Friday, 22 October 2021

100 करोड़ टीके लगने के बावजूद सतर्कता जरूरी



भारत सरीखे देश में 100 करोड़ लोगों को कोरोना के टीके लग जाना निश्चित तौर पर बड़ी उपलब्धि है | गत दिवस इस महत्वपूर्ण आंकड़े को पार कर देश ने महामारी के विरुद्ध लड़ाई में बड़ा मोर्चा फतह कर लिया | प्रधानमंत्री ने इसके लिए चिकित्सकों , नर्सों और उनका  सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है , जो वाकई इसके योग्य हैं |  टीकाकरण के पात्र 75 फीसदी वयस्कों को पहला और 31 फीसदी को  दोनों डोज लगना स्वप्न प्रतीत होता था लेकिन अब ये वास्तविकता है | भारत में चिकित्सा सुविधाओं की हालत  देखते हुए ये आशंका थी कि विशाल जनसँख्या को कोरोना का  रक्षा कवच माना  जा रहा टीका  लगाना शायद ही संभव होगा | लेकिन देश में न सिर्फ रिकॉर्ड समय में टीके बने अपितु तमाम अव्यवस्थाओं के बावजूद टीकाकरण अभियान का संचालन सफलतापूर्वक किया जा सका | आम जनता में टीके को लेकर भ्रम फ़ैलाने की कोशिशों को बेअसर करना भी बड़ी चुनौती थी | आम तौर पर ऐसे मौकों पर मुनाफखोरी और कालाबाजारी करने वाले अपना खेल दिखाने से बाज नहीं आते किन्तु टीकाकरण अभियान को इससे बचाकर रखने के लिए सरकार सहित सभी सम्बन्धित लोग साधुवाद के पात्र हैं | इस अभियान की कामयाबी से देश का आत्मविश्वास दो स्तरों पर बढ़ा | अव्वल तो आपदा प्रबंधन करने में  सरकारी मशीनरी की  कार्यकुशलता सामने आई और उससे  भी बड़ी बात ये हुई कि टीका लगवाने वाले लोगों के मन में समाया कोरोना का भय  कम हुआ , जो बड़ी जरूरत थी | महामारी की दूसरी लहर में मौत का जो मंजर देश ने देखा वह दिल दहलाने वाला था | लाखों लोग अस्पतालों में बिस्तर उपलब्ध न होने से जान गँवा बैठे | ऑक्सीजन की कमी ने भी कोरोना की भयावहता को और बढ़ा दिया था | लेकिन टीकाकरण अभियान की निरंतरता और विस्तार ने महामारी के प्रकोप को थामने में जो योगदान दिया वह निःसंदेह बड़ी उपलब्धि कही जायेगी | इस बारे में गौरव करने वाली बात ये है कि इस विराट अनुष्ठान की शुरुवात देश में बने टीके से हुई | हालाँकि उनका आयात भी हुआ किन्तु  दूसरी तरफ भारत ने अनेक जरूरतमंद देशों को टीका निर्यात कर मानवता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन किया | वयस्कों की अधिकांश आबादी को पहला टीका लग जाने के बाद अब बच्चों के टीकाकरण की शुरुवात किये जाने की तैयारी चल रही है | इससे पता चलता है कि टीके की उपलब्धता और उसे लगाने के लिए आवश्यक प्रबंधन कर लिया गया है | संतोष का विषय है कि आम जनता ने विघ्नसंतोषियों के बहकावे में न आते हुए टीकाकरण को अपनाया | इसी के साथ ही विभिन्न संस्थाओं और समाजसेवियों ने भी इस काम में सक्रिय सहयोग देकर दायित्वबोध का निर्वहन किया | किसी भी देश की असली ताकत ऐसी ही आपदाओं का सामना करने  की क्षमता और तरीके से होती है | कोरोना का हमला बहुत ही प्रचंड था  जिसके इलाज और रोकथाम के बारे में पूरी दुनिया के अनजान होने से ये आशंका थी कि भारत जैसे विकासशील देश में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में करोड़ों लोग जान गँवा बैठेंगे किन्तु सौभाग्य से ऐसा नहीं हुआ | वरना अमेरिका , इटली , ब्रिटेन , जर्मनी और फ्रांस सदृश विकसित देशों में जिस बड़े पैमाने पर कोरोना से लोग मारे गये उसे देखते हुए भारत में होने वाली जनहानि अकल्पनीय हो सकती थी किन्तु वह अपनी विशाल जनसँख्या के मद्देनजर न्यूनतम जनहानि के साथ इस महामारी से निकल आया | तीसरी लहर की आशंका का लगातार कम होता जाना भी परम संतोष का विषय है | लेकिन जब तक बच्चों सहित पूरी आबादी को टीका नहीं लग जाता तब तक निश्चिन्त होकर बैठ जाना गलत होगा | कोरोना का प्रकोप दिन ब दिन घटने के बावजूद उसकी मौजूदगी बनी हुई है | ऐसे में 100 करोड़ टीकों का जश्न मनाने के साथ ही कोरोना के प्रति सावधानी बरतने हेतु जनजागरण भी जारी रहना चाहिए क्योंकि पहली लहर कमजोर पड़ने के बाद जनता में आई बेफिक्री ने ही दूसरी लहर को आने का मौका दिया था | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


किसान और इंसान अलग नहीं होते



किसान आन्दोलन के अन्तर्विरोध नित्य सामने आने लगे हैं | दिल्ली की  सीमा पर चल रहे धरने में एक व्यक्ति की निहंगों ने जिस बेरहमी से हत्या की उसके बाद संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य योगेन्द्र यादव ने निहंगों से धरना स्थल छोड़ने की  अपील करते हुए स्पष्ट किया कि इस आन्दोलन का किसी धर्म से कोई लेना देना नहीं है |  लेकिन इस बीच एक नया विवाद पैदा हो गया | हुआ यूं कि श्री यादव के  लखीमपुर खीरी में मारे गये एक भाजपा कार्यकर्ता के घर सम्वेदना व्यक्त करने जाने से नाराज संयुक्त किसान मोर्चा ने उन्हें 9 सदस्यों वाली समिति से एक माह के लिए निलम्बित कर दिया | इस पर उन्होंने  कहा कि वे अपने सिद्धांत नहीं  छोड़ सकते और मौत का दर्द सभी के लिए समान  है | श्री यादव इस आन्दोलन के बौद्धिक चेहरे माने  जाते हैं | उनके  वामपंथी झुकाव से अनेक गैर किसान संगठन और बुद्धिजीवी भी किसानों के हमदर्द बनकर सामने आये | किसानों को दिल्ली की सीमा पर डेरा जमाकर बैठे रहने की  समझाइश श्री यादव द्वारा दिए जाने की बात भी  सुनने में आई | ऐसे में उन्हें आन्दोलन की सर्वोच्च सञ्चालन समिति से निलम्बित किया जाना चौंकाता है | लेकिन उससे भी अधिक आश्चर्य की बात उनके निलबंन का कारण है | लखीमपुर खीरी में मारे  गये किसानों के प्रति तो सहानुभूति का सैलाब आ गया लेकिन प्रतिक्रियास्वरूप मारे गये भाजपा कार्यकर्ताओं की मौत पर उपेक्षा का पर्दा डालने का प्रयास भी हुआ | उस दृष्टि से भाजपा के ऐलानिया विरोधी होने के बावजूद श्री यादव का मृतक कार्यकर्ता के परिवारजनों से मिलना सहज मानवीयता थी जिसकी सराहना होनी चाहिए थी | लेकिन उनको निलम्बित कर संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने दिमागी दिवालियेपन के साथ ही अमानवीय सोच का परिचय दिया है | इससे ये भी  साफ़ होता है कि आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे कथित नेता बहुत ही संकुचित मानसिकता वाले हैं जिनकी नजर में मरने वाला गैर किसान ,इंसान नहीं होता | योगेन्द्र यादव  आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य थे  जिन्हें अरविन्द केजरीवाल एंड कम्पनी ने धकियाकर बाहर कर दिया था | बाद में उन्होंने अपनी पार्टी भी बनाई किन्तु उसे विशेष सफलता नहीं मिली | किसान आन्दोलन में भी उनकी मौजूदगी बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी ही थी |  संयुक्त किसान मोर्चा के ताजा फैसले के बाद ये स्पष्ट हो गया कि किसान नेता भी श्री यादव से मुक्ति पाना चाह रहे थे लेकिन उनको निलम्बित करने की जो वजह बताई गई वह किसी भी स्तर पर उचित नहीं हो सकती और इससे विरोधियों के मन में भी उनके प्रति सहानुभूति उत्पन्न होगी | 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 21 October 2021

भ्रष्टाचार मुक्त भारत की शुरुवात भाजपा शासित राज्यों से करें प्रधानमंत्री



प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से जब कुछ भी बोलते हैं तो उसे सरकार की आवाज माना जाता है | उस दृष्टि से गत दिवस नरेंद्र मोदी ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग ( सीवीसी ) और केन्द्रीय जांच ब्यूरो ( सीबीआई ) के अधिकारियों के  सम्मलेन को संबोधित करते हुए भ्रष्टाचार के विरुद्ध सम्पूर्ण असहनशीलता की नीति अपनाने के साथ ही ये भी  कहा कि इन एजेंसियों  का काम किसी को डराने का नहीं अपितु लोगों के मन से डर निकालना है | लेकिन उनके उद्बोधन की सबसे महत्वपूर्ण बात  ये थी कि बीते कुछ वर्षों में उनकी सरकार लोगों में ये विश्वास जगाने में सफल रही है कि भ्रष्टाचार पर रोक लगना संभव है और नया  भारत भ्रष्टाचार को व्यवस्था का हिस्सा मानने की मानसिकता को जारी रखने के लिए तैयार नहीं है | श्री मोदी की छवि एक साफ – सुथरे नेता की रही है | उनकी नीतियों की आलोचना भले होती हो लेकिन व्यक्तिगत तौर पर उन्हें ईमानदार माना जाता है | उनके पूर्ववर्ती डा.मनमोहन सिंह भी निजी तौर पर भ्रष्टाचार से दूर थे लेकिन उनके शासनकाल में  अनेक घपले और घोटाले होने से  सरकार की छवि बहुत खराब हुई | जहां तक बात  श्री मोदी की है तो उन्होंने केन्द्रीय स्तर पर व्यवस्थाजनित भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए काफी कदम उठाये लेकिन केन्द्रीय सचिवालय को ही देश नहीं माना जा सकता | प्रधानमन्त्री का ये कहना पूरी तरह सही है कि नया भारत  भ्रष्टाचार को व्यवस्था का हिस्सा मानने तैयार नहीं है किन्तु  इस आशावाद को वास्तविकता में बदलने के हालात निचले स्तर पर कहीं भी नजर नहीं आते | उनका ये दावा कि लोगों में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के बारे में विश्वास जागा है , उनके पास पहुंचाई जा  रही सूचनाओं और आंकड़ों पर आधारित हो सकता है परन्तु  ये जमीनी सच्चाई नहीं है | मोदी जी ने सत्ता सँभालते ही केन्द्रीय सचिवालय की  व्यवस्था में तो काफी  सुधार और बदलाव कर दिए | जैसा सुनाई देता है उसके अनुसार मंत्रीमंडल के सदस्यों पर भी पैनी निगाह रखी जाती है जिससे भ्रष्टाचार की गुंजाईश नहीं रहती लेकिन भाजपा के भीतर भी ये चर्चा आम है कि  मंत्रियों को स्वतंत्र होकर काम  करने के अवसर ही नहीं दिए जाते और सारे महत्वपूर्ण फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय से ही होते हैं | केन्द्रीय सचिवालय के अधिकारियों के बारे में भी ये कहा जाता है कि वे  विभागीय मंत्री की बजाय प्रधानमंत्री  कार्यालय से निर्देशित होते हैं | ऐसे में श्री मोदी के मन में ये विश्वास होना स्वाभाविक है कि उनकी सरकार ने भ्रष्टाचार नामक अमरबेल की जड़ों में मठा डालने का काम कर डाला | लेकिन वास्तविकता के धरातल पर उतरकर देखें तो डिजिटल तकनीक के प्रचलन और अनेक क्षेत्रों में पारदर्शी व्यवस्था लागू होने के बावजूद आम जनता  के मन से ये विश्वास दूर नहीं  किया जा सका कि बिना भ्रष्टाचार के सरकारी विभाग से जुड़े हुए काम संपन्न हो सकेंगे | जहाँ तक बात सीवीसी और सीबीआई की है तो इनके बारे में भी  ये अवधारणा  नहीं बदली  जा सकी कि वे  पूरी तरह स्वायत्त हैं | इनका उपयोग डराने के लिए नहीं होना चाहिए , ये बात सैद्धांतिक तौर पर तो पूरी तरह सही है लेकिन सरकार चाहे किसी की रहे उक्त जाँच एजेंसियां हुक्मरानों के इशारे पर नाचने मजबूर होती हैं | और फिर जब सीबीआई में राज्यों की  पुलिस के अधिकारी ही प्रतिनियुक्ति पर जाते हों तब उसे पूरी तरह पाक - साफ होने का प्रमाणपत्र देना अतिशयोक्ति होगी | जहां तक  तक सीवीसी का प्रश्न है तो उसकी कार्यप्रणाली पर भी  उँगलियां उठती रही हैं | ऐसे में प्रधानमंत्री के उदगार रस्मी भाषण से अधिक कुछ नहीं है | सच्चाई ये है कि भ्रष्टाचार दिल्ली से लेकर ग्राम पंचायत तक बदस्तूर फैला हुआ है | महंगाई के साथ ही उसके दाम भी बढ़ते जा रहे हैं और राजनीति इस बुराई को सहयोग और संरक्षण देने में सबसे आगे है | मोदी जी की अपनी पार्टी की जिन राज्यों में सरकारें हैं उनको भी भ्रष्टाचार मुक्त नहीं कहा जा सकता | ऐसे में उसको व्यवस्था का अंग नहीं मानने जैसी धारणा  खयाली पुलाव पकाने जैसा ही है | सरकारी दफ्तरों के बारे में सर्वविदित है कि उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को मिटाए बिना व्यवस्था को शुद्ध नहीं किया जा सकता | अब तो सरकारी मुलाजिम भी घूस लेते समय साफ़ कहता है कि ऊपर भी देना पड़ता है | ऐसे में प्रधानमंत्री को चाहिये कि वे उन मूलभूत कारणों का पता करवाएं जिनके कारण भ्रष्टाचार निचले स्तर तक फ़ैल गया | भ्रष्टाचार व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनते – बनते शिष्टाचार कैसे बन गया ये गहन  विश्लेषण का विषय है | प्रधानमंत्री पार्टी संगठन का कार्य करते – करते अचानक  मुख्यमंत्री बने थे | उस समय तक उनको प्रशासन का अनुभव भी नहीं था | लेकिन इस बात की तारीफ करनी होगी कि उन पर  भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा जिसके कारण गुजरात विकास का प्रतीक बन गया | ये कहना गलत न होगा कि प्रधानमंत्री बनने में बतौर मुख्यमंत्री उनके कार्यकाल का बड़ा योगदान था | लेकिन  भारत का प्रधानमंत्री बनने के बावजूद वे राज्यों की शासन व्यवस्था को एक सीमा के बाद प्रभावित नहीं कर सकते | राजनीतिक मतभेदों का स्तर इस हद तक गिर गया  है कि अनेक राज्यों ने  केंद्र सरकार से वैचारिक मतभेद  के कारण सीबीआई को अपने यहाँ कार्य करने से रोक दिया है | ये सब देखते हुए प्रधानमंत्री ने  भ्रष्टाचार के बारे में जो कुछ कहा वह केवल भाषण सीमित न रहे यह चिन्तन का विषय है क्योंकि वह  कार्य संस्कृति का पर्याय बन चुका है | प्रधानमंत्री यदि वाकई देश को इस बुराई से मुक्त करवाना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले भाजपा शासित राज्यों को भ्रष्टाचार मुक्त करवाने का काम करना होगा जिससे पार्टी विथ डिफ़रेंस का दावा कसौटी पर खरा साबित हो सके | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 20 October 2021

कश्मीर से आतंकवाद के खात्मे के लिए इजरायल की कार्यप्रणाली अपनाई जावे



कश्मीर घाटी में आतंकवादियों द्वारा की गईं हालिया हत्याओं के कारण वहां अन्य राज्यों के प्रवासी श्रमिकों के पलायन के साथ ही तीन दशक पहले  घर छोड़ने मजबूर हुए कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की योजना खटाई में पड़ रही  है | पर्यटकों की आवाजाही पर भी विपरीत असर पड़ा है जिससे व्यवसायिक गतिविधयों को भी नुकसान हो रहा है | सबसे बड़ी बात ये हुई कि  आम जनता के मन में सुरक्षा की जो भावना जागी थी उसमें  कमी आने लगी | घाटी से जो खबरें आ रही हैं उनसे  बाहरी लोगों के साथ ही गैर मुस्लिम समुदायों के लोगों को भी अपना  जीवन `खतरे में नजर आने लगा है | श्रीनगर की डल झील के किनारे गोलगप्पे बेचने वाले बिहार के एक युवक ने जम्मू जाने वाली बस में बैठते समय कहा कि उसके खोमचे पर आने वाला व्यक्ति ग्राहक है या आतंकवादी , ये पहिचानना कठिन होने के बाद यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है | बाहरी श्रमिकों के साथ ही अनेक स्थानीय गैर मुस्लिमों की अकारण हत्या और उसके बाद घाटी छोड़कर जाने की धमकियों से घड़ी की सुइयां 1990 के उस खौफनाक दौर पर लौटने लगीं जब रातों -  रात हजारों कश्मीरी पंडितों सहित अन्य हिन्दू परिवारों को महिलाओं की आबरू के साथ ही परिवार की जान बचाने की खातिर भागकर आना पड़ा | दो साल पहले केंद्र सरकार द्वारा जब धारा 370 हटाई गई तभी से ये उम्मीद की जाने लगी थी कि घाटी छोड़कर गए हिन्दू समुदाय के विस्थापित अपने घरों को लौट सकेंगे | पत्थरबाजी की घटनाओं में कमी  आने के साथ ही आतंकवादी वारदातें भी घटीं |  नमाज के बाद मस्जिदों से निकलती  भीड़ द्वारा पाकिस्तानी झंडे लहराते हुए भारत विरोधी नारे लगाने जैसे दृश्य समाप्तप्राय हो गए | श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के साथ जन्माष्टमी की  शोभायात्रा निर्बाध निकलने से भी ये एहसास जागा कि घाटी में भारत विरोधी ताकतों के हौसले पस्त हो चुके हैं | राजनीतिक नेतागण भी  धमकी  की  बजाय चिकनी चुपड़ी बातें करने लग गये | लेकिन बीते कुछ दिनों में ही ऐसा लगने लगा कि सारे किये – कराये पर पानी फिर गया | पर्यटकों की आवाजाही  रुकने से पूरे देश में ये संदेश फ़ैल गया कि कश्मीर घाटी बाहरी लोगों के लिए अब भी असुरक्षित ही है | अन्य राज्यों से आकर मजदूरी या खोमचे लगाकर पेट पालने वाले कुछ लोगों की बेवजह हत्या ने दहशत का दौर  लौटने की पुष्टि कर दी | भले ही सुरक्षा बल आये दिन दो चार आतंकवादियों को घेरकर मारने में सफल हो रहे हों किन्तु  ये कहा जा  सकता है कि आतंकवादियों ने छोटी – छोटी घटनाओं को अंजाम देकर कश्मीर घाटी में लौटने की सोच रहे हिन्दुओं को भयग्रस्त करने के साथ ही स्थानीय जनता के मन में भी ये बात बिठाने का प्रयास किया कि वे धारा 370 हटाये जाने के बाद हुए बदलाव को स्थायी मानकर भारत विरोध की मानसिकता को त्यागने से दूर रहें | वे अपने मकसद में कितने कामयाब हुए इसका आकलन फिलहाल  करना जल्दबाजी होगी लेकिन ताजा वारदातों से दहशत का जो वातावरण बना उसकी वजह से आतंकवादियों का मनोबल जरूर ऊंचा  हुआ है | सबसे अहम बात ये है कि केंद्र सरकार ने धारा 370 हटाने के साथ ही घाटी में सामान्य स्थिति बनाने के लिए जितना कुछ किया वह गुड़ - गोबर होने जैसी स्थिति में आ गया | निश्चित रूप से ये स्थिति चिंताजनक है | केंद्र सरकार ने यही देखते हुए  सुरक्षा और गुप्तचर एजेंसियों की बैठक कर घाटी में उभरे आतंकवाद के नए संस्करण के विरुद्ध निर्णायक जंग छेड़ने के संकेत दिए हैं | सीमावर्ती पुंछ इलाके से लोगों को हटाये जाने के फैसले से ये लग रहा  है कि सुरक्षा बल किसी  बड़े अभियान की तैयारी में जुट गए हैं | गृह मंत्री अमित शाह ने दो – तीन दिन जम्मू – कश्मीर में रहकर हालात का जायजा लेने का जो निर्णय लिया वह इस ओर इंगित कर रहा है कि  हालात बेकाबू होने से पहले ही  इस तरह के पुख्ता इंतजाम किये जाएंगे जिनसे आतंकवादियों की कमर तोड़ीं जा सके | ये जरूरी भी है क्योंकि जम्मू कश्मीर की भौगोलिक स्थिति  संवेदनशील होने के साथ ही बहुत ही विकट है | आतंकवाद से आंतरिक सुरक्षा को उत्पन्न खतरे को स्थायी रूप से खत्म करना समय की मांग है क्योंकि ऐसा किये बिना कश्मीर घाटी में भारत विरोधी भावना को समय – समय पर पनपने से रोक पाना असम्भव होगा | केंद्र सरकार इस दिशा में क्या करने वाली है ये तो उसे ही पता होगा लेकिन जन  आकांक्षा यही है कि  स्थायी इलाज करने में देर नहीं करनी चाहिए | घाटी में चाहे कश्मीरी पंडित दोबारा बसाए जाएं या पूर्व सैनिक,  लेकिन वहां जब तक जनसँख्या का असंतुलन रहेगा तब तक पाकिस्तान और चीन को गड़बड़ी फ़ैलाने का अवसर मिलेगा | एक बात तो प्रमाणित सत्य है कि कश्मीर में आतंकवाद को खाद – पानी सीमा पार से ही मिला करता है | इसलिए सुरक्षा बलों को दो मोर्चों पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कदम उठाना पड़ेगा | सीमा पार जाकर आतंकवाद के अड्डे नष्ट करना साधारण काम नहीं है | लेकिन उनके  आने के रास्ते अवरुद्ध करने का पुख्ता इंतजाम किया जा सकता है | इसी के साथ ही घाटी में आतंकवाद की जड़ों को खोद डालने की हरसंभव कोशिश करनी होगी जिससे वहां  की जनता के मन में ये विश्वास पुख्ता हो सके कि आतंकवादी अपराजेय नहीं हैं | मौजूदा माहौल में एक बात  उम्मीदें  जगाने वाली है कि 1990 में जहां मस्जिदों से कश्मीरी पंडितों को घाटी से भाग जाने की धमकी दी जा रही थी वहीं इस बार ये अपील की जा रही है कि कोई डर के कारण घाटी न छोड़े | भले ही ये दिखावे के लिए हो किन्तु इससे एक बात साबित होती है कि धारा 370 हटने के बाद आम कश्मीरी के मन में  ये बात गहराई तक समा चुकी है कि राज्य की विशेष स्थिति लौटना अब दिवास्वप्न है | घाटी के युवाओं में भी आतंकवाद के साए से निकलकर अपना भविष्य बनाने की उत्कंठा पैदा हुई है | भारत सरकार को चाहिए वह कश्मीर से आतंकवाद को उखाड़ फेंकने के लिए इजरायल की कार्यप्रणाली अपनाये क्योंकि  सांप का फन कुचले बिना उसे मरा हुआ समझना भूल होती है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 19 October 2021

काबुल , कश्मीर और ढाका में हिन्दुओं पर हमले किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हैं


मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी

काबुल , कश्मीर और ढाका में हिन्दुओं पर हमले किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हैं  

कश्मीर में अन्य राज्यों के गैर मुस्लिम श्रमिकों की हत्या के साथ ही बांग्ला  देश से भी हिन्दू समुदाय के लिए चिंताजनक खबरें आने लगीं | नवरात्रि  के दौरान दुर्गा पंडालों पर हमले किये जाने के बाद  मंदिरों को निशाना बनाया जाने लगा और अब ग्रामीण इलाकों में हिन्दुओं के घर जलाये जाने जैसी वारदातों की खबर है | वहां की सरकार इन घटनाओं को पूर्व नियोजित बताते हुए हिन्दुओं और मुसलिमों के बीच सौहार्द्र बिगाड़ने की साजिश बता रही है |  गृहमंत्री ने तो यहाँ तक कहा कि 2023 में होने वाले आम चुनाव के पहले कट्टरपंथी ताकतें  माहौल बिगाड़ने की साजिश के तहत ऐसा कर रही  हैं | उनके अलावा सूचना राज्य मंत्री ने भी साफ़ – साफ़ कहा है कि उनका देश इस्लामिक राष्ट्र न होकर धर्म निरपेक्ष है | सरकारी एजेंसियों ने अनेक गिरफ्तारियों की जानकारी भी दी है | ये बात भी सामने आई है कि फेस बुक पर किसी आपत्तिजनक टिप्पणी से आक्रोशित होकर हिन्दुओं पर ये हमले किये गये  | इस बारे में उल्लेखनीय है  कि शेख हसीना के नेतृत्व वाली बांग्ला देश सरकार ने भारत  के साथ अच्छे कूटनीतिक और करोबारी रिश्ते बनाये रखे जिसके  कारण सीमा विवाद जैसे तमाम मसले सहजता से सुलझाए जा सके | बांग्ला देश में हिन्दुओं की खासी  आबादी होने से अनेक बड़े मंदिर और तीर्थस्थल हैं | पूरा देश बांग्लाभाषी है और खान – पान तथा रहन सहन में भी साम्यता है | देश के पहले शासक शेख मुजीबुर्रहमान ने पाकिस्तान से अलग होने के बाद अपने देश को इस्लामिक देश नहीं  बनाया जिसका एक कारण उसके निर्माण में भारत का ऐतिहसिक सहयोग भी था किन्तु वे  महज चार साल के बाद ही मार डाले गाये और उसके बाद लम्बे समय तक  मुल्क में राजनीतिक अस्थिरता के साथ ही कट्टरता का बोलबाला रहा | हालाँकि शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद हालातों में सुधार आया किन्तु हिन्दुओं के विरुद्ध नफरत फ़ैलाने वाली शक्तियाँ भी सक्रिय बनी रहीं जिसकी वजह से उनके  धर्मस्थलों पर हमले जैसी घटनाएँ होती रहीं | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिस पाकिस्तान के विरुद्ध लड़कर बांग्ला देश अस्तित्व में आया उसके आतंकवादी संगठनों को इस  देश में  भी पनाह मिलती रही | भारत में हुई अनेक आतंकवादी घटनाओं के तार भी उससे जुड़े पाए गए | यद्यपि पाकिस्तान की तरह से बांग्ला देश की वर्तमान सरकार आतंकवादी संगठनों को संरक्षण और सहायता नहीं देती किन्तु वहां इस्लामिक कट्टरपंथ के समर्थक भी काफी हैं जो पाकिस्तान प्रायोजित  आतंकवादी संगठनों को गोद में बिठाने के पक्षधर हैं | इस आधार पर  हिन्दुओं पर हुए हालिया हमले केवल इस देश का आन्तरिक मामला न होकर अंतर्राष्ट्रीय घटनाचक्र से जुड़ा हुआ लगता  है | अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता आने के बाद से इस्लामिक कट्टरपंथ का हौसला  मजबूत हुआ है | काबुल में गुरुद्वारों और मंदिरों को आतंकित किये जाने के बाद कश्मीर घाटी में  गैर मुस्लिमों की हत्या कर  उन्हें वहां से चले जाने के लिए बाध्य किये जाने के साथ ही बांग्ला देश में दुर्गा पंडालों , मंदिरों और अब हिन्दुओं के घरों में आगजनी की घटनाओं को अलग – अलग देखना सही नहीं होगा | इस बारे में उल्लेखनीय बात ये है कि हमारे देश के एक बड़े तबके ने अमेरिका  विरोध की मानसिकता के वशीभूत काबुल में कट्टरपंथी इस्लामिक सत्ता के काबिज होने पर जोरदार  जश्न मनाते हुए उसे आजादी का नाम दिया | उनके साथ  तमाम इस्लामिक संगठनों के प्रमुखों ने भी बाकायदा तालिबान के समर्थन में बयान देकर खुशी ज़ाहिर की | अनेक राजनीतिक नेताओं ने भारत सरकार पर तालिबानी हुकूमत से  कूटनीतिक रिश्ते कायम करने की मांग भी कर डाली |  ये कहना गलत नहीं है कि कश्मीर घाटी में अचानक प्रारम्भ हुई आतंकवादी घटनाओं के पीछे अफगानिस्तान में हुए सत्ता परिवर्तन का भी हाथ है | इसी तरह बांग्ला  देश में एकाएक आई हिन्दू विरोधी लहर के सम्बन्ध भी पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी संगठनों से हो सकते हैं | गौरतलब है प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में ममता बैनर्जी की  धमाकेदार जीत का कारण  राज्य के लगभग तीस फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का तृणमूल कांग्रेस को एकमुश्त  समर्थन माना जाता है जिनमें बहुत बड़ी संख्या बांग्ला देश से आये घुसपैठियों की है जिन्हें पहले वामपंथी और फिर ममता सरकार ने वोट बैंक की खातिर भारत का नागरिक बना दिया |  उसकी वजह से  भी  बांग्ला देश के कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों का हौसला मजबूत हुआ है | गत दिवस कोलकाता की फुरफुरा शरीफ के एक पीर द्वारा कुरान के अपमान पर सिर काट लेने की धमकी दिया जाना साधारण बात नहीं है क्योंकि बांग्ला देश में हिन्दुओं पर टूटे कहर की वजह भी सोशल मीडिया पर की गयी विवादित टिप्पणी को माना जा रहा है | ये देखते हुए काबुल से बरास्ते कश्मीर ,  ढाका तक हिन्दुओं के विरुद्ध जो हिंसक घटनाएँ हो रही हैं वे किसी सुनियोजित साजिश का हिस्सा हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | इसका कारण भारतीय उपमहाद्वीप में  शामिल देशों मसलन  पाकिस्तान , नेपाल , भूटान , बांग्ला देश , श्रीलंका के अलावा म्यांमार , अफगानिस्तान और मालदीव में सक्रिय भारत विरोधी शक्तियों की  संगामित्ती है | आज के संदर्भ में इनमें से अधिकतर के साथ हमारे रिश्ते प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तनावपूर्ण हैं | इसके पीछे अब तक चीन और पाकिस्तान की भूमिका को जिम्मेदार माना जाता था किन्तु अफगानिस्तान में तालिबान की वापिसी से इस्लाम के नाम पर भारत विरोधी ताकतों को नया संरक्षक मिल गया  है | इसलिए  भारत सरकार को अब नए सिरे से अपनी कूटनीतिक  रचना करनी होगी | भारत में जो लोग तालिबानी हुकूमत की तरफदारी करने में आगे – आगे थे उनका  कश्मीर और बांग्ला देश में हिन्दुओं पर हो रहे हमलों पर  मौन रहना चौंकाने वाला  है | भारत भले ही धर्म निरपेक्ष हो लेकिन इस्लामिक जगत की नजर  में उसे हिन्दुओं का देश ही माना जाता है | ताजा घटनाक्रम को इसीलिये इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों द्वारा भारत के विरुद्ध रची जा रही व्यूह रचना के तौर पर देखा जाना चाहिए | आश्चर्य की बात है भारत में अल्पसंख्यकों के हमदर्द बने रहने वाले नेतागण कश्मीर घाटी और बांग्ला देश की घटनाओं का अपेक्षित संज्ञान नहीं ले रहे | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 18 October 2021

बाहरी मजदूरों की हत्या कश्मीरी पंडितों को डराने का षडयंत्र



 जब पूरे देश का ध्यान लखीमपुर खीरी और दिल्ली की सिन्धु सीमा पर निहंगों द्वारा एक दलित की हत्या पर केन्द्रित है तब कश्मीर घाटी में आतंकवाद के नए संस्करण की शुरुवात हो गयी है | बीते कुछ दिनों से सुरक्षा बलों की बजाय आम नागरिकों की हत्या की जा रही है | इनमें विशेष रूप से दूसरे राज्यों से घाटी में आकर रोजी – रोटी कमा रहे श्रमिक हैं जिनका  राजनीति से कोई लेना - देना नहीं है | गत दिवस दो बिहारी मजदूरों को घर में घुसकर गोली मार दी गई | हालांकि सुरक्षा बल भी आतंकवादियों को निशाना बना रहे हैं तथा कोई बड़ा हमला भी नहीं हुआ है लेकिन ज्योंही  कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास का सिलसिला शुरू हुआ , आतंकवादियों ने बाहरी मजदूरों को अपना लक्ष्य बनाकर भय का माहौल निर्मित कर दिया | परिणामस्वरूप जो कश्मीरी पंडित हाल ही में अपने घर लौटे थे वे बोरिया - बिस्तर समेटकर जाने लगे और जो आने की तैयारी कर रहे थे , उन्होंने इरादा बदल दिया | आतंकवादी भारत सरकार की पुनर्वास योजना  को भांप गये थे , इसीलिये उन्होंने घाटी में कार्यरत मजदूरों सहित अन्य लोगों की जान लेना शुरू कर दिया | चूँकि बाहरी मजदूर अक्सर किसी साधारण जगह पर रहते हैं और उनके लिए अपनी सुरक्षा का प्रबंध करना भी आसान नहीं होता इसलिए आसानी से आतंकवादियों के  शिकार हो जाते हैं | कुछ दिन पहले राज्य के पुलिस प्रमुख ने कहा था कि आतंकवादी  स्थानीय युवकों को पैसों का लालच देकर  साधारण लोगों की हत्या करवा रहे हैं | उनकी आवाजाही पर सुरक्षा बलों को संदेह भी नहीं होता | और वारदात करने के बाद वे सरलता से लोगों में घुल मिल जाते हैं | दरअसल घाटी में आतंकवादियों के जाल को तहस - नहस करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा चलाये जा रहे अभियान की वजह से अब वे बड़ी वारदात करने की बजाय छोटी घटनाओं के जरिये दहशत पैदा करने की रणनीति पर चल रहे हैं | हालाँकि पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारुख अब्दुल्ला का दावा  है कि  ताजा घटनाओं  के पीछे स्थानीय कश्मीरियों का हाथ नहीं है |  उनके ऐसा कहने के पीछे भी निहित उद्देश्य है क्योंकि  सरकारी विद्यालय में घुसकर एक सिख महिला प्राचार्या और हिन्दू शिक्षक के पहिचान पत्र से  गैर मुस्लिम होने की पुष्टि करने के बाद उनकी हत्या की  घटना के बाद सुरक्षा बलों ने एक हजार से ज्यादा संदिग्धों की धरपकड़ कर डाली | डा. अब्दुल्ला ने अप्रत्यक्ष रूप से इन गिरफ्तार लोगों की तरफदारी की है  | घाटी के राजनीतिक दल इस बात को समझ चुके हैं कि अनुच्छेद 370 की वापिसी असम्भव है | लेकिन उन्हें ये भी गंवारा नहीं है कि घाटी का मुस्लिम बहुल स्वरूप बदल जाए | इसीलिये बाहरी लोगों की हत्या की आलोचना करने के बावजूद न तो अब्दुल्ला और न ही मुफ्ती परिवार खुलकर आतंकवाद के विरुद्ध मैदान में उतरने के संकेत दे रहा है | प्राप्त जानकारी के अनुसार घाटी में पांच लाख मजदूर अन्य राज्यों से आकर कार्यरत हैं | घाटी के 90 फीसदी निर्माण कार्यों में यही मजदूर कार्य करते हैं | इनको घाटी से भगाना आतंकवादियों का उद्देश्य नहीं है अपितु  इनके बीच में से कुछ को निशाना बनाकर कश्मीरी पंडितों के घाटी में पुनर्वास को रोकना उनकी कार्ययोजना का हिस्सा है |  ध्यान देने योग्य बात ये भी है कि बहार का मौसम होने से घाटी इस समय सैलानियों से गुलज़ार रहा करती है | इस साल पर्यटकों की रिकॉर्ड संख्या आने से पुराने दिन लौटने का एहसास होने लगा था | होटल , परिवहन , हस्तकला व्यवसाय आदि में वृद्धि से  स्थानीय रोजगार भी बढ़ा वहीं  अलगाववादी संगठनों पर बंदिश से भी भारत विरोधी गतिविधियाँ शिथिल पड़ीं | सबसे बड़ी बात ये हुई कि घाटी के लोगों को भयमुक्त वातावरण  का एहसास होने लगा था | लेकिन इसी बीच अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत कायम हो जाने से घाटी में आतंकवाद की उखड़ती सांसें लौटने लगीं | हालाँकि सीमा पर चौकसी से पहले जैसी घुसपैठ तो नहीं हो पा रही लेकिन पाक अधिकृत  कश्मीर से आतंकवादी मौका पाते ही सीमा के इस पार आ जाते हैं जिसमें स्थानीय लोगों का सहयोग रहता है | ये कहना गलत न होगा कि घाटी के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले  कश्मीरियों के लिए आतंकवादियों और हथियारों को उस पार से इस पार लाने में सहायता करना एक तरह से रोजी - रोटी का हिस्सा है | ये इलाके इतने दुर्गम हैं कि कदम – कदम पर चौकसी भी नामुमकिन है | इस नई शैली के आतंकवाद के प्रति सुरक्षाबलों को भी नई रणनीति बनानी होगी | घाटी में पर्यटन के पुराने दिन लौटने के बाद   कश्मीरी पंडितों के मन में ये विश्वास जागने लगा था कि वे अपनी जन्मभूमि में दोबारा बस सकेंगे | लेकिन अलगाववादी ताकतें इसके दूरगामी नतीजों का आकलन कर परेशान हो उठीं  और अन्य राज्यों से आये गरीब मजदूरों को निशाना बनाकर उनको भयभीत करने में जुट गए | वे अपने उद्देश्य में कितने सफल होंगे ये पक्के तौर पर तो कह पाना मुश्किल है किन्तु इससे  पता चलता है कि आतंकवादी अब हताश हो उठे हैं | घाटी में आतंकवाद के चरमोत्कर्ष के दौरान भी बिहार , छत्तीसगढ़ , पंजाब आदि के श्रमिक काम करते रहे किन्तु उनको आतंकवादियों ने निशाना नहीं बनाया | मौजूदा संदर्भ में घाटी के राजनीतिक नेताओं को भी ये समझना चाहिए कि जब तक स्थितियां सामान्य नहीं होंगीं तब तक राज्य में चुनाव भी  संभव नहीं होगा | इसके साथ ही स्थानीय नागरिकों विशेष तौर पर व्यवसायी समुदाय को इन हत्याओं के विरुद्ध मुखर होना चाहिए वरना घाटी में  पटरी पर लौटता व्यवसाय और रोजगार फिर  चौपट होकर रह जाएगा | रही बात कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास  की तो आतंकवादी और उनकी पीठ पर हाथ रखने वाले राजनीतिक नेता कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन घाटी को अपनी मिल्कियत बनाये रखने की उनकी चाल  टिकने वाली नहीं | कश्मीरी जनता को अपने नेताओं की असलियत भी  समझनी चाहिए  जो  अपने स्वार्थ के लिए घाटी के विकास को तिलांजलि देते रहे |            

  -रवीन्द्र वाजपेयी                          

Saturday, 16 October 2021

किसान आन्दोलन के दामन पर खून के छींटे : ट्रैक्टर की बजाय तलवार चल रही




दिल्ली की सीमा पर चल रहे  किसान  आन्दोलन के रक्तरंजित होने से उसकी दिशाहीनता सामने आ गई है | सिन्धु सीमा पर किसानों  की सुरक्षा के नाम पर बैठे निहंगों ने पंजाब के ही एक दलित युवक की बेरहमी से हत्या कर  उसका शव लोहे  के एक बैरिकेड पर टांग दिया | निहंगों का आरोप है कि मारे गये युवक ने गुरु ग्रन्थ साहेब का अपमान किया था | निहंगों के एक नेता ज्ञानी शमशेर सिंह ने इस ह्त्या को उचित ठहराते हुए कहा  कि पहले भी गुरु ग्रन्थ साहेब के अपमान के दोषियों को हमने पुलिस के हवाले किया था किन्तु कुछ दिन बाद उनको छोड़ दिया गया | इसलिए इस बार हमने  गुनाह के बराबर सजा दी है , ताकि दूसरा कोई ऐसी हिम्मत  न कर सके , और दोबारा ऐसा  हुआ तो हम फिर उसे ऐसा ही प्रसाद देंगे | हत्या करने वाले निहंग ने पुलिस के सामने समर्पण कर दिया है | शमशेर सिंह ने हत्या को जायज ठहराते हुए ये भी कहा कि  गुरु ग्रन्थ साहेब के अपमान पर  आगे भी  निहंगों की तलवार निकलेगी | उनके अनुसार निहंग भी बतौर किसान इस  आन्दोलन में शामिल हैं और  धरना स्थल पर उनकी मौजूदगी बतौर रक्षक है | किसान आन्दोलन में निहंगों की भूमिका गणतंत्र दिवस पर उस समय विवादित हुई जब लालकिले पर  एक निहंग ने तलवार लहराते हुए शक्ति प्रदर्शन किया वहीं दूसरे ने निशान साहेब फहरा दिया | हालाँकि उस घटना की  सिखों के एक बड़े वर्ग ने भी आलोचना की थी | लेकिन किसान नेता राकेश टिकैत उसे भाजपा की करतूत  बताने जैसी हरकत करते रहे | शुरू में तो किसान नेताओं को लगा कि निहंगों के आने से उनके आन्दोलन को सिखों का एकमुश्त समर्थन मिलेगा लेकिन उनकी गतिविधियों से जब तकलीफ होने लगी तब दो माह पहले बलवीर सिंह राजेवाल ने सार्वजनिक रूप से कहा कि निहंगों का वहां कोई काम नहीं है और उनको वापिस चला जाना चाहिए | उनकी बात पर निहंगों ने नाराजगी व्यक्त करते हुए साफ़ – साफ कह दिया कि  वे किसानों की हिफाजत के लिए आये हैं और वहीं रहेंगे | जैसी जानकारी मिल रही है उसके अनुसार निहंग धीरे – धीरे किसानों के धरने का नेतृत्व कर रहे लोगों से भी बेअदबी  करने लग गये थे | लेकिन उनका विरोध करने का साहस किसी में नहीं हुआ | लेकिन अब जबकि धरना स्थल पर ही एक युवक की तालिबानी शैली में हत्या कर उसकी लाश को टांग दिया गया तब जाकर किसान आन्दोलन की ओर  से योगेंद्र यादव ने जुबान खोली और कहा कि ये कोई धार्मिक मोर्चा नहीं है और निहंगों को यहाँ से चला जाना चाहिए | लेकिन निहंगों की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया | हालांकि जो निहंग पहले हत्या  के औचित्य को साबित करने में बड़बोलापन दिखा रहे थे वे शाम तक ठन्डे पड़े और हत्यारे को पुलिस के हवाले करने राजी हो गये | लेकिन इस घटना के बाद  आन्दोलन के उग्रवादियों के हाथ चले जाने के आरोप को बल मिला है  | लखीमपुर खीरी में किसानों को कुचलकर मार डालने की प्रतिक्रिया स्वरूप पांच लोगों को पीटकर  मौत के घाट उतारने वालों की तरफदारी से निहंगों का हौसला बढ़ा और उन्होंने धर्मान्धता का घिनौना रूप पेश करते हुए पूरी कौम के लिए शर्मिन्दगी पैदा कर दी | सिख धर्म अपने सेवा भाव और शौर्य के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है | गुरु ग्रन्थ साहेब के प्रति केवल सिख ही नहीं अपितु हिन्दू भी श्रद्धा रखते हैं | लेकिन निहंग अक्सर ऐसा कर जाते हैं जिससे उनके साथ ही सिख धर्म पर भी सवाल उठते हैं | कुछ साल पूर्व पंजाब में एक पुलिस वाले के हाथ निहंगों ने सरे आम काटकर आतंक फैलाया था | किसान आन्दोलन में उनका क्या काम है ये प्रश्न पहले दिन से उठता रहा है | लेकिन किसान नेताओं को निहंगों की उपस्थिति में फायदा दिखा तो उन्हें पूरी छूट दे  दी गयी | जो बात  बलवीर सिंह ने दो माह पहले कही और योगेन्द्र यादव अब कह रहे हैं , यदि ये गणतंत्र दिवस की घटना के दिन ही कही जाती तो शायद इस  आन्दोलन के दामन पर खून के छींटे न पड़े होते | बहरहाल अब जबकि किसान आन्दोलन  अपना पैनापन खोता जा रहा है तब निहंगों द्वारा एक व्यक्ति की खुले आम हत्या किये  जाने के बाद  ये साफ़ हो गया है कि वे किसानों की हिफाजत की आड़ में किसी गुप्त लक्ष्य को हासिल करने धरना स्थल पर घोड़े और हथियार सहित जमा हुए हैं | जहां तक बात किसान नेताओं द्वारा निहंगों से पिंड छुडाने संबंधी बयानों की है तो ये भी कलंकित होने से बचने का प्रयास है | वरना गणतंत्र दिवस पर निकाली गई ट्रैक्टर रैली के आगे चल रहे घुड़सवार निहंग इन्ही नेताओं को रास आ रहे थे | किसान नेता समझते थे कि निहंगों से डरने के  कारण पुलिस और प्रशासन धरना स्थल में नहीं घुस सकेंगे , लेकिन  जब बात हत्या जैसे  अपराध तक आ पहुँची तब ध्यान आ रहा है कि किसान आन्दोलन धार्मिक नहीं है | प्रारंभिक दौर में जब खालिस्तान समर्थकों की मौजूदगी पर सवाल उठे तब आन्दोलन के नेताओं ने बड़ी ही चालाकी से ये प्रचारित कर दिया कि पूरी सिख कौम को खालिस्तानी कहा जा रहा है | लेकिन वे ये भूल गये कि अपनी राजनीति के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले को आगे बढ़ाने का कितना बड़ा नुकसान कांग्रेस , इंदिरा जी और देश ने भुगता | किसान आन्दोलन के कर्णधारों को ये समझना होगा  कि बात अब उनके नियन्त्रण से बाहर हो चुकी है | गांधीवादी तरीके से अहिंसक आन्दोलन की बात करने वाले राकेश टिकैत  और योगेन्द्र यादव को ये नहीं भूलना चाहिए कि गांधी जी आंदोलन में हिंसा  होने पर  उसे तत्काल रद्द कर दिया करते थे | किसान आन्दोलन जिस तरह बेलगाम होता जा रहा है उसके बाद उसे मौजूदा तरीके से जारी रखना समय और शक्ति दोनों की बर्बादी है | अपनी मांगों के लिए आन्दोलन करना किसानों का मौलिक अधिकार है लेकिन हवा में तलवार घुमाते रहने से लड़ाई नहीं जीती जाती | किसान आन्दोलन को बचाए रखना है तो उसे उग्रवादियों और उपद्रवियों के चंगुल से आजाद करना होगा | वरना ट्रैक्टर चलाने वालों को बाहर धकेलकर तलवार चलाने वाले उस पर काबिज हो जायेंगे |  

- रवीन्द्र वाजपेयी