Wednesday, 10 November 2021

आग लगने के बाद याद आया कि फायर ऑडिट भी कोई चीज है



म.प्र की राजधानी भोपाल में एम्स की शाखा खुलने से पहले हमीदिया मेडिकल कालेज का अस्पताल ही सबसे बड़ा और अच्छा माना जाता था | आजकल तो मंत्री  से लेकर संतरी तक निजी अस्पतालों में इलाज करवाने लगे हैं | लेकिन पहले  आम और ख़ास सभी हमीदिया की शरण में ही जाते थे | भोपाल से लगे जिलों के मरीजों के लिए भी ये चिकित्सालय ही मददगार हुआ करता था | यहाँ कार्यरत चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस भी हमीदिया का नाम जुड़ा होने से खूब चला करती थी | लेकिन धीरे – धीरे इस अस्पताल की प्रतिष्ठा पर अव्यवस्था और बदनामी की गर्द जमने लगी और गाहे – बगाहे होने वाले हादसे नियमित होने लगे | अस्पताल का भवन , उस पर होने वाला खर्च , कर्मचारियों और चिकित्सकों का वेतन तथा उपकरणों आदि के मामले में ये  अभी भी काफी अच्छा है लेकिन अन्य उपक्रमों की तरह यहाँ भी वही सब होने लगा जिसके लिए शासकीय व्यवस्था कुख्यात है | बीते सोमवार की रात इस अस्पताल के शिशु रोग विभाग के 8 साल पुराने वेंटीलेटर में लगी आग पूरे वार्ड में फ़ैल गई जिसमें अनेक बच्चे जलकर जान गँवा बैठे | मौतों का वास्तविक वास्तविक आँकड़ा 12 तक पहुंच चुका है लेकिन सरकारी सूत्र अभी भी 4 पर ही अटके हुए हैं | आग लगने के जो कारण बताये जा रहे हैं वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रदेश की राजधानी का वीआईपी सरकारी अस्पताल भी किस तरह अव्यवस्था का शिकार है | वेंटीलेटर को सामान्य एक्स्टेंशन से जोड़कर चलाये जाने की वजह से ये हादसा होना बताया जा रहा है जबकि इसके लिए पहले से आगाह किया जा चुका था | वेंटीलेटर का उपयोग असामान्य स्थिति में किया जाता है | उसके लिए हर बिस्तर के पीछे पृथक विद्युत बोर्ड होते हैं | लेकिन राजधानी के इस सबसे बड़े अस्पताल में बेहद संवेदनशील जीवन रक्षक उपकरण के लिए विद्युत आपूर्ति की व्यवस्था बेहद घटिया और कामचलाऊ होना इस बात का परिचायक है कि शासकीय महकमों में किस  हद तक लापरवाही है | मृतकों की संख्या यदि एक होती तब भी अपराध उतना ही संगीन माना जाता | मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस घटना के बाद प्रदेश भर के सरकारी और निजी अस्पतालों का फायर ऑडिट करवाने के निर्देश दिए हैं | जिस पर वरिष्ठ अधिकारियों ने सरकारी अस्पतालों की  अग्नि शमन व्यवस्था का निरीक्षण भी शुरू कर दिया है | निजी अस्पतालों में भी जांच आदि का कर्मकांड होगा | रिपोर्ट बनेगी , दो चार निपटेंगे और कुछ समय बाद जैसे थे की स्थिति लौट आयेगी | प्रदेश के चिकित्सा मंत्री भोपाल के ही निवासी हैं | उन्होंने भी मौके पर जाकर मुआयना करने के उपरान्त वही घिसे - पिटे आश्वासन दे डाले | लेकिन अब तक किसी अधिकारी और मंत्री ने जिम्मेदारी लेने  या पश्चताप करने का कष्ट नहीं उठाया जिससे ये स्पष्ट है कि वे कितने भावनाशून्य  हैं | हमारे देश में इस तरह के हादसों को महज अग्निकांड मानकर चला जाता है | दिल्ली  के उपहार सिनेमा गृह में 1997 के मई माह में हुए अग्निकांड में 59 लोग मारे गये थे |  उसके दो संचालकों को कुछ  रोज पहले ही सात – सात साल की सजा सुनाई गयी है | इसमें देखने वाली बात ये है कि ये फैसला दिल्ली की अदालत का है जिसके विरुद्ध अपील की जा सकती है | 24 साल में दंड प्रक्रिया का  इस पड़ाव तक पहुँच पाना अपने आप में काफी कुछ कहता है | ये भी तब हुआ जब  हादसे में मारे गये लोगों के परिजनों ने संगठित होकर लम्बी लड़ाई लड़ी | देश की राजधानी  होने के कारण उक्त कांड को काफी प्रचार मिला वरना वह दबकर रह जाता | म.प्र के मुख्यमंत्री ने अस्पतालों का फायर ऑडिट करवाने की जो बात कही वह भी  मूलभूत आवश्यकता है | यदि हमीदिया सहित प्रदेश के सरकारी और निजी अस्पतालों में उसका पालन नहीं हो रहा था तब उसके लिए जिम्मेदार कौन सा विभाग और अधिकारी हैं इसका खुलासा भी लगे हाथ हो जाना चाहिए | चिकित्सा अब सेवा नहीं रही और सरकारी नियन्त्रण से निकलकर  विशुद्ध व्यवसाय बन गई है | निजी क्षेत्र के आने से तो वह उद्योग की शक्ल ले चुकी  है | ऐसे में प्रदेश की राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के शिशु रोग विभाग में पुराना वेंटीलेटर चलाने के लिए विद्युत आपूर्ति का काम चलाऊ इन्तजाम आपराधिक उदासीनता नहीं तो और क्या थी ? वहां तैनात स्टाफ के अतिरिक्त जो चिकित्सक मरीजों को देखने आते रहे उनमें से किसी को वह अव्यवस्था  दिखी  नहीं अथवा देखकर भी अनदेखी कर दी गयी इस सवाल का जवाब शायद ही कभी मिल सकेगा |  ऐसे हादसों के लिए बलि के बकरे तलाशने की परिपाटी त्यागकर व्यवस्था को सुधारने पर ध्यान दिया जाना जरूरी है | मुख्यमंत्री के निर्देश पर अग्नि शमन व्यवस्था की जांच को लेकर दिखाई जाने वाली  सक्रियता कितने दिन रहेगी ये कहना कठिन है क्योंकि सरकारी अमला यदि अपने दायित्व के प्रति सतर्क होता तो ये घटना होती ही नहीं | ये समस्या केवल अस्पतालों की ही नहीं अपितु बहुमंजिला आवासीय टावर्स , बड़े होटल  और शापिंग मॉल्स से भी सम्बंधित है , जिनमें लगे अग्नि शमन उपकरणों की समय – समय पर जाँच के बारे में जबरदस्त लापरवाही बरती जाती है | कुछ समय पहले भोपाल स्थित सचिवालय में मुख्यमंत्री की लिफ्ट फंस जाने के बाद बिना देर लगाये जिम्मेदार लोगों पर गाज गिरी थी | लेकिन हमीदिया हादसे में अब तक कुछ भी स्पष्ट नहीं हुआ | जाँच के बाद सच्चाई सामने आने की जो उम्मीद की जाती है वह अधिकतर  पूरी नहीं होती | और फिर उसके लम्बे चलने से अपराधी अपने बचाव का इंतजाम कर ले जाते हैं | राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठान भी अपने कृपा पात्र दोषियों को बचाने में कोई संकोच नहीं करते | लेकिन असल सवाल गलतियों से सबक लेकर अव्यवस्था को दूर  करना है जिसकी ओर ध्यान  नहीं दिए जाने से इस तरह की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति होती है | ऐसी घटनाओं पर दुःख व्यक्त करना आम बात है लेकिन पूरी सरकार को इसके लिए सार्वजनिक क्षमा याचना करना चाहिए | जिम्मेदार मंत्री में  यदि रत्ती भर भी नैतिकता है तब उनको घटना के बाद इस्तीफ़ा देना चाहिए था क्योंकि जब किसी उपलब्धि पर श्रेय लेने की बारी आती है तब ये तबका आगे – आगे होता है लेकिन विफलता का दोष किसी और पर डालकर दूर बैठ जाता  है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 9 November 2021

ऐतिहासिक घटना चक्र का गवाह बना 32 साल का सफर



आज से 32 साल पहले मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का पहला अंक आपके हाथ आया था | महाकौशल की चेतनास्थली कहे जाने वाले जबलपुर में पत्रकारिता की गौरवशाली परम्परा हमारी प्रेरणा का स्रोत थी | सांध्यकालीन अख़बारों को अपेक्षाकृत उतना महत्व नहीं मिलता लेकिन संस्कारधानी में हमसे पहले भी अनेक सांध्यकालीन समाचार पत्र प्रकाशित होते रहे और सभी ने अपने दौर में पत्रकारिता की मशाल को रोशन रखा | 1989 में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का प्रकाशन जब प्रारम्भ हुआ तब देश अभूतपूर्व राजनीतिक और सामाजिक बदलाव की ओर बढ़ रहा था | भारी उथलपुथल के बीच नए समीकरण जन्म ले रहे थे | कई स्थापित प्रतिमाएं खंडित हो रही थीं और उनकी जगह लेने के लिए नये चेहरे सामने आ रहे थे | जाति और धर्म अचानक राजनीतिक विमर्श पर हावी होने लगे | कुछ वर्ष भारी उहापोह और अनिश्चितता में व्यतीत होने के बाद राजनीतिक स्थायित्व आया तो आर्थिक जगत में ऐतिहासिक परिवर्तन शुरु हुए जिनकी  वजह से समाजवाद के साथ राजनीति का रोमांस खत्म होने लगा | ये कहना गलत न होगा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने की उस पहल ने आम भारतीय की सोच को अंतर्राष्ट्रीय बनाने में मदद की जिससे  दुनिया उसे छोटी लगने लगी | उसके अच्छे या बुरे परिणाम बड़ी बहस का विषय हैं किन्तु  बाद में आईं सभी सरकारों को भी चाहे – अनचाहे उन्हीं आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाना पड़ा | इसी के साथ ही देश ने गठबंधन राजनीति को स्वीकार  करने का साहस भी दिखाया |  1989 से 2014 में मोदी सरकार बनने तक केंद्र में किसी एक दल को लोकसभा में बहुमत नहीं हासिल होने से विभिन्न दलों की मिली जुली सरकार बनती बिगड़ती रहीं | उसी दौर में देश ने अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में पहला विशुद्ध गैर कांग्रेसी प्रधानमन्त्री भी देखा | आर्थिक क्षेत्र के समानांतर जो सबसे बड़ा बदलाव उस दौर में हुआ वह था सोशल इन्जीनियरिंग के नाम पर जाति आधारित राजनीति का प्रादुर्भाव , जिसने सियासत की चाल , चरित्र और चेहरे को सिर से पाँव तक बदल डाला | बीते तीन दशक में तमाम विसंगतियों और विरोधाभासों के बावजूद भारत आगे बढ़ा है और वैश्विक स्तर पर उसकी उपस्थिति  उभरती हुई महाशक्ति के तौर पर होने लगी है | एक उपभोक्ता देश से आगे निकलकर उत्पादक और आयात करने वाले से निर्यातक बनने तक का सफर  प्रारब्ध का नहीं अपितु  सामूहिक राष्ट्रीय पौरुष का ज्वलंत प्रमाण है | बीते लगभग दो वर्ष में भारत ने कोरोना नामक महामारी के  अप्रत्याशित हमले का जिस सफलता से सामना किया उससे हमारा आत्मविश्वास द्विगुणित हुआ है | आज पूरी दुनिया ये मानने लगी है कि 21 वीं सदी में भारत विश्व के अग्रणी और शक्तिशाली देशों में होगा | तीन दशकों के समूचे घटनाचक्र पर  मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने सतर्कता के साथ नजर रखकर  पाठकों को हर छोटी – बड़ी बात से अवगत करवाते हुए उनके  सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को सामने रखा | समाचार पत्र का काम खबरों के अलावा वैचारिक स्तर पर पाठकों को जागरूक रखना भी होता है | और उस कार्य को भी हमने पूरी ईमानदारी से किया | यद्यपि सभी हमसे सहमत हों ये आवश्यक नहीं होता किन्तु असहमति और आलोचना के प्रति हमारा रवैया सदैव सौजन्यतापूर्ण रहा है | यही वजह है कि मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस को हर वर्ग और विचारधारा के पाठकों का स्नेहयुक्त संरक्षण और सहयोग प्राप्त हुआ |  सीमित पृष्ठ संख्या और श्वेत – श्याम होने के बावजूद इसकी चमक और धमक निरंतर बनी रही तो उसकी विशेष वजह हमारा गैर व्यवसायिक दृष्टिकोण ही है | प्रतिस्पर्धा और व्यवसयिकता के दौर में जब जमीन पर पड़े पैसे को मुंह से उठाने में शर्म नहीं की जाती और पत्रकारिता  को धनोपार्जन का पर्याय माना जाने लगा है तब सीमित साधनों में एक भाषायी अखबार का 32 साल तक चलते रहना मामूली बात नहीं है | लेकिन इसके लिए हम उन असंख्य पाठकों के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्होंने मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस को विषम से विषम हालातों में भी साथ दिया | विज्ञापनदाताओं से मिले सहयोग के प्रति भी हम आभारी हैं जिनके मन में इस समाचार पत्र के प्रति पालक का भाव है | 32 वर्ष का ये सफर निश्चित रूप से अनेकानेक खट्टे – मीठे अनुभवों से भरा रहा | न जाने कितने उतार और चढ़ाव इस दौरान देखने मिले किन्तु हमारी नीति और नीयत चूँकि पत्रकारिता की गरिमा को सुरक्षित रखने की थी इसलिए विफलताओं में निराश होने और सफलता पर इतराने से मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस बचा रहा | वर्तमान परिस्थितियों में लघु और मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों के सामने अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है | बाजारवादी शक्तियों के बढ़ते वर्चस्व और सरकारों के उपेक्षा भाव ने समाचार पत्रों को कार्पोरेट संस्कृति का हिस्सा बना दिया जिसकी वजह से कतिपय पत्रकार भी मालिकों के लिए पैसा उगाही के औजार  बनते जा रहे हैं | ऐसे में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने अपने को उन बुराइयों से बचाकर रखा है जो पत्रकारिता को कलंकित करने का कारण बन रही हैं  | आगे आने  वाला समय और भी चुनौतीपूर्ण  है | पत्रकारिता  के सामने विश्वसनीयता का संकट दिन ब दिन गंभीर होता जा रहा है | बिकाऊ पत्रकारों की जमात ने इस पेशे की पवित्रता और प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाने का पाप किया है | लेकिन अंधेरी कोठरी में रोशनदान के तौर पर मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस अपनी भूमिका का ईमानदारी से निर्वहन करता आ रहा है और पाठकों के अमूल्य सहयोग , संरक्षण और संबल के बलबूते आगे भी निर्भीक पत्रकारिता की परम्परा को जीवित रखेगा , इस संकल्प को हम आज फिर दोहरा रहे हैं | 
विनम्र आभार सहित ,

रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 November 2021

नोट बंदी का दूसरा चरण लागू किया जावे लेकिन ........



आज से पांच साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रात 8 बजे जब राष्ट्र को सम्बोधित करने वाले थे तब किसी को इस बात की भनक तक नहीं थी कि वे क्या बोलेंगे? यहाँ तक कि उनके वरिष्ठ मंत्री बेखबर थे। लेकिन ज्योंही उन्होंने एक हजार और पांच सौ के नोट बंद करने का ऐलान किया त्योंही हड़कंप मच गया। आगामी कुछ महीने तक देश जबरदस्त आर्थिक अनिश्चितता और अव्यवस्था से गुजरा। बैंकों में जमा अपनी रकम निकालने में भी लोगों को अकल्पनीय परेशानी झेलनी पड़ी। शादियों के आयोजन तक रद्द हो गये। बैंकिंग व्यवस्था पर विश्वास में भी कमी आई। नोट बंदी का सबसे बड़ा मकसद काले धन को बाहर लाना था। प्रधानमंत्री को भरोसा था कि जिनके पास काली कमाई वाले बड़े नोट थे वे रद्दी कागज बनकर रह जायेंगे। लेकिन काला धन रखने वाले ज्यादा चालाक निकले। व्यवस्था जनित खामियों का सहारा लेते हुए काली कमाई को किस तरह बैंकों तक पहुंचाकर वे नुकसान से बचे ये सर्वविदित है। श्री मोदी का वह कदम बहुत ही साहसिक और सामयिक था। भ्रष्टाचार ने देश में काली कमाई को जो बड़ा भंडार पैदा कर दिया था उसकी वजह से अर्थव्यवस्था को वांछित दिशा नहीं मिल पा रही थी। ये कहना गलत न होगा कि व्यापार-उद्योग से जुड़े लोगों द्वारा कर चोरी करते हुए अर्जित काले धन की तुलना में भ्रष्ट नौकरशाहों और नेताओं द्वारा अर्जित काली कमाई भी कम नहीं थी। इसीलिये प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद सरकार द्वारा लगातार ऐसे कदम उठाये जाते रहे जिनकी वजह से उस कड़े फैसले में लचीलापन आने से देखते-देखते तकरीबन पूरा काला धन बैंकों में आ गया। सरकार इस बात का संतोषजनक जवाब आज तक नहीं दे सकी कि जब एक हजार और पांच सौ के प्रतिबंधित लगभग सभी नोट बैंकों में आ गये तब काले धन की बात कहाँ तक सही थी? दरअसल नोट बंदी का फैसला प्रधानमंत्री ने अर्थक्रांति नामक जिस संस्था के सुझाव पर लिया उसके संस्थापक अनिल बोकिल ने उनको उसके लाभ बताये थे। लेकिन उनके सुझावों को एक तो आधा-अधूरा लागू किया गया और दूसरी गलती ये हुई कि समाचार माध्यमों के साथ राजनीतिक जगत द्वारा नोट बंदी से मची अव्यवस्था पर जो हल्ला मचाया गया उसके दबाव में आकर रोजाना नये-नये फैसले किये गये जिससे उस ऐतिहासिक निर्णय का पूरा लाभ नहीं मिल सका, उल्टे कारोबार में जबरदस्त ठहराव आ गया। ये तर्क भी चारों तरफ से उछला कि बिना काले धन के अर्थव्यवस्था चल ही नहीं सकती। हालाँकि काले धन को किसी तरह बैंकों में जमा करवाने में सफल लोग नुकसान से तो बच गये लेकिन आगे उसका उपयोग करने में उनके सामने अनेक व्यवहारिक परेशानियाँ आईं। इसकी वजह से कारोबार प्रभावित हुआ और कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि पांच साल बाद भी नोट बंदी की चोट से उद्योग-व्यापार जगत उबर नहीं सका। यद्यपि उस फैसले का सकारात्मक पहलू भी है जो आलोचनाओं के पहाड़ तले दबकर रह गया। इसमें दो राय नहीं है कि नोट बंदी के बावजूद जो काला धन बैंकों में पहुंचकर वैध हो गया उसको चलन में लाना मुश्किल हुआ और नगदी की कमी होने से डिजिटल लेनदेन भी बढ़ा। नई पीढ़ी तो छोटी-छोटी खरीदी तक नगदी रहित करती है। पान, चाय और सब्जी के ठेलों तक पर पेटीएम से भुगतान स्वीकार किया जाने लगा है। नोट बंदी के बाद सरकार ने पाँच सौ और दो हजार के साथ ही दो सौ के नए नोट भी जारी किये। लेकिन एक हजार का नोट बंद कर दो हजार का जारी करने का औचित्य समझ से परे था। ये कहना गलत न होगा कि ज्योंही वह चलन में आया उसे नये काले धन के तौर पर छिपाकर रखा जाने लगा। सरकार को भी आखिरकार ये भूल समझ में आई और इसीलिये बैंकों से दो हजार का नोट मिलना बंद सा कर दिया गया। लेकिन पांच सौ का नोट भरपूर उपलब्ध है, जबकि अर्थक्रांति के प्रणेता श्री बोकिल के अनुसार एक सौ से बड़ा नोट होना ही नहीं चाहिए ताकि नगदी के लेनदेन में तकलीफ होने से लोग डिजिटल को अपनाएं। उनका मूल सुझाव तो ये था कि आयात कर को छोड़कर आयकर जैसे तमाम कर और कानून रद्द करते हुए बैंकों में जमा की जाने वाली राशि पर निश्चित दर से करारोपण किया जावे। ऐसा करने से कर चोरी की प्रवृत्ति पर विराम लगेगा। अर्थ क्रांति द्वारा इस बारे में किये गये अध्ययन से प्रधानमंत्री सहमत तो हुए लेकिन उसे पूरी तरह लागू करने की बजाय आंशिक तौर पर अपनाये जाने से नोट बंदी से होने वाला लाभ भी खंडित हो गया। इसीलिये पाँच साल बाद भी न काले धन की समस्या हल हुई और न ही भ्रष्टाचार रुका। वस्तुत: नेता और नौकरशाहों का अपवित्र गठबंधन ही काले धन की उत्पत्ति का सबसे बड़ा कारण है जिसे तोड़ने में प्रधानमंत्री भी सफल नहीं हो सके। लेकिन अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है। बेहतर होगा हालातों का जायजा लेते हुए नोट बंदी के अगले चरण में आगे बढ़ा जावे। जिसमें एक सौ से उपर के सभी नोट बंद कर दिए जावें। लेकिन इसके लिए निश्चित की गई समय सीमा को बार-बार बढ़ाने जैसी गलती न दोहराई जावे। पिछली बार पेट्रोल पम्प और सरकारी विभागों द्वारा की जाने वाली वसूली के जरिये काली कमाई बैंकों तक आई थी। लेकिन इस बार केवल बैंक में जमा करने का विकल्प रखा जावे और उनको भी ये निर्देश हों कि जमाकर्ता द्वारा जमा किये गए नोटों के बदले यदि वह चाहे तो तत्काल दूसरे नोट लौटाएं क्योंकि किसी को पैसा निकालने से रोकने से जनरोष बढ़ता है। नोट बंदी के पांच साल पूरे होने पर ये कहना पूरी तरह से सही होगा कि वह देश हित में उठाया गया बहुत ही हिम्मत भरा फैसला था जिसके लिए श्री मोदी को प्रारम्भिक स्तर पर विपक्षी दलों से भी प्रशंसा प्राप्त हुई किन्तु उसे अमल में लाने के तरीके और रोजाना उनमें किये गए बदलाव से एक अच्छी कोशिश भी अव्यवस्था में फंसकर रह गई। नोट बंदी से जुड़े अनेक मुद्दों पर रहस्य का पर्दा पड़ा रहने से भी सवाल उठते हैं। समय की मांग है कि प्रधानमंत्री नोट बंदी के दूसरे चरण को लागू करने का साहस दिखाएँ। पिछली गलतियों को दोहराने से बचते हुए जनता को परेशान किये बिना यदि सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के मुख्य स्रोत को बंद करने की दिशा में बढ़ेगी तो जनता भी उसके साथ खड़े होने में संकोच नहीं करेगी। स्मरणीय है कि नोट बंदी के बाद हुए उ.प्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा को भारी बहुमत मिला था। दरअसल नोट बंदी के दौरान हुई बदइन्तजामी के बाद जीएसटी लागू करने में भी जिस तरह की अनिश्चितता और अनिर्णय के हालात बने उसका बुरा असर व्यापार पर भी पड़ा। लेकिन अब जीएसटी तकरीबन पूरी तरह लागू हो चुका है और देश का बड़ा वर्ग डिजिटल लेनदेन को अपनाता जा रहा है। ऐसे में ये सही समय है जब अर्थ क्रांति द्वारा सुझाई गई नोट बंदी को उसके सही स्वरूप में बिना हड़बड़ाहट के लागू किया जावे। लोकसभा का अगला चुनाव चूँकि ढाई साल दूर है ऐसे में प्रधानमंत्री बिना दबाव के फैसला ले सकते हैं। कोरोना के बाद भारत की अर्थव्यवस्था को यदि मजबूत बनाना है तो उसके लिए कर प्रणाली की विसंगतियां दूर कर उन्हें व्यवहारिक बनाना होगा। बड़े नोट बंद कर बैंक में जमा की जाने वाली नगदी पर कर लगाने से काले धन और भ्रष्टाचार पर काफी हद तक रोक लगाना आसान होगा। ये बात काफी हद तक सही है कि लोग कर देना चाहते हैं, लेकिन सरकारी व्यवस्था उन्हें चोरी करने बाध्य कर देती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 November 2021

श्रम रूपी साधना से अर्जित समृद्धि ही सार्थक होती है



दो वर्ष बाद दीपावली की रौनक लौटी है। बाजारों में उमड़े जनसैलाब से पता चलता है कि लोगों में व्याप्त भय उत्साह में बदल चुका है। हालाँकि बीते साल भी दीपावली मनाई गई थी किन्तु हर व्यक्ति डरा और सहमा हुआ था। महामारी से बचने के लिए टीके का इंतजार हो ही रहा था कि देश ने दूसरी लहर का दर्दनाक मंजर देखा। लाखों लोगों की मौत ने हर मन में दहशत भर दी। मार्च से शुरू हुआ वह दौर जून तक चला। लेकिन उसके बाद हालात धीरे-धीरे सुधरते गये। हालाँकि तीसरी लहर की आशंका अभी भी बनी हुई है क्योंकि दुनिया के अनेक देशों में कोरोना की वापिसी के साथ ही उसके बदले हुए रूप सामने आने लगे हैं। लेकिन भारत तमाम आशंकाओं के मानसिक दबाव से उबरकर दीपावली की उमंग में शामिल है तो उसका सबसे बड़ा कारण वह आत्मविश्वास है जो किसी देश की उन्नति के लिए प्राथमिक आवश्यकता है। दीपावली भारतीय पर्व-परम्परा का चरमोत्कर्ष है। नई फसल के बाद भावी आर्थिक नियोजन की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण अवसर होता है। बीता साल इस दृष्टि से बेहद तनाव और अनिश्चितता से भरा रहा। लेकिन इस दीपावली पर देश का चिर-परिचित उत्साह लौटता दिख रहा है। कृषि क्षेत्र से अच्छी खबरें आने के साथ ही उद्योग जगत ने भी कमर कस ली है। उपभोक्ता बाजार में बढ़ती मांग के अनुरूप उत्पादन का आंकड़ा भी ऊपर की ओर है। व्यापारी समुदाय के चेहरों पर भी मुस्कराहट देखी जा सकती है। निर्यात में आशातीत वृद्धि से उज्जवल भविष्य की उम्मीदें साकार होने लगी हैं। इसका असर रोजगार पर भी पड़ रहा है। आगामी कुछ सालों में नई नौकरियां आने के संकेत मिलने लगे हैं। आर्थिक स्थिति में सुधार का सबसे बड़ा पैमाना है करों से होने वाली आय। उस दृष्टि से देखें तो जीएसटी और आयकर आदि में उत्तरोत्तर वृद्धि परिलक्षित हो रही है। कोरोना काल में आर्थिक संकट के बावजूद भी राजमार्गों और रेलवे के ढांचे में जबरदस्त सुधार होने के बाद उड्डयन के क्षेत्र में भी आश्चर्यजनक प्रगति देखने मिल रही है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का जो अनुभव हुआ उसके बाद से सरकारी और निजी क्षेत्र ने इस दिशा में सुधार की तरफ कदम बढ़ाये हैं। टीकाकरण के बड़े अभियान के सफल होने से भी आम जनता का आत्मविश्वास बढ़ा है। रेलों, बसों और हवाई जहाजों में यात्रियों की बढ़ती भीड़ अपने आप में काफी कुछ कह रही है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि देश एक अभूतपूर्व संकट पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा। लेकिन आने वाला समय भी चुनौतियों से भरा हुआ है क्योंकि वैश्विक समीकरण नए सांचे में ढलने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। भारत ने बीते दो वर्ष में जिस धैर्य, साहस और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया उसकी वजह से पूरी दुनिया प्रभावित है। एक विश्वसनीय देश के तौर पर हमारी प्रतिष्ठा कायम होने से विदेशी पूंजी का प्रवाह चरमोत्कर्ष पर है। रक्षा उपकरणों के सबसे बड़े खरीददार के अलावा अब हम उनका निर्यात करने की स्थिति में  हैं। सीमाओं की सुरक्षा के प्रति भारत की तैयारियां सर्वकालीन बेहतर नजर आ रही हैं। पर्याप्त साजो-सामान की उपलब्धता के अलावा राजनीतिक नेतृत्व के खुले समर्थन से सेना का मनोबल भी ऊंचा है। ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में हमारी युवा पीढ़ी अपने पुरुषार्थ को वैश्विक स्तर पर प्रमाणित कर रही है। कोरोना काल के बाद का भारत एक स्वस्थ, समृद्ध और शक्तिशाली देश के तौर पर उभर रहा है। लेकिन आज भी गरीबी, बेरोजगारी, बेघरबारी, कुपोषण, अशिक्षा जैसी समस्याओं की उपस्थिति बनी हुई है जिनका निराकरण किये बिना बाकी उपलब्धियों पर सवालिया चिन्ह लगते रहेंगे। ऐसे में जरूरी है कि सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास जैसे नारे को पूर्णता प्रदान करते हुए भारत को सभी क्षेत्रों में एक अग्रणी राष्ट्र बनाने के अनुष्ठान में हर किसी की सहभागिता हो। 80 करोड़ लोगों को मुफ्त या सस्ता राशन देने की योजना सरकार की संवेदनशीलता और दायित्वबोध का बेहतरीन उदाहरण तो है, लेकिन ये शर्म का विषय भी है। किसी देश की इतनी बड़ी आबादी के पास पेट भरने का साधन न होना निश्चित रूप से आर्थिक प्रगति को झुठलाने का ठोस कारण है। ये सवाल भी अपनी जगह सही है कि ये मुफ्तखोरी कब तक जारी रहेगी क्योंकि इसके कारण करोड़ों लोग निठल्ले बैठे हैं। इस मानव संसाधन का समुचित उपयोग करना उनके और देश दोनों के हित में होगा। इससे जुड़ा एक मसला ये भी है कि ईमानदार करदाताओं में इस कारण व्यवस्था के प्रति वितृष्णा जन्म ले रही है। आर्थिक नियोजन से जुड़े लोगों को इस दिशा में गंभीरता के साथ दूरगामी उपाय करना चाहिए। जिससे विशाल मानव संपदा का लाभ देश के सर्वतोमुखी विकास हेतु लिया जा सके। दीपावली पर हर्षोल्लास के माहौल में हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि लक्ष्मी रूपी सम्पन्नता केवल आराधना से नहीं अपितु श्रम रूपी साधना से प्राप्त होती है। बेईमानी और छल-छद्म से अर्जित धन - संपत्ति से इन्सान अपने लिए भले ही भौतिक सुखों की व्यवस्था कर ले किन्तु ऐसा करने वाले अपनी संतानों को संस्कार देने में असफल रहते हैं। हमारे देश के नेताओं और नौकरशाहों को जिस दिन ये बात समझ में आ जायेगी उस दिन सही मायनों में अच्छे दिन आ जायेंगे।
दीपावली पर आप सभी को सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य हेतु अनन्त मंगल कामनाएँ।

रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 November 2021

प. बंगाल, राजस्थान और हिमाचल के नतीजों से भाजपा को सतर्क हो जाना चाहिए



हालाँकि राज्यों में होने वाले उपचुनावों को आगामी आमचुनाव का संकेत मान लेना पूरी तरह सही नहीं होता लेकिन उनसे जनता के रुझान का कुछ तो पता चलता ही है। उस दृष्टि से एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में हुए उपचुनावों के जो नतीजे गत दिवस आये उनसे ये बात साफ हुई कि जो पार्टी जिस राज्य में सत्तासीन है उसे वहां सफलता मिली। मेघालय और मिजोरम को छोड़ दें तो म.प्र, राजस्थान, बिहार, प. बंगाल, असम, कर्नाटक आदि में मतदाताओं ने राज्य सरकार के पक्ष में ही अपना समर्थन दिया। म.प्र में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा ने चार में से तीन मुकाबले जीतकर मजबूती दिखाई, वहीं राजस्थान में कांग्रेस के दोनों उपचुनाव जीतने से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की स्थिति सुदृढ़ हो गई। बिहार में यही काम नीतिश कुमार ने कर दिखाया। असम में भी भाजपा की अगुआई में एनडीए ने बाजी मारी तो प. बंगाल में ममता बैनर्जी ने साबित कर दिया कि वे चुनौती विहीन हो चुकी हैं। अन्य कुछ राज्यों में जहां एक-दो उपचुनाव हुए वहाँ भी कमोबेश सत्ताधारी दल या गठबंधन को लाभ हुआ। लेकिन हिमाचल प्रदेश इस मामले में अपवाद साबित हुआ जहां तीन विधानसभा और एक लोकसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा का सफाया हो गया और कांग्रेस को कामयाबी हासिल हुई। इसी तरह प.बंगाल में भाजपा के लिए चिंता के कारण पैदा हो गये हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में जीती अपनी दोनों सीटों पर वह बुरी तरह हारी। तृणमूल कांग्रेस को ज्यादातर सीटों पर तीन चौथाई मत मिलना भाजपा के लिए शर्मनाक है। विधानसभा चुनाव में प्रदर्शित आक्रामकता के विपरीत वह इन उपचुनावों में भीगी बिल्ली की तरह नजर आई। कुछ जगह तो उसकी जमानत जप्त हो गई। चार में से दो सीटों पर उसके विधायक तृणमूल में चले गये थे किन्तु उनमें भी वह औंधे मुंह गिरी जिससे साबित हो गया कि पार्टी का मनोबल पूरी तरह टूटा हुआ है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में अभूतपूर्व सफलता हासिल करने वाली भाजपा के लिए इस राज्य से खतरे के संकेत आ रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये देखने में आई कि विधानसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बाद भाजपा के स्थानीय संगठन में ही अंतर्विरोध सामने आने लगे। उस वजह से जो आयातित नेता थे वे भी वापिस लौट रहे हैं। दूसरी तरफ ममता ने चुनाव जीतने के बाद से ही भाजपा के विरुद्ध जबरदस्त मोर्चा खोल दिया। यदि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व इस राज्य के लिए कोई कारगर रणनीति नहीं बनाता तो आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी को उम्मीदवार मिलना तक मुश्किल हो जाएगा। उसके लिए दूसरा बड़ा गड्ढा बना हिमाचल जहां तीन विधानसभा और एक लोकसभा सीट वह हार गई। मुख्यमंत्री ने इसका कारण महंगाई को बताकर अपनी गर्दन बचाने की कोशिश की है लेकिन उनके नेतृत्व की कमजोरी को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। आखिर महंगाई तो म.प्र में भी थी लेकिन मुख्यमंत्री श्री चौहान ने विपरीत हालातों में भी सफलता प्राप्त की। इसी तरह असम के मुख्यमंत्री हिमन्ता बिस्वा सरमा ने भी अपना असर दिखा दिया। बिहार में राजनीतिक प्रेक्षक ये कयास लगा रहे थे कि जेल से निकलने के बाद लालू प्रसाद यादव अपन जादू बिखेरने में कामयाब हो जायेंगे लेकिन नीतीश कुमार ने ये दिखा दिया कि फि़लहाल उनकी पकड़ बनी हुई है। इन चुनावों में चर्चा का केंद्र भाजपा के अलावा कांग्रेस भी रही। हिमाचल और राजस्थान के परिणाम उसके लिए उत्साहवर्धक रहे लेकिन बाकी राज्यों में उसकी स्थिति भविष्य की दृष्टि से इसलिए अच्छी नहीं कही जा सकती क्योंकि संगठन की हालत अच्छी नहीं है। हिमाचल की सफलता में स्थानीय कारण ज्यादा असरकारक रहे वहीं राजस्थान में भी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ गई। कल ही पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिन्दर सिंह ने कांग्रेस को अलविदा कहकर उसके लिए गड्ढा खोदने की शुरुवात कर दी। बिहार में राजद के साथ उसका गठबंधन टूटता नजर आ रहा है। प. बंगाल में तो वह राजनीतिक तस्वीर से ही बाहर हो गई है और तेलंगाना तथा आंध्र में भी घुटनों के बल पर है। तेलंगाना के उपचुनाव में भाजपा की जीत से कांग्रेस विपक्ष  की हैसियत भी गंवा रही है। वैसे भाजपा के लिए भी ये उपचुनाव संतोषजनक नहीं रहे। म.प्र में उसे निश्चित तौर पर अच्छी जीत मिली जिसने दमोह उपचुनाव की शर्मिंदगी को धो डाला लेकिन जोबट और पृथ्वीपुर से जो प्रत्याशी जीतकर आये हैं वे क्रमश: कांग्रेस और सपा से हाल ही में भाजपा में आये थे। पार्टी को प. बंगाल, राजस्थान और हिमाचल के चुनाव परिणामों का ईमानदारी और गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए क्योंकि उसके अपने प्रतिबद्ध मतदाता भी उससे छिटकने लगे हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों का सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता जाना पार्टी के लिए खाई में गिरने का कारण बन सकता है क्योंकि मोदी मैजिक की भी अपनी सीमा है। विपक्षी वोटों के बिखराव की खुशफहमी में मदमस्त हो जाना आत्मघाती हो सकता है। राजनीति के जानकार ये भविष्यवाणी करने लगे हैं कि उ.प्र में भाजपा की सरकार तो लौटेगी किन्तु पिछली बार जैसी धमाकेदार जीत उसे नसीब नहीं होगी। म.प्र की रेगांव सीट पर कांग्रेस को तीन दशक बाद जीत मिलना भाजपा के लिए शोचनीय है। प. बंगाल में भाजपा का ग्राफ जिस तेजी से उठा था उससे ज्यादा गति से उसके नीचे आने को हवा में उड़ाने से पार्टी को बड़ा नुकसान होगा। इन उपचुनावों का सतही विश्लेषण करने पर ये समझ आता है कि भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के लिए क्षेत्रीय पार्टियां मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। लेकिन जो सबसे बड़ी बात सामने आई है वह ये कि कांग्रेस यदि अपना घर ठीक कर ले तो वह भाजपा को टक्कर देना ही नहीं अपितु पराजित भी कर सकती है। राजस्थान और हिमाचल में ये साबित हुआ है। ऐसे में भाजपा को अपने पाँव जमीन पर टिकाने होंगे , वरना 2024 आते-आते उसकी सांसें फूलने लगें तो आश्चर्य नहीं होगा। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता तक पहुँचने के लिए उसने जिन प्रवासी पक्षियों को अपनी मुंडेर पर बिठा रखा है, वे कब फुर्र हो जाएँ ये अंदाजा लगाना कठिन है। प. बंगाल इसका सबसे अच्छा और ताजा-तरीन उदाहरण है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 November 2021

अर्थव्यवस्था सुधार पर तो पेट्रोल – डीजल के दाम क्यों बढ़ रहे



धनतेरस से दीपावली पर्व का शुभारम्भ हो जाता है |   आरोग्य के अधिष्ठाता भगवान धन्वन्तरि की जयंती के साथ ही ये विश्व का सबसे बड़ा व्यापार मेला है जिसका आयोजन राष्ट्रव्यापी होता है | मामूली आर्थिक हैसियत वाला व्यक्ति भी आज के दिन कुछ न कुछ खरीदता है | धनतेरस इस बात का प्रमाण है कि अपनी आध्यात्मिक चिंतन धारा के साथ ही भारत में अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने के लिए सामाजिक दृष्टि से परम्पराओं का  सृजन किया गया | धनतेरस उसका चरमोत्कर्ष है | दीपावली धन – धान्य को समर्पित पर्व है जो पूरी तरह से आर्थिक गतिविधियों पर केन्द्रित है | कृषि  के साथ ही अब उद्योग - व्यापार भी दीपावली से जुड़ गए हैं | इसलिए उपभोक्ताओं की प्राथमिकता और पसंद भी तदनुसार परिवर्तित होने लगे हैं | बर्तनों और आभूषणों तक सीमित न रहकर  धनतेरस की  खरीदी व्यापक रूप ले चुकी है | सूचना तकनीक के प्रसार ने आम इन्सान को भी अर्थव्यवस्था के बारे में सोचने को प्रेरित किया है | और इसीलिये अब लोग पेट्रोल – डीजल , जीएसटी , शेयर बाजार के सूचकांक जैसे विषयों पर भी बतियाने लगे हैं | देश की आर्थिक स्थिति केवल सरकार का  ही नहीं अपितु आम जनता के संज्ञान में आने वाला विषय भी बनता जा रहा है | राजनीति के समानांतर अब आर्थिक मसलों पर भी जनता के बीच चर्चा होना शुभ संकेत है | केवल संपन्न वर्ग तक सीमित रहने वाले विषयों पर मध्यम  आय वर्गीय तबके का खुलकर बात करना लोकतंत्र की जड़ों के गहराई तक पहुँचने का प्रमाण है | उस दृष्टि से धनतेरस पर केवल खरीदा – खरादी से ऊपर उठकर इस बात की भी चर्चा सुनाई दे रही है कि कोरोना के उपरांत देश के आर्थिक हालात सुधरे तो कितने और आगे उनमें क्या उम्मीद है ? नवम्बर के दूसरे दिन धनतेरस  पड़ने से नौकरी पेशा लोगों के पास भरपूर क्रय शक्ति है | अखबारों के जरिये ये जानने में आ रहा है कि कोरोना से उबरकर अर्थव्यवस्था कुलांचे भरने को बेताब है जिससे  बाजार के  गुलजार होने   की उम्मीदें बढ़ गई हैं | बीते माह के जीएसटी संग्रह का आँकड़ा 1 लाख 30 हजार करोड़ रु. को पार करना इस बात का प्रमाण है कि उद्योग – व्यापार रफ़्तार पकड़ चुका है | कोरोना की तीसरी लहर के आने की आशंका ज्यों – ज्यों कम होती जा रही है त्यों – त्यों अर्थव्यवस्था का ग्राफ भी चढ़ने लगा है | लेकिन इसमें बहुत बड़ा हिस्सा पेट्रोल – डीज़ल  पर होने वाली मुनाफाखोरी का है | आज ही जानकारी आई है कि तेल कंपनियों ने बीते तीन महीनों में ही तकरीबन 12 हजार करोड़ का लाभ अर्जित किया | केंद्र सरकार को ही बतौर एक्साइज 64 हजार करोड़ इस दौरान मिल गए | राज्यों ने जो कमाई की वह अलग से है | कोरोना काल में आय के स्रोत घट जाने से सरकार को राजस्व की बेहद जरूरत थी किन्तु अब जबकि बीते छह माह से लगातार जीएसटी का आँकड़ा ऊपर जा रहा है और कारोबारी जगत से भी अच्छी खबरें आ रही हैं तब जनता का ये उम्मीद लगाना गलत नहीं है कि सरकारी कर्मचारियों को दिए जाने वाले महंगाई भत्ते और बोनस जैसी राहत आम जनता को भी मिले | किसी भी देश की  अर्थव्यवस्था की  मजबूती का  सबसे बड़ा पैमाना उसके नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार होना है | आजकल दुनिया के अनेक देशों में प्रति व्यक्ति आय से ज्यादा प्रसन्नता  के स्तर को प्राथमिकता दी जाने लगी है | म.प्र जैसे अनेक राज्यों में आनंद मंत्रालय भी बनाया गया है | लेकिन दुर्भाग्य से आम जनता को आनंदित करने की बजाय सत्ता में बैठे महानुभाव अपने आनंद तक ही सीमित रहते हैं और राग दरबारी के गायन में प्रवीण नौकरशाह दिन रात उनको इस गलतफहमी में रखते  हैं कि प्रजा बहुत आराम से है |  पेट्रोल –  डीजल को जीएसटी के दायरे में लेने की मांग को सभी  राज्य सिरे से नकारते रहे हैं | अनेक वित्त मंत्रियों को ये कहते सुना भी गया है कि इन वस्तुओं की बिक्री में कर चोरी की गुंजाईश नहीं होने से सरकार को ये सबसे आसान कमाई के स्रोत लगते हैं | कोरोना काल में सरकार के सामने भी अभूतपूर्व आर्थिक संकट था | इसलिए जनता भी धैर्य पूर्वक सब सहती रही किन्तु अब जबकि चारों  तरफ से खुशनुमा संकेत मिल रहे हैं तब आम जनता यदि ये अपेक्षा रखती है कि धनतेरस और दीपावली के अवसर पर केंद्र और राज्य सरकार उनको राहत पहुँचाने वाली कोई घोषणा करे तो उसमें गलत  क्या है ? जनता के मन में इस बात की पीड़ा भी है और नाराजगी भी कि राजनीतिक दल चुनाव में बेतहाशा पैसा बहाते हैं | इसी तरह सरकार में बैठे लोग भी जनता  के धन पर ऐश करने में कोई संकोच नहीं करते किन्तु आम लोगों से ये उम्मीद की जाती है कि वे मितव्ययता बरतें और बढ़ती महंगाई का सामना कंजूसी के साथ जीवन यापन करते हुए करें | ये सोच अर्थव्यवस्था की  सेहत में हो रहे सुधार पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त है | आज जबकि पूरा देश त्यौहार की खुशियों में डूबा हुआ है तब पेट्रोल और डीजल के दामों में रोजाना होने वाली बढ़ोतरी कचोटती है | कच्चे तेल के दाम घटाना तो सरकार के बस में नहीं होता क्योंकि वह आयातित वस्तु है लेकिन उस पर तेल कंपनियों द्वारा कमाया जाने वाला मुनाफा  कम करना तो उसके नियन्त्रण में है | देश संकट में हो तो जनता हर तरह  का त्याग  करने तत्पर रहती है लेकिन अर्थव्यवस्था जब मजबूत हो रही है तब उसका तेल निकालने की कोशिशों से तो यही समझ में आता है कि शासन में बैठे लोग लोगों  की तकलीफों के प्रति पूरी तरह से संवेदनाशून्य हो चले हैं | कहना गलत नहीं होगा कि केंद्र सरकार ने अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं को चलाकर जो प्रशंसा हासिल की थी वह पेट्रोल – डीजल में की जा रही मुनाफाखोरी  के चलते मिट्टी में मिल रही है | 

-रवीन्द्र  वाजपेयी

Monday, 1 November 2021

प्रदूषण की चिंता तो दैनिक जीवन का हिस्सा होना चाहिए


मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
-रवीन्द्र वाजपेयी

प्रदूषण की चिंता तो दैनिक जीवन का हिस्सा होना चाहिए

दीपावली पर प्रदूषण रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बेहद सख्त है | उसने साफ़ कहा है कि प्रदूषण फ़ैलाने वाली आतिशबाजी के उपयोग की अनुमति नहीं होगी | जिन पटाकों से विषाक्त धुंआ नहीं निकलता उनके प्रयोग के बारे में बीते अनेक सालों से शासन , प्रशासन , न्यायपालिका और पर्यावरण संरक्षण में जुटे संगठन मिलकर मुहिम चला रहे हैं | चीन से आने वाले घटिया  पटाकों के आयात पर रोक भी लगाई गई | शिवाकाशी ( तमिलनाडु ) के पटाका उद्योग को इससे जबरदस्त घाटा भी हुआ है |  स्थानीय स्तर पर बननेवाली आतिशबाजी की गुणवत्ता को लेकर भी चर्चाएँ हुआ करती हैं | ओलिम्पिक सरीखे आयोजनों में जिस आतिशबाजी का उपयोग होता है वह पर्यावरण को क्षति न पहुँचाने वाली होती है किन्तु दीपावली जैसे लोक महोत्सव पर उसका उपयोग करना हर किसी के बस में नहीं है | यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर स्थानीय प्रशासन फरमान तो जारी कर देता है किन्तु उसका अपेक्षित  असर  नहीं होता और तमाम प्रतिबंधों को धता बताते हुए गुणवत्ता विहीन पटाके धड़ल्ले से ध्वनि और वायु प्रदूषण फैलाते हैं | भारत में तीज – त्यौहारों का धार्मिक महत्व होने से उनके साथ जन भावनाएं जुड़ जाती हैं | और इसीलिये  दीपावली पर पटाके फोड़ने पर  बंदिश का विरोध किया जाता है | लेकिन ये मुद्दा एक दिन तक सीमित रखने वाला नहीं है | दिवाली पर करोड़ों दीपक जलाये जाते हैं | उनमें प्रयुक्त होने वाले तेल को लेकर भी ये कहा  जा सकता है कि उनके जलने पर निकलने वाला धुंआ भी वायु प्रदूषण का कारण बनता है | बाजार में मिलावटी तेल की भरमार किसी से छिपी नहीं है | कुल मिलाकर बात  वायुमंडल को साफ़ - सुथरा रखने की है | ये विषय भारत की नहीं अपितु समूचे विश्व के लिए गहन चिंता का विषय है |  लेकिन भारत सरीखे विशाल आबादी वाले देश में जहाँ आज भी करोड़ों लोग बेघरबार होने से झुग्गियों में रहते हैं वहां  साफ़ - सफाई , पर्यावरण , वायु प्रदूषण , स्वच्छ पेयजल , शौचालय जैसे मुद्दे गौण हो जाते हैं | शहरों में जो चकाचौंध नजर आती है उसके साथ ही गंदी बस्तियों की बढ़ती संख्या किसी कलंक से कम नहीं है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता  और शौचालयों के निर्माण के अभियान  को निश्चित रूप से अकल्पनीय सफलता मिली लेकिन आज भी बहुत बड़ी आबादी खुले में शौच हेतु मजबूर है | शुद्ध पेयजल की आपूर्ति भी गम्भीर  चुनौती है | कल – कारखानों  के साथ ही वाहनों के धुंए से पर्यावरण को  होने वाले नुकसान के बारे में भी चिंताएं बढ़ती जा रही हैं | प्रदूषण रोकने वाले सरकारी महकमे इस बारे में प्रयासरत हैं लेकिन भ्रष्टाचार के चलते पर्यावरण के साथ खिलबाड़ बदस्तूर जाती है | वाहनों का प्रदूषण जांचकर उन्हें प्रमाणपत्र देने वाली प्रक्रिया पूरी तरह मजाक बनकर रह गई है | देश में इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन शुरू होने के बाद भी पेट्रोल –डीजल चलित वाहनों से आने वाले अनेक वर्षों तक मुक्ति मिलने की सम्भावना नहीं है | कोयले से  विद्युत उत्पादन पर पूरी तरह रोक लगने में भी अभी समय है | आजकल ई कचरा  भी  चिंता का बड़ा कारण बनता जा रहा है | तेजी से घट रहे वन , हिमाच्छादित पर्वतों पर ग्लेशियरों का लगातार सिकुड़ना , असीमित शहरीकरण और  सुविधाभोगी जीवनशैली के कारण प्रकृति और पर्यावरण की जो अनदेखी हुई उसकी वजह से ही पृथ्वी के नष्ट होने या जलमग्न होने जैसी कल्पनाएँ की जाने लगी हैं | बीते दो वर्ष में कोरोना के प्रकोप के दौरान जब लॉक डाउन की वजह से सब कुछ रुक गया था तब बिना किसी मानवीय या शासकीय प्रयास के ही प्रकृति और पर्यावरण अपने मूल स्वरूप में लौटने लगे थे |  गंगा बिना किसी खर्च के ही स्वच्छ होने लगी | लेकिन ज्योंही स्थितियां सामान्य हुईं त्योंही हालात पहले जैसे बदतर होते गये | ये सब देखकर लगता है कि  पर्यावरण को लेकर की जाने वाली चिंता केवल दीपावली तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बनना चाहिए | दीपावली पर चलाये जाने पटाके निश्चित रूप से वायु प्रदूषण का बड़ा कारण बनते  हैं , लेकिन केवल एक दिन के लिए सर्वोच्च न्यायालय से लेकर स्थानीय प्रशासन तक जितनी  मशक्कत की जाती है उसका अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता | बेहतर तो यही होगा कि पर्यावरण संरक्षण को भी स्वच्छता और शौचालय जैसा दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाए | आम जनता को ये समझाने की जरूरत है कि प्रकृति और पर्यावरण पर होने वाला अत्याचार हमारी अपनी संतानों के लिए कितना नुकसानदेह होगा | प्रदूषण को रोकने के प्रति लोगों में जागरूकता निश्चित रूप से बढ़ी है लेकिन बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनकी ज़िन्दगी में इन सबका कोई महत्व  नहीं है | एक या कुछ दिन पर्यावरण की चिंता करने  से कुछ हासिल नहीं होता | भारतीय जीवन शैली और चिंतन धारा में प्रकृति को देवता मानकर उसकी पूजा करने का संस्कार किसी न्यायालय अथवा राजाज्ञा ने न होकर स्वप्रेरित था क्योंकि वायु , अग्नि , आकाश , कुए , तालाब , नदी , समुद्र , पर्वत , वन , वृक्ष , पशु , पक्षी , जीव – जंतु सभी को सृष्टि के व्यवस्थित संचालन में महत्वपूर्ण आवश्यकता मान उनके साथ सामंजस्य बनाकर सह अस्तित्व का जो अन्तर्निहित भाव था उसी के कारण भारत में गरीब से अमीर तक सभी पर्यावरण  को बचाने के प्रति सतर्क रहा करते थे | आज जिस जैविक खेती का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटा जा रहा है वह भारत का अपढ़ किसान सदियों से जानता है | लेकिन ज्यादा पढ़े लोगों ने खेतों की भूमि को भी जहरीला बना दिया | दीपावली पर पटाकों को लेकर मचाया जाने वाला हल्ला भी विश्व पर्यावरण दिवस पर होने वाली भाषणबाजी जैसा होकर रह जाता है | सर्वोच्च न्यायालय की चिंता पूरी तरह वाजिब और जनहितकारी है लेकिन केवल फरमान जारी करने  से कुछ होता तो प्रदूषण इतना विकराल रूप नहीं लेता | 

-रवीन्द्र वाजपेयी