक्ति की संपत्ति जप्त करने जैसे कदम भी उठाए जाते हैं | लेकिन ये तौर - तरीके आम जनता के लिए हैं | देशभक्ति - जनसेवा के ध्येय वाक्य से प्रेरित हमारे देश की पुलिस आम और ख़ास में फर्क करने के लिये मजबूर है जो लोकतंत्र की मूल  भावना के विरुद्ध होने से  कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत की धज्जियां उड़ाकर रख देता है | गोविन्द सिंह की गिरफ्तारी इतनी बड़ी  समस्या नहीं थी जिसके लिए पुलिस को यह  सब करना पड़ता किन्तु जनता द्वारा चुने जाने के बाद किसी जनप्रतिनिधि को जो विशिष्ट स्थिति हासिल हो जाती है उसका लाभ विधायक पति को मिलता रहा  है | प्रकरण की सुनवाई जिस स्थानीय अदालत में चल रही है उसके माननीय न्यायाधीश   महोदय को भी सुरक्षा दे दी गई है | कुल मिलाकर मामला इसलिए सुर्ख़ियों में है क्योंकि गिरफ्तारी से बचने वाला व्यक्ति विधायक  का पति है और वह भी उस बसपा से जो दलित वर्ग की पार्टी कहलाती है | पुलिस की हालिया  दबिश पर घर में न रामबाई मिलीं न गोविन्द सिंह | पिछली सरकार द्वारा जांच में गोविन्द सिंह को निर्दोष ठहराए जाने का मसला भी राजनीतिक सौजन्यता का ही परिणाम कहा जाएगा  | मप्र में शिवराज सरकार ने हालांकि स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है लेकिन वह उतना ज्यादा नहीं कि वह  निश्चिन्त होकर बैठी रहे | इसीलिये निर्दलीय और बसपा - सपा सहित  फुटकर विधायकों की पूछ - परख कुछ ज्यादा ही होती है और उस दृष्टि से रामबाई भी सरकार की जरूरत बनी हुई हैं | कहे कोई कुछ भी लेकिन गोविन्द सिंह की फरारी और उसे पकड़  पाने में पुलिस की लाचारी व्यवस्था की फटेहाली को उजागर करने के लिए पर्याप्त है | यद्यपि ये कोई पहला और  अंतिम मामला नहीं है जिसमें पुलिस की प्रतिष्ठा तार - तार हो रही हो | पहले भी ऐसे मामले उजागर होते रहे  हैं जिनमें राजनीतिक रसूख के चलते कोई आरोपी या अपराधी कानून के शिकंजे से बचा रहा | उसे लेकर होहल्ला भी मचा |  चूँकि सत्ता और विपक्ष ऐसे मामलों में सिकंदर और पोरस के बीच हुए संवाद के अनुसार एक दूसरे का सम्मान करते हैं  इसलिए अंततः निहित स्वार्थों के सामने  समूची  व्यवस्था  बौनी  साबित हो जाती है  | गोविन्द सिंह भी आज - कल में पकड़ा ही जायेगा लेकिन सम्भावना यही है कि गिरफ्तारी उसकी सुविधा के अनुसार ही होगी |   न्यायमूर्ति चंद्रशेखर धर्माधिकारी का ये कथन ऐसे सभी मामलों में बेहद प्रासंगिक है कि हमारे देश में किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर है कि कानून तोड़ने और उससे बचने  की उसकी क्षमता कितनी अधिक है |

-रवीन्द्र वाजपेयी



Tuesday, 16 March 2021

किसानों के हाथ से निकलकर राजनीति के शिकंजे में फंसा आन्दोलन



किसान आन्दोलन के 100 दिन पूरे होने के बाद किसान नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल प.बंगाल गया और  भाजपा के अलावा किसी को भी मत देने की अपील कर आया | इसी तरह राकेश टिकैत विभिन्न राज्यों में जाकर किसानों को लामबंद करते हुए केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने में जुटे हुए हैं | किसान नेताओं द्वारा  उठाये जा रहे मुद्दे और मागें  वही हैं  जो दिल्ली की सीमा पर  दिए जा रहे धरने में उठाई गई थीं |  केंद्र सरकार लगातर कह  रही है कि वह किसानों द्वारा सुझाये  संशोधनों पर विचार करने के लिए तैयार  है किन्तु किसान नेताओं की जिद है कि सभी कानून वापिस लिए जाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप दिया जाए | चूंकि दोनों पीछे हटने राजी नहीं हैं इसलिए गतिरोध दूर होने की सम्भावना नजर नहीं आ रही | श्री टिकैत सरकार द्वारा समर्थन  मूल्य को जारी रखने के आश्वासन का मजाक उड़ाते हुए लगातार कह रहे हैं कि अब किसान जिलाध्यक्ष कार्यालय जाकर  अपना अनाज बेचने और समर्थन मूल्य हासिल करने का दबाव बनाएंगे | ये   बहुत ही बचकानी बात है क्योंकि सरकारी खरीद या तो कृषि उपजमंडी में होती है या प्रशासन द्वारा निर्धारित केन्द्रों में | जिन राज्यों में आन्दोलन का असर है वहां  के किसान भी श्री टिकैत के सुझाव को कितना स्वीकार करेंगे ये कहना कठिन है | आज  प्राप्त समाचार के अनुसार मक्का को  छोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में आने वाले अनेक खाद्यान्नों एवं अन्य चीजों की कीमतें फ़िलहाल समर्थन मूल्य से ज्यादा चल रही हैं | कपास के दाम तो काफी ऊपर चल रहे हैं  | इसी तरह भारतीय गेंहू और चावल की मांग  भी विदेशों में बढ़ी है | यद्यपि ये अस्थायी दौर हो सकता है क्योंकि  अनेक दक्षिण एशियाई देशों में  उत्पादन गिरा है जबकि भारत में सौभाग्यवश अच्छी फसल आने से हम निर्यात करने में सक्षम हुए हैं | जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में भारत खाद्यान्न के बड़े निर्यातक के रूप में अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरेगा | किसान आन्दोलन के संचालकों को अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने का पूरा अधिकार है लेकिन जिलाध्यक्ष कार्यालय जाकर अनाज बेचने की बात गले नहीं उतरती | उल्लेखनीय है वे संसद जाकर अनाज के न्यूनतम  समर्थन मूल्य वसूलने जैसी घोषणा भी कर चुके हैं | उनसे ये पूछा जा सकता है कि जिन जिंसों के दाम समर्थन मूल्य से ज्यादा हो गए हैं क्या  उन्हें भी जिला मुख्यालय अथवा संसद ले जाकर न्यूनतम मूल्य पर बेचा जाएगा ? वैसे भी  किसान आन्दोलन से इतर सोचने वाली बात ये है कि कृषि प्रधान देश होने के बाद भी भारत खाद्यान्न के निर्यात में वैश्विक स्तर पर अपनी जगह क्यों नहीं  बना सका ? | किसान आन्दोलन के बाद खेती और उससे उत्पादित  चीजों के दाम और उत्पादक को होने वाले लाभ का मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श बन चुका है | राजनीति  से अलग हटकर देखें तो ये शुभ संकेत है किन्तु साथ ही ये याद रखना जरूरी होगा कि जिस तरह वामपंथी सोच पर आधारित श्रमिक आन्दोलनों ने  श्रमिकों की संघर्ष क्षमता खत्म कर दी  ठीक उसी तरह किसान आन्दोलन को लेकर भी  आशंका  है कि उसकी हालत भी वैसी ही न  हो जाए | किसानों की जायज मांगों से किसी को ऐतराज नहीं  है लेकिन श्री टिकैत और बाकी  किसान नेता जिस तरह से बातें कर रहे हैं वे इस बात का संकेत हैं कि उनका उद्देश्य आन्दोलन को टाँगे रखना है न कि किसानों की भलाई | 100 दिन बीत जाने के बाद भी आन्दोलन को वैसा अखिल भारतीय स्वरूप नहीं  मिल सका जैसा किसान संगठन सोच रहे थे | दिल्ली की सीमा पर चल रहे धरने भी अब रौनक खोते जा रहे हैं | जिस तरह किसान नेता ,  केंद्र सरकार को व्यापारियों द्वारा संचालित बताने में जुटे हुए हैं ठीक वैसे ही इस आन्दोलन के साथ भी  ये बात जुड़ चुकी है कि अव्वल तो ये पंजाब - हरियाणा के सम्पन्न  किसानों और उनके साथ जुड़े ढ़तियों द्वारा प्रायोजित  है और दूसरा ये  भाजपा विरोधी शक्ल अख्तियार कर चुका है | वैसे अब तक किसान नेता इतना आगे बढ़ चुके हैं कि पीछे लौटना उनके लिए बेहद कठिन हो गया है | रही बात केंद्र सरकार की तो प्रधानमन्त्री द्वारा स्पष्ट कर  दिए जाने के बाद कृषि कानून वापिस होने की सम्भावना तो बची नहीं है और रही बात न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जामा पहिनाने की तो वह सुधारों की पूरी प्रक्रिया को ही पटरी से उतार देगा | ऐसे में बीच का रास्ता ही इस विवाद को ठंडा कर सकेगा लेकिन वह  निकालेगा कौन ये यक्ष प्रश्न है | जानकारों का कहना है कि  यदि बाजार के भाव सरकारी कीमत से ज्यादा चले तब तो  आन्दोलन अपना बचा - खुचा दबाव भी खो बैठेगा | 2 मई को पांच राज्यों के  चुनाव नतीजे  आने के बाद दोनों पक्ष अपनी रणनीति नये सिरे से बनायेंगे  | श्री टिकैत भी अक्टूबर - नवम्बर तक विवाद  सुलझ जाने की बात लगातार दोहरा रहे हैं | गत दिवस मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा बागपत में दिए भाषण की भी काफी चर्चा रही जिससे लगा कि कोई राजनीतिक प्रक्रिया पर्दे  के पीछे चल रही है | आने वाले दिनों में क्या होगा ये अनिश्चित है किन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है यह  आन्दोलन किसानों के हाथ से निकलकर राजनेताओं के कब्जे में आता जा रहा है और श्री टिकैत सहित बाकी नेता सियासत के औजार बनकर रह गये हैं |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 15 March 2021

तबादला उद्योग के चलते भ्रष्टाचार रोकना असम्भव



मप्र सरकार ने अपनी नई तबादला नीति के तहत  फैसला किया है कि प्रभारी  मंत्री  अधिकारियों , शिक्षकों या कर्मचारियों का तबादला साल में दो बार नहीं कर सकेंगे और विशेष परिस्थिति में ऐसा करने के लिए मुख्यमंत्री स्तर तक स्वीकृति लेनी होगी | हालाँकि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी इस नीति से बाहर होंगे | राज्य सरकार शीघ्र ही  तबादलों से प्रतिबंध हटाने जा रही है | पहले परीक्षाओं का मौसम खत्म होने के बाद सरकारी अमले के स्थानान्तरण की परम्परा थी | इसका उद्देश्य बच्चों की पढाई बीच सत्र में बाधित होने से रोकना था | लेकिन धीरे - धीरे तबादले की प्रक्रिया में भी अस्थिरता आ गई और फिर इसने एक उद्योग का रूप ले लिया | ज्योंही प्रतिबन्ध हटता है राजधानी में मंडी सज जाया करती है | मंत्रियों के बंगलों पर सौजन्य ( ? ) भेंट करने वाले सरकारी सेवकों की भीड़ इसका प्रमाण है | इसी के साथ ही बीच शैक्षणिक सत्र में स्थानान्तरण का सिलसिला भी अनवरत चला करता है | कमलनाथ सरकार बनी तो उसने पूरी नौकरशाही को अपनी अनुकूलता के अनुसार उलट - पुलट  किया | ये भी कहा जाता है कि नई सरकार बनने पर चुने हुए जनप्रतिनिधि चुनाव में हुए खर्च की भरपाई तबादलों से कर लेते हैं | कमलनाथ सरकार के 15 महीने के कार्यकाल में तबादले बिना रुके जारी रहे | संयोग से उसकी विदाई हो गयी और शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बन गये | उसके बाद फिर वही प्रक्रिया शुरू हुई | जबसे प्रभारी मंत्री नामक व्यवस्था शुरू हुई तबसे सम्बन्धित  जिले का सरकारी अमला उनकी पसंद का होने का चलन चल पडा | उसकी वजह से प्रभारी मंत्री की खुशी और नाराजगी किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी के तबादले का कारण बनने लगी है | हाल ही में ऐसे अनेक वाकये हुए जिनमें किसी कर्मचारी या अधिकारी को महज इसलिए तबादले का शिकार होना पडा क्योंकि मंत्री जी अपने स्वागत - सत्कार में कमी से नाराज हो उठे | वैसे सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिहाज से प्रभारी मंत्री रूपी  व्यवस्था गलत नहीं है किन्तु कतिपय  मंत्रियों का जो शैक्षणिक और मानसिक स्तर होता  है उसे देखते हुए उन्हें तबादलों का अधिकार देना  बंदर के हाथ में उस्तरा पकडाने जैसा है | ये देखते हुए शिवराज सरकार ने एक साल में दो तबादले करने के अधिकार से प्रभारी मंत्रियों को वंचित करने की जो नीति बनाई है वह व्यवहारिक है | लेकिन ये भी  देखना   होगा कि विशेष मामलों में मुख्यमंत्री स्तर पर तबादले की प्रक्रिया भी पारदर्शी हो और उसमें राजनीतिक भेदभाव नजर न आये | किसी भी शासकीय कर्मी को अपने कर्तव्य के निर्वहन में कमी या गलती पर दंडित किये जाने के प्रावधान सेवा शर्तों में  हैं | निलम्बन और बर्खास्तगी के अलावा भी अनेक ऐसे तरीके हैं जिनसे उसे दंडित किया जाता है जिससे उसकी पदोन्नति पर असर पड़ता है | वरिष्ठ अधिकारी द्वारा  अपने अधीनस्थ की गोपनीय वार्षिक रिपोर्ट लिखने का जो प्रावधान है उसका उद्देश्य भी प्रशासनिक कसावट बनाये रखना ही है | हालाँकि इस कार्य में  कितनी ढील - पोल है ये किसी से छिपा नहीं है | सरकारी अमले के तबादले के पीछे मकसद ये होता है कि किसी एक जगह रहते हुए उसके निहित स्वार्थ जड़ें न जमा लें | लेकिन दंडस्वरूप किये जाने वाले स्थानांतरण का विशेष लाभ  इसलिए नहीं होता क्योंकि जो कर्मचारी या अधिकारी  स्वभावतः भ्रष्ट अथवा अकर्मण्य है उसे कहीं भी पदस्थ किया जावे वह कुत्ते की पूंछ की तरह ही बना रहेगा | कहने का आशय ये है कि शासकीय सेवा में स्थानान्तरण सामान्य और काफी हद तक आवश्यक  प्रक्रिया  है किन्तु उसका औचित्य साबित करना भी जरूरी है | प्रभारी मंत्री या दूसरे किसी भी जनप्रतिनिधि की व्यक्तिगत नाराजगी या प्रसन्नता के कारण होने वाले स्थानान्तरण से किसी भी तरह के सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ है | कमलनाथ और शिवराज सिंह दोनों  के समय ये देखने में आया कि पहले तो लम्बी चौड़ी तबादला  सूची जारी हुई और अगले ही दिन उसमें से बड़ी संख्या में तबादले रद्द कर दिए गए | इसी तरह एक जगह हुए तबादले को बदलकर आनन - फानन में दूसरी जगह भेजने का आदेश जारी हो गया | जाहिर है ये सब राजनीतिक कारणों के साथ ही पैसे के लेनदेन से संभव होता है |  सबसे बड़ी बात ये है कि तबादला उद्योग के कारण ही प्रतिबद्ध नौकरशाही नामक विसंगति ने जन्म लिया | आज के दौर में किसी अधिकारी की निष्ठा किस नेता के प्रति है ये आसानी से उजागर हो जाता है | धीरे - धीरे ये प्रवृत्ति दलीय प्रतिबद्धता में बदलती गई | इसका नुकसान यह हुआ कि राजनीतिक विद्वेष का शिकार कर्मचारी या अधिकारी निठल्ला  बैठकर अपनी अनुकूल सरकार  आने की प्रतीक्षा करता है | भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी राज्य में मनमाफिक सरकार नहीं होने पर केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर खिसक लेते हैं | शिवराज सरकार ने एक साल में दो तबादले करने के  प्रभारी मंत्री के अधिकार को भले ही खत्म किया हो लेकिन तबादले को उद्योग बनने से रोकने की इच्छा  शक्ति के बिना व्यवस्था में सुधार की अपेक्षा करना व्यर्थ है | प्रशासनिक ढांचा एक स्थायी व्यवस्था है जिसे सत्ता  परिवर्तन से अछूता रखा जाना ही सही मायनों में प्रशासनिक सुधार होगा | दुर्भाग्य से नेता और नौकरशाही के बीच होने वाले अपवित्र गठजोड़ ने जिस भ्रष्ट संस्कृति को जन्म दिया वह सारी समस्याओं की जड़ बन गई है | शिव्र्राज सरकार यदि  तबादला उद्योग रूपी भ्रष्टाचार के स्रोत को बंद करना चाहती है तो उसे ईमानदार और निष्पक्ष  होकर काम करना होगा | राजनीतिक तौर पर भले ही उनकी नीतियां कांग्रेस से भिन्न हों लेकिन प्रशासनिक अमले के भ्रष्टाचार को रोकने के मामले में मौजूदा सरकार भी  पूरी तरह विफल रही है | और इसके  प्रमुख कारणों में तबादला सबसे ऊपर है | प्रभारी मंत्रियों को ये  नई व्यवस्था कितनी रास आयेगी , कहना कठिन है क्योंकि मलाई का स्वाद चखने के बाद रूखी - सूखी खाने के लिए शायद ही  कोई तैयार होगा | वैसे भी गांधी , लोहिया और दीनदयाल केवल  जयन्ती मनाने तक ही प्रासंगिक रह गए हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 13 March 2021

क्यों न कर्ज का नाम बदलकर मुफ्त उपहार कर दिया जावे



 तमिलनाडु से आ रही खबरों के अनुसार आगामी विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक सत्ता से बाहर होने जा रही है और द्रमुक भारी बहुमत के साथ दस साल बाद सरकार बना लेगी | करूणानिधि और जयललिता के निधन के बाद इस राज्य की राजनीति में दिग्गजों का अभाव साफ़ दिख रहा है | हालाँकि करूणानिधि के बेटे और चेन्नई के पूर्व महापौर स्टालिन प्रदेश की राजनीति में जाने पहिचाने चेहरे हैं जिसके जवाब में अन्नाद्रमुक के पास कोई  दमदार नेता नहीं है | वर्तमान मुख्यमंत्री  पलानि स्वामी की छवि अभी भी स्टेपनी की ही है | इनके अलावा फ़िल्मी सितारे रजनीकांत और कमल हासन ने भी अपनी - अपनी  पार्टी बनाकर राजनीति में उतरने का प्रयास किया  लेकिन वे आधे - अधूरे मन से आगे बढ़ने के बाद ठहरे हुए हैं | ऐसे में मुकाबला तो द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच ही होगा | कांग्रेस का  द्रमुक और भाजपा का  अद्रमुक के साथ गठबंधन  है | दक्षिण का ये राज्य , हिन्दी और उत्तर भारत के विरोध के लिए जाना जाता है | एक समय था जब यहाँ अलग तमिल राष्ट्र जैसी मांग भी उठी किन्तु श्री लंका में लिट्टे के खात्मे के बाद उसकी हवा निकल गई | बीती आधी शताब्दी से यहाँ की सियासत पर फ़िल्मी हस्तियों का कब्जा रहा | करूणानिधि , एमजी रामचंद्रन और जयललिता तमिल  फिल्म उद्योग से जुड़े हुए  थे | बीते कुछ सालों में जरूर ये सिलसिला टूटा लेकिन अभी भी वहां दोनों प्रमुख क्षेत्रीय दलों का ही आधिपत्य है और कांग्रेस तथा भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल इनका दामन पकड़कर चलने को मजबूर हैं | फ़िल्मी हस्तियों के वर्चस्व के कारण राजनीति भी लटकों - झटकों से भरपूर रही है | इसका प्रमाण चुनाव में किये जाने वाले वायदों से मिलता रहा | मिक्सर - ग्राइंडर , टीवी , मंगलसूत्र जैसे उपहार घोषणापत्र के वायदों में प्रमुखता से छाये रहते हैं | इनकी देखासीखी बाकी राज्यों में भी इसका अनुसरण किया जाने लगा | हालाँकि जयललिता द्वारा 2 रूपये में इडली का नाश्ता शुरू किये जाने जैसी योजना जनहित में मील का पत्थर साबित हुई जिसकी नकल करते हुए ममता बैनर्जी ने भी बंगाल की जनता से वैसा ही वायदा किया है | लेकिन जो नई बात सुनाई दे रही है उसके अनुसार अपनी जमीन खिसकते देख अन्नाद्रमुक ने स्वर्ण लोन  माफी जैसा वायदा उछालकर सत्ता में वापिसी का दांव चल दिया है | राजनीतिक  विश्लेषकों के अनुसार इस वायदे की वजह से मैदान  से बाहर हो रही सत्तारूढ़ पार्टी वापिस मुकाबले  में उतरने लायक हो गई है | कुछ लोग तो इसे चुनाव  की दिशा बदलने वाला पैंतरा बता रहे हैं | इसका कारण ये है कि स्वर्ण आभूषणों के प्रति तमिलनाडु में जबर्दस्त आकर्षण है | देश भर के हालमार्क केन्द्रों में से 30 फीसदी इसी राज्य में हैं | सहकारी  संस्थाओं द्वारा वितरित 20 हजार करोड़ रु.  के  ऋणों में लगभग 7 हजार करोड़ सोना गिरवी रखकर लिए गये ऋण ही हैं | प्राप्त जानकारी के अनुसार लगभग 15.5 लाख महिलाओं को इस प्रस्तावित ऋण माफी का  लाभ मिलेगा | अन्नाद्रमुक के इस चुनावी बाउंसर से द्रमुक चिंतित  हो उठी है | 48 ग्राम तक के स्वर्ण  ऋण माफ़ करने का वायदा किसानों के कर्जे माफ़ किये जाने जैसा करिश्माई साबित होने की अटकलें लगाई  जाने लगी हैं | सुना है द्रमुक के चुनाव सलाहकार प्रशांत किशोर इस दांव का जवाब तलाशने में जुट गये हैं  | लेकिन इससे इतर देखें तो क्या इस तरह के वायदे मतदाताओं को घूस देने की श्रेणी में नहीं  आते ? चुनावों के दौरान सख्ती का प्रतीक बन जाने वाला चुनाव आयोग इस मुफ्तखोरी पर अंकुश लगाने के मामले में क्यों उदासीन बना रहता है , ये बड़ा सवाल है | लोकतंत्र में जनहित की नीतियों को लागू किया जाना हर दृष्टि से वांछनीय है  किन्तु ये भी देखा जाना जरूरी है कि समाज के एक वर्ग को दिए जाने वाली मुफ्त सुविधा का भार दूसरे वर्ग पर पड़ता है | जिन सहकारी संस्थाओं द्वारा दिये गये स्वर्ण ऋण माफ़ किये जाने का वायदा अन्नाद्रमुक ने किया है उनकी भरपाई करने में राज्य सरकार द्वारा की जाने वाली देरी से उनका आर्थिक आधार डगमगाना तय है | किसानों के  कर्जे माफ़ किये जाने वाले राज्यों में ऋण देने वाले बैंकों और सहकारी संस्थाओं के सामने भारी संकट उत्पन्न हो गया क्योंकि  चुनावी वायदा सुनते ही कर्जदारों ने अदायगी बंद कर दी वहीं सत्ता में आने के बाद सरकार उनकी भरपाई में टरकाऊ रवैया दिखाती रही | मप्र , राजस्थान , छतीसगढ़ , पंजाब जैसे राज्यों में  किसानों के कर्ज माफ़ करने की घोषणा ने सरकार और वित्तीय संस्थानों के लिए मुसीबत पैदा कर दी | सबसे बड़ी बात ये है कि राजनीतिक दलों द्वारा इस तरह के वायदों से सत्ता हथियाए जाने के कारण जनता की मानसिकता में  भी  मुफ्तखोरी बढ़ रही है | पहले के जमाने में कर्ज को बुरा माना जाता था लेकिन राजनीति के चलते  लोग  कर्ज लेने और फिर अदा न करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं  | उस  दृष्टि से      तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक द्वारा स्वर्ण ऋण माफ़ किये जाने का चुनावी वायदा बहुत ही खतरनाक संकेत है | भाजपा का उसके साथ गठबंधन है लेकिन वह राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद उस पर हावी होने की स्थिति में नहीं है | लेकिन उसे चाहिए वह इस तरह के वायदों से खुद को दूर रखे क्योंकि चुनाव दर चुनाव ये बढ़ता  ही जा रहा है | ये सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा कहना कठिन है | चुनाव आयोग को भी इस बारे में कड़ाई दिखानी चाहिए | यदि मुफ्त खैरात बांटने पर रोक नहीं  लगाई जाती तब बड़ी बात नहीं आने वाले समय में कर्ज का  नाम बदलकर मुफ्त उपहार करना पड़ेगा | गरीबों की मदद करना बुरा नहीं है लेकिन उन्हें मुफ्तखोर बनाना देश के दूरगामी हितों के विरुद्ध होगा |  

- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 12 March 2021

प्रधानमन्त्री के सन्देश की प्रतीक्षा में न बैठे रहें



महाशिवरात्रि पर गत दिवस  हरिद्वार में कुम्भ का शुभारम्भ हुआ | एक माह तक चलने वाले इस आयोजन में करोड़ों लोगों की आवक होगी | शाही स्नान और विभिन्न पर्वों के दिन श्रद्धालुओं की भीड़ हरिद्वार में उमड़ेगी | कुम्भ मेला भारत के सबसे बड़े आयोजनों में से है | लेकिन ये आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब देश में कोरोना की दूसरी लहर ने जोरदार दस्तक दे दी है | गत दिवस 22 हजार से ज्यादा नए मामले आये जबकि स्वस्थ होकर अस्पतालों से लौटने वालों की संख्या काफ़ी कम रही | महाराष्ट्र , केरल और गुजरात से आ रही खबरें  भी चिंता में डालने वाली हैं | पूरे देश से लोग कुम्भ में आयेंगे । वहीं असम , प.बंगाल , तमिलनाडु , पुडुचेरी और केरल में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के कारण कोरोना से बचाव के प्रति वैसे भी लापरवाही देखी जा रही है | मास्क और शारीरिक दूरी की सलाह पूरी तरह उपेक्षित कर दी गई है  | द्देश के बाकी हिस्सों में भी कोरोना को लेकर पैदा हुआ खौफ पूरी तरह खत्म सा लगने लगा है | सरकार द्वारा लगाई गयी बंदिशें लगातार शिथिल किये जाने से भी संक्रमण के लौटने की स्थितियां बनने लगी हैं | रेलगाड़ियों का परिचालन बढ़ने से आवागमन बढ़ने लगा है | घरेलू उड़ानों को भी भरपूर यात्री मिल रहे हैं | सिनेमा घर खुल गए हैं और होटल रेस्टारेंट भी गुलजार नजर आ रहे हैं | इस महीने के अंत में होली का उत्सव होगा और फिर आ जाएगा शादियों का मौसम | कहने का आशय ये है कि लॉक डाउन हटने के बाद कोरोना में क्रमशः आई गिरावट ने जो उम्मीदें जगाई थीं वे उसका टीकाकरण शुरू होने से और बलवती होने लगीं | इसका असर ये हुआ कि लोगो में बेफिक्री आने लगी जो लापरवाही की हद तक जा पहुँची | उसी का परिणाम ये हुआ कि जिस कोरोना की विदाई मानकर राहत की सांस की जा रही थी वह लौट आया है | एक तरफ तो देश भर में चल  रहे  टीकाकारण के आंकड़े प्रसारित हो रहे हैं वहीं दूसरी तरफ कोरोना के नये मामलों में वृद्धि की खबरें भी बराबरी से सुनाई दे रही हैं | गत दिवस नए संक्रमितों की संख्या न केवल चौंकाने बल्कि उससे ज्यादा डराने वाली है | यदि इस पर नियन्त्रण नहीं हुआ तब टीकाकरण आगे पाट पीछे सपाट की कहावत चरितार्थ करने वाला होगा | सरकार का पूरा ध्यान मौजूदा समय में टीकाकरण पर है | ऐसे में यदि कोरोना पहले की तरह फैला तब हालात बेकाबू हो जायेंगे | कहा जा रहा है कि मुम्बई में लोकल ट्रेन शुरू होते ही कोरोना के नए मामले बढ़ने लगे | पुणे , नासिक , नागपुर से आ रही खबरें भयभीत कर रही हैं | जहां रात्रिकालीन कर्फ्यू के बाद अब लॉक डाउन की नौबत आ गई है | ऐसी सूरत में अब जनता विशेष रूप से पढ़े - लिखे लोगों की जिम्मेदारी है कि वे खुद तो कोरोना से बचाव के तौर - तरीकों का पालन करें ही , साथ में अपने सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति को उसके लिए प्रेरित करें | कोरोना को लेकर जिस तरह की लापरवाही देखी जा रही है  वह गंभीर संकट को आमंत्रित करने वाली है | बीते एक साल में देश का हर व्यक्ति इस बीमारी और उससे बचने के तरीकों से दीक्षित हो चुका है | हमारे इर्द - गिर्द हुईं  मौतों से हमें जो सबक मिला उसे इतनी जल्दी भुला देना मूर्खता होगी | इसलिए व्यर्थ की बहादुरी दिखाने  की बजाय बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करना समयोचित होगा | कोरोना को आपकी सामाजिक या आर्थिक हैसियत से कुछ लेना - देना नहीं है | वह सावधानी हटी - दुर्घटना घटी वाली उक्ति को सही साबित करने वाला है | ऐसे में जरूरी है कि देश के प्रत्येक नागरिक को कोरोना के प्रति पहले जैसी सतर्कता रखनी होगी | हर बात के लिए प्रधानमन्त्री के सन्देश की प्रतीक्षा करने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय देना हमारा दायित्व है जिससे मुंह मोड़ना जानलेवा हो सकता है | भारत ने इस बीमारी पर विजय पाने के लिए जो कुछ किया उसकी पूरी दुनिया में प्रशंसा हो रही है | हमारे यहाँ  तैयार हुए टीके भी विदेशों में जा रहे हैं | ऐसी स्थिति में कोरोना का पुनरागमन हमारी जगहंसाई करवा देगा | बेहतर हो कोरोना के प्रति पूर्ववत सावधानी  की प्रतिबध्दता का पालन किया जाए | दुनिया को ये संदेश देने की जरूरत है कि भारत अब एक  जिम्मेदार देश बन चुका  है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी