Friday, 19 November 2021

सरकारी शालाओं का कायाकल्प : दिल्ली सरकार बधाई की हकदार


 
भारत को कृषि प्रधान की बजाय अब चुनाव प्रधान देश कहना चाहिए क्योंकि यहाँ जब देखो तब चुनाव रूपी फसल की तैयारी होती रहती है | चूंकि चुनावों का मूल आधार राजनीति है इसलिए उसकी चर्चा भी इक्का – दुक्का  छोड़कर हर जुबान पर रहती है |  शोचनीय बात ये है कि इस चर्चा के विषय जाति , धर्म और स्थानीय मुद्दे ही ज्यादा होते हैं | लेकिन इसके लिए आम जनता को दोषी ठहराना गलत होगा क्योंकि राजनेता और राजनीतिक दलों से उसे जो सुनने मिलता है उसी के इर्द - गिर्द उसकी  सोच सिमटकर रह जाती है | ये कहना गलत न होगा कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर राजनीतिक विमर्श कम ही सुनाई देता है | टीवी चैनलों पर होने वाली दिशाहीन बहस में भी वही मुद्दे शामिल होते हैं जिनसे दर्शक संख्या बढ़े | वहीं अखबारी पन्ने भी राजनीति , हिंसा , भ्रष्टाचार और ऐसी ही बाकी सनसनीखेज खबरों से भरे रहते हैं | जबकि देश की अधिकतर जनसँख्या को प्रभावित करने वाले मुद्दे कुछ और ही हैं | उस दृष्टि से देखा जाए तो दिल्ली सरकार द्वारा अपनी शालाओं का स्तर सुधारकर उन्हें बड़े नाम वाले निजी विद्यालयों की टक्कर में खड़ा किये जाने को राष्ट्रीय उपलब्धि  के तौर पर प्रचारित किया जाना चाहिए ,  किन्तु ऐसी खबरों को अपेक्षित महत्व नहीं मिलता | आज ही छोटी सी खबर से पता चला कि देश में सरकारी विद्यालयों की गुणवता के आधार पर जो सूची तैयार की गई उसमें सर्वश्रेष्ठ विद्यालय दिल्ली का ही है | यही नहीं जिन 10 सरकारी विद्यालयों का श्रेष्ठता सूची हेतु चयन हुआ उनमें चार दिल्ली सरकार द्वारा संचालित हैं | दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया के पास शिक्षा विभाग भी है | अपने पहले कार्यकाल  में ही उन्होंने इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास किये  जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में संपन्न वर्ग के अभिभावक भी अपने बच्चों को प्रवेश दिलवाने प्रेरित हुए | उनमें दी जाने वाली शिक्षा के अलावा अन्य वे सभी गतिविधियां संचालित की जाने लगीं जिनकी वजह से निजी विद्यालय आकर्षण का केंद्र माने जाते हैं | राजनीतिक मतभेदों से परे  हटकर ये मानना ही पड़ेगा  कि अरविन्द केजरीवाल की सरकार ने शासकीय विद्यालयों की दशा और दिशा दोनों में जबरदस्त या यूँ कहें कि अकल्पनीय सुधार करते हुए उनको निजी क्षेत्र के महंगे विद्यालयों से प्रतिस्पर्धा करने लायक बनाकर उनसे आगे निकलने में सक्षम बनाया | देश की 10 श्रेष्ठ सरकारी शालाओं में से चार दिल्ली की होना मायने रखता है | केजरीवाल सरकार और आम आदमी पार्टी की नीतियों से मतभिन्नता होना बुरा नहीं है परन्तु शिक्षा और मोहल्ला क्लीनिक के रूप में उसने दिल्ली में जो काम किया वह राष्ट्रीय राजनीति के लिए प्रेरणास्पद कहा जाएगा | विद्यालयीन शिक्षा और प्राथमिक चिकित्सा ऐसे मौलिक विषय हैं जिन पर सरकार को विशेष ध्यान देना चाहिए । लेकिन वोट बैंक की राजनीति में उलझे राजनीतिक दलों को इस बारे में ज्यादा रूचि नहीं होती | अनेक अदालती फैसलों के अलावा सरकारी  आदेशों में शासकीय सेवारत अधिकारियों तक से ये कहा गया कि वे अपने बच्चों को शासकीय शाला में पढ़ाएं | कुछ  स्थानों से इसका पालन किये जाने संबंधी खबरें भी आईं किन्तु उनको अपवाद ही कहा जा सकता है | आज भी न सिर्फ नौकरशाहों अपितु ज्यादातर राजनेताओं के बच्चे महंगे निजी विद्यालयों में ही शिक्षा प्राप्त करते हैं | और उसके बाद उनकी कोशिश होती है कि उच्च शिक्षा हेतु किसी तरह उन्हें विदेश भेज दिया जाए | इस माहौल में दिल्ली सरकार द्वारा हासिल उपलब्धि प्रशंसा और अभिनंदन के साथ ही अन्य सरकारों के लिए अनुकरणीय भी है | श्री सिसौदिया ने ये साबित कर दिया कि सरकारी  विद्यालयों की दशा सुधारकर उनका उन्नयन संभव है , बशर्ते प्रयासों में प्रतिबद्धता और ईमानदारी हो | दिल्ली सरकार ने सरकारी शालाओं का स्तर उठाकर ये स्थिति उत्पन्न कर दी कि उच्च  वर्गीय परिवारों के अभिभावक भी अपने बच्चों को इनमें प्रवेश दिलवाने को प्रयासरत रहते हैं | राजनीति की अपनी सीमाएं  और संकोच हैं , लेकिन ऐसे मुद्दों पर अपने विरोधी से भी सीखना ही बुद्धिमत्ता होती है | स्व. अटलबिहारी वाजपेयी ने प्रधानमन्त्री रहते हुए उच्चस्तरीय सडकों - की जरूरत और महत्व समझाया | उनकी सोच को केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने जिस कुशलता से आगे बढ़ाया उसकी उनके विरोधी भी मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं | दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री रहते हुए श्री सिसौदिया ने सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता को  जिस ऊंचाई तक पहुँचाया उसे राष्ट्रीय मॉडल बनाया जाना  चाहिए | देश में शिक्षा के व्यवसायीकरण को रोकने का ये एक कारगर उपाय हो सकता है | सबका साथ , सबका विकास और सबका विश्वास नारे को  वास्तविकता  में तभी बदला जा सकेगा जब शिक्षा जैसी मूलभूत चीज बाजारवादी ताकतों के हाथों में कैद न रहे |  वैसे अनेक राज्यों में लड़कियों को मुफ्त शिक्षा के  अलावा अन्य सुविधाएँ जैसी योजनाएँ भी प्रचलित हैं किन्तु शासकीय शिक्षण संस्थाएं गुणवत्ता की दौड़ में पिछड़ने की वजह से विद्यार्थियों की पसंद नहीं बन पातीं | इस कमी को दूर करना समय की मांग है | विशेष रूप से विद्यालय स्तर तक की शिक्षा के लिये सरकारी संस्थानों का निजी क्षेत्र के समकक्ष होना बेहद जरूरी हो गया है क्योंकि विकास की कल्पना इसके बिना अधूरी है | बताया जाता है अमेरिका में शालेय शिक्षा हेतु बच्चों को ज्यादा दूर भेजने की बजाय निकटवर्ती शाला में प्रवेश दिलवाना अनिवार्य है | इसका कारण वहां सभी विद्यालयों का  मूलभूत ढांचा एक समान होना है | 21वीं सदी में भारत को यदि विश्वशक्ति बनना है तब उसे विद्यालयीन स्तर से ही सरकारी शिक्षा  संस्थानों को उच्च स्तरीय बना होगा | शाला का अर्थ केवल एक भवन न होकर उसमें दी जाने वाली शिक्षा होती है | हमारे देश में  बिजली , सड़क और पानी जैसे मुद्दे चुनावों में हावी रहते हैं | उनके अलावा आरक्षण रूपी लॉलीपाप  और मुफ्त उपहारों की घोषणा से मतदाताओं को आकर्षित किया जाता है | लेकिन दिल्ली सरकार ने सरकारी विद्यालयों का कायाकल्प करते हुए उनको जिस तरह से प्रतिष्ठित किया वह अँधेरे में किरण जैसा है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 November 2021

न्यायपालिका भी तो अपनी सुविधा के मुताबिक संज्ञान लेती है



सर्वोच्च न्यायालय कानून की किताबों से बाहर निकलकर भी आये दिन ऐसी टिप्पणियां करता है जो जनता की आवाज प्रतीत होती हैं। दिल्ली में प्रदूषण की समस्या पर केजरीवाल सरकार और केंद्र दोनों को जिस तरह से फटकार लग रही है उससे आम जनता खुश है। दरअसल इन दिनों दिल्ली वासियों का साँस लेना दूभर हो रहा है। दीपावली पर चली आतिशबाजी के बाद पड़ोसी पंजाब और हरियाणा राज्यों के किसानों द्वारा खेतों में पराली जलाए जाने से निकले धुंए ने हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली का रुख किया जिससे वहां के आसमान में धुंआ छा गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में दिल्ली और केंद्र सरकार के हलफनामे पर सवाल उठाते हुआ कहा कि पराली से होने वाला प्रदूषण वाहनों के धुंए की तुलना में बहुत कम है जिसे रोकने में वे दोनों असफल रहे हैं। और साल भर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के बाद सर्दियां आते ही किसानों को दोषी बताकर अपनी गलतियाँ छिपाते हैं। न्यायालय ने नौकरशाही की अकर्मण्यता पर भी तंज़ कसते हुए कहा कि वह पूरी तरह निष्क्रिय बनी रहकर अदालत से आदेश मिलने का इन्तजार करती रहती है। न्यायालय ने कानपुर आईआईटी द्वारा पराली प्रदूषण पर दिए गए सुझाव पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उसके निष्कर्ष भरोसे लायक नहीं हैं और पांच सितारा होटलों में बैठकर किसानों को दोषी ठहराना आसान है। अदालत ने दिल्ली सरकार को लताड़ते हुए ये भी कहा कि वह विज्ञापनों पर तो भारी-भरकम राशि लुटाती है परन्तु प्रदूषण रोकने की बजाय बलि के बकरे खोजा करती है। लेकिन न्यायालय की ये टिप्पणी सबसे तीखी रही कि टीवी पर होने वाली बहस सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं क्योंकि उसमें शामिल लोगों को मुद्दे की समझ नहीं होने पर वे कुछ भी बोल जाते हैं जिससे वातावारण खराब होता है। सर्वोच्च न्यायालय तकरीबन हर रोज किसी न किसी मामले में इसी तरह की व्यंग्यात्मक और कड़वी लगने वाली बातें किया करता है। नौकरशाहों को फटकारने में भी वह संकोच नहीं करता। आजकल उसकी ये धमकीनुमा टिप्पणी भी अक्सर सुनाई दे जाती है कि शासन और प्रशासन की तरफ से जल्द कोई कदम न उठाया गया तब वह खुद होकर आदेश पारित कर देगा। यद्यपि इसके पीछे सरकारी मशीनरी को तेजी से काम करने के लिए बाध्य करना होता है किन्तु अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें न्यायपालिका ही अनिर्णय बनाये रखते हुए इस बात की प्रतीक्षा करती है कि सरकार और नौकरशाह ऐसा कुछ कर दें जिससे वह निर्णय देने से बच जावे। इसके दो ज्वलंत उदाहरण हैं , दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में मुस्लिम समाज द्वारा लम्बे समय तक सड़क रोककर बैठ जाना और उसके बाद कृषि कानूनों के विरुद्ध दिल्ली की सीमाओं पर किसानों द्वारा सड़कों पर किया गया कब्जा। इन दोनों मामलों में सम्बंधित राज्य और केंद्र की सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या कानून व्यवस्था बनाये रखने की थी। शाहीन बाग़ के आन्दोलन को समूचे विपक्ष का समर्थन था। यदि केंद्र सरकार धरना स्थल को बलपूर्वक खाली करवाती तो अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का हल्ला मचाकर सहिष्णुता और ऐसे ही अन्य मुद्दे उछाले जाते। इसी तरह किसान आन्दोलन के जरिये घेरी गईं सड़कें जिन राज्यों के क्षेत्राधिकार में आती हैं यदि वे आम नागरिकों को हो रही परेशानी दूर करने के लिए धरने को पुलिस की मदद से खत्म करवातीं तो उन पर किसान विरोधी होने का दोष थोप दिया जाता। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि शाहीन बाग़ और किसान आन्दोलन में सड़क पर कब्जा किये जाने से दिल्ली के नागरिकों सहित बाहर से आने वालों को कितना हलाकान होना पड़ा। होना तो ये चाहिए था कि सर्वोच्च न्यायालय खुद होकर संज्ञान लेते हुए सड़कों को खाली करवाने का आदेश पारित करता किन्तु वह ऐसा करने से बचता रहा जिसका कारण तो वही जानता होगा। लेकिन जब उनके विरोध में याचिकाएं पेश हुईं तब भी न्यायालय की तरफ से उपदेशात्मक बातें तो खूब की गईं लेकिन आदेशात्मक कुछ भी नहीं। शाहीन बाग़ का धरना पूरी तरह गैरकानूनी था। लेकिन न्यायपालिका ने बजाय उसे हटवाने के बजाय धरना देने वालों से बात करने के लिए एक टीम बनाई जो खाली हाथ लौटी। यदि कोरोना न आया होता तो बड़ी बात नहीं शाहीन बाग़ वाली सड़क पर आज भी धरना दिए मुस्लिम महिलाओं और बच्चों को बैठाये रखा जाता। इसी तरह किसान आंदोलन के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी किन्तु उसके बाद भी किसानों ने धरना खत्म नहीं किया तो बजाय उनको हटाने का आदेश देने के उसने आन्दोलन के अधिकार को मान्यता देते हुए किसान संगठनों से केवल ये पूछा कि कानूनों पर रोक के बाद भी वे जनता के लिए परेशानी का कारण क्यों बने हुए हैं ? जनअपेक्षा यही थी कि सर्वोच्च न्यायालय उक्त दोनों धरनों के बारे में दायर याचिकाओं पर बजाय लम्बी सुनवाई के सबसे पहले सड़क खाली करने का आदेश देता किन्तु कानून व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी होने के नाम पर वह इससे बचता रहा। ये कहना कतई गलत न होगा कि यदि सर्वोच्च न्यायालय स्वत: संज्ञान लेते हुए शाहीन बाग के धरने को गैरकानूनी बताते हुए सड़क खाली करवाने का आदेश दे देता तब शायद किसान संगठनों द्वारा भी राजधानी को जाने वाली सड़कें घेरने का दुस्साहस नहीं किया जाता। सही बात ये है कि दिल्ली में दीपावली की रात चले पटाकों से न्यायपालिका भन्नाई हुई है। सर्वोच्च न्यायालय के कड़े और स्पष्ट आदेश के बाद भी उसकी नजर के सामने ही दिल्लीवासियों ने उसके आदेश को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। हालांकि उस आदेश की मंशा असंदिग्ध रूप से जनहित में ही थी। ये देखते हुए न्यायपालिका को भी अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करनी चाहिए। किस मामले में वह स्वत: संज्ञान लेगी और किसमें ऐसा करने से बचेगी,इस बारे में स्पष्टता होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय की जागरूकता और जनहितैषी सोच निश्चित तौर पर प्रशंसनीय है। शासन और प्रशासन के कान खींचने के उसके प्रयासों को जनता भी पसंद करती है किन्तु न्यायपालिका के बारे में ये अवधारणा भी आम जनता के मन में गहराई तक घर करती जा रही है कि वह अनेक गम्भीर मामलों को अपनी सुविधा के अनुसार निपटाती है। दिल्ली में प्रदूषण की मौजूदा स्थिति पर केंद्र और केजरीवाल सरकार पर उसकी नाराजगी पूरी तरह जायज है। नौकरशाही के निकम्मेपन और टीवी चैनलों पर होने वाली बेसिर पैर की बहस पर रोषपूर्ण और व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ भी लोगों को अच्छी लग रही हैं। लेकिन ये बात भी सच है कि न्यायपालिका की सक्रियता जब विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करती दिखाई देती है तब अहं का जो टकराव पैदा होता है वह अनेक समस्याओं का कारण बनता है। प्रदूषण सहित ऐसे ही अनेक विषयों पर न्यायालयों की चिंता स्वागतयोग्य है किन्तु जब शाहीन बाग़ और किसान संगठनों द्वारा सड़क पर गैर कानूनी कब्जे के विरुद्ध वह सख्त कदम उठाने से खुद को बचाता है तब उसके आदेशों की गम्भीरता वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसा दीपावली की रात हर साल देखने मिलता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 17 November 2021

अजीब विरोधाभास : रिकार्ड अन्न उत्पादन के बाद भुखमरी



भारत  में भोजन के लिए भिक्षा मांगने वाले हर जगह दिख जाते हैं |  हाल ही में वैश्विक भुखमरी सूचकांक – 2021 में  खुलासा हुआ कि 116 देशों की सूची में भारत एक वर्ष के भीतर 91 वें से लुढ़क कर 116 वें स्थान पर आ गया , जो पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी नीचे  है | सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए ये शर्मिन्दगी का विषय है | इसीलिये सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस  केंद्र सरकार को  भूख से मर रहे लोगों को बचाने के लिए योजना न बनाने के लिए लताड़ते हुए कह दिया कि जल्द ऐसा न होने पर वह स्वतः संज्ञान लेकर आदेश पारित कर देगा | पेट भरने में असमर्थ लोगों की मदद के लिए सामुदायिक रसोई  सुविधा  प्रारम्भ करने की मांग करने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने उक्त आदेश दिया | न्यायालय की पीड़ा बिल्कुल  सही है | किसी भी कल्याणकारी राज्य में एक भी व्यक्ति भूख से मर जाए तो इससे बड़ी शर्म की बात दूसरी नहीं हो सकती | लेकिन सवाल ये है कि लोग भूखे क्यों हैं ? पूरे कोरोना काल में 80 करोड़ लोगों को सरकार ने मुफ्त अनाज प्रदान किया | आगामी 30 नवम्बर से मुफ्त वितरण तो बंद हो जायेगा किन्तु सस्ते अनाज की राशन व्यवस्था पूर्ववत जारी रहेगी | ऐसे में वे  परिस्थितियां विचारणीय हैं जो  भुखमरी का कारण हैं | पाकिस्तान और बांगला देश से भी बदतर स्थिति वाले सर्वेक्षण को भले ही अविश्वसनीय मान लिया जाए लेकिन ये तो सच है कि भारत में करोड़ों लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं है | इसकी  मुख्य वजह बेरोजगारी ही है जो कोरोना काल में सर्वोच्च स्तर पर जा पहुंची | ये बात सही है कि पेट भरने के लिए इन्सान के पास पैसे और पैसों के लिए काम होना चाहिए |  इसी के साथ ही जनसँख्या नियन्त्रण प्राथमिक आवश्यकता है किन्तु  इस बारे में सरकारी स्तर पर उदासीनता नजर आने लगी है | दुष्परिणाम ये हुआ कि सुशिक्षित और संपन्न वर्ग में तो परिवार नियोजन अपना लिया गया लेकिन गरीब तबके की जनसंख्या वृद्धि लगातार जारी है | कुछ समुदायों ने धर्म के नाम पर परिवार नियोजन को अपनाने से इंकार कर दिया | जनसँख्या में सबसे आगे चीन में जब  साम्यवादी व्यवस्था आई तब वह आर्थिक तौर पर भारत से भी पीछे था लेकिन आज ही ये जानकारी आई कि वह अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे धनी देश बन गया | ये चमत्कार रातों - रात नहीं हुआ | बल्कि अपनी विशाल जनसंख्या को बिठाकर मुफ्त में खिलाने के बजाय उसने हर व्यक्ति को कार्य करने  हेतु मजबूर कर दिया | परिणाम ये निकला कि देखते ही देखते वह उत्पादक देश बनने लगा जिसने न्यूनतम वेतन की बजाय अधिकतम काम पर बल दिया और  बच्चे पैदा करने के लिये भी सरकार से अनुमति लेने जैसी  व्यवस्था लागू की | हमारे देश में श्रमिक संगठनों ने कभी कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने की जरूरत नहीं समझी जबकि चीन में आन्दोलन , हड़ताल या वेतन जैसी मांग करने का अधिकार ही नहीं दिया गया | कौन  व्यक्ति क्या  काम करेगा ये सरकार तय करती है | श्रम करने में सक्षम किसी भी व्यक्ति को बिना काम किये बैठने नहीं दिया जाता | अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन दुनिया भर के लिए नियम - कायदे बनाता है किन्तु  चीन ने उनको लागू किया या नहीं उसकी जांच वह भी नहीं कर सकता | भारत में स्थिति इसके ठीक विपरीत है | हमारे देश में अधिकारों के लिए तो खूब आवाज उठती है लेकिन कर्तव्यों का निर्वहन प्राथमिकताओं से परे है | गरीबी और भुखमरी का सबसे बड़ा कारण कामचोरी है जिसे मुफ्तखोरी ने बढ़ावा दिया | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा  भुखमरी के शिकार लोगों की चिंता करना हर दृष्टि से सही है किन्तु भुखमरी  दूर करने के लिए लोगों को मुफ्त खिलाने की बजाय काम की अनिवार्यता बेहतर विकल्प होगा | इसे विडंबना ही  कहा जाएगा  कि एक तरफ तो बेरोजगारी का आंकड़ा  सर्वकालीन उच्च स्तर पर  है लेकिन दूसरी तरफ हर क्षेत्र में काम करने वालों का अभाव है |  आज जरूरत है कि श्रम को भी मांग और पूर्ति से जोड़ा जाए | सर्वोच्च न्यायालय की मंशा पूरी तरह मानवीय है लेकिन जिस तरह मध्यान्ह आहार के बावजूद शालाओं में गरीब घरों के बच्चों के शैक्षणिक स्तर में अपेक्षित सुधार होने की बजाय भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला वैसी ही अव्यवस्था सामुदायिक रसोई में होने की आशंका से इंकार नहीं जा सकता | भारत में कृषि क्षेत्र रोजगार प्रदान करने का सबसे बड़ा जरिया  है किन्तु उसमें  भी श्रमिकों के अभाव का रोना सुनाई देता है | निर्माण क्षेत्र में इन दिनों जबरदस्त कार्य हो रहा है जहां करोड़ों श्रमिकों को रोज काम मिल सकता है | फिर भी  श्रमिकों के अभाव में बड़े – बड़े प्रोजेक्ट विलम्ब से पूरे होते हैं | मध्यमवर्गीय परिवारों के जीवन स्तर में सुधार के कारण घरेलू काम के लिए कर्मचारियों की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है लेकिन जिसे देखो ये शिकायत करता मिल जायेगा कि उसे काम वाले नहीं मिल रहे | भूख निश्चित तौर पर बड़ी समस्या है | दूसरी तरफ देश में खाद्यान्न का उत्पादन साल दर साल बढ़ता जा रहा है | सरकार सार्वजानिक वितरण प्रणाली के लिए अरबों – खरबों रु. का अन्न खरीदकर भंडारण करती है | एक और दो रूपये में गेंहू - चावल करोड़ों लोगों को दिये जाते हैं | वृद्धावस्था और निराश्रित पेंशन भी मिल रही है | ऐसे में भूखा वही रह सकता है जो पूरी तरह से निकम्मा या अपाहिज हो | इसलिए  ये भी जरूरी है कि हर किसी को इस बात के लिए प्रेरित किया जावे कि वह कुछ न कुछ करे जिससे उसका भरण – पोषण हो सके | हालाँकि इस सुझाव को जनविरोधी कहने वाले भी कम नहीं होंगे  लेकिन कोई भी देश करोड़ों लोगों को मुफ्त में खिलाता रहे तो वह कभी विकास नहीं कर  सकेगा | खाद्य सुरक्षा बेशक सरकार की जिम्मेदारी है किन्तु सबकी भूख मिटाने के इंतजाम का दुष्परिणाम नए भूखों के रूप में सामने आये बिना नहीं रहेगा | सार्वजानिक रसोई अवश्य बने और जरूरतमंदों को सस्ता अनाज और भोजन मिले इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चहिये किन्तु इस समस्या का स्थायी हल आज नहीं तो कल तलाशना ही पड़ेगा | सरकारी अनुदान से जनता की भलाई बहुत जरूरी और अच्छी बात है लेकिन तालाब  के किनारे बैठे लोगों को मुफ्त में मछली बांटकर निकम्मा बनाने के बजाय उन्हें मछली पकड़कर पेट भरने के लिए प्रेरित करना ही उपयुक्त तरीका है | अपने देश के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस की उक्त शिक्षा से  प्रेरणा लेकर चीन ने अपनी विशाल जनसंख्या को मानव संसाधन में बदलकर जो कमाल किया वही भारत को भी करना पड़ेगा | वरना एक तरफ प्रगति के आंकडे चमकेंगे और दूसरी तरफ भुखमरी के | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 16 November 2021

हिन्दू और हिन्दुत्व : कांग्रेस से न निगलते बन रहा है और न ही उगलते



ऐसा लगता है कांग्रेस ने गलतियों से सीखने की बजाय उन्हें दोहराने की आदत पाल ली है | बीते सप्ताह पार्टी के वरिष्ट नेता सलमान खुर्शीद की पुस्तक सनराइज ओवर अयोध्या के विमोचन पर वरिष्ट नेता दिग्विजय सिंह ने हिन्दू और हिंदुत्व संबंधी निरर्थक बातें कहते हुए विवाद पैदा कर दिया था | बाद में जब पुस्तक में हिंदुत्व की तुलना इस्लामिक आतंकवादी संगठनों से किये जाने की जानकारी उजागर हुई तब श्री खुर्शीद के विरुद्ध भी गुस्सा बढ़ा और बात  पुस्तक पर प्रतिबंध से उनके घर पर तोड़फोड़ तक जा पहुँची | इसी बीच एक और कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने  आग में घी डालने का काम किया | पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल  गांधी भी हिन्दू और हिंदुत्व की अधकचरी व्याख्या करने बैठ गये | म.प्र के एक कांग्रेस विधायक ने श्री खुर्शीद को पार्टी से निकालने की मांग कर डाली | उधर छत्तीसगढ़ के एक सरकारी कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर श्री खुर्शीद को दिया आमन्त्रण रद्द कर दिया गया | बीते काफी समय से कांग्रेस स्वातंत्र्य वीर सावरकर के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर काफ़ी आलोचनात्मक है | वामपंथी विचारधारा से भी उसकी इस मुहिम को समर्थन मिल रहा है | प्रश्न ये है कि हिन्दू और हिंदुत्व को लेकर की जा रही निराधार टिप्पणियों से कांग्रेस  को क्या हासिल होगा ? धर्मनिरपेक्षता का अनुपालन अपनी जगह ठीक है | भारत अनादिकाल से बहु आस्था वाला देश रहा है | हिन्दुओं में भी अलग – अलग देवी – देवताओं  को मानने वाले हैं | परस्पर विरोधी विचारों वाले ऋषियों को भी एक समान सम्मान दिया गया | यही वजह रही कि विदेशों से आये दूसरे धर्मों के आक्रमणकारी भी यहीं रच - बस गये | मुगलों के पहले भी गैर हिन्दू विदेशी शासकों ने हम पर हमला किया और कुछ समय तक राज भी | लेकिन  हिन्दू संस्कृति और उसमें समाया हिंदुत्व का भाव जीवित रहा तो उसकी वजह उसका शाश्वत होना है | ये बात समय – समय पर साबित हो चुकी है कि जिस सनातन  धर्म को हिन्दू  और हिंदुत्व का आधार माना जाता है वह किसी एक व्यक्ति अथवा देवता द्वारा प्रतिपादित न होकर निरंतर चलने वाली चिंतन परम्परा से विकसित होता गया | किसी एक व्यक्ति या पुस्तक को पत्थर की लकीर मानकर चलने की बजाय समूचे ब्रह्माण्ड को अपनी आस्था से जोड़कर एक उदार और विचारशील जीवन पद्धति ही हिंदु और हिंदुत्व के रूप  में स्वीकार की गई | श्री अय्यर और उन जैसे तमाम लोग समय – समय पर ये साबित करने का प्रयास करते रहते हैं कि मुग़ल शासक बड़े उदार ह्रदय थे  और उन्होंने यदि आतंक फैलाकर हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराया होता तो आज वे बहुसंख्यक न होते | अकबर को महान बताते हुए मणिशंकर ने दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय के अकबर रोड पर होने पर खुशी भी जाहिर की | उन्होंने मुगल शासक जहांगीर और शाहजहाँ की रगों में हिन्दू खून होने के बात को भी उछाला है | लेकिन आज जब कांग्रेस पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है और उसका जनाधार सिमटता जा रहा है तब उसे बजाय इस तरह के मुद्दों पर अपनी ऊर्जा और समय नष्ट करने के इस तरफ ध्यान देना चाहिए कि वह लोगों का विश्वास दोबारा किस तरह जीते | सही बात तो ये है कि कांग्रेस बीते कुछ समय से जबरदस्त मानसिक द्वन्द में फंसी हुई है | 2014 में सत्ता गंवाने के बाद बनाई गई एंटोनी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पार्टी की अल्पसंख्यक समर्थक  छवि उसकी पराजय का कारण बनी | चूँकि श्री एंटोनी गांधी परिवार के करीबी थे इसलिए उनकी बात को गम्भीरता से लेते हुए राहुल को ब्राह्मण के तौर पर प्रचारित करते हुए उनके द्वारा जनेऊ धारण करने और सारस्वत गोत्रीय होने की बात उछाली गई | मंदिरों में परंपरागत वस्त्र पहिनकर पूजा करने के चित्र भी प्रसारित होने लगे | कर्नाटक में वे विभिन्न मठों में भी गये | उनकी बहिन प्रियंका भी इन दिनों उ.प्र में मंदिरों के दर्शन करती देखी जा रही हैं | हालाँकि अभी तक उनकी माँ सोनिया गांधी ने अपने धर्म और गोत्र के बारे में कुछ भी  नहीं कहा | हाल ही कश्मीर यात्रा के दौरान भी राहुल ने खुद को कश्मीरी ब्राहमण बताया था | यद्यपि इस सबका कांग्रेस को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ , बल्कि मुस्लिम उससे छिड़कने लगे |   श्री खुर्शीद की पुस्तक में कांग्रेस के इस मानसिक भटकाव पर तंज कसते हुए कहा गया है कि पार्टी की  अल्पसंख्यक समर्थक छवि बनने के कारण जनेऊ जैसे मुद्दे उछालकर बचाव किया जाने लगा है | ऐसा लगता है राहुल और प्रियंका द्वारा स्वयं को हिन्दू साबित करने की कोशिश पार्टी के एक तबके को रास नहीं आ रही जिसका प्रमाण हिन्दू और हिंदुत्व को लेकर खड़ा किया ताजा विवाद है | हालाँकि चौतरफा छीछालेदर होने के बाद श्री खुर्शीद भी सफाई देते फिर रहे  हैं | उनकी पुस्तक बिके या नहीं लेकिन उसके  विमोचन के अवसर पर हुई बयानबाजी और उसके कुछ अंश कांग्रेस की डूबती नाव में छेद बन रहे हैं | आगामी चुनावों के मद्देनजर मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पार्टी  तरह – तरह के  जतन कर रही है | लेकिन भाजपा पर हमला  करते – करते उसके कुछ नेता जनहित के मुद्दों को छोड़ ज्योंही हिन्दू और हिंदुत्व विरोधी बयान देते हैं त्योंही उसकी आक्रामकता ठंडी पड़ जाती है और  मजबूरन उसे रक्षात्मक होना पड़ता है | श्री खुर्शीद को संदर्भित पुस्तक से  क्या लाभ होगा ये तो अभी कह  पाना कठिन है लेकिन उसकी सामग्री और उस बारे में  कतिपय नेताओं की उलजलूल बयानबाजी ने कांग्रेस का बड़ा नुकसान कर दिया | अतीत में भी ऐसा होता रहा है जिसके लिए  मणिशंकर को तो निलम्बित तक किया गया था । लेकिन उसके बाद भी गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी रुकने का नाम नहीं ले रही | पार्टी को अपने नेताओं को हिन्दू और हिन्दुत्व जैसे विषयों के बारे में प्रशिक्षण देकर ये समझाना चाहिए कि बहुसंख्यक समुदाय की उपेक्षा करने के दिन बीत चुके हैं | और ढुलमुल नीतियों के कारण ही  कांग्रेस का परम्परागत दलित , आदिवासी और यहाँ तक कि मुस्लिम मतदाता समूह भी उससे दूर होता जा रहा है |  उ.प्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जो आजादी के बाद से ही नेहरु और फिर गांधी परिवार की कर्मभूमि रही है लेकिन आज आलम ये है कि राहुल गांधी अमेठी गँवा चुके हैं और सपा – बसपा अपना प्रत्याशी खड़ा कर देते  तो सोनिया गांधी भी रायबरेली में हार जातीं | बीते कुछ सालों से प्रियंका इस राज्य में कांग्रेस का चेहरा बनी हुई हैं लेकिन वे भी चुनाव लड़ने से डरती हैं | इसका मुख्य कारण हिन्दू और हिंदुत्व जैसे मुद्दे पर  कुछ नेताओं की  बयानबाजी ही है | कांग्रेस का प्रचारतंत्र भाजपा को चाहे जितना कोसे लेकिन उसकी वर्तमान दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण  नीतिगत अनिश्चितता है | पार्टी को ये स्पष्ट करना चाहिए कि राहुल गांधी का सारस्वत गोत्र और जनेऊ उसे पसंद है या सलमान खुर्शीद द्वारा हिंदुत्व की तुलना आईएस और बोकोहरम से करने जैसी बेवकूफी | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 15 November 2021

आदिवासी अंचलों में राष्ट्रवादी सोच का प्रसार अच्छा संकेत



 
किसी राजनीतिक दल द्वारा किये जाने वाले हर कार्य के पीछे अगला चुनाव होता है | उस दृष्टि से म.प्र सरकार द्वारा आज आदिवासी समुदाय के प्रेरणा पुरुष अमर  शहीद बिरसा मुंडा की जयन्ती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाये जाने को भी भाजपा की राजनीतिक योजना कहना गलत नहीं होगा | प्रदेश कांग्रेस के नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह इस कार्यक्रम की जोरदार आलोचना करते हुए कह रहे हैं कि भाजपा को जनजातीय गौरव दिवस मनाने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि उसने इस वर्ग के लिए कुछ नहीं किया | लेकिन राजनीतिक विश्लेषक भाजपा की इस व्यूहरचना को समझ रहे हैं | कुछ समय पूर्व जबलपुर में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी आदिवासी सम्मलेन में आये थे | हाल ही में इस समुदाय के प्रभाव वाली जोबट विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा की जीत से उसका उत्साह बढ़ा है | बिरसा मुंडा वैसे तो झारखण्ड में आदिवासियों के महानायक माने जाते हैं लेकिन बिहार , उड़ीसा , छत्तीसगढ़ , म.प्र और महाराष्ट्र  के बहुत बड़े जनजातीय इलाके में उनके प्रति श्रद्धा है | ये समूचा इलाका ईसाई मिशनारियों के साथ ही नक्सली गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है | भाजपा के वैचारिक अभिभावक रास्वसंघ ने लंबे  समय से आदिवासी क्षेत्रों में जिस तरह सक्रियता बढ़ाई उसके कारण वहां मुख्य धारा की सोच को जगह मिली है | धर्मांतरण के अभियान को भी इससे धक्का पहुंचा वहीं नक्सली आतंक के विरुद्ध भी लोग सामने आने लगे हैं | दरअसल जनजातीय समुदाय को हिन्दू धर्म से अलग करने का विदेशी षडयंत्र आजादी के बाद लगातार सफल होता गया | इसी के चलते पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववादी संगठन खड़े हुए | म.प्र सरकार ने भोपाल के नव विकसित हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति करने का जो दांव चला वह हर किसी को चौंका गया | प्रदेश की राजधानी पर कभी आदिवासी राजपरिवार के शासन की जानकारी तो अच्छे – अच्छों को नहीं होगी | और फिर बड़ी मुस्लिम आबादी और नवाबी विरासत के  कारण भोपाल के प्रमुख स्टेशन का मुस्लिम नाम बदलकर आदिवासी रानी का नाम देना साहस भरा काम भी है | रानी कमलापति के इतिहास पर पड़ी धूल को एक झटके में साफ़ कर देना वाकई राजनीतिक सूझ - बूझ का उदाहरण है | इस अवसर पर प्रधानमन्त्री का आगमन और आदिवासियों का विशाल सम्मलेन भी भाजपाई रणनीतिकारों की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है | भले ऐसे आयोजनों का तुरंत असर न दिखाई देता हो लेकिन भाजपा , जिसे अब तक शहरी मध्यम वर्ग और व्यापारियों की पार्टी माना जाता रहा , जिस सुनियोजित ढंग से जनजातीय क्षेत्रों में पकड़ बनाती जा रही है उसका परिणम मणिपुर सहित  अन्य  पूर्वोत्तर राज्यों में देखा जा सकता है | बिरसा मुंडा तो खैर जनजातीय समुदाय में महानायक के तौर पर पूजित हैं लेकिन रानी कमलापति को अचानक विस्मृति और उपेक्षा से निकालकर राष्ट्रव्यापी प्रसिद्धि दिलवाना बहुत बड़ी बात है | हबीबगंज स्टेशन को  स्व. अटलबिहारी वाजपेयी के नाम करने की मांग कतिपय भाजपा नेताओं द्वारा  उठाई जा रही थी और ऐसी उम्मीद थी कि वह मंजूर भी  कर  ली जावेगी किन्तु सबको चौंकाते हुए रानी कमलापति के नाम का चयन किया गया | इसके पूर्व भाजपा ने गत वर्ष म.प्र से आदिवासी कार्यकर्ता  डा. सुमेर सोलंकी को राज्यसभा में भेजकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था | प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2023 में होगा | भाजपा के चुनाव प्रबंधक इस बात को भूले नहीं हैं कि अति आत्मविश्वास के चलते 2018 में पार्टी के हाथ से सत्ता खिसक गई थी | हालाँकि महज 15 माह बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की अतृप्त महत्वाकांक्षाओं की वजह से भाजपा को सत्ता दोबारा  हासिल हो गई लेकिन पार्टी इस बात से भी आशंकित रहती है कि कांग्रेस से आये विधायक भले ही शिवराज सरकार में भी मंत्री बने हुए हैं लेकिन अगले चुनाव के पहले उनमें से कुछ वापिस लौट जाएँ तो आश्चर्य नहीं होगा | इसीलिये पार्टी ने आदिवासी वर्ग के बीच पैठ बनाने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है | भोपाल में आज हो रहा आदिवासियों का जमावड़ा और उसमें प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का हिस्सा लेना महज सरकारी जलसा न होकर भाजपा और संघ परिवार की उस कार्य योजना का हिस्सा है जिसके अंतर्गत आदिवासियों को हिन्दू धर्म से दूर करते हुए मुख्य धारा से काट देने के षडयंत्र को विफल करना है | आदिवासी इलाकों में नक्सली गतिविधियाँ भी इसी कारण बढ़ीं क्योंकि विकास के नाम पर आया अनाप – शनाप धन नेता और नौकरशाहों की जेबों में जाता रहा जिसके कारण आदिवासी इलाके विकास की रोशनी से वंचित रह गये | यदि  ईमानदारी होती तो बीते सात दशक में आदिवासी इलाके और उनमें  रहने वाले धर्मांतरण करने वाली ताकतों के अलावा नक्सली जाल में न फंसे होते |  भाजपा की जहाँ – जहाँ सरकारें हैं वहां रामराज आ गया हो ऐसा तो नहीं है लेकिन ये बात सही है कि 2014 के बाद से रास्वसंघ ने उन अनछुए क्षेत्रों में अपनी गतिविधियाँ सफलतापूर्वक तेज कीं जिन्हें मुख्यधारा से काटकर देशविरोधी ताकतें अपने प्रभाव में लेने में कामयाब हो रही थीं  | आदिवासी समुदाय सांस्कृतिक तौर पर हिन्दुत्व का हिस्सा रहा है लेकिन उसके मन में हिन्दू विरोधी ज़हर बोने का काम बड़े पैमाने पर किया जाता रहा जिसके लिए विदेशी पैसे का उपयोग किसी से छिपा नहीं है | वैसे इस विषय पर राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए क्योंकि  आदिवासी समुदाय केवल वोट बैंक नहीं वरन इस देश की 135 करोड़ से अधिक जनसंख्या का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं | अशिक्षा और शहरी सभ्यता से दूर रहने के बावजूद देश की आजादी के लिए उसने भी  बलिदान दिए | जिनमें साधारण व्यक्ति से लेकर राजवंशीय विभूतियाँ भी थीं | आजादी के बाद उनके उत्थान के लिए कहने को तो बहुत कुछ किया गया लेकिन उन कोशिशों का समुचित लाभ नहीं होने के कारण  देश विरोधी शक्तियों को उनके मन में जहर भरने का अवसर मिल गया | ये अच्छा संकेत है कि आदिवासी वर्ग के बीच मुख्यधारा की राष्ट्रवादी राजनीति पूरे जोर से प्रवेश करने को तैयार है | चुनावी जीत हार से अलग हटकर देखें तो ये मानना ही होगा कि आरक्षण भी अपना असर खोता जा रहा है क्योंकि निजीकरण के चलते सरकारी नौकरियां सिमटने लगी हैं | ऐसे में आदिवासी अंचलों में यदि विकास की रोशनी नहीं पहुंचती तब वहाँ विघटनकारी ताकतों की पकड़ और मजबूत होती जायेगी जो किसी भी दृष्टि से देश हित में नहीं होगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 November 2021

मामला केवल मलिक और फड़नवीस के मान – सम्मान तक सीमित नहीं रह गया



महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों आरोप – प्रत्यारोप का रोचक मुकाबला देखने मिल रहा है | यूँ तो राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ी हस्तियाँ नित्य प्रति इस तरह के खेल में हिस्सेदार होती हैं लेकिन मुम्बई में जिसे देश की आर्थिक राजधानी भी कहा जाता है , नशीले पदार्थों के कारोबार को लेकर जिस तरह की रस्सा खींच देखने मिल रही है उससे डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ नामक कुश्ती याद आती है जिसे देखने वालों को भी ये पता होता है कि रिंग  में होने वाली कुश्ती महज नाटकबाजी है किन्तु फिर भी वे उस स्टंटबाजी का आनंद उठाने महंगी टिकिट खरीदकर जाते हैं या टीवी पर उसका प्रसारण देखते हैं | हमारे देश में सियासत के सौदागर भी उसी शैली की कुश्ती लड़ा करते हैं जो  जीत हार का फैसला हुए बिना ही कब खत्म हो जाये , ये पता ही नहीं  चलता | इसे  कव्वाली का मुकाबला भी कह सकते हैं जिसमें आमने सामने बैठे कव्वालों द्वारा जवाबी शेर दागकर श्रोताओं का मनोरंजन किया जाता है | पिछले महीने फिल्म उद्योग के बड़े सितारे कहलाने वाले शाहरुख़ खान के बेटे आर्यन को उसके कुछ साथियों सहित गोवा जाने वाले एक क्रूज पर हो रही पार्टी में नशीली चीजों के उपयोग की शिकायत पर एनसीबी ने पकड़ा |  शाहरुख़ और उनके बेटे ने तो चुप्पी साधे रखी लेकिन महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री नवाब मलिक ने उक्त छापे का नेतृत्व करने वाले एनसीबी अधिकारी  समीर वानखेड़े पर आरोपों  की बौछार लगा दी | समीर से उनकी खुन्नस जनहित के किसी मुद्दे पर न होकर उनके दामाद की नशीली चीजों के कारोबार से जुड़े होने के आरोप में की गई गिरफ्तारी है , जिसे कुछ समय पहले ही जमानत मिली थी | श्री मलिक ने आर्यन की गिरफ्तारी के बहाने श्री  वानखेड़े के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ये साबित करने का प्रयास किया कि वे घूसखोर और धोखेबाज हैं | उनकी शादी , धर्म और जाति को लेकर भी उन्होंने सनसनीखेज जानकारी उजागर की जिस पर  एनसीबी ने उनके विरुद्ध विभागीय जांच भी शुरू कर दी | लेकिन इसी दौरान महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने समीर का बचाव करते हुए श्री मलिक के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया | वानखेड़े परिवार भी मंत्री महोदय के खिलाफ अदालत में चला गया | लेकिन श्री फड़नवीस के मैदान में कूदते ही मुकाबला उनके और श्री मलिक के बीच सिमट गया | दोनों और से रोजाना बयानों के तीर चलने लगे |  रोचक बात ये है कि सभी आरोप पुराने हैं  जिन्हें गड़े मुर्दे उखाड़ने का प्रयास भी कहा जा सकता है | उसके बाद शुरू हुआ  मानहानि के नोटिस जारी करने का सिलसिला | वानखेड़े परिवार के साथ ही श्री मलिक और श्री फड़नवीस के बीच भी मानहानि के दावों का मुकाबला चल पड़ा | इस बारे में उल्लेखनीय है कि श्री वानखेड़े के परिजनों द्वारा श्री मलिक के विरुद्ध प्रस्तुत शिकायत पर अदालत ने मंत्री जी से कहा है कि वे अपने आरोपों को पुष्ट करने विषयक हलफनामा पेश करें | ऐसी ही बात उनके और पूर्व मुख्यमंत्री के बीच चल रही बयानों की जंग के बारे में कही जा रही हैं  | लेकिन इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि श्री मलिक को यदि श्री वानखेड़े के भ्रष्टाचार की इतनी बारीक जानकारी थी तो वे अब तक खामोश क्यों रहे ? इसी तरह श्री फड़नवीस के कथित कारनामों का पर्दाफाश करने की पहल  आर्यन मामले के बाद ही क्यों की गई ? सवालों के घेरे में तो पूर्व मुख्यमंत्री भी आते हैं | केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार  होने से वे चाहते तो श्री मलिक के विरुद्ध जो आरोप वे अभी लगा रहे हैं , उनकी जांच करवा सकते थे | लेकिन न तो श्री मलिक ने श्री वानखेड़े के विरुद्ध पहले कोई आरोप लगाये और न ही श्री फड़नवीस ने इस विवाद के पहले कभी श्री मलिक की बखिया उधेड़ने के लिए इतना जोर लगाया | इससे साबित होता है कि राजनेता एक दूसरे के काले - कारनामों के  बारे में सब कुछ जानते हुए भी तब तक चुप रहते हैं जब तक उनको कोई व्यक्तिगत नुकसान न हो रहा हो | यदि श्री मलिक के दामाद गिरफ़्तार न होते तब उनको श्री वानखेड़े से कोई शिकायत न रहती | इसी तरह उनके और श्री फडड़नवीस के बीच शुरू हुई बयानों की जंग पहले शुरू क्यों नहीं हुई इसका जवाब भी मिलना चाहिए | इस बारे में ये बात भी  गौरतलब है कि आरोपों की जबरदस्त बौछार करने वाले योद्धागण अब तक पुलिस या किसी अन्य सक्षम एजेंसी के पास अपनी बात को प्रमाणित करने वाले सबूतों के साथ नहीं गये जिससे  ये लगता है कि पूरी कवायद केवल सामने वाले पर दबाव बनाने के लिए की जा रही है | समीर वानखेड़े तो सरकारी अधिकारी हैं इसलिए उनकी कुछ सीमायें हैं लेकिन नवाब मलिक और देवेन्द्र फड़नवीस तो ताकतवर लोग हैं जो उनके पास उपलब्ध जानकारी जाँच एजेंसियों को देकर अपनी बात को साबित कर सकते हैं | इससे भी  बड़ी बात ये है कि  किसी व्यक्ति की गैर कानूनी गतिविधियों की जानकारी होने पर उसे पुलिस को न बताना भी एक तरह का अपराध ही है | साधारण इंसान तो ऐसे मामलों में झंझट लेने से बचता है लेकिन वर्तमान मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के साथ तो इस तरह का कोई डर नहीं होने से उनको तो पहले ही ये मामले सामने लाना चाहिए थे | कुल मिलाकर मुम्बई में आरोप – प्रत्यारोप के दैनिक मुकाबले के बाद अब मानहानि के दावों की जो बोलियाँ बढ़ – चढ़कर लग रही हैं उनसे राजनीतिक नेताओं का असली चरित्र उजागर हो रहा है | नशे के कारोबार से किसी का भी जुड़ाव गम्भीर मामला है | राजनेता और नौकरशाह मिलकर अपराधिक गतिविधियों को संरक्षण देते हैं ये  बात भी लोगों के मन में बैठती जा  रही है | इस प्रकरण में  नवाब मलिक और देवेन्द्र फड़नवीस ने जो कुछ भी कहा वह जगजाहिर है | दोनों ने एक दूसरे पर जो आरोप लगाये वे हवा में उड़ाने लायक नहीं हैं क्योंकि उनमें नशे के कारोबारियों के साथ विदेश से जुड़े तारों का  भी उल्लेख है | इसलिए दोनों तरफ से लगाये गये आरोपों की जाँच होनी चाहिए |  जो भी दोषी हो उसे समुचित दंड देना जरूरी है | अब ये मामला श्री मलिक और श्री फड़नवीस के मान – सम्मान तक सीमित न रहकर देश की सुरक्षा तक जा पहुंचा है |  यदि आरोप असत्य निकलते हैं तब भी दोनों नेताओं पर देश को गुमराह करने के लिए कारवाई होनी चाहिए |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 November 2021

दिग्विजय : भाजपा के घोषित विरोधी लेकिन अघोषित मददगार



अक्सर ये सुनने मिलता है कि कांग्रेस के वरिष्ट नेता और म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भाजपा के अघोषित मित्र हैं जो अपने बयानों से उसकी मदद  करते हैं | इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो श्री सिंह और भाजपा ही जानें क्योंकि आज की राजनीति में कौन कब किसके साथ और विरोध में है ये जान लेना बहुत कठिन है | विशेष तौर पर राजनेताओं की  वैचारिक अनुवांशिकता का  परीक्षण करना तो असंभव हो गया है | इसकी एक वजह राजनीति का विचारकों  की बजाय स्टार प्रचारकों पर निर्भर होते जाना है | नवजोत सिद्धू के पुराने और नए बयानों के वीडियो देखने से ही कविवर नीरज की ये पंक्ति याद आ जाती है कि लोग  ईमान बदलते हैं कैलेंडर की तरह | गत दिवस कांग्रेस के एक और वरिष्ट नेता तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की पुस्तक सनराइज ओवर अयोध्या के विमोचन में उपस्थित श्री सिंह ने एक बार फिर इतिहास को आधार बनाकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की जिसका लाभ भाजपा यदि उठाये तो आश्चर्य नहीं होगा | अपनी  आदतानुसार उन्होंने हिन्दू और हिन्दुत्व का मुद्दा उठाते हुए कहा कि हिदुत्व का हिन्दू धर्म और सनातन परम्पराओं से कोई सम्बन्ध नहीं है | ज़ाहिर है ऐसा कहकर वे भाजपा और संघ परिवार द्वारा प्रचारित हिन्दुत्व शब्द पर आपत्ति व्यक्त करना चाह रहे थे लेकिन निराधार बातें करने के आदी हो चुके इस वरिष्ट नेता ने इसके साथ ये कहकर अपने मानसिक संतुलन को सवालों  के घेरे में खड़ा कर दिया कि भारत में इस्लाम आने के पहले भी दूसरे धर्मों के मंदिर तोड़े जाते रहे | दरअसल इस बयान का उद्देश्य इतिहास के पन्नों को पलटना नहीं अपितु मुगलों के शासनकाल  में हिन्दू धर्मस्थलों को तोड़े जाने का बचाव करना था | उनकी इस टिप्पणी पर सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने ये जानकारी दी है कि जब देश रियासतों में बंटा था तब राजाओं द्वारा अपने कुलदेवताओं और पूर्वजों के मंदिर बनवाये जाते थे | दूसरे राजा द्वारा आक्रमण किये जाने पर वह उन स्मारकों को तोड़कर अपना आधिपत्य साबित करता था किन्तु जिस दौर की बात दिग्विजय सिंह कर रहे हैं उसमें भारत में जिन तीन धार्मिक धाराओं की जानकारी मिलती है वे सनातन धर्म जिसे प्रचलित भाषा में हिन्दू कहा जाता है के अलावा जैन और बौद्ध ही थे | इनके बीच वैचारिक मतभेद भले रहे लेकिन एक दूसरे के धर्मस्थल ध्वस्त करने की बात शायद ही कहीं उल्लिखित हो | आजादी के बाद वोट बैंक की राजनीति ने  अल्पसंख्यक की श्रेणी में जैन ,  बौद्ध और सिख  भी जोड़ दिए वरना उसके पूर्व इनको एक ही माना जाता था जो  सांस्कृतिक पहिचान पर आधारित था | बहरहाल श्री सिंह का ये कहना कि हिन्दुत्व का हिन्दू धर्म और सनातन परम्पराओं से कोई सम्बन्ध नहीं है , सिवाय भटकाव  पैदा करने के और कुछ भी नहीं है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय सहित अनेक धर्माचार्य तक ये कह चुके हैं कि हिन्दुत्व जीवन शैली है जिसे कोई भी अपना सकता है | जहाँ तक बात हिन्दू की है तो खुद को हिन्दू बताने वाले दिग्विजय सिंह को ये मालूम होना चाहिए कि हिन्दू धर्म न होकर राष्ट्रीयता को संबोधित करने वाला शब्द है और धर्म के लिए सनातन शब्द का उपयोग इसलिए होता है क्योंकि इसकी उत्पत्ति का समय कोई नहीं जानता | जिस वैदिक ज्ञान पर हिन्दुत्व आधारित है उसमें भी हिन्दू शब्द कहीं नहीं है | सनातन धर्मी हिन्दुओं के मन में  मानव रूप में अवतरित हुए  भगवान राम और श्रीकृष्ण  के प्रति अगाध श्रृद्धा है लेकिन उनके किसी भी कथन में हिन्दू शब्द नहीं है | गीता और रामायण  में भी हिन्दू धर्म जैसा कुछ भी पढ़ने नहीं मिलता | ये देखते हुए श्री सिंह द्वारा हिन्दू धर्म जैसी बात कहना उनके अज्ञान न सही किन्तु अल्पज्ञान को अवश्य दर्शाता है | लेकिन ये कहना कि इस्लाम के आने के पहले भी  दूसरे धर्म के मंदिर तोड़े जाते थे ,  उस राजनीतिक सोच का ताजा प्रमाण है जो हताशा और कुंठा से उपजी है | कुछ लोगों का ये मानना है कि दिग्विजय सिंह को चूँकि साध्वी उमा भारती के हाथों पराजित होने से म.प्र की सत्ता गंवानी पड़ी  इसलिए वे हिन्दू और हिंदुत्व को लेकर आलोचनात्मक  टिप्पणियाँ करने लगे | रही – सही कसर पूरी कर दी 2019 के लोकसभा चुनाव ने जब भोपाल सीट पर वे एक और साध्वी प्रज्ञा से बुरी तरह हारे | हालाँकि हिन्दू , हिन्दुत्व और आतंकवाद के बारे में उनकी बातों से कांग्रेस भी पल्ला झाड़ती रही है | वैसे 2003 में म.प्र की सत्ता छिन  जाने के बाद श्री सिंह के अनुज लक्ष्मण सिंह  सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा करते हुए भाजपा में घुस आये थे और राजगढ़ से लोकसभा चुनाव भी जीते | बाद में फिर कांग्रेस में आकर वर्तमान में विधायक बने हुए हैं | लेकिन श्री सिंह ने कभी भी  छोटे भाई की  भाजपा में जाने पर आलोचना नहीं की जिससे लगता है हिन्दू और  हिन्दुत्व को लेकर की जाने वाली उनकी बयानबाजी चर्चाओं में बने रहने का प्रयास मात्र है  और ऐसा करते हुए वे अप्रत्यक्ष तौर पर रास्वसंघ तथा भाजपा की मदद ही करते हैं | इस्लाम के आगमन के पहले भी भारत में दूसरे धर्मों के मंदिर तोड़े जाने की बात कहने के पीछे उनका उद्देश्य अतीत में हिन्दुओं के धर्मस्थानों को खंडित करने के आरोप से मुग़ल शासकों  को बरी करना भले रहा हो लेकिन सलमान खुर्शीद की पुस्तक के विमोचन के अवसर पर अनावश्यक और  अप्रासंगिक बात कहकर उन्होंने एक बार फिर ये सिद्ध कर   दिया है कि उम्र का असर कुछ लोगों के शरीर के साथ ही दिमाग पर भी हो जाता है | हालांकि ये भी कह सकते हैं कि श्री सिंह ने सलमान खुर्शीद को खुश करने की कोशिश की हो जिन्होंने अपनी  संदर्भित पुस्तक में इस बात पर अफ़सोस जताया है कि कांग्रेस में एक तबका पार्टी की अल्पसंख्यक समर्थक छवि बन जाने से चिंतित होकर नेतृत्व की जनेउधारी ( राहुल गांधी ) पहिचान की वकालत करता है | दिग्विजय सिंह के ताजा विवादित बयान से न सिर्फ उनमें अपितु कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर आ रही विचारशून्यता उजागर हो रही है | ऐसे समय जब उ.प्र जैसे राज्य में जहाँ राम जन्मभूमि के बाद मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के अलावा वाराणसी  के विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा गरमाया हुआ हो तब श्री सिंह द्वारा इस्लाम के आने के पहले भी मंदिरों को ध्वस्त किये जैसा बयान देकर पार्टी के लिये मुसीबतें खडी करना उनके भाजपा के मददगार होने की बात को बल प्रदान करता है |

-रवीन्द्र वाजपेयी