Wednesday, 1 September 2021

नेता-नौकरशाहों के गठजोड़ की नींव पर खड़े हैं भ्रष्टाचार के टॉवर



दिल्ली का हिस्सा  बन चुके  नोएडा में सुपरटेक नामक नामी बिल्डर द्वारा निर्मित 40 मंजिला दो टॉवर गिरवाने का जो आदेश अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिया था उसे सर्वोच्च न्यायालय ने बहाल करते हुए टॉवर गिराने के साथ ही उसमें फ्लैट खरीदने वालों को ब्याज  सहित मुआवजा देने का आदेश भी दे दिया। इमारत गिराने का खर्च भी बिल्डर को ही वहन करना होगा। इन टॉवर्स के निर्माण में नियम-  शर्तों का उल्लंघन होने का आरोप था जिसे उच्च और सर्वोच्च न्यायालय ने सही मानते हुए उक्त आदेश दिया। अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध निर्माण में बिल्डर और भवन निर्माण की स्वीकृति देने से संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत पर भी टिप्पणी की। ये पहला अवसर नहीं है जब किसी अवैध निर्माण को धराशायी करने के आदेश न्यायालय ने दिए हों किन्तु 40 मंजिल के दो जुड़वा टावर्स को गिरा देने का सम्भवतः ये पहला मामला होगा। इनमें पैसा निवेश  करने वालों  की संख्या एक हजार से ज्यादा बताई जाती है। अवैध निर्माण के नाम पर तोड़ी जाने वाली ये इमारतें एक दिन में तो खड़ी नहीं हुई होंगी । इतने बड़े निर्माण पर नजर रखना सरकारी विभागों के अधिकारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है लेकिन ये बात केवल दिल्ली के सुपरटेक बिल्डर से जुड़ी हो ऐसा नहीं है क्योंकि पूरे देश में बनने वाले आवासीय एवं व्यावसायिक निर्माण में अनियमितताएं होती हैं । और इसका कारण है स्थानीय निकायों में बैठे नौकरशाहों का भ्रष्ट रवैया। निर्माण कार्य की स्वीकृति देने वाले विभागों का ये दायित्व होता है कि वे विभिन्न स्तरों पर उसका निरीक्षण करते हुए देखें कि सब कुछ  नियमानुसार हो रहा है अथवा नहीं ? ऐसे में  छोटा सा निर्माण भी बिना सरकारी अधिकारियों की जानकारी के नहीं हो सकता। ऐसे में देश की राजधानी के बगल में 40 - 40 मंजिल की दो अट्टालिकाएं नियम विरुद्ध खड़ी होती रहीं और किसी ने उनका संज्ञान न लिया हो ऐसा मानना  सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा । सर्वोच्च न्यायालय ने बिल्डर और अधिकारियों की मिलीभगत की जो बात कही वह तो जगजाहिर है। ऐसे में अवैध निर्माण के लिए जितना दोषी भवन निर्माता बिल्डर है उतना ही वे सरकारी अधिकारी भी जिनकी भ्रष्ट कार्यप्रणाली के कारण बिल्डर बिना डरे नियम - कानूनों की धज्जियां उड़ाता रहा । ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय  ने टॉवर तोड़ने का जो आदेश दिया उसके साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों को भी ऐसी सजा मिलनी चाहिए जिससे कि भविष्य में ऐसी हिमाकत किसी की न हो । अन्यथा किसी निर्मित भवन को धरशायी करना राष्ट्रीय सम्पत्ति का नुकसान है। सही बात ये है कि कानून के प्रति भय यदि नहीं है तो इसकी बड़ी वजह वह नौकरशाही भी है जिसके कंधों पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी है। इसी कारण से पूरे देश में अवैध निर्माणों की संस्कृति विकसित हो गई। सुपरटेक ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध पुनरीक्षण  याचिका दायर करने की बात भी कही है । हो सकता है न्यायालय कुछ राहत दे दे किन्तु जब तक ऐसे मामलों से जुड़े भ्रष्ट अधिकारियों को कड़ा दंड नहीं दिया जाता तब तक ये प्रवृत्ति जारी रहेगी।  बेहतर होगा इस बारे में न्यायालय के फैसलों तक इंतजार करने के बजाय अवैध  निर्माण की संस्कृति की जड़ में मठा डालने का प्रयास हो। सुपरटेक तो केवल एक उदाहरण है । यदि व्यापक सर्वेक्षण किया जाए तो अवैध निर्माण के अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे। ये बुराई राजनीतिक संरक्षण के कारण और तेजी से फैली क्योंकि इस देश में जितने भी अवैध कार्य होते हैं उनमें नौकरशाह और नेताओं के गठजोड़ की बड़ी भूमिका है। सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकारियों पर तो तीखी टिप्पणी की किन्तु नेताओं के बारे में वह मौन रहता है । समय आ गया है जब इस गठजोड़ को धराशायी किया  जाए क्योंकि इसी नींव पर भ्रष्टाचार के अनगिनत टॉवर खड़े हुए हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 31 August 2021

जाते – जाते अमेरिका ने गृहयुद्ध के हालात बना दिए अफगानिस्तान में



आख़िरकार अमेरिका ने अफगानिस्तान पूरी तरह छोड़ दिया | गत रात्रि 12 बजे के पहले ही उसके बचे हुए सैनिक और राजनयिक विमानों के जरिये काबुल से निकल गये | वहां  से जुड़े कूटनीतिक मसले अब वह कतर की राजधानी दोहा  से संचालित करेगा | उसके काबुल छोड़ने के दौरान आईएस ( इस्लामिक स्टेट ) ने राकेटों से हवाई अड्डे पर हमला किया | हालांकि कोई जनहानि नहीं  हुई किन्तु अफगानिस्तान के भीतरी हालात अनियंत्रित होने का संकेत जरूर मिल गया | यद्यपि गोलियां तालिबान के लोगों ने भी चलाईं लेकिन वे अमेरिकी विमान काबुल की  हवाई पट्टी से उड़ जाने के बाद चलीं जिनकी  वजह से नगरवासी दहशत में आ गये | लेकिन तालिबान की तरफ से तत्काल ये ऐलान कर  दिया गया कि वैसा अमेरिका के पूरी तरह से देश छोड़ने के जश्न  स्वरूप किया गया था | लेकिन आईएस द्वारा  अमेरिकी दस्तों की मौजूदगी में ही राकेट दागे जाने का मकसद पूरी दुनिया को ये बताना था कि अफगानिस्तान में तालिबान का  एकाधिकार भ्रम है | ये बात बिलकुल सही है कि अमेरिका द्वारा अपनी सेनाएं वापिस बुलाने की प्रक्रिया शुरू होते ही तालिबान की तरफ से उसके किसी सैनिक , नागरिक अथवा राजनयिक पर हमला नहीं किया गया | बीते सप्ताह काबुल हवाई अड्डे के बाहर हुए बम धमाके भी  आईएस  की कारस्तानी थे जिसे उसकी तरफ से स्वीकार भी किया गया | गत रात्रि दागे गये रॉकेट की जिम्मेदारी लेने में भी उसने न संकोच किया  और न ही देर  लगाई | उधर अमेरिका ने भी  डेरा उठाने के पहले ही ड्रोन हमलों के जरिये अपनी मौजूदगी जारी रहने की बात  साबित कर दी है | राष्ट्रपति जो बाईडन ने भी ऐलान कर दिया है कि अमेरिका सहित बाकी नाटो देश अफगानिस्तान में सक्रिय आईएस के विरुद्ध जंग जारी रखेंगे | इस बारे में ये जिज्ञासा सहज रूप से उठ  खड़ी हुई है कि आखिर अमेरिकी ड्रोन कहाँ से संचालित हो रहे हैं ? और इसका जवाब है पाकिस्तान में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे | इस बारे में ज्ञात हुआ है कि अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ज्योंही  तालिबान से समझौता वार्ता प्रारम्भ की त्योंही उनके देश ने पाकिस्तान के भीतर अपने एक सैन्य अड्डे को और उन्नत बनाते हुए अफगानिस्तान पर नजर रखने का इंतजाम कर दिया था | वैसे भी ये अब तक रहस्य बना हुआ है कि अमेरिका ने इतनी जल्दी अपने सैनिक अफगानिस्तान से क्यों हटा लिए ? और फिर जब उसे ये अच्छी तरह मालूम था कि वह मुल्क छोड़ना है तब उसने बहुत बड़ी संख्या में बेशकीमती  अत्याधुनिक हथियार , बख्तरबंद गाड़ियाँ , हेलीकाप्टर और लड़ाकू विमान वहाँ क्यों छोड़ दिए ? जबकि वह जानता था कि ये जखीरा तालिबान के अलावा वहां सक्रिय अन्य आतंकवादी संगठनों के हाथ लग जायेगा  | इस बारे में ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि भले ही अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी सैन्य उपस्थिति खत्म करते हुए उसे तालिबान के सुपुर्द कर दिया लेकिन उसकी रूचि और दखल परोक्ष तौर पर जारी रहेगा | ये बात पूरी दुनिया जानती है कि तालिबान मूलतः अमेरिका की अवैध संतान ही हैं | यही नहीं तो कुछ और इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को भी वही दाना – पानी देता है | ऐसे में ये सोचना गलत न होगा कि जिसे लोग अमेरिका की पराजय मान रहे हैं उसके पीछे भी कोई दूरगामी रणनीति हो | वरना उसके पास इतने संसाधन हैं कि वह अपना छोटे  से छोटा सामान उठा ले जाता | और फिर समझौते में तय की गई तारीख से पहले ही अफगानिस्तान से वापिसी शुरु कर देना , सरकारी सेना का अघोषित आत्मसमर्पण तथा राष्ट्रपति अशरफ गनी का रहस्यमय तरीके से देश छोड़कर चल देना भी किसी पूर्व नियोजित कार्ययोजना का हिस्सा  लगता है | इस्लामी जगत में जो अमेरिकी प्रभाव वाले देश हैं उनका अफगानिस्तान के प्रति ठंडा रवैया भी विश्लेषण का विषय है |  जहाँ तक बात पाकिस्तान की है तो वह भी  तालिबान को निरंकुश नहीं  होने देना चाह रहा  जिसका प्रमाण काबुल पर तालिबान का कब्जा होते ही आईएस का धमाकेदार अंदाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना है | कुल मिलाकर ये कहा  जा सकता है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेनाएं भले ही वापिस बुलवा लीं किन्तु वह तालिबान को भी चैन से नहीं बैठने देगा | इसके पीछे उसकी चिंता ये है कि चीन  और रूस जिस तरह तालिबान  के साथ रिश्ते जोड़ने को आतुर हैं वह वाशिंगटन को पसंद नहीं है | जहाँ तक बात अफगानिस्तान में बहुमूल्य खनिज संपदा के दोहन की है तो अमेरिका को पता है कि कबीलाई प्रभुत्व के चलते ऐसा करना आसान नहीं होगा | लेकिन अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए ही चीन और रूस वहां अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं | जिस तरह से ईरान के साथ अमेरिका की तनातनी चली आ रही है उसे देखते हुए अफगानिस्तान एक बार फिर वैश्विक राजनीति का मोहरा बन सकता है | अमेरिका पिछले 20 साल तक वहां रहने के बाद भी जो न कर सका वह अब बाहर  निकलकर करना चाहेगा | और इसके लिए जरूरी है कि इस  देश को अशांत बनाकर  गृहयुद्ध की आग में जलने छोड़ दिया जाए | यहाँ एक बात और भी है कि चीन और रूस के बीच भी अविश्वास बना रहता है | बीजिंग में बैठे हुक्मरानों की अतृप्त महत्वाकांक्षाओं के अलावा  मध्य एशियाई देशों में चीन की बढ़ती रूचि से रूस बेहद चौकन्ना है | ऐसे में उन दोनों का एक साथ अफगानिस्तान में सक्रिय होना भी नये तनाव को जन्म  दे सकता है | जो नये हालात बने हैं उनमें अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता ही भारत के हित में हैं क्योंकि तालिबान यदि पूरी तरह काबिज होकर पूरे देश का समर्थन हासिल कर सके तो ये हमारे लिए खतरनाक होगा | तालिबान की हुकूमत को जितनी ज्यादा चुनौतियां वहां मौजूद दूसरे आतंकवादी  गुट देंगे उतना ही पाकिस्तान का सिरदर्द बढ़ेगा | आखिरकार ये सांप भी तो उसी के पाले हुए हैं | इसीलिये फ़िलहाल  भारत ने देखो और प्रतीक्षा करो की जो नीति अपना रखी है वही उचित प्रतीत होती है | 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 28 August 2021

केरल की खबरों से पूरे देश को सतर्क हो जाना चाहिए



कोरोना की तीसरी लहर को लेकर चिकित्सा जगत  में वैसे तो मतभिन्नता रही किन्तु एक बिंदु पर सभी सहमत थे कि कोरोना का तीसरा हमला होगा जरूर । हालांकि उसकी तीव्रता और भयावहता के बारे में जरूर अनिश्चितता व्यक्त होती रही। उसके आने और चरम पर पहुँचने के प्रति भी चिकित्सक अलग - अलग अभिमत रखते रहे। आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं ने भी इस बारे में कुछ भविष्यवाणी कीं। आम जनता के मन में यद्यपि अदृश्य भय तो है लेकिन जैसा परिदृश्य  आम तौर पर दिखाई देता है  उससे तो लगता था जैसे वह मान बैठी है कि कोरोना का काम - तमाम हो चुका है। मास्क और शारीरिक दूरी जैसी सावधानियों की भी उपेक्षा साफ दिखने लगी । दूसरी लहर के कमजोर पड़ते जाने और टीकाकरण अभियान के गति पकड़ने से  भी कोरोना से डर के बावजूद भी लापरवाही बढ़ने लगी। ओणम और रक्षाबंधन जैसे त्यौहारों पर बाजारों में उमड़ी भीड़ से भी आशंकाओं के बादल उमड़ने लगे। शुरू - शुरू में ये भी कहा गया कि ये सब दवाई बेचने वाली कंपनियों का खेल है जो  कोरोना काल में लोगों का भयादोहन करते हुए जमकर कमाई कर चुकी थीं । लेकिन बीते कुछ  दिनों से कोरोना संक्रमण में जिस तेजी से वृद्धि हो रही है वह खतरे की घण्टी है। बीते दिन नए मरीजों का आंकड़ा 46 हजार पार कर गया जो अप्रत्याशित  होते हुए भी वास्तविकता है। सबसे चौंकाने वाली बात ये कि इनमें से दो - तिहाई  मामले अकेले केरल के हैं । कोरोना की पिछली दो लहरों में  महाराष्ट्र सबसे आगे रहा था। केरल में ओणम के समय दी गई छूट का दुष्परिणाम अब जाकर सामने आ रहा है । लेकिन इसके बाद ये आशंका प्रबल हो रही है कि  रक्षाबंधन के त्यौहार पर  बाजारों में जो बेतहाशा भीड़ दिखाई दी उसका  असर आने वाले दिनों में देखने मिलेगा। और यदि ऐसा हुआ तब दूसरी लहर के बाद अर्थव्यवस्था की जो गाड़ी पटरी पर आ रही थी वह फिर उतर सकती है। एक तरफ तो विभिन्न राज्य सरकारें शैक्षणिक संस्थान खोलने की तैयारी कर रही हैं वहीं दूसरी तरफ  कोरोना की तीसरी लहर  का प्रकोप दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञ ये भी कह रहे  हैं कि देश में टीकाकरण जिस तेजी से होता जा रहा है उसे देखते हुए  तीसरी लहर का प्रकोप उतना घातक नहीं होगा जितना दूसरी का था।  ऑक्सीजन की मारामारी भी नहीं है और अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या भी पहले से काफी अधिक है । ये भी कहा जा रहा है कि मृत्युदर भी ज्यादा नहीं रहेगी क्योंकि तीसरी लहर में कोरोना  पूर्ववत गम्भीर नहीं रहेगा इसलिए अस्पताल में भर्ती हुए बिना भी मरीज घर पर ही इलाज करवाकर स्वस्थ हो जाएंगे । बावजूद इस सबके कोरोना को लेकर किसी भी प्रकार की अनदेखी महंगी पड़ सकती है क्योंकि जो आंकड़े आ रहे हैं उनमें मरने वालों की संख्या 500 के करीब है। ये देखते हुए इस बात की जरूरत है कि कोरोना से बचाव हेतु जो मूलभूत  सावधानियां बताई गईं उनका पालन गम्भीरता से किया जावे। केरल में जिस बड़े पैमाने पर कोरोना का संक्रमण देखने मिल रहा है वह ओणम के दौरान लोगों ने जिस लापरवाही का  प्रदर्शन किया , उसका परिणाम है । ये देखते हुए पूरे देश में कोरोना से बचाव के प्रति गम्भीरता बरती जानी चाहिए। आने वाले दिनों में त्यौहारों की श्रृंखला शुरू होने वाली है। इस दौरान बाजारों में भीड़ बढ़ेगी । इसलिए जरूरत इस बात की है कि कोरोना की तीसरी लहर के प्रति उतनी ही सावधानी रखी जाए जितनी पहले सुझाई गई थी। कोरोना की पहली और दूसरी लहर तक जो अनभिज्ञता थी वह अब नहीं रही । इसलिए अब अपेक्षा है कि लोग पूरी तरह सतर्क हो जाएं । केरल से आ रही खबरों से पूरे देश को सबक लेना चाहिये क्योंकि कोरोना संक्रामक रोग है और जरा सी लापरवाही से वह महामारी में बदल सकता है । इसके पहले कि पूरे देश में उसका फैलाव हो  सबको सावधान हो जाना चाहिए वरना  तीसरी लहर के लिए हम किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकेंगे। यदि छोटी - छोटी सावधानियों का पालन किया जाता रहे तो तीसरी लहर से होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सकता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 27 August 2021

तेल संपन्न अरब के बजाय अफीम संपन्न अफगानिस्तान होगा युद्ध का नया मैदान



अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के बाहर हुए विस्फोटों में तकरीबन 100 लोगों की मौत और सैकड़ों के घायल होने की खबर है | एक दर्जन से ज्यादा अमेरिकी सैनिक भी धमाके के शिकार होकर जान गँवा बैठे | इस घटना के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की उनके अपने देश में थू- थू होने लगी तब उन्होंने अंजाम भुगतने की धमकी तो दी किन्तु ये बात भी दोहरा दी कि 31 अगस्त तक अमेरिकी सैनिक पूरी तरह से अफगानिस्तान खाली कर देंगे | तालिबान ने तो पहले ही इस तारीख के बाद किसी भी तरह की मोहलत न देने की चेतावनी दे दी थी | उल्लेखनीय है काबुल हवाई अड्डा अभी तक अमेरिकी सेना के कब्जे में ही है और वही उड़ानों के आने - जाने संबंधी व्यवस्था का संचालन कर रही है | काबुल छोड़कर जाने के इच्छुक अफगानी या दूसरे देशों के नागरिक भी हवाई अड्डे के भीतर आने के बाद खुद को सुरक्षित मान रहे थे | लेकिन कल हुए धमाकों के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति भी ये कहने लगे कि वहां रहना खतरे से खाली नहीं है | लेकिन उनका ये कहना  कि अमेरिका हमलावार्रों की तलाश कर  बदला लेगा , इस बात का संकेत हो सकता है कि नाटो देश अफगानिस्तान में बने रहने का नया बहाना खोज रहे हों | लेकिन उक्त घटना इसलिए अचरज में डालने वाली है  क्योंकि तालिबान ने उसे आतंकी वारदात बताया है | उसके बाद ये खुलासा भी हुआ कि आई.एस.आई.एस ( खुरासान ) नामक गुट का इन विस्फोटों में हाथ था | यदि ये सच है तब अफगानिस्तान एक बार फिर आतंकवादी संगठनों की क्रीड़ास्थली  बनने जा रहा है | वैसे भी  पाकिस्तान के साथ लगी उसकी सीमा पर अनेक आतंकवादी गुटों के अड्डे हैं | तालिबान को अपना भाई बताने वाला पाकिस्तान भी इसे लेकर चिंतित है | गत दिवस की घटना में आई.एस.आई.एस ( खुरासान ) का हाथ होने से तालिबान के माथे पर भी पसीना छलछलाया होगा क्योंकि ये उसके एकाधिकार के लिए भी चुनौती है | अमेरिका को 31 अगस्त तक देश छोड़ देने की चेतावनी देकर तालिबान अपने वर्चस्व को साबित करना चाह रहा था किन्तु किसी और आतंकवादी संगठन द्वारा हवाई अड्डे के बाहर किया गया विस्फोट अफगानिस्तान में आने वाले  संकट का ऐलान है | आई.एस.आई.एस ( खुरासान ) द्वारा किये गये धमाकों का उद्देश्य अब तक स्पष्ट नहीं है | लेकिन जब काबुल हवाई अड्डा छोड़कर लगभग पूरे देश पर तालिबान का कब्ज़ा हो चुका हो तब उक्त विस्फोट किसे डराने के लिए किये गये ये बड़ा सवाल है | ये भी  गौरतलब है कि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से संपन्न  करने के लिए बनाई गयी संयोजन समिति के प्रमुख और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई को गत दिवस घर में नजरबंद करते हुए उनकी सुरक्षा वापिस ले ली गई और वाहन भी छीन लिए गये | इन सब बातों की वजह से तालिबान द्वारा सत्ता हासिल होते ही अपनी छवि बदलने की खातिर किये गये वायदे हवा – हवाई साबित हो रहे हैं | पूरे देश में सशस्त्र लड़ाके लूटपाट, हत्या और बलात्कार जैसी वारदातें करने में जुटे हैं | कानून – व्यवस्था का नामो – निशान कहीं नहीं है | महिलाओं को इस्लाम के अनुसार सम्मान देने का आश्वासन भूलकर ये धमकी दी जा रही हैं कि वे घर पर ही रहें क्योंकि तालिबान लड़ाकों को उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाए इसकी तालीम नहीं  दी गई है | इस तरह की और भी बातें सामने आ रही हैं जिनके आधार पर तालिबान की सोच में आये बदलाव की उम्मीद खत्म हो चली है और पूरी दुनिया इस बात से भयभीत है कि आई.एस.आई.एस सहित अन्य इस्लामी आतंकवादी संगठनों का मुख्यालय कहीं  अफगानिस्तान न बन जाए | वैसे इस आशंका से तालिबान को भी खतरा है क्योंकि एक से अधिक आतंकवादी गुटों की मुल्क में मौजूदगी गृह युद्ध का कारण बन सकती है | इस बारे में ध्यान देने योग्य बात ये है कि अफगानिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा अफीम उत्पादक देश होने से आतंकवादी संगठनों के लिए धन का सबसे बड़ा स्रोत है | चूँकि तालिबान खुद भी आतंकवादी है अतः वह चाहकर भी अन्य संगठनों को रोकने की स्थिति में नहीं है | इसीलिये अब ये कहा जाने लगा है कि इस मुल्क के दुर्भाग्य का नया अध्याय शुरू हो गया है | बीते दो दशक में जो सुखद परिवर्तन हुए थे वे एक झटके में मिट्टी के घरोंदे की तरह बिखरकर रह गये हैं | कल हुए धमाकों ने सत्ता के लिए होने वाले संघर्ष का एक और मोर्चा खोल दिया है | बड़ी बात नहीं इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाने वाले संगठन  तालिबान से अपना हिस्सा मांगें क्योंकि पाकिस्तान के जरिये वे सब भी अमेरिका के विरुद्ध लड़ाई में उसके साथ थे | इस प्रकार काबुल में सत्ता के हस्तान्तरण के बाद शांति की उम्मीदें  नाउम्मीदी में बदलती दिखाई देने लगी हैं | बड़ी बात नहीं अफगानिस्तान पर अगला हमला सोवियत संघ से अलग हुए किसी मध्य एशियाई देश की तरफ से हो क्योंकि कबीलों में बंटे अफगानिस्तान में बड़ी आबादी पड़ोसी देशों के मूल की भी है जिनके पठानों से नस्लीय झगड़े चले आ रहे हैं | अमेरिकी राष्ट्रपति  द्वारा आई.एस.आई.एस के विरुद्ध मोर्चा खोल देने का आदेश अपनी सेना  को देने के बाद अफगानिस्तान में  ठीक वैसी ही कार्रवाई हो सकती है जैसी बीस साल पहले ओसामा बिन लादेन की खोज में  की गई थी | ये भी जानकारी आ रही है कि आई.एस.आई.एस ( खुरासानी ) नामक इस गुट को पाकिस्तान ने ही दूध पिलाकर पाला है और इसकी तालिबान से पुरानी दुश्मनी है | इसका आशय ये हुआ कि पाकिस्तान भी दोहरी नीति अपना रहा है क्योंकि तालिबान  सर्वशक्तिमान होते ही उसके  उन  सीमावर्ती इलाकों पर अपना कब्जा जमाने से बाज नहीं आयेगा  जिनमें उसके अड्डे काम कर रहे हैं और जिन्हें अफगानिस्तान का ही क्षेत्र वे मानते हैं | कुल मिलाकर ये लगने लगा है कि पश्चिम एशिया के तेल संपन्न देशों से खिसक कर अब दुनिया की ताकतें अफीम संपन्न अफगानिस्तान को युद्ध का मैदान बनायेंगी | यूँ भी नशे के कारोबारियों का हथियारों के सौदागरों से पुराना रिश्ता रहा है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 26 August 2021

लोकतंत्र के नव सामंतों के सामने जाँच एजेंसियां असहाय होकर रह जाती हैं



सर्वोच्च न्यायालय ने सांसदों - विधायकों के विरुद्ध सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ( ईडी ) द्वारा की जाने वाली जांच और प्रकरण के निपटारे में होने वाले विलम्ब पर  नाराजगी जताते हुए सरकार से पूछा है कि क्या जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध जांच और मामलों के निपटारे के लिए अतिरिक्त  संसाधनों की जरूरत है ? अदालत ने इस बात पर भी रोष जताया  कि सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने सांसदों  और विधायकों के मामलों में होने वाले विलम्ब का कोई ठोस कारण नहीं बताया | 10 - 15 साल तक प्रकरण को  टाँगे रखने पर भी  तीखी टिप्पणी की गई | इस सम्बन्ध में प्रस्तुत एक याचिका में ये तथ्य भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया कि अनेक मामलों में बरसों तक प्रकरण  को लम्बित रखने के बाद उनको वापिस ले लिया गया | पता नहीं न्यायालय की  फटकार युक्त पूछ्ताछ का कितना असर होगा लेकिन याचिकाकर्ता द्वारा उठाये गये सवाल और उनके बारे में जांच एजेंसियीं का निरुत्तर रहना कानून बनाने वाले सांसदों और विधायकों के सामने उनकी  निरीहता को दर्शाने के लिए पर्याप्त है | हालाँकि आम जनता को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उसके मन में ये बात काफ़ी गहराई तक समा चुकी है कि लोकतंत्र का चोला ओढ़कर व्यवस्था पर काबिज हो चुके नव सामंत कानून को अपनी जेब में रखकर घूमते हैं | हत्या जैसे जघन्य अपराध के आरोपी भी जब सांसद और विधायक बनकर मंत्री पद तक हासिल कर लेते हों तब सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय में तैनात अधिकारियों के मन में ये भय सदैव समाया रहता है कि जिसे वे अपराधी साबित करना चाह रहे है वही न जाने कब उनकी ही जाँच करवाने की हैसियत में आ जाये | चकाजाम और धरना प्रदर्शन जैसे मामले वापिस लिए जाने की बात तो फिर भी  समझ में आती है किन्तु गम्भीर किस्म के अपराध की जांच बरसों – बरस खींचने के बाद प्रकरण वापिस ले लेना एक तरह से न्याय प्रणाली की सरासर अवहेलना है | लोकतांत्रिक व्यवस्था संवैधानिक प्रावधानों के अलावा स्वस्थ परंपराओं और नैतिक मूल्यों पर आधारित होती है , जिसमें राजा और प्रजा जैसे शब्द अर्थहीन होकर रह जाते हैं | राज करने वाले किसी राजघराने में जन्म लेने वाले न होकर आम जन के बीच से चुने जाते  हैं | उस दृष्टि से वे थोड़े से खास भले ही हो जाएं लेकिन आख़िरकार होते तो आम ही हैं | इसीलिए क़ानून के सामने समानता का सिद्धांत संविधान में उल्लिखित है | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी की आपराधिक कर्म पत्री सार्वजनिक किये जाने को लेकर भी सख्त आदेश दिए गये थे | अब उसने सांसदों और विधायकों के विरुद्ध चलने वाली जाँच और प्रकरणों में विलम्ब पर नजर टेढ़ी की है | हालाँकि इसके बाद भी सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय निडर होकर कार्रवाई करने आगे आयेंगे ऐसा नहीं लगता | विपक्षी दल सदैव सरकार पर आरोप लगाया करते हैं कि वह उक्त जाँच एजेंसियों का उपयोग विरोधियों की आवाज दबाने के लिए करती  है | सर्वोच्च न्यायालय भी सीबीआई को पिजरे में बंद तोता कहते हुए उसका मज़ाक उड़ा चुका है | हाल के वर्षों में प्रवर्तन निदेशालय भी काफ़ी चर्चाओं में रहा है | लेकिन सांसदों और विधायकों के जितने मामले जांच और अदालत में लम्बित हैं उनका हश्र अधर में लटका रहता है | ऐसा लगता है कि जनसेवक कहलाने वाले सांसद और विधायकों को जाँच एजेंसियां भी राज परिवार के सदस्यों जैसा मानकर  दण्डित करवाने से बचती हैं | ये सिलसिला सरकारें बदलने के बावजूद अपरिवर्तित है | इन जाँच एजेंसियों की स्वायत्तता को लेकर भी चर्चाएँ होती रहती हैं लेकिन विपक्ष में रहते हुए ऐसी मांग करने वाले सत्ता में  आते ही इन पर नियन्त्रण बनाये रखने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते | अतीत में मुलायम सिंह यादव और मायावती के विरूद्ध दायर भ्रष्टाचार के प्रकरण सीबीआई द्वारा वापिस लिए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर दोबारा खोले गये थे | लेकिन उनका अंजाम क्या हुआ ये भी  जाँच का विषय है | दरअसल  देश में राजनीतिक नेताओं के रूप में स्थापित नव सामंतों का  एक अभिजात्य वर्ग  समूची शासन व्यवस्था पर कुण्डली मारकर बैठ गया है | इस वर्ग के लोगों में कहने को तो वैचारिक और सैद्धांतिक मतभेद हैं किन्तु अधिकतर मामलों में ये लगता है कि मतभेद जनता को मूर्ख बनाने के लिए हैं और भीतर – भीतर सभी एक दूसरे  की मदद को तैयार रहते हैं | भूले – भटके कोई सांसद – विधायक जेल चला भी जावे तो उसके लिए वहां ऐशो – आराम के सारे इंतजाम किये जाते हैं | वैसे तो ज्यादातर समय वे अस्पताल में सरकारी खर्च पर अपना इलाज करवाते हुए ही काटते हैं | सर्वोच्च न्यायालय की भी मजबूरी है कि वह सवाल पूछने और नाराजगी व्यक्त करने में भले पीछे न रहे लेकिन जांच और दंड प्रक्रिया को गतिशील बनाने का उपाय उसके पास भी नहीं है | और फिर न्यायाधीश की आसंदी पर विराजमान मी लॉर्ड में बहुत बड़ी संख्या उनकी होती है जो वकालत करने के दौरान मामले को टालने के विशेषज्ञ  माने जाते थे | इस प्रकार न्याय में विलम्ब , न्याय से इंकार का सिद्धांत व्यवहार में आते तक निरर्थक हो उठता है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 25 August 2021

आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में जहरीली होती राजनीति



महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में केंन्द्र सरकार में कैबिनेट मंत्री नारायण राणे को गत दिवस महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार किया | लेकिन रात में ही अदालत ने उनको जमानत भी  दे दी | 15 अगस्त के दिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भाषण के दौरान  स्वाधीनता किस साल मिली ये भूल गये थे , जिस पर श्री राणे ने टिप्पणी कर डाली कि वे वहां होते तो उनको जोरदार थप्पड़ मारते | इस पर उनके विरुद्ध थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई गई और कल जब वे रत्नागिरी में जन आशीर्वाद यात्रा निकालने गये थे तब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया | इसके बाद हुआ घटनाक्रम राजनीति में बेहद आम है |  बयानों के तीर दोनों तरफ से चले | शिवसेना और भाजपा कार्यकर्ताओं में शक्तिप्रदर्शन और  पार्टी  दफ्तरों में तोड़फोड़ के दृश्य भी दिखाई दिए | सरकार ने कानून के राज का एहसास दिलाया तो भाजपा ने केन्द्रीय मंत्री की गिरफ्तारी को लोकतंत्र विरोधी बताते हुए केंद्र और राज्य के रिश्तों में  खटास पैदा करने वाला कदम निरुपित किया | श्री राणे और उद्धव ठाकरे के बीच मतभेद राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता  से बढ़ते  - बढ़ते कटुता और शत्रुता तक जा पहुंचे हैं | शिवसेना से श्री राणे के निकलने के पीछे उद्धव की महत्वाकांक्षा ही बड़ी वजह बताई जाती है  | वरना एक ज़माने में वे स्व. बाल ठाकरे के नजदीकी होने के कारण ही मुख्यमंत्री बन बैठे थे  | शिवसेना छोड़कर पहले उन्होंने कांग्रेस का  दामन थामा और फिर भाजपा की शरण में आकर राज्यसभा पहुंच गये | मोदी मंत्रीमंडल के हालिया पुनर्गठन में उनको कैबनेट मंत्री बना दिया गया | इसके पीछे प्रशासनिक अनुभव अथवा योग्यता से ज्यादा महाराष्ट्र के कोंकण अंचल में उनका प्रभाव और  शिवसेना को उसी की शैली में जवाब देने की क्षमता है | बीते काफी समय से वे उद्धव के बेटे आदित्य के ऊपर तीखे हमले करते आ रहे थे  | अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या वाले प्रकरण में भी  उन्होंने आदित्य पर गम्भीर आरोप लगाये | इन सबसे ठाकरे परिवार बहुत नाराज था | लेकिन जबसे वे केन्द्रीय बनाये गये तबसे शिवसेना को उनसे ज्यादा खतरा महसूस होने लगा | मुम्बई महानगरपालिका के आगामी चुनाव 2022 में  होने वाले हैं जिनमें श्री राणे शिवसेना के लिए गड्ढा खोदने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे | केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनाये जाने से उनके  रुतबे  और आभामंडल में भी कुछ  वृद्धि तो  हुई ही है जिससे ठाकरे पारिवार चौकन्ना है | हालांकि जिस बयान को बहाना बनाकर उद्धव सरकार ने श्री राणे को गिरफ्तार करवाया उससे कहीं ज्यादा तीखे बयान वे पूर्व में दे चुके थे | लेकिन उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनकर राज्य की राजनीति में वजनदार माना जाने लगे उसके पहले ही  मुख्यमंत्री  ने उन्हें  कमतर साबित करने के लिए ये कदम उठाया ताकि उनके साथ जुड़ने की सोच रहे  शिवसैनिक हतोत्साहित हो जाएँ | इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि श्री राणे ने जो कुछ मुख्यमंत्री के बारे में कहा वह किसी भी राजनेता को शोभा नहीं देता । राजनीतिक या व्यक्तिगत मतभेद कितने भी गहरे हों किन्तु केंद्र सरकार के एक मंत्री द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री को थप्पड़ मारने जैसी  बात कहना शालीनता के विपरीत है | लेकिन ये भी मानना पड़ेगा कि श्री राणे ने राजनीति की जो शैली शिवसेना में रहते हुए सीखी उसे वे इस उम्र में आने के बाद शायद ही भूल सकेंगे | शिवसेना के  प्रवक्ता संजय राउत तो आये दिन कुछ न कुछ ऐसा बोलते ही रहते हैं जो सार्वजनिक तौर पर  टिप्पणी लायक नहीं होता | अतीत में उ.प्र  के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा छत्रपति  शिवाजी महाराज की मूर्ति पर खड़ाऊँ पहिनकर माल्यार्पण किये जाने पर उद्धव ने उनको उसी चप्पल ( खड़ाऊँ ) से मारने की बात कही थी | श्री राणे की टिप्पणी पर आपाराधिक मामला बनता है या नहीं ये तो अदालत और विधि विशेषज्ञ ही  बता सकेंगे किन्तु जहाँ तक बात कानून का एहसास करवाने की है तो श्री ठाकरे और उनके निकटस्थ शिवसेना नेताओं के दर्जनों सार्वजनिक बयान ऐसे मिल जायेंगे जिनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई हो सकती थी | पार्टी के मुखपत्र सामना में तो प्रथम पृष्ठ पर जिस तरह की टिप्पणियाँ देश की बड़ी – बड़ी हस्तियों के विरूद्ध प्रकाशित होती रहीं उनको किसी भी दृष्टि से स्तरीय नहीं कहा जा सकता | महाराष्ट्र के पूर्व  मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस के अलावा भाजपा के अनेक नेताओं ने भी  श्री राणे द्वारा प्रयुक्त शब्दावली का समर्थन नहीं किया किन्तु उनको जिस तरह गिरफ्तार किया गया उसकी वजह से केन्द्रीय मंत्री का पलड़ा मजबूत हो गया | हालाँकि ये मान लेना मूर्खता होगी  कि इस घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी में शालीनता और मर्यादा का पालन होने लगेगा क्योंकि न तो ठाकरे एंड कम्पनी को उनका ध्यान है और न ही श्री राणे से ये उम्मीद  कि  गत दिवस जो हुआ उसके बाद वे सोच समझकर बोलने लगेंगे परन्तु इस सबसे  एक विषबेल देश में फ़ैल रही है जो   केंद्र और राज्यों के रिश्तों में जहर घोलकर संघीय ढांचे को कमजोर करने में कामयाब हो सकती है | प. बंगाल इसका ताजा उदाहरण है और अब वही सब महाराष्ट्र में देखने मिल रहा है | राजनीतिक चश्मे  से इस घटना को देखें तो उद्धव ठाकरे ने एक बार फिर अपरिपक्वता का परिचय देते हुए अपने कट्टर विरोधी को बेवजह प्रसिद्धि और सहानभूति हासिल करने का अवसर दे दिया |  श्री राणे ने श्री ठाकरे  के बारे में जो कुछ कहा उसे आम तौर पर किसी ने पसंद नहीं किया लेकिन ये भी सही है कि मुख्यमंत्री को स्वाधीनता प्राप्ति का साल याद नहीं रहना साधारण गलती नहीं थी | यदि उद्धव ने केन्द्रीय  मंत्री की बात को उपेक्षित कर दिया होता तब शायद लोग इस बात को ही भूल जाते कि उसके पीछे का कारण क्या था ? अब जबकि श्री राणे गिरफ्तार होने के बाद रिहा भी हो चुके हैं तब उनके हाथ में बैठे - बिठाये एक मुद्दा आ गया | बहरहाल जो कुछ भी हुआ उसे कोई भी समझदार व्यक्ति पसंद नहीं करेगा | इसका राजनीतिक लाभ उद्धव ठाकरे को मिलेगा या नारायण राणे को ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि राजनीति में शालीनता , सौजन्यता और सहिष्णुता जैसे तत्व धीरे – धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं | आजादी के  अमृत महोत्सव वर्ष में इस बारे में विचार नहीं हुआ तो जिस तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित फिल्मों में वास्तविकता के नाम पर अश्लील गालियों की भरमार की जा रही है उसी तरह के नज़ारे राजनेता सड़कों पर पेश करते दिखेंगे |

 - रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 24 August 2021

सरकारी संपत्तियों की बिक्री पर जनता को भरोसे में लेना भी जरूरी



केंद्र सरकार द्वारा रेलवे और राजमार्गों सहित अन्य विभागों की सरकारी संपत्तियां बेचने और लंबी समयावधि पर लीज ( किराये ) पर देने की घोषणा पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी का ये तंज सामयिक  है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो कहा करते थे कि देश नहीं बिकने दूंगा , किन्तु  उनके राज में सरकारी संपत्तियां  धड़ल्ले से बेची जा रही हैं | विपक्ष के नेता से तो खैर ऐसे विषयों पर इसी तरह की टिप्पणी अपेक्षित होती किन्तु आम जनता के मन में भी ये बात  बैठती जा रही है कि मोदी सरकार बीते सात दशक में जमा की गई पूंजी बेच – बेचकर काम चला रही है , जिसे भारतीय सोच के अनुसार अच्छा अर्थ प्रबन्धन नहीं माना जाता | लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि जिस उदारवाद और मुक्त अर्थव्यवस्था की बुनियाद स्व. पी. वी. नरसिम्हा राव  के शासनकाल में बतौर वित्तमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने रखी थी उसकी आलोचना करने वाली पार्टियों और नेताओं ने भी सत्ता में आने के बाद आर्थिक सुधारों के नाम पर उसी नीति को आगे बढ़ाया | स्व. राजीव गांधी ने देश में लायसेंस राज खत्म करने का जो फैसला लिया , दरअसल वही निजीकरण की दिशा में उठाया गया पहला कदम था | वर्तमान केंद्र सरकार स्वदेशी  नामक जिस भावना से प्रेरित और प्रभावित है उसमें देश का विकास विदेशी पूंजी की बजाय घरेलू संसाधनों से करने पर जोर दिया जाता है | लेकिन मोदी सरकार इस बात पर गर्व करती है कि उसके शासनकाल में देश का विदेशी मुद्रा भंडार नए – नए कीर्तिमान  स्थापित कर रहा है |  जिसका कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेशकों का बढ़ता विश्वास बताया जाता है | भारत के उद्योगपति भी विदेशी कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम लगा रहे  हैं | इसके अलावा भी अनेक बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत में अपनी  इकाइयाँ लगाई हैं | ऑटोमोबाइल , इलेक्ट्रानिक्स और मोबाईल के उत्पादन में इसीलिये देश  काफी आगे निकलता जा रहा है | कोरोना के बाद से चीन के प्रति वैश्विक निवेशकों का मोहभंग होने के कारण भी भारत में विदेशी निवेश आने  की सम्भावना बढ़ रही है | इन सबके बीच भारत सरकार द्वारा अपनी कंपनियों के विनिवेश के साथ ही अचल संपत्ति और  सेवा क्षेत्र का स्वामित्व अथवा संचालन निजी क्षेत्र को सौंपकर विकास कार्यों के लिये धन जुटाने का जो प्रयास किया जा रहा है उसे लेकर तरह – तरह के सवाल उठ रहे हैं  | हालाँकि विनिवेश की प्रक्रिया तो कांग्रेस के शासन में  ही  शुरु कर दी गई थी |  घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों तथा अनुपयोगी पड़ी अचल संपत्ति से धन जुटाने की तरकीब मूलतः डा. मनमोहन सिंह द्वारा प्रारंभ किये गये आर्थिक सुधारों में सुझाई गई थी लेकिन मोदी सरकार इसके लिए इसलिए आलोचना झेल रही है क्योंकि वह इस बारे में बेझिझक होकर फैसले करते हुए उनको शीघ्रता से लागू करने के प्रयास कर रही है | एयर इण्डिया के अलावा भारत पेट्रोलियम और भारतीय जीवन बीमा निगम जैसे संस्थानों के दरवाजे निजी क्षेत्र के लिए खोलने पर आश्चर्य व्यक्त करने वाले भी कम नहीं हैं | कुछ सरकारी बैंक भी निजी क्षेत्र को देने की तैयारी चल रही है | इसी  बीच गत दिवस श्रीमती सीतारमण द्वारा रेलवे और राजमार्गों सहित अनेक सरकारी संपत्तियों को बेचने अथवा किराए पर देने संबंधी घोषणा करते हुए आलोचकों को नया मुद्दा दे दिया गया | लेकिन इसका दूसरा पहलू ये है कि अधिकतर आर्थिक  विशेषज्ञ और उद्योग जगत विनिवेश के जरिये आ रहे निजीकरण से खुश हैं | इसका कारण सरकारी क्षेत्र में आमदनी कम और खर्च ज्यादा की स्थिति है | ऊंचे वेतनमान के बावजूद सरकारी अमला उत्पादकता के मामले में चूँकि बेहतर परिणाम नहीं दे पाता इसीलिये सरकारी उपक्रम सफेद हाथी के तौर पर जाने जाते हैं | निजीकरण की जो प्रक्रिया 1991 से प्रारंभ हुई वह हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ी क्योंकि लगातार मिली – जुली सरकारों के कारण  नीतिगत  मतभिन्नता से नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाले हालात बने रहे | 2014 में पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद वह बाधा दूर हो गई जिससे विनिवेश और निजीकरण संबंधी निर्णयों में तेजी आई | इस बारे में आलोचना तो सरकार को अपने वैचारिक  परिवार के बीच भी झेलनी पड़ती है लेकिन वह उसे अनसुना करने का दुस्साहस दिखा रही है | ये बात सभी मानेंगे कि सरकारी क्षेत्र का एकाधिकार होने से काम की गति और गुणवत्ता दोनों अपेक्षानुरूप नहीं रहे | इस वजह से विकास  प्रक्रिया के विलम्बित होने से उसकी लागत बढ़ती जाती है | विशेष रूप से अधो संरचना ( इन्फ्रा स्ट्रक्चर ) के कार्य  समय सीमा के भीतर पूर्ण नहीं होने से बहुत नुकसान होता है | हालाँकि निजी क्षेत्र को एकाधिकार सौंप देना भी बुद्धिमत्ता नहीं होगी | अतः सरकार को चाहिए कि वह संतुलन बनाकर काम करे | घाटे की इकाइयों और अनुपयोगी संपत्तियों को बेचकर या किराये पर देकर यदि विकास परियोजनाओं के लिए धन जुटाया जा सकता है तो उसमें बुराई नहीं है लेकिन उसका  सरकारी फिजूलखर्ची में उपयोग किया जाना धोखाधड़ी मानी जायेगी | सरकार द्वारा दिए जा रहे आश्वासनों पर सिरे से अविश्वास करना जल्दबाजी हो सकती है लेकिन उसे भी देश का ये भरोसा दिलाना होगा कि सरकारी संपत्ति के विक्रय , विनिवेश अथवा लीज पर देकर अर्जित किये जाने वाले  धन का उपयोग देश के विकास के  लिए होगा जो भावी पीढ़ियों के सुखी और सुरक्षित भविष्य के लिए जरूरी है | इस बारे में सरकार को ये बात ध्यान रखनी होगी कि उसकी आर्थिक नीतियां चाहे कितनी भी अच्छी हों लेकिन उनके फायदे मिलने के पहले ही लोकसभा चुनाव आ जाएंगे और तब उसे  लोगों को संतुष्ट करना का बेहद कठिन होगा  क्योंकि अकेले  प्रधानमन्त्री की ईमानदारी और कर्मठता के बल पर चुनाव नहीं जीता जा सकता | वरना  2004 में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी और 2014 में डा.मनमोहन सिंह की सरकार को जनता सत्ता से अलग नहीं करती |  

- रवीन्द्र वाजपेयी