Saturday, 27 November 2021

तो क्या 15 अगस्त और 26 जनवरी का भी बहिष्कार होगा



संविधान किसी एक राजनीतिक दल या व्यक्ति का न होकर  देश के हर व्यक्ति के लिए बना वह पवित्र दस्तावेज है जिसके अनुसार शासन और प्रशासन चला करता है | उस दृष्टि से संविधान दिवस की भी वही महत्ता है जो स्वाधीनता और गणतंत्र दिवस की है | इसीलिये जिस तरह 15 अगस्त और 26 जनवरी के आयोजनों में सभी राजनीतिक दल तमाम मतभेद भूलकर शामिल होते हैं उसी तरह 26 नवम्बर को संविधान दिवस का जश्न भी राष्ट्रीय पर्व से कम नहीं होना चाहिए | लेकिन गत दिवस संसद के केन्द्रीय कक्ष में आयोजित संविधान दिवस के जलसे का  कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने जिस तरह बहिष्कार किया उसका  राजनीतिक तौर पर भले ही औचित्य साबित किया जाए लेकिन राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने पर वह बेहद गैर जिम्मेदाराना कदम था | कांग्रेस प्रवक्ता ने इस पर अपनी सफाई में कहा कि चूँकि भाजपा सरकार संवैधानिक व्यवस्थाओं और संसदीय गरिमा को नष्ट कर रही है इसलिए विपक्ष ने उक्त कार्यक्रम का बहिष्कार किया | पार्टी प्रवक्ता आनंद शर्मा ने ये आरोप भी लगाया कि सरकारी आयोजनों में विपक्ष को पर्याप्त सम्मान और महत्व नहीं मिलता | विपक्ष की गैर मौजूदगी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खाली मैदान दे दिया  जिसका लाभ उठाते हुए उन्होंने वंशवादी राजनीति पर कड़े प्रहार करते हुए उसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया | स्मरणीय है कि जो आनंद शर्मा सरकार पर संवैधानिक गरिमा को नष्ट करने का आरोप लगाने सामने आये वे कांग्रेस नेताओं के उस जी – 23 समूह के प्रमुख सदस्य हैं जो कांग्रेस में गांधी परिवार द्वारा पार्टी संविधान की अवहेलना करते हुए संगठन के चुनाव को टालते रहने का आरोप लगाया करता है | व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण से  देखें और सोचें तो संसद के केन्द्रीय कक्ष में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की मौजूदगी में आयोजित संविधान दिवस का आयोजन दलगत   राजनीति से परे  होना चाहिए था | कांग्रेस तो वह पार्टी है जिसका संविधान सभा में वर्चस्व था | डा. राजेन्द्र प्रसाद जैसे ऋषि तुल्य और परम विद्वान राजनेता उसके अध्यक्ष थे और संविधान का प्रारूप भीमराव आम्बेडकर जैसे प्रख्यात विधिवेत्ता द्वारा तैयार किया गया | इन दोनों महान हस्तियों का प्रधानमंत्री ने अपने उद्बोधन में सम्मानपूर्वक उल्लेख किया | निश्चित तौर पर ऐसे अवसरों पर देश की एकता  का प्रगटीकरण होता है | लेकिन दुर्भाग्यवश अब राष्ट्रीय दिवस भी राजनीतिक वैमनस्यता और रागद्वेष के शिकार होने लगे हैं | कांग्रेस द्वारा सरकार पर संवैधानिक व्यवस्थाओं को ध्वस्त करने का आरोप लगाते हुए संविधान दिवस का तो बहिष्कार कर दिया गया और उसकी देखीसीखी अन्य  विपक्षी दल भी उस जलसे से दूर रहे लेकिन  सरकार के साथ अपने मतभेदों के चलते क्या कांग्रेस और शेष विपक्ष भविष्य में स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र की वर्षगाँठ पर आयोजित कार्यक्रमोंका भी बहिष्कार करेगा ? ये बात बिलकुल सही है कि इस तरह की सोच के पीछे कांग्रेस साहित उन विपक्षी पार्टियों  पर हावी सामन्तवादी मानसिकता  ही है जिसके प्रभावस्वरूप वे सत्ता पर अपना एकाधिकार समझते हैं और उससे बाहर आते ही उनको संविधान और लोकतंत्र खतरे में नजर आने लगता है |  यदि कल के आयोजन में विपक्ष भी मौजूद रहता तब शायद श्री मोदी के भाषण की विषयवस्तु भी अलग होती | लेकिन उन्होंने बिना किसी दल का नाम लिए वंशवादी राजनीति पर जो प्रहार किया वह लोकतंत्र के  व्यापक हितों के मद्देनजर विचारणीय है | निश्चित रूप से कांग्रेस इसके लिए प्राथमिक तौर पर दोषी मानी जायेगी जिसने आजादी के बाद से ही एक परिवार के खूंटे से खुद को बांधे रखा | बीच – बीच में उसे इससे आजाद होने का अवसर मिला भी किन्तु घूम - फिरकर वह उसी परिवार की निजी जागीर बनकर रह गयी | इससे प्रोत्साहित होकर अन्य पार्टियों ने भी  परिवारवाद को अपनाया और देखते – देखते अनेक क्षेत्रीय दल पारिवारिक उत्तराधिकार की परम्परा अपनाते हुए मैदान में आ गये | कांग्रेस को ये बात समझनी  चाहिए कि उससे प्रेरित होकर वंशवाद अपनाने वाले इन क्षेत्रीय दलों ने सबसे ज्यादा उसे ही नुकसान पहुँचाया | आज स्थिति ये आ गयी कि देश की  सबसे पुरानी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस को लालू यादव और ठाकरे परिवार की  शिवसेना में बतौर कनिष्ट भागीदार गठबंधन करना पड़ा | 2017 में उ.प्र विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच गठबंधन हुआ था जिसे राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलने वाला बताया गया | लेकिन चुनाव परिणाम ने दोनों को फिर दूर कर दिया और आज हालत ये है कि उ.प्र में सपा - बसपा तो दूर छोटी – छोटी पार्टियाँ तक कांग्रेस के करीब आने में कतरा रही हैं | हाल ही में बिहार में हुए उपचुनावों के दौरान लालू के बेटों ने भी कांग्रेस को खूब अपमानित किया | इस सबका कारण  पार्टी की वैचारिक पहिचान पर पारिवारिक मिल्कियत का ठप्पा लग जाना है | ये बात बिलकुल सही है कि परिवार के शिकंजे में फंसा राजनीतिक दल आंतरिक लोकतंत्र सहन नहीं कर सकता | कांग्रेस तो इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ही लेकिन राजद , सपा , बसपा , शिवसेना , टीआरएस , द्रमुक , अकाली , रालोद  , इनेलो , नेशनल कांफ्रेंस , पीडीपी और ऐसे ही अन्य छोटे दल एक परिवार की निजी संपत्ति बनकर रह गये हैं | इसीलिये इनके लिए लोकतंत्र तभी तक सुरक्षित और सार्थक है जब तक सत्ता इनके हाथ में है वरना उस पर खतरा मंडराने का ढोल पीटा जाने लगता है | ममता बैनर्जी ने भी राजनीतिक तौर पर ताकतवर होते ही तृणमूल कांग्रेस में अपने भतीजे अभिषेक को उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित कर दिया | यही स्थिति बसपा में मायावती के भतीजे आनंद कुमार की है | हालाँकि श्री मोदी की अपनी पार्टी भाजपा में भी परिवारवाद की विषबेल फैलने लगी है लेकिन पार्टी के वैचारिक अभिभावक के रूप में रास्वसंघ के कारण शीर्ष नेतृत्व पर परिवारवाद के लिए जगह नहीं है | वामपंथी दल जरूर इस बुराई से मुक्त हैं और अभी तक आम आदमी पार्टी भी किन्तु वह एक व्यक्ति के करिश्मे की बंधक बनकर रह गई है जिनको चुनौती देने वाले को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है | ऐसे में संविधान दिवस पर श्री मोदी द्वारा वंशवाद में जकड़ी राजनीतिक पार्टियों पर किया गया कटाक्ष गलत नहीं था | आज देश जिस माहौल से गुजर रहा है वह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है | देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी दलीय हितों को महत्व दिया जाना खतरनाक संकेत है | सीमा पर मंडराते संकट के बीच विपक्ष का प्रमुख नेता शत्रु देश के दूतावास में किसलिए गया ये प्रश्न आज तक अनुत्तरित है | एक और नेता दूसरे दुश्मन देश के प्रधानमंत्री से याराना निभाने में फक्र महसूस कर रहा है | राष्ट्रहित के मूद्दों पर  राजनीतिक सहमति बननी ही चाहिए लेकिन जब विपक्ष संविधान दिवस पर संसद में आयोजित समारोह का बहिष्कार करने जैसा आचरण करने लगे तब उससे और क्या अपेक्षा की जा सकती है | संसद के भीतर सत्ता और विपक्ष के बीच टकराहट कोई नई बात नहीं है | पं. नेहरु के जमाने से ऐसा होता आ रहा है | लेकिन राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े किसी भी विषय पर राजनीतिक मतभेदों को ताक पर रखने की स्वर्णिम परम्परा भी  रही है | उसका स्मरण करने पर गत दिवस विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस द्वारा संविधान दिवस समारोह  का बहिष्कार लोकतंत्र और स्वस्थ राजनीति के  लिए अच्छा संकेत नहीं है | विपक्ष उस समारोह  में शामिल होने का बाद अपना पृथक आयोजन रखकर सरकार की घोर आलोचना कर सकता था किन्तु राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार करने जैसी गलती पुनः दोहराई गई | ये देखते हुए तो ऐसा लगता है भविष्य में सरकार से नाराज विपक्ष कहीं संसद में जाने से ही परहेज न करने लगे | लोकतंत्र वैचारिक मतभेदों के बावजूद  सौजन्यता , सामंजस्य और समन्वय के मौलिक सिद्धांतों पर आधारित होता है | इसके लिए सत्ता और विपक्ष दोनों को दायित्वबोध का परिचय देना होता है | सत्ता पक्ष को जहां बड़ा दिल दिखाना चाहिए वहीं विपक्ष को भी जनादेश का सम्मान करने की आदत डालनी होगी  क्योंकि जनता किसी एक दल ,  नेता या परिवार  के मोहपाश से मुक्त होकर निर्णय लेना सीख चुकी है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 26 November 2021

एक साल बाद भी किसान जहां का तहां :आन्दोलन भी राष्ट्रव्यापी नहीं बन सका



दिल्ली की देहलीज पर संयुक्त किसान मोर्चे के धरने को आज एक वर्ष बीत गया | इससे क्या हासिल हुआ इस प्रश्न के जवाब में केवल ये  कहा जा सकता है कि प्रधानमन्त्री  ने उन तीन कृषि कानूनों को वापिस लेने की घोषणा कर दी जिन्हें लागू किये जाने पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पहले ही रोक लगा दी गई थी | दर्जन भर वार्ताओं का दौर चलने के बाद भी समझौते  की गुंजाईश नहीं बनी जिसकी वजह किसान नेताओं और सरकार का  अपनी – अपनी बात पर अड़े रहना था | संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं की जिद रही कि पहले तीनों कानून वापिस लिए जावें तब ही बात आगे बढ़ेगी किन्तु सरकार कहती रही  कि जिन बिन्दुओं पर सहमति बन सकती है उन पर बात करते हुए वार्ता जारी रखी जावे | आख़िरी बातचीत तकरीबन 10 महीने पहले हुई थी | उसके बाद किसान नेताओं को महसूस हुआ  कि दिल्ली की सीमाओं पर  बैठे रहने से कुछ हासिल नहीं होने वाला तब वे देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों को आन्दोलन के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करने निकल पड़े | लेकिन उनको अपेक्षित सफलता नहीं मिली | यही वजह रही कि जबरदस्त प्रचार और समूचे विपक्ष के समर्थन के बाद  भी आन्दोलन पंजाब  , हरियाणा और प. उ.प्र के अलावा राजस्थान के छोटे से हिस्से तक सिमटकर रह गया |  इस वजह से उस पर सिखों और जाटों का आन्दोलन होने का ठप्पा लग गया | पंजाब में गुरुद्वारों का सहयोग और बाकी जगह जाटों की पंचायतें किसान आन्दोलन की पहिचान बन गईं | और यहीं से आन्दोलन पर क्षेत्रीयता हावी होने लगी | जहां तक विपक्षी दलों का सवाल है तो वे केवल बहती गंगा में हाथ धोने के लिए धरना स्थल पर अपना समर्थन व्यक्त करने की औपचारिकता निभाते रहे | यद्यपि ये बात भी पूरी तरह सच है कि संयुक्त किसान मोर्चे ने राजनेताओं को मंच नहीं दिया लेकिन केंद्र सरकार का विरोध करते – करते वे आख़िरकार भाजपा विरोधी मोर्चा खोल बैठे | बीते एक वर्ष में आन्दोलन से जुड़ी ऐसी अनेक घटनाएँ हुईं जिनके कारण उसकी गम्भीरता और प्रभाव कम हुआ | जिनमें सबसे बड़ा वाकया बीती 26 जनवरी का था जब गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर रैली अनियंत्रित होकर हिंसा पर उतारू हो गई | लालाकिले पर चढ़कर तलवार लहराने और राष्ट्रध्वज के अपमान के दुस्साहस ने किसान आन्दोलन के चेहरे को दागदार कर दिया | इसी तरह लम्बे समय से दिल्ली जाने वाले रास्ते को घेरकर बैठे रहने से आवाजाही करने वालों के साथ ही क्षेत्रीय व्यापारियों  को जो परेशानी हुई उसके कारण भी आन्दोलन जनता की सहानुभूति अर्जित नहीं कर सका , जबकि हमारे देश में किसानों के प्रति फ़ौजी जवानों जैसे  ही सम्मान का भाव है | हाल ही में प्रधानमन्त्री ने कृषि  कानून वापिस लेने का ऐलान किया उसके बाद  भी किसान आन्दोलन के अधिकतर नेताओं की जो प्रतिक्रिया आई उसमें भी बजाय सौजन्यता के अकड़ दिखाई दी  | इसका संकेत धरना जारी रखने और संसद तक ट्रैक्टर ले जाने जैसी घोषणाओं से मिला | संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि बिजली और  पराली के मुद्दों के अलावा  न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी बनाये बिना आन्दोलन समाप्त नहीं होगा | राकेश टिकैत सरकार से  वार्ता शुरू करने के लिए भी कह रहे हैं | लेकिन इस बात का कोई आश्वासन नहीं दिया जा रहा कि वार्ता में इकतरफा जिद कायम रहेगी या एक – एक सीढ़ी चढ़ते हुए समाधान तक पहुँचने का तरीका अपनाया जावेगा | ये देखते हुए कहा जा सकता है कि किसान नेताओं का अपना अहं किसानों की समस्याओं के हल में बाधक बन रहा है | पहले वे कृषि कानून रद्द किये जाने का हठ करते रहे और अब न्यूनतम समर्थन मूल्य की जिद है,  जिसकी अव्यवहारिकता से वे भी  अपरिचित नहीं हैं | लेकिन आन्दोलन का नेतृत्व करने वालों को ये सोचना चाहिए कि एक साल के भीतर भी वे इस आन्दोलन को राष्ट्रीय स्वरूप क्यों नहीं दे सके ? उनके रवैये को देखते हुए  कहना गलत न होगा कि वे आगे भी सीमित दायरे में ही बने रहेंगे | आन्दोलन के भीतर  पंजाब और उ.प्र के विधानसभा चुनावों को लेकर जो अंतर्विरोध है वह उसमें बिखराव का कारण बन सकता है | इन दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम यदि किसान नेताओं के मनमाफिक न निकले तब आन्दोलन की दशा और दिशा क्या होगी ये कोई  नहीं बता सकता | सही  बात तो ये है कि आन्दोलन को इतना लम्बा खींचने के कारण उसकी गंभीरता नष्ट हो चुकी है | प्रधानमन्त्री द्वारा कृषि कानून वापिस लिए जाने के कदम को भले ही किसानों की जीत के तौर पर प्रचारित किया जा रहा हो लेकिन ये केवल आभासी ही कही जायेगी क्योंकि वे लागू ही नहीं हो सके थे | और जैसी सम्भावना बन रही थी केंद्र सरकार भी उनको ठन्डे बस्ते में डालकर रखने के मूड में थी | एक वर्ष बाद भी किसान आन्दोलन जहां का तहां खड़ा है तो उसके लिए वे नेता कसूरवार हैं जो किसानों के कन्धों पर चढ़कर अपनी नेतागिरी चमकाने  में लग गए | पिछले अनुभवों  से उन्होंने कुछ सीखा हो तो वे आन्दोलन को दिल्ली के दरवाजे से उठाकर पूरे देश में फैलाने की योजना बनाएं | लेकिन इसके लिए उनको राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होना पड़ेगा | किसान नेताओं को ये नहीं भूलना चाहिये कि  वामपंथी दलों के नियंत्रण वाली कर्मचारी यूनियनों के सदस्य अपना वेतन बढ़वाने तो लाल झंडे के नीचे एकत्र हो जाते हैं परन्तु  चुनाव में वे साम्यवादी पार्टियों के उम्मीदवारों की बजाय अन्य पार्टियों के पक्ष में मतदान करते हैं | यही वजह है कि वामपंथी पार्टियों का जनाधार लगातार छोटा होता जा रहा है | कहने का आशय ये है कि पंजाब के सभी सिख और प.उ.प्र के जाट किसान क्या आन्दोलन के नेताओं के कहने से किसी का समर्थन अथवा विरोध करेंगे ? और जब दो किसान नेता पंजाब में अपनी पार्टी बनाकर चुनाव में उतरने वाले हैं तब क्या होगा ये आसानी से समझा जा सकता है | उचित तो यही होगा कि बजाय विजयोल्लास मनाने के किसान नेता आत्ममंथन करते हुए उन कमियों को दूर करने का उपाय तलाशें जिनकी वजह से अब तक वे पूरे देश के किसानों का मन नहीं जीत सके |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 25 November 2021

सिद्धू कांग्रेस के लिए जी का जंजाल साबित हो रहे



 आगामी वर्ष फरवरी में जिन पांच राज्यों में  विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं उनमें पंजाब भी है | 2017 में वहां कांग्रेस को अच्छा खासा बहुमत मिला था | सरकार भी ठीक - ठाक चली  लेकिन अचानक नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टेन अमरिंदर सिंह का निजी झगड़ा इतना बढ़ गया कि मुख्यमंत्री बदलने की नौबत आ गयी | नवजोत ने जो बिसात बिछाई थी उसका मकसद खुद मुख्यमंत्री  बनना था किन्तु दो की लड़ाई में तीसरे के फायदे वाली कहावत चरितार्थ हो गयी और चरणजीत सिंह चन्नी को अमरिंदर की जगह बिठा दिया गया | शुरुवाती दौर में तो वे नवजोत के विश्वासपात्र लगे लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही उन्होंने श्री सिद्धू के शिकंजे  से खुद को आजाद कर लिया | उनके इस कदम को कांग्रेस आलाकमान का समर्थन भी प्राप्त हुआ  जो चाहकर भी नवजोत की हरकतों को नियन्त्रित करने में असफल साबित हुआ है | प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बैठे नवजोत आये  दिन उनको जिस तरह से बौना बताकर अपमानित करने में जुटे हैं उसकी वजह से पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने का साहस नहीं कर पा रहा |  ये कहने में कुछ भी गलत न होगा कि श्री चन्नी की जितनी आलोचना पूरा विपक्ष मिलकर करता है उससे  कहीं ज्यादा सार्वजनिक रूप से श्री सिद्धू कर देते हैं | बतौर प्रदेश अध्यक्ष उनको अपनी बातें मुख्यमंत्री से निजी तौर पर कहना चाहिए | लेकिन वे अपनी सभाओं में मुख्यमंत्री से नई – नई मांगें करने के अलावा उनके अनेक फैसलों की तीखी  आलोचना कर कांग्रेस के लिए शोचनीय स्थित उत्पन्न कर रहे हैं | हालाँकि  ये हरकत विपक्ष को भी रास आ रही हैं क्योंकि वे उनका काम आसान जो कर  रहे हैं | आम आदमी पार्टी का प्रचार करने पंजाब आये  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविदं केजरीवाल ने तो श्री सिद्धू को साहसिक बताते हुए उनकी प्रशंसा तक कर डाली | यदि पार्टी हाईकमान नवजोत की हरकतों पर समय रहते लगाम लगा लेता तब शायद पंजाब में कांग्रेस के सामने इस तरह के हालात उत्पन्न न होते जिसमें  घर को आग लग गई घर के चिराग से वाली कहावत चरितार्थ हो  रही है | नवजोत की वाकपटुता बेशक उनको लोकप्रिय बनाती रही है | सार्वजनिक मंचों से वे श्रोताओं को आकर्षित भी करते हैं | लेकिन अपने अस्थिर  और मेरी मुर्गे की डेढ़ टांग वाले स्वभाव के कारण आलोचना  और मजाक का पात्र भी बनते रहे हैं | क्रिकेट में नाम कमाने के बाद वे तब चर्चा में आये जब  हत्या के एक मामले  में आरोपी बने | उनका सार्वजनिक जीवन अमृतसर से भाजपा   सांसद के रूप में शुरू हुआ किन्तु 2014 में टिकिट नहीं  मिलने के बाद राज्यसभा में मनोनयन के बावजूद वे  भाजपा छोड़ कांग्रेस की गोद में आ बैठे और उसके बाद जिस गांधी परिवार के विरुद्ध बेहद तीखी टिप्पणियाँ किया करते थे उसी का अभिनंदन पत्र पढ़ने  लगे | हालाँकि भाजपा  से उनकी निकासी के पीछे अकाली दल का सर्वेसर्वा बादल परिवार रहा , परन्तु   अमरिंदर मंत्रीमंडल के सदस्य बनने के बाद उनकी कैप्टेन से भी नहीं पटी जिसका परिणाम पंजाब में हुआ सत्ता परिवर्तन है | हाल ही में नवजोत एक बार फिर आलोचना के घेरे में आ गये जब गुरुनानक जयन्ती पर भारतीय सीमा से कुछ  दूर पाकिस्तान स्थित ननकाना साहेब गुरूद्वारे की यात्रा के दौरान उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान को बड़ा भाई बताते हुए उनके प्रति प्रेम व्यक्त किया | उनकी इस टिप्पणी पर कांग्रेस के भीतर ही बवाल मच गया | सांसद मनीष तिवारी सहित अनेक नेताओं ने इसे देशहित के विरुद्ध बताते हुए उनकी कड़ी आलोचना की | स्मरणीय है इमरान के शपथ ग्रहण में बतौर अतिथि गये नवजोत के   सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा से गले मिलने पर भी  उनकी जबरदस्त  निंदा हुई थी | पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका संगठन और सत्ता में समन्वय स्थापित करने की होनी चाहिए किन्तु वे खुद मुख्यमंत्री के विरुद्ध खुले आम मोर्चा खोलकर अपनी ही सरकार के लिए मुसीबत पैदा करने में लगे हैं | न जाने क्यों गांधी परिवार उनकी हरकतों को सहन कर रहा है | पंजाब में अमरिंदर सिंह के नई पार्टी बनाने का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही होगा | लेकिन नवजोत के मोह में उसने अपने अनुभवी और जनाधार वाले नेता को पार्टी छोड़ने मजबूर कर दिया | ऐसा कहा जाता है कि नवजोत को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के पीछे उनका बचकाना आचरण ही रहा | इस वजह से वे और आहत हो उठे और प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के साथ ही मनमाफिक नियुक्तियों के लिए अड़ गये | बावजूद इसके पार्टी उनके नखरे सहन करती आ रही है तो उसके पीछे कोई न कोई रहस्य तो है | पंजाब में इस बार चतुष्कोणीय मुकाबला होगा | कांग्रेस को आम आदमी पार्टी और  अकाली – बसपा के अलावा अमरिंदर – भाजपा गठबंधन से टकराना होगा | नए मुख्यमंत्री श्री चन्नी की जनता के बीच अमरिंदर जैसी पकड़  नहीं है और  बची – खुची फजीहत श्री सिद्धू किये दे रहे हैं | ऐसे में पंजाब जहाँ कांग्रेस  ने पिछले चुनाव में रिकॉर्ड सफलता  हासिल की थी इस बार अपने घर की कलह से ही परेशान है | नवजोत सिद्धू नादाँ की दोस्ती जी का जंजाल साबित होते लग रहे हैं | उनकी गैर जिम्मेदाराना हरकतों से किसान  आन्दोलन खड़ा करने के बावजूद कांग्रेस मुकाबले से पहले ही बाहर हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा | नवजोत को न जाने ये बात कब समझ में आयेगी कि राजनीति और कामेडी शो में अंतर होता है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 24 November 2021

राजनेता ही एक दूसरे को कचरा कहने लगे तो और प्रमाणपत्र की क्या जरूरत



हालांकि इसे अंगूर खट्टे हैं वाली कहावत से भी जोड़कर देखा जा सकता है लेकिन आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविन्द केजरीवाल की ये टिप्पणी वर्तमान भारतीय राजनीति पर बहुत बड़ा कटाक्ष है कि कांग्रेस के 2 सांसद और 25 विधायक तो उनकी पार्टी में आने को तैयार हैं किन्तु हम उनका कचरा नहीं लेना चाहते। दरअसल पंजाब में आम आदमी पार्टी के दो विधायक हाल ही में कांग्रेस में चले गए। पत्रकारों द्वारा इस बारे में पूछे जाने पर श्री केजरीवाल ने टिकिट नहीं मिलने पर नेताओं के दलबदल करने को गंदी राजनीति बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी इसे पसंद नहीं करती। हालाँकि आम आदमी पार्टी में दूसरी पार्टियों से आये लोगों को भी जगह दी गई है। 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में नवजोत सिंह सिद्धू जब राजनीतिक पुनर्वास के लिए भटक रहे थे तब उनके आम आदमी पार्टी में जाने की बात भी चली किन्तु मुख्यमंत्री का चेहरा न बनाये जाने के कारण अंतत: वे कांग्रेस की गोद में जा बैठे। लेकिन श्री केजरीवाल का तंज केवल पंजाब तक सीमित न होकर राष्ट्रीय राजनीतिक में व्याप्त सिद्धांत विहीनता पर साधा गया निशाना है। संयोगवश इसी के साथ ही ये खबर भी आ गई कि भाजपा से कांग्रेस में गये कीर्ति आजाद, हरियाणा के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर और जनता दल (यू) के पूर्व महासचिव पवन वर्मा ने ममता बैनर्जी की शान में कसीदे पढ़ते हुए तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ले ली। उल्लेखनीय है सुश्री बनर्जी इन दिनों अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने के लिए दूसरे दलों के नेताओं को धड़ाधड़ अपनी पार्टी में खींच रही हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पुत्र अभिजीत भी कांग्रेस छोड़ तृणमूल में जा चुके हैं। कांग्रेस के अन्य नेता भी इन दिनों ममता के साथ जाते देखे जा रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि प. बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव के पहले जब तृणमूल के विधायक और नेता भाजपा में घुसकर टिकिट प्राप्त कर रहे थे तब सुश्री बैनर्जी उनको कचरा बताकर अपनी पार्टी के साफ़ होने की बात कह रही थीं किन्तु चुनाव के बाद वे उसी कचरे को दोबारा अपने घर में लाने बेताब हैं। भाजपा टिकिट पर चुनाव जीते और हारे अनेक ऐसे पुराने तृणमूल नेता घर वापिसी में लगे हैं जिनको ममता और उनके करीबी कचरा कहकर अपमानित किया करते थे। भाजपा के दिग्गज नेता यशवंत सिन्हा भी तृणमूल में जा चुके हैं। हाल ही में गोवा के एक बड़े कांग्रेसी नेता ममता की पार्टी में आ गये। लेकिन सवाल ये है कि कीर्ति आजाद जैसे लोगों को अपनी पार्टी में शामिल करने का लाभ या औचित्य क्या है? कांग्रेसी पृष्ठभूमि से होने के बाद वे भाजपाई बनकर सांसद भी बने किन्तु पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से लड़कर बुरी तरह हारे। उनका अपना कोई जनाधार तो है नहीं जो वे तृणमूल को मजबूती देंगे। तकरीबन यही स्थिति यश्वंत सिन्हा की है। लेकिन जो गलती भाजपा ने बंगाल में तृणमूल और कांग्रेस के लोगों को बिना सोचे समझे खींचकर की थी वही ममता भी दोहरा रही हैं। भाजपा तो इन दिनों दूसरी पार्टी के नेताओं को आयात करने में सबसे आगे है। म.प्र और कर्नाटक में उसकी सरकार कांग्रेस से आये दलबदलुओं के बल पर ही बन सकी। उ.प्र में आज भाजपा के तमाम सांसद और विधायक ऐसे हैं जो चाल ,  चरित्र और चेहरे से भाजपाई नहीं होने के बाद भी उसमें घुसे बैठे हैं। हाल ही में विधान परिषद के दो सपा सदस्यों ने भाजपा की सदस्यता ले ली। ये देखते हुए इस बात का अंदाजा लगाना कठिन हो गया है कि कौन किस पार्टी में कब तक रहेगा? दरअसल सिद्धांत और आदर्श की बजाय पद और व्यक्तिगत अहं की संतुष्टि ही राजनीतिक निष्ठा का पर्याय बन गई है। नवजोत सिंह सिद्धू राजनीतिक कचरे के सबसे बड़े उदाहरण हैं। बीते पांच साल से वे कांग्रेस में हैं जरूर लेकिन उनकी गैर जिम्मेदाराना हरकतों के कारण पार्टी परेशान है। अमरिंदर सिंह को हटवाने के बाद जो नये मुख्यमंत्री बने उनके खिलाफ भी वे जिस तरह की बयानबाजी करते हैं वह देखकर कांग्रेस आलाकमान की लाचारी पर तरस आता है। भाजपा में रहते हुए नवजोत ने गांधी परिवार और डा. मनमोहन सिंह का जितना उपहास किया वह किसी से छिपा नहीं है। प. बंगाल में मुकुल रॉय ममता के दाहिने हाथ माने जाते थे किन्तु नाराज होकर भाजपा में आकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद बन गये। प. बंगाल में भाजपा की जड़ें ज़माने में उनका योगदान सबसे ज्यादा था किन्तु विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता न मिलने पर वे फिर तृणमूल में लौट आये। ऐसे उदाहरण भारतीय राजनीति में आजकल ढेरों मिल जाएंगे। प. बंगाल में जिन लोगों ने तृणमूल छोड़ भाजपा की टिकिट हासिल की थी उनको ममता और उनके सहयोगी मीर जाफर कहकर अपमानित करने से बाज नहीं आते थे परन्तु अब उन्हीं को वापिस लेने में उन्हें न संकोच है और न ही शर्म। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आज की राजनीति पूरी तरह व्यापार हो गई है जिसमें नीति और सिद्धांतों पर निजी स्वार्थ और महत्वाकांक्षाएं हावी हो गई हैं। ममता हों या भाजपा, ये सब सत्ता हासिल करने के लिए ही राजनीति कर रहे हैं। भाजपा के अनेक नेता ये कहते सुने भी गए हैं कि चूंकि सत्ता में रहते हुए ही अपनी नीतियों को लागू किया जा सकता है इसलिए जैसे भी हो उसे प्राप्त करना होगा। वैसे बात गलत भी नहीं क्योंकि अब किसी नेता की पहिचान और राजनीतिक ताकत चुनाव जिताकर पार्टी को सत्ता में लाने पर निर्भर है। ममता ने तीसरी बार जीत हासिल कर ली तो वे बड़ी नेता मानी जाने लगीं। लेकिन कभी प्रधानमंत्री बनने की सोचने वाले लालू यादव आज चर्चाओं से बाहर होते जा रहे हैं। भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी एक समय सबसे ताकतवर और सम्माननीय हुआ करते थे लेकिन उनके नेतृत्व में 2009 का लोकसभा चुनाव हारते ही उनका रुतबा घटने लगा। हालांकि दलबदल कोई नई चीज नहीं है और न ही इसे अपराध कहा जा सकता है। परन्तु नीतिगत मतभेद के कारण पार्टी बदलना तो समझ में आता है किन्तु सिर्फ निजी स्वार्थ पूरे न होने पर पाला बदल लेना अवसरवाद नहीं तो और क्या है? श्री केजरीवाल ने जो साफगोई दिखाई वह उनके दो विधायकों के कांग्रेस में घुस जाने से उपजी खीज कही जा सकती है लेकिन दूसरी पार्टी से आने वालों को कचरा कहने का उनका अंदाज उन लोगों के लिए संकेत है जो पार्टी बदलने में तनिक भी संकोच नहीं करते। म.प्र में भी जब दो दर्जन कांग्रेस विधायक भाजपा में गये तब उनका भी कचरा कहकर उपहास किया गया था। आयाराम-गयाराम, दलबदलू, गद्दार और मीर जाफर के बाद अब पार्टी बदलने वालों को कचरा कहा जाने लगा है। लेकिन अभी तक तो पार्टी से जाने वाले ही कचरा कहलाते थे परन्तु श्री केजरीवाल ने आने वालों को भी कचरा कहकर दलबदल करने वालों के लिए एक नये विशेषण का प्रयोग किया है। लोकतंत्र को मजाक बनने से रोकना है तो इस कचरे को साफ़ करने के लिए भी राजनीतिक स्वच्छता मिशन जैसा कोई प्रयास होना चाहिए क्योंकि जब राजनेता ही एक दूसरे को कचरा कहने लगे तो किसी और के प्रमाणपत्र की जरूरत ही क्या है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 November 2021

आ गये चुनाव बनने लगे दबाव : पुरानी व्यवस्था की वापसी जरूरी



प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीनों कृषि कानून वापिस लेने के बाद भी संयुक्त किसान मोर्चा आन्दोलन  वापिस लेने राजी नहीं है | प्रारम्भिक संकेतों के अनुसार इस बात की सम्भावना थी कि संसद में कानून रद्द करने संबंधी प्रस्ताव पारित होते ही आन्दोलन स्थगित कर  दिया जावेगा किन्तु गत दिवस लखनऊ में आयोजित किसान महापंचायत के बाद ये साफ़ हो गया कि किसान संगठन इस अवसर को पूरी तरह से भुनाना चाहते हैं और इसीलिए उनकी तरफ से प्रधानमन्त्री को पत्र  भेजकर दो टूक कह दिया गया कि शेष मांगों को भी मंजूर किया जावे | 26 नवम्बर को धरने की वर्षगांठ पर भी किसान संगठन बड़ा जमावड़ा करने जा रहे हैं | कुल मिलाकर अब दबाव की रणनीति पर काम हो रहा है | किसानों की देखा - सीखी गत दिवस साधु – संतों को भी जोश आ गया और उन्होंने  दिल्ली में एक बैठक करने के बाद सरकार को धमकी दे डाली कि मंदिरों और मठों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त नहीं किये जाने पर वे भी आन्दोलन करने बाध्य होंगे और शस्त्र उठाने तक में संकोच नहीं करेंगे | एक साधु ने तो यहाँ तक कह डाला कि जब मुट्ठी  भर किसान सरकार को झुका सकते हैं तब देश भर के संत क्यों नहीं ? संतों का कहना है कि अगले  चुनाव से पहले ही ये आन्दोलन खड़ा हो जाएगा जिसका लक्ष्य नई सरकार बनने के पहले ही मंदिर और मठों को सरकारी नियंत्रण से आजाद करवाना होगा | अभी तक केंद्र सरकार की तरफ से न तो किसानों की मांगों  पर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया आई और न ही संतों की धमकी के बारे में कुछ सुनने मिला | हो सकता है आने वाले दिनों में कुछ और दबाव समूह  इसी तरह की मांगें लेकर सरकार पर हावी होने का प्रयास करने लगें क्योंकि पंजाब , उ.प्र  और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव आगामी फरवरी में होने जा रहे हैं | यद्यपि चुनाव तो मणिपुर  और गोवा में भी होंगे  लेकिन राष्ट्रीय  राजनीति में उनका ज्यादा असर नहीं है |  लेकिन पहले तीन राज्यों में पंजाब को एकबारगी छोड़ भी दें क्योंकि वहां भाजपा अभी तक अकाली दल पर निर्भर रही किन्तु उ.प्र  और उत्तराखंड उसके लिए जीवन - मरण का सवाल बन गये हैं |  इनमें होने वाली  जीत – हार की छाया 2024 के लोकसभा चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगी | 2014 और 2019 के  लोकसभा चुनाव में उक्त दोनों राज्यों ने भाजपा की  झोली वोटों से भर दी थी | 2017 के विधानसभा चुनाव में भी दोनों राज्य भगवा लहर में समाहित हो गये | उ.प्र में तो भाजपा ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया |  कोरोना न आया होता तब भाजपा इस बार भी पुरानी जीत को दोहराने के प्रति  आश्वस्त होती | 2017 का विधानसभा चुनाव तो उसने नोटबंदी के बाद  जीता था | पिछले लोकसभा चुनाव में भी मोदी लहर के कहर में विपक्ष साफ़ हो गया | लेकिन कोरोना और उसके बाद किसान आन्दोलन के कारण भाजपा ऊपरी तौर पर भले ही आत्मविश्वास में नजर आती हो लेकिन मन ही मन वह सहमी या यूँ कहें कि सतर्क है | उसे पता है कि इस चुनाव में यदि उसके खाते में हार आई या बहुमत कम हुआ तो उसका असर भावी मुकाबलों पर पड़ना तय है | यही वजह है कि लगभग एक वर्ष तक कृषि कानून रद्द करने से इंकार करते रहने के बाद अचानक प्रधानमन्त्री ने उनको वापिस लेने की घोषणा कर दी |  इस अप्रत्याशित फैसले के पीछे भाजपा नेता और सरकार कुछ भी कहती फिरे किन्तु मूल रूप से ये आंशिक तौर पर पंजाब और पूरी तरह उ.प्र को ध्यान में रखते हुए लिए गए ।हालाँकि उत्तराखंड के तराई इलाके में भी बड़े सिख किसान  हैं परन्तु  उ.प्र को लेकर भाजपा का शिखर नेतृत्व किसी प्रकार का खतरा मोल लेने से बच रहा है | और फिर यहाँ श्री मोदी का निर्वाचन क्षेत्र भी है | भाजपा की इसी चिंता का लाभ उठाकर पहले किसान संगठन और अब साधु – संत आन्दोलन के नाम पर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने को आगे आ रहे हैं | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि हमारे देश में चुनाव के समय जो मांगोगे  वही मिलेगा वाली उक्ति चरितार्थ होती है | संतों का ये कहना  पूरी तरह सही  है कि मुट्ठी भर किसान यदि श्री मोदी  समान मजबूत प्रधानमंत्री को घुटनाटेक करवा सकते हैं तब लाखों साधु – संत अगर सड़कों पर उतर गए तब सरकार को झुकाना कठिन न होगा |  इन दोनों समूहों की मांगों का समय चुनाव के नजदीक होने से ये बात सामने आई है कि देश में बारहों महीने चुनावी मौसम रहने से प्रदेश और केंद्र सरकार को दबाव समूहों के सामने झुकना पड़ता है जो  विकास और सुधार  कार्यक्रमों के लिए नुकसानदेह है | उदाहरण के तौर पर तीनों कृषि कानूनों के रद्द होने पर शेयर बाजार में ये  सोचकर गिरावट देखी गई कि चुनावी हार के डर से मोदी  सरकार आर्थिक क्षेत्र में कड़े सुधारवादी फैसले लेने से पीछे हटेगी | भाजपा विरोधी जो तमाम स्तंभ लेखक कानून वापिसी को प्रधानमन्त्री की पराजय बताने में आगे – आगे हैं उनमें से भी ज्यादातर इस बात को  स्वीकार कर रहे हैं कि इस फैसले से आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को धक्का पहुंचा है | साधु – संत भी यदि अपनी मांगों के लिए धरना देकर बैठ गए तब उ.प्र में उसका असर होने की चिंता भाजपा को सताने लगेगी | कहने का आशय ये है कि चुनावों का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला  शासन व्यवस्था के लिए बड़ी समस्या बनता जा रहा है। जिसकी वजह से नीति बनाने और उसको लागू करने में सरकारों के सामने वोटों के नुकसान की आशंका आकर खड़ी हो जाती है | इस बारे में प्रधानमन्त्री सहित अनेक मंचों से एक देश , एक चुनाव की वह व्यवस्था पुनः अपनाने की सलाह दी जा चुकी है जो 1952 से 1967 तक जारी रही | तब पांच साल में लोकसभा और  सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ  होते थे | लेकिन बाद में ये व्यवस्था छिन्न – भिन्न होने से चुनावी कैलेंडर गडबडा गया जिसकी वजह से हर समय देश में कहीं न कहीं चुनाव की हलचल बनी रहती है | इसके कारण देश में  नीतिगत अस्थिरता , राजनीतिक ब्लैकमेलिंग , जातिगत वैमनस्य और  चन्दा उद्योग की शक्ल में फलने – फूलने वाला भ्रष्टाचार जन्म लेता है | बीते दो – तीन दशक में   चुनाव सुधार की जो बयार बही उसने बहुत कुछ ठीक किया लेकिन चुनाव में धन की बर्बादी रोकने में सफलता नहीं मिली | आज इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि देश को हर समय चुनावी चक्रव्यूह में फंसे रहने की समस्या से कैसे निकाला जाए | राजनीति से इतर देश में जो कथित सिविल सोसायटी है वह इस मुहिम को आगे बढाए तो कुछ समय बाद ये मुद्दा देशव्यापी बहस का हिस्सा बन सकता है |  इस बारे में चुनाव आयोग भी एक समिति बनाकर निश्चित समय सीमा में उसके  निष्कर्ष देश के सामने रखे और फिर संसद में उस पर विचार होने के उपरांत  लागू किया जावे | कोरोना  संक्रमण के दौरान भी  देश के अनेक हिस्सों में चुनाव करवाना जनहित के विरुद्ध था | लेकिन राजनेताओं को केवल वोट की चिंता रहती है | बेहतर हो समाचार माध्यम इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाएं | अन्यथा कभी न रुकने वाला चुनाव चक्र देश में अस्थिरता और अराजकता को बढ़ावा देने का जरिया बना रहेगा | आज देश जिन समस्याओं से गुजर रहा है उनमें से अधिकांश हर समय चुनाव के कारण हैं | इसे जितनी जल्दी समझ लिया जावे उतना अच्छा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 22 November 2021

न्यूनतम समर्थन मूल्य : सरकार और बाजार के बीच समन्वय मुश्किल



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गत सप्ताह तीनों कृषि कानून वापिस लेने की जो घोषणा की गई थी उसके बाद लगता था कि किसान आन्दोलन समाप्त हो जाएगा। लेकिन संयुक्त किसान मोर्च सोच रहा है कि उ.प्र. और पंजाब के विधानसभा चुनाव को देखते हुए दबाव बनाकर अन्य मांगें भी पूरी करवाई जा सकती हैं। इसका संकेत प्रधानमंत्री को प्रेषित पत्र से मिला जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी शक्ल देने के साथ ही बिजली और पराली संबंधी कानून बदलने के अलावा आन्दोलन के दौरान मारे गये किसानों के परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास की मांग भी है। आज लखनऊ में होने वाली महापंचायत के बाद भावी रूपरेखा भी स्पष्ट हो जायेगी। अनेक किसान नेताओं का कहना है कि संसद में कृषि कानून रद्द होने तक तो आन्दोलन चलेगा ही। वैसे आज शाम तक स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। हालाँकि ये खबर भी है कि मोर्चे में शामिल अनेक नेताओं को राजनीति में भाग्य आजमाने की जल्दी होने से वे भी दिल्ली की सीमा से हटने के पक्षधर हैं। गुरनाम चढूनी और लश्कर सिंह ने तो बाकायदा पंजाब चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान भी कर दिया है। वहीं राकेश टिकैत ने उ.प्र में भाजपा को घेरने की बात कहकर अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी है। अतीत में भी वे दो मर्तबा चुनाव हार चुके हैं। और भी कुछ ऐसे नेता हैं जो किसानों के कंधों पर चढ़कर सियासत में घुसना चाहते हैं। हालाँकि अभी तक मोर्चे ने राजनीतिक दलों और नेताओं को मंच से दूर रखा परन्तु हमारे देश में हर आन्दोलन की परिणिति अंतत: चुनाव ही होती है। इसलिए ये कहना गलत न होगा कि किसान आन्दोलन से जुड़े रहे अनेक नेतागण निकट भविष्य में राजनीति का दामन थामेंगे। रही बात उनकी मांगों की तो उनमें सबसे प्रमुख है न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी शक्ल देने की। ये वह मुद्दा है जिसका सतही तौर पर तो सभी दल समर्थन करते हैं लेकिन सत्ता में आने के बाद इससे कन्नी काट लेते हैं। इससे पहले भी जो सरकारें केंद्र में रहीं उनमें कृषि से जुड़े अनेक नेता थे। उनमें से शरद पवार तो कृषि मंत्री भी रहे । एचडी देवगौड़ा भी प्रधानमन्त्री बनने के बाद खुद को विनम्र किसान कहते थे लेकिन उन्होंने भी इस बारे में कुछ नहीं किया। किसान नेताओं का ये आरोप गलत नहीं है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए श्री मोदी ने भी न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी बना देने की पैरवी की थी। किसानों की आमदनी बढ़ाने के पक्षधर अनेक अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी के लिए सरकार और व्यापारियों को कानूनी तौर पर बाध्य किये जाने से अनेक समस्याएँ जन्म लेंगी। वर्तमान में सरकार समर्थन मूल्य घोषित कर उस पर खरीदी करती है। लेकिन किसान चाहते हैं कि व्यापारी को भी उसी मूल्य पर अनाज खरीदने कानूनी तौर पर बाध्य किए जावे। सुनने में तो ये मांग बहुत ही वाजिब लगती है लेकिन भारत के आर्थिक ढांचे में इसे समाहित कर पाना संभव नहीं लगता क्योंकि 80 फीसदी किसान लघु और मध्यम श्रेणी के होने से बाजार तक पहुंच नहीं पाते और व्यापारी उनसे सीधे खरीदी कर लेते हैं। उनकी आर्थिक स्थिति भी इतनी अच्छी नहीं होती कि वे जरा सा भी इंतजार या मोलभाव कर सकें। इसी तरह सरकार भी अपनी जरूरत की खरीदी ही करेगी जिसके बाद किसान को खुले बाजार में विक्रय करने पर सरकार द्वारा तय की गई कीमत का मिलना व्यवहारिक तौर पर संभव नहीं होगा। साल दर साल अन्न का उत्पादन बढ़ते जाने के पीछे सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य का ही आकर्षण है। लेकिन ज्यादा अनाज खुले बाजार में आने के बाद उसके दाम मांग और पूर्ति के सिद्धांत के अनुरूप ही तय होंगे। उस स्थिति में व्यापारी यदि किसान से खरीदी न करे तब उसे मजबूरन कम दाम पर विक्रय करना होगा। इसी तरह सभी कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निश्चित करने की मांग पूरी होने के बाद भी लागू नहीं हो पायेगी। अनेक कृषि विशेषज्ञों ने इस बारे में कहा है कि किसान को फसल का अर्थशास्त्र समझना होगा। तकनीक आधारित उन्नत खेती का चलन शुरू होते ही अधिकतर किसान एक ही अनाज का अधिकतम उत्पादन करने लगे। खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता हो जाने के बाद अतिरिक्त उत्पादन का निर्यात ही एकमात्र रास्ता बच रहता है लेकिन तब गुणवत्ता और ग्रेडिंग की जरूरत पड़ती है। और फिर सारे के सारे कृषि उत्पादन सरकार खरीदे ये नामुमकिन है क्योंकि वह सार्वजानिक वितरण प्रणाली के साथ ही आपातकालीन भण्डारण हेतु ही खरीदी करती है। ऐसे में किसान को सरकार पर पूरी तरह निर्भर न रहते हुए अपनी क्षमता का सही उपयोग करना होगा। आन्दोलन के दबाव में हो सकता है सरकार उनकी मांगें स्वीकार कर भी लेकिन उनको अमल में लाना आसान नहीं है। जिन इलाकों में गन्ना ज्यादा होता है वहां के किसान चीनी मिलों से समय पर भुगतान नहीं मिलने के कारण परेशान रहते हैं। अब गन्ने से एथनाल बनाकर उसका वैकल्पिक उपयोग प्रारम्भ किया जा रहा है जिसके बाद किसानों की समस्या काफी हद तक सुलझ जायगी किन्तु गेंहू, धान, चना, दलहन और तिलहन को सरकार किस सीमा तक खरीद सकेगी ये बड़ा सवाल है। किसानों की आय बढ़े ये सभी चाहते हैं लेकिन केवल उनके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय हों तो बाकी उत्पादक भी आज न सही भविष्य में इस हेतु दबाव बन सकते हैं। वैसे भी मुक्त अर्थव्यवस्था और उदारवाद के दौर में बाजार को नियंत्रित करना सरकारों के बस में नहीं रह गया है। कृषि को उद्योग का दर्जा देने की मांग भी लगातार उठती है लेकिन क्या बड़े किसान आयकर के दायरे में आने को तैयार होंगे? बिजली सहित कृषि उपकरणों एवं अन्य चीजों पर मिलने वाली सब्सिडी के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी सुरक्षा तभी सम्भव है जब कृषि उत्पादन और जरूरत के बीच समन्वय हो सके और निर्यात की ठोस योजना हो। खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने में किसानों के योगदान को भुलाना एहसान फऱामोशी होगी। लेकिन असली किसान और फार्म हाउस वाले उन किसानों के बीच अंतर तो करना पड़ेगा जो अपने काले धन को सफेद करते हैं और वह भी बिना आयकर चुकाए। संसद के भी अनेक ऐसे सदस्य किसान होने का दावा करते हैं जो कभी खेत में घुसे तक नहीं होंगे। प्रधानमन्त्री द्वारा तीन कानून वापिस लिए जाने के ऐलान के बावजूद किसान संगठन यदि आन्दोलन खत्म करने राजी नहीं हैं तो उसके पीछे उनका सोचना ये है कि अगर इस बार चूके तो फिर उनकी मांगों के विरोध में दूसरी दबाव समूह भी सामने आने लगेंगे। इस बारे में एक बात किसानों को समझ लेनी चाहिए कि इस आन्दोलन से सहानुभूति रखने वाले राजनीतिक दल भी सत्ता में रहते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करने से बचते रहे। यहाँ तक कि देवगौड़ा और गुजराल सरकार में कृषि मंत्री बने सीपीआई नेता चतुरानन मिश्र तक ये दुस्साहस नहीं कर सके। 2004 से 2009 तक मनमोहन सिंह सरकार को वाममोर्चे का बाहर से समर्थन था। सीपीएम महासचिव हरिकिशन सुरजीत उस बेमेल गठबंधन के शिल्पकार थे। लेकिन वाम मोर्चे ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी बनाने की मांग नहीं उठाई। उस सरकार में लालू प्रसाद यादव जैसे लोग भी मंत्री बने लेकिन उन्होंने भी कुछ नहीं किया क्योंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैधानिक बनाना व्यवहारिकता के धरातल पर अनेक समस्याओं का कारण बन जायेगा। किसान आन्दोलन फिलहाल जिस स्थिति में है उसे अनंतकाल के लिए जारी रखना आसान नहीं होगा। इस हेतु समिति बनाने के घोषणा श्री मोदी कर चुके हैं लेकिन उसकी रिपोर्ट कब तक आयेगी और क्या वह किसानों को स्वीकार्य होगी, ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे भी तीन कृषि कानून वापिस लेकर प्रधानमंत्री ने जो कदम उठाया उससे किसानों के हाथ कुछ नहीं आया क्योंकि वे लागू ही नहीं हुए थे। किसान संगठन अब जिन मांगों के लिए अड़े हैं उनमें से बहुत सी तो विगत वार्ताओं में ही सरकार ने मान ली थीं। हो सकता है आगामी लोकसभा चुनाव के पहले किसानों को खुश करने के लिए केंद्र सरकार वैसा कर भी दे लेकिन उस पर अमल हो पाना संभव नहीं होगा। किसान आन्दोलन की वर्तमान राजनीति पंजाब और उ.प्र के चुनाव के मद्देनजर केंद्र सरकार को घुटनाटेक करवाना है लेकिन प्रधानमंत्री के मन में भी कुछ न कुछ चल रहा होगा। इसलिए ये मुकाबला कब और कहाँ जाकर खत्म होगा ये कह पाना फिलहाल तो संभव नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 20 November 2021

कृषि क़ानून : विरोधी गदगद , समर्थक हतप्रभ



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी राष्ट्र के नाम सन्देश देने वाले होते हैं तब उत्सुकता से ज्यादा भय व्याप्त हो जाता है | नोट बंदी और लॉक डाउन सदृश आशंका परेशान करने लगती है | गत दिवस जब पता चला  कि वे सुबह – सुबह देश को संबोधित करने वाले हैं तब आम तौर पर ये माना गया कि वे गुरुनानक जयन्ती पर शुभकामना संदेश देंगे | पंजाब के  सिख मतदाताओं को लुभाने इसे नितांत स्वाभाविक माना जाता लेकिन उन्होंने एक बार फिर सभी को चौंकाते हुए तीन कृषि कानूनों को वापिस लेने का ऐलान कर दिया | उनको किसानों के हित में बताने के बाद उन्होंने  कहा कि चूंकि सरकार इनके फायदों से कुछ  किसानों को समझाने में असफल रही इसलिए उनको वापिस ले लिया जावेगा | प्रधानमंत्री ने ये भी बताया कि इनके जरिये देश के 80 फीसदी लघु और सीमान्त किसानों को लाभान्वित करने का उद्देश्य था | स्मरणीय है गत वर्ष 26 नवम्बर से किसान  संगठन दिल्ली  की सीमा पर कानून रद्द करने की मांग के साथ  धरने पर बैठे थे |  उनकी अन्य मांगों में  विशेष रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जामा पहिनाना है | श्री मोदी ने कानून वापिस लेने के साथ ही इस बारे में एक समिति बनाने की बात भी कही | उनके इस कदम से आन्दोलन कर रहे किसान संगठन और उनके समर्थन में खड़ी विपक्षी पार्टियों में तो विजयोल्लास छा  गया लेकिन उनकी अपनी पार्टी और प्रशंसक वर्ग में मायूसी छा गयी | विपक्ष ने थूककर चाटने , अहंकार की पराजय , चुनावी हार  के भय से देर से लिया गया सही फैसला जैसी टिप्पणियाँ कीं वहीं समर्थकों को समझ में नहीं आया कि वे जिन कानूनों की  बीते एक साल से  वकालत करते आ रहे थे उनको वापिस लिए जाने पर क्या कहें ?  लेकिन थोड़ी देर में ही  कोई इसे मास्टर स्ट्रोक कहने लगा तो किसी ने कहा कि  किसान संगठनों के साथ ही विपक्ष के हाथ से मुद्दा छिन गया | परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाओं के बीच  इस कदम के निहितार्थ तलाशे जाने लगे | किसान संगठन भी चौंक गए क्योंकि  उन्हें लगता था कि सरकार उनसे बातचीत करते हुए समझौते की शक्ल में निर्णय लेगी | लेकिन प्रधानमंत्री ने किसी को भनक तक नहीं लगने दी और वह घोषणा कर दी जिसकी उम्मीद  किसी को भी नहीं थी | ऐलान के बाद से ही उसके राजनीतिक परिणाम का आकलन शुरू हो गया | विरोधियों ने इसे प्रधानमन्त्री और सरकार की हार तो बताया लेकिन वे इस बात को स्पष्ट नहीं कर सके कि इसका राजनीतिक लाभ कौन उठाएगा ?  ये कहना पूरी तरह सही है कि श्री मोदी ने ये कदम राजनीतिक दांव के तौर पर ही उठाया है | यदि उत्तर भारत के तीन राज्यों क्रमशः  उ.प्र , उत्तराखंड और पंजाब के विधानसभा करीब न होते तब शायद वे  ये दांव न चलते | भले ही पंजाब छोड़कर शेष दोनों राज्यों के जो सर्वे आये हैं उनमें सीटें कम होने के बावजूद भाजपा सत्ता में लौटती दिख रही है लेकिन प्रधानमन्त्री के मन में 2024 का लोकसभा चुनाव है जिसके लिए उ.प्र में वर्चस्व बनाये रखना निहायत जरूरी है | इसके अलावा पंजाब में सूपड़ा साफ होने से बचाने के  लिए सिख समुदाय की नाराजगी दूर करना भी जरूरी था | ये भी कहा  जा रहा है कि  किसान आन्दोलन के बहाने पंजाब में खालिस्तानी गतिविधियाँ फिर शुरू होने लगी थीं | केंद्र सरकार को सिख विरोधी बताकर हिन्दुओं और सिखों  के बीच का सौहार्द्र खत्म करने के  संकेत भी आ रहे  थे | राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार कैप्टेन अमरिंदर सिंह द्वारा  गृह मंत्री अमित शाह से की गई मुलाकातों में भी पंजाब में आतंकवाद के नये बीज  अंकुरित होने संबंधी जानकारी दी गयी | उन्होंने भाजपा के सामने ये शर्त भी रखी कि  कृषि कानून वापिस  लिए जावें तो वे उसके साथ अपनी नवगठित पार्टी का  गठबंधन करने तैयार हैं | इसी तरह पश्चिमी उ.प्र के जाट मतदाताओं की नाराजगी दूर करने के लिए कुछ करना जरूरी था | सतही विश्लेषण कर्रें तो यही लगता है  कि उक्त सभी कारण  अपनी जगह सही हैं जिनके कारण प्रधानमन्त्री को पराजय स्वीकार करनी पड़ी | जिससे कठोर निर्णय  पर कायम रहने वाली उनकी  छवि को धक्का पहुंचा है | बीते एक साल में समाज के बड़े वर्ग के साथ ही किसानों के बीच भी  कृषि कानूनों के पक्ष में वातावरण बनने से  दिल्ली में चल रहे धरने की रंगत भी फीकी पड़ने लगी थी | राकेश टिकैत सहित किसान संगठनों के अन्य नेता विभिन्न प्रदेशों में दौरा करने के बाद भी आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी नहीं बना सके | और फिर आम जनता को इस विवाद में  किसी भी प्रकार की रूचि नहीं थी | गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में हुए उपद्रव और हाल ही में निहंगों द्वारा  दिल्ली में धरनास्थल के पास की गयी हत्या के बाद आन्दोलन नैतिक दृष्टि से  कमजोर हो चला था | दिल्ली और पड़ोसी राज्यों की जनता और व्यापारी वर्ग भी  आन्दोलन के विरोध  में मुखर था | वैसे भी  सर्वोच्च न्यायालय की  रोक से क़ानून लागू नहीं हो सके थे | ऐसे में  प्रधानमंत्री द्वारा अचानक  किये गये  ऐलान से उनकी छवि रणछोड़ दास की बन गयी | उल्लेखनीय है 2016 में नोट बंदी के बाद भी पूरे देश में  जबरदस्त नाराजगी  थी |  कृषि कानूनों से तो  किसान ही प्रभावित हो रहे थे किन्तु नोट बंदी ने तो पूरे समाज को हलाकान कर डाला था |  2017 में इन्हीं राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले थे | लेकिन वे अपने फैसले पर अडिग रहे और तमाम आशंकाओं  के बावजूद उ.प्र और उत्तराखंड में भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली | कल के पहले तक ये लग रहा था कि प्रधानमन्त्री किसान आन्दोलन से भयभीत हुए बिना चुनाव का सामना करेंगे किन्तु इस बार उनके चौंकाने का  अंदाज कदम पीछे खींचने के रूप में सामने आया | कृषि कानूनों को लेकर उनको एक बड़े वर्ग का समर्थन भी मिला जिसने इसे आर्थिक सुधारों की दिशा में सराहनीय कदम बताया था | इस फैसले के बाद भी किसान संगठनों द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए दबाव बनाने के संकेत से लगता है श्री मोदी द्वारा दिखाई गयी दरियादिली से दूसरा पक्ष ज़रा भी नहीं पसीजा , उलटे उसे ये लगने लगा है कि सड़क घेरकर बैठने से संसद के फैसले भी बदलवाए जा सकते हैं | इस तरह  प्रधानमन्त्री के कदम पीछे खींचने के इस निर्णय ने दबाव की राजनीति के लिए भी रास्ता साफ कर दिया है | यदि आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को अपेक्षित सफलता मिली तब  तो  इस दांव की सार्थकता साबित हो जायेगी | लेकिन  किसानों की नाराजगी अब भी बनी रही तब प्रधानमंत्री की निर्णय क्षमता और राजनीतिक आकलन पर सवाल उठे बिना नहीं रहेंगे |  राजनीति के जानकार पंजाब में भाजपा को पाँव ज़माने की जगह मिलने के साथ ही पश्चिमी उ.प्र में रालोद नेता जयंत चौधरी के साथ उसके संभावित गठबंधन की जो बात सोच रहे हैं वह उतनी आसान नहीं लगती क्योंकि  अमरिंदर और  जयंत दोनों ये  भांप गये हैं कि फिलहाल भाजपा को उनकी जरूरत है | अकाली दल ने तो दोबारा  जुड़ने से साफ़ इंकार कर दिया है | इसलिए इस कदम के नतीजों के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा |  लगता है  हालिया उपचुनावों में हिमाचल और राजस्थान के नतीजों ने प्रधानमन्त्री को चिंतित किया है | उनको ये समझ में आने लगा है कि  भावनात्मक  मुद्दे भी एक सीमा के बाद काम नहीं आते किन्तु उनके समर्थकों को अब भी  ये भरोसा है कि प्रधानमन्त्री मोर्चा जरूर हारे हैं लेकिन जंग नहीं  | और फिलहाल तो उन्होंने किसान  आन्दोलन सहित विपक्षी हमले की धार कमजोर कर दी है |  आने वाले कुछ दिनों में खुलासा हो जायेगा कि  इस फैसले से किसे और कितना फायदा या नुकसान होगा ? वैसे आन्दोलन चलाने वालों को भी इस बात की समीक्षा करनी चाहिए कि एक साल तक लड़ने और सैकड़ों मौतों  के बाद किसानों को आखिर मिला क्या ? क्योंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात समिति के पाले में चली जाने से फिलहाल उस पर किसी निर्णय की उम्मीद नहीं है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी