Thursday, 14 October 2021

विकास दर के आकलन में छिपे हैं उज्जवल भविष्य के संकेत



अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत  की विकास दर 9.5  फीसदी रहने का अनुमान लगाते हुए कहा कि ये दुनिया भर में सबसे ज्यादा होगी | कोरोना का कहर न आया होता तो पिछले वित्तीय वर्ष में ही भारत की विकास दर दहाई के आंकड़े के करीब पहुँच जाती | जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार कोरोना के दूसरे दौर की भयावहता के बाद  देश में आर्थिक गतिविधियाँ तेज हो गईं | कुछ क्षेत्रों में तो उम्मीद से ज्यादा अच्छे परिणाम आ रहे हैं | अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों  ने भी भारत की आर्थिक प्रगति को लेकर सकारात्मक आकलन किये हैं | सबसे बड़ी बात ये है कि भारत में मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर आश्चर्यजनक रूप से अच्छा प्रदर्शन कर रहा है तथा कोरोना काल के बाद निर्यात में भी वृद्धि के संकेत हैं | केंद्र सरकार ने कोरोना काल में औद्योगिक इकाइयों को जिस तरह के प्रोत्साहन दिए उसकी वजह से अनेक सेक्टरों में  कच्चे माल के लिये चीन पर निर्भरता कम हुई जिससे लागत घटी और अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारत के उत्पाद प्रतिस्पर्धा में टिके रहने में सक्षम साबित हो रहे हैं | घरेलू परिदृश्य पर नजर डालें तो दवा और ऑटोमोबाइल सेक्टर में मांग काफी तेजी से बढ़ी है | दवाईयाँ बनाने वाली इकाइयों को कच्चा माल तैयार करने के लिए जो सहायता और प्रोत्साहन सरकार ने बीते एक साल में दिया उसके नतीजे दिखाई देने लगे हैं | कोरोना के टीके का घरेलू उत्पादन होने से भी  अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सहारा मिला | तीसरी लहर को रोकने में भारत का टीकाकरण अभियान निश्चित रूप से कारगर रहा | कल तक की जानकारी के मुताबिक 52.23 फीसदी आबादी को कोरोना का पहला और 22.80 फीसदी को दोनों टीके लग चुके हैं | इस कारण कोरोना के संक्रमण को नियंत्रित करना संभव हुआ  और देश लॉक डाउन की स्थिति से बाहर आ सका | वैसे भी तीसरी लहर को लेकर चिकित्सा जगत आश्वस्त कर चुका था कि  उसका प्रकोप बहुत कम  रहेगा | यद्यपि कुछ समय पहले तक केरल और महाराष्ट्र में कोरोना का संक्रमण खतरनाक संकेत दे रहा था लेकिन बीते कुछ दिनों से नये मरीजों की संख्या में लगातार कमी आने से शुरुवाती आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं | इसका सीधा असर बाजार पर पड़ा जहां एक साल से सुस्त पड़ी मांग ने जोर पकड़ा जिससे प्रभावित होकर कारखानों के साथ ही इन्फ्रा स्ट्रक्चर के  काम ने तेजी पकड़ी | इसका लाभ ये हुआ कि लॉक डाउन की वजह से बेरोजगार हुए लोगों को काम मिलने की शुरुवात हुई | गत दिवस इस बारे में कुछ विशेषज्ञों की जो राय आई है उसके अनुसार भारत में बेरोजगारी के  जो काले  बादल गत वर्ष आये थे , वे छंटने लगे  हैं और आगामी एक दशक तक उद्योग – व्यापार के सभी क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति बहुत ही  अच्छी रहेगी | केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में घोषित कुछ रियायतों से उद्योग जगत खासा प्रभावित है और जिसका असर तत्काल परिलक्षित होने भी लगा | कोरोना रूपी त्रासदी ने भारत के आम आदमी की सोच में जो आमूल परिवर्तन किये उसके प्रभावस्वरूप बड़ी संख्या में लोगों ने आपदा में अवसरों का सृजन करने का चमत्कार कर दिखाया | ढर्रे से हटकर उच्च शिक्षित्त युवा पेशेवरों ने जिस प्रकार की उद्यमी विविधता का परिचय दिया उसने कम पूंजी में आय के नए स्रोत तलाशने की राह दिखाई है | सेवा क्षेत्र के अकल्पनीय विकास ने स्व - रोजगार के जो अवसर  उत्पन्न किये उससे ये साबित हो गया है कि देश विपरीत हालातों में भी अपना लक्ष्य  नहीं भूला , अपितु उसने आगे बढ़ने के नए रास्ते भी बना लिए जो किसी भी राष्ट्र के आत्मविश्वास और संघर्षशीलता का परिचायक होता है | हालाँकि अर्थव्यवस्था के सामने चुनैतियां पूरी तरह से खत्म हो गईं ये सोचना जल्दबाजी होगी क्योंकि कोरोना के बाद की वैश्विक व्यवस्था में काफी कुछ बदला हुआ होगा और उसी के बीच भारत को अपने लिए सम्मानजनक और सुरक्षित जगह बनानी होगी | विशाल उपभोक्ता बाजार के कारण दुनिया भर के निवेशक यदि भारत में रूचि दिखा रहे हैं तो वह हवा – हवाई नहीं है | शेयर बाजार के सूचकांक का 60 हजार के पार चला जाना भले ही आम आदमी के लिए मायने न रखता हो किन्तु कारोबारी गतिविधियों के लिए वह मौसम की भविष्यवाणी जैसा होता है | महंगाई , विशेष रूप से पेट्रोल – डीजल के निरंतर बढ़ते दाम हालाँकि समस्या बन रहे हैं लेकिन देश में वैकल्पिक ईंधन का उपयोग बढ़ाने की दिशा में हो रहे प्रयास देर सवेर रंग लायेंगे | उस दृष्टि से आने वाले कुछ साल निश्चित तौर पर संक्रांति काल होंगे | लेकिन जिस तरह दूसरे महायुद्ध के उपरांत दुनिया का शक्ति संतुलन और आर्थिक केंद्र बदले , ठीक वैसे ही कोरोना काल  के बाद होना सुनिश्चित है और उसमें भारत की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रहेगी | कोरोना से उबरने के बाद देश के आम आदमी में नजर आ रहा आत्मविश्वास  सुखद और सुरक्षित भविष्य के  संकेत दे रहा है | शारदेय नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान दिख रहा उत्साह और दीपावली के पूर्व  बाजार से मिल रहे अग्रिम संकेत अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आकलन को प्रामाणिक साबित कर रहे हैं |  

-रवीन्द्र वाजपेयी

 

 

Wednesday, 13 October 2021

लखीमपुर खीरी : इंसानियत विहीन सियासत सम्मानित नहीं हो सकती



लखीमपुर खीरी में गत दिवस हाल ही में मारे गये किसानों का उठावना संपन्न हुआ | इसमें कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा सहित अनेक राजनेता शरीक हुए किन्तु उन्हें किसानों ने मंच , माला और माइक से दूर ही रखा | इस आयोजन में तय हुआ कि मारे गये चार किसानों के  अस्थिकलश देश के हर जिले में  भेजे जायेंगे | राजनीतिक दल भी अपने नेताओं की मौत पर जन सहानुभूति बटोरने के लिए ऐसा करते रहे हैं | कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आन्दोलन के संदर्भ में इस तरह का निर्णय अस्वाभाविक नहीं कहा जाएगा क्योंकि हमारे देश में भावनाओं को भुनाकर जनसमर्थन हासिल करने का तरीका बहुत सामान्य  है | चूँकि किसानों का आन्दोलन पंजाब , हरियाणा , पश्चिमी उ.प्र और राजस्थान के अलावा दिल्ली की सीमा के आगे नहीं बढ़ पा रहा इसलिए लखीमपुर खीरी की घटना के सहारे उसका फैलाव करने की रणनीति  बनाई गई है |  जिस तरह से उक्त किसानों की मौत हुई वह बहुत ही नृशंस था | लेकिन किसान आन्दोलन के नेताओं को ये नहीं भूलना चाहिए कि उस घटना में कुछ  अन्य लोगों की भी हत्या उन लोगों द्वारा की गई थी  जो खून का बदला खून की मानसिकता के वशीभूत होकर हैवानियत पर उतारू हो गये | चूंकि शुरुवात किसानों की हत्या से हुई इसलिए उनके समर्थकों द्वारा की गई जवाबी हत्याओं का औचित्य साबित करने का प्रयास भी  किया गया  | लखीमपुर खीरी में संवेदना व्यक्त करने गये राजनेता भी किसानों के अलावा मारे गये अन्य पांच लोगों में शामिल एक पत्रकार के घर ही गये | ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि किसान और पत्रकार के अलावा जिन लोगों को बलवाइयों ने बेरहमी से पीटकर मार डाला क्या वे इन्सान नहीं थे और क्या उनके परिजन सांत्वना और सहानुभूति के हकदार नहीं थे ? स्मरणीय है श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए दंगे में निरपराध सिखों की हत्या के आरोप में कांग्रेस के अनेक नेताओं को अदालत ने सजा दी थी | उसी तर्ज पर लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या के बाद प्रतिक्रियास्वरूप की गई बाकी  हत्याओं के आरोपियों को भी दंड दिया जाना जरूरी है | उन मृतकों के परिजनों के साथ ही भाजपा के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में भी इस बात को लेकर नाराजगी है कि उ.प्र सरकार के मंत्रियों सहित संगठन के नेताओं ने लखीमपुर खीरी आने के बावजूद उनके घरों में जाने की जरूरत नहीं समझी | इन मृतकों को समुचित मुआवजा और आश्रित को नौकरी आदि का आश्वासन भी संभवतः नहीं मिला | किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत के अलावा विपक्ष के तमाम नेता केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं लेकिन उनमें से किसी ने भी गैर किसानों को मारने वालों की पहिचान कर उन्हें सजा दिलवाने के बारे में कुछ नहीं कहा | इस दोहरे रवैये के कारण ही लखीमपुर खीरी और निकटवर्ती इलाकों में जातिगत भावनाएं उबाल पर हैं | सत्ता और विपक्ष दोनों का ये दायित्व है कि वे बलवे के दौरान जान गंवाने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति एक जैसी  सहानुभूति प्रदर्शित करें | दुर्भाग्य से मौत को भी राजनीतिक रंग दिया जाने लगा है | इंदिरा जी की हत्या चूँकि उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा की गई थी इसलिए दिल्ली सहित देश के अनेक हिस्सों में हर सिख को हत्यारा मानकर उसके साथ अमानुषिक व्यवहार किया गया | लखीमपुर खीरी में मारे गये सभी लोग किसी आन्दोलन या पार्टी का हिस्सा होने से पहले मनुष्य थे | इसलिए सभी मौतों के प्रति एक सामान सोच रखते हुए उनके परिजनों को ये एहसास करवाना जरूरी है कि  शासन , प्रशासन , समाज और राजनीतिक दल उनके शोक में सहभागी हैं | जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार लखीमपुर खीरी में मरने वालों के परिजनों को सांत्वना और सहायता देने  से ज्यादा प्रयास वोटों की फसल काटने का हो  रहा है | कांग्रेस , सपा , बसपा , अकाली और भाजपा इस बात का हिसाब लगाने में जुटे हैं कि उ.प्र , उत्तराखंड और पंजाब के  आगामी विधानसभा चुनाव में लखीमपुर खीरी को कैसे भुनाया जावे ? विपक्षी दलों को लगता है कि केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री का इस्तीफा होने से उन्हें चुनावी लाभ होगा | दूसरी तरफ भाजपा भी इस बात का आकलन कर रही है कि मंत्री को हटाने पर उनके सजातीय ब्राह्मण मतदाता नाराज तो नहीं होंगे | ये स्थिति वाकई शोचनीय है | राजनीति में भावनाओं का भी अपना महत्व है | जहाँ – जहाँ भी लोकतंत्र है वहां राजनीतिक नेता जनभावनाओं के अनुरूप रणनीति बनाया करते हैं | लेकिन आम जनता की मौतों का  भी राजनीतिक नफे – नुकसान के लिए उपयोग करना निश्चित रूप से दुखद है | लखीमपुर खीरी की  पूरी घटना निंदनीय है | सत्ता के मद में की गई हैवानियत के साथ ही बदले की आग में जलते हुए की गई हत्याएं एक जैसे अपराध हैं | इसीलिये किसी को कम या ज्यादा मान लेना एकपक्षीय होगा | जो लोग किसानों की मौत पर मातम मना रहे हैं उन्हें उस दिन जवाबी हिंसा का शिकार हुए अन्य लोगों के लिए भी आंसू बहाना चाहिए क्योंकि इंसानियत के बिना की जाने वाली सियासत  कभी भी सम्मान प्राप्त नहीं कर सकती |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 October 2021

वोटों के लिए सिखों को मुख्यधारा से अलग करना खतरनाक होगा



उ.प्र में हुई लखीमपुर खीरी की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण थी  जिसमें चार किसानों के अलावा पांच अन्य लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा | किसानों को तो तेज गति से आते हुए वाहनों ने कुचल डाला जबकि बाकी  को क्रोधित भीड़ ने पीटकर मार डाला  | उस हादसे की देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई | चूँकि किसानों की मौत के लिए केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री के बेटे को दोषी माना गया इसलिए राजनीति भी जमकर चली जिससे कुछ दिनों तक लखीमपुर खीरी और आसपास का इलाका राजनीतिक नेताओं के आवागमन का साक्षी बना रहा | चूंकि  हमारे देश में ये सब होता रहता है इसलिए किसी को इस पर आश्चर्य नहीं हुआ किन्तु जैसी जानकारी आई है उसके अनुसार कुछ लोग इस घटना को दो सम्प्रदायों के बीच का विवाद बताकर जहर फ़ैलाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं  | हालाँकि मंत्री पुत्र की गिरफ्तारी में हुए विलम्ब से राजनीतिक बिरादरी को शोर मचाने का पर्याप्त अवसर मिला गया किन्तु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खुद होकर संज्ञान लेने के बाद कानूनी प्रक्रिया तेज हो गई और दोनों पक्षों के अनेक  आरोपी पकड़े जाकर जांच भी शुरू कर दी गयी है | हालांकि जिस इलाके में उक्त घटना हुई वहां पूरी तरह से शांति व्याप्त है लेकिन राजनेता जैसी  चालें चल रहे हैं उसकी वजह से ये आशंका है कि किसान आन्दोलन की तरह ये घटना भी एक राज्य और समुदाय से न जुड़ जाए | स्मरणीय है लखीमपुर खीरी के अलावा उ.प्र में तराई के हल्दवानी और पीलीभीत  जिलों में सिखों की काफी आबादी है | देश विभाजन के समय आये अनेक सिख शरणार्थियों को तराई इलाके में खेती हेतु भूमि दी गई थी | जिन्होंने अपने परिश्रम से उस इलाके को चमन बना दिया | लेकिन आज तक इस क्षेत्र में कभी सिखों को लेकर कोई विवाद नहीं देखने मिला | भले ही पंजाब में खलिस्तानी आतंक के समय जरूर तराई क्षेत्र में कुछ घटनाएँ हुईं पर  वहां  की आग से यहाँ का सिख समुदाय अछूता रहा | लेकिन लखीमपुर खीरी में मारे गये अधिकतर किसान चूंकि सिख थे इसलिए उनके बहाने पंजाब में सिखों को इस बात के लिए बरगलाया जा रहा है कि उ.प्र में सिखों पर अत्याचार हो रहे हैं | इस घटना को किसान आन्दोलन से सम्बद्ध करते हुए वहां  ये प्रचार भी किया जा रहा है कि केंद्र और उ.प्र  सरकार  सिख  विरोधी है | उ.प्र में तो एक – दो इलाके छोड़कर सिख  मतदाता उतने प्रभावशाली नहीं हैं लेकिन पंजाब में इसका उल्टा है जहाँ की पूरी राजनीति उनके नियन्त्रण में है | ये परम संतोष का विषय है कि खालिस्तानी आतंक का  पंजाब के सिख समुदाय ने बड़ी बहादुरी से सामना करते हुए अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया था | अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुई सैन्य कार्रवाई और उसके बाद श्रीमती इंदिरा गांधी की ह्त्या  के बाद दिल्ली में हुए सिखों के कत्ल ए आम से उत्पन्न कटुता भी जल्द भुला दी गई और कालान्तर में  सिख समुदाय ने पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनवाने में संकोच नहीं किया | ये बात सच है कि खालिस्तान के बीज अभी भी यहाँ – वहां बिखरे पड़े हैं  किन्तु सिख समुदाय ने उनको पनपने नहीं देता | किसान आन्दोलन में भी खलिस्तान समर्थक तत्वों ने घुसपैठ की थी किन्तु उन्हें ज्यादा महत्व नहीं मिला | बाकी किसानों ने भी जल्द उनके मंसूबों को भांप लिया | लेकिन लखीमपुर खीरी की घटना में अनेक सिख युवक जरनैल सिंह भिंडरावाले की फोटो वाली  जर्सी पहिने हिंसा करते दिखे और बाद में कुछ नेता पंजाब जाकर सिखों को भड़काने में जुटे हुए हैं | गत दिवस महाराष्ट्र में लखीमपुर खीरी की घटना के विरोध में सरकार  प्रायोजित बंद के दौरान जिस तरह से जबरदस्ती की गई उससे ये संकेत मिला है कि सियासत के सौदागर चिंगारी को आग में बदलने की फिराक में हैं | उल्लेखनीय है सरकार में एक साथ रहते हुए  भी जहाँ शिवसेना और शरद पवार की पार्टी रांकापा एक साथ नजर आईं वहीं कांग्रेस ने अपनी खिचड़ी अलग से पकाई |  संदर्भित घटना के इतने दिनों बाद सैकड़ों किमी दूर किसी राज्य में सरकार समर्थित बंद का औचित्य समझ से परे है | अनेक जानकार इस बारे में चिंता व्यक्त कर चुके हैं कि देश भर में सिखों को भड़काने का षडयंत्र रचा जा रहा है | यद्यपि इसके पीछे पंजाब के आगामी चुनाव हैं लेकिन इस आशंका को पूरी तरह नष्ट  करना जरूरी है | महाराष्ट्र में तो हाल – फिलहाल चुनाव होना नहीं है इसलिए वहां का  बंद लोगों की परेशानी का सबब बन गया | देखा - देखी कुछ और राज्यों में भी इस तरह के आयोजन हो सकते हैं लेकिन राजनीति चलाने वालों को ये ध्यान रखना चाहिए कि वे जाने – अनजाने सिख समुदाय को मुख्य धारा से अलग  करने का खतरनाक खेल न खेलें | पंजाब में रहने वाले सभी सिख एक ही विचारधारा या मानसिकता के नहीं हैं | भले ही उन पर पंजाब का ठप्पा लगा हो लेकिन आज की स्थिति में ये समुदाय देश के हर हिस्से में है | ऐसे में ये निहायत जरूरी है कि नब्बे के दशक में उनको लेकर बनाई गई अवधारणा को दोहराने से बचा जाए क्योंकि चुनाव तो आते – जाते रहते हैं किन्तु देश की एकता के साथ छेड़छाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगी | लखीमपुर खीरी में जो हुआ उसको उपेक्षित तो नहीं  किया जा सकता किन्तु उस बहाने अन्य  राज्यों में भी सद्भाव बिगाड़ने का  प्रयास  बेहद नुकसानदेय है | लखीमपुर खीरी  की  अपराधिक घटना के दोषियों को कड़ी सजा मिलनी ही  चाहिए , चाहे वे किसानों को कुचलने वाले हों या फिर बाकी लोगों को पीटकर मार डालने वाले बलवाई | राजनेताओं को उस आग में जितनी रोटी सेकनी थी उतनी वे सेंक चुके है | इसके आगे वे ऐसा ही करेंगे तो रोटी और उनके हाथ दोनों जलने वाली स्थिति बन जायेगी | ऐसी ही हरकतें नागरिकता संशोधन कानून के विरोध और किसान आन्दोलन को लेकर भी हुईं जिनके कारण दोनों ही पटरी से उतर गये | 21 वीं सदी में हमारा देश बहुत सारे बदलावों का गवाह बन रहा है लेकिन  राजनीति वोटों के मकड़जाल से निकल नहीं पा रही | तभी तो लखीमपुर खीरी में जा – जाकर आंसू बहाने वालों में से किसी ने भी कश्मीर में मारे गये लोगों के परिजनों को सांत्वना और सहायता देने के बारे में नहीं सोचा |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 11 October 2021

सौर ऊर्जा के बिना आत्मनिर्भर भारत का सपना पूरा नहीं होगा



कोरोना ग्रसित काफी मरीजों को बीमारी से उबरने के बाद भी स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याओं से जूझना पड़ रहा है | इसे दवाइयों से होने वाली प्रतिक्रिया के अलावा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में कमी से जोड़कर भी देखा जा सकता है | दरअसल कोरोना के इलाज को लेकर प्रारम्भिक स्थिति में चिकित्सा जगत काफी हद तक अनजान था जिसकी वजह से इलाज का प्रयोगात्मक तरीका अपनाया गया | जो दवाएं शुरुवाती तौर पर कारगर मानकर  दी जाती रहीं उन पर बाद में  अनुपयोगी  और नुकसानदेय मानकर रोक लगा दी गई | दुनिया भर में जो टीके खोजे गए उनकी प्रामाणिकता और प्रभावशीलता के बारे में अब तक भ्रम की स्थिति भी हुई है | कुछ टीकों को  अनेक देशों  द्वारा मान्यता नहीं दिए जाने से वहां जाने के इच्छुक लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है | कोरोना के आगमन को लगभग दो साल होने को आये किन्तु अभी तक दुनिया उसका स्रोत नहीं जान सकी है और न ही ये कहने की स्थिति है कि दवाओं और टीकों से उसकी पुनरावृत्ति को रोकना संभव हो गया है | अब तो  कहा जाने लगा है कि  हमें कोरोना के  साथ रहने की आदत  डालनी होगी | कहने का आशय ये है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद कोरोना ने ही पूरे विश्व को एक साथ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित किया है | जिस तरह उस महायुद्ध के उपरांत विश्व के शक्ति संतुलन के साथ ही आर्थिक हालात बदले , उसी तरह की सम्भावना कोरोना के बाद उत्पन्न होने लगी है | बीते दो साल में वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह हिल गई है |  आर्थिक दृष्टि  से सम्पन्न देश तक संकट में फंस गये हैं |  लॉक डाउन के कारण आयात – निर्यात में आई बाधा की वजह से कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित होने का असर उत्पादन पर पड़ने से अनेक आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो गया जिनमें दवा और चिकित्सा उपकरण भी हैं | इसी तरह ऑटोमोबाइल , इलेक्ट्रानिक्स , कप्म्यूटर के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले छोटे – छोटे उपकरण उपलब्ध न होने से  आपूर्ति पर विपरीत असर पड़ा  है जिस  वजह से कीमतें  भी  स्वाभविक रूप से बढ़ी हैं | लेकिन बीते कुछ दिनों से पूरी दुनिया जिस संकट से परेशान है वह है उर्जा अर्थात बिजली | कोयला आधारित ताप विद्युत गृहों में कोयले का भंडार  घटने के कारण बिजली की उपलब्धता कम होने से चीन और ब्रिटेन जैसे देशों तक में उसकी कटौती के हालात पैदा हो गये हैं | कोरोना के चलते कोयला उत्पादक देशों में काम बंद रहने से समुचित उत्खनन नहीं हो सका | कोरोना की दूसरी लहर के बाद औद्योगिक गतिविधियाँ एकाएक बढ़ने से बिजली की मांग में तो अप्रत्याशित वृद्धि होने लगी किन्तु कोयले का उत्पादन उस अनुपात में नहीं बढ़ने से आपूर्ति में रूकावट आ रही है | इस वजह से दुनिया के तमाम बड़े देशों में बिजली उत्पादन  प्रभावित हो रहा है | वैश्विक  अर्थव्यवस्था से अभिन्न रूप से जुड़ चुका भारत  भी इससे  अछूता नहीं है | हालाँकि पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर कोयले से बिजली बनाने वाले संयंत्रों को धीरे – धीरे बंद किया जा रहा है | लेकिन अभी वह स्थिति भी नहीं आई जिसमें विद्युत उत्पादन के वैकल्पिक स्रोत के तौर पर पनबिजली , पवन चक्की और सौर ऊर्जा से काम चल सके | यद्यपि अनेक देश सौर ऊर्जा के जरिये बिजली उत्पादन में महारत हासिल करते हुए अपनी जरूरत से ज्यादा विद्युत् उत्पादन कर रहे हैं | लेकिन भारत सरीखे विशाल देश में अभी सौर उर्जा के साथ ही पवन चक्की द्वारा बिजली उत्पादन इस मात्रा में नहीं पहुँच सका जहां वह कोयले से बनने वाली बिजली को पूरी तरह विदा कह सके | यही वजह है कि पिछले कुछ दिनों से समूचे भारत में बिजली संकट पैदा हो गया है | ताप विद्युत संयंत्रों के पास कुछ ही दिनों का कोयला शेष होने से भारी बिजली कटौती की आशंका बढ़ती जा रही है | यद्यपि सरकार ये भरोसा दिला रही है कि पर्याप्त कोयले का प्रबंध कर लिया जावेगा जिससे आम नागरिकों , किसानों और उद्योगपतियों को परेशानी नहीं होगी  किन्तु वस्तुस्थिति ये है कि कोयले की कमी से बिजली उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होने जा रहा है | इस संकट के लिए सरकार कितनी दोषी है ये फ़िलहाल कह पाना जल्दबाजी होगी | जैसी जानकारी आ रही है  उसके अनुसार कोयला निर्यातक देश भी कोरोना काल में अपनी क्षमतानुरूप उत्पादन नहीं कर सके और  भारत भी इससे अछूता नहीं रहा | अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ़्तार के कारण भी  कोयला उत्खनन कम हुआ था | हालांकि कोरोना की दूसरी लहर के कमजोर पड़ते ही कारोबारी जगत की  सक्रियता तो बढ़ी किन्तु बारिश के मौसम में कोयला खदानों में पानी  भर जाने से उत्खनन प्रभावित हुआ जिसके कारण विद्युत संयंत्रों की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही | ऐसे में  जिन प्रदेशों में जरूरत से ज्यादा बिजली बना करती थी वे भी कटौती के लिए मजबूर हो चले हैं | इस संकट से  कच्चे तेल की  मांग भी बढ़ने लगी और  देखते – देखते उसके दाम भी आसमान छूने लगे | इस तरह भारत के लोगों को दोहरे संकट का सामना करना पड़ रहा है | भले ही राज्य और केंद्र दोनों ये आश्वासन दे रहे हों कि कोयले के आपूर्ति पूर्ववत हो जायेगी तथा बिजली का संकट नहीं होने दिया जावेगा लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो भारत जैसे देश में साल भर पर्याप्त धूप रहने के बावजूद सौर उर्जा से बिजली बनाने का काम काफी पिछड़ गया | इसकी प्रमुख वजह देश में उसके उपकरण नहीं बनना भी है | लेकिन इस दिशा में जैसे प्रयास सरकारी और निजी  क्षेत्र द्वारा किये जाने चाहिए थे वे नहीं हुए | भले ही सरकार ने सौर ऊर्जा संयंत्र लगवाने पर सब्सिडी की व्यवस्था बनाई किन्तु उसके साजो – सामान का देश में उत्पादन हो सके इस दिशा में पर्याप्त कोशिशें नहीं हुई |  मौजूदा संकट को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए वे सौर उर्जा के अधिकतम उपयोग की नीति बनाकर उसे युद्धस्तर पर अमल में लाने की कार्ययोजना बनाएं | कोरोना के बाद की दुनिया निश्चित तौर पर पहले से अलग और बेहतर रहेगी | भारत के लिए आने वाले समय में अनंत  संभावनाएं हैं जिन्हें भुनाने के लिए हमें सौर उर्जा के क्षेत्र में पेशेवर सोच के साथ आगे बढ़ना होगा | संतोष का विषय है कि देश के दिग्गज उद्योगपति इस दिशा में सोचने लगे  हैं | समय आ गया है जब भारत में राजमार्गों के  कायाकल्प की तरह से ही सौर ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी भगीरथी प्रयास किये जाएँ | यदि 21 वीं सदी को भारत की बनाना है तो सौर ऊर्जा के समुचित उपयोग में दक्षता हासिल करना जरूरी है क्योंकि  आत्मनिर्भर भारत का सपना उसके बिना पूरा नहीं हो सकेगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 October 2021

क्या शिया नमाजी मुसलमान नहीं थे




अफगानिस्तान के कुन्दूज शहर की एक मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान हुए विस्फोट में लगभग 100 नमाजियों के मारे जाने की  खबर है | विस्फोट आत्मघाती हमले से होने का संदेह व्यक्त किया जा रहा है | मारे गये लोग शिया मुस्लिम थे और इस हमले के लिए आईएस ( इस्लामिक स्टेट) नामक संगठन को जिम्मेदार माना जा रहा है,  जो सुन्नी मुसलमानों का समर्थक है | अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता आईएस को हज़म नहीं  हो रही | सत्ता हस्तांतरण के दौरान काबुल हवाई अड्डे के बाहर हुए बम धमाकों में  भी उसी का हाथ था | ये भी माना जाता है कि उसकी  गतिविधियां पाकिस्तान से निर्देशित होती हैं जिन्हें इमरान सरकार से प्रश्रय और प्रोत्साहन मिलता है जो अफगानिस्तान में दोमुंही नीति पर चल रही   है | पहले तो उसने तालिबान लड़ाकों को अफगानिस्तान पर काबिज होने के लिए हर तरह की सहायता दी | यहाँ तक कि अनेक इलाकों में तो तालिबान की शक्ल में पाकिस्तानी सैनिक ही लड़ते रहे | लेकिन ज्योंहीं अमेरिका ने वहां से पलायन किया और सत्ता पर तालिबान बैठे त्योंही आईएस को तालिबान के विरुद्ध सक्रिय कर दिया | दरअसल इमरान सरकार तालिबान नेताओं की नीयत को लेकर आशंकित है जो पाकिस्तान के बड़े भूभाग को अफगानिस्तान का हिस्सा मानकर उसे वापिस लेना चाहते हैं | पाकिस्तान के पश्चिमी सीमान्त इलाकों में तालिबानी अड्डे पहले से ही बने हुए हैं जिन्हें खाली करवाना आज की तिथि में असंभव है | यही सोचकर उसने आईएस के रूप में एक मुसीबत तालिबानी सत्ता के लिए खड़ी कर दी है | हालाँकि तालिबान भी सुन्नी समर्थक हैं जिनके सत्ता में आते ही शिया आबादी में भय व्याप्त है | अनेक शियाओं की  ह्त्या के साथ ही उनके एक बड़े नेता की मूर्ति भी गिरा दी गयी | हजारा नामक शिया मुसलमानों को तो तालिबान काफ़िर मानते हुए गैर इस्लामी मानते हैं | हाल ही में शियाओं की उलेमा काउन्सिल ने तालिबान से सभी सम्प्रदायों के प्रति सद्भाव रखने की अपील भी की थी | ये देखते हुए गत दिवस शिया मस्जिद में हुए विस्फोट को अफगानिस्तान के बिगड़ते हालातों का ताजा प्रमाण कहा जा सकता है | इस घटना से अफगानिस्तान के पड़ोस में स्थित ईरान का नाराज होना स्वाभाविक है जो वैसे तो शिया मुसलमानों का सबसे बड़ा देश है किन्तु अमेरिका से  दुश्मनी की वजह से सुन्नी समर्थक तालिबान की वापिसी का पक्षधर रहा | गत दिवस हुई घटना के कारण दुनिया भर में फैले शिया मुसलमानों में गुस्सा और डर दोनों व्याप्त हैं क्योंकि  अफगानिस्तान के वर्तमान हालात पूरी तरह से अनिश्चित और तनावपूर्ण हैं | सत्ता मिलने के बाद भी तालिबान पूरी तरह अपनी सरकार नहीं बना सके हैं | उनके गुटीय झगड़े हिसंक रूप लेते रहते हैं | सरकार में शामिल कुछ बड़े नेताओं के जीवित रहने को लेकर अनिश्चतता बनी हुई है | कुछ हिस्सों में अभी तक कबीलाई सत्ता जारी है जो काबुल के अधीन होने के प्रति हिचक रखती है | इस माहौल में शिया मुसलमानों की मस्जिद में  जिस तरह से खून खराबा हुआ वह नए गृहयुद्ध की जमीन तैयार कर सकता है | इस घटना से  तालिबान की जीत का जश्न मना रहे दुनिया भर के मुसलमानों के सामने धर्मसंकट की स्थिति आ खड़ी हुई है | बेगुनाह शिया नमाजियों की नृशंस हत्या से ईरान की नाराजगी तालिबान को भारी पड़ सकती है | मध्य और पश्चिम एशिया के शिया बाहुल्य वाले  देश भी तालिबानी सत्ता के दौर में  शियाओं पर अत्याचारों को पसंद नहीं करेंगे और उस सूरत में खस्ता आर्थिक स्थिति से उबरना अफगानिस्तान के लिए मुश्किल हो जाएगा | अमेरिका  जैसी महाशक्ति को पलायन के लिए मजबूर करने में सफल होने के बाद से तालिबान के प्रति दुनिया भर के मुसलमानों के मन में प्रशंसा का भाव उत्पन्न हो गया था | उसकी कट्टर और आतंकवादी छवि के बावजूद इस्लाम के नाम पर उसे हाथों  – हाथ उठाते हुए दावा  किया जाने लगा कि अब तालिबान पहले जैसे क्रूर न होकर समन्वयवादी हैं | प्रारंभिक बयानों में उनकी तरफ से जिस तरह के आश्वासन दिए गये उनसे भी आशा का संचार हुआ था परन्तु जल्द  ही ये बात उजागर हो गई कि तालिबान के व्यवहार और नीतियों में लेशमात्र भी बदलाव नहीं आया | ये देखते हुए अफगानिस्तान को केवल इस्लामिक नहीं वरन सुन्नी इस्लामिक देश कहना ज्यादा सही होगा | आईएस को भले ही इस हादसे के लिए जिम्मेदार माना जावे लेकिन तालिबान भी तो शियाओं से उतनी ही घृणा करते हैं | कुल मिलाकर  मुसलमानों का आपसी संघर्ष मुस्लिम देशों की एकता में बाधक होने के साथ ही पश्चिम एशिया में युद्ध की आग को बुझने ही नहीं दे रहा | अफगानिस्तान में दो दशक बाद इस्लामी राज लौटा है ,  लेकिन पूत के पाँव पालने में नजर आने की कहावत अभी से चरितार्थ होने लगी है | हो सकता है आईएस ने जानबूझकर शियाओं को अपना निशाना बनाया हो जिससे तालिबान की छवि विश्व बिरादरी में खराब हो | पाकिस्तान भी आईएस को इसीलिये  आगे बढ़ा रहा है ताकि  अफगानिस्तान में आंतरिक उथल - पुथल बनी रहे और तालिबान अपना घर बचाने की चिंता में डूबे रहें | लेकिन इस्लाम को मानने वाले समझदार लोगों को इस बारे में विचार करना होगा कि क्या शिया संप्रदाय के लोग मुसलमान नहीं  हैं , जिन्हें नमाज पड़ते समय बेरहमी से मार दिया गया  | तालिबान सत्ता भले ही आईएस को कठघरे में खड़ा करते हुए अपनी चमड़ी बचाने की कोशिश करे किन्तु उसके अपने लड़ाके भी तो शिया मुसलमानों पर अमानुषिक अत्याचार करने में आगे – आगे रहते हैं | नमाज पढ़ने वालों की  सामूहिक हत्या सरीखे घृणित अपराध के कर्ताधर्ता अपने को मुसलमान भले कहते रहें किन्तु वे इंसान कहलाने के काबिल तो  नहीं हो सकते | मशहूर शायर निदा फाज़ली ने ऐसी ही किसी घटना पर व्यथित होकर लिखा था  :-

उठ – उठ के मस्जिदों से नमाजी चले गए , दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया |

- रवीन्द्र वाजपेयी
 

Friday, 8 October 2021

कश्मीर घाटी का जन सँख्या असंतुलन दूर करना जरूरी



कश्मीर घाटी  से लगातार तीसरे दिन बुरी खबर आई | बीते मंगलवार को श्रीनगर में तीन लोगों  की हत्या  के बाद बुधवार को  एक कश्मीरी पंडित दवा व्यवसायी की उसके परिसर में  गोली मारकर हत्या कर दी गई थी | गत दिवस भी श्रीनगर के एक सरकारी विद्यालय में कुछ आतंकवादी घुसे और सभी शिक्षकों के पहिचान पत्र देखने के बाद उनमें से दो को  मौत के घाट उतारकर भाग गये | मृतकों में एक सिख महिला प्राचार्य और दूसरा हिन्दू शिक्षक था | इस घटना की जिम्मेदारी जिस टीआरएफ नामक आतंकवादी संगठन ने ली उसकी जड़ें पाकिस्तान में बताई जाती हैं और वह लश्कर ए तैयबा की ही शाखा है जिसका उद्देश्य गैर मुस्लिमों को निशाना बनाना है | उसके प्रवक्ता अहमद खालिद ने एक बयान में कहा कि उनके संगठन ने पोस्टर के माध्यम से 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस समारोह नहीं मनाने कहा था लेकिन मारे गये दोनों शिक्षकों ने अभिभावकों और विद्यार्थियों को समारोह में शामिल होने को बाध्य किया | जैसी जानकारी आ रही है उसके अनुसार आतंकवादियों ने छोटी – छोटी घटनाओं के जरिये घाटी में रह रहे हिन्दुओं और सिखों में दहशत फ़ैलाने की योजना बनाई है | मंगलवार को जिन तीन लोगों को मारा गया उनमें कश्मीरी पंडित और स्थानीय व्यक्ति के अलावा बिहार का एक श्रमिक भी था | इस तरह तीन दिनों के भीतर राजधानी श्रीनगर में हुईं छह हत्याओं में पांच गैर मुस्लिम हैं | कल हुई वारदात में तो हत्यारों ने बाकायदा धर्म का पता कर  हत्या की | आज ही खबर आई है कि कश्मीर से पलायन कर चुके पंडितों की  संपत्ति पर किये गए अवैध कब्जे खाली करवाए जाने से भूमाफिया काफी नाराज है | राज्य सरकार ने घाटी से बाहर विस्थापित पंडितों से उनके संपत्ति का ब्यौरा पोर्टल पर मांगकर उस पर हुए अवैध कब्जे हटवाने का जो अभियान छेड़ा उससे कब्जेदार बौखलाए हुए हैं | ये जानकारी भी मिली है कि उक्त हत्याएं स्थानीय अपराधियों को पैसा देकर इसलिए करवाई जा रही हैं जिससे घाटी में रह रहे गैर मुस्लिमों के मन में खौफ पैदा हो और जो कश्मीरी पंडित घाटी  में लौटने की तैयारी कर रहे हैं उनका  उत्साह  ठंडा हो जाये |  बीते कुछ दिनों से अलगाववादियों ने  छोटी घटनाओं के जरिये दहशत फ़ैलाने की जो रणनीति प्रदर्शित की है उसका परिणाम जम्मू क्षेत्र के जो लोग घाटी में रह रहे हैं उनके घर लौटने से मिलने लगा है | कुछ समय पहले तक आतंकवादियों ने पुलिस और सुरक्षा बलों में कार्यरत मुस्लिमों को मारने का सिलसिला भी चलाया था जिसकी वजह से स्थानीय जनता में नाराजगी व्याप्त थी | शायद  इसीलिये अब मुस्लिमों को छोड़कर हिन्दू और सिखों को निशाना बनाया जा रहा है | हालांकि सुरक्षा बल भी घाटी के भीतर आतंकवादियों को घेरकर मारने में जुटे हैं और आये दिन उनके खात्मे की खबर भी आती है | लेकिन हत्याओं की इस श्रृंखला ने  संकेत दिया है कि अफगानिस्तान में तालिबानी हुकुमत के स्थापित होते ही कश्मीर घाटी में आतंकवाद को नए सिरे से खड़ा करने का प्रयास हो रहा है | इसीलिये इन घटनाओं को दूरगामी प्रभाव के मद्देनजर देखा जाना चाहिए | जम्मू में विधानसभा की सीटें बढ़ाकर कश्मीर घाटी का राजनीतिक प्रभुत्व कम करने से वहां  के राजनीतिक छत्रपों में घबराहट है |  अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार को ये बात समझ में आने लगी है कि विधानसभा सीटों का परिसीमन होने के बाद उनका आभामंडल फीका पड़ जाएगा | घाटी के  बाकी नेताओं को भी इस बात की  चिंता है कि अगर कश्मीरी पंडितों घाटी में लौटे तो इससे वहां भी राजनीति में उनकी हिस्सेदारी बढ़ने के साथ ही  भविष्य में कारोबार और नौकरियों में भी उनकी मौजूदगी नजर आयेगी | 1990 में पंडितों के पलायन के बाद घाटी में मुस्लिम समुदाय तकरीबन 99 फीसदी  हो गया जिससे आतंकवाद को पनपने के लिए अनुकूल हालात मिले | लेकिन बीते दो साल में  गैर मुस्लिमों की आवक - जावक  बढ़ने लगी थी | पर्यटन के क्षेत्र में भी बाहर से आये व्यवसायी संभावनाएं तलाशने लगे थे | जाहिर है यदि इस तरह हिन्दू और सिखों को मारने का सिलसिला जारी रहा तो फिर गैर मुस्लिमों को जान की चिंता सतायेगी और पर्याप्त सुरक्षा न मिली तो वे पलायन करने मजबूर होंगे | लेकिन इतनी जल्दी हताश होने की जरूरत भी नहीं है | केंद्र सरकार ने अचानक उत्पन्न परिस्थिति से निपटने के लिए उच्च स्तरीय बैठक बुलाई है वहीं जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने भी मौतों का हिसाब बराबर करने की बात कही है | लेकिन इस तरह की समस्या तब तक आती रहेगी जब तक  कश्मीर घाटी का जनसँख्या संतुलन मुस्लिमों के पक्ष में झुका रहेगा | केंद्र सरकार को चाहिए वह कश्मीरी पंडितों के अलावा देश के अन्य राज्यों के लोगों को वहां बसने की अनुमति के साथ उनकी सुरक्षा का समुचित प्रबंध भी करे | सेवा निवृत्त  फौजियों को घाटी में कृषि हेतु भूमि देकर बसाने जैसी योजना भी समय – समय पर चर्चा में आई है | उन्हें शस्त्र लायसेंस भी दिए जाएं जिससे समय पड़ने पर वे अलगाववादी तत्वों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे सकें | पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद यदि नियंत्रण में आया तो उसका एक कारण वहां जनसँख्या का असंतुलन न होने के साथ उसका अन्य राज्यों से घिरा होना था | कश्मीर घाटी के साथ ये समस्या जरूर है कि उसकी सीमा पाकिस्तान से मिलने से आतंकवाद का आयात आसानी से हो जाता है जिसमें उसका मुस्लिम बहुल होना सहायक बन जाता है | धारा 370 के खात्मे के बाद घाटी के अलगाववादी ये तो समझ गये हैं कि विशेष स्थिति वाला पुराना दौर तो आने से रहा | इसलिए वे इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि बाहर  से आने वालों के मन में  असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया जाए | हालाँकि धर्मनिरपेक्षता का झन्डा उठाकर घूमने वालों को  घाटी में जनसंख्या असंतुलन  खत्म करने की योजना में साम्प्रदायिकता नजर आते देर नहीं लगेगी लेकिन ये बात अक्षरशः सही है कि देश के जिस भाग में भी हिन्दू अल्पमत में आते हैं वहां अलगाववादी ताकतें मजबूत हो जाती हैं | कश्मीर घाटी के भीतर गैर मुस्लिमों की संख्या मुट्ठी भर होने के कारण भारत के प्रति निष्ठावान मुस्लिम भी डर के कारण चुप रहने मजबूर हो जाते हैं | अनेक मुस्लिम पुलिसकर्मी और फौजियों की  आतंकवादियों ने जिस बेरहमी से हत्या की  उससे आम कश्मीरी मुस्लिम भी खौफ खाता है | केंद्र सरकार को चाहिए कश्मीर घाटी के जनसँख्या असंतुलन को दूर करने के लिए भी  वैसा ही साहस दिखाए जैसा धारा 370 हटाने में दिखाया था | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 7 October 2021

बिंदरू की हत्या कश्मीरी पंडितों को रोकने की साजिश का हिस्सा है




श्रीनगर में गत दिवस एक प्रतिष्ठित कश्मीरी पंडित दवा व्यवसायी माखनलाल बिंदरू की ह्त्या को आतंकवादियों की हताशा से जोड़कर देखा जा रहा है | आतंकवादियों ने उनके प्रतिष्ठान में घुसकर उन्हें गोली मार दी | 1990 में कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन के भयावह दौर में भी उन्होंने श्रीनगर नहीं छोड़ा | बीते कुछ समय से सुरक्षा बल लगातार आतंकवादियों को ढूंढकर मार रहे हैं | सीमा पार से घुसपैठ में भी कमी आई है | इस कारण घाटी में बचे - खुचे अलगाववादी बौखलाहट में हैं | उनको सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात पर है कि आम जनता भी शान्ति के पक्ष में खड़ी नजर आ रही है | इसका सबसे बड़ा लाभ ये हुआ कि घाटी में इस साल पर्यटकों की संख्या ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए | कश्मीरी युवाओं को भी ये बात समझ में आने लगी है कि उनका भविष्य अलगाववादियों के साथ रहने से अंधकारमय हो जाएगा और जिस बन्दूक को उठाकर वे निर्दोष लोगों की हत्या करेंगे वही एक दिन उनकी मौत का जरिया बनेगी | जनजीवन सामान्य होने से अलगाववादियों के आश्रयस्थल भी लगातार कम होते जा रहे हैं | पंचायत चुनाव निर्विघ्न संपन्न होने के बाद घाटी के भीतरी हिस्सों में पहली बार विकास के छोटे – छोटे काम शुरू हो सके जिससे वहां के लोग आश्चर्यचकित हैं | आतंकवाद से दिखावटी दूरी बनाये रखते हुए अलगाववाद और पाकिस्तान परस्ती का प्रतीक बन चुकी हुर्रियत कांफ्रेंस की कमर भी टूट चुकी है | उसके नेताओं पर नियन्त्रण लगाये जाने का असर ये हुआ कि सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने और आतंकवादियों के जनाजे में जनसैलाब के उमड़ने जैसे दृश्य अब नहीं दिखाई देते | जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने जिस कुशलता से घाटी के जिम्मेदार लोगों से सीधे संवाद का तरीका अपनाया उससे भी माहौल सकारात्मक होने लगा है | जैसी जानकारी आ रही है उसके अनुसार घाटी से भगाये गये कश्मीरी पंडितों को दोबारा वहां बसाने की तैयारियां भी प्रशासनिक स्त्तर पर चल रही हैं | हालाँकि अलगाववाद के पोषक गुटों को उनकी वापिसी किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं है | कुछ बड़े नेता तो इससे घाटी में जनसँख्या का संतुलन बिगड़ने की आशंका भी व्यक्त कर चुके हैं | अतीत में सुरक्षा के लिहाज से कश्मीरी पंडितों को वापिस लाकर उनके लिए अलग आवासीय क्षेत्र बनाने की योजना बनी तब फारुख अब्दुल्ला जैसे नेताओं ने भी उसका ये कहते हुए विरोध किया था कि इससे सामुदायिक भेदभाव और बढ़ेगा | लेकिन दूसरी तरफ ये भी कहा जाता रहा कि बिना पंडितों के लौटे कश्मीर अधूरा है | मोदी सरकार द्वारा धारा 370 को हटा देने के बाद से जिस तेजी से हालात बदले उनमें कश्मीरी पंडितों की वापिसी के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल होने लगी थी. | ऐसा लगता है आतंकवादी इसी कारण चिंतित हैं और उसी वजह से दवा व्यवसायी माखनलाल बिंदरू की ह्त्या की गई जो आतंकवाद के चरमोत्कर्ष के समय भी घाटी छोड़कर नहीं गये | निश्चित तौर पर ये बहुत ही निंदनीय कृत्य है | पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने यद्यपि उनके घर जाकर इसे अमानवीय कृत्य तो बता दिया लेकिन कश्मीरी पंडितों की वापिसी को लेकर वे और उनकी पार्टी दोगलापन दिखाते आये हैं | यही हाल महबूबा मुफ्ती का भी है | संदर्भित ह्त्या दरअसल कश्मीरी पंडितों की वापिसी को रोकने की साजिश का ही हिस्सा है | हालाँकि आतंकवादी अब पहले जैसे ताकतवर तो नहीं लगते किन्तु स्व. बिंदरू के साथ जो हुआ उसके कारण घाटी में लौटने के इच्छुक पंडितों का हौसला कमजोर अवश्य पड़ सकता है और यही आतंकवादी चाहते भी हैं | स्व. बिंदरू की बेटी ने अपने पिता की हत्या पर कहा कि तुम्हारे हाथ में बन्दूक है तो हमारे पास पिता द्वारा दिलाई गई शिक्षा है | ये बात सर्वविदित है कि कश्मीरी पंडित घाटी के सर्वाधिक शिक्षित लोगों में होते थे | सरकारी नौकरियों के अलावा व्यवसाय में भी वे अग्रणी थे | इसलिए उनकी वापिसी अलगावादियों को रास नहीं आयेगी | श्रीनगर के साहसिक दवा व्यवसायी की हत्या भी इसी कारण की गयी ताकि देश के बाकी हिस्सों में जा बसे पंडित वापिस लौटने की हिम्मत ही न कर पाएं | ऐसे में जम्मू कश्मीर प्रशासन और केंद्र सरकार को माकूल कदम उठाने होंगे | जिस तरह धारा 370 को खत्म करना एक चुनौती थी ठीक वैसे ही कश्मीरी पंडितों का घाटी में पुनर्वास भी बहुत बड़ा काम है जिसे किये बिना केंद्र सरकार की पूरी मेहनत पर पानी फिर जायेगा | सरकार को चाहिए उनकी सुरक्षा और सुविधाओं का सामुचित प्रबंध करे | कश्मीरी पंडित हमारी संस्कृति के संवाहक रहे हैं | देश के पहले प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरु भी इसी समुदाय से थे और उनके प्रपौत्र राहुल गांधी भी अपने को सारस्वत गोत्र धारी कश्मीरी ब्राह्मण बताते हैं | बीते कुछ समय से घाटी में रहने वाले हिन्दुओं का मनोबल बढ़ा है | जन्माष्टमी पर निकली शोभा यात्रा के अलावा स्वाधीनता दिवस पर श्रीनगर के लालचौक में पाकिस्तानी ध्वज के बजाय तिरंगा फहराया जाना राष्ट्रवादी भावनाओं के मजबूत होने का प्रमाण है जिसे अलगाववादी पचा नहीं पा रहे और इसीलिये बीच – बीच में भय का वातावरण बनाने का काम करते हैं | लेकिन माखनलाल बिंदरू की हत्या से घबराए बिना केंद्र और राज्य प्रशासन को कश्मीरी पंडितों की घर वापिसी की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए ताकि धारा 370 हटाये जाने का उद्देश्य पूरा हो सके |

- रवीन्द्र वाजपेयी