Friday, 16 April 2021

सजा के अलावा इंसानियत के दुश्मनों का सामाजिक तिरस्कार भी होना चाहिये



ऐसे समय जब समूची मानवता पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं तब देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पैसे की हवस में डूबकर लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने में लेश मात्र भी संकोच नहीं कर रहे | कुछ दिन पहले ही जबलपुर के एक दवा विक्रेता के कुछ कर्मचारी रेमडेसिविर नामक इंजेक्शन की कालाबाजारी करते हुए पकड़ लिए गए | हालाँकि इस अपराध में दुकान के मालिक को इस सफाई के आधार पर छोड़ दिया गया कि नौकरों की करतूत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं  था | इसी तरह गत दिवस इंदौर का  एक चिकित्सक भी गिरफ्त में आया जो हिमाचल में नकली रेमडेसिविर बनाने का धंधा कर रहा था | आज ही जबलपुर में ही  दवा कम्पनी के एक  विक्रय प्रतिनिधि को उक्त इंजेक्शन निर्धारित से कई गुना ज्यादा दाम पर  बेचने के आरोप में पकड़े जाने का समाचार भी मिला  | नागपुर में भी गत दिवस एक चिकित्सक इसी तरह की गतिविधि में लिप्त पाए जाने पर पुलिस के  हत्थे चढ़ गया | इसके अलावा निजी क्षेत्र के अनेक  अस्पतालों से भी ऐसे ही  समाचार मिल रहे हैं | उनके द्वारा  कोरोना के मरीज को भर्ती करने से पहले ही भारी - भरकम राशि जमा करने का दबाव बनाया जाता है | जिन लोगों के पास नगदी रहित स्वास्थ्य बीमा है उन्हें  भी  अग्रिम भुगतान करने बाध्य किया जा रहा है | कुछ मामले तो ऐसे भी सुनने में आये जिनमें केंद्र सरकार के कर्मचारियों को मिलने वाली सीजीएचएस सुविधा  के पात्रों से भी नगद राशि वसूली गई | आक्सीजन की कालाबाजारी किये जाने  की जानकारी भी आ रही है | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि ऐसे समय जब इंसानियत का फर्ज निभाने के लिए हर किसी को आगे आना चाहिये तब कुछ लोग मजबूरी का लाभ उठाकर आपदा में अवसर तलाशने के आह्वान का उलटा मतलब निकालने में लगे हुए हैं | ऐसे लोग हालाँकि हर मौके पर अपनी निम्नस्तरीय सोच का परिचय देने से नहीं  चूकते लेकिन अचरज तब होता है जब समाज इनके इस व्यवहार के लिए इन्हें आसानी से क्षमा कर  देता है | सवाल ये है कि ऐसे लोगों के कुकृत्यों के प्रति उपेक्षा का भाव आखिर कब तक चलेगा | मानवता पर आया ये विश्वव्यापी संकट एक तरह से हमारे चरित्र की परीक्षा भी है | हद दर्जे की लापरवाही का जो प्रदर्शन हमारे दिग्गज नेताओं से लेकर आम जनता तक ने किया उसकी वजह से ही कोरोना की दूसरी लहर कहर बरपाने पर आमादा हैं | जिस संक्रमण को दम तोड़ता मान लिया गया था वह दोगुनी ताकत से आ धमका है | बीते एक साल के अनुभवों के आधार पर होना तो ये चाहिए था कि पूरा समाज एकजुट होकर जिम्मेदारी से इस विपदा का सामना करता किन्तु ऐसे समय जब चारों तरफ से मृत्यु की पदचाप सुनाई दे रही है तब भी कुछ लोग इंसानियत को  त्यागकर सिर्फ और सिर्फ पैसा बटोरने में लगे हुए हैं | ऐसे लोगों को कानून तो जो सजा देगा वह अपनी जगह होगी ही किन्तु समाज को भी ऐसे लोगों को ये एहसास करवाना चाहिए कि इंसानों के बीच रहना है तो इंसानियत का पालन भी करना पड़ेगा | दशकों पहले की सामाजिक व्यवस्था की याद करें तो किसी  व्यक्ति द्वारा इंसानी  मर्यादाएं तोड़कर किये गये कदाचरण के लिए समाज की ओर से जो जो दंड दिया जाता था उसमें सामाजिक बहिष्कार सबसे प्रमुख  था |   दुर्भाग्य से आज के दौर में चूँकि नैतिकता और आदर्श केवल किताबों और प्रवचनों तक सीमित रह गये हैं इसलिए सामाजिक संरचना का तानाबाना भी धन की चकाचौंध से प्रभावित होने लगा है | यही वजह है कि अनुचित और अपराधिक तरीकों से धन -संपदा अर्जित करने वालों को भी सम्मान मिल जाता है | कोरोना काल में ज्यादातर   निजी अस्पतालों द्वारा जिस तरह से मानवीयता को दरकिनार रखते हुए पैसा बटोरने का अभियान चलाया गया उसकी निंदा तो सभी करते हैं लेकिन उन अस्पतालों के मालिक बने बैठे गैर चिकित्सकीय लोग अपनी सम्पन्नता के बल पर शासन , प्रशासन  और समाज में अपनी वजनदारी बरकारार रखे हुए हैं | यही वजह है कि गलत काम करने वाले बजाय  तिरस्कृत किये जाने के पुरस्कृत हो रहे हैं | जिन लोगों के अपराधिक कार्यों का उल्लेख प्रारम्भ में किया गया उन्हें यदि समाज  का भय होता तब  गलत काम करने में उनके पाँव ठिठकते भी , लेकिन उनको ये विश्वास है कि भले ही अदालत उन्हें दो - चार साल के लिए जेल भेज दे किन्तु बाहर  आने के बाद समाज  उन्हें पूर्ववत स्वीकार कर ही लेगा | उस दृष्टि से विकृत मानसिकता वाले जो भी लोग आपदा के इस दौर में इंसानियत के साथ हैवानियत से पेश आ रहे हैं समाज को उनका तिरस्कार करना चाहिए | वरना मानवीयता के दुश्मनों का हौसला और बुलंद होता जायेगा | 
- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 15 April 2021

चिकित्सा क्रांति सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता


 
आग लगने पर कुआ खोदने वाली कहावत तो सभी ने सुनी होगी  लेकिन कुआ होने के बाद घर में रखी बाल्टी और उसमें बांधी जाने वाली रस्सी समय पर न मिले तो उसका लाभ ही क्या ? कोरोना के पहले हमले के समय देश भर में वेंटीलेटर की किल्लत महसूस किये जाने के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने बड़े पैमाने पर उनकी खरीद की | विदेशों  से आयात भी आसानी से संभव नहीं था | ऐसे में भारत में  उनका उत्पादन  प्राथमिकता के आधार पर शुरू  हुआ  और ये दावा भी सुनाई देने लगा कि  इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल हो गई  है | कुछ समय बाद कोरोना के  ढलान पर आते ही  वेंटीलेटर की मारामारी खत्म सी हो गई | लेकिन बीते दो सप्ताह में ही  लाखों मरीजों को वेंटीलेटर की आवश्यकता हुई तो पता चला कि पिछले साल आई मुसीबत से थोड़ी  सी राहत क्या मिली गाड़ी फिर पुराने ढर्रे पर लौट गयी | उल्लेखनीय है गत वर्ष देश में लागभग 4 लाख  वेंटीलेटर बनाये गये जबकि पहले ये संख्या 4 हजार से भी  कम थी | केंद्र सरकार ने भी 50 हजार वेंटीलेटर  का ऑर्डर दिया | लेकिन जो जानकारी निकलकर आई है उसके अनुसार उत्पादन होने के बाद भी  बहुत  बड़ी संख्या में वे अभी कम्पनी के पास ही पड़े हैं | उससे भी बड़ी बात ये हुई कि पंजाब सहित अनेक राज्यों को मिले वेंटीलेटर अभी तक डिब्बों में ही   बंद हैं | इसके पीछे एक कारण उनको संचालित करने वाले प्रशिक्षित कर्मियों की  कमी है | सवाल ये है कि जब ये बात प्रामाणिक तौर  पर  सबको पता थी कि कोरोना खत्म नहीं हुआ है और हमें इसके  साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए तब वेंटीलेटर की पर्याप्त संख्या के साथ ही उनको संचालित करने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित क्यों नहीं किया गया ?  सरकारी अस्पतालों में गत वर्ष आपूर्ति किये गये वेंटीलेटरों की पैकिंग तक नहीं खोला जाना अपराधिक  उदासीनता नहीं तो और क्या है ? ये माना कि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में इस तरह की महामारी से निपटने के लिए पर्याप्त आपदा प्रबंधन नहीं था लेकिन गत वर्ष मिले अनुभवों से सबक लेकर जरुरी व्यवस्थाएं करने की बजाय निश्चिंतता की चादर ओढकर सो जाने  की परम्परा का जो निर्वहन किया गया वह बेहद  महंगा पड़ा  | सवाल केवल वेंटीलेटर का नहीं है | कोरोना मरीजों के इलाज में लगने वाली आक्सीजन की कमी गत वर्ष भी देखने मिली थी किन्तु बीते एक वर्ष में न तो सरकारी और न ही निजी क्षेत्र के चिकित्सा प्रबंधन ने इस बारे में कोई कार्ययोजना बनाई जिससे  आपातकालीन व्यवस्था हो सके | इससे बड़ी पीड़ादायक बात क्या हो सकती है कि किसी मरीज के परिजन को कहा जाए कि वह आक्सीजन का इन्तजाम खुद करे | कल को ये भी सुनने मिल सकता है कि अपना वेंटीलेटर भी लेकर आओ | कोरोना के पहले हमले के समय प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा आपदा में अवसर तलाशने और आत्मनिर्भर भारत का जो मन्त्र दिया था उस दिशा में  बिलकुल काम नहीं हुआ ये कहना तो गलत होगा लेकिन  जैसे ही कोरोना का प्रकोप कम होने लगा हमारा समूचा तन्त्र और उसे संचालित करने वाले लापरवाह हो गये | सरकारी के साथ ही निजी क्षेत्र भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है | बीते एक साल में निजी अस्पतालों  को जो छप्पर फाड़ कमाई हुई है यदि उसका उपयोग वे अपनी क्षमता और सुविधाओं में वृद्धि के लिए करते तब स्थिति बेहतर होती | ये बात भी देखने लायक है कि गत वर्ष जहां निजी क्षेत्र के गिने - चुने अस्पाताल ही कोरोना मरीजों का इलाज कर रहे थे वहीं इस वर्ष अधिकतर में कोरोना मरीजों को धड़ल्ले से भर्ती किया जा रहा है | मरीजों की  मजबूरी ये है कि उनके सामने विकल्प ही नहीं होता जिसकी वजह से वे सुविधाहीन अस्पतालों में भर्ती होकर दुर्दशा झेलने बाध्य हैं | कहने का आशय ये कि बीते एक साल में कोरोना से लड़ने के मामले में टीके का घरेलू उत्पादन जहां हमारी बड़ी कामयाबी रही परन्तु  दूसरी तरफ इतनी बड़ी  आबादी के इलाज के लिए समुचित व्यवस्था और संसाधन जुटाने में हम विफल रहे | प्रबन्धन का मूल सिद्धांत है गलतियों से सीखना लेकिन इस मन्त्र की उपेक्षा करना हमारा स्वभाव बन गया है | और तो और गलतियों को दोहराने में हम जरा  भी  हिचकते या शर्माते नहीं हैं | 1962 के चीनी हमले के बाद से भारत ने सीमा पर सुरक्षा के लिए जरूरी ढांचा खड़ा करने की तरफ ध्यान दिया | उसके अच्छे परिणाम भी आये | कोरोना संकट के मद्देनजर   देश में चिकित्सा क्रांति की महती आवशयकता महसूस की जाने लगी है | यदि आपदा में अवसर तलाशने के प्रति हम वाकई  ईमानदार है तो फिर बिना देर लगाये इस दिशा में काम शुरू करना होगा | परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने दावा किया है कि तीन - चार साल में भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग यूरोप की टक्कर के बन जायेंगे | ऐसी ही योजना चिकित्सा को लेकर भी बननी चाहिए | भारत में चिकित्सा पर्यटन काफी तेजी से विकसित होने  लगा था | अपेक्षाकृत  सस्ता और अच्छा इलाज यहाँ होने से विदेशी काफी बड़ी संख्या में आने लगे थे किन्तु कोरोना के बाद इस बात का खुलासा हो गया कि हम अपनी आबादी तक को समुचित चिकित्सा नहीं दे पा रहे | कोरोना ने ये सिखा दिया है कि हमारी आर्थिक और  सामरिक मजबूती तब तक किसी काम की नहीं है जब तक हम एक स्वस्थ देश के रूप में नहीं खड़े हो जाते |

 

Wednesday, 14 April 2021

सरकार कितना भी छिपाए किन्तु अस्पताल और श्मशान सच उगल देते हैं



कोरोना के कहर ने मौतों का आंकड़ा भी बढ़ा दिया है | गत वर्ष की तुलना में चूँकि संक्रमण अधिक घातक है इसलिए मरीज को  संभलने का समय नहीं मिलता | जाँच रिपोर्ट आने में होने वाले विलम्ब से भी असमंजस की स्थिति बनी रहती है जिसकी वजह से देश भर में हजारों कोरोना संक्रमितों को इलाज ही नहीं मिल पाया और वे मौत के गाल में समा गये |  गाँव , कस्बों या छोटे जिलों को छोड़ भी दें लेकिन मुम्बई - दिल्ली जैसे  महानगरों तक में चिकित्सा प्रबंधन पूरी तरह गड़बड़ा गया है | ये कहना गलत नहीं होगा कि कोरोना के दूसरे हमले की भयावहता का पूर्वानुमान लगाने में सरकार और सम्बन्धित लोग चूक गये | जैसे ही टीका बाजार में आया तैसे ही ये मानकर चला जाने लगा कि कोरोना पर विजय हासिल कर ली गई लेकिन इस दौरान इस तथ्य की अनदेखी की गई कि संक्रामक बीमारी का विषाणु सदैव गुरिल्ला शैली में हमला करते हुए बड़ी से बड़ी  फौज को भी चकमा दे जाता है | लेकिन इस सबसे अलग देश भर में इस बात की चर्चा है कि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की संक्रमण और मौतों की संख्या को छिपा रही है |  ऐसा क्यों किया जाता है इसके बारे में तरह - तरह की चर्चाएँ हैं | अव्वल तो कहा जा सकता है कि  शासन और प्रशासन अपनी नाकामी छुपाने की गरज से ऐसा करते हैं और दूसरी वजह ये कि मौत के बढ़ते आंकड़े से जनता भयभीत होकर कहीं  आपा न खो बैठे | नेता और नौकरशाहों की  सोच वैसे भी कुछ अलग हटकर बन जाती है जिसके वशीभूत वे अपनी सफलता को तो बढ़ा - चढ़ाकर प्रचारित करते हैं लेकिन जब बात विफल होने की  होती है तब तरह - तरह के प्रपंच रचकर सच्चाई पर पर्दा डालने का दुष्चक्र रचा जाता है | कोरोना के पहले भी ऐसा होता रहा है | लेकिन इस बीमारी के बारे में कुछ भी छिपाना इसके विरुद्ध हो रही लड़ाई को कमजोर करने का कारण बन रहा है | मसलन पिछली लहर की समाप्ति का दावा  जिस जोरशोर से किया गया उसने आम जनता के मन में निश्चिंतता का भाव भर दिया | यदि उस समय से ही खतरे की घंटी बजाई जाती तो हो सकता है मौजूदा स्थिति जन्म ही न लेती | सूचना क्रांति के इस दौर में किसी तथ्य अथवा  जानकारी का छिपाना संभव नहीं  रह गया है | और फिर ध्यान देने योग्य बात ये भी है कि  सरकार द्वारा सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश किये जाने से सोशल मीडिया सहित अन्य माध्यमों पर प्रसारित होने वाली अनधिकृत और अतिरेक से भरी  खबरों पर विश्वास करने आम जनता बाध्य हो जाती है | बेहतर  हो आंकड़ों की ये बाजीगरी बंद कर वास्तविकता से जनसाधारण को अवगत कराया जावे | रही बात संक्रमण  और मौतों की बढ़ती जा रही संख्या से भय का माहौल बनने की तो नेता - नौकरशाह गठजोड़ को ये  जान लेना चाहिए कि कोरोना संबंधी कोई  भी जानकारी छिपाने या उसमें कांट - छाँट किये जाने से ज्यादा नुकसान हो रहा है | सरकार की विश्वसनीयता इसी में है कि वह पारदर्शिता को पूरी तरह अपनाये | और फिर कोरोना के मामले और मौतें छिपाने से किसी भी  तरह का लाभ होता हो , ऐसा भी नहीं है | तत्संबंधी किसी भी जानकारी को जस का तस सार्वजनिक करने से आम जनता के मन में भी खतरे को गम्भीरता से लेने का भाव पैदा होगा | सरकार और स्थानीय प्रशासन सहित सरकारी अस्पतालों का अमला इस विषम परिस्थिति में जो कर रहा है उसके लिए उनकी तारीफ़ की जानी चाहिए क्योंकि उनके भी अपने परिवार हैं | अनेक स्वास्थ्यकर्मी यहाँ तक कि अनुभवी चिकित्सक तक इस दौरान संक्रमित होकर चल बसे | ये देखते हुए जरूरी है कि नए संक्रमण के साथ  ही कोरोना से होने वाली मौतों की वास्तविक जानकारी दी जावे | आंकड़ों में  हेराफेरी करने के बाद भी शासन और प्रशासन हालात को छिपाने में नाकामयाब साबित हुए | उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि अस्पतालों में बिस्तरों की कमी के अलावा  श्मशान भूमि और कब्रिस्तान से आ रहे आंकड़ों से सच्चाई सामने आ ही रही है तो फिर उस पर पर्दा डालने का औचित्य ही क्या ? 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 13 April 2021

अब भी नहीं माने तो अगली बारी कर्फ्यू की है



कोरोना का दूसरा चरण कितना खतरनाक है ये किसी को बताने की  जरूरत नहीं है | संक्रमण  के राष्ट्रीय आंकड़ों के साथ ही अब तो स्थानीय स्तर पर सामने आ रही संख्या भी  भयग्रस्त करने के लिये पर्याप्त है | रात्रिकालीन कर्फ्यू के बाद अब  देश के अनेक शहरों में तो लॉक डाउन  लग  चुका है और जैसे  हालात हैं उनको देखते हुए बड़ी बात नहीं गत वर्ष की तरह से ही लम्बी देशबंदी करनी पड़ जावे | देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई  सहित अनेक बड़े शहरों से प्रवासी श्रमिकों  के लौटने का सिलसिला शुरू हो चुका है | हालाँकि केंद्र  और राज्यों की सरकारें उद्योग - व्यवसाय को बंद करने से बच रही हैं लेकिन  संक्रमण पर लगाम नहीं लग सकी तो बड़ी बात नहीं आगामी कुछ महीने तक  पूरे देश में लॉक डाउन लगाना पड़े | किसी व्यक्ति द्वारा  सोशल मीडिया पर प्रसारित ये टिप्पणी काफी अर्थपूर्ण है कि अभी तो अस्पतालों में बिस्तर कम पड़े हैं लेकिन यही हाल रहा तो श्मसान और कब्रिस्तान में भी जगह कम पड़ जायेगी | बात है भी सही क्योंकि जान है तो जहान है से शुरू होकर बात जब जान भी और जहान भी तक आ पहुंची  तब लॉक डाउन को धीरे धीरे इस विश्वास के साथ शिथिल किया गया था कि कोरोना से बचाव के प्रति आम जनता में काफी जागरूकता आ गई है | लेकिन ये कहना कहीं से भी गलत नहीं है कि ज्योंही लॉक डाउन हटा त्योंही ऐसा लगने लगा मानो कुछ हुआ ही नहीं था | सरकार के साथ जिम्मेदार तबके ने हमेशा ये अपील की कि मास्क और शारीरिक दूरी जैसी सावधानियां लम्बे समय तक हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बनकर रहेंगी | संक्रमण के पूरी तरह से खत्म नहीं होने की बात भी किसी से छिपी नहीं थी | लेकिन ज़माने भर के प्रचार और समझाइश के बाद भी आम जनता ने अव्वल दर्जे की लापरवाही दिखाई जिसके कारण  कोरोना को दोबारा  पैर  पसारने की जगह और छूट मिल गई | गत वर्ष तो इस समय तक वह सामान्य गति से बढ़ रहा था और चरमोत्कर्ष तक पहुंचने में उसे छह महीने लग गये थे किन्तु इस वर्ष  छह सपताह भी नहीं हुए और देश भर में डेढ़ लाख से भी ज्यादा संक्रमित रोज निकलने की स्थिति आ गयी , जो बड़ी चिंता का कारण है | हालाँकि कुछ चिकित्सा विशेषज्ञ मान रहे हैं कि जितनी तेजी से संक्रमण फैला उससे ये भी लगता है कि वह जल्दी  ही ढलान पर भी आ सकता है किन्तु इसके लिए भी मई के अंतिम सप्ताह तक प्रतीक्षा करने कहा जा रहा है | और वर्तमान स्थिति को देखते हुए तब तक प्रतिदिन ढाई लाख से भी ज्यादा नए मरीज निकलने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता | ऐसे में ये अनिवार्य हो गया है कि कोरोना अनुशासन का कड़ाई से पालन किया जावे | जिन - जिन स्थानों पर लॉक डाउन लगाया गया है वहां दैनिक उपयोग की चीजें खरीदने के लिए दिए जाने वाले समय में जिस तरह की अफरातफरी देखने मिल रही है उसे देखकर ये लगता है कि लोग अपनी जान के प्रति पूरी तरह से निष्फिक्र  हैं | वास्तविकता ये है  कि चिकित्सा प्रबंध पूरी तरह से पंगु हो चले हैं और अस्पतालों में पैर रखने की जगह तक नहीं है | अचानक आई इस विपदा के कारण ऑक्सीजन और जीवनरक्षक इंजेक्शन की आपूर्ति भी फ़िलहाल गड़बड़ा गई है | ऐसी स्थिति में जनता को ये सोचना चाहिए कि जो भी पाबंदियां लगाई  जा रही हैं उनका उद्देश्य उसी की प्राण रक्षा करना है | लॉक  डाउन के दौरान दी जाने वाली छूट का उपयोग अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए ही करें तभी  वह सार्थक है | दंगे फसाद के समय लगाए जाने वाले कर्फ्यू के दौरान जब इस तरह की ढील दी जाती है तब भी बाजारों में हुजूम उमड़ता है लेकिन कोरोना काल में भीड़ का हिस्सा  बनना संक्रमण को अपने घर आने का न्यौता देना है | जैसे समाचार आ रहे हैं वे चिंता पैदा करने वाले हैं | ये कहना गलत न होगा कि यदि जनता ने लॉक डाउन के दौरान मिलने वाली  छूट को स्वछंदता का लायसेंस समझ लिया तब फिर  बात उससे आगे बढ़कर कर्फ्यू तक जा पहुंचेगी और वह स्थिति ज्यादा असुविधाजनक होगी | इस समय अनुशासन सबसे  जरूरी चीज है | हर व्यक्ति को अपनी और अपनों की  जान बचाने के लिए जिम्मेदार बनना पड़ेगा | एक संक्रमित व्यक्ति अपने पूरे परिवार को ही नहीं बल्कि  सम्पर्क में आने वाले न जाने कितने लोगों की जान खतरे में डाल सकता है | जिन लोगों ने टीका लगवा लिया  वे निःसंदेह दायित्वबोध के प्रति सजग है लेकिन उनसे भी अपेक्षा है कि वे निडर दिखने  का दुस्साहस न करें | आने वाले कुछ सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण हैं जिनमें हमारा आचरण और अनुशासन ही हमारी रक्षा करेगा | कोरोना की दूसरी लहर अभी कितनी ऊंची और जायेगी ये तो बड़े से बड़े वैज्ञानिक और ज्योतिषी तक नहीं बता पा रहे | लेकिन सावधान रहकर उसके प्रकोप से बचा जा सकता है ये सर्वविदित है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 12 April 2021

जो हमारे हाथ में है उतना तो कम से कम करें



गत वर्ष जब इन्हीं  दिनों कोरोना अपने शुरुवाती दौर में था तब देश में जांच की समुचित व्यवस्था नहीं होने से मरीजों के आंकड़े भी धीमी गति से बढ़ रहे थे | धीरे - धीरे निजी क्षेत्र को भी जांच का जिम्मा सौंप दिया गया | इसी तरह इलाज हेतु भी अस्पताल गिने चुने होने से परेशानी हुई | लेकिन समय बीतने के साथ ही निजी अस्पतालों में भी कोरोना का इलाज शुरू हो गया | और फिर ऐसा लगने लगा कि उस  पर हमने काबू पा लिया है | नए संक्रमण घटते - घटते दहाई के भीतर सिमटने लगे | देश में बने टीके के कारण आम जनता का आत्मविश्वास भी बढ़ा | लेकिन उसके अति आत्मविश्वास में बदल जाने से लौटती  हुई मुसीबत के कदम वापिस घूम पड़े और जब तक हम कुछ समझ और संभल पाते उसने हमें चारों तरफ से घेर लिया | एक तरफ तो टीकाकरण चल रहा है दूसरी  तरफ संक्रमण दोगुनी और चौगुनी ताकत से हमला करने पर आमादा है | ज़ाहिर है इसकी आशंका तो थी लेकिन जिस तरह कोरोना के पहले चरण का  भारत ने सामना किया उसे देखते हुए सभी को ये भरोसा था कि उसके पलटवार को आसानी से झेल लिया जावेगा किन्तु ये आशावाद खोखला साबित हो गया | बीते कुछ दिनों से ऐसा लगने लगा है कि स्थिति नियन्त्रण से बाहर होने जा रही है | चिकित्सा को लेकर किये जा रहे तमाम इंतजाम दम तोड़ने लगे हैं | जीवन रक्षक इंजेक्शन और ऑक्सीजन की कमी ने  लोगों में घबराहट पैदा कर दी है | ये आरोप भी खुले आम लग रहे हैं कि शासन - प्रशासन नए संक्रमण के साथ ही मरीजों और मौतों की संख्या छिपा रहे हैं  | अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ने से लाखों लोगों को मजबूरन घरों में रहकर इलाज करने बाध्य किया जा रहा है |  जब तक किसी को वेंटीलेटर और आक्सीजन की जरूरत न हो तब तक तो घर पर इलाज संभव भी है किन्तु उनकी आवश्यकता होते ही अस्पताल में भर्ती होना अनिवार्य बन जाता है | ये दुखद है कि सैकड़ों मरीज अस्पताल के बाहर ही जान गँवा बैठे क्योंकि वहां बिस्तर उपलब्ध नहीं थे | ऑक्सीजन के अलावा गंभीर मरीजों को लगने वाले इंजेक्शन की आपूर्ति भी गड़बड़ा गई है | कुल मिलाकर स्थिति चिंताजनक है और कोई भी दावे के साथ ये बता पाने में असमर्थ है कि हालत सामान्य होने में कितना समय लगेगा | ये बात तो अच्छी है कि बीमारी के समानांतर टीकाकरण भी चल रहा है और लोगों में उसके प्रति व्याप्त प्रारंभिक हिचक भी खत्म हो गई है | लेकिन इस सबसे अलग  बात है  हमारी अपनी सोच | क्योंकि कोरोना का जो नया  रूप आया है उसके फैलने के पीछे हमारी अपनी लापरवाही बड़ी वजह  है | ये कहना कहीं से भी  गलत न होगा कि संक्रमण की  पहली लहर की वापिसी का एहसास होते ही जिस तरह की लापरवाही देखने मिली उसका ये परिणाम होना ही  था | बीते कुछ दिनों से जो आंकड़े आ रहे हैं उनकी वजह से भय का माहौल तो है लेकिन अब भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो स्थिति की  गम्भीरता को समझने से दूर भाग रहे हैं | चिकित्सा विज्ञान भी  कोरोना के इस नए रूप को  लेकर भ्रमित है | संक्रमण की तीव्रता मरीज और चिकित्सक दोनों को सम्भलने का अवसर नहीं देती | जो टीका लगाया जा रहा है वह भी कोविड - 19 पर तो कारगर था किन्तु उसके नए रूप पर उसका कितना असर होगा इस पर विमर्श हो रहा है | लेकिन एक बात जो वैश्विक स्तर पर स्वीकार कर ली गयी है वह है बचाव के परम्परागत तरीकों की सफलता | पूरी दुनिया के चिकित्सा विशेषज्ञ एक स्वर से कह रहे हैं कि मास्क और सैनीटाईजर का उपयोग , शारीरिक दूरी , भीड़भाड़ में जाने से परहेज और हाथ धोते रहने जैसे उपाय कोरोना और उस जैसे अन्य संक्रमणों से 90 फीसदी बचाव करने में सक्षम है | लेकिन देश में कहीं भी चले जाएँ बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके लिए उक्त सभी उपाय फालतू की चीजें हैं | कोरोना का दूसरा हमला यदि शुरुवात में ही तेज हो गया तो उसके पीछे ऐसे ही लोग हैं जिनको न अपनी चिंता है और न  अपने परिवार की | मौजूदा हालातों में सरकार और चिकित्सा जगत जो कर रहे हैं उनमें ढेर सारी खामियां हैं जिनकी आलोचना करने बैठें तो समय कम पड़ जाएगा | लेकिन ऐसे समय में जनता का अनुशासित होना सबसे ज्यादा  जरूरी  है | जिन देशों के लोगों  ने कोरोना से जुड़े अनुशासन का पालन किया वहां हालात काबू में बने रहे | दूसरी ओर अनेक विकसित देशों में लोगों को अपने यहाँ की चिकित्सा सुविधा पर बड़ा घमंड था | इसलिए वे  बेहद लापरवाह रहे जिसकी वजह से वहां मौत का तांडव हुआ | उल्लेखनीय है उनमें से अनेक  देशों की आबादी भारत के कुछ प्रदेशों से भी कम है | उस दृष्टि से हमारे लिए ये समय बहुत ही  नाजुक है | संक्रमण की तीव्रता पहले से ज्यादा बताई जा रही है , उसका सटीक इलाज भी विचाराधीन है , वर्तमान में लग रहे टीके की प्रभावशीलता पर भी वैज्ञानिक  बहस जारी है | ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि हर व्यक्ति इस विषम परिस्थिति में  बजाय भयभीत होने या व्यवस्था को कोसते रहने के अपनी प्राण रक्षा के लिए जो वह खुद कर  सकता है , उतना तो करे ही | याद रहे किसी की मौत सरकार के लिए महज आँकड़ा है | यदि आप उस आँकड़े में शामिल नहीं होना चाहते तो सामान्य तौर पर सुझाए गए उपायों को अपनाएँ | लॉक डाउन लगे या न लगे लेकिन ये मानकर चलना चाहिए कि कोरोना नामक मुसीबत से छुटकारा पाने में अभी समय लगेगा और तब तक छोटी से भी लापरवाही बड़े नुकसान का कारण बन सकती है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 10 April 2021

दलबदलू से वसूला जाए उपचुनाव का खर्च



भारत में दलबदल कब शुरू हुआ ये शोध का विषय है | लेकिन सत्तर के दशक में यह खुलकर सामने आने लगा | विधायकों के पाला बदलने से अनेक राज्य सरकारें गिरीं | हरियाणा में आयाराम - गयाराम जैसे वाकये हुए जिनमें  सुबह पार्टी छोड़ने  और शाम को वापिस लौट आने जैसी नौटंकियाँ देखने मिलीं | भजनलाल नामक मुख्यमंत्री ने तो पूरी सरकार सहित दलबदल कर डाला | 1985 में संसद ने दलबदल विरोधी कानून पारित किया  जिसके अंतर्गत पार्टी बदलने पर विधायक और सांसद की सदस्यता समाप्त हो जाती है | सदन में पार्टी व्हिप का उल्लंघन भी अयोग्यता का आधार बन गया | लेकिन एक तिहाई विधायक या सांसद यदि सामूहिक रूप से दलबदल करते हैं तो उसे पार्टी में विभाजन मानकर सदस्यता बरकरार रखे जाने का प्रावधान भी उक्त्त कानून में रखा गया | हालाँकि इसके बावजूद भी नये तरीके निकाले जाते रहे | वैसे  दलबदल  सैद्धांतिक अथवा नीतिगत मतभिन्नता के कारण हो तो उसका औचित्य समझा जा सकता है |  अनेक ऐसे उदहारण हैं जहाँ सांसदों और विधायकों ने अपनी पार्टी से मतभेदों के चलते सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया | कुछ को सदन के  अध्यक्ष द्वारा  अयोग्य भी ठहराया गया | थोक में दिए त्यागपत्र स्वीकार करने के  मामलों में अध्यक्ष द्वारा सत्तारूढ़ दल के लाभ  के मद्देनजर  फैसला करने या निर्णय को लंबित रखे  रहने के भी तमाम मामले हैं | बीते कुछ सालों से  छोटे - छोटे  राज्यों में दलबदल का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है | सभी पार्टियां एक - दूसरे पर आरोप लगाया करती हैं किन्तु सबका आचरण  कमोबेश है एक जैसा  | जैसे - जैसे राजनीति में धन का जोर बढ़ा  वैसे - वैसे दलबदल भी पांच सितारा संस्कृति से प्रभावित होने लगा | जो पार्टी दलबदल करवाती है वह विधायकों को सम्बन्धित राज्य की बजाय ऐसे  किसी राज्य में ले जाती है जहां या तो उसकी अपनी सत्ता हो या फिर अनुकूल सरकार | दल बदलने वालों को किसी सितारा होटल या रिसार्ट रूपी ऐशगाह में ठहराया जाता है | दूसरी तरफ  सत्ता और विपक्ष में बैठी पार्टी अपने विधायकों को पाला बदलने से रोकने के लिए भी ये तरीका अपनाती  हैं | पहले - पहले ये अटपटा लगता था किन्तु बीते  कुछ वर्षों से राजनीतिक पर्यटन या रिसार्ट राजनीति की बयार काफी तेजी से बहने लगी है | गत दिवस इसका नया रूप सामने आया जब खबर मिली कि कांग्रेस ने असम में अपने गठबंधन भागीदार  एआईयूडीएफ की टिकिट पर विधानसभा चुनाव लड़े डेढ़ दर्जन उम्मीदवारों को जयपुर भेजने का निर्णय किया  | इसके पीछे ये डर है कि चुनाव जीतकर वे दूसरे खेमे में जा सकते हैं   | इसके बाद ये जानकारी भी मिल रही है कि सम्भवतः कांग्रेस  अपने उम्मीदवारों को भी राजस्थान भेजने वाली है ताकि जीतने के बाद वे  धोखा न दे सकें  | रणनीति के लिहाज से ये स्वाभाविक ही है | लेकिन ये इस बात को भी तो प्रमाणित करता है कि राजनीतिक दलों का अपने उम्मीदवारों  पर किस हद तक अविश्वास  है | चुनाव जीतने के बाद विधायकों को एक जगह बटोरकर रखना तो फिर भी समझ में आता है लेकिन  नतीजे का इंतजार किये बिना ही उन्हें इस तरह कैद में रखने की कोशिश  लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त है | हो सकता है आने वाले समय में सभी पार्टियां इस तरीके को अपनाने लगें | बीते कुछ समय से चुने हुए विधायकों को सामूहिक त्यागपत्र दिलवाकर उपचुनाव करवाने की तरकीब काम में लाई जा रही है | इसकी वजह से सरकार पर अतिरिक्त आर्थिक  बोझ पड़ने के साथ ही  राजनीतिक अस्थिरता और  प्रशासनिक निष्क्रियता भी देखने मिलती है | मप्र की दमोह  विधानसभा सीट के उपचुनाव के लिए आगामी सप्ताह मतदान होना है | 2018 में जीता कांग्रेस विधायक भाजपा में आ गया और अब भाजपा की टिकिट पर दोबारा जनादेश मांग रहा है |  ऐसे मामलों में ये व्यवस्था की जानी चाहिए कि चुना हुआ जनप्रतिनिधि  कार्यकाल  पूरा करने के पहले दलबदल करे या सदस्यता छोड़े तो उपचुनाव पर होने वाले सरकारी खर्च की भरपाई या तो वह करे या फिर उसे अपनी टिकिट पर उपचुनाव लड़वाने वाली पार्टी | दो जगह से चुनाव जीतने के बाद एक सीट खाली करने वाले से भी उपचुनाव का  खर्च वसूलने का नियम समय की मांग है | वैसे तो लोकतंत्र  स्वस्थ परम्पराओं और नैतिकता की बुनियाद पर टिका होता है लेकिन जब उनकी धज्जियां उड़ाई जाने लगें तब कानून नामक शिकंजा कसना जरूरी हो जाता है | असम से आई खबर को सामान्य मानकर हवा में उड़ा देना ठीक नहीं होगा | यदि राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों की निष्ठा और वफादारी पर इस हद तक अविश्वास है तो उन्हें टिकिट देने की समूची प्रक्रिया ही दोषपूर्ण कही जायेगी | मूल्यों की राजनीति करने वाले तो न जाने कब के  चले गए | लेकिन उनके उत्तराधिकारी जिस बेहयाई से अपना  मूल्य लगाने लगे  हैं उसे देखकर उनकी आत्मा भी रोती होगी | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 9 April 2021

जब मध्यस्थ पहुंच सकते हैं तो सुरक्षा बल क्यों नहीं



सीआरपीएफ (केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल) के कोबरा कमांडों राकेश्वर सिंह के नक्सली कब्जे से सुरक्षित लौटने से सभी ने राहत की साँस ली | पिछले दिनों बस्तर के बीजापुर में हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बल के 22 जवान मारे गये थे | उसी दौरान घायल अवस्था में  राकेश्वर नक्सलियों के कब्जे में आ गये | उन्हें छुड़ाने के प्रयास शुरू हुए तो नक्सलियों ने कुछ मध्यस्थों के जरिये बात करने कहा | इस पर  एक गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ पत्रकारों की कोशिशों के बाद कमांडो  रिहा कर दिया गया | लेकिन जैसी  जानकारी मिली है उसके बदले  नक्सलियों से जुड़े होने के कारण गिरफ्तार किये गये  एक ग्रामीण को वापिस करना पड़ा | चूँकि  सीआरपीएफ का एक कमांडो सुरक्षित आ गया इसलिए इसे फायदे का सौदा कहना गलत न होगा | लेकिन एक बार फिर ये साबित हो गया  कि नक्सलियों की  एक समानांतर सरकार चलती है | उनके प्रभावक्षेत्र में  रहने वाले ग्रामीण आदिवासी ही नहीं अपितु व्यापारी , सरकारी  कर्मचारी - अधिकारी सहित राजनीतिक लोग भी उन्हीं की दयादृष्टि पर निर्भर रहते हैं | संदर्भित मामले  में जैसे ही राकेश्वर के बंधक होने  की जानकारी आई त्योंही उक्त  गांधीवादी कार्यकर्ता को उनसे संपर्क  करने कहा गया |  बाद में कुछ स्थानीय पत्रकार जोड़े गए जिनके जरिये कमांडों और एक ग्रामीण का आदान - प्रदान हो सका | जान बची तो लाखों पाये की तर्ज पर राकेश्वर की रिहाई राहत देने वाली है परन्तु इस  दौरान एक बात देखने में आई कि नक्सली भले ही घने जंगलों में छिपे रहते हों लेकिन समाज के कुछ लोगों का उनसे सम्पर्क रहता है | उनके असर वाले ग्रामीण और वनों में रहने वाले आदिवासी भी उनके साथ मेल  जोल रखते हैं | भले ही वे नक्सली विचारधारा से अवगत या सहमत न हों लेकिन चाहे - अनचाहे उन्हें उनसे तालमेल बनाकर चलना होता है | इसी तरह उन पर सुरक्षा बलों का भी दबाव पड़ता है | यही स्थिति एक जमाने में मप्र के चम्बल इलाके की थी जहाँ डाकू समस्या के कारण  ग्रमीण जनता को डकैत और पुलिस नामक दो पाटों के बीच पिसना पड़ता था | सवाल ये है कि जब  नक्सलियों तक कुछ सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार पहुंच सकते हैं तब सुरक्षा बल उनका पता लगाकर कार्रवाई करने में सफल क्यों नहीं हो पाते ? एक जमाने में कर्नाटक और तमिलनाडु में आतंक का पर्याय बने चन्दन तस्कर और हाथियों के हत्यारे वीरप्पन भी कई दशकों तक समस्या   बने रहे | उनको पकड़ने हेतु  करोड़ों खर्च किये गए | तमाम पुलिस अधिकारी उसकी नृशंसता के शिकार हुए | अनेक नेताओं और अभिनेताओं का उसने अपहरण कर फिरौती वसूली | सुरक्षा बल उसे पकड़ने में सफल नहीं हो पाते थे लेकिन तमिलनाडु के एक पत्रकार ने वीरप्पन के ठिकाने पर पहुंचकर उनका वीडियो साक्षात्कार लिया जो काफी चर्चित हुआ | उस समय भी ये सवाल उठा था कि एक पत्रकार जब उस दुर्दांत अपराधी के पास पहुँचने में सफल हो गया तो फिर सुरक्षा बल  क्यों नाकामयाब रहे ? ऐसे लोगों पर  ये दबाव क्यों नहीं   बनाया जाता कि वे उनका पता ठिकाना शासन - प्रशासन को दें | राकेश्वर की रिहाई को लेकर आई जानकारी के अनुसार उसे लौटाने के फैसले का उपस्थित ग्रामीण जन विरोध कर रहे थे | इसका अर्थ ये हुआ कि नक्सलियों के असर वाले इलाकों में आम जनता का पुलिस और प्रशासन के बजाय नक्सलियों से ज्यादा जीवंत सम्पर्क है | दरअसल  ये अदिवासी ही नक्सलियों के सूचना तंत्र का आधार भी  हैं और उनकी  ढाल भी  | यदि इन्हें  उनसे दूर  किया जा सके  तो इस आतंक को  खत्म करना आसान हो जायेगा किन्तु  ले - देकर फिर वही सवाल उठ खड़ा होता है कि नक्सली जिन गैर शासकीय लोगों को मध्यस्थ मनाकर  सरकार से सौदेबाजी करते हैं वे उनकी पतासाजी करने में सुरक्षा बलों की मदद क्यों नहीं करते ? कहा जा सकता  है कि ऐसा करने पर उनकी जान को खतरा होगा क्योंकि मुखबिरी करने वालों को नक्सली बड़ी ही बेदर्दी से मौत के घाट उतारते हैं | लेकिन किसी अपराधी व्यक्ति अथवा संगठन से सम्पर्क होने के बावजूद शासन - प्रशासन को  उसके बारे में सूचना नहीं देना भी तो अपराध की श्रेणी में आता है | ये मुद्दा वीरप्पन का वीडियो बनाने वाले पत्रकार को लेकर भी उठा था | बस्तर में नक्सलियों से सीधे सम्पर्क रखने वाले लोगों की  जानकारी समय - समय पर आती रही है किन्तु उनकी मदद लेकर नक्सली ठिकानों पर दबिश क्यों नहीं दी जाती ये रहस्यमय है | छत्तीसगढ़ की राजनीति पर  नक्सली  प्रभाव सर्वविदित है | चुनाव के दौरान अनेक प्रत्याशी उनका समर्थन हासिल करने में भी  संकोच नहीं करते | ये देखते हुए जिन मध्यस्थों ने यह कार्य करवाया उनसे तो पूछा जाना चाहिए कि नक्सलियों तक पहुँचने का तरीका क्या है ? यदि अंत भला तो सब भला की तर्ज पर खुशी मनाई जाती रही  तो  जवानों की शहादत का ये सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा | नक्सलियों की कमर तोड़ने के लिए निर्णायक अभियान जरूरी  है क्योंकि  घर के भीतर बैठा दुश्मन ज्यादा खतरनाक होता है |  

- रवीन्द्र वाजपेयी