Thursday, 8 April 2021

राष्ट्रीय आपात्काल घोषित कर एक साल के लिए सभी चुनाव रोके जाएँ



कोरोना का दूसरा हमला पहले से ज्यादा शक्तिशाली है | गत वर्ष जब प्रधानमन्त्री ने अचानक देशव्यापी  लॉक डाउन की घोषणा की तब उसके तरीके और औचित्य को लेकर ढेर सारे सवाल उठे |  लेकिन इस साल बीते एक महीने में जिस तरह से संक्रमण ने सुरसा जैसा  मुंह फैलाया उसके बावजूद लॉक डाउन लगाने  के फैसले  को प्रदेश और स्थानीय प्रशासन के जिम्मे छोड़ने पर केंन्द्र सरकार से पूछा जा रहा है कि जब संक्रमितों का दैनिक आंकड़ा 1 लाख  25 हजार से भी ज्यादा हो चुका है जिसमें आगे भी वृद्धि की पूरी सम्भावना है तब भी वह इस बारे  में उदासीन क्यों  है ? जाहिर है पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव राष्ट्रव्यापी लॉक डाउन नहीं लगाने का कारण  हो सकते हैं किन्तु जब असम , पुडुचेरी , तमिलनाडु  और केरल में प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है तब बंगाल  छोडकर बाकी राज्यों के बारे में तो  फैसला लिया ही  जा सकता है | वैसे जिस वजह से केंद्र सरकार देश भर में लॉक  डाउन लगाने से पीछे हट रही है वह है अर्थव्यवस्था | गत वर्ष अनेक महीनों तक अधिकांश  उद्योग - व्यापार बंद पड़े रहने से अर्थव्यवस्था के  चिंताजनक स्थिति में आने से  विकास दर नकारात्मक दिशा में बढ़ गई | दिवाली के समय  लॉक डाउन हटने पर आर्थिक गतिविधियों ने दोबारा गति पकड़ी जिसका असर जीएसटी संग्रह में लगातार हुई वृद्धि के रूप में सामने आया | लेकिन फरवरी के बीच से ही कोरोना ने  वापिसी का संकेत  दे दिया | शुरू में लग रहा था कि महाराष्ट्र सहित  कुछ राज्यों में ही उसका असर  रहेगा लेकिन देखते  - देखते पूरा देश उसकी गिरफ्त में आ गया | इस बार उसकी गति बहुत तेज होने से चिकित्सा प्रबंध कम पड़ने लगे हैं | कहीं वेंटीलेटर की कमी है तो कहीं ऑक्सीजन की | अस्पतालों में बिस्तरों का अभाव होने से मरीजों को घर पर रहकर इलाज करने की सलाह  दी जा रही है | गम्भीर मरीजों को लगाये जाने वाले रेमडेसिवर इंजेक्शन की उपलब्धता भी पर्याप्त नहीं है | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिस तरह सरकार  कोरोना की वापिसी   को लेकर निश्चिन्त हो चली  थी उसी तरह चिकित्सा जगत भी उसके पलटवार को लेकर बेफिक्र सा था | आम जनता की लापरवाही तो हमारे राष्ट्रीय चरित्र को दर्शाती ही  है | ऐसे में कोरोना को भी तेजी से पांव फैलाने का अवसर मिल गया | दरअसल जैसे ही टीकाकरण शुरू हुआ वैसे ही आम जनता में  ये अवधारणा प्रबल हो उठी कि उनके पास कोरोना से बचाव का रक्षा कवच आ गया है | लेकिन अभी तक जितने लोगों को टीके लगे हैं उस गति से तो ये काम पूरा होने में लंबा समय लगेगा | ऐसे में जो सामान्य तरीके हैं वे ही बचाव में सहायक होंगे जिनकी उपेक्षा करने का दुष्परिणाम देश भोग रहा है | टीका लगने के बाद भी अनेक लोगों को लापरवाही महंगी पड़ी है | लेकिन जनता को कसूरवार ठहराने मात्र से काम नहीं चलेगा क्योंकि राजनीति भी  उसे लापरवाह बनाने में सहायक है | मसलन राजनीतिक जलसों में कोरोना शिष्टाचार की जिस बेहयाई और दबंगी से धज्जियाँ उडाई जाती हैं वह भी संक्रमण के फैलाव की बड़ी वजह है | चुनाव वाले राज्यों में तो लगता ही नहीं कि कोरोना का कोई डर है | दिल्ली उच्च न्यायालय पूछ रहा है कि प्रचार करने वाले नेता मास्क क्यों नहीं  लगा रहे ? राजनीति का आलम ये है कि प्रधानमन्त्री द्वारा कोरोना  पर विचार करने बुलाई गई आभासी बैठक में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी हिस्सा नहीं लेंगीं | पहले भी ऐसा हो चुका है | हाल ही में पंजाब सहित कुछ राज्यों में राजनीतिक जलसों पर भी रोक लगाई गयी है | 2 मई को पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद आगामी वर्ष के मुकाबलों के लिए मैदान सजने लगेगा | राजनीतिक दलों के अपने स्वार्थ हैं | लेकिन मौजूदा हालात में लोगों की जान के साथ अर्व्यथवस्था को  बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए | इसके लिए ज़रूरी है राष्ट्रीय आपातकाल लगाकर कम से कम एक साल तक के लिए सभी प्रकार के चुनाव पर रोक लगे | इससे सरकार के संसाधन तो बचेंगे ही उद्योग - व्यापार जगत पर राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे का दबाव भी कम होगा | सबसे बड़ा लाभ  केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय कायम हो सकेगा |  दुर्भाग्य से हमारे देश में राजनेता चाहे सत्ता में बैठे हों या विपक्ष में , उनकी  नजर सदैव अगले चुनाव पर ही  रहती है | जिन राज्यों में  चुनाव हो रहे हैं या होने वाले हैं वहां के सभी नेता कोरोना को भूलकर वोट बटोरने की तरकीबें तलाशने में जुटे हैं और इस दौरान कोरोना संबंधी सावधानियों को  रद्दी की टोकरी में फेंक  दिया जा रहा है  | इस समस्या का हल केवल यही  है कि एक वर्ष तक देश को चुनाव के संक्रमण से मुक्त रखा जावे | लोकसभा के चुनाव तो अभी दूर हैं लेकिन  जिन राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल इस दौरान खत्म हो रहे हों वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया जावे | हालाँकि राजनीति के दुकानदारों को इसमें लोकतन्त्र के लिये खतरा  नजर आने लगेगा लेकिन चुनावों के दौरान जिस तरह की लापरवाही देखने मिलती है वह महामारी का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये | जनता की सुरक्षा को खतरे में डालकर करवाए जाने वाले चुनाव सत्ता की वासना मात्र हैं | जितना पैसा चुनावों में बर्बाद  किया जाता है उसका आधा भी कोरोना से बचाव पर खर्च किया जावे तो इस मुसीबत से जल्द छुटकारा मिलने के साथ ही  हजारों लोगों की ज़िन्दगी बच सकती है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 April 2021

बाअदब - बामुलाहिजा होशियार , मुख्तार की सवारी आ रही है


मुख्तार अंसारी की पारिवारिक पृष्ठभूमि यूँ  तो बहुत ही समृद्ध है | दादा आजादी के पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्य्क्ष रहे | पिता साम्यवादी थे जिन्हें स्वच्छ छवि के चलते नगर पालिका के लिए निर्विरोध चुना गया | चाचा हामिद अंसारी विदेश सेवा में रहने के बाद उपराष्ट्रपति  बने | नाना उस्मान खान फ़ौज में ब्रिगेडियर बने जिनकी सेवाओं के लिए उन्हें महावीर चक्र दिया गया |  भाई अफजल अंसारी उप्र की गाजीपुर सीट से लोकसभा सदस्य हैं और  बेटा निशानेबाजी की अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुका है | इन्हीं सबके कारण उप्र के मऊ इलाके में अंसारी परिवार का बड़ा नाम और् प्रतिष्ठा रही लेकिन मुख़्तार इससे अलग अपराधों की दुनिया में अपनी जगह बनाने में लग गया और देखते - देखते उसके विरुद्ध ह्त्या , अपहरण , फिरौती जैसे  दर्जनों मामले कायम हो गये | बीते लगभग दो साल से किसी मामले में वह पंजाब की रोपड़ जेल में बंद था | उप्र पुलिस उसे वहां से लाने की  कोशिश कर  रही थी जिसमें पंजाब सरकार अज्ञात कारणों से अड़ंगे लगाने में जुटी रही | अंततः अदालती आदेश के तहत उसे उप्र लाने की अनुमति मिली जिसके बाद गत दिवस उप्र पुलिस भारी तामझाम के साथ उसे रोपड़ जेल से लेकर बांदा के लिए रवाना हुई | मुख्तार बीमार हैं इसलिए एम्बुलेंस में लाया गया | आगे पीछे वज्र वाहन चल रहे थे | लगभग 150 पुलिस वाले काफिले के साथ रहे | कुछ महीने पहले कानपुर के कुख्यात अपराधी विकास दुबे का उज्जैन से कानपुर ले जाते समय  वाहन पलट जाने पर भागने की वजह से  एनकाउंटर कर दिया गया | उस घटना को लेकर उप्र की पुलिस अभी भी संदेह के घेरे  में है |  मुख्तार और उनके परिवार ने पंजाब से उप्र लाये जाने का विरोध करने के लिए विकास की मौत को ही आधार बनाया | यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर मुख़्तार के साथ भी  विकास दुबे जैसे  काण्ड की  पुनरावृत्ति का शिगूफा छोड़ा जाता रहा | और इसी के चलते रोपड़ से बांदा  जेल तक के तकरीबन 800 किमी तक के रास्ते पर मुख्तार के काफिले के साथ टीवी चैनलों के संवाददाताओं के वाहन मय कैमरों के चलते रहे | काफिला पंजाब से निकलकर हरियाणा में घुस गया , फलां वाहन में मुख्तार बैठा है , गाड़ियां 120 की गति से दौड़ रही हैं , रास्ते में काफिला कहीं रोका नहीं जाएगा , अब वह आगरा एक्सप्रेस हाइवे पर आ गया है जैसे समाचार लगातार सुनाये और दिखाये जाते रहे   | बीच - बीच में मुख़्तार के भाई का बयान भी सुनाया गया  जिसमें उसने कहा कि उसके भाई को कुछ हुआ तो उसे शहादत माना जायेगा और इसके बाद तानाशाही का अंत हो जाएगा | मुख्तार की पत्नी द्वारा उसकी सलामती को लेकर व्यक्त की जा रही चिन्ताओं से भी देश और दुनिया को अवगत कराने की होड़ टीवी चैनलों में लगी रही | ऐसा लग रहा था किसी   बड़ी हस्ती का काफिला एक जगह से दूसरी को जा रहा है | लोकतंत्र में अभिव्यक्ति , मानवाधिकार और पारदर्शिता का महत्वपूर्ण स्थान है | आरोप लगने मात्र से किसी को तब तक  सजा नहीं दी जा सकती जब तक वे प्रमाणित न हो  जाएँ | मुख्तार भी दर्जनों मामलों में  आरोपी है जिनका फ़ैसला होना है | सवाल ये है कि बरसों से चले रहे इन मामलों में फैसला क्यों नहीं हो पाता | न्याय प्रक्रिया निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक चलती है जिसका लाभ लेकर संपन्न और प्रभावशाली अपराधी बचे  रहते हैं | मुख्तार का आर्थिक साम्राज्य और राजनीतिक प्रभाव सर्वविदित है |  अल्पसंख्यक होने के कारण उसे अतिरिक्त फायदा मिलता रहा , ये कहना गलत न होगा | उसका अपने  इलाके में  अल्पसंख्यक   समुदाय के मतदाताओं पर भी  खासा प्रभाव और दबाव है जिसके कारण  पिछली राज्यं सरकारें उसके प्रति नरम बनी रहीं | योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपराधी सरगनाओं पर कानून का शिकंजा कसने की जो कवायद शुरू हुई उसी के तहत मुख्तार भी  घेरे  में है | उसे पंजाब से  वापिस लाने के लिए कितनी उठापटक करनी पड़ी ये किसी से छिपा नहीं है | उसके अपराधों की सूची इतनी लम्बी है कि मौजूदा गति से चल्र रही न्याय प्रक्रिया  के अंजाम तक पहुचने में बरसों  लग जायेंगे | ऐसे व्यक्ति के प्रति टीवी चैनलों का विशेष अनुराग समाचार  माध्यमों द्वारा  प्राथमिकता के  चयन  पर बड़ा सवाल है | मुख्तार के काफिले का मार्ग सुरक्षा कारणों से सार्वजनिक नहीं किया  गया था | लेकिन टीवी कैमरे  हर स्थान का नाम बताते हुए ये भी कहते जा रहे थे कि अगला स्थान  कौन सा आयेगा | मुख्तार का रोपड़ से बाँदा जेल  लाया जाना निश्चित तौर पर समाचार है लेकिन टीवी  प्रसारण ने उसे एक ईवेंट बना दिया | गनीमत है कोई चैनल वाला  उसकी एम्बुलेंस में बैठने का जुगाड़  नहीं कर  सका वरना  मुख़्तार अंसारी के कथित क्रांतिकारी विचार सुनने मिलते जिनमें तानाशाही के विरुद्ध निर्णायक जंग का आह्वान होता | बीते कुछ समय से टीवी चैनलों के पास दर्शकों को दिखाने के लिए गुणवत्तायुक्त सामग्री का अभाव होने से वे ऊलजलूल चीजें  दिखाकर समय व्यतीत किया करते हैं | मुख्तार अन्सारी जैसे लोग समाज के लिए खतरा हैं | उनका खुली हवा में रहना जनसुरक्षा के लिहाज से ठीक नहीं है | बेहतर होगा माननीय न्यापालिका इनको दण्डित करने में तत्परता बरते जिससे इनका अनुसरण करने के इच्छुक लोगों में भी भय व्याप्त हो सके | संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोगों की उपस्थिति लोकतंत्र के लिए किसी कलंक से कम नहीं है | समाचार माध्यमों को  चाहिए कि वे ऐसे लोगों को बिना वजह महत्व देने से परहेज करें | 



Tuesday, 6 April 2021

गुजरात और बंगाल दोनों हैं तो इसी देश में



बंगाल की  मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अपने गुस्से के लिए मशहूर हैं | विधानसभा  चुनाव के पहले  उनकी पार्टी तृणमूल के ढेर सारे नेताओं का भाजपा में चला जाना उनके गुस्से को  बढ़ाने  वाला रहा | लेकिन उनकी नाराजगी इस बात पर ज्यादा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल में भाजपा के प्रचार की बागडोर संभाल रखी है | हालाँकि राज्य से भाजपा के 18 लोकसभा सदस्य  हैं लेकिन वहाँ पार्टी के पास एक  दमदार नेता नहीं है जिसे ममता की टक्कर का कहा जा सके | इसीलिये उसने अपना मुख्यमंत्री  उम्मीदवार घोषित नहीं किया | बीते कुछ सालों से भाजपा ने मप्र सरकार  के पूर्व मंत्री कैलाश  विजयवर्गीय को बंगाल में तैनात कर रखा है जिन्होंने बड़ी ही कुशलता से भाजपा को  मुकाबले में ला खड़ा किया | ममता ने इसी मुद्दे पर अपने चुनाव अभियान को केन्द्रित रखते हुए बंगाल की बेटी का नारा गुंजा दिया | तीसरे दौर के मतदान के एक दिन पहले उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि बंगाल पर गुजरात के लोगों ( मोदी - शाह ) को राज नहीं  करने देंगे | चुनाव परिणाम तो  मतदाता तय करेंगे किन्तु प्रांतवाद की ये धारणा  राष्ट्रीय एकता के लिए नुकसानदेह है | 1956 में भाषावार प्रान्तों की रचना  कितनी घातक साबित हुई ये किसी से छिपा नहीं है | दशकों बीत जाने के बाद भी भावनात्मक मुद्दे आग भड़काते हैं | उस दृष्टि से ममता ने कई नया काम नहीं किया | महाराष्ट्र में तो इस तरह की बातें अक्सर सुनाई देती रही हैं | सवाल ये है कि क्या बंगाल सिर्फ बंगालियों का है ? इसी तरह क्या केवल मराठी भाषी महाराष्ट्र और तमिल बोलने वाले तमिलनाडु में रह सकते हैं ? सुश्री बैनर्जी की अपनी पार्टी के तमाम प्रवक्ता गैर बंगाली हैं | चुनाव जीतने के लिए जिन प्रशांत किशोर की सेवायें उनके द्वारा ली जा रही हैं वे भी बाहरी हैं | कुछ समय पहले तक तृणमूल के वरिष्ठ राज्यसभा सदस्य रहे दिनेश त्रिवेदी तो गुजराती मूल के ही हैं | बंगाल सहित पूरे पूर्वोत्तर में मारवाड़ी व्यवसायी पीढ़ियों से रह रहे हैं और इस अंचल के  औद्योगिक विकास में उनकी महती भूमिका रही है | बिरला परिवार का तो मुख्यालय ही एक तरह से कोलकाता हुआ करता था | जहां तक राजनीति की बात है तो देश आजाद होने के बाद बंगाली मूल की सुचेता कृपलानी देश के सबसे बड़े राज्य उप्र की मुख्यमंत्री रहीं वहीं अलाहाबाद से जुड़े कश्मीरी पंडित परिवार के डा. कैलाशनाथ काटजू मप्र के मुख्यमंत्री बनाये गये थे | राज्यसभा में तो दूसरे राज्यों के नेताओं का चुना जाना सामान्य बात है | दस साल तक देश के प्रधानमन्त्री रहे डा. मनमोहन सिंह असम से राज्यसभा में आते रहे हैं | कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद महाराष्ट्र से लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं | तमिलनाडु में अम्मा के नाम से मशहूर रहीं स्व. जयललिता स्वयं कर्नाटक की थीं जबकि अभिनेता से नेता बने रजनीकांत मूल रूप  से मराठी भाषी हैं | और भी अनेक उदहारण हैं जिनमें एक राज्य के किसी नेता  ने  अन्य राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान  बनाया हो | बंगाल में भले ही  गुजराती मूल के लोग कम रहते हों लेकिन उप्र और बिहार से लाखों लोग वहां रोजगार के लिए आये और वहीं के होकर रह गये | बाहरी  व्यक्ति को लेकर स्थानीय भावनाएं दरअसल रोजगार के  अवसर छिन जाने की आशंका से उग्र होती हैं | लेकिन जिस संदर्भ में सुश्री बैनर्जी ने बंगाल पर किसी  गुजराती द्वारा राज नहीं किये जाने की बात कही और उससे उनका मानसिक तनाव  ही व्यक्त हुआ है | कुछ दिन पहले ही उनकी पार्टी की एक सांसद ने चुनौती भरे अंदाज में कहा था कि दीदी अगला चुनाव बनारस से नरेंद्र मोदी के विरुद्ध लड़ेंगी | अपने राज्य में केवल बंगालियों का वर्चस्व चाहने वाली नेत्री के  किसी  और राज्य से लड़ने की बात किस मुंह से कही जा रही है ये बड़ा सवाल है |  समाजवादी आन्दोलन से जुड़े स्व. जॉर्ज फर्नांडीज और शरद यादव अपने मूल राज्य से निकलकर बिहार में जाकर स्थापित हो गये | ये भारतीय राजनीति के संघीय स्वरूप को व्यक्त करता है | बंगाल की दार्जिलिंग सीट से भाजपा के स्व.जसवंत सिंह और एस.एस  अहलुवालिया लोकसभा के लिए चुने जाते रहे जबकि दोनों दूसरे राज्यों के थे | स्व. इंदिरा गांधी ने कर्नाटक की चिकमंगलूर और अविभाजित आन्ध्र की मेडक लोकसभा  सीट से चुनाव जीता वहीं सोनिया गांधी कर्नाटक की वेल्लारी से सांसद रह चुकी हैं | उनके पुत्र राहुल गांधी  वर्तमान लोकसभा में केरल की  वायनाड सीट के सांसद हैं | 2014 में जब श्री मोदी उप्र की वाराणसी सीट से लड़ने गए तब तक उनका उस शहर या राज्य से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था | वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात की गांधी नगर सीट का लम्बे समय तक लोकसभा में प्रातिनिधित्व किया था | पूर्व विदेश मंत्री स्व. सुषमा स्वराज मप्र की विदिशा सीट से चुनी जाती रहीं जबकि वे थीं हरियाणा की | भारतीय राजनीति में ऐसी तमाम नजीरें भरी पडी हैं | 2018 में मप्र के मुख्यमंत्री बने कमलनाथ 1980 में इंदिरा जी के कृपा से  लोकसभा चुनाव लड़ने भेजे गये | उनका मप्र से  तब कोई जुडाव नहीं था | आज भी वे बाहरी ही कहे जाते हैं | 1971 में तत्कालीन  राष्ट्रपति स्व. वी.वी गिरि के साहेबजादे शंकर  गिरी कांग्रेस  टिकिट पर मप्र की दमोह सीट से लोकसभा पहुंचे  थे | ऐसे में बंगाल में किसी बाहरी का राज नहीं  होने देने जैसा बयान स्वस्थ मानसिकता का परिचायक नहीं कहा जा सकता | भविष्य में यदि श्री मोदी बंगाल आकर चुनाव लड़ें तब भी  क्या इसी तरह का बयान तृणमूल नेत्री देंगी ? भारत में लोकतंत्र के मजबूती के लिए भाषा और प्रान्त जैसी संकुचित भावनाएं त्यागनी होंगी | चुनाव आते - जाते रहेंगे लेकिन देश की एकता अक्षुण्ण रहनी चाहिए | बंगाल को अलग - थलग रखने की राजनीति ने वहां विकास प्रक्रिया को कितना पीछे धकेल दिया ये सर्वविदित है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 5 April 2021

हत्यारों का कोई मानवाधिकार नहीं होता



छत्तीसगढ़ के  सुकमा - बीजापुर क्षेत्र में बीते शनिवार की रात को नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बल के 22 लोग शहीद हो गए | नक्सलियों ने सुरक्षा बलों की टुकड़ियों को तीन तरफ से घेरकर जोरदार हमला किया जिसमें लगभग 2 दर्जन जानें चली गईं  | वैसे 25 से 30 नक्सलियों के भी मारे जाने की खबर है |  केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह  गत दिवस असम का चुनावी दौरा छोड़कर दिल्ली आये और उच्च स्तरीय बैठक में ये तय किया गया कि नक्सलियों को अब उनके अड्डों में घुसकर मारने का अभियान चलाया  जाएगा |  इस प्रकार की घटनाएँ छत्तीसगढ़ में पहले भी अनेक बार हो चुकी हैं | हर बड़ी वारदात के बाद इसी तरह की बड़ी - बड़ी बातें होती रहीं | एक बार फिर  राजनीतिक इच्छाशक्ति के प्रदर्शन के साथ ही बलि के बकरे तलाशने  का चिर - परिचित कर्मकांड होगा  परन्तु कुछ समय  बाद शहीदों का बलिदान राजनीतिक नफे - नुकसान के हिसाब में उलझकर भुला दिया जावेगा  | ताजा घटना के बारे में  स्पष्ट किया गया है कि सुरक्षा बलों की तरफ से दिए  गये माकूल जवाब के कारण नक्सलियों की भी बड़ी संख्या हताहत हुई | लेकिन उनकी मौत हमारे जवानों की शहादत का मुआवजा नहीं मानी जा सकती | छत्तीसगढ़  वह  राज्य है जिसकी सीमाएं मप्र , झारखण्ड , उड़ीसा , तेलंगाना और महाराष्ट्र से  मिलती हैं | और संयोगवश ये सभी  नक्सल प्रभावित हैं | नक्सल प्रभावित  समूचा इलाका भी वनाच्छादित है जिसमें अधिकतर आदिवासी आबादी है | नक्सलियों को यहाँ की परिस्थितियाँ पूरी तरह से अनुकूल लगती हैं | विकास का अभाव , शिक्षा की कमी और गरीबी के कारण आदिवासी समुदाय का जो शोषण होता रहा उसके आधार पर वे अपना नेटवर्क फ़ैलाने में कामयाब हो गये | यद्यपि  इनके पीछे विदेशी  हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता | नेपाल के पशुपतिनाथ से लेकर आंध्र के तिरुपति तक वे अपना फैलाव कर भी  चुके हैं | फिर भी   घरेलू समर्थन के बिना उनकी जड़ें इतनी गहरी कभी नहीं जम पातीं | ज़ाहिर है राजनीतिक समर्थन के कारण वे  अपने पाँव ज़माने में कामयाब हो सके | शहरों में छद्म  बुद्धिजीवी बनकर बैठे तमाम लोग इनके संरक्षक हैं जिनकी गिरेबान पर हाथ डालते ही मानवाधिकार हनन  का ढोल पीटा जाने लगता है | जिन राज्यों का ऊपर जिक्र किया गया उनमें अनेक नेताओं और राजनीतिक दलों का नक्सलियों से गठजोड़ खुली किताब है | छत्तीसगढ़ में  26 मई 2013 को जिस नक्सली हमले में कांग्रेस के तमाम बड़े नेता मारे गये थे उसके बारे में भी ये कहा जाता है कि वह राजनीतिक षड्यंत्र ही था | उस आरोप की सुई बार - बार वहाँ के एक पूर्व मुख्यमंत्री की तरफ घूमती रही जो हमले के कुछ देर पहले ही घटनास्थल से चले आये थे |  बिहार और झारखण्ड में भी ऐसी ही बातें सुनाई देती रही हैं | ये देखते हुए तो लगता है नक्सलियों  का वैचारिक पक्ष  केवल मुखौटा है और विदेशी मदद तथा घरेलू संरक्षण के कारण ये ऐसा माफिया गिरोह बन गया है जिसका मकसद आपराधिक गतिविधियों में  लिप्त रहने  के साथ ही देश को भीतर से कमजोर करना है | इसकी तुलना मुम्बई के उन माफिया गिरोहों से करना गलत न होगा जो राजनीतिक नेताओं की जेबें गर्म करते हुए  देशविरोधी गतिविधियों का संचालन करते रहे | गौरतलब है कि नक्सलियों का कार्यक्षेत्र मुख्यरूप से   उन्हीं इलाकों में हैं जहाँ खनिज भण्डार है | खदान व्यवसायियों से अवैध वसूली इनकी आय का स्रोत है जिसमें स्थानीय प्रशासन में बैठे कतिपय लोग भी लालच और भयवश सहयोग करते हैं | एक जमाने में चम्बल के बीहड़ों में सक्रिय  डकैत भी ऐसा ही करते थे | सवाल ये है कि ये समस्या को कैसे हल  होगी ? वैसे तो हर बड़ी हिंसक वारदात की निंदा राज्नीतिक बिरादरी द्वारा की जाती है किन्तु नक्सलवादियों के सफाये के लिए सुरक्षा बलों को वैसी छूट अब तक नहीं मिली जैसी कश्मीर घाटी में  सेना को दी गई है | समस्या ये भी है कि बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी  इनकी बंधक जैसी  है जिसे ये अपनी ढाल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं | विकास के कार्यों में रूकावट डालने की इनकी कोशिशों से साफ़ हो जाता है कि वे आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध नहीं अपितु उनको पिछड़ा बनाये रखने के समर्थक हैं | केंद्र सरकार ने गत दिवस जो संकेत दिए वे कितने दीर्घजीवी और कारगर होंगे ये कह पाना कठिन है क्योंकि पिछले अनुभव निराश करने वाले ही रहे | लेकिन  यदि सभी  राजनीतिक दल  किसी ठोस रणनीति पर एकमत हो सकें तो बड़ी बात नहीं जिस तरह कश्मीर घाटी और उत्तर पूर्व के अनेक राज्यों में आतंकवाद और उग्रवाद की जड़ें कमजोर की जा सकीं ठीक वैसे ही नक्सलवादियों की भी कमर तोडी जा सकती है | ये बात स्वीकार करनी ही होगी कि  हत्यारों का कोई  मानवाधिकार नहीं होता | जब सीधी उंगली से घी नहीं निकलता तब उनको  टेढा  करना ही पड़ता है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 3 April 2021

छोटी - छोटी सावधनियाँ भी कारागर हो सकती हैं बशर्ते



कोरोना की दूसरी लहर हमारी सामूहिक लापरवाही का परिणाम है | गत वर्ष जब उसका आगमन हुआ तब वह पूरी तरह से अप्रत्याशित था | लेकिन पुनरागमन के समय हमें उसके चाल - चलन की पूरी जानकारी है | इसलिए ये कहना गलत होगा कि इस हमले के लिए हम तैयार न थे | पूरी दुनिया में कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर का हल्ला मचने के बावजूद भारत में पूरी तरह बेफिक्री का आलम था | लोग मान बैठे थे कि किसी बुरे सपने  की तरह से ही कोरोना भी बीत चुका है , लेकिन वह खुशफहमी घातक  साबित हुई और गत वर्ष जो चरमोत्कर्ष छह महीने बाद आया था वह दूसरी लहर में महीने भर के भीतर आने को है | दिल्ली स्थित एम्स के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार कोरोना अप्रैल के मध्य से लेकर मई की  समाप्ति तक सर्वोच्च स्तर पर रहेगा और उसके बाद ही उसमें गिरावट के आसार हैं | इसकी पुष्टि करने के लिए नए संक्रमण के दैनिक आंकड़े पर्याप्त हैं | सरकारी जानकारी के अनुसार एक दो दिन के भीतर एक लाख से ज्यादा नए कोरोना संक्रमित सामने आने लगेंगे | बीते एक सप्ताह का औसत भी तकरीबन 61 हजार प्रतिदिन का रहा है | हालांकि  टीकाकरण का काम भी तेजी से चल रहा है परन्तु   शोचनीय मुद्दा  ये है कि जनता का एक वर्ग उसके प्रति उदासीन  है | इसके पीछे एक कारण तो अशिक्षा है लेकिन दूसरी और सबसे बड़ी वजह है पढ़े - लिखे लोगों के एक वर्ग में कोरोना को लेकर लापरवाह रवैया | ये कहना भी गलत  नहीं है कि इसी तबके के कारण संक्रमण जाते - जाते फिर लौट आया है | ताजा  आंकड़ों के मुताबिक 7 करोड़ लोगों को ही अब तक टीका लगाया जा सका है | ऐसे में जब तक 60  फीसदी जनता टीका नहीं लगवा लेती तब तक कोरोना से बचने के लिए मास्क और सैनीटाइजर के उपयोग के साथ ही हाथ धोते रहने और छह से सात फीट की शारीरिक दूरी  नितांत आवश्यक है | लेकिन विडंबना ये है कि अधिकतर लोग इन सावधानियों के प्रति हद दर्जे की लापरवाही दिखा रहे हैं | कहावत है कि दूध का जल हुआ छाछ भी फूंक  फूंककर पीता है लेकिन हमारे  देश में इसका मजाक बनाया जा रहा है | सबसे बड़ी बात ये है कि राजनीतिक जलसों पर किसी भी प्रकार की बंदिश नहीं है जिससे  सामुदायिक संक्रमण का खतरा बना हुआ है | पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के अभियान में कोरोना संबंधी निर्देशों   की जिस तरह से धज्जियां उड़ रही हैं उसकी वजह से आम जनता के मन में  भी उसको लेकर बेफिक्री बढ़ रही है | रैलियों  और  रोड शो में बिना मास्क लगाये  उमड़ने वाला जनसैलाब शारीरिक दूरी को भी  पूरी तरह से नजरअंदाज कर  देता है | विरोधाभास ये है कि भीड़ एकत्र करने वाले नेता ही आम जनता को कोरोना से लड़ने के लिए सावधानियाँ बरतने का उपदेश देते फिरते हैं | ये सब देखते हुए कोरोना के विरुद्ध जारी लड़ाई आगे पाट पीछे सपाट का उदाहरण पेश कर रही है | केवल ये मानकर निश्चिन्त हो जाना निरी मूर्खता है  कि वैक्सीन नामक रक्षा कवच  पूरी तरह बचा लेगा क्योंकि टीके की दोनों खुराक लगने के बाद भी संक्रमित होने के मामले आ रहे हैं | इस बारे में  प्रख्यात चिकित्सा विशेषज्ञ डा. नरेश त्रेहन का ये कहना आँखें खोल देना वाला है कि कोरोना कब तक रहेगा इसके बारे में कोई पुख्ता अनुमान नहीं लगाया जा सकता | उनका सुझाव है कि इस संक्रमण से बचाव हेतु छोटी - छोटी सावधानियां और सतर्कता कारगर हो सकते हैं , बशर्ते  उनका पालन ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ किया जावे  | बेहतर तो यही होगा कि हर नागरिक इस महामारी के फैलाव को रोकने के लिए अपने दायित्व को समझे | हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि कोरोना का संक्रमण  शारीरिक और आर्थिक दृष्टि से तो हमें  नुकसान पहुंचाता ही है लेकिन उसका दुष्प्रभाव हमारे परिवार के अलावा सम्पर्क में आने वाले किसी भी व्यक्ति पर पड़ सकता है | लॉक डाउन के पीछे भी उद्देश्य यही है कि किसी भी तरह से लोगों को एक दूसरे से दूर रखा  जा सके किन्तु इस उपाय को भी लम्बे समय तक आजमाया जाना अर्थव्यवस्था की सेहत को पूरी तरह  बर्बाद कर देगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 2 April 2021

एक साथ चुनाव से ही दूर होगी नीतिगत अनिश्चितता



नए वित्तीय वर्ष के पहले ही दिन केंद्र सरकार को फजीहत झेलनी पडी | सुबह खबर थी कि अल्पबचत योजनाओं पर ब्याज दर घटा दी गई है | कुछ देर में ही कदम पीछे खींचते   हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण  ने  ऐलान कर  दिया कि ब्याज दरें पूर्ववत रहेंगी और घटाने  वाला आदेश गलती से जारी हो गया था | मध्यमवर्ग ने इससे राहत तो महसूस की लेकिन उसके मन में केंद्र सरकार या वित्तमंत्री के प्रति किसी भी प्रकार के आभार का भाव नहीं आया |  आम धारणा यही बनी कि ये सब पांच राज्यों के चुनावों में मतदाताओं की नाराजगी से बचने के लिए किया गया | उल्लेखनीय है कल ही बंगाल और असम में दूसरे चरण का मतदान भी था | हालाँकि केंद्र सरकार इस बारे में पहले ही संकेत दे चुकी थी | इस बारे में ये बात याद रखनी होगी कि 1991 में डा. मनमोहन सिंह ने जिस उदारीकरण की नीति को लागू किया उसके बाद  लघु बचत पर  ब्याज दर में कटौती का सिलसिला शुरु हुआ | कहा जाता है विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित कर्ज देने वाले अन्य संस्थानों ने भारत सरकार पर दबाव डालते हुए लघु बचत योजनाओं में मिलने वाले ब्याज को घटाने कहा | उनका तर्क था कि इस वजह से मध्यम वर्ग अपनी बचत बैंकों में जमा रखता है जबकि ब्याज कम होने से यही पैसा पूंजी बाजार में आयेगा | हालाँकि सरकारें बदलती गईं लेकिन उदारीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था के ग्लैमर से  सभी आकर्षित रहे जिससे कारण छोटी बचत के  परम्परागत भारतीय  संस्कार और संस्कृति को बहुत चोट पहुंची  | जो भाजपा शुरुवात  में इन नीतियों का खुलकर विरोध करती रही वही सत्ता में आने के बाद उन्हें लागू करने में आगे - आगे होती नजर आई | सेवा निवृत्त बुजुर्गों को बैंक में जमा राशि पर मिलने वाला ब्याज  नीचे आते जाने से  उनका जीवनयापन कठिन हो गया | हालाँकि गृह निर्माण और  वाहन खरीदी जैसे ऋण भी सस्ते हुए लेकिन जिस व्यक्ति का गुजारा  जमा राशि पर मिलने वाले ब्याज से होता रहा  वह संकट में है | मोदी सरकार ने आर्थिक क्षेत्र में सुधारवादी अनेक अच्छे कदम उठाये जिनका दूरगामी लाभ देश को मिलेगा लेकिन ये बात पूरी तरह सही है कि वह मध्यमवर्गीय तबके को राहत देने में विफल रही है | इसमें नौकरपेशा के साथ लघु और मध्यम कारोबारी भी है | कोरोना काल में पुरानी बचत ने इस वर्ग के लिए प्राणवायु का काम किया लेकिन बीते एक साल में वह भी खल्लास हो गई | बेहतर होता सरकार इस दिशा में  और प्रोत्साहित करती किन्तु इसके ठीक उलट नया कारोबारी साल शुरू होते ही बचत पर ब्याज दरें घटाने जैसा तुगलकी फरमान जारी कर  दिया गया और फिर दिल्ली से दौलताबाद वाली उक्ति दोहराते हुए वापिसी का आदेश आया | भले ही जैसी वित्तमंत्री ने सफाई दी पहला आदेश गलती से जारी हो गया लेकिन उसे सुधारे जाने में दिखाई गयी तत्परता से सरकार को किसी भी  तरह की वाहवाही नहीं  मिली ,  उलटे वह जगहंसाई का पात्र बनी | इसी तरह बीते कुछ दिनों  से पेट्रोल - डीजल की कीमतों में रोजाना  कुछ पैसों की गिरावट को भी जनता चुनावी मजबूरी मान रही है | ये चर्चा आम है कि सभी पाँच राज्यों में मतदान खत्म होते ही दाम बढ़ने का सिलसिला दोबारा शुरू हो जाएगा | इससे अलग हटकर देखें तो सरकार के स्तर पर भी  नीतिगत निर्णयों को लेने में चुनाव बाधा बन  जाते हैं | इस समय केंद्र   सरकार का पूरा ध्यान  चुनाव वाले राज्यों पर हैं | असम , बंगाल , तमिलनाडु और केरल संबंधी तमाम घोषणाएं हाल के दिनों में की गईं | तमिलनाडु के लोकप्रिय फिल्मी सितारे रजनीकांत को दादा साहेब फाल्के पुरुस्कार दिए जाने की घोषणा इसका प्रमाण है | ये देखते हुए एक देश एक चुनाव की पुरानी व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की बहुत जरूरत है | हमारे देश में चुनावी मौसम कभी खत्म ही नहीं होता | 2 मई को पांच राज्यों के नतीजे आते ही उप्र , उत्तराखंड और पंजाब के विधानसभा चुनाव की हलचल शुरू हो जायेगी | ऐसे में  केंद्र और राज्य दोनों की सरकारों का पूरा ध्यान चुनाव जीतने पर लग जाता है | ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इस वजह से विपक्ष भी अपनी दिशा तय कर पाने में असमर्थ रहता है | बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी एक हैं वहीं केरल में आमने - सामने | बीच चुनाव में ममता द्वारा विपक्ष के नेतओं को पत्र लिखकर मदद मांगने से भी ये स्पष्ट हुआ कि देश में  एक साथ चुनाव नहीं होने से सरकार के स्तर पर नीतिगत ठहराव और अनिश्चितता बनी रहती है वहीं विपक्ष में भी  रणनीति को लेकर भटकाव की स्थिति साफ़ नजर आती है | प्रधानमन्त्री एक देश एक चुनाव के बारे में कई बार बोल चुके हैं लेकिन न जाने क्यों बाकी दल इसे लेकर बेहद उदासीन हैं | जबकि देखा जाए तो ऐसा होने पर वे अपने प्रभावक्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे | ये दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे देश में राष्ट्रहित के विषयों पर भी दलगत राजनीति होने लगती है | हम अपने लोकतंत्र की परिपक्वता का दावा तो बहुत करते हैं लेकिन राजनीतिक दलों और उसके नेताओं की सोच निहित स्वार्थ और क्षणिक  लाभ से आगे ही नहीं बढ़  पाती | सही बात तो ये है  विपक्ष नरेंद्र मोदी को हटाने के बारे में सतही तौर पर  भले ही एकजुट नजर आता है किन्तु उसके भीतर भी एकता का अभाव है | बंगाल को ही लें तो यदि ममता सत्ता से बाहर होती हैं तो उसका कारण भाजपा के आक्रामक  प्रचार अभियान के साथ ही कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन भी होगा जिसमें ममता समर्थक मुस्लिम मतों में सेंध  लगाने के लिए फुरफुरा शारीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी को भी  शामिल किया गया है | ऐसी विसंगतियां अन्य राज्यों में भी देखी जा सकती हैं | उप्र में सपा ने पहले कांग्रेस और फिर बसपा से गठबंधन किया और अब तीनों अलग हैं | शिवसेना खुलकर कहती आ रही है कि यूपीए की कमान सोनिया गांधी से लेकर शरद पवार को दी जाए | यदि देश में एक साथ चुनाव होने लगें  तो इससे राजनीतिक प्रदूषण तो कम होगा ही आर्थिक मोर्चे पर भी नीतिगत असमंजस  खत्म किया जा सकेगा जिसकी बानगी गत  दिवस दिखाई दी |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 1 April 2021

ममता की चिट्ठी में छिपे हैं भविष्य के संकेत



राजनीति में समय का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है |  इस दृष्टि से बंगाल  की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी द्वारा राज्य विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान के पहले देश भर के विपक्षी नेताओं को चिट्ठी भेजकर भाजपा के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष  की अपील किये जाने का सांकेतिक महत्त्व है | सुश्री बैनर्जी ने इस पत्र के जरिये ये जताने की कोशिश की है कि वे भाजपा के विरुद्ध समूचे विपक्ष को एकजुट करने के लिए सक्रिय होंगी | राजनीति के जानकार ये मान  रहे हैं कि चुनाव बाद के  परिदृश्य को अपने  अनुरूप  ढालने के लिए उन्होंने ये रणनीतिक कदम उठाया है | वरना जो कांग्रेस बंगाल में तृणमूल सरकार को हटाने के लिए वाम दलों और अब्बास सिद्दीकी के सेकुलर फ्रंट के साथ मिलकर मैदान में हैं उसकी सबसे बड़ी नेता सोनिया गांधी को भी उक्त पत्र भेजने का कोई औचित्य नहीं था | यद्यपि ममता ने शरद पवार , उद्धव ठाकरे , अरविन्द केजरीवाल , स्टालिन , जगनमोहन रेड्डी , केसी रेड्डी , तेजस्वी यादव , अखिलेश यादव , फारुख अब्दुल्ला , महबूबा मुफ्ती , नवीन पटनायक और हेमंत सोरेन को तो पत्र  लिखा लेकिन वामदलों में उन्होंने सीपीआई और सीपीएम की उपेक्षा करते  हुए भाकपा ( माले ) के नेता नेता दीपांकर भट्टाचार्य को पत्र भेजा जिससे ये स्पष्ट हो गया कि उनके मन में वाममोर्चे के शासन में हुए दुर्व्यवहार की कसक अभी भी  है | लेकिन जिस कांग्रेस को सीपीएम की बी टीम निरूपित करते हुए  छोड़कर उन्होंने तृणमूल बनाई उसकी कार्यकारी  अध्यक्ष श्रीमती गांधी उनकी सूची में पहले क्रमांक पर क्यों हैं  इसके पीछे की राजनीति भी अब बाहर  आ रही है | उल्लेखनीय है कि बंगाल में कांग्रेस ने वाम दलों के साथ चुनावी गठबंधन तो  किया है लेकिन गांधी परिवार का कोई भी सदस्य वहां प्रचार करने नहीं आ रहा | राहुल और प्रियंका दोनों असम में तो सक्रिय हैं किन्तु बंगाल से दूरी बनाये हुए हैं | इसके पीछे चुनाव बाद की व्यूह रचना है जिसमें त्रिशंकु विधानसभा उबरने की सूरत में भाजपा को रोकने के लिए ममता की ताजपोशी करवाना है | वाम दलों में दीपांकर भट्टाचार्य चूँकि मुख्य धारा के साम्यवादी आन्दोलन से नहीं जुड़े हैं इसलिए उनको खुश करने का प्रयास किया गया | दूसरी बात ये भी है कि खुदा न खास्ता अगर ममता की पार्टी सत्ता से बाहर हो जाती है और बाहरी समर्थन से भी सरकार बनाना नामुमकिन हो जाता है तब वे अपने लिए राष्ट्रीय राजनीति में जगह तलाशेंगी | इस चुनाव के बाद यूँ भी बंगाल में  लोकसभा और राज्य सभा के कुछ उपचुनाव होंगे जिनके जरिये वे दिल्ली की सियासत में दोबारा प्रवेश करने का सोच सकती हैं | ये बात बिलकुल सही है कि कांग्रेस के झंडे तले अब छोटे दल अपने को सुरक्षित नहीं समझते | सोनिया जी  अस्वस्थता  के कारण विपक्ष की एकता के लिए जरूरी मेहनत करने में असमर्थ हैं वहीं राहुल से अपनी पार्टी ही नहीं संभल रही | शरद पवार , शरद यादव , मुलायम सिंह , लालू यादव आदि सभी आयु और स्वास्थ्य के कारण राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बनने में अक्षम हैं वहीं उनके उत्तराधिकारी  कसौटी पर  खरे नहीं उतर सके | ऐसे में ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति के नेता की खाली  जगह को भरने की इच्छा रख रही हैं तो गलत नहीं है | बंगाल की मुख्यमंत्री रहने के बाद भी वे केंद्र सरकार से टकराने का कोई अवसर नहीं छोड़तीं | राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहिचान भी है | सबसे बड़ी बात उनकी आक्रामकता है जो विपक्षी नेता का सबसे बड़ा गुण है | विधानसभा चुनाव के दो दिन पहले विपक्ष के तमाम नेताओं को भाजपा के विरुद्ध एकजुट होने के लिए लिखित निवेदन भेजना उनकी चुनावी रणनीति के लिहाज से भी एक दांव हो सकता है जिसके जरिये वे  ये आगाह करना चाहती हैं कि भाजपा को हराने के लिए विपक्षी मतों का बंटवारा रोकना होगा | चूँकि बंगाल में तृणमूल ही भाजपा को रोकने में सक्षम है इसलिए विपक्षी मतों का ध्रुवीकरण नितान्त जरूरी है | उनके पत्र पर  विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और जवाब आने वाले दिनों में सामने आ जायेंगे किन्तु एक लड़ाई के बीच  अगली की तैयारी करने को साधारण कदम नहीं माना जा सकता | बंगाल का ये चुनाव काफी कशमकश भरा है जिसमें पहली बार भाजपा ने खुद को बतौर विकल्प पेश करने का जो दुस्साहस किया था वह इस हद तो सफल हो गया है कि  लगभग सभी विश्लेषक ये मान  रहे हैं कि तृणमूल और भाजपा के बीच ही टक्कर है तथा कांग्रेस , वामदलों और आईएसएफ़ का गठबंधन वोटकटवा की भूमिका में है | नंदीग्राम में शुबेन्दु अधिकारी को चुनौती देने उतरीं ममता का वहां लगातार पांच दिन तक डेरा डाले रहना ये तो दर्शाता ही है कि लड़ाई को वे खुद आसान नहीं मान रहीं | ऐसे में विपक्षी नेताओं को लिखित उनका पत्र बंगाल के मतदाताओं के भावनात्मक दोहन का भी प्रयास है | खास तौर पर उस वर्ग को वे अपने पाले में खींचना चाह रही हैं जो लोकसभा चुनाव में वामदलों से नाराज होकर भाजपा की तरफ झुक गया था   |  ममता का ये पत्र उनकी दूरगामी रणनीति  है लेकिन विपक्षी एकता की इस मुहिम से सीपीआई और सीपीएम को बाहर रखने से वह कितनी सफल होगी ये बड़ा सवाल है क्योंकि केरल से मिल रहे संकेतों के अनुसार वाममोर्चा वहां सत्ता में लौट रहा है और उसे सुश्री बैनर्जी का नेतृत्व कतई मंजूर नहीं होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी