अब इस बारे में किसी भी प्रकार के शक की गुंजाईश नहीं रह गई कि कोरोना का नया संस्करण ओमिक्रोन भारत में विधिवत प्रवेश कर चुका है | ये बात भी सामने आई है कि विदेशों से आ रहे यात्री ही इसके संवाहक बन रहे हैं | कोरोना की विदाई के प्रति आश्वस्त अनेक लोगों में इस नए संक्रमण को लेकर सतर्कता भी दिखाई देने लगी है | अपने और दूसरों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहने वाले जिम्मेदार किस्म के लोग मास्क सहित अन्य सावधानियों का पालन भी करने लगे हैं | लेकिन ऐसे लोगों की संख्या उँगलियों पर गिनने योग्य ही है | हालाँकि सरकारी स्तर पर हो रही हलचल से ये तो लगता है कि दूसरी लहर के कटु अनुभवों को सरकारी अमला अब तक भूला नहीं है किन्तु इसी के साथ ये भी समझने वाली बात है कि तमाम चेतावनियों के बावजूद राजनीतिक पार्टियां इस बारे में बेहद लापरवाह या यूँ कहें कि असहयोगात्मक हैं | आज ही म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोगों को तीसरी लहर के प्रति आगाह करते हुए सतर्कता बरतने कहा जिससे लॉक डाउन की स्थिति न आये | दूसरी तरफ इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी साफ़ शब्दों में कहा है कि यूरोप में ओमिक्रोन का कहर जारी रहने से भारत में सतर्कता न रखी गई तो तीसरी लहर का आना अवश्यम्भावी है जो पहले से भी ज्यादा खतरनाक हो सकती है क्योंकि इस संक्रमण की चपेट में बच्चे भी आ रहे हैं | भारत में अभी तक बच्चों को कोरोना का टीका लगाये जाने की तैयारी ही चल रही है और देश के बड़े हिस्से में शिक्षण संस्थान खोल दिए गये हैं | कोरोना काल में लगाई गईं अधिकतर पाबंदियां तो पहले ही हटाई जा चुकी हैं जिसके कारण बाजार , मॉल , सिनेमागृह आदि में लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी है | शादी जैसे अन्य आयोजनों में उपस्थित जनों की संख्या को सीमित रखने संबंधी आदेश भी वापिस ले लिया गया है | ऐसे में जनजीवन पूरी तरह सामान्य हो चला है | रेल गाड़ियों में भी पूर्ववत भीड़ नजर आ रही है जिसकी वजह से आरक्षित टिकिट में प्रतीक्षा सूची की नौबत आने लगी है | अर्थव्यवस्था की दृष्टि से ये सब शुभ संकेत हैं किन्तु कोरोना संक्रमण के नए रूप के सामने आने के बाद चिकित्सा जगत और वैज्ञानिक जिस तरह की चेतावनियाँ लगातार दे रहे हैं उनके मद्देनजर ये देखने पर कि सामाजिक जीवन की वे कौन सी गतिविधियाँ हैं जिनमें कोरोना संबंधी शिष्टाचार की सबसे ज्यादा धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं तो राजनीतिक जलसों पर ही नजर जाती है | चूँकि उन पर रोक – टोक का साहस प्रशासन में नहीं होता इसलिए नेता और उनके उत्साही समर्थक पूरी तरह स्वछंद हो जाते हैं | इसी वर्ष की शुरुवात में प.बंगाल सहित चार राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए तब कोरोना की पहली लहर बिदाई के कगार पर थी किन्तु जब देश भर के दिग्गज नेता चुनाव मैदान में उतरकर सभा और रैलियों के माध्यम से प्रचार करने उतरे तब भारी भीड़ उनको सुनने और देखने आई | सबसे लंबा चुनाव प. बंगाल का था जिसके आधे चरण पूरे होते – होते ही कोरोना ने दूसरा हमला कर दिया था | इसे लेकर प्रधानमन्त्री सहित अन्य नेताओं की काफी आलोचना भी हुई | ममता बैनर्जी ने आखिर – आखिर में बचे हुए चरणों का मतदान एक साथ करवाने का आग्रह तक कर डाला | चुनाव के बाद प. बंगाल में कोरोना का प्रकोप बढ़ा ये किसी से छिपा नहीं है | उल्लेखनीय है तमिलनाडु , पुडुचेरी और केरल में मतदान एक दिन में ही संपन्न हो गया था | इस विषय को दोहराने का उद्देश्य आगामी वर्ष फरवरी माह में उ.प्र , उत्तराखंड , पंजाब , मणिपुर और गोवा में होने जा रहे विधानसभा चुनाव और कोरोना की तीसरी लहर के संयोग पर ध्यान आकर्षित करना है | इन राज्यों में चुनावी तैयारियों के मद्देनजर राजनीतिक गतिविधियाँ पूरे शबाब पर हैं | नेताओं की यात्रायें और रैलियां जमकर हो रही हैं | सरकारी जलसों में नए विकास कार्यों का शिलान्यास और पूरे हो चुके प्रकल्पों का उद्घाटन किया जा रहा है | ज्यों – ज्यों चुनाव की तारीख नजदीक आयेगी राजनीतिक सरगर्मियां भी बढेंगी जिनके वजह से भीड़भाड़ होना स्वावाभाविक होगा | पिछले अनुभव बताते हैं कि राजनीतिक जलसों में कोरोना संबंधी सावधानियों के प्रति जबर्दस्त उपेक्षा भाव नजर आता है | जनता तो छोडिये , नेता गण खुद उनका पालन नहीं करते | चूंकि चुनाव आयोग इस बारे में पूरी तरह अधिकारविहीन है इसलिए राजनेताओं को किसी भी प्रकार का भय भी नहीं रहता | इस बारे में सबसे प्रमुख बात गंभीरता से विचारयोग्य है कि उ.प्र देश का सबसे अधिक आबादी वाला प्रदेश है जहाँ घनी बसाहट होने से शारीरिक दूरी का पालन करना असंभव होता है | इसी तरह पंजाब में विदेशों से आने - जाने वालों की संख्या काफी है जिससे वहां संक्रमण की आशंका वैसे भी ज्यादा है | उत्तराखंड में भी जनवरी – फरवरी महीना त्यौहारों और यात्राओं का होता है | गोवा में इन महीनों में विदेशी पर्यटकों की भरमार के होने से वहां सतर्कता की बेहद जरूरत है | ऐसे में इन राज्यों में चुनाव की तैयारियों में जुटा प्रशासन तीसरी कहर से बचाव के उपाय किस तरह कर सकेगा ये यक्ष प्रश्न है | सत्ता में बैठे नेतागण भी चुनावी अभियान के कारण इस तरफ ज्यादा ध्यान देने में असमर्थ होंगे | और फिर आचार संहिता लग जाने से भी शासन का काम प्रभावित होता ही है | इन सब हालातों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग को चाहिए वह सर्वदलीय बैठक बुलाकर उक्त राज्यों के चुनाव टालने पर सहमति बनाये | देश के करोड़ों लोग इन राज्यों में रहते हैं | यदि चुनाव के दौरान तीसरी लहर का विस्फोट हुआ तो लेने के देने पड़ जायेंगे | और फिर जो सरकारी अमला चुनाव प्रबंध में जुटता है उसकी जान भी फालतू तो हैं नहीं | स्मरणीय है उ.प्र के पंचायत चुनाव में बड़ी संख्या में उन सरकारी कर्मचारियों की जानें गईं थी जो मतदान केन्द्रों पर तैनात थे | अब जबकि केंद्र से लेकर राज्य और इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन तक ओमिक्रोन के आने की पुष्टि करते हुए जनवरी – फरवरी में सबसे ज्यादा संक्रमण होने के प्रति आगाह कर ही रहे हैं तब पांच राज्यों के चुनाव आग में घी डालने की कोशिश होगी | राजनीतिक जमात इस सुझाव को संविधान और लोकतंत्र विरोधी बताकर विरोध व्यक्त करने में पीछे नहीं रहेगी किन्तु संविधान जिन भारत के लोगों के लिए बनाया गया है उनके प्राण खतरे में डालकर किसी प्रक्रिया को पूरा करने की जिद जनविरोधी है | इस बारे में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि बीमार होने पर नेताओं का इलाज तो वीआईपी के तौर पर देश – विदेश में सरकारी खर्च पर हो भी जाता है लेकिन आम जनता को पैसे होने के बाद भी अस्पताल में बिस्तर नसीब हो सकेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है | पिछले अनुभवों के बाद भी यदि कोई सबक न लिया गया तब ये मान लेने में कुछ भी गलत न होगा कि राजनीतिक नेता आम जनता को कीड़े –मकोड़े से ज्यादा नहीं समझते | -रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 8 December 2021
Tuesday, 7 December 2021
मध्यमवर्ग को घर की मुर्गी समझने की भूल भाजपा को भारी पड़ सकती है
गत दिवस एक छोटी सी खबर आई कि अर्थव्यवस्था कोरोना पूर्व के स्तर से भी बेहतर स्थिति में आ गई है। कृषि क्षेत्र तो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर ही रहा था लेकिन अब औद्योगिक इकाईयोँ में भी उत्पादन बढ़ रहा है और जमीन-जायजाद के व्यवसाय में भी खरीद-फरोख्त बढ़ने के प्रमाण मिलने लगे हैं। ऑटोमोबाइल का व्यवसाय जरूर सेमी कंडक्टर की कमी की वजह से ठहरा हुआ है लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि संभवत: फरवरी तक ताइवान से आपूर्ति शुरू होने के बाद कारों और दोपहिया वाहनों के बाजार में भी रौनक आ जायेगी। अर्थव्यवस्था में मजबूती का सबसे बड़ा पैमाना है जीएसटी की वसूली जो बीते कुछ महीनों से निरंतर लक्ष्य से ज्यादा हो रही है और जिसके कारण मौजूदा वित्तीय वर्ष में अनुमानित राशि का 80 फीसदी नवम्बर तक सरकारी खजाने में जमा हो चुका था। इसी से उत्साहित होकर केंद्र और अनेक राज्यों द्वारा दीपावली पर पेट्रोल और डीजल सस्ता किया गया। इसके बाद कोरोना काल में शुरू की गई मुफ्त खाद्यान्न योजना को प्रधानमंत्री ने 31 मार्च 2022 तक बढ़ा दिया। सरकारी गोदामों में अन्न का भरपूर भण्डार होने के साथ ही विदेशी मुद्रा का खजाना भी लबालब है। जैसे संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार वार्षिक विकास दर के अनुमान भी उत्साहवर्धक हैं और विदेशी निवेश भी उम्मीद के मुताबिक आ रहा है। विवाह का सीजन अच्छा – खासा चलने से बाजार में पैसे का आवागमन अपेक्षानुसार ही है। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था पर छाया कोहरा छंटने लगा है। हालाँकि कोरोना की तीसरी लहर और ओमिक्रोन की आशंका से थोड़ी चिंता है लेकिन इस बार चिकित्सा व्यवस्था को चाक-चौबंद किये जाने और बड़े पैमाने पर हो रहे टीकाकरण के कारण नए संक्रमण की भयावहता पूर्वापेक्षा कम रहने का आत्मविश्वास भी कारोबारी जगत पर देखा जा रहा है। कोरोना कल में लगाये गए लॉक डाउन के दौरान ये मांग लगातार उठ रही थी कि सरकार को विकास योजनाओं पर ज्यादा खर्च करना चाहिए ताकि रोजगार बढ़े और जनता की जेब में पैसा आये। उस दृष्टि से देखें तो लॉक डाउन के दौरान भी भारतीय रेलवे ने अपनी विकास परियोजनाओं को जिस तेजी और कुशलता से पूरा किया वह समय के सदुपयोग का अच्छा उदाहरण है और ज्योंही हालात सामान्य हुए त्योंही अधो-संरचना के कार्यों में तेजी आने से औद्योगिक क्षेत्र को बढ़ी हुई मांग का सहारा मिला , वहीं श्रमिकों को भी काम मिलने से उनके हाथ में नगदी आने लगी। केंद्र सरकार ने बीते कुछ समय में राजमार्ग, पुल और फ्लायओवर जैसे प्रकल्पों में जिस तेजी से स्वीकृति प्रदान की उसकी वजह से भी आर्थिक जगत में छाई निराशा काफी हद तक दूर हुई है। लेकिन इस सबके बीच लाख टके का सवाल ये है कि जब सब कुछ अच्छा हो रहा है तब जनता के खाते में उसके लाभ क्यों नहीं पहुँच रहे? कहने का आशय ये है कि किसी भी सरकार का समूचा आर्थिक नियोजन देश के विकास के साथ ही जनता के कल्याण के लिए होता है। उस दृष्टि से देखें तो केंद्र सरकार को कोरोना के दौरान उत्पन्न हुई विषम परिस्थितियों से सफलतापूर्वक निपटने के बाद अब जनता द्वारा उस दौरान दिए गये सहयोग का प्रतिफल उसे देना चाहिए। देश के 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त खाद्यान्न देने की प्रधानमंत्री की दूरगामी सोच को पूरी दुनिया ने सराहा। ये कहना भी गलत न होगा कि यदि वह योजना लागू न की जाती तब लॉक डाउन के दौरान लूटपाट और अराजकता की स्थिति उत्पन्न होने से कोई नहीं रोक सकता था। लेकिन दूसरी तरफ ये बात भी सही है कि गरीबों के अलावा समाज के बहुत बड़े तबके ने लॉक डाउन के दौरान जो कुछ भी भोगा उसकी कड़वी यादें आज भी उसके मानस पटल पर ताजा हैं। सरकारी नौकरी के अतिरिक्त जो मध्यमवर्ग है उसने कोरोना काल में असहनीय परेशानियाँ झेलने के बाद भी सरकार से सहयोग किया। इसमें नौकरीपेशा और छोटे तथा मझोले किस्म के व्यापारी भी हैं। ये कहना पूरी तरह सच है कि इस वर्ग को सिवाय मुफ्त वैक्सीन के और कुछ नहीं मिला। आज जबकि स्थितियां पहले से बेहतर होने के दावे किये जा रहे हैं और उनके आधार पर नई उम्मीदें हिलोरें मारने लगी हैं तब इस बात की आवश्यकता है कि समाज का जो वर्ग दबाव समूह बनाने में असमर्थ है और जिसे वाकई राहत की जरूरत है उसकी तरफ भी सरकार देखे। ये बात सर्वविदित है कि कोरोना काल के बाद ज्योंहीं अर्थव्यवस्था ने गति पकड़ी त्योंही महंगाई भी उसके समानांतर दौड़ने लगी। इसका सबसे ज्यादा असर उस मध्यमवर्ग पर पड़ रहा है जिसके पास आय के सीमित साधन हैं और जिसे न मुफ्त या सस्ती बिजली मिलती है न ही राशन या अन्य सुविधाएँ। ये कहना कदापि गलत न होगा कि इस वर्ग के पास किसानों और सरकारी कर्मचारियों की तरह सरकार से लड़ने की संगठित शक्ति नहीं है और इसीलिए राजनेता भी इसकी समुचित चिंता नहीं करते। कोरोना काल के बाद अर्थव्यवस्था के रफ़्तार पकड़ने के साथ ही मध्यमवर्ग पर महंगाई का जो बोझ आया है उससे राहत दिलवाने की दिशा में सोचना समय की मांग है। सरकार ने जितनी भी कल्याणकारी योजनायें चला रखी हैं उनमें मध्यमवर्ग के लिए कुछ खास नहीं है जिससे सबका विकास का प्रधानमंत्री का नारा गलत साबित हो रहा है। पेट्रोल-डीजल के दामों में जो कमी की गई उससे निश्चित तौर पर राहत मिली है। लेकिन सरकार की सोच वाकई जनता को राहत देने की है तब उसे पेट्रोलियम वस्तुओं को अविलम्ब जीएसटी के दायरे में लाकर जनता के हित में अपनी प्रतिबद्धता साबित करनी चाहिए। भाजपा को ये भरोसा हो चला है कि प्रधानमंत्री की छवि के बलबूते भावी चुनावी वैतरणी पार कर ली जायेगी किन्तु उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक परिवर्तनों में मध्यमवर्ग की भूमिका बहुत ही निर्णायक होती है। ये वर्ग भले ही सड़क पर तम्बू गाड़कर न बैठता हो लेकिन सरकार के बारे में जनमत बनाने में इसकी महती भूमिका रहती है। भाजपा को याद रखना चाहिए कि उसे चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने में इसी मध्यमवर्ग का सबसे ज्यादा योगदान है इसलिए प्रधानमंत्री को इस परम्परागत समर्थक वर्ग के कुशल क्षेम की चिंता भी करनी चाहिए , अन्यथा इसे घर की मुर्गी दाल बराबर समझने की भूल भारी पड़ सकती है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 6 December 2021
चुनाव जनता के लिए बने या जनता चुनाव के लिए?
चुनाव लोकतंत्र की मूलभूत आवश्यकता है। इसकी जड़ों को मजबूत करने के लिए ही नगरीय निकायों के चुनाव भी कराए जाते हैं। भारत में चूँकि अधिकांश आबादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है इसलिए ग्राम पंचायत नामक प्रशासनिक व्यवस्था सदियों से लागू रही जिसे कालान्तर में वैधानिक स्वरूप दे दिया गया है। महात्मा गांधी ने तो ग्राम स्वराज की कल्पना तक कर डाली थी। स्व. राजीव गांधी ने पंचायती राज व्यवस्था लागू करते हुए ग्राम पंचायत के चुनावों को भी लोकसभा और विधानसभा की तरह संवैधानिक आवश्यकता बनाया। हालाँकि अनेक विसंगतियों के कारण इस व्यवस्था के अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहे लेकिन उसके कारण शासन-प्रशासन का विकेंद्रीकरण तो हुआ ही है। इसी के चलते म.प्र सरकार ने पंचायत चुनाव करवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इसके लिए कमर कसने का ऐलान भी कर दिया है। वैसे तो नगरीय निकायों के चुनाव भी होने हैं लेकिन आरक्षण प्रक्रिया को लेकर अदालतबाजी होने से उन पर रोक लगी हुई है। यद्यपि वैसी ही सुगबुगाहट पंचायत चुनावों को लेकर भी है किन्तु सरकारी स्तर पर तैयारियां शुरू करते हुए मतदान की तारीख भी घोषित हो गई। उसके कुछ दिन पहले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कोरोना काल में लगाई गईं तमाम पाबंदियां हटाने की घोषणा की थी ताकि जनजीवन सामान्य हो और अर्थव्यवस्था पुरानी रफ़्तार से दौड़ सके। निश्चित तौर पर ऐसा करना हालात का तकाजा था लेकिन ये बात भी ध्यान देने वाली है कि जिस कोरोना के कारण वह सब करना पड़ा वह हमारे बीच अभी भी मौजूद है। उससे बचाव के लिए शुरू किये गये टीकाकरण अभियान की वजह से अब तक तो तीसरी लहर से बचाव होता रहा है लेकिन प्रतिबन्ध हटाते ही लोगों ने लापरवाही शुरू कर दी। विवाह सहित अन्य जलसों में लोगों की उपस्थिति की सीमा खत्म कर देने से भी भीड़ बढ़ने लगी। यद्यपि मुख्यमंत्री द्वारा मास्क सहित अन्य सावधानियां जारी रखने की अपील किये जाने के साथ ही मास्क न लगाये जाने पर जुर्माने जैसी कार्रवाई भी की जा रही है किन्तु ये बात बेहिचक स्वीकार करनी होगी कि इस बारे में आम जनता में अव्वल दर्जे की लापरवाही है। यहाँ तक कि नेता और शासकीय अधिकारी तक इस बारे में बहुत ही गैर जिम्मेदार बने हुए हैं। जहां तक बात टीकाकरण अभियान की है तो उसमें हो रहा फर्जीबाड़ा जिस तरह सामने आ रहा है उससे लगता है कि सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करते हुए ये मान लेना गलत होगा कि अधिकांश लोगों को कोरोना के दोनों टीके लगते ही हर्ड इम्युनिटी (सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता) विकसित हो चुकी है जिससे तीसरी लहर जैसा कोई खतरा नहीं रहेगा। लेकिन कोरोना की पहली और दूसरी लहर के बीच में भी इसी तरह का आशावाद सर्वत्र दिखाई देने लगा था जिसका परिणाम कितना भयावह निकला ये किसी से छिपा नहीं है। हालाँकि चिकित्सा विशेषज्ञ ये कहते रहे हैं कि कोरोना की तीसरी लहर पहले जैसी जानलेवा नहीं होगी क्योंकि देश में आक्सीजन और वेंटीलेटर की समुचित व्यवस्था कर ली गई है। लेकिन ऐसा कहते समय किसी को नहीं पता था कि उससे भी ज्यादा खतरनाक ओमीक्रोन नामक वायरस आ टपकेगा जिस पर न कोरोना के टीके का असर होता है और न ही प्रतिरोधक क्षमता काम आती है। बीते कुछ ही दिनों में इसका संक्रमण देश के विभिन्न हिस्सों में तेजी से फैलने लगा है। पड़ोसी राज्यों में ओमिक्रोन के नये-नये मरीजों का पता चलने से म.प्र में भी खतरा बढ़ गया है। ये भी उल्लेखनीय है कि प्रतिबन्ध शिथिल किये जाते ही प्रदेश के भीतर कोरोना के नये मरीज मिलना शुरू हो गये हैं जिसमें इंदौर और भोपाल सबसे आगे हैं। चूँकि विदेशों से लोगों का आगमन शुरू हो गया है इसलिए ओमिक्रोन की आशंका बढ़ रही है। पर्यटन का मौसम होने से विदेशी सैलानी प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों में सैर हेतु आ रहे हैं। हालांकि बाहर से आने वालों की जाँच के प्रबंध किये जा रहे हैं लेकिन इनमें कितनी पोल होती है ये किसी से छिपा नहीं है। ऐसी हालत में जब कोरोना के साथ ओमिक्रोन जैसे नए संक्रमण का हमला होने की पूरी आशंका है तब पंचायत चुनवा करवाने का औचित्य समझ से परे है। निश्चित तौर पर ये एक संवैधानिक व्यवस्था है जिसका पालन लोकतंत्र को देश के ग्रामीण इलाकों तक पहुँचाने के लिए आवश्यक है परन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात है उस जनता की सुरक्षा जिसके लिए पंचायती राज और चुनाव बनाये गए हैं। जनता के स्वास्थ्य और जि़न्दगी से बढ़कर और कुछ नहीं हो सकता। पंचायत चुनाव में भी वही सब होता है जो बाकी में देखा जाता है। नेताओं के दौरे, सभाएं, रैलियां-जुलूस और इन सबके कारण भीड़ का जमा होना संक्रमण के फैलाव का कारण बने बिना नहीं रहेगा और तब कोरोना के साथ ही ओमिक्रोन से बचाव की अपीलें चुनावी भीड़ के सामने बेअसर होना तय है। चिकित्सा विशेषज्ञ आये दिन चेता रहे हैं कि जनवरी में कोरोना की तीसरी लहर संभावित है और फरवरी में प्रतिदिन एक लाख से ज्यादा संक्रमितों के साथ चरम आयेगा। हालाँकि टीकाकरण के कारण मृत्यु होने का भय पहले जैसा नहीं रहा लेकिन लापरवाही जारी रही तो स्थिति भयावह होते देर नहीं लगेगी। ऐसे में बुद्धिमत्ता इसी में है कि पंचायत चुनाव को फि़लहाल टाला जाए। लोकतंत्र से जुड़ी संवैधानिक अनिवार्यताओं का अपना महत्व है लेकिन वे जनता की जान से ज्यादा नहीं। म.प्र के मुख्यमंत्री श्री चौहान बेहद संवेदनशील और जनता से जुड़े नेता हैं। उनको इस बारे में जानकरी न हो ऐसा भी नहीं है। अच्छा तो यही होगा कि वे सर्वदलीय बैठक बुलवाकर सभी को विश्वास में लेते हुए पंचायत चुनाव को कोरोना और ओमिक्रोन के खतरे के मद्देनजर रोकने की व्यवस्था करें। इस बारे में सीधी-सपाट बात ये है कि जनता की जान को खतरे में डालकर चुनाव करवाने की जिद तंत्र को भले मजबूत कर दे किन्तु वह लोक के हित में नहीं होगी।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Saturday, 4 December 2021
सांसदों का आचरण देखकर लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलने वालों को हौसला बुलंद
पिछले सत्र में अशोभनीय आचरण के कारण निलम्बित विपक्ष के 12 राज्यसभा सदस्यों द्वारा संसद परिसर में दिए जा रहे धरने के जवाब में भाजपा सांसदों ने भी प्रदर्शन किया। इस मुद्दे पर विपक्ष निलम्बन रद्द करने का दबाव बना रहा है वहीं सभापति वेंकैया नायडू और संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी इस बात पर अड़े हैं कि निलम्बित सदस्यों को बिना शर्त क्षमा याचना करना चाहिए। अक्सर ऐसे मामलों में सुलह और समझाइश के बाद भूलो और माफ़ करो की नीति अपनाई जाती रही है। लेकिन इस बार सभापति और संसदीय कार्य मंत्री ने कड़ा रुख अपनाते हुए विपक्ष के दबाव को अनदेखा करने का मन बना लिया है। हुआ यूँ था कि पिछले सत्र में सरकार के विरोध में गर्भगृह में आकर हंगामा कर रहे विपक्षी सदस्यों को बाहर निकालने के लिए बुलाये गए मार्शलों के साथ भी उन सदस्यों द्वारा झूमा-झटकी की गई जिनमें महिला मार्शल भी रहीं । उसके वीडियो सभी ने देखे। इस पर उनके निलम्बन की कार्रवाई की गई जिसके तहत पूरे शीतकालीन सत्र में उन्हें सदन से बाहर रहना होगा। विपक्ष इस बारे में सभापति के अधिकारों पर सवाल उठा रहा है वहीं श्री नायडू का दावा है कि उन्होंने अपने अधिकारों के अंतर्गत ही उक्त कार्रवाई की है। बहरहाल मामला अभी तक अनसुलझा है। निलम्बित सदस्य संसद परिसर में धरना दे रहे हैं जिसे अन्य विपक्षी नेताओं का भी समर्थन है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे सरकार की रणनीति बताते हुए कहा कि ऐसा कर उसने उच्च सदन में बहुमत का इंतजाम करते हुए अपने प्रस्ताव पारित करने का रास्ता साफ़ कर लिया। दूसरी ओर सभापति श्री नायडू ने उस वाकये को अपने संसदीय जीवन की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताते हुए कहा है कि निलम्बित सदस्यों को माफी मांगे बिना राहत नहीं दी जायेगी। ऐसे विवादों को चूंकि राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है इसलिए गुण – दोष की बजाय इकतरफा निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं। विपक्ष को संसदीय मर्यादा और आसंदी के सम्मान की फ्रिक नहीं है। इसी तरह सत्ता पक्ष की नजर में सभापति ने जो फैसला किया वह पूर्णत: विधि सम्मत और संसदीय गरिमा बनाये रखने के लिए आवश्यक था। लेकिन आरोप – प्रत्यारोप के बीच एक बात समझनी जरूरी है और वह ये कि संसदीय प्रजातंत्र कानून नहीं अपितु स्वस्थ परम्पराओं और समन्वय पर आधारित व्यवस्था है। इसमें सत्ता और विपक्ष दोनों की भूमिका अपनी – अपनी जगह बेहद महत्वपूर्ण होती है। दोनों के अपने अधिकार हैं लेकिन उनके साथ जुड़े दायित्व भी कम नहीं और ये भी उतना ही सच है कि दायित्व बोध न हो तो लोकतंत्र अपना अर्थ खो बैठता है। उस दृष्टि से देखें तो भारत में संसदीय प्रणाली की गरिमा और सम्मान के प्रति राजनीतिक दलों का आचरण बहुत ही गैर जिम्मेदाराना है। संदर्भित प्रकरण के पहले भी अनेक ऐसे वाकये हुए जब संसद के भीतर उसकी पवित्रता को उन्हीं सांसदों द्वारा नष्ट किया गया जिनको जनता ने लोकतन्त्र के इस मंदिर की रक्षा का भार सौंपा था। एक दौर था जब संसद में होने वाली बहस सुनने दर्शक दीर्घाएं ठसाठस भर जाया करती थीं। लेकिन अब टेलीविजन पर सीधा प्रसारण होने के बावजूद संसद की कार्रवाई कुछ विशेष अवसरों को छोड़कर देखने में देश की जनता को कोई रूचि नहीं रहती। राजनीति और नेताओं के प्रति सम्मान में कमी आने के पीछे एक बड़ा कारण संसद के भीतर होने वाला हंगामा और असंसदीय आचरण भी है। संसद की बैठकों पर प्रतिदिन करोड़ों रूपये खर्च होते हैं। ऐसे में ये अपेक्षा गलत नहीं होती कि इन बैठकों में देश हित से जुड़े विषयों पर सार्थक विचार-विमर्श हो और पक्ष-विपक्ष अपनी बात कहते हुए दूसरे की सुनें भी। लेकिन हमारे देश में संसदीय प्रणाली को सड़क पर होने वाले हंगामे में तब्दील कर दिया गया है। इसके लिए आज के विपक्ष को पूर्णत: दोषी ठहरा देना पक्षपात होगा क्योंकि जब भाजपा विपक्ष में थी तब उसने भी सरकार के विरोध के चलते पूरे के पूरे सत्र को हंगामे की भेंट चढ़ा दिया। देश के कानून मंत्री रह चुके स्व. अरुण जेटली ने भी इसका बचाव करते हुए इसे संसदीय प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बताया था। अनेक अवसर ऐसे भी आये जब सत्तारूढ़ सदस्यों ने ही मंत्री के हाथ से विधेयक की प्रति छीनकर फाड़ दी। महिला आरक्षण विधेयक पर सदन में दोनों पक्षों के अनेक सांसदों का व्यवहार बेहद गैर जिम्मेदाराना था। उनके विरुद्ध समुचित कार्रवाई नहीं किये जाने के कारण हंगामा पसंद दूसरे सदस्यों की हौसला अफजाई हुई। बेहतर तो ये होगा कि गर्भगृह में जाने वाले सदस्यों को उनके दलों के नेता ही रोककर आसंदी से क्षमा याचना करें परन्तु होता उल्टा है। मौजूदा विवाद भी क्षण भर में सुलझ सकता था लेकिन विपक्ष के नेतागण मार्शलों के साथ हाथापाई करने वाले सदस्यों को माफी मांगने के लिए प्रेरित करने की बजाय उनका बचाव कर रहे हैं। राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू लम्बे समय तक इस सदन के सदस्य रहे हैं। उन्होंने बतौर मंत्री भी काम किया और विपक्ष में भी। संसदीय नियम और प्रक्रिया के बारे में उनके ज्ञान और अनुभव को विपक्षी सदस्य भी नकार नहीं सकते। उन्होने जिस तरह अपनी पीड़ा व्यक्त की उसे समझकर निलंबित सांसद अपने अमर्यादित आचरण के लिए खेद व्यक्त कर देते तो विवाद कभी का खत्म हो जाता। लेकिन बजाय ऐसा करने के विपक्षी नेता उनके बचाव में खड़े होकर अनुशासनहीनता को प्रोत्साहित कर रहे हैं। सत्ता पक्ष में बैठे लोगों को भी ऐसे अवसरों पर आत्म निरीक्षण करना चाहिए जो विपक्ष में रहते हुए हंगामा करने में ही अपनी बहादुरी समझते थे। बेहतर तो ये होगा कि गर्भगृह में आने पर पूरी तरह रोक लगे। इसी तरह हंगामा करने वालों के विरुद्ध भी सख्त नियम बनाये जाने चाहिए। ये इसलिए जरूरी है क्योंकि सांसदों के अमर्यादित आचरण से प्रोत्साहित होकर देश में होने वाले आन्दोलन अराजकता और मनमानी में बदलने लगे हैं। जेएनयू, जामिया मिलिया, शाहीन बाग और किसान आन्दोलन इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। प्रजातंत्र में अभिव्यक्ति के अधिकार का उपयोग जिम्मेदारी के साथ न किया जावे तो वह स्वछंदता और स्वेच्छाचारिता में बदल जाता है। संसद सदस्यों का आचरण देखकर हंगामा और अनुशासनहीनता राष्ट्रीय चरित्र के रूप में स्थापित होती जा रही है। संसद केवल चुने हुए सासदों के बैठने की जगह न होकर देश के सामने आदर्श प्रस्तुत करने का मंच भी है। यदि उसकी गरिमा से खिलवाड़ न रुका तब लोकतंत्र को भीड़तन्त्र में बदलने वालों के मंसूबे पूरे होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। संसद के भीतर किसानों के लिए आवाज उठाने वाले नेताओं को किसान आन्दोलन के मंच पर बैठने से रोककर ये संकेत दिया जा चुका है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 3 December 2021
छोटी-छोटी सावधानियों से रोका जा सकता है बड़ा संकट
कोरोना की मार पूरी तरह खत्म हो पाती उसके पहले ही ओमिक्रान नामक नया वायरस दुनिया भर में आ धमका जिसने पूरी दुनिया को दहशत में डाल दिया है। द. अफ्रीका में इसके मरीज मिलते ही हडकंप मच गया। भारत सहित अनेक देशों के शेयर बाजार में बड़ी गिरावट से निवेशकों में निराशा आने लगी। सबसे ज्यादा चिंता की बात ये है कि अभी तक हमारे देश में पूरी जनता को कोरोना वैक्सीन की ही दोनों खुराक नहीं मिल सकीं। यद्यपि ओमीक्रान के बारे में चिकित्सा विशेषज्ञ ये कह रहे हैं कि कोरोना का टीका भी इसके संक्रमण से बचा नहीं सकता किन्तु साथ ही ये भी दावा भी किया जा रहा है कि जिन्हें दोनों खुराक मिल चुकी हैं उनको खतरा अपेक्षाकृत कम होगा। ये देखते हुए भारत में कोरोना टीकाकरण के अभियान में शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल करने के ईमानदार प्रयास अनिवार्यता बन गए हैं। ईमानदार शब्द का प्रयोग यहाँ इसलिए किया जा रहा है क्योंकि टीकाकरण अभियान में सरकारी धांधलेबाजी सामने आने लगी है। बड़ी संख्या में मृतकों को टीके लगाने के साथ ही जिन लोगों को पहले दोनों खुराक दी जा चुकी हैं उन्हें भी टीका लगाये जाने के सन्देश आना ये साबित करने के लिए काफी है कि लक्ष्य पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर फर्ज़ीबाड़ा किया जा रहा है। इसके पहले कि सभी वयस्कों के बाद बच्चों के टीकाकरण की शुरुवात होती, नये वायरस के खौफ ने चिंता के नए कारण उत्पन्न कर दिए हैं। कोरोना की तीसरी लहर आशंका के विपरीत अब तक नहीं आई जिसके कारण देश सामान्य स्थिति में लौटने लगा है। शिक्षण संस्थान खोले जाने के साथ ही रेल और हवाई यातायात पर लगी रोक भी हटाई जाने लगी। कोरोना काल में लगाये गए तमाम प्रतिबंधों को या तो समाप्त कर दिया गया या फिर उनमें शिथिलता की जा रही है। शादियों में आमंत्रितों की संख्या पर लगाई गई बंदिश खत्म होने से सामाजिक जीवन में उत्साह लौटता नजर आने लगा। बीते कुछ माह में उद्योग-व्यापार जगत ने आशाजनक प्रदर्शन करते हुए आर्थिक स्थिति में सुधार के संकेत दिए। नवम्बर माह में जीएसटी संग्रह ने एक बार फिर छलांग भरते हुए 1.31 लाख करोड़ का आकंडा छू लिया। इस बारे में पता चला है कि इस वित्तीय वर्ष के जीएसटी संग्रह का 80 फीसदी लक्ष्य पूरा हो चुका है। सबसे उत्साहजनक बात ये है कि निर्यात के क्षेत्र में आशातीत परिणाम आ रहे हैं। कई क्षेत्रों में भारत कोरोना काल से पहले वाली स्थिति से भी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। इसी कारण विश्व भर में आर्थिक विकास दर का आकलन करने वाली पेशेवर एजेंसियां इस वर्ष भारत को सर्वोच्च पायदान पर रखते हुए सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था मान रही हैं। लेकिन ओमिक्रान फैला तब सारे अनुमान और आंकड़े धरे रह जायंगे। गत दिवस कर्नाटक में दो लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि होने के बाद पूरे देश में ओमिक्रान से बचाव के प्रति कड़ाई बरतने की जरूरत है। इस बारे में ध्यान रखने वाली बात ये है कि कोरोना की तीसरी लहर का भय भले ही जाता रहा हो लेकिन अभी भी 8 से 10 हजार कोरोना मरीज नित्य प्रति देश में पाये जा रहे हैं। ऐसे में अतिरिक्त सतर्कता की बेहद जरूरत है। दूसरी लहर के कमजोर पडऩे ओर टीकाकरण हो जाने के बाद अधिकतर लोग ये मान बैठे थे कि कोरोना गुजरे ज़माने की बात हो चुकी है लेकिन ये पूरी तरह गलत है। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि उसके अवशेष अभी बाकी हैं और जऱा सी असावधानी संक्रमण के विस्फोट का कारण बन सकती है। स्मरणीय है कि कोरोना को लेकर शुरुआती तौर पर बरती गई लापरवाही कितनी महंगी पड़ी थी। इसी तरह पहली लहर के बाद पूरा देश जिस तरह बेफिक्र हुआ उसके कारण ही इस वर्ष की पहली तिमाही लाखों मौतों की गवाह बनी। बुद्धिमत्ता का तकाजा है कि ओमिक्रान चाहे आये या न आए लेकिन कोरोना से बचाव के लिए जो सावधानियां आवश्यक हैं उनका पालन जारी रखना होगा। इस बीमारी के बारे में अभी चिकित्सा जगत बहुत ज्यादा नहीं जानता। लेकिन मास्क, शारीरिक दूरी और हाथ धोने जैसे उपाय किये जाते रहें तो संक्रमण से बचा जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय आवागमन शुरू होने से ओमिक्रान का फैलाव होना बहुत आसान है। हालांकि विदेश से आने वालों की जाँच की प्रक्रिया शुरू हो गई है किन्तु इस काम के लिए तैनात सरकारी मशीनरी अपने दायित्व निर्वहन में पूरी तरह ईमानदार रहे ये देखना जरूरी है क्योंकि आज ही खबर आई है कि आंध्र प्रदेश में विदेश से आये दर्जनों व्यक्ति बिना जाँच के लापता हैं। ऐसे लोग ही बीमारी को फ़ैलाने के कारण बनते हैं। कहावत है दूध का जला छाछ भी फूं-फूंककर पीता है। इस आधार पर कोरोना का दंश भोग चुके देश में किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचने के लिये जरूरी उपाय करने के प्रति स्वप्रेरित जागरूकता होनी चाहिये। ये कहना कतई गलत न होगा कि कोरोना की मार झेल लेने के बाद भी सरकार और जनता दोनों के स्तर पर अपेक्षित सावधानी का अभाव है। बेशक सरकार की अपनी जिम्मेदारी इस तरह की आपदा के समय होती है किन्तु जनता को भी अपनी जान की हिफाज़त के प्रति गंभीर होना चाहिए।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 2 December 2021
राष्ट्रीय स्तर पर खेला करने के फेर में अपनी जमीन भी गंवा सकती हैं ममता
प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने 1997 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। तब उनका आरोप था कि पार्टी बंगाल पर लम्बे समय से राज करने वाली सीपीएम की बी टीम बनकर रह गई है। इसमें दो राय नहीं हैं कि वाममोर्चे के विरुद्ध जितना संघर्ष उन्होंने किया उतना किसी और ने नहीं और यही वजह रही कि साम्यवाद का अभेद्य दुर्ग बन चुके इस राज्य में लगभग चार दशक के वामपंथी शासन को हटाने का कारनामा उन्हीं के नाम लिखा गया। इस वर्ष वे तीसरी बार भारी बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनी। जुझारूपन के साथ ही वे अपनी तुनुकमिजाजी के लिए भी जानी जाती हैं जिसके लिए उन्हें काफी हद तक मायावती, जयललिता और उमाश्री भारती जैसी महिला नेत्रियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। कांग्रेस से अलग होने के बाद वे वाजपेयी सरकार में मंत्री भी रहीं लेकिन उस समय भी उनकी स्वभावगत अस्थिरता प्रधानमन्त्री के लिए मुसीबत पैदा करती रही। बाद में वे सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन का हिस्सा भी बनीं किन्तु उससे भी उनकी नहीं बनी। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले ममता ने कोलकाता में सभी विपक्षी दलों के नेताओं को एक मंच पर जमा करते हुए मोदी विरोधी गठजोड़ बनाने का प्रयास किया जिसमें सफलता नहीं मिली। कांग्रेस ने तृणमूल की बजाय वाममोर्चे का साथ पकड़ा जो पिछले विधानसभा चुनाव तक जारी रहा। इस चुनाव तक तृणमूल का फैलाव प. बंगाल के बाहर कुछ पूर्वोत्तर राज्यों तक ही रहा। लेकिन 2021 का विधानसभा चुनाव जीतने के साथ ही ममता ने राष्ट्रीय राजनीति में आने आने के संकेत ये कहते हुए दे डाले कि केंद्र में भाजपा को हराने की क्षमता उनमें ही है और वे ही नरेंद्र मोदी का विकल्प बन सकती हैं। उनका वह बयान सीधे-सीधे कांग्रेस और गांधी परिवार की चौधराहट को चुनौती था। उसके बाद से ही उनके राजनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर को उन्होंने सक्रिय किया जिन्होंने मुम्बई जाकर रांकापा नेता शरद पवार से लम्बी मुलाकातें करते हुए कांग्रेस विहीन विपक्षी गठबंधन की रूपरेखा तैयार की। हालांकि इसी दौरान श्री किशोर ने राहुल गांधी से भी भेंट की जिससे ये खबर तेजी से फैली कि वे कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं किन्तु ऐसा लगता है उन्हें वहां अपने लिए अनुकूलता नजर नहीं आई। लौटकर उन्होंने सुश्री बनर्जी को राष्ट्रीय राजनीति में कूदने के लिए प्रेरित किया। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रशांत की व्यूहरचना के कारण ही ममता ने श्री मोदी और अमित शाह की तगड़ी मोर्चेबंदी को ध्वस्त किया था। इसीलिये वे उन पर भरोसा करते हुए आगे आईं और सबसे पहले गोवा में मोर्चा खोलते हुए वहां के वरिष्ठ कांग्रेस नेता को अपनी पार्टी में शामिल करते हुए विधान सभा चुनाव में तृणमूल को उतार दिया। उसके बाद दिल्ली आकर कांग्रेस सहित कुछ और दलों के नेताओं को अपनी पार्टी में जगह दी। खबर है कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट नेता सुश्री बैनर्जी में संभावनाएं देखते हुए उनकी पार्टी में शामिल होने की सोचने लगे हैं। इसका जो कारण है वह उन्होंने मुम्बई में शरद पवार के साथ हुई मुलाक़ात के बाद कुछ विशिष्ट जनों के साथ संवाद के दौरान स्पष्ट कर दिया। यूपीए को खत्म बताते हुए उन्होंने बिना नाम लिये राहुल गांधी का ये कहते हुए मजाक उड़ाया कि अगर कोई कुछ करता नहीं है और विदेश में रहता है तो कैसे काम चलेगा? और इसीलिये उन्हें दूसरे राज्यों में जाना पड़ेगा। ऐसा कहते हुए उन्होंने देश भर के अनगिनत कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को संदेश दे दिया। जी-23 नामक समूह में शामिल कांग्रेस के नेताओं की भी यही शिकायत है कि न तो राहुल कुछ करते हैं और न हटते हैं। ममता को ये बात अच्छी तरह समझ में आ चुकी है कि कांग्रेस उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में आने नही देगी और यूपीए में रहने का अर्थ गांधी परिवार के पीछे चलना है। कांग्रेस और वाममोर्चे का साथ भी उनको फूटी आंखों नहीं सुहाता। इसीलिये बजाय सोनिया गांधी के वे श्री पवार से मिलीं जो उन्हीं की तरह कांग्रेस छोड़कर रांकापा बनाये बैठे हैं। उल्लेखनीय है कुछ समय पहले श्री पवार द्वारा विपक्ष के नेताओं की जो आभासी बैठक बुलाई गई थी उसमें भी कांग्रेस को आमंत्रित नहीं किया गया था। ये बैठक भी प्रशांत किशोर और उनकी मुलाकात के बाद संपन्न हुई थी। कांग्रेस के तमाम नेताओं के मन में भी ये बात घर करती जा रही है कि गांधी परिवार के नेतृत्व में आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कुछ ख़ास नहीं कर सकेगी। गुलाम नबी आजाद ने तो गत दिवस ये सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी कर लिया। ये सब देखते हुए सुश्री बैनर्जी अपनी महत्वाकांक्षाओं को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत करते हुए मैदान में कूद पड़ीं। इसके पीछे प्रशांत किशोर की ये सोच है कि भाजपा और प्रधानमंत्री से नाराज मतदाताओं की संख्या बहुत बड़ी है किन्तु वे कांग्रेस को बतौर विकल्प स्वीकार करने राजी नहीं हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उदय से एक बात साफ हो गई कि भाजपा और कांग्रेस दोनों से हटकर कोई सक्षम विकल्प हो तो मतदाता उसे हाथों-हाथ उठाने तैयार हो जाते हैं। उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र में जगन मोहन रेड्डी, तेलंगाना में चंद्रशेखर राव, तमिलनाडु में द्रमुक-अद्रमुक, केरल में वाममोर्चा इसके उदाहरण हैं। इन राज्यों में भाजपा तेजी से पाँव पसारने में जुटी है परन्तु उसे सफलता नहीं मिल रही क्योंकि गैर कांग्रेसी मजबूत विकल्प मौजूद है। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में ये सोच उतनी असरकारक नहीं रही। इसीलिये जिस क्षेत्रीय नेता ने प्रधानमन्त्री पद पाने के लिये अपने राज्य को छोड़ राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरने की कोशिश की वह अपनी जमीन भी गंवा बैठा। चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह और एचडी देवेगौड़ा भले ही प्रधानमन्त्री बन गये किन्तु उनका कार्यकाल बेहद संक्षिप्त रहा और वे कोई छाप भी नहीं छोड़ सके। चन्द्र शेखर और इंद्र कुमार गुजराल को हालात ने उस पद तक पहुंचा तो दिया लेकिन वे भी जैसे आये वैसे ही चले गये। देश के राजनीतिक इतिहास में इन सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों को सिवाय उल्लेख के और कोई महत्व नहीं मिलेगा क्योंकि उनके पीछे राष्ट्रीय स्तर का कोई दल या व्यक्तिगत जनाधार नहीं था। इस बारे में ये कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी भी तो राज्य से निकलकर राष्ट्रीय मंच पर छा गए किन्तु ऐसा कहने वालों को ये ध्यान भी रखना होगा कि वे एक विचारधारा के साथ स्थायी रूप से जुड़े रहे जो राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो चुकी थी। उस दृष्टि से ममता की ये कोशिश कांग्रेस को कमजोर करने में तो सफल हो जायगी किन्तु लोकसभा चुनाव में वे समूचे विपक्ष का चेहरा बने बिना श्री मोदी को टक्कर दे पायेंगी ये आशावाद पाल लेना उनकी भूल होगी। हो सकता है सुश्री बैनर्जी ऐसा कुछ कर जाएँ जिससे कांग्रेस का जी-23 जैसा कोई वर्ग टूटकर उनके साथ जुड़कर गांधी परिवार को अलग-थलग कर दे लेकिन ये भी उतना ही सही है कि सोनिया जी की अस्वस्थता और राहुल की निष्क्रियता के बावजूद कांग्रेस में काफी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो गांधी परिवार को कांग्रेस के लिए अपरिहार्य मानते हैं। और गैर भाजपाई क्षेत्रीय दलों के नेता इतनी आसानी से ममता को अपना रहनुमा मान लेंगे, ये नहीं लगता। भाजपा या एनडीए में प्रधानमन्त्री पद को लेकर कोई विवाद नहीं है। कांग्रेस में भी राहुल के अलावा और कोई नजर नहीं आ रहा। ऐसे में तीसरा मोर्चा बन भी जाए तो प्रधानमंत्री पद के लिए ममता और पवार में रस्साकशी हो सकती है। शिवसेना के बारे में अधिकतर लोगों का ये मानना है कि 2024 आते-आते वह फिर भाजपा के साथ आ जायेगी। ऐसे में ममता ने जो खेला प. बंगाल में कर दिखाया उसे राष्ट्रीय स्तर पर दोहराना आसमान से तारे तोड़ने जैसा होगा। और बड़ी बात नहीं इसकी कीमत उन्हें अपने घर में चुकानी पड़ जाए। इस बारे में रोचक बात ये है कि ममता ने भले ही यूपीए खत्म होने का दम्भ भर दिया लेकिन श्री पवार ने इस बारे में कुछ नहीं कहा। वैसे भी इस मराठा नेता पर भरोसा करना ममता के लिए आत्मघाती होगा क्योंकि धोखा और पवार समानार्थी शब्द माने जाते हैं। और फिर ममता भी उनके साथ कितनी दूर चल सकेंगी ये कह पाना कठिन है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 1 December 2021
सवाल ये है कि पराग विदेश जाते ही क्यों हैं ....
जब अपना कोई कहीं जाकर उपलब्धियां अर्जित करता है तब न केवल परिवार अपितु समूचे मोहल्ले , गाँव और शहर को खुशी मिलती है | लेकिन जब देश का कोई व्यक्ति विशेष तौर पर युवा सात समंदर पार जाकर बाद बड़ा मुकाम हासिल करता है तब उसकी कामयाबी पूरे देश को गौरवान्वित करती है | निश्चित रूप से भारत के लिए बीते कुछ वर्षों में ऐसे अवसर लगातर आते रहे हैं जब हमारे किसी व्यक्ति को अमेरिका जैसे विकसित देश में कोई ऐसा बड़ा पद मिला जिसकी वैश्विक प्रासंगिकता हो | उस दृष्टि से सोशल मीडिया के चर्चित माध्यम ट्विटर के सीईओ पद पर भारतीय मूल के पराग अग्रवाल की नियुक्ति निश्चित तौर पर खुशी के साथ ही गौरव का विषय है | ट्विटर विश्व की 500 बड़ी कंपनियों में गिनी जाती है और पराग इस पद पर पहुंचने वाले सबसे युवा व्यक्ति हैं | ट्विटर का उपयोग संवाद सम्प्रेषण के लिए दुनिया भर के दिग्गज राष्ट्रप्रमुख , राजनेता , अभिनेता , खिलाड़ी , उद्योगपति , कलाकार और विचारक करते हैं | इसमें किसके कितने प्रशंसक या फालोअर हैं इससे उसकी लोकप्रियता का अंदाज लगाया जाता है | यद्यपि इसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है क्योंकि ये संख्या प्रायोजित भी होती है | लेकिन ट्विटर की विश्व्यापी मौजूदगी और उसके महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता | उस दृष्टि से पराग का उसके प्रशासनिक मुखिया पद पर पहुंचना गर्व का विषय है | अपने जीवन में प्रगति के उच्च शिखर पर जाने के इच्छुक युवाओं के लिए वे प्रेरणा का नया स्रोत बन गये हैं | हालाँकि ये उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले भारतीय नहीं हैं | उनसे पहले भी विश्व की सबसे बड़ी अनेक कम्पनियों में भारतीय पेशेवर उच्चतम पदों पर आसीन होने में सफल रहे और उन्होंने अपने कृतित्व से देश की छवि को चमकाया भी | उनकी कामयाबी असंख्य भारतीय युवाओं की प्रेरणा का स्रोत बनी और उसी का परिणाम है कि विश्व की आर्थिक महाशक्ति अमेरिका की बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उच्च प्रबन्धन में भारतीय पेशेवरों की संख्या बढ़ती जा रही है | पराग के पूर्व माइक्रोसाफ्ट में सत्या नडेला , गूगल की अभिभावक कम्पनी अल्फाबेट में सुंदर पिचाई , अडोब में शांतनु नारायण और आईबीएम में अरविन्द कृष्णा भी उच्चतम पदों को हासिल कर भारत की गौरव पताका फहरा चुके हैं | पेप्सी जैसी लोकप्रिय कम्पनी की प्रशासनिक मुखिया का पद भी इंदिरा नूयी ने बहुत ही कुशलता से संभाला था | अमेरिका की अन्य बड़ी कम्पनियों के अलावा वहां की सरकार में अब उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के अलावा अनेक मुख्य पदों पर भारतीयों की नियुक्ति भारत के बढ़ते प्रभाव और महत्व को साबित करती है | लेकिन इस सबके बीच एक सवाल रह – रहकर उठता है कि इन मेधावी प्रतिभाओं को देश में ही रहकर काम करने के वैसे अवसर क्यों नहीं मिलते जिनके लिए वे अमेरिका या अन्य देशों में जाते हैं | एक जमाना था जब विदेश जाना बहुत बड़ी बात हुआ करती थी किन्तु आज भारतीय वैश्विक नागरिक के रूप में जाने जाते हैं | दुनिया के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है | न केवल शिक्षा , शोध और नौकरी , अपितु व्यवसाय के क्षेत्र में भी वे सफलतापूर्वक कार्यरत हैं | वाजपेयी सरकार के समय जब परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका सहित तमाम देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये तब विदेशों में कार्यरत इन्हीं भारतीयों ने अपनी देशभक्ति का उदाहरण पेश करते हुए विदेशी मुद्रा के भण्डार को लबालब कर दिया जिसकी मदद से देश वैश्विक बिरादरी में सिर ऊंचा करते हुए खड़ा रहा | आज हमारी अर्थव्यवस्था जिस आत्मविश्वास से ऊंचाई की ओर बढ़ती जा रही है उसमें अप्रवासी भारतीयों का योगदान बहुत बड़ा है | लेकिन ये अफ़सोस भी इसी के साथ होता है कि हमारे देश में इन प्रतिभाओं को चमकने का वैसा अवसर क्यों नहीं मिलता जिसके लिए वे विदेश भागते हैं | आईआईटी , आईआईएम, और एम्स जैसे संस्थानों से शिक्षित इंजीनियर , वैज्ञानिक , प्रबंधन विशेषज्ञ और चिकित्सा विज्ञान की जो हस्तियाँ उच्च शिक्षा हेतु विदेश जाती हैं उनमें से कितनी वापिस लौटकर भारत को अपना कार्यक्षेत्र बनाती हैं ये अध्ययन का विषय है | पराग अग्रवाल भी इसी श्रेणी में आते हैं | देश में उद्योग – व्यवसाय लगाने वाले उद्यमियों को शासन की ओर से तरह – तरह के प्रोत्साहन और सहायता दी जा रही है | ये भी उल्लेखनीय है कि विदेशों में कार्यरत अनेक युवा वहां से अच्छे अवसर छोड़कर देश में सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं | विदेशों की चमक – दमक और सुख – सुविधा से भरी ज़िन्दगी को त्यागकर कुछ युवाओं नें तो अपने गाँव में आकर विकास का जो बीड़ा उठाया उसने पूरे इलाके की तकदीर संवार दी | लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम है | यदि भारत को वाकई विश्व महाशक्ति बनना है तो इसके लिए दुनिया भर की बड़ी कंपनियों को भारत में कारोबार ज़माने के लिए आमंत्रित करने से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि भारत के उद्योगपति और नव उद्यमी ऐसी कम्पनियाँ खड़ी करें जो बहुराष्ट्रीय बने सकें | टाटा सहित अनेक उद्योगपतियों ने देश के बाहर जाकर अपनी धाक जमाई है लेकिन ऐसा सुनने में नहीं आता कि किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी का दिग्गज भारतीय अधिकारी उसकी नौकरी छोड़कर भारत के किसी प्रतिष्ठान में आया हो | रघुराम राजन जैसे अनेक आर्थिक विशेषज्ञ भारत आये और कुछ समय बाद लौट गये | हमारी जो प्रातिभायें दूसरे देशों में कार्यरत हैं उनकी मेहनत और कार्यकुशलता का लाभ उनको ही मिलता है | ऐसे में उनकी पेशेवर उपलब्धियां हमारे लिये केवल भावनात्मक संतोष और खुशी का तात्कालिक विषय तो बनती हैं लेकिन देश को विकसित करना है तो हमें ऐसा वातावरण और परिस्थितियां उत्पन्न करना पड़ेंगी जिसके आकर्षण में उच्च शिक्षित युवा जन्मभूमि को ही अपनी कर्मभूमि बनायें | इतिहास इस बात का प्रमाण है कि गुलाम होने के पहले भारत विश्व व्यापार में बड़ा हिस्सेदार हुआ करता था | ज्ञान – विज्ञान , उद्योग – व्यापार सभी में हमारा बोलबाला था | भारत में हुनर की कोई कमी नहीं है , यहाँ की संतुलित जलवायु पूरे साल काम करने का अवसर प्रदान करती है | खनिज , वन और जलसंपदा के मामले में भी देश काफी समृद्ध है | बड़ी आबादी के कारण विशाल मानव संसाधन उपलब्ध है | सबसे बड़ी बात तमाम विसंगतियों के बाद भी भारत में देशभक्ति को लेकर जबरदस्त भावनात्मक एकता है | इन सब खूबियों के कारण यदि हम अपने मेधावी लोगों को देश में ही काम करने के लिए समुचित अवसर और सुविधाएं दें तो पराग जैसी अनगिनत प्रतिभाएं भारत को वैश्विक महाशक्ति बनाने के लिए अपना योगदान दे सकती हैं | ट्विटर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के तौर पर एक भारतीय युवा का पदासीन होना निश्चित रूप से हर्षोल्लास का अवसर है लेकिन इसी के साथ ये भी विचारणीय है कि ऐसी प्रतिभाएं देश के बाहर जाकर ही क्यों निखरती हैं ? जिस दिन इस सवाल का समुचित उत्तर खोजकर प्रतिभा पलायन रोकने में भारत कामयाब हो जायेगा तब विश्व की बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मुख्यालय भारत में होने के साथ ही उनके सीईओ ही नहीं , मालिक भी भारतीय होंगे |
- रवीन्द्र वाजपेयी
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