Monday, 16 August 2021

अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत भारत के लिए खतरे की शुरुवात



अफगानिस्तान अंततः २० साल बाद फिर से तालिबान के कब्जे में चला गया जो इस्लाम को कट्टरता के साथ लागू करने में यकीन रखते हैं | हालांकि ये मुल्क पहले भी उसके कब्जे में रहा है और उस दौर की यातनाएं अफगानी  जनता भूली नहीं है | इसीलिये गत दिवस जैसे ही तालिबान काबुल पर काबिज हुए और राष्ट्रपति – उपराष्ट्रपति ने देश छोड़ा त्योंही हजारों की संख्या में लोग अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर जमा होकर  देश से बाहर जाने का प्रयास करने लगे  | हालांकि  तालिबान ने ये आश्वासन दिया था  कि किसी को डरने की जरूरत नहीं है | उनके प्रवक्ता ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का भरोसा भी दिलाया लेकिन बीती रात काबुल हवाई अड्डे पर बिना बुर्के पहने कुछ महिलाओं को गोली मारे जाने की खबर से ये आशंका मजबूत हो चली है कि तालिबान का रवैया लेशमात्र भी नहीं बदला | राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का  देश छोड़ना  तो समझ में आता है लेकिन आम नागरिक और तमाम बुद्धिजीवी भी वहां से पलायन करने मजबूर हो गये हैं | दिल्ली की जेएनयू में पढ़ रहे अफगानी छात्र भी  वापिस लौटने से डर रहे हैं जबकि उनके वीजा खत्म होने को हैं | ये सब खबरें इस बात की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं कि तालिबान की धार्मिकता आतंक की बुनियाद पर टिकी हुई है | हालांकि अमेरिका को ही इसके जन्म के लिए जिम्मेदार माना  जाता है | अतीत में अफगानिस्तान पर तत्कालीन सोवियत संघ का आधिपत्य भी रहा | दरअसल अस्सी के दशक में वहां नजीबुल्लाह के नेतृत्व में साम्यवादी रुझान वाली  सरकार के विरुद्ध इस्लामी मुजाहिदीन ने संघर्ष छेड़ दिया था  | जब ऐसा लगा कि वे नजीबुल्लाह हुकुमत को हरा देंगे तब १९७९ में सोवियत सेनाएं अफगानिस्तान में घुस आईं और गृहयुद्ध की स्थिति बन गई | जवाब में अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद से मुजाहिदीनों को सैन्य प्रशिक्षण तथा हथियार और धन उपलब्ध करवाया  | १० साल चले गृहयुद्ध में लाखों लोगों की मौत हुई | आखिर में १९८९ में सोवियत सेनाएं भी लौट गईं | उसके  बाद १९९२ में मुजाहिदीनों के बढ़ते दबाव के बाद नजीबुल्ल्लाह काबुल स्थित सोवियत दूतावास में शरण लेकर बैठ गये लेकिन उन्हें वहां  से निकालकर मार  डाला गया | और इस तरह अफगानिस्तान में तालिबान हुकूमत का दौर शुरू हुआ | उसने अफगानिस्तान को कट्टर इस्लामी देश बनाने का अभियान चलाते हुए वही सब किया जो शाह पहलवी की सत्ता के पतन के बाद खोमैनी ने ईरान में किया | तालिबान का शासन २००१ तक जारी रहा | लेकिन इस दौरान वैश्विक स्तर पर पनपे इस्लामिक आतंकवाद ने अमेरिका को चुनौती दे डाली | ११ सितम्बर २००१ को न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो गगन चुम्बी इमारतों को हवाई हमले में ध्वस्त करने का कारनामा अल कायदा नामक  संगठन द्वारा किये जाने के बाद अमेरिका अफगानिस्तान से नाराज हो गया क्योंकि इस संगठन का तालिबान से याराना था और अमेरिका को पता चल चुका था कि अल कायदा का मुखिया ओसामा बिना लादेन अफगानिस्तान में ही छिपा हुआ है | उसके बाद अमरीकी फौजों ने अफगानिस्तान पर हमला करते हुए तालिबान को हुकुमत छोड़ने  के लिए बाध्य कर दिया | उसके बाद से ही  ये  देश एक बार फिर गृहयुद्ध की चपेट में फंस गया | यद्यपि काबुल में अमेरिका समर्थित सरकारें बैठी रहीं और प्रजातंत्र भी  लौटा | उसके बाद वहां विकास का दौर शुरू हुआ जिसमें भारत ने   महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हुए दर्जनों प्रकल्पों को सफलतापूर्वक पूरा किया | ओसामा को तो अमेरिका ने  अफगान सीमा से सटे पाकिस्तानी क्षेत्र में मार गिराया लेकिन  तालिबान के साथ उसका संघर्ष जारी  रहा |  हालाँकि ये रहस्य आज तक अनसुलझा है कि अमेरिका से २० साल तक लड़कर उसे मैदान छोड़ देने के लिए बाध्य करने में सफल हुए तालिबान को धन , प्रशिक्षण और अस्त्र – शस्त्र कौन देता रहा ? सतही तौर पर तो पाकिस्तान पर शक की सुई घूमती है लेकिन  कई मामलों में तालिबान के साथ उसके भी विवाद हैं | पश्तो भाषा बोलने वाले अनेक सीमावर्ती कबीलाई पाकिस्तानी क्षेत्रों पर तालिबान अघोषित तौर पर कब्जा किये हुए हैं | और फिर पाकिस्तान की अपनी माली हालत भी इतनी अच्छी नहीं है  कि वह तालिबान का खर्च उठा सके | ऐसे में चीन को लेकर ये सोचा जा सकता है कि उसने  तालिबान को सहायता और संरक्षण दिया | बहरहाल काबुल में तालिबान फिर आ बैठे हैं | उनका भारत विरोधी रुख बहुत ही साफ़ है | काबुल पर कब्जा करने के पूर्व ही उनकी तरफ से भारत को सैन्य हस्तक्षेप करने पर अंजाम भुगतने जैसी चेतावनी दिया जाना उनके मन में भरे ज़हर का परिचायक है | वहां कार्यरत भारतीय नगरिकों तो निकाल लिया गया है लेकिन अफगानिस्तान में अनेक हिन्दू और सिख परिवार पीढ़ियों से रह रहे हैं | उनकी सुरक्षा भी भारत  की चिन्ताओं में है | बीते दशक में वहां  किया गया अरबों रूपये का भारतीय निवेश तालिबानी सत्ता के आने के बाद कितना सुरक्षित रह सकेगा ये कह पाना कठिन है | हालाँकि सत्ता हस्तान्तरण के लिए बनी समिति में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई का प्रमुख बनना भारत के लिए राहत की बात है  लेकिन तालिबान का अतीत और  चरित्र धोखाधड़ी और वहशीपन भरा रहा  है और उस आधार पर ये कहना गलत न होगा कि भारत के लिए एक नया शत्रु खड़ा हो गया है जिसे चीन और पाकिस्तान का खुला समर्थन है | चीन ने तो तालिबान  का समर्थन करने की पूर्व में ही घोषणा कर रखी है | दरअसल अमेरिका के अफगानिस्तान  छोड़ने का सबसे फायदा चीन ही उठाने में सक्षम है क्योंकि रूस सहित सोवियत संघ के पुराने घटकों को तालिबान अपने लिए खतरा प्रतीत होते हैं | अभी तालिबान सरकार को मान्यता देने के बारे में  विश्व बिरादरी असमंजस में है | अमेरिका और उसके समर्थक शायद ही उससे  कूटनीतिक रिश्ते रखें | वहीं इस्लामिक मुल्कों का फैसला भी अभी तक नहीं आया है | हालांकि कतर के दोहा शहर में चली वार्ता में तालिबान के नेताओं ने महिलाओं साहित सभी नागरिकों के सम्मान और मानवाधिकारों की रक्षा करने का वचन दिया है लेकिन वह उस पर कितना कायम रहेगा ये कहना मुश्किल है | भारत के लिए  इस बदलाव से गम्भीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं | सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या अफगनिस्तान  बीते २० बरस में  हुए विकास को आगे बढ़ाने की बुद्धिमत्ता दिखाकर अपनी छवि सुधारेगा या फिर वहां शरीया के नाम पर फिर वही खूनी  खेल शुरू हो जाएगा जिसके भय से अफगानी नागरिक वतन छोड़कर भागने  बाध्य हैं | आने वाले कुछ दिनों तक इसीलिये पूरी दुनिया की निगाहें काबुल पर लगी रहेंगी |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 14 August 2021

अपनी बनाई जंजीरों से मुक्त हुए बिना आज़ादी अधूरी रहेगी



स्वाधीनता का ७५ वां वर्ष कल से प्रारंभ हो जाएगा | इस हेतु सरकारी स्तर पर काफी पहले से तैयारियां की जा रही हैं | १५ अगस्त को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनकल्याण की कुछ योजनाओं के साथ ही कोरोना काल के बाद देश के समक्ष  उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के बारे में भी नीतिगत घोषणाएं कर सकते हैं | जैसा कि होता आया है ,  मौजूदा हालातों में विश्व रंगमंच पर  भारत की भूमिका के बारे में भी वे अपनी सरकार का दृष्टिकोण देश और दुनिया के सामने रखेंगे | घरेलू मोर्चे पर जो समस्याएँ हैं उनके समाधान के बारे में भी जनता उनसे सुनना चाहेगी |  आगामी वर्ष  भारत के लिए भावनात्मक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है |  ७४ साल पहले प्राप्त आजादी  के बाद  सामाजिक और आर्थिक तौर पर हुए  परिवर्तनों की समीक्षा के साथ ही भविष्य की कार्ययोजना बनाना भी आगामी वर्ष की विषय सूची में होगा | बीते ७४ वर्ष से हमारा देश संसदीय प्रजातंत्र  से संचालित है | आज का विश्व कमोबेश इस व्यवस्था को अपना चुका है जिसमें हर नागरिक को अपना मत व्यक्त करने की आजादी हासिल है | वयस्क मताधिकार के जरिये करोड़ों मतदाता ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक में अपने प्रतिनिधि भेजते हैं | इस बात का ध्यान हमारे संविधान निर्माताओं ने रखा था कि समाज के उस तबके को भी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जावे जो सदियों से उपेक्षित और शोषित रहा और उसे किसी भी प्रकार से अधिकार संपन्न नहीं होने  दिया गया | इसका लाभ ये हुआ कि वंचित और शोषित वर्ग का आत्मविश्वास बढ़ा और उसमें आत्मसम्मान के साथ जीने की इच्छा  जागी | सर्वविदित है कि जातिवाद के नाम पर ऊंच - नीच का भेद भारतीय समाज को टुकड़ों – टुकड़ों में बांटने का कारण बना जिसका लाभ पहले मुगलों और बाद में अंग्रेजों ने उठाते हुए सैकड़ों साल तक हमें गुलाम बनाकर रखा | महात्मा गांधी ने सामाजिक समरसता का अनुष्ठान प्रारम्भ करते हुए  छुआछूत रूपी कलंक को धोने का  जो ऐतिहासिक प्रयास किया वह बहुत  बड़ा सामाजिक परिवर्तन था | आजादी  के बाद प्रख्यात समाजवादी चिंतक  डा. राममनोहर लोहिया ने तो जाति तोड़ो जैसा  नारा तक दिया | इस सबके पीछे  सोच यही थी कि स्वाधीन भारत  एक ऐसा समाज होगा जिसमें जातिगत आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं रहेगा और विकास के अवसरों पर कुछ लोगों का एकाधिकार नहीं रहेगा | एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था की  इस कल्पना को मूर्तरूप देने के लिए संविधान में ही अनेक प्रावधान कर दिये गए थे | कालान्तर में समयानुकूल उनका और विस्तार भी किया गया | आरक्षण नामक इस व्यवस्था का उद्देश्य बहुत ही पवित्र और दूरदर्शितापूर्ण था | सदियों से प्रताड़ना सहते आये वर्ग को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास भारत की तकदीर और तस्वीर बदलने में सक्षम था | इसके प्रणेताओं को उम्मीद रही होगी कि आजादी के बाद एक – दो दशक के भीतर ऐसे  नए समाज की रचना की जा सकेगी जो जाति की बेड़ियों को तोड़कर मानवीयता पर आधारित होगा और जिसमें किसी एकलव्य का अंगूठा नहीं काटा जावेगा |  लेकिन आजादी के ७५ वें वर्ष में प्रविष्ट होते हुए ये सवाल हर जिम्मेदार नागरिक को झकझोर रहा है कि क्या हम वह समाज बना पाए ? और उसका उत्तर खोजने पर नजर आता है कि जाति नामक जिस जाल से देश को निकालने का लक्ष्य रखा गया था वह और भी घना होता जा रहा है और उससे निकलने के  जितने भी जतन आज तक हुए वे या तो आधे रास्ते ही दम तोड़ बैठे या फिर लक्ष्य से भटक गये | अछूतोद्धार और जाति तोड़ो का नारा लगाने वालों के अनुयायियों ने जातियों के दायरे को और बढ़ा दिया | जातियों के भीतर उपजातियां , पिछड़ों के बीच अति पिछड़े और दलितों में महादलित तलाशकर सामाजिक एकता को मजबूत करने की बजाय  छिन्न – भिन्न करने का जो महापाप हुआ  उसकी वजह से आरक्षण नामक उपाय भी  सियासत के मकड़जाल में फंसकर सामाजिक वैमनस्य और ईर्ष्या का कारण बनने लगा  | अनु. जाति और जनजाति से शुरू हुई बात कहाँ तक आ पहुँची और आगे कहाँ जाकर रुकेगी ये कोई नहीं  बता पा रहा | विदेशी सत्ता से तो हमने आजादी हासिल कर ली  किन्तु हम अपनी ही बनाई जंजीरों की पकड़ से आजाद  नहीं हो पाए ,  जो किसी विडंबना से कम नहीं है | आज देश उस दौर में आ खड़ा हुआ है जब पूरी दुनिया उसकी तरफ उम्मीदों के साथ देख रही है | महर्षि अरविन्द और स्वामी विवेकानंद ने आजादी के काफी पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि २१ वीं सदी भारत की होगी और वह एक बार फिर दुनिया को दिशा दिखायेगा | बीते ७४ सालों में देश  ने हर क्षेत्र में अपने कदम आगे बढ़ाये हैं | ज्ञान – विज्ञान का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें हमारी उपस्थिति न हो | सपेरे और मदारी अब हमारी पहिचान नहीं रहे | धरती के गर्भ से अन्तरिक्ष की अनन्त ऊंचाइयों तक भारत की प्रशस्ति गुंजायमान है | आर्थिक और सामरिक दृष्टि से हमें विश्व के विकसित देशों के समकक्ष माना जाता है | देश की युवा प्रतिभायें पृथ्वी  के प्रत्येक हिस्से में अपनी सम्मानजनक मौजदूगी से प्रभावित कर रही हैं | भारत के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास के प्रतीकस्वरूप विदेशी मुद्रा का भण्डार निरंतर बढ़ता ही जा रहा है | केन्द्र में राजनीतिक स्थायित्व से भी अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत को महत्व मिलने लगा है | लेकिन जातियों में विभाजित होते जा रहे देश के भविष्य को लेकर जो चिंताएं मन – मष्तिष्क में उठ रही हैं वे डराने वाली हैं | आजादी की ७५ वीं जयंती का जश्न कल से शुरू होने जा रहा है किन्तु सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न ये है कि क्या भारतीय समाज जातीय संघर्ष में फंसकर उसी तरह विभाजित तो नहीं  होने जा रहा जिसकी वजह से अतीत में  विदेशी शक्त्तियाँ यहाँ आने का दुस्साहस कर सकीं | आज भी  देश शत्रुओं से घिरा हुआ है जो हमारी किसी भी कमजोरी का लाभ उठाने में नहीं चूकेंगे | जातियों के नाम पर  पैदा हुए नेता कबीलों के सरदारों की तरह आचरण करते दिख रहे हैं और राजनीति उन्हें सिर पर बिठाने पर आमादा है क्योंकि वे वोट बैंक के ठेकेदार जो  हैं | दुर्भाग्य से बीते सात दशक में चुनाव जीतने के लिए किये जाने हथकंडों ने बहुत नुकसान किया जिसकी वजह से भ्रष्टाचार जड़ों तक जा पहुंचा है | ये अवसर उन विसंगतियों को दूर करने के लिए कार्ययोजना बनाने का है जिनके कारण हमें आज भी आजादी अधूरी प्रतीत होती है | आइये , हम सब मिलकर उस भारत के निर्माण का संकल्प लें जो सामाजिक एकता और सद्भाव के साथ आगे बढ़ते हुए विश्व का मार्गदर्शन कर सके | जरूरत है अपनी उन अंतर्निहित शक्तियों और गुणों के पुनर्जागरण की जिनको भुला देने के कारण हमें गुलामी का जहर पीना पड़ा था |

स्वाधीनता दिवस की अग्रिम शुभकामनाएँ |

 रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 13 August 2021

कमंडल के बाद अब मंडल पर भी भाजपा की नजर



 अनु. जाति और जनजाति के लोगों को आरक्षण देने का प्रावधान संविधान निर्माताओं द्वारा ही कर लिया गया था |  लेकिन 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की  सरकार ने  दायरा बढ़ाकर उसमें अन्य पिछड़ी जातियों को भी शामिल करते हुए उनके लिए 27 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित कर दिया | दरअसल 1977 में बनी जनता पार्टी सरकार ने जो मंडल आयोग बनाया था उसने अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की सिफारिश की थी | लेकिन वह सरकार ज्यादा चली नहीं और   सिफारिश ठन्डे बस्ते में चली गई | 1990 में बनी जनता दल सरकार में भी मंडल समर्थक नेताओं का दबदबा था | उनको ये एहसास भी था कि वह सरकार  ज्यादा चलने वाली नहीं थी | लिहाजा उन्होंने समय गंवाए बिना अन्य पिछड़ी जातियों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था करवा दी | उस सरकार को भाजपा बाहर से समर्थन  दे रही थी | उसे मंडल आयोग की सिफ़रिशों के लागू होने का राजनीतिक परिणाम समझ में आ गया था | इसीलिये उसने भी राममंदिर आन्दोलन तेज करते हुए सोमनाथ से अयोध्या तक  लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा निकालने का दांव चल दिया | बिहार के समस्तीपुर में लालू यादव की सरकार ने ज्योंही  उनको गिरफ्तार किया त्योंही  पूर्व घोषणानुसार भाजपा ने विश्वनाथ सिंह सरकार से समर्थन वापिस ले लिया | उसके बाद का दौर भारी राजनीतिक उथल - पुथल का रहा |  सरकारें बनती – बिगड़ती रहीं , चुनाव दर चुनाव भी हुए | लेकिन उस सबके बीच भाजपा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आकर कांग्रेस का विकल्प बन बैठी और  सवर्ण जातियों को उसमें अपना भविष्य दिखने लगा | लेकिन केंद्र की पूर्ण सत्ता  उसे तब ही हासिल हो सकी जब उ.प्र और बिहार ही नहीं , दूसरे राज्यों में भी अन्य पिछड़ी जातियों के अलावा अनु.जाति और जनजाति वर्ग में  उसे जबरदस्त समर्थन मिला | इसका सबसे बड़ा प्रमाण उ.प्र है जहाँ पिछले दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सपा और बसपा का सफाया कर दिया | आदिवासी बहुल म.प्र , झारखंड , उड़ीसा , महाराष्ट्र आदि में भी उसे जो कामयाबी मिली उसका कारण वही जातिगत सामाजिक समीकरण रहे जिनके बल पर मंडल  समर्थक राजनीतिक दलों को उभरने का अवसर मिला था  | भाजपा का प्रभावक्षेत्र बढ़ने के पीछे उसकी हिंदूवादी छवि मानी जाती रही है | वहीं उसकी  मातृसंस्था रास्वसंघ के विरोधी उसे  ब्राह्मणवादी बताते रहे | 2015 के  बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान संघ प्रमुख डा. मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा किये जाने जैसा बयान दे दिया जिसे लालू प्रसाद यादव ने लपककर ये प्रचार किया कि संघ और भाजपा आरक्षण विरोधी हैं | हालाँकि 2020 के चुनाव में नीतिश कुमार के साथ मिलकर लड़ी भाजपा ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर अपना प्रभाव साबित कर दिया | लेकिन उ.प्र की योगी सरकार के शासन में कुछ ब्राह्मण अपराधी सरगनाओं के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद उस सरकार को ब्राह्मण विरोधी प्रचारित किया जाने लगा | आगामी वर्ष फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्दे नजर बसपा और सपा ने तो बाकायदे ब्राह्मण सम्मलेन आयोजित करते हुए भाजपा के सबसे प्रतिबद्ध मतदाताओं में सेंध लगाने की चाल चली | इस खतरे को भांपते हुए भाजपा ने संसद के मॉनसून सत्र में अन्य पिछड़ी जाति संशोधन विधेयक पारित करवा लिया | जिसके आधार पर अब राज्य सरकारों को अन्य पिछड़ी जातियों की सूची में और जातियों को जोड़ने का अधिकार होगा | इस संशोधन का कांग्रेस  सहित बाकी विपक्ष ने भी बिना शर्त समर्थन  किया जबकि सत्र के शेष समय हंगामा किया जाता रहा | इस निर्णय के उपरान्त  रास्वसंघ के सरकार्यवाह दत्तात्रय होसबोले का ये बयान आ गया  कि जब तक आरक्षण आवश्यक है तब तक उसे जारी रखा जाना चाहिये |  उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि बिना दलितों के देश का इतिहास ही  अधूरा है | संघ प्रमुख भी हाल के वर्षों में इसी आशय के बयान देते रहे हैं | संसद में पारित हुए ताजा संशोधन को लेकर भाजपा और संघ विरोधी राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि  ये दांव मंडल समर्थक राजनीतिक ताकतों को पूरी तरह धराशायी करने के लिए चला गया है | संघ की जो राष्ट्रीय बैठक कुछ समय पूर्व चित्रकूट में सम्पन्न हुई थी उसमें भी ये रणनीति बनाई गई थी कि संघ और भाजपा को सवर्ण समर्थक अपनी छवि से बाहर निकलना बहुत जरूरी है | इसी के साथ ही उ.प्र में सवर्ण जातियों की संभावित नाराजगी से होने वाले नुकसान की भरपाई अन्य पिछड़ी जातियों में सपा के बचे खुचे प्रभाव को नष्ट करते हुए किये जाने की योजना भी है | हालांकि जैसा कि अनुमान है सवर्ण मतदाता अभी भी भाजपा को ही अपना संरक्षक मान रहे हैं | अयोध्या में राममंदिर का निर्माण तेजी  से चलने की वजह से उसकी साख भी बची रह गई | लेकिन संघ का सोचना ये है कि समूचे हिन्दू समाज को एकजुट किया जावे और उसके लिये उसकी आधी से ज्यादा आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली अन्य पिछड़ी जातियों को साधना जरुरी है | संघ को ये भी समझ में आ गया है कि धारा 370 और राममंदिर अब पहले जैसे  चुनावी मुद्दे नहीं बन सकेंगे | इसके अलावा मौजूदा हालातों में सत्ता विरोधी रुझान भी  नजर आने लगा है | बंगाल के कड़वे अनुभव से भी संघ और भाजपा का नेतृत्व सतर्क है | यही कारण है कि कमंडल और सवर्ण समर्थक छवि से बाहर आकर पार्टी अब पूरे हिन्दू समाज को अपने साथ जोड़ना चाह रही है | उ.प्र विधानसभा का आगामी चुनाव सही मायनों में 2024 के  लोकसभा चुनाव की झलक दे देगा | इसीलिये विपक्षी दलों की संभावित एकता में छोटी  – छोटी जातिवादी राजनीतिक पार्टियों की भूमिका को प्रभावहीन करने के लिए ही भाजपा ने मंडल समर्थक पार्टियों के आधार को हिलाने का प्रयास किया है | इसका क्या असर होगा ये तो  भविष्य ही बतायेगा क्योंकि आरक्षण का खुलकर समर्थन करने की नीति उसकी परम्परागत समर्थक  ऊंची जातियों को उससे दूर कर सकती है । लेकिन संघ और भाजपा के भीतर ये अवधारणा तेजी से घर कर चुकी है कि सत्ता में बने रहने के लिए जातिगत समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ना नितांत आवश्यक है क्योंकि जाति भारतीय समाज में उस अमरबेल की तरह है जिसे जितना काटो वह उतनी ही बढ़ती है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 August 2021

सबसे घटिया सांसदों का भी चयन हो : संसद पर होने वाले खर्च का औचित्य सवालों के घेरे में



 
राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू सदन में ये कहते हुए रो पड़े कि बीते दिन हुए हंगामे से दुखी होकर रात भर नहीं सो सके | वहीं लोकसभा के अध्यक्ष ओम  बिरला ने सत्र स्थगित करने के बाद प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी , कांग्रेस की कार्यकारी  अध्यक्ष सोनिया गांधी , लोकसभा में नेता अधीर रंजन चौधरी सहित विपक्ष के बाकी नेताओं को एक साथ बिठाकर भविष्य में  सदन की कार्यवाही सुचारु तरीके से संचालित करने के बारे में चर्चा की | श्री नायडू की नाराजगी से ये संकेत भी मिला कि ज्यादा हंगामा करने वाले कुछ  सदस्यों के विरुद्ध वे कड़ी कार्रवाई कर सकते हैं | संसद के मानसून सत्र में कहने को तो सरकार द्वारा अनेक विधेयक पारित करवा लिए गये लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग संशोधन को छोड़कर बाकी  किसी पर भी न बहस हुई और न चर्चा | दोनों सदनों में आखिरी दिन तक सिवाय हंगामे के कुछ नहीं हुआ | सत्र की समाप्ति  के बाद एक बार फिर बताया जा रहा है संसद को चलाने में प्रति मिनिट  और पूरे सत्र पर कितने करोड़ खर्च हो गए | वैसे संसद में हंगामा , बहिर्गमन , नारेबाजी नई बात नहीं है , जिसकी देखा - सीखी विधानसभाओं में भी वैसा ही नजारा देखने मिलने लगा | सदन नहीं चलने देने के लिए सत्ता पक्ष और विरोधी दल एक दूसरे को कठघरे में खड़ा करते हुए खुद को बेकसूर बताते हैं लेकिन असलियत यही है कि दोनों इस मामले में बराबर के दोषी हैं | संसद के मानसून सत्र को ही लें तो  विपक्ष ने पेगासस जासूसी मामले में चर्चा करवाने की जिद पकड़कर सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी | दूसरी तरफ सत्ता पक्ष ने उसकी इस कमजोरी को भांपकर बहस नहीं करवाने की जो रणनीति अपनाई उसमें विपक्ष उलझ गया | उसकी सबसे बड़ी विफलता ये रही कि सरकार  ने तो अपना विधायी कार्य पूरी तरह संपन्न करवा लिया और बड़ी ही चतुराई से हंगामे के बीच भी आनन – फानन  तमाम विधेयक सदन से विधिवत पारित करवा लिए किन्तु विपक्ष न जासूसी के मुद्दे पर बहस करवा सका और न ही कृषि कानून , कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हुई जनहानि , पेट्रोल – डीज़ल के अलावा अन्य जरूरी चीजों की महंगाई जैसे मुद्दों पर ही  सरकार को घेर सका | यदि वह पेगासस प्रकरण को पकड़कर नहीं बैठा होता तब  सरकार को बात – बात पर घुटनाटेक करवा सकता था | बावजूद इसके कि लोकसभा के साथ ही राज्यसभा में भी सरकार के पास बहुमत होने से वह विपक्ष के चक्रव्यूह से सुरक्षित बाहर निकलने में सक्षम है , विपक्ष के पास शब्दबाणों से हमले की जो ताकत है उसके उपयोग से वह जनता को अपनी मौजूदगी का एहसास करवा सकता था | इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि आजकल सत्ता पक्ष बहुमत के बाद भी सदन में बहस से बचता है और मौका मिलते ही सत्रावसान करने की चाल चलकर विपक्ष को असहाय साबित कर देता है | संसद के मानसून सत्र का चलना न चलना एक तरह से बराबर ही रहा | विपक्ष के पास अब सरकार को कोसने के अलावा और कुछ बचा ही नहीं है किन्तु संसद के माध्यम से जनता की तकलीफों को  पेश करने का अवसर गंवाने के पीछे उसकी अपरिपक्व और गैर जिम्मेदार नीति ही रही | अब सवाल ये है कि  जनता के कर से चलने वाली संसद को ठप्प करने का ये सिलसिला कब तक जारी रहेगा  ? जो  सदस्य लोकतंत्र का मंदिर कहलाने वाली संसद या विधानसभा की गरिमा तार – तार करते हैं उनको महज एक या कुछ दिन के लिए निलम्बित करने का रत्ती भर भी असर नहीं होता | ये कहना अच्छा तो नहीं लगता लेकिन कुछ सदस्य बेशर्मी की हद तक उद्दंड हो चले हैं | उनकी पार्टी के नेता उन्हें न टोकते हैं और न ही रोकने की कोशिश करते हैं | जिससे लगता है हंगामेबाजों को प्रोत्साहन मिलता है | गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष के बुलावे पर सोनिया जी सहित बाकी विपक्षी  नेता भले ही आ  गये हों लेकिन किसी ने भी सत्र का अधिकांश समय बर्बाद होने पर अफसोस जताया हो , ऐसा सुनने  नहीं मिला | लोकतंत्र के रखवालों का ये रवैया  कुत्ते की पूंछ के सीधे नहीं होने जैसा है | जो मतदाता सांसदों और विधायकों  का चुनाव करते हैं  उनमें से कोई सदन की दर्शक दीर्घा में नारेबाजी या हंगामा कर दे तो उसे जेल भेज दिया जाता है | लेकिन उसके चुने हुए सांसद या विधायक गर्भगृह में नारेबाजी  करें , आसंदी पर कागज  फेंकें , विधेयक छीनकर फाड़ दें और टेबिल पर खड़े होने जैसा आशोभनीय आचरण  करें तो उन्हें ज्यादा से ज्यादा  कुछ समय तक के लिए निलम्बित किये जाने के अलावा और कुछ नहीं किया जाता | संसद में हर साल सर्वश्रेष्ठ सांसद चुने जाते हैं और उनका सम्मान भी किया जाता है | लेकिन अब समय आ गया है कि सदन के भीतर सबसे घटिया व्यवहार  करने  वाले सांसदों को चुनकर उनकी सार्वजनिक निंदा जैसा आयोजन भी किया जाना चाहिए | संसद का सत्र यदि इसी तरह चलाना है तब बेहतर है उसे एक – दो दिन के लिए ही बुलाया जाए जिससे संवैधानिक बाध्यता पूरी हो सके और उसी में सरकार अपने सभी विधेयक पटल पर रखकर बहुमत  से पारित करवा ले | रही विपक्ष की बात तो उसे जब सदन में चर्चा करनी ही नहीं तो करोड़ों की बर्बादी का औचित्य ही क्या  है ? 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 August 2021

लोकतंत्र : अपराधियों का , अपराधियों द्वारा और अपराधियों के लिए !



राजनीति के  अपराधीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी चिंता व्यक्त्त करने के साथ ही ये भी बता दिया कि वह इस मामले में असहाय है | सरकार के अधिकार क्षेत्र में दखल देने से परहेज करते हुए उसने कहा कि वह केवल कानून बनाने वालों की अंतरात्मा से अपील कर सकता है |  हालाँकि न्यायालय ने इस बात पर नाराजगी व्यक्त की कि राजनीतिक दल जिन उम्मीदवारों को टिकिट देते हैं उनके आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी का समुचित प्रचार नहीं किया जाता | भविष्य में 48 घंटे के भीतर तत्सम्बन्धी जानकारी देना अनिवार्य होगा | राज्य सरकारों द्वारा जनप्रतिनिधियों पर चल रहे  आपराधिक  प्रकरण वापिस लेने के पूर्व सम्बन्धित उच्च न्यायालय की अनुमति को भी सर्वोच्च न्यायालय ने  अनिवार्य कर दिया है | राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले  तत्वों की बढ़ती संख्या पर तीखी टिप्पणी करते हुए उसने  कहा कि ऐसे  नेताओं को क़ानून बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए | देश की  सर्वोच्च न्यायिक आसन्दी से निकली उक्त सभी बातें पूरे देश के संज्ञान में हैं | आम आदमी तक ये देखकर दुखी और परेशान है कि उसके लिए  साफ़ – सुथरी छवि के जनप्रतिनिधियों को चुनना कठिन होता जा रहा है | अनेक सीटों पर प्रमुख उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि के होने से नागनाथ और सांपनाथ में से किसी एक का चयन करना  मजबूरी बन जाती है | नेताओं द्वारा किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने के लिए अपराधी तत्वों का सहयोग लेने से राजनीति का अपराधीकरण प्रारम्भ हुआ | शुरू – शुरू में नेताओं की मदद करने वाले अपराधियों को बाद में ये लगने लगा कि जब वे दूसरों को चुनाव जितवा सकते हैं तब क्यों न खुद ही विधानसभा और लोकसभा में जाकर बैठ जाएँ | धीरे – धीरे  राजनीति और अपराधियों में इतना घालमेल हो गया कि उनमें अंतर करना कठिन होने लगा | सर्वोच्च न्यायालय काफी पहले से इस विषय में अपनी चिंता व्यक्त करता आ रहा है | चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड का उल्लेख नामांकन पत्र में किये जाने के साथ ही  समाचार माध्यमों के जरिये उनकी जानकारी मतदाताओं को देने की बाध्यता भी उत्पन्न की | लेकिन कानून की नजर में कोई आरोपी तब तक अपराधी  नहीं कहलाता  जब तक न्यायालय में  दोषी साबित न हो जाये | इसी प्रावधान का लाभ लेते हुए कुख्यात अपराधी तत्व चुनाव मैदान में उतरने लगे और मतदाता भी उनके खौफ से बचने के लिए उनको जिताने मजबूर होते गये | हत्या , अपहरण , डकैती जैसे संगीन मामलों में आरोपी होने के कारण जेल में बंद एक सांसद को कड़ी सुरक्षा के बीच  राष्ट्रपति चुनाव में मतदान हेतु  संसद भवन लाये जाने जैसे दृश्य लोकतंत्र को कलंकित करने के लिए पर्याप्त हैं | सर्वोच्च न्यायालय  के इस अभिमत से भला कौन असहमत होगा कि आपराधिक छवि वाले नेताओं को कानून बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती | लेकिन ये सवाल  भी उठता  है कि आपराधिक छवि का निर्धारण कौन और कैसे करेगा ? कुख्यात डकैत स्व. फूलन देवी के उ.प्र की मिर्जापुर सीट से लोकसभा के लिए चुने जाने का मुख्य कारण वैसे तो  उस क्षेत्र में उनके सजातीय  मल्लाहों का बाहुल्य होना था | लेकिन समाजवादी पार्टी  उम्मीदवार न बनाती तब शायद वे नहीं जीत पातीं | हालांकि अनेक कुख्यात अपराधी सरगना निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर भी जीतकर आते रहे हैं लेकिन संसद और विधानसभाओं ही नहीं वरन नगरीय निकायों तक में प्रमुख राजनीतिक दल उनको उम्मीदवारी देने लगे  हैं | संसदीय लोकतंत्र के लिए ये स्थिति निश्चित रूप से शोचनीय है क्योंकि जिस देश की कानून बनाने वाली संस्थाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग बैठने लगें वहां के समाज में सज्जनों की स्थिति दांतों के बीच जीभ जैसी होकर रह जाती है | क्षेत्रीय दलों पर अक्सर ये आरोप लगा करता था कि वे अपराधी  तत्वों को चुनाव में उम्मीदवार बनाते हैं , परन्तु  अब तो भाजपा और कांग्रेस  जैसे राष्ट्रीय दल भी आपराधिक व्यक्तियों को सांसद और विधायक बनाने में संकोच नहीं करते क्योंकि उनके लिए उम्मीदवार की छवि से ज्यादा उसकी चुनाव जीतने की क्षमता  महत्वपूर्ण होने लगी है | पहले धनकुबेरों को इसी वजह से उम्मीदवार बनाया जाता था लेकिन उसके बाद बात आपराधिक तत्वों तक जा पहुँची जिसके कारण राजनीति का चेहरा बदसूरत होते – होते अंततः विकृत हो गया | सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जो पीड़ा व्यक्त की वह सही मायनों में उन करोड़ों देशवासियों की  अभिव्यक्ति है जो लोकतंत्र की पवित्रता को बचाए रखने के लिए निरंतर चिंता में डूबे रहते हैं | अमेरिका के महान राष्ट्रपति स्व. अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि वह  जनता की , जनता द्वारा और जनता के लिए बनी शासन प्रणाली है | लेकिन हमारे देश में सत्ता की  वासना ने उस परिभाषा को बदलकर अपराधियों की  , अपराधियों द्वारा और अपराधियों के लिए प्रचलित शासन प्रणाली बनाने की परिस्थिति निर्मित कर दी है | ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की नसीहतों पर अमल होने की उम्मीद करना व्यर्थ है क्योंकि उसकी  स्थिति घर के उस बुजुर्ग की तरह हो गई  है जिसकी बात सुनने का नाटक तो सभी करते हैं लेकिन मानता कोई नहीं है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 August 2021

क्या विपक्ष की जिम्मेदारी केवल वोट बैंक से जुड़े क़ानून का समर्थन मात्र है



संसद के मानसून सत्र में पहले दिन से ही विपक्ष हंगामे पर उतारू है | पेगासस जासूसी मामले को लेकर वह संसद के कामकाज में लगातार व्यवधान डाल रहा है | इस वजह से रोज सदन की कार्रवाई स्थगित हो जाती है | ठीक से बहस नहीं हो पाने के कारण अनेक विधेयकों को बिना चर्चा के ही पारित कर दिया गया | गत दिवस राज्यसभा में जब  लद्दाख में केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोलने का विधेयक  ध्वनि मत से पारित किया गया तब भी विपक्षी सदस्य बहिर्गमन कर रहे थे | इसी तरह लोकसभा में भी  हंगामे के बीच ही तमाम महत्वपूर्ण विधेयकों को मंजूरी दे दी गई | लेकिन जब सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग  ( ओबीसी ) सम्बन्धी संशोधन विधेयक पेश किया तब कांग्रेस ने इसका समर्थन करने का ऐलान कर दिया | सदन में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी ने विपक्ष की जिम्मेदारी का हवाला देते हुए उक्त विधेयक को पारित करवाने में सरकार का साथ देने  का आश्वासन दे डाला | बाकी विपक्षी  पार्टियाँ भी इसको पारित कराने के लिए तैयार हैं जिसके कानून बन जाने पर  राज्य सरकारें अन्य पिछड़ी जातियों की सूची  स्थानीय आधार पर बना सकेंगी | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को अवैध करार दिए जाने के बाद जो स्थितियां उत्पन्न हुईं उनको दृष्टिगत रखते हुए केंद्र सरकार यह विधेयक लेकर आई है | हालाँकि इसके पीछे पिछड़ी जातियों के उत्थान का उद्देश्य न होकर विशुद्ध वोट बैंक की राजनीति है | अन्य पिछड़ी जातियों की जनगणना कराये जाने के चौतरफा दबाव के साथ ही उ.प्र विधानसभा के आगामी चुनाव में पिछड़ी जातियों के वोटों की फसल काटने की गरज से उक्त विधेयक इसी सत्र में पेश करने की जल्दबाजी की गई | इसके पारित होने के बाद चुनाव  वाले राज्य नई जातियों को अन्य पिछड़ी जातियों के सूची में शामिल कर उनका राजनीतिक तुष्टीकरण कर सकेंगे | सवाल ये है कि बाकी  जो विधेयक  संसद में  हंगामे के दौरान बिना किसी भी तरह की चर्चा के ही पारित हो गये,  उनके बारे में विपक्ष इतना लापरवाह क्यों रहा ? क्या उनका देश और जनता से कोई सरोकार नहीं था ? लद्दाख जैसे पिछड़े इलाके में केंद्रीय विवि खोलने संबंधी विधेयक का समर्थन करने की बजाय विपक्ष द्वारा सदन छोड़कर चला जाना बेहद गैर  जिम्मेदाराना  कदम ही कहा जाएगा | ऐसे में अधीर रंजन का ये कहना कि हम विपक्ष की जिम्मेदारी समझते हैं , हास्यास्पद है | अन्य पिछड़ी जातियां चूँकि अब वोट बैंक का हिस्सा बन चुकी हैं और उन जाति समूहों के नेता वोटों के ठेकदार हैं इसलिये न सिर्फ कांग्रेस अपितु शेष विपक्षी दल भी पैगासस जासूसी मामले में बहस की जिद पूरी नहीं होने के कारण संसद की कार्यवाही बाधित करने के निर्णय से पीछे हटकर अन्य पिछड़ा वर्ग संशोधन विधेयक पर सरकार का साथ देने एक पैर पर खड़े नजर आ रहे हैं |  मौजूदा सत्र में केंद्र सरकार ने अनेक ऐसे विधेयक पारित करवाए जिनका आर्थिक और सामजिक क्षेत्र पर काफी असर पड़ेगा | विपक्ष ने इन विधेयकों का न तो समर्थन किया और न ही विरोध क्योंकि वह अपनी मांग पूरी हुए बिना सदन को न चलने देने की रणनीति पर चलता रहा | चूँकि उन  विधेयकों का चुनावी राजनीति से सीधा सम्बन्ध नहीं है इसलिए विपक्ष की नजर में वे महत्वहीन समझे गए परन्तु पिछड़ी जातियों के बारे में ज्योंही संशोधन विधेयक लाया गया त्योंही  अकड़ खत्म हो गई | इस प्रकार उसकी दोहरी भूमिका एक बार पुनः उजागर हो गई | होना तो ये चाहिए था कि जितने भी विधेयक इस सत्र में पारित हुए उन पर विपक्ष का अभिमत भी देश को ज्ञात होता  | उसे इस बात का जवाब  देना चाहिए कि क्या उसकी जिम्मेदारी केवल अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े संशोधन विधेयक को पारित करवाना है और उसके पूर्व पारित हुए लगभग दर्जन भर विधेयक अनुपयोगी या अर्थहीन थे ?

- रवीन्द्र वाजपेयी

 

Monday, 9 August 2021

खेलों का उज्जवल भविष्य : बशर्ते पूरा ध्यान पदक रूपी चिड़िया की आंख पर रहे



टोक्यो ओलम्पिक गत दिवस संपन्न हो गए | कोरोना के कारण यह आयोजन एक वर्ष विलम्ब से  हुआ और वह भी  बिना दर्शकों के  खाली पड़े स्टेडियम में | हालाँकि टीवी के जरिये पूरी दुनिया में विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं का प्रसारण  खेल प्रेमियों ने देखा किन्तु खिलाड़ियों को  दर्शकों की  अनुपस्थिति में अपना श्रेष्ठतम प्रदर्शन करना अटपटा लगता है क्योंकि उनकी तालियाँ उनका उत्साह्वर्धन करती हैं  | गत वर्ष तो ये लगा था कि ये शायद नहीं हो सकेगा लेकिन जापान की संकल्पशक्ति आभिनंदन की  पात्र है  जिसकी वजह से बहुत ही विषम परिस्थितियों में विश्व का सबसे बड़ा गैर पेशेवर आयोजन सफलतापूर्वक हो सका | कोरोना की दूसरी लहर के कारण ये आशंका भी थी कि विभिन्न देश खिलाड़ियों को संक्रमण से बचाने के लिए  टोक्यो जाने की अनुमति नहीं देंगे किन्तु ऐसा करने से अनेक ऐसे खिलाड़ी ओलम्पिक में भाग लेने से वंचित हो सकते थे जो बढ़ती आयु की वजह से 2024 में फ्रांस  की राजधानी पेरिस में होने वाले ओलम्पिक खेल में नहीं जा पाते | इसके अलावा जो  खिलाड़ी बीते चार – पांच साल से कठोर  परिश्रम करते  आ रहे थे उनके लिए भी ओलम्पिक  रद्द होना किसी सपने के टूटने जैसा हो जाता | ये सब देखते हुए टोक्यो ओलम्पिक का सफल आयोजन दुनिया भर के खेल प्रेमियों और खिलाड़ियों  के लिए उत्साहवर्धक साबित हुआ | अपवाद स्वरूप कोई विवाद हुआ हुआ तो बात अलग वरना पूरे आयोजन में बेहतर प्रबन्धन और खेल भावना ने प्रभावित किया | अमेरिका ने जहां पदक तालिका में अपना वर्चस्व बनाये रखा वहीं चीन ने दूसरा स्थान हासिल कर ये दिखा दिया कि आर्थिक प्रगति के साथ ही उसने खेलों में भी विश्वस्तरीय हैसियत बना ली है | जहां भारत का सवाल है तो उसने इस बार सात पदक जीतकर उल्लेखनीय सफलता हासिल की | सबसे बड़ी बात रही पहली बार किसी एथलीट ने स्वर्ण पदक प्राप्त किया | भाला फेंक में नीरज चोपड़ा ने ये उपलब्धि हासिल कर पूरे  देश को हर्षित  होने  का अवसर दिया | दो रजत और चार कांस्य पदक के साथ भारत पदक तालिका में 48 वें स्थान पर रहा | हालाँकि पूर्वापेक्षा ये स्थिति उत्साहित करती है | विशेष रूप से इसलिए क्योंकि हमारे अनेक खिलाड़ी अंतिम चार तक पहुंचे | महिला हॉकी टीम भी  भले ही पदक से वंचित रही लेकिन पूरी प्रतियोगिता में उसका प्रदर्शन शानदार रहा जिसकी वजह से भविष्य में उससे उम्मीदें की जा सकती हैं | पुरुष हॉकी टीम ने 21 साल बाद देश को पदक दिलवाकर उस अतीत की  स्मृतियाँ ताजा कीं जब हॉकी का स्वर्ण पदक और भारत समानार्थी हुआ करते थे | हालाँकि मुक्केबाजी , तीरंदाजी , कुश्ती  और निशानेबाजी में कुछ और पदक आने से रह गए परन्तु इस ओलम्पिक की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत के लिहाज से ये रही कि  निजी खेलों में भी  हमारे खिलाड़ियों ने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन किया जिसमें उन्हें मिले प्रशिक्षण का खासा योगदान था | केंद्र सरकार ने पिछले ओलम्पिक के बाद से ही टोक्यो के आयोजन हेतु खिलाड़ियों को हर तरह से प्रोत्साहित करने का योजनाबद्ध प्रयास किया | उनको  देश – विदेश में महंगे प्रशिक्षकों से मिले मार्गदर्शन का लाभ भी देखने मिला | बीते कुछ  सालों में राज्य सरकारें भी खेलों को प्रोत्साहित करने पर ध्यान दे रही हैं | यही वजह है कि पंजाब और हरियाणा के अलावा उत्तर पूर्वी राज्यों सहित कुछ ऐसे राज्यों से भी खेल प्रतिभाएं निकलकर आने लगी हैं जिनकी आर्थिक स्थिति तुलनात्मक दृष्टि से कमतर  है | उदाहरण के लिए उड़ीसा का खेलों में कुछ स्थान नहीं माना जाता किन्तु वहां के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने हॉकी टीमों के प्रशिक्षण सहित बाकी खर्च उठाकर जो योगदान दिया उसकी पूरे देश में प्रशंसा हो रही है | इस उदाहरण से यदि बाकी मुख्यमंत्री भी प्रेरणा लेते हुए पेरिस ओलम्पिक के लिए अभी से  खिलाड़ियों  और टीमों को आर्थिक सहयोग के साथ ही सुरक्षित भविष्य का आश्वासन दें तो बड़ी बात नहीं अगले आयोजन में भारत पदक तालिका में और ऊंचा स्थान बना सके | म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  द्वारा पदक नहीं मिल पाने  के बावजूद महिला हॉकी टीम के  प्रत्येक खिलाड़ी को 31 -31 लाख देने का जो ऐलान  किया गया वह भी अनुकरणीय है | बेहतर हो उद्योग जगत भी इस दिशा में आगे आये और खेलों में रूचि रखने वाले लड़के – लड़कियों को संरक्षण और सहायता प्रदान करे जिससे सरकारों का बोझ कम हो | ये अच्छी बात है कि पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के प्रति उदीयमान खिलाड़ियों की रूचि बढ़ी है | जीतने वालों के अलावा ओलम्पिक में भाग लेने वाले अन्य खिलाड़ियों को भी पुरस्कार तथा नौकरी दिए जाने की नीति से नई पीढ़ी के मन में ये धारणा तेजी से स्थापित होती जा रही है कि  खेलों में भी  भविष्य बनाया जा सकता है | ओलम्पिक में पदक जीतने वालों पर जिस तरह से धनवर्षा हुई उससे खिलाड़ियों को ये एहसास हुआ कि केवल क्रिकेट में ही पैसा नहीं है | टोक्यो ओलम्पिक में जीतने वाले खिलाड़ियों अथवा टीम के साथ ही पदक के बेहद करीब पहुंचने वालों को भी  जिस तरह से प्रशंसा और प्रोत्साहन मिला वह शुभ संकेत है | प्रसन्नता और आनंद  को विकास का आधार मानने की जो नई अवधारणा वैश्विक स्तर पर स्थापित हो रही है उसमें खेलों का भी बड़ा योगदान है | 1983 में  क्रिकेट का विश्वकप जीतने के बाद भारत का आत्मविश्वास इस हद तक बढ़ा कि आज उसके बिना विश्व क्रिकेट की कल्पना तक नहीं की जा सकती | ठीक वैसे ही टोक्यो ओलम्पिक में हमारे खिलाड़ियों ने जो उपलब्धियां अर्जित कीं वे भविष्य में और ज्यादा सफलताओं का आधार बन सकती हैं | लेकिन उसके लिए अर्जुन की तरह पदक रूपी  चिड़िया की आँख  पर  ही  समूचा ध्यान केन्द्रित करना होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी