Monday, 23 August 2021

सिद्धू का सलाहकार : बन्दर के हाथ उस्तरा साबित हो रहा


 
पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोतसिंह सिद्धू के साथ विवाद खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे | मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के खुले विरोध के बावजूद हाईकमान की कृपा से  पार्टी संगठन की बागडोर हाथ आते ही उन्होंने जो चार सलाहकार नियुक्त किये उनमें से एक मालविंदर सिंह माली ने अपने फेसबुक पेज पर पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. इंदिरा गांधी का एक स्कैच पोस्ट किया है जिसमें उन्हें इंसानी खोपड़ियों पर खड़ा बताया गया है | उनके हाथ में जो बंदूक है  उसके सिरे पर भी एक खोपड़ी है | जन तक पैगाम नामक एक पंजाबी पत्रिका में वर्ष 1989 में उक्त स्कैच प्रकाशित हुआ था | उस समय श्री माली ही उसके संपादक थे जिसका आशय इंदिरा जी को सिखों के नरसंहार से जोड़ना था | इसके कुछ दिन पहले भी उन्होंने कश्मीर को  लेकर बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था जिसमें जम्मू – कश्मीर को अलग देश बताते हुए कहा था कि भारत और पाकिस्तान ने चूँकि उस पर अवैध कब्जा कर रखा है , इसलिए उसे आजाद कर देना चाहिए | उल्लेखनीय है बीते 11 अगस्त को ही नवजोत ने उनको अपना सलाहकार नियुक्त किया था | भारी विरोध के बाद भी श्री माली ने फेसबुक पेज से इंदिरा जी का संदर्भित स्कैच हटाने के प्रति बेरुखी दिखाई है जिसका  न सिर्फ मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह वरन आनंदपुर साहिब सीट से कांग्रेस के लोकसभा सदस्य मनीष तिवारी ने भी तगड़ा विरोध किया है | इस बारे में चौंकाने वाली बात ये है कि श्री सिद्धू की ओर से इस बारे में न तो कोई प्रतिक्रिया आई और न ही उन्होंने  श्री माली की छुट्टी करने का संकेत  दिया | विधानसभा चुनाव के कुछ महीनों पहले नवजोत और अमरिंदर में लम्बे समय से चला आ रहा  शीतयुद्ध जब गर्म युद्ध में बदलने लगा तब हाईकमान हरकत में आया और उसने मुख्यमंत्री के ऐतराज को दरकिनार करते हुए नवजोत को संगठन की कमान थमा दी | इससे अमरिंदर तो नाराज हैं ही परन्तु मनीष तिवारी और निवर्तमान प्रदेश  अध्यक्ष सुनील जाखड़ को भी सिद्धू की ताजपोशी जमी नहीं | हालाँकि श्री सिद्धू द्वारा  अध्यक्ष का  कार्यभार ग्रहण करते समय  मुख्यमंत्री ने उपस्थित होकर भाषण भी दिया था किन्तु उस दौरान  भी दोनों में  बातचीत नहीं हुई | तबसे लगातार उनके बीच किसी न किसी बात को लेकर आरोप – प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है | लेकिन अपने सलाहकार की करतूत ने उनके विरोधियों को श्री सिद्धू की पगड़ी उछालने का जोरदार अवसर दे दिया | कश्मीर पर भारत के अवैध कब्जे संबंधी बयान के अलावा इंदिरा जी को नरमुंडों के साथ खड़ा  दिखाने वाला स्कैच सोशल मीडिया पर प्रसारित करने जैसी हिमाकत  करने वाले व्यक्ति को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यदि अपना सलाहकार बनाये  रखते हैं  तब तो ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि ज्यादा जुबान चलाने के कारण उनका दिमाग चलना बंद हो गया है | उससे भी बड़ी गलती कांग्रेस हाईकमान विशेष रूप से गांधी परिवार की कही जायेगी जिसने राज्य के मुख्यमंत्री सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं के विरोध को ठेंगा दिखाते हुए चुनावी वर्ष में श्री सिद्धू को पार्टी संगठन का मुखिया बना दिया जो अपनी ही प्रदेश सरकार के विरोध में सार्वजनिक बयानबाजी और आन्दोलन की  धमकी देने से बाज नहीं आये | अमरिंदर और उनके साथ ही राज्य इकाई के अनेक नेताओं ने तो नवजोत के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने तक की मांग कर डाली थी  किन्तु गांधी परिवार ने बजाय दण्डित करने के उन्हें पुरस्कृत कर दिया | कांग्रेस में चली आ रही परम्परा के अनुसार छोटी – छोटी नियुक्तियाँ भी गांधी परिवार की अनुमति और सहमति से ही की जाती रही हैं | ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि श्री सिद्धू ने अपने लिए जो चार सलाहकार नियुक्त किये क्या उनके लिए भी पार्टी के सर्वेसर्वा परिवार से पूछा गया या मनमर्जी से निर्णय लिया गया ? बहरहाल श्री माली ने जो हरकत की वह इंदिरा जी के अपमान के साथ ही राष्ट्रीय संप्रभुता का भी खुला विरोध है जो उनकी देशभक्ति पर संदेह पैदा करने के लिए पर्याप्त है | इस बारे में ये भी गौरतलब है कि श्री सिद्धू पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में उनके न्यौते पर न सिर्फ  गये बल्कि वहां के सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा से गले भी मिले जिसके लिए देश में उनकी  जोरदार आलोचना हुई । उनके सलाहकार मालविंदर सिंह माली के देशविरोधी बयान और कांग्रेस  पार्टी की आराध्य नेता रहीं इंदिरा जी का आपत्तिजनक स्कैच प्रसारित किये जाने के बाद एक बार फिर श्री सिद्धू विवादों में घिर गये हैं | विपक्ष आलोचना करता उसके पहले कांग्रेस  पार्टी के भीतर ही उनकी  मुखालफत खुलकर सामने आने लगी है | अमरिंदर सिंह और मनीष तिवारी पहले भी उनके विरुद्ध बोलते और हाईकमान को पत्र लिखते रहे हैं | इस बार भी दोनों ने सीधा हमला  करने में देर नहीं की है | वैसे इस मसले पर पार्टी हाईकमान के सामने भी असमंजस की स्थिति है क्योंकि वह सिद्धू पर श्री माली को हटाने का दबाव डालती है तो उससे अमरिंदर खेमा मजबूत होगा और यदि वह ऐसा नहीं करती तब उसके लिए मुंह छिपाना मुश्किल हो जाएगा | ये देखते हुए कहना सही है कि पंजाब को लेकर गांधी परिवार जिस तरह लापरवाही दिखा रहा है , वह कांग्रेस को महंगी पड़ सकती है | नवजोत सिंह सिद्धू की बेलगाम जुबान के बाद उनके सलाहकार की देश  विरोधी दुस्साहसी हरकत बन्दर के हाथ उस्तरा थमाने वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है | इंदिरा जी का नरमुंडों पर खड़ा स्कैच भी यदि गांधी परिवार को क्रोधित नही कर पा रहा तब फिर कहने को बचता ही क्या है ?

- रवीन्द्र वाजपेयी


 

Saturday, 21 August 2021

विपक्षी एकता बाद में , पहले कांग्रेस खुद तो एकजुट हो ले



कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आमंत्रण पर गत दिवस आभासी माध्यम के जरिये विपक्षी दलों की बैठक में 19 दलों के नेतागण हुए शामिल हुए | उनमें शरद पवार , ममता बैनर्जी , उद्धव ठाकरे और एम . के. स्टालिन ही प्रमुख  कहे जा सकते हैं | हालाँकि जम्मू – कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारुख अब्दुल्ला के अलावा सीपीएम नेता सीताराम येचुरी भी बैठक का हिस्सा बने , लेकिन राष्ट्रीय राजनीति को दिशा देने  वाले राज्य  उ.प्र की प्रमुख विपक्षी पार्टियों में से न बसपा आई और न ही सपा | सपा की अनुपस्थिति के पीछे अखिलेश यादव के संबंधी की मृत्यु बताई गई जबकि बसपा ने सोनिया जी के आमंत्रण की उपेक्षा कर दी | दिल्ली के बाद पंजाब में बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभर रही आम आदमी पार्टी ने जानकारी  दी कि उसको बैठक का न्यौता ही नहीं दिया गया | बैठक में केंद्र सरकार के विरुद्ध विपक्षी लामबंदी पर सहमति बनने के साथ ही आगामी 20 से 30 सितम्बर तक पूरे देश में संयुक्त रूप से आन्दोलन किया जावेगा | बैठक का असली उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकता की बुनियाद रखना बताया गया  | बीते दिनों ममता बैनर्जी ने दिल्ली यात्रा के दौरान सोनिया जी और श्री पवार सहित अन्य विपक्षी दलों से भेंट करते हुए भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने की पहल की थी | उनके पहले पवार साहेब भी एक बैठक कर चुके थे किन्तु उसमें कांग्रेस मौजूद नहीं थी |  राहुल गांधी ने भी हाल ही में विपक्षी नेताओं को नाश्ते पर बुलाया | यद्यपि श्रीमती गांधी द्वारा गत दिवस आहूत बैठक को काफी महत्व मिला परन्तु ये केंद्र सरकार को चुनौती देने से ज्यादा कांग्रेस के जी – 23 नामक असंतुष्ट नेताओं को जवाब देने  के लिए चला गया दांव था | स्मरणीय है हाल ही में उक्त गुट के नेता कपिल सिब्बल ने अपने जन्मदिन के बहाने तमाम विपक्षी नेताओं को भोज पर बुलाया किन्तु  गांधी परिवार को बुलावा नहीं भेजा | श्री सिब्बल ने उस भोज का मकसद भाजपा विरोधी विपक्षी गठबंधन बनाना बताया था लेकिन गांधी परिवार ने उसके निहित उद्देश्य को समझते हुए जवाबी कदम उठाने का निर्णय किया और उसी के तहत श्रीमती गांधी द्वारा  संदर्भित बैठक बुलाई गई | वरना 2024 के पहले विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होंगे जिनमें से कुछ में क्षेत्रीय पार्टियां ही भाजपा का मुकाबला करने लायक हैं | उ.प्र को ही लें तो वहां बसपा और सपा दोनों में से एक भी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ज्यादा भाव नहीं देंगी  | इसी प्रकार  पंजाब , उत्तराखंड और गोवा में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लिए सिरदर्द बनने जा रही है | अकाली दल से तो वैसे भी उसका सांप और नेवले जैसा रिश्ता है | बंगाल में भी विधानसभा चुनाव कुछ महीने पहले ही  हुए हैं जिनमें कांग्रेस शून्य पर सिमटकर रह गई | ममता ने हाल ही में महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया जबकि पूर्व राष्ट्रपति स्व.प्रणव मुखर्जी के पुत्र अभिजीत पहले ही तृणमूल का दामन थाम चुके थे | इसी तरह शरद पवार महाराष्ट्र में कांग्रेस को शायद ही पनपने देंगे | जम्मू – कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस का गठबंधन पहले भी  होता रहा है लेकिन उसकी हैसियत  कनिष्ठ भागीदार की ही है | राष्ट्रीय से क्षेत्रीय पार्टी में तब्दील होते जा रहे वामपंथी दलों का वैचारिक और मैदानी असर भी  अब पहले जैसा नहीं रहा | सोनिया जी की  बैठक में शरीक  हुईं शेष विपक्षी पार्टियों में से एक - दो को छोड़कर बाकी कांग्रेस की सहायक बनने की बजाय बोझ बन जाएँ तो आश्चर्य नहीं होगा | तेलंगाना से टी.आर.एस , आंध्र से वाई.एस.आर कांग्रेस  और उड़ीसा से बीजू जनता दल उक्त बैठक में आये नहीं अथवा उनको बुलाया नहीं गया ये स्पष्ट नहीं है | तेलुगु देशम के चन्द्र बाबू नायडू भी  कांग्रेस की संगत का दंड भोग चुके हैं | भले ही तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक कांग्रेस के साथ है लेकिन वह भी कब पलटी मार जाए ये कहा नहीं जा सकता | कर्नाटक  से जनता दल ( एस ) भले आ गयी लेकिन अब देवगौड़ा परिवार का प्रभाव ढलान पर है | इस तरह देखें तो दो - चार नाम छोड़कर एक भी ऐसा नेता या दल नहीं है जिसके साथ आने से श्रीमती गांधी  2004 वाला करिश्मा दोहरा सकें  जब अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार को अप्रत्याशित रूप से पराजय का सामना करना पड़ा | तब भाजपा के पास अपने  बलबूते सरकार बनाने लायक ताकत नहीं होती थी लेकिन 2014 और 2019 में उसने खुद ही बहुमत हासिल कर एक मिथक तोड़ दिया | अटल जी के पराभव के उपरान्त भाजपा ने तो नरेंद्र मोदी के तौर पर वैकल्पिक चेहरा देश के सामने रखा , वहीं अपने संगठन में भी युवाओं को महत्व देते हुए अगली पीढ़ी के  नेताओं को तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू कर  दी किन्तु कांग्रेस सोनिया जी से बढ़कर पहले राहुल और प्रियंका पर आकर रुकी और फिर वापिस उन्हीं के पास लौट आई | हालांकि कल की बैठक के बारे में भाजपा का ये कहना निरर्थक है कि गठबंधन की कोशिश कर कांग्रेस ने अपनी हार स्वीकार कर ली क्योंकि भाजपा पूर्ण बहुमत के बाद भी उ.प्र में छोटे  – छोटे दलों के साथ गलबहियां किये हुए है | मोदी सरकार में भी अनेक छोटे दलों के मंत्री हैं | लेकिन कांग्रेस के साथ ये समस्या है कि वह चंद नेताओं की पार्टी बनकर रह गई है और उनमें से भी बहुतायत उनकी है जो गांधी परिवार के इर्द – गिर्द मंडराने को ही राजनीति मान बैठे हैं | जी – 23 नामक गुट में भी जनाधारविहीन नेता ही हैं | ये सब देखते हुए कहना गलत न होगा कि कांग्रेस भले ही कोशिश कर  रही हो लेकिन 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए  उ.प्र में भाजपा को सत्ता से अलग करना होगा किन्तु आज की स्थिति में कांग्रेस के लिए वैसा कर पाना असम्भव है | सपा – बसपा जैसी क्षेत्रीय ताकतें भी उसे बोझ मान रही हैं | यद्यपि विपक्ष में बैठीं तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ भाजपा को तो हटाना  चाहती हैं किन्तु वे कांग्रेस को भी दोबारा ताकतवर नहीं होने देना चाहतीं क्योंकि उसका पुनरोदय उनको अस्ताचल की ओर भेज देगा | श्रीमती गांधी भी ये जानती हैं कि शरद पवार , ममता बैनर्जी , अखिलेश यादव , मायावती और तेजस्वी यादव जैसे नेता कांग्रेस को मजबूत नहीं होने देंगे |  जहां तक राहुल गांधी का सवाल है तो आज विपक्ष की राजनीति में एम .के स्टालिन ,अखिलेश और तेजस्वी यादव के अलावा अरविन्द केजरीवाल जैसे नेता युवा वर्ग को ज्यादा आकर्षित कर पा रहे हैं | कपिल सिब्बल का ये तंज वाकई मायने रखता है कि भला पूर्णकालिक अध्यक्ष के बिना भी कोई पार्टी चलती है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 20 August 2021

तालिबान को चरित्र प्रमाणपत्र देने में जल्दबाजी गलत : कूटनीति में धैर्य सबसे बड़ा हथियार है



 क्रिकेट के खेल में अच्छा बल्लेबाज शॉट लगाने के लिए कमजोर गेंद का इंतजार करता है | महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर  नये बल्लेबाजों को ये नसीहत देते रहे  हैं कि गेंद के पीछे भागने की बजाय उसके बल्ले तक आने की प्रतीक्षा करना चाहिए | यही बात कूटनीति में भी बेहद कारगर है | इसीलिये किसी भी घटना के बारे में प्रतिक्रिया व्यक्त करते समय जल्दबाजी से बचा जाता है | दो देशों के बीच राजनयिक संबंधों में भी धैर्यपूर्वक आगे बढ़ने की नीति अपनाई जाती है | अति उत्साह में दिया गया आश्वासन और आकस्मिक नाराजगी दोनों कूटनीति के लिहाज से नुकसानदेह होते हैं | अफगानिस्तान में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन के बारे में भारत सरकार द्वारा अब तक किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं किये जाने की  पूर्व विदेश मंत्री और विदेश सचिव नटवर सिंह , पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और  वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने आलोचना करते हुए कहा है कि भारत को तत्काल तालिबान से बातचीत कर कूटनीतिक सम्बन्ध कायम करना चाहिए जिससे भविष्य में वहां भारत के हित सुरक्षित रहें | उनका इशारा अतीत में तालिबान की सत्ता के साथ हमारे कूटनीतिक रिश्ते न होने से कंधार विमान अपहरण कांड के समय बंधकों की रिहाई में आई अड़चनों की तरफ था | इस तरह का सुझाव और भी कुछ लोगों की तरफ से आया है | कतिपय मुस्लिम नेताओं के अलावा मुनव्वर राणा जैसे शायर ने भी तालिबान की तारीफ़ में कसीदे पढ़ते हुए उनको जीत की बधाई देने के साथ ही इस बात का प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया कि नये तालिबान शासक पुराने वालों से सर्वथा अलग होने से कट्टर नहीं हैं तथा भारत के प्रति उदार रहेंगे | उल्लेखनीय है काबुल पर तालिबान का आधिपत्य होते ही भारत ने अपने राजदूत सहित दूतावास के सारे कर्मचारियों को वापिस बुलवा लिया | हालाँकि तालिबान की ओर से आयोजित पहली पत्रकार वार्ता में काश्मीर को भारत – पाकिस्तान के बीच का मामला बताने के साथ ही ये आश्वासन भी दिया कि भारत द्वारा अफगनिस्तान में किये जा रहे काम जारी रखे जा सकते हैं किन्तु  उसके फौरन बाद ही ये खबर भी आ गई कि तालिबान के हुक्मरानों ने भारत के साथ होने वाले व्यापार को पूरी तरह रोक दिया है |  इससे जाहिर हो गया कि तालिबान की कथनी और करनी विरोधाभासी है | भारत में बैठे तालिबान के हमदर्द और प्रशंसक उसके ह्रदय परिवर्तन के बारे में चाहे जो कह रहे हों लेकिन वहां  से आ रही खबरें न सिर्फ भारतीय अपितु समूचे विश्व समुदाय को विचलित कर रही हैं | काबुल में ही तालिबान लड़ाकों ने आतंक का राज  स्थापित कर रखा  है | खुलेआम लूटखसोट होने के साथ ही बात – बात में गोली मारने की घटनाएँ सामने आ रही हैं | राजधानी से कुछ दूर निकलते ही तालिबान के लड़ाकों का राक्षसी रवैया नजर  आने लगता है | मासूम लड़कियों तक को हवस का शिकार बनाने के साथ ही युवतियों  को घरों से जबरन उठाकर उनकी नीलामी की जा रही है | पुरुषों से जान बख्शने की कीमत उनकी पत्नी के रूप में वसूली जा रही है | राह चलते लोगों को रोककर कीमती सामान छुड़ा लेना आम हो गया है | तालिबान के हथियारबंद गुंडे देश छोड़कर जाने के इच्छुक लोगों को काबुल हवाई अड्डे के भीतर नहीं जाने दे रहे | ऐसी ही घटना में एक महिला को जब हवाई अड्डे में जाने से रोका गया तो उसने  अपनी गोद में से बच्ची को ये कहते हुए भीतर फेंक दिया कि मेरा जो होगा वह होगा , कम से कम से ये तो दरिंदों से बच जायेगी | ये सब देखते हुए भी जो राजनेता , बुद्धिजीवी , पत्रकार और मुस्लिम  समुदाय के स्वयंभू प्रवक्ता भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं उनकी अक्ल पर तरस खाएं या नीयत पर शक करें ये फिलहाल तय नहीं किया जा सकता किन्तु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि या तो इन्हें तालिबान की असलियत नहीं पता या फिर ये सरकार के विरोध की आड़ में राष्ट्रीय हितों को नजरंदाज कर रहे हैं | मुनव्वर राणा ने तो तालिबान की तुलना रास्वसंघ और उसके अनुषांगिक संगठनों से कर अपनी खीझ निकाली परन्तु कांग्रेस के प्रवक्ता द्वारा भी सरकार की चुप्पी पर सवाल खड़े करना चौंकाने वाला है क्योंकि दशकों तक  देश की सत्ता में रही पार्टी को कम से कम इतनी समझ तो होनी ही चाहिए कि तालिबान के बदले हुए चरित्र की पुष्टि करने में समय लगेगा | और फिर भारत के लिए अफगानिस्तान में हुआ सत्ता परिवर्तन केवल उसका आंतरिक मसला न होकर हमारी सुरक्षा के लिए गम्भीर खतरा उत्पन्न करने वाला भी हो सकता है क्योंकि भारत विरोधी अनेक  इस्लामी आतंकवादी संगठन उस देश की धरती पर पल रहे है जिन्हें तालिबान का खुला  समर्थन और संरक्षण  है | इसके अलावा भारत के दो सबसे बड़े घोषित दुश्मन चीन और पाकिस्तान जिस तरह से तालिबान को हाथों – हाथ उठा रहे हैं वह देखते हुए भारत का अफगानिस्तान की नई सत्ता से रिश्ता बनाने में फूंक – फूंककर कदम उठाना पूरी तरह सही और बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन है | इस बारे में ये बात  भी विचारणीय है कि तालिबान की तरफ से भी भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने जैसी कोई पहल नहीं हुई | ऐसे में उसके द्वारा शराफत और मानवीयता का जो दावा किया जा रहा है उसकी असलियत परखे बिना कूटनीतिक रिश्ते कायम कर लेना धोखे और शर्मिंदगी का कारण बन सकता है | कूटनीति की साधारण समझ रखने वाला भी ये मानेगा कि अफगानिस्तान के नए सत्ताधीश तालिबान चाहे कितने भी सुधरे हुए हों लेकिन चीन और पाकिस्तान की संगत में रहने के बाद  वे भारत के प्रति भी सद्भावना रखेंगे ये भरोसा नहीं होता | ये सब देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा समूचे घटनाक्रम और उससे पैदा हुईं परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन करने के उपरांत ही कोई कदम उठाने की  रणनीति समयानुकूल है | और फिर कूटनीति परदे के पीछे चलने वाली सतत प्रक्रिया है जिसे रोज – रोज सार्वजानिक नहीं किया जा सकता |

 -रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 August 2021

खाद्य तेल: उत्पादन बढ़ाने के साथ ही शुद्धता और कीमत पर ध्यान देना भी जरूरी



भारत में हरित क्रांति के परिणामस्वरूप खाद्यान्न विशेष रूप से गेंहू , धान आदि का उत्पादन तो इतना होने लगा है जिसे हम निर्यात कर सकें | लेकिन दलहन और तिलहन की पैदावार जरूरत से कम रहने पर उनका आयात करना पड़ता है | इससे एक तो  आयात खर्च बढ़ता है और दूसरा देश के किसान को होने वाली कमाई विदेश चली जाती है | केंद्र सरकार बीते कुछ सालों से दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काफी प्रयास कर रही है | जिससे  दालों की पैदावार में तो मामूली ही सही लेकिन बढ़ोतरी हुई परंतु खाने वाले तेल का आयात किया जाता  है | विशेष रूप से पाम ऑयल बड़ी मात्रा में बुलाना पड़ता है , जिसका सबसे बड़ा निर्यातक मलेशिया है | इसे खाद्य तेल में मिलाने के कारण उनकी लागत कम हो जाती  है  | बीते कुछ समय से मलेशिया से हमारे रिश्ते तनावपूर्ण हैं  | कश्मीर और नागरिकता संशोधन विधेयक पर उसने टर्की के साथ मिलकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का खुला विरोध किया | यही नहीं तो  कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले जाकिर नाइक नामक इस्लामी  प्रचारक को अपने यहाँ शरण दे दी जो भारत में  आतंकवादी गतिविधियों का आरोपी है | उसके बाद से ही मोदी सरकार ने मलेशिया से पाम ऑयल का आयात पहले तो बंद कर दिया लेकिन बाद में उसकी मात्रा घटाते  हुए इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे दक्षिण एशियाई देशों से  खरीदी बढ़ा दी  | इस प्रकार केंद्र सरकार ने मलेशिया की अकड़ कम करते हुए पाम ऑयल के आयात हेतु  वैकल्पिक स्रोत तलाश लिए लेकिन अब खाद्य तेल संबंधी आत्मनिर्भरता अर्जित करने हेतु राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन का शुभारम्भ कर 11000 करोड़ की बड़ी राशि का प्रावधान भी कर दिया | भारत के  12 तटीय राज्यों में पाम खेती की संभावनाएं हैं जिनका मौसम दक्षिण एशिया के उक्त देशों जैसा ही है | इस मिशन के अंतर्गत पाम  खेती का  रकबा 10 लाख हेक्टेयर तक किये जाने का लक्ष्य है जिसके लिए किसानों को प्रति हेक्टेयर मौजूदा 12 हजार रु. प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 29 हजार रु. प्रति हेक्टेयर की सहायता दी जावेगी | खर्च यदि कमाई से ज्यादा हुआ तब उसकी क्षतिपूर्ति का प्रावधान भी रखा गया है | एक अध्ययन से ज्ञात हुआ कि देश में पाम खेती का रकबा 28 लाख हेक्टेयर तक किया जाना संभव है और ऐसा होने के बाद भारत से पाम ऑयल का निर्यात हो सकेगा क्योंकि अफ्रीकी और यूरोपीय देशों को भारत से पाम ऑयल मंगाना दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में सस्ता पड़ेगा  | हालाँकि निर्यात की स्थिति आने में तो फ़िलहाल समय लगेगा लेकिन यदि मिशन की उम्मीद के मुताबिक  2025 तक पाम खेती का रकबा लक्ष्य को छू सके तो खाद्य तेल के आयात से बचने की स्थिति तो बन ही सकती है  | राजनीतिक मुद्दों से परे  हटकर देखें तो इसमें संदेह नहीं है कि केंद्र  सरकार का यह  निर्णय देश के दूरगामी हितों के संरक्षण में सहायक होगा | वैसे भी हमारा देश कृषि प्रधान है और  अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान सर्वविदित है | बीते दो वर्ष में कोरोना जैसी आपदा  के कारण जब समूचा उद्योग और व्यापार तकरीबन ठप्प पड़ गया था तब भारत के किसानों ने खेतों में जो परिश्रम किया उसी के कारण 80 करोड़ लोगों को  मुफ्त और सस्ता अनाज बांटने जैसा जनहितकारी कार्य संभव हो सका  | वरना  बेरोजगार हुए गरीब अराजकता पर उतारू हो  सकते थे  | देश में बीते एक साल के भीतर खाद्य तेल के दाम जिस तेजी से बढ़े उसके मद्देनजर राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन एक क्रन्तिकारी कदम है | पाम के साथ ही  सरसों , तिली , मूंगफली और नारियल आदि के उत्पादन पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए जो खाद्य  तेलों के  परम्परागत स्रोत हैं | वैसे एक शिकायत ये भी है कि आयातित पाम ऑयल की मिलावट स्वीकृत मात्रा से ज्यादा खाद्य तेलों में करते हुए अनाप – शनाप मुनाफा तेल उत्पादकों ने अर्जित किया | वहीं इससे  गुणवत्ता भी घटी | खाद्य तेलों की शुद्धता वाकई बहुत बड़ा मुद्दा है जिसका सीधा  सम्बन्ध जनस्वास्थ्य से है | राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन ने  देश में उत्पादन बढ़ाकर आयात को घटाने का जो संकल्प लिया वह समय की मांग है | लेकिन उसे शुद्धता के बारे में भी सख्ती बरतनी होगी क्योंकि आम तौर पर ये देखने में आया है कि निर्यात के लिए बनाये जाने वाले सामान की गुणवत्ता तो वैश्विक मानकों के अनुरूप रहती है जबकि घरेलू उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराया जाने वाला वही सामान तुलनात्मक रूप से उतना अच्छा नहीं होता | बहरहाल इस नये प्रयास की शुरुवात शुभ संकेत है | लेकिन इसके साथ ही सरकार को खाद्य तेलों के दामों में हो रही बेतहाशा वृद्धि को भी रोकना चाहिये जिसने आम जनता का बजट बिगाड़  रखा  है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

 

Wednesday, 18 August 2021

अच्छी – अच्छी बातों के बावजूद तालिबान पर भरोसा नहीं किया जा सकता



काबुल पर कब्जा कर लेने के बाद जब तालिबान नेताओं को लगा कि विश्व बिरादरी ही नहीं  अफगानिस्तान की जनता भी उनसे भयभीत है तो उसके प्रवक्ता ने  अनेक अच्छी – अच्छी बातों के साथ ही इस तरह के आश्वासन भी दिए  जिनसे ये लगे कि वह अब पहले जैसा नहीं रहा | महिलाओं को काम पर लौटने के साथ ही अफगानी  नागरिकों से देश नहीं छोड़ने की  अपील भी  की गई | समाचार माध्यमों को अपनी आलोचना की छूट भी तालिबान ने देने की बात कही  बशर्ते वे इस्लामिक गतिविधियों को भी समुचित महत्व दें | महिलाओं के अधिकारों और सम्मान के प्रति  तालिबान शासन की प्रतिबद्धता व्यक्त करने के साथ ही ये शर्त भी जोड़ दी गयी कि उन्हें इस्लामी तौर – तरीकों का पालन करना होगा | भारत को वहां अपना कारोबार जारी रखने की छूट देते हुए तालिबान ने  कश्मीर विवाद को भारत – पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मामला  बताकर  संकेत दिया कि वह इससे दूर रहेगा | सबसे बड़ी बात ये कही गई कि अफगानिस्तान  की धरती का उपयोग किसी और देश के विरुद्ध किये जाने की अनुमति नहीं दी जायेगी | अपना उदारवादी रूप दिखाते हुए  ऐलान  किया गया कि नई सत्ता ने उसका विरोध करने वालों को भी माफ़ कर दिया है और किसी के विरुद्ध कोई  कार्रवाई नहीं की जायेगी |  हालाँकि  प्रवक्ता ने हर बात में ये जरूर जोड़ा कि उनका देश इस्लामिक व्यवस्था से संचालित होगा और सबको उसी के अनुरूप चलना होगा |  अर्थात जिन आजादियों का आश्वासन दिया गया वे सब सशर्त हैं और इस्लामी कानूनी और सामाजिक व्यवस्था ही वहां हावी रहेगी | दरअसल तालिबान की वापिसी पर जिस प्रकार की प्रतिक्रिया दुनिया भर में हुई उसने इस कट्टरपंथी संगठन को चिंता में डाल दिया | पश्चिम  एशिया में हो रहे खून - खराबे के बावजूद आईएसआईएस अब तक कामयाब नहीं हो सका जबकि युद्ध की विभीषिका ने अरब जगत के अनेक देशों की आर्थिक स्थिति खराब कर दी | अफगानिस्तान वैसे भी बहुत ही गरीब है | उस लिहाज से बीते बीस साल में विकास का जो दौर शुरू हुआ है यदि उस पर विराम लग गया तब  देश के भीतर तालिबान को विरोध का सामना करना होगा  |  | नए सत्ताधीशों को ये खौफ भी है कि बड़ी संख्या में देश छोड़कर जाने वाले अफगानी नागरिक  तालिबान की सत्ता के विरुद्ध विश्व जनमत को प्रभावित कर सकते हैं | बीते दो – तीन दिन में तालिबान लड़ाकों  द्वारा महिलाओं के साथ किये गये आपत्तिजनक व्यवहार की खबरें जिस तेजी से आईं उसके कारण पूरी दुनियां में  नई सत्ता के प्रति गुस्सा देख़ने मिला | मानवाधिकारों की रक्षा को लेकर तो इस संगठन की छवि पहले से ही  खराब रही है | तालिबान के प्रमुख नेताओं को ये फ़िक्र भी है कि चीन और पाकिस्तान से मिला खुला समर्थन उनके लिए मुसीबत न बन जाये क्योंकि बीते दो दशक में वहां जो युवा पीढ़ी पनपी वह धार्मिक कट्टरता को आसानी से पचा नहीं सकेगी | शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं को मिले अवसर छीनने पर भी अंदर ही अंदर विरोध पनपेगा | तालिबान नेताओं को एक बात समझ में आने तो लगी है कि विश्व जनमत की उपेक्षा करने पर वे  अलग -  थलग पड़ जायेंगे और उस स्थिति में फिर से महाशाक्त्तियाँ अफगानिस्तान पर शिकंजा कस सकती हैं | आर्थिक प्रतिबंध की आशंका भी बनी हुई है | हालाँकि ये बात भी कूटनीतिक क्षेत्रों में सुनी जा रही है कि अफगानिस्तान से अमेरिका द्वारा अपना डेरा जिस तरह उठाया गया और तालिबान टहलते  हुए काबुल तक चले आये वह उनके और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाईडन  के बीच हुए किसी गोपनीय समझौते का परिणाम है | और इसीलिये इस्लामी कट्टर छवि को धोने के लिए तलिबान की ओर से चिकनी – चुपड़ी बातें की जा रही हैं | लेकिन उन  बातों पर उसके देश के ही लोग भरोसा करने राजी नहीं हैं | इसका प्रमाण देश छोड़कर भागे अफगानी पुरुषों और  महिलाओं द्वारा व्यक्त की जा रही बातों से मिलता है | ये बात भी सामने आ रही है कि काबुल  के पहले जिन – जिन इलाकों पर तालिबान काबिज होते गये वहां उन्होंने जमकर लूटमार की और महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाया | इसीलिये दुनिया भर में रह रहे अफगानी अपने उन परिजनों की खैरियत को लेकर चिंतित हैं जो अब तक देश में ही  रह रहे हैं | तालिबान द्वारा गत दिवस आश्वासनों का जो पिटारा खोला गया उनकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है | पिछली सरकार के लोगों को माफी और महिलाओं को सरकार में शामिल होने के न्यौते के अलावा अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से जुड़ने की उसकी चाहत के पीछे ईमानदारी कितनी है ये पक्के तौर् पर कोई नहीं कह पा रहा | इसीलिये भले ही चीन ने उसे मान्यता दे दी और पाकिस्तान भी बेशक उसका अनुसरण करेगा किन्तु विश्व की बाकी बड़ी आर्थिक शक्तियां जब तक उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं करेंगी तब तक तालिबान अलग – थलग ही  रहेगा | जहाँ तक भारत का सवाल है तो भले ही उसके प्रवक्ता  ने कितनी भी अच्छी बातें की हों लेकिन चीन और पाकिस्तान के साथ नजदीकी रखने के बाद वह भारत के प्रति लचीलापन दिखायेगा ये मान लेना अपने आप को धोखा देना होगा | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 August 2021

बलूचिस्तान और तिब्बत की आजादी का मुद्दा उठाने का सही मौका



अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा अब एक सत्य है | पूरी दुनिया काबुल हवाई अड्डे के वे दृश्य देखकर मर्माहत है जिनमें देश छोड़ने के लिए जमा भीड़ ने उड़ान भरते हुए हवाई जहाज से लटकने तक का दुस्साहस किया  |  विमान के पहियों वाली जगह घुसकर बैठ गए तीन लोग ऊँचाई पर उसके पहुंचते ही नीचे आ गिरे | दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रह रहे अफगानी  नागरिक विशेष रूप से महिलाएं और युवा  मुल्क के अचानक कट्टरपंथियों के शिकंजे में आने से दुखी और चिंतित हैं | उनको लग रहा है कि बीते २० सालों  में अफगानी समाज   में जो सकारात्मक  बदलाव आये तथा महिलाओं को शिक्षा के साथ ही रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ने के  अवसर मिले , वे शायद ही जारी रहें | दुनिया भर से वहां  के हालात पर  चिंता व्यक्त की जा रही है लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान सहित अनेक राष्ट्रप्रमुखों के मुताबिक अफगानिस्तान ने आजादी हासिल की है | उनका आशय अमेरिका की सेनाओं के  पलायन से है जिसे इस्लामी जगत  महाशक्ति की  पराजय निरुपित कर रहा है  | भारत में भी ऐसी  सोच रखने वाले कम नहीं हैं | सपा सहित कुछ और पार्टियों के मुस्लिम नेताओं ने तालिबान की  जीत पर खुशी व्यक्त की है | टीवी चैनलों की बहस में शामिल अनेक मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने तालिबान के राज में कट्टरपंथ का बोलबाला होने की बात को नजरंदाज करते हुए भारत को इन्तजार करो और देखो की नीति पर चलने की सलाह भी दे डाली | ऐसे लोगों को इस बात की तनिक भी परवाह नहीं है  कि तालिबान की  सत्ता पाकिस्तान और चीन द्वारा पोषित रहने से भारत के लिए नुकसानदेह रहेगी | इन तीनों की जुगलबंदी से  हमारी सीमाओं पर संकट के बादल और घने हो सकते हैं | चूँकि चीन ने तालिबान का समर्थन कर दिया है इसलिए भारत का वामपंथी तबका भी तालिबान की विजय को लेनिन और माओ की  क्रान्ति का प्रतिबिम्ब मान रहा है | सही बात ये है कि जो लोग अफगानिस्तान में तालिबान की वापिसी का जश्न मना रहे हैं उनमें से अधिकांश दरअसल अमेरिका विरोधी मानसिकता से ग्रसित हैं | लेकिन जब बात अफगानिस्तान के लोगों को अमेरिका के दखल  से आजादी मिलने पर खुश होने की है तो उसमें वह रूस भी शामिल है जो सोवियत संघ के तौर पर  कई  साल तक अफगानिस्तान में अपनी फौजें उतारकर तालिबान से लड़ता रहा और आखिर में उसी तरह मैदान छोड़कर भागा था जैसे हाल ही में अमेरिकी सेनाएं वहां से निकलने को मजबूर हुईं | लेकिन जो चीन और पाकिस्तान आज अफगानिस्तान में अमेरिका की हार को आजादी की जीत बता रहे हैं क्या वे खुद क्रमशः बलूचिस्तान और तिब्बत पर बलात कब्जा कर दमनचक्र चलाने के अपराधी नहीं हैं ? १९४७ में भारत के बंटवारे के समय तक बलूचिस्तान एक स्वतंत्र इकाई था , जिसका विभाजन के दस्तावेज में कोई उल्लेख नहीं था | लेकिन पाकिस्तान ने उस पर जबरन कब्जा  जमा लिया | दुनिया भर में फैले बलूच पाकिस्तान  के विरुद्ध आवाज उठाते हैं | संरासंघ तक में उसकी आजादी का मसला चर्चा में आया है | इसी तरह चीन में साम्यवादी शासन आते ही उसने तिब्बत नामक स्वतंत्र देश पर सैन्यबल से आधिपत्य जमा लिया | वहां की सत्ता बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के हाथ थी जो अपने भरोसेमंद सहयोगियों के साथ हिमालय के दुर्गम रास्तों से पैदल चलते हुए भारत आये जिसने उन्हें राजनीतिक शरण तो दी लेकिन तिब्बत पर चीन के अवैध कब्जे को भी मान्यता देकर अपने पैर में कुल्हाड़ी मार ली | तत्कालीन नेहरु सरकार का वह नीतिगत निर्णय पूर्णरूपेण विरोधभासी रहा | तिब्बत को उसका क्षेत्र मानने का एहसान जताना तो दूर रहा लेकिन दलाई लामा को शरण देकर वहां  की निर्वासित सरकार का मुख्यालय भारत में कायम किये  जाने की  अनुमति से भन्नाकर चीन ने पं. नेहरु के हिन्दी – चीनी भाई – भाई के नारे और पंचशील नामक समझौते को रद्दी की टोकरी में फेंकते हुए १९६२ में भारत पर हमला कर दिया | हमारी सेनाएं चूँकि उस  समय तक इतनी साधन सम्पन्न नहीं थीं इसलिए मुकाबला करने में असफल रहीं और उसने हमारी हजारों वर्गमील जमीन कब्जा ली | आज जब चीन और पाकिस्तान ,  अफगानिस्तान में  अमेरिकी हस्तक्षेप के खत्म होने पर फूले नहीं समा रहे तब भारत को भी आक्रमण ही सर्वोत्तम सुरक्षा की नीति पर चलते हुए  तिब्बत और बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन का मामला विश्व मंच पर उठाना चाहिए | कुछ लोगों का मानना है कि ऐसा करने पर चीन और पाकिस्तान कश्मीर में जनमत संग्रह का मामला उठा सकते हैं | लेकिन अब तो संरासंघ भी इससे अपना पल्ला झाड़ चुका है और फिर  भारत ने कश्मीर पर बलात कब्जा नहीं किया अपितु भारतीय संघ में उसके विलय के बावजूद पाकिस्तान ने उस पर हमला करते हुए एक तिहाई हिस्सा कब्ज़ा लिया | तालिबान की वापिसी के बाद वैश्विक राजनीति विशेष रूप से एशिया के शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आ सकता है | इसके पहले कि भारत पूरी तरह असहाय और अप्रासंगिक हो जाए हमें भी कूटनीतिक चालें तेज करनी चाहिए | प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने कुछ साल पहले लालकिले से बलूचिस्तान के लोगों के संघर्ष के प्रति भारत की हमदर्दी दिखाई तो पूरी दुनिया में वह मुद्दा  गरमा उठा था | ये सही मौका है जब भारत को तिब्बत और बलूचिस्तान की आजादी के संघर्ष को खुला समर्थन देना चाहिए | चीन और पाकिस्तान से हमारे रिश्ते वैसे भी तनावपूर्ण हैं जिनके सुधरने के आसार  भी दूरदराज तक नहीं हैं | पाकिस्तान के अंदरूनी हालात और आर्थिक स्थिति बहुत ही  जर्जर है वहीं चीन भी ताईवान के अलावा दक्षिणी समुद्र पर आधिपत्य को लेकर अमेरिका , जापान , ऑस्ट्रेलिया , वियतनाम , दक्षिण कोरिया आदि के विरोध का सामना कर रहा है जिसमें भारत भी  शामिल है | कूटनीति में अवसर बेहद महत्वपूर्ण होता है | दलाई लामा वयोवृद्ध हो चुके हैं और उनके सहयोगियों की वैश्विक स्तर पर वैसी स्वीकार्यता और सम्मान नहीं है | ऐसे में भारत को बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के कूटनीतिक मोर्चा खोलना चाहिए | तालिबान की छवि दुनिया की निगाहों में अच्छी नहीं है जिसका लाभ भारत को उठाना चाहिए क्योंकि अपने पाँव जमाते ही वह हमारे लिए मुसीबत बने बिना नहीं रहेगा |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 August 2021

आज की राजनीति में अटल जी का अभाव बहुत खलता है : आज उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक कोई नहीं - आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी



आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तृतीय पुण्य तिथि है | आजाद भारत में एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र  थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर जैसी लोकप्रियता हासिल हुई | लेकिन नेहरू जी और इंदिरा जी सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनका सम्मान प्रधानमन्त्री से कम नहीं था | इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीतिक थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें उनसे पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही सादगी से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | 

विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुआ लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि ढ़ी वह आज भी उद्धृत की जाती  है | नेहरू जी ने उनकी तेजस्विता को भांपते हुए भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | 

हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में उनके  विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी  वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान अर्जित करने।का उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि  व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह किया करती थीं  |

आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - 
बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने , 
तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - 
कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  
खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें ,
कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चूका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

उन्हें गये तीन वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |