Tuesday, 14 December 2021

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर एक नई यात्रा की शुरुआत



 काशी या वाराणसी को विश्व की प्राचीनतम नगरी कहा जाता है | भगवान शंकर का ज्योतिर्लिंग यहाँ स्थित है जिसे बाबा विश्वनाथ कहा जाता है | काशी भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का केंद्र रही  है | यहाँ के  आध्यात्मिक वातावरण में भक्ति , वैराग्य , कला , संगीत , साहित्य , संस्कृति , शिल्प , शिक्षा , उद्योग  सभी का अद्भुत समावेश है | ये नगरी भारतीय संस्कृति के लगभग सभी रंगों को अपने आँचल में समाहित किये हुए है | यहाँ का खान – पान , गान और तो और श्मसान तक ख्यातलब्ध है | काशी अध्ययन , आराधना और साधना का विश्वप्रसिद्ध केंद्र है | भगवान बुद्ध ने यहीं सारनाथ में सबसे पहले अपने ज्ञान का प्रकाश बिखेरा था | लेकिन काशी विरोधाभासों का भी  शहर है | पूर्वी भारत का यह प्रवेश द्वार अपनी विलक्षणताओं के साथ ही अव्यवस्थाओं के लिए भी जाना जाता रहा है | भीड़ , गंदगी , संकरी  गलियाँ , बेतरतीब यातायात और सबसे बढ़कर तो शिव के गणों जैसा लोक व्यवहार | जिन बाबा विश्वनाथ की वजह से वाराणसी पूरे भारत में आस्था का केंद्र  होने के साथ ही वैश्विक आकर्षण का केंद्र है , उनके ऐतिहासिक मंदिर के आस पास का समूचा क्षेत्र  अव्यवस्था का साक्षात अनुभव करवाने वाला था | मंदिर जाने के लिए आने वाले श्रृद्धालुओं को घनी बस्ती के अलावा संकरी गलियों से गुजरना होता था | जिनमें शिव के वाहन का निर्बाध आवागमन  आने – जाने वालों को भयभीत कर देता था | अवैध निर्माण और अतिक्रमणों के कारण विश्वनाथ  मंदिर के चारों तरफ बने दर्जनों मंदिर पूरी  तरह छिप गये थे | लेकिन गत दिवस पूरी दुनिया ने काशी के कायाकल्प को देखा | काशी विश्वनाथ कॉरिडोर नामक परियोजना का प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने लोकार्पण कर काशी को क्योटो बना देने के वायदे को पूरा करने के सिलसिले को और आगे बढ़ा दिया |  2014 में वाराणसी से उनका लोकसभा चुनाव लड़ना विशुद्ध रूप से राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था | भाजपा का वह दांव कारगर साबित हुआ | वाराणसी से श्री मोदी तो जीते ही वहीं  उ.प्र में भी भाजपा को  अभूतपूर्व सफलता हासिल हुई | जैसी कि उम्मीद थी श्री मोदी प्रधानमंत्री  बन गये और उसके बाद उन्होंने वाराणसी की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाया | उ.प्र ने उसके पहले भी देश को आधा दर्जन प्रधानमंत्री  दिए | उन सभी के निर्वाचन क्षेत्र अति विशिष्ट ( वीआईपी ) कहलाये | लेकिन फूलपुर , रायबरेली और अमेठी की दशा देखकर कोई नहीं कहेगा कि यहाँ से जीतने वाले   देश के प्रधानमंत्री  रहे | लेकिन श्री मोदी ने वाराणसी से चुनाव जीतने के तत्काल बाद ही वहां के विकास पर ध्यान दिया  | बीते सात  साल के भीतर ही वहां ये विश्वास पैदा हो गया है कि  इच्छा शक्ति हो तो बदरंग तस्वीर को भी  संवारा जा सकता है |  प्रधानमंत्री  जाहिर तौर पर एक  राजनेता हैं |  उनके कन्धों पर भाजपा को जिताने  की भी जिम्मेदारी है | उ.प्र में दो – ढ़ाई महीने  बाद विधानसभा चुनाव हैं  जिसमें भाजपा को कड़ी चुनौती मिलने की बात कही जा रही है | उस दृष्टि से पूर्वांचल का प्रमुख केंद्र होने से वाराणसी बहुत ही महत्वपूर्ण है | ये भी कहा जा रहा है कि चुनावी फायदे के लिए काशी  विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास कार्य  समय से पहले करवा लिया गया | प्रधानमंत्री  चूँकि हर आयोजन में भव्यता और सुव्यवस्था के लिए जाने जाते हैं इसलिए गत दिवस काशी में जो हुआ वह भव्यता   और दिव्यता दोनों लिहाज से बेमिसाल था | राजनीति से अलग हटकर देखें तो वाराणसी से अतीत में भी  अनेक दिग्गज लोकसभा चुनाव जीतकर जाते रहे |  उनके द्वारा भी इस प्राचीन नगरी के विकास के लिए काफी कुछ किया गया | मसलन स्व. कमलापति  त्रिपाठी ने रेलमंत्री रहते हुए  रेल सुविधाओं के विकास के लिए उल्लेखनीय कार्य किये | लेकिन ये कहने में लेश मात्र भी संकोच नहीं होना चाहिए कि  श्री मोदी ने बीते सात साल में ही वाराणसी को उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप विकसित करने का जो प्रयास किया वह वाकई प्रशंसनीय  है | दुनिया भर से बौद्ध धर्मावलम्बी वाराणसी के उपनगरीय क्षेत्र सारनाथ आते हैं | श्री मोदी ने जापान के प्रधानमंत्री  को वाराणसी की  गंगा आरती में शामिल करवाकर  जापान के धार्मिक शहर क्योटो की तरह से ही काशी को भी विकसित करने का इरादा जताया | उसे लेकर प्रधानमन्त्री का उपहास भी किया  जाता रहा किन्तु उन्होने   अपने संकल्प को न सिर्फ याद रखा अपितु उसे कार्यरूप में परिणित भी कर दिखाया | काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास को केवल धार्मिक  दृष्टि से देखा  जाना उचित न होगा | यह हिन्दू तीर्थों की अव्यवस्था को दूर कर उन्हें साफ़ - सुथरा , सुंदर और सुविधासंपन्न बनाने की दिशा में एक दिशा निर्देशक बन सकता है | काशी विश्वनाथ के दर्शन करने आये महात्मा गांधी ने भी वहां की गंदगी और अव्यवस्थाओं  पर असंतोष  व्यक्त किया था | देश में हिन्दू धर्म के अधिकतर धार्मिक केंद्र और तीर्थ स्थल इसी तरह की हालत में हैं | श्री मोदी ने वाराणसी के प्राचीन गौरव के अनुरूप उसके विकास का जो उदाहरण पेश किया वह पर्यटन और उससे उत्पन्न होने वाले रोजगार को बढ़ावा देने वाला साबित होगा इसमें कोई संदेह नहीं है | इसे सुखद  संयोग ही कहा जायेगा कि उ.प्र में ही अयोध्या में विकास का महा अभियान जोर – शोर से जारी है और यदि कार्य योजनानुसार ही चलता रहा तो आगामी दो वर्ष के भीतर अयोध्या भी विश्व के  मानचित्र पर उसी तरह स्थापित हो जायेगी जैसे वेटिकन और मक्का हैं | ये कहना कदापि गलत न होगा कि राममंदिर विवाद के बाद अयोध्या को लेकर पूरे विश्व से  हिन्दू  धर्मावलम्बी वहां आने के लिए लालायित हैं लेकिन पर्याप्त व्यवस्था के अभाव में अपनी इच्छा दबाकर रह जाते हैं | अयोध्या में राम मंदिर के साथ ही उसे विश्व के सबसे प्रमुख धार्मिक केंद्र में परिवर्तित करने के लिए जिस तरह की सुविधाओं  का विकास किया जा रहा है उसे देखते हुए आगामी कुछ सालों बाद पूरी दुनिया से लोग अयोध्या आएंगे | वाराणसी में भी काशी विश्वनाथ कॉरिडोर  बन जाने से पर्यटकों के लिए दोहरा आकर्षण रहेगा  | स्मरणीय है आजादी के बाद सरदार पटेल की पहल पर गुजरात में सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था | उसके लोकार्पण में पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद गये थे | लेकिन तब के प्रधानमंत्री  पं. जवाहर लाल नेहरु ने उनसे ये कहते न जाने का आग्रह किया कि उससे  देश  की धर्म निरपेक्ष छवि प्रभावित होगी | राजेन्द्र बाबू ने नेहरू जी की आपत्ति को दरकिनार कर दिया और कहा कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार राष्ट्रीय गौरव की पुनर्स्थापना होने से उनका वहां जाना सही रहेगा | काशी  विश्वनाथ परिसर का जो रूप निखरकर सामने आया है वह दिव्यता और भव्यता का सुंदर समन्वय है | याद  रखने वाली बात ये है कि भारत रत्न स्व. बिस्मिल्लाह खान भी बाबा विश्वनाथ के परम भक्त थे और अक्सर भोर की बेला में मंदिर प्रांगण में शहनाई बजाने पहुंच जाया करते थे | काशी के इस कायाकल्प से प्रेरित होकर अन्य ज्योतिर्लिंगों और शक्तिपीठों को भी इसी तरह विकसित और व्यवस्थित किया जावे तो देश ही नहीं अपितु विदेशों तक से श्रद्धालुजन इनकी यात्रा  करने आयेंगे | विश्वनाथ मंदिर के इर्द गिर्द हुए अतिक्रमण हटा दिए जाने के बाद से गंगा जी से ही मंदिर का दर्शन होना वाकई सुखद अनुभूतिदायक होगा | भारत विविधताओं से भरा देश है | लेकिन संस्कृति और धर्म सदियों से उसे एकता के सूत्र में बांधकर रखे हुए है | हमारे तीर्थ और धार्मिक केंद्र इस एकता को बनाये  रखने के सशक्त माध्यम हैं | उस दृष्टि से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ समूचे क्षेत्र में मूलभूत ढांचा खडा करने का जो अभियान चल पड़ा है उससे उ.प्र के पिछड़े कहे जाने वाले क्षेत्रों का भाग्योदय होना तय है | वैसे भी  भारत में धार्मिक पर्यटन का इतिहास बहुत पुराना है | उसे और सुविधा सम्पन्न बनाने से देशी और विदेशी पर्यटक ज्यादा संख्या में आकर्षित हो सकेंगे जिससे आसपास के इलाके में रोजगार  तथा  व्यवसाय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी | गुजरात में सरदार पटेल की जो मूर्ति लगाई गई वह विश्व में सबसे ऊंची है | उसके निर्माण पर हुए खर्च को लेकर प्रधानमंत्री की आलोचना भी हुई लेकिन कुछ सालों के भीतर ही उस क्षेत्र में पर्यटकों के रिकार्डतोड़ आवागमन ने उस प्रकल्प की सार्थकता साबित कर दी | उस दृष्टि से  काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास को एक नई यात्रा की शुरुआत माना जा सकता है  |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 December 2021

राष्ट्रीय आंदोलन के शोर में राज्यों में किसानों की समस्याएँ दबकर रह गईं



संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा एक साल से चलाया जा रहा आन्दोलन औपचारिक तौर पर समाप्ति के बाद दिल्ली से  किसानों के जत्थे वापिस लौटने लगे हैं | इनमें  सबसे ज्यादा पंजाब के किसान हैं | गत दिवस आयोजित  विदाई सभा में राकेश टिकैत ने कहा कि बीते एक साल में किसानों को आन्दोलन का प्रशिक्षण मिल गया है | अब वे और अन्य किसान नेता देश के विभिन्न राज्यों में जाकर किसानों को आन्दोलन के तौर – तरीके सिखाएंगे | प्रति वर्ष आन्दोलन मेला लगाकर देश भर के किसानों को एकत्र कर उनमें सम्पर्क और एकता बनाये रखने का प्रयास भी होगा | श्री टिकैत के अनुसार मोर्चा हर माह अपनी बैठक कर भावी  रणनीति तय करेगा | लेकिन वे ये बताने से बचे कि उ.प्र , उत्तराखंड और पंजाब के विधानसभा चुनाव में किसान संगठन किसका समर्थन करेंगे , जबकि मोर्चे के प्रमुख नेताओं में से एक भारतीय किसान यूनियन के गुरनाम सिंह चढूनी ने पंजाब में किसान उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दिया है | इसी के साथ ही पंजाब के कुछ किसान संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर रेल रोकने का प्रयास भी किया | दिल्ली से लौटने के पहले ही पंजाब के किसान संगठनों ने राज्य सरकार को चेतावनी दे डाली कि वह पांच साल पहले किये गये वायदे के अनुसार किसानों के कर्जे माफ करें | उल्लेखनीय है 2017 के चुनावी  घोषणापत्र में कांग्रेस ने किसानों से कर्ज माफी का वायदा किया था | संयुक्त किसान मोर्चे के आन्दोलन में शामिल  40  संगठनों में से 32 पंजाब के थे | ये बात भी निकलकर आई है कि श्री टिकैत द्वारा आन्दोलन जारी रखने के सुझाव का पंजाब के संगठनों ने विरोध करते हुए दिल्ली से डेरा उठाने का दबाव बना दिया |  जबकि श्री टिकैत को लग रहा था कि कि जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर वे सरकार को झुकाना चाहते थे वह तो अभी भी उलझा रह गया | चूँकि पंजाब और हरियाणा के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का भरपूर लाभ पहले से ही प्राप्त होता रहा है इसलिए उनमें  लड़ाई जारी रखने में रूचि नहीं थी | उनको ये भी लग रहा था कि राज्य सरकार से उनकी लम्बित मांगों को पूरा करवाने के लिए समय बहुत कम बचा है क्योंकि जनवरी में विधानसभा चुनाव के लिए आचार संहिता लग जायेगी | पंजाब से आ रहे संकेतों के अनुसार कांग्रेस सरकार की वापिसी की सम्भावना दिन ब दिन धूमिल होती जा रही है | किसान संगठनों को लग रहा है कि यही मौका है दबाव बनाकर कर्ज माफ़ करवाने का | ऐसी स्थिति में यदि श्री चढूनी की मंशानुसार किसानों के उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे तब श्री टिकैत और संयुक्त किसान मोर्चे के बाकी नेता उनका प्रचार करने आयेंगे या नहीं ये बड़ा सवाल है | उल्लेखनीय है अपने प्रभाव क्षेत्र पश्चिमी उ.प्र में किसानों का समर्थन किसे दिया जावेगा ये खुलासा भी  श्री टिकैत नहीं कर पा रहे हैं | ये देखते हुए किसान आन्दोलन अघोषित  बिखराव की और बढ़ रहा है | संयुक्त किसान मोर्चे के नेताओं को इस बात की खुन्नस है कि उनकी मेहनत पर श्री टिकैत महानायक बन बैठे | आन्दोलन  के दौरान और खत्म होने के ठीक पहले योगेन्द्र यादव द्वारा की गई टिप्पणी से ये साफ़ हो गया कि श्रेय लूटने के लिए हुई खींचातानी आखिर में खटास पैदा कर गयी | वैसे भी आंदोलन का केंद्र दिल्ली बन जाने से उस पर जाटों का कब्ज़ा हो गया | खाप पंचायतों के जरिये श्री टिकैत ने उ.प्र और हरियाणा में जाटों का ध्रुवीकरण करने का जो दांव चला उससे भी पंजाब के किसान नेता अपने को ठगा महसूस करते रहे | अपने बयानों में श्री टिकैत ने उ.प्र के गन्ना किसानों के भुगतान और बिजली बिलों की बात तो उठाई लेकिन पंजाब के किसानों की  कर्ज माफी पर वे कुछ नहीं बोले | इसीलिये अब ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि दिल्ली से लौटे पंजाब के किसान अब अपने राज्य में मोर्चा खोलेंगे जिसकी बानगी गत दिवस रेल रोके जाने के रूप में सामने आ गई | श्री टिकैत ने विभिन्न राज्यों में जाकर सरकार से चर्चा कर किसानों की मांगें पूरी करने की जो बात कही वह उतनी आसान नहीं  जितनी वे समझ रहे हैं | दिल्ली में तो सिख और जाट किसानों ने आन्दोलन को मजबूती दे दी | लेकिन अन्य राज्यों में संयुक्त किसान मोर्चा और श्री टिकैत  का कोई आभामंडल नहीं है | गौरतलब है कि मोर्चे में शरीक 40  में से 32 संगठन तो पंजाब के ही थे | श्री टिकैत के अपने संगठन को भी मिला लें तो पूरे देश से कुल सात – आठ ही इस आन्दोलन के साथ खड़े हुए दिखे | इनमें से भी कुछ ऐसे हैं जिनके नेताओं का अपने राज्य में धेले भर का असर नहीं है | ये सब देखते हुए  कहना गलत न होगा कि इस आन्दोलन के बाद अब विभिन्न राज्यों में किसानों के नाम पर नेतागिरी चमकाने के लिए नए – नए संगठन उभरेंगे जिनके नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसानों का उपयोग करेंगे | खुद श्री टिकैत के मन में चुनाव जीतने की लालसा है जो दो बार लड़कर अपनी जमानत जप्त करवा चुके हैं | इस आन्दोलन में राजनीतिक दलों को दूर रखने का प्रयास किया जाता रहा लेकिन राज्य स्तर पर किसान संगठन गैर राजनीतिक नहीं रह सकेंगे | पंजाब की भी जो 32 जत्थेबंदी आन्दोलन की असली ताकत बनीं वे भी  तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह द्वारा प्रायोजित थीं और तीन कानून वापिस होते ही पंजाब के किसानों के वापिस लौटने के फैसले के पीछे भी अमरिन्दर ही थे | इसी तरह पश्चिमी उ.प्र के जाट किसानों को दिल्ली में बिठाए रखने में सपा के अखिलेश यादव और रालोद के जयंत चौधरी का स्वार्थ था क्योंकि उन्हें इस बात का भय है कि आन्दोलन शांत होते ही जाट समुदाय के बीच भाजपा अपनी पैठ फिर बना लेगी | दिल्ली से लौटते हुए किसानों के चेहरों पर जीत की जो खुशी थी वह घर लौटते ही गायब हो जायेगी क्योंकि वहां जाते ही उनको ये एहसास होगा कि उनकी जो स्थानीय समस्या है उस पर तो संयुक्त किसान मोर्चा पूरी तरह उदासीन रहा |  तीनों कानूनों की वापिसी के बाद केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में समिति तो बना दी किन्तु वह कब तक निर्णय करेगी ये निश्चित नहीं है | जिन राज्यों में सरकारी खरीद होती है उनके किसानों को इसकी ज्यादा चिंता नहीं है | उनकी प्राथमिकता बिजली के बिल और कर्ज जैसे मुद्दे हैं | चूँकि संयुक्त किसान मोर्चा तीन कानूनों में उलझ गया इसलिए किसानों की बाकी मांगें उपेक्षित रह गईं | यही कारण है कि पंजाब के किसान संगठन  दिल्ली से लौटने की जल्दबाजी में थे | अब सवाल ये है कि कर्जमाफी सहित  उनकी मांगों के समर्थन में क्या श्री टिकैत और मोर्चे के बाकी नेता पंजाब सरकार के विरोध में रेल रोको और टोल नाकों पर कब्जे का समर्थन करने आयेंगे ? इसी तरह क्या पंजाब की 32 जत्थेबंदियां उ.प्र के गन्ना किसानों के बकाया भुगतानों के लिए लड़ने जायेंगी ? इस तरह के सवाल और भी हैं | श्री टिकैत गत दिवस कह रहे थे कि इस आन्दोलन पर शोध होंगे क्योंकि यह अपनी तरह का अनूठा प्रयोग था जिसमें एक साल तक किसान धरने पर बैठा  रहा | उनकी बात बिल्कुल सच है किन्तु इस शोध में ये बात भी उभरकर आयेगी कि आन्दोलन से किसानों की एक भी समस्या  स्थायी रूप से हल नहीं हुई | बिजली बिल और गन्ना के भुगतान की समस्या पूरी तरह राज्यों से सम्बंधित है | इसी तरह कर्ज माफी के पंजाब कांग्रेस के घोषणापत्र से हरियाणा और राजस्थान के किसान उदासीन हैं | देश के सभी राज्यों में तो अनाज की सरकारी खरीद तक नहीं होती | किसानों की कर्ज माफी की मांग भी राष्ट्रीय आन्दोलन का मुद्दा नहीं बन सकी |  श्री टिकैत का ये कहना यदि सही भी है कि एक वर्ष चले धरने  में किसानों को आन्दोलन का प्रशिक्षण मिल गया किन्तु उसी के साथ ये भी सही है कि इस दौरान  स्थानीय समस्याओं को केन्द्रीकृत करने में संयुक्त किसान मोर्चा असफल रहा क्योंकि उसका ध्यान एक ही मुद्दे पर जाकर ठहर गया | इसीलिये राष्ट्रीय स्तर पर जो छोटा और मध्यम श्रेणी का किसान है उसे इस आन्दोलन की  सफलता अथवा विफलता में कोई रूचि नहीं रही | चूंकि हमारे देश में अधिकतर जनांदोलनों की परिणिति चुनाव और सत्ता पाने के रूप में होती है इसलिए इस आन्दोलन का भविष्य भी फरवरी  में होने वाले उ.प्र , उत्तराखंड और पंजाब के चुनाव परिणामों के बाद तय होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 11 December 2021

हेलीकाप्टर दुर्घटना पर निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी ठीक नहीं



हेलीकाप्टर दुर्घटना में चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ जनरल बिपिन रावत और दर्जन भर लोगों की मौत के बाद दुर्घटना के कारणों को लेकर कुछ लोग जिस तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं उनसे लगता है जैसे वे ऐसे मामलों के जन्मजात विशेषज्ञ हों। इनमें कुछ राजनेता, पत्रकार और सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले वे लोग हैं जिन्हें हर मामले में टांग अड़ाने की आदत है। कुछ लोगों को इस बात का भी दर्द है कि समाचार माध्यमों में उक्त दुर्घटना को लेकर वैसी चर्चा नहीं हो रही जैसी सुशांत राजपूत और आर्यन खान के मामले में हुई थी। सांसद डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने इस घटना में षडयंत्र की आशंका जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश से जांच कराये जाने की मांग कर डाली ताकि किसी तरह का दबाव न आये। उनके अलावा अनेक लोगों का कहना है कि हादसे के पीछे चीन, पाकिस्तान और श्री लंका के तमिल उग्रवादी संगठन लिट्टे का हाथ हो सकता है जो दोबारा जीवित हो रहा है। कुछ लोगों ने ताईवान में हुई इसी तरह की दुर्घटना के तार इससे जोड़ते हुए अपना निष्कर्ष निकाल लिया। रूस के राष्ट्रपति पुतिन के संक्षिप्त भारत दौरे के फौरन बाद हुई उक्त दुर्घटना को हथियारों के सौदों में चल रही प्रतिद्वंदिता से जोड़कर भी देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है भारत ने रूस से हाल ही में रक्षा प्रणाली खरीदने का जो सौदा किया उससे अमेरिका बहुत नाराज है। साथ ही चीन को भी ये डर है कि भारत इसका उपयोग उसके विरुद्ध करेगा। स्व. रावत द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध की गई जमीनी सर्जिकल स्ट्राइक से उत्पन्न उसकी नाराजगी को भी इस दुर्घटना की वजह मानने वाले कम नहीं है। सबसे नया कयास लेसर तकनीक से हेलीकाप्टर गिराये जाने के तौर पर लगाया जा रहा है। तीनों सेनाओं के प्रमुख के तौर पर स्व. जनरल रावत सेना के आधुनिकीकरण के अभियान से करीबी से जुड़े रहे। रक्षा उपकरणों के सौदों में भी उनकी सलाह काफी महत्वपूर्ण मानी जाती थी। सबसे प्रमुख बात ये है कि उनके सरकार के साथ काफी नजदीकी सम्बन्ध होने से रक्षा मामलों में निर्णय प्रक्रिया तेज हुई थी। गत वर्ष गर्मियों में चीन द्वारा लद्दाख क्षेत्र की गलवान घाटी में की गई घुसपैठ का भारतीय सेना ने दबंगी से जवाब देने के बाद पूरे इलाके में जबरदस्त मोर्चेबंदी की उसकी वजह से चीन को काफी शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी और वह बजाय अकड़े रहने के वार्ता करने राजी हुआ जिसका सिलसिला अभी भी जारी है। केंद्र सरकार द्वारा तीनों सेनाओं का एक स्थायी प्रमुख (सीडीएस) नियुक्त करने से सेना के तीनों अंगों में तालमेल और अच्छा हुआ जिसके कारण ही लद्दाख जैसे दुर्गम इलाके में हवाई पट्टी बनाकर आधुनिक लड़ाकू विमान और मिसाइलें लगाई जा सकीं। जाहिर है शत्रु राष्ट्र इससे परेशान होकर ऐसा कुछ करने की ताक में रहते हैं जिससे हमारी सैन्य तैयारियों में व्यवधान आये। जनरल रावत बीते कुछ समय से भारत की रक्षा नीति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे थे और उस लिहाज से उनका दुश्मनों की नजर में खटकना स्वाभाविक ही था। दुनिया भर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों के पास आजकल अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र और तकनीक आ गयी है। अफगानिस्तान जैसे गरीब देश में सड़क चलते लोगों के कन्धों पर रखे रॉकेट लांचर इसके जीवंत सबूत है। ऐसे में ये सोचना पूरी तरह निराधार नहीं है कि जनरल रावत के हेलीकाप्टर की दुर्घटना के पीछे कोई शत्रु देश अथवा ऐसा आतंकवादी संगठन हो सकता है जो भारत की रक्षा तैयारियों में खलल डालने के साथ देश को आन्तरिक तौर पर कमजोर करना चाहता हो। लेकिन ऐसे मामलों में सार्वजनिक चर्चा और अनधिकृत टिप्पणियों से बचा जाना चाहिए। जिस हेलीकाप्टर में स्व. रावत और उनका दल सवार था वह अपनी गुणवत्ता और विश्वसनीयता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। युद्ध के अलावा अति विशिष्ट व्यक्तियों के आवागमन के लिए भी उसका उपयोग किया जाता है। हालाँकि वह अनेक बार दुर्घटना का शिकार हो चुका है किन्तु तकनीकी श्रेष्ठता और सुरक्षा मानकों पर खरा साबित होने के कारण उसकी साख पर असर नहीं पड़ा। दुर्घटना के फौरन बाद सरकार और वायुसेना ने जांच शुरू कर दी। चूँकि हादसे में सीडीएस भी जान से हाथ धो बैठे और हेलीकाप्टर भी उच्च कोटि का था इसलिये जांच भी उसी स्तर की होगी। ये देखते हुए अनुमानों के दिशाहीन तीर छोड़ना जल्दबाजी के साथ ही गैर जिम्मेदार रवैया ही है। किसी तोड़फ़ोड़ या आतंकवादी हरकत की आशंका अपनी जगह स्वाभाविक है लेकिन जिस जगह और मौसम में हादसा हुआ उन्हें देखते हुए यही सम्भावना ज्यादा है कि पायलट हेलीकाप्टर को सामान्य ऊंचाई से भी कम पर उड़ाने बाध्य हुआ और वही जानलेवा बना। उड़ान का समय यद्यपि बहुत ही संक्षिप्त था किन्तु हवाई यातायात का नियन्त्रण बहुत ही सावधानी से किया जाता है। और फिर जब जिस उड़ान में देश की सुरक्षा से जुड़ा बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति बैठा हो तब सतर्कता और भी ज्यादा रखी जाती है। जिस इलाके में दुर्घटना घटित हुई वह घने जंगलों वाला है। इस तरह की उड़ान का जो मार्ग है वह सार्वजानिक भी नहीं किया जाता। ऐसे में बेहतर यही होगा कि वायुसेना द्वारा की जा रही जाँच के परिणामों का इंतजार किया जावे। उससे निकलने वाले निष्कर्षों का विश्लेषण जरूर किया जा सकता है। बहरहाल किसी के पास या उसके दिमाग में ऐसी कोई बात हो जो दुर्घटना के कारणों को पता लगाने में सहायक हो सकती है तब उसे जाँच एजेंसियीं तक पहुंचाना समझदारी होगी। लेकिन बैठे-बैठे अन्दाजिया तीर छोड़ते रहने से हासिल तो कुछ होता नहीं, उलटे जांच करने वाले दबाव में आ जाते हैं। इस बारे में ये भी ध्यान रखना चाहिए कि हादसे का शिकार हुआ हेलीकाप्टर वायुसेना का था जिसमें तीनों सेनाओं के प्रमुख सवार थे। सेना, सुरक्षा और सेनापति से जुड़े इस घटनाक्रम में बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन्हें सार्वजनिक करना देशहित में नहीं होगा। ये देखते हुए अति उत्साह में अपनी काल्पनिकता का उपयोग करने की बजाय जिम्मेदारी के साथ धैर्य रखने में ही बुद्धिमत्ता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 December 2021

नेताओं का अहं तो संतुष्ट हुआ लेकिन किसान खाली हाथ ही रहे




आखिऱकार किसान आन्दोलन समाप्त हो ही गया। 11 दिसम्बर से दिल्ली में  धरना दे रहे जत्थे वापिस लौटने लगेंगे। किसान नेताओं के चेहरे पर जीत की खुशी है। एक साल से भी ज्यादा आन्दोलन को खींचना वाकई बड़ी बात थी। इतने लम्बे समय तक धरना स्थल पर भोजन-पानी और अन्य व्यवस्थाओं को देखकर ये तो पता चलता ही था कि किसानों के पीछे कुछ अदृश्य ताकतें भी रहीं  । वरना अपनी पैदावार का उचित मूल्य न मिलने से कर्ज में डूबा किसान काम-धंधा छोड़कर घर परिवार से दूर कैसे रहा ,ये सवाल भी उठना स्वाभाविक है। इसी के साथ  गौरतलब है कि समूचे विपक्ष के समर्थन और समाचार माध्यमों में बेतहाशा प्रचार के बावजूद आन्दोलन दिल्ली के निकटवर्ती तीन-चार राज्यों में ही क्यों सिमटा रहा ? निश्चित रूप से संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में एक बड़ी लड़ाई लड़ी गई। लेकिन उससे जो हासिल हुआ और अब उसका असर अन्य क्षेत्रों में होने वाले आन्दोनों पर किस तरह पड़ेगा ये गहन विश्लेषण का विषय है। गत दिवस एक चैनल के पत्रकार ने जब राकेश टिकैत से पूछा कि आन्दोलन की उपलब्धि क्या है, तब वे बड़ी ही मासूमियत से बोले कि देश का किसान आन्दोलन के तौर-तरीके सीख गया, सरकार के साथ बातचीत में आने वाले पेच भी उसे पता चले और सबसे बड़ी बात हुए किसान संगठनों का एकजुट होना। हालाँकि उन्होंने ये माना कि सरकार के साथ  आमने-सामने बैठकर फैसला करने की हसरत अधूरी रह गई। वस्तुत: प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा कृषि कानून वापिस लेने की घोषणा के बाद ही ये तय था कि आन्दोलन जल्द समेट लिया जाएगा। काफी किसान तो घोषणा के फ़ौरन बाद धरना स्थल से लौट भी गये किन्तु किसान नेताओं ने सरकार पर इस बात का दबाव बनाया कि आन्दोलन के दौरान जान गंवा बैठे किसानों के परिजनों को क्षतिपूर्ति, आपराधिक मुकदमे वापिस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ठोस निर्णय के बिना वे वापिस नहीं लौटेंगे। बिजली और पराली संबंधी आश्वासन तो पहले ही मिल चुका था। राकेश टिकैत चाह रहे थे कि सरकार उनको बैठक हेतु बुलाये किन्तु उसने फोन और चिट्ठियों से ही आन्दोलन समाप्त करने की परिस्थितियां बना दीं। सबसे बड़ा पेंच फंसा न्यूनतम समर्थन मूल्य का , लेकिन पंजाब और हरियाणा के किसान संगठन इस मुद्दे पर उदासीन रहे क्योंकि उनकी 90 फीसदी उपज सरकार खरीद लेती है। बाकी मुद्दों पर उनको ये एहसास था कि पंजाब की तरह अन्य राज्य  भी मौतों पर  मुआवजा और मुकदमे वापिस ले ही लेंगे। पराली और  बिजली संबंधी कानून भी सरकार ने वापिस लेने की बात कह दी थी। आन्दोलन शुरू होने के बरसों पहले से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग उठती रही है। इस बारे में अनेक समितियों की रिपोर्ट भी सरकारी फाइलों में धूल  खा रही है। ऐसे में जब कृषि कानून आये तब जिन किसान संगठनों ने उनके विरोध में दिल्ली की सीमा पर धरना दिया वे प्रारम्भिक दौर में ही कानून रद्द करने की जिद पकड़ने की गलती कर गये । कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ हुई दर्जन भर बैठकों में यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में भी किसानों का पक्ष रखते हुए बातचीत जारी रखी जाती तो बड़ी बात नहीं इस विषय पर अब तक कुछ न कुछ हो गया होता। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चे में योगेन्द्र यादव जैसे  कुंठित सलहाकार घुसे थे जिनकी रूचि गतिरोध बनाये रखने में थी क्योंकि उनके पास सुर्खियों  में बने रहने का और कोई जरिया नहीं है। इसीलिए सरकार के साथ हुई वार्ता केवल एक मुद्दे पर आकर अटकती रही कि पहले तीनों कानून रद्द हों तब बात होगी। इसके कारण ही सरकार ने बातचीत करना बंद कर दिया जिसके बाद संयुक्त किसान मोर्चा टेबिल पर बैठकर बात करने की गुहार लगाता रहा लेकिन पिछली जनवरी के बाद सरकार ने उसको कोई तवज्जो नहीं दी। किसान संगठनों को इस बात का भी अफसोस रहा कि श्री मोदी ने उनसे चर्चा किये बिना ही कानून वापिस  लेने की इकतरफा घोषणा कर उनके हाथ से हथियार छीन लिया। आन्दोलन की शुरुवात चूँकि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री  कैप्टन अमरिंदर सिंह ने करवाई थी इसलिए कानून वापिस होते ही उनके प्रभाव वाले पंजाब के 32 संगठनों ने बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी कर ली। उससे घबराई टिकैत एंड कम्पनी ने मुक़दमे वापिस लेने और मृतकों के परिजनों को मुआवजे के ऐलान तक रुकने की अपील की जिसके संकेत सरकार संदेशों के जरिये दे ही चुकी थी। संयुक्त किसान  मोर्चे ने लखीमपुर खीरी कांड के आरोपी के पिता केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री को हटाये जाने का जो दबाव बनाया था उसे भी केंद्र सरकार ने कोई भाव नहीं  दिया। इसी तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानूनी गारंटी दिए बिना आंदोलन खत्म न करने वाली जिद भी पूरी नहीं हुई। प्रधानमंत्री ने इस हेतु समिति बनाने की घोषणा की जिस पर संयुक्त किसान मोर्चे ने इस शर्त पर सहमति दी कि उसमें केवल उनके मोर्चे के सदस्य रहेंगे लेकिन गत दिवस जिस पत्र के बाद आन्दोलन खत्म करने की घोषणा हुई उसमें साफ लिखा है कि राज्य सरकारों के अलावा अन्य किसान संगठनों के प्रतिनिधि और कृषि विशेषज्ञ भी उसमें होंगे। समिति निर्णय करने हेतु कितना समय लेगी और सरकार तथा किसान उसकी सिफारिशों को मान लेने बाध्य होंगे ये भी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में  सोचने वाला मुद्दा है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीनों कानूनों के क्रियान्वयन  पर रोक लगा देने के बाद किसान नेता हठयोग का प्रदर्शन छोड़ आन्दोलन स्थगित करते हुए  सरकार के साथ सकारात्मक माहौल में बातचीत जारी रखते तब शायद वे इससे ज्यादा और जल्दी हासिल करने में सफल रहते। 700 से ज्यादा जिन किसानों की मौत आन्दोलन के दौरान बताई जा रही है उसके लिए सरकार से मुआवजा लेने की  मांग करने वाले किसान नेताओं को इस बात के लिए प्रायश्चियत करना चाहिए कि उनके द्वारा भावानाएं भड़काए जाने और धरना स्थल पर जरूरत से ज्यादा भीड़ जमा करने से हुई  बदइन्तजामी भी अनेक किसानों की जान ले बैठी। अब जबकि आन्दोलन औपचारिक तौर पर समाप्त हो गया है तब उसकी समीक्षा करने पर ये कहना गलत न होगा कि देश का किसान जहाँ एक साल पहले था वहीं आज भी खड़ा है और जो विजयोल्लास मनाया जा रहा है वह दरअसल राकेश टिकैत नुमा कुछ चेहरों के अहं की संतुष्टि बनकर रह गया। जैसा कि संयुक्त किसान मोर्चे के तमाम नेता स्वीकार कर रहे हैं कि असली मांग तो न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप देने की थी। बाकी मांगें तो तात्कालिक तौर पर सामने आईं जिनका पूरा होना उतना कठिन नहीं था जितना  हल्ला मचाया गया। अनेक कृषि विशेषज्ञ भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि यदि किसान संगठन न्यूनतम समर्थन मूल्य पर इतनी लम्बी लड़ाई लड़कर सफलता हासिल करते तब शायद कृषि कानून लागू होने के बाद भी कारगर न हो पाते। लेकिन पंजाब में बिचौलियों के हाथ से कृषि उपज मंडियों का कारोबार छिन जाने के भय से कृषि कानूनों का विरोध शुरू हुआ। चूंकि राज्य के राजनेताओं को ये आढ़तिया आर्थिक मदद करते हैं इसलिए कांग्रेस और अकाली दल दोनों ने कानूनों के विरोध को प्रायोजित किया परन्तु  दिल्ली आने के बाद उसकी बागडोर राकेश टिकैत और योगेन्द्र यादव जैसों ने छीन ली। इसमें दो राय नहीं है कि पंजाब के गुरुद्वारे व्यवस्था अपने हाथ न लेते तब दिल्ली में धरना इतना लम्बा नहीं चलता। पंजाब-हरियाणा, उत्तराखंड, उ.प्र और राजस्थान के जो किसान धरना स्थल से जा रहे हैं उनसे आन्दोलन की उपलब्धि पूछने पर वे इधर-उधर देखने लगते हैं क्योंकि उनके पास उस प्रश्न का कोई जवाब नहीं है। इसी तरह श्री टिकैत अब कह रहे हैं कि उ.प्र के गन्ना किसानों के भुगतान और बिजली बिलों  की समस्या के लिए योगी सरकार से बात करेंगे। सवाल ये भी है कि इस आन्दोलन से दिल्ली के प्रवेश मार्ग पर अवरोध उत्पन्न होने के कारण प्रतिदिन लाखों लोगों को जो तकलीफ हुई और कारोबारियों को करोड़ों का नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कौन करेगा? संयुक्त किसान मोर्चा को जीत का जश्न मनाने का पूरा अधिकार है लेकिन साथ ही उसको जनता और व्यापारियों से क्षमा याचना के साथ ही  पूरे देश से गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर राष्ट्र ध्वज और स्वाधीनता के उत्सव के प्रतीक स्थल के अपमान के लिए खेद भी जताना चाहिए । केंद्र सरकार ने किसानों की मांगों के समक्ष झुकने की जो रणनीति अपनाई वह हालात से उत्पन्न मजबूरी थी या उसके पीछे कुछ और है ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन इतना तो साफ़ है कि सरकार ने रणछोड़ दास की भूमिका का निर्वहन कर किसान नेताओं से बिना बात किये उनको धरना स्थल खाली करने राजी कर लिया। जहाँ तक न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात है तो उसके लिए बनी समिति कब और कितने समय में निर्णय तक पहुंचेगी इस बारे में कोई ठोस बात न होना ये साबित करता है कि कानून वापिस लिए जाते ही आन्दोलन अपना जोश खो चुका था। राकेश टिकैत यदि अब भी अड़े रहते तो बड़ी बात नहीं धरना स्थल पर केवल वे  और उनके साथी ही नजर आते।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 December 2021

हेलीकाप्टर तो और भी आ जाएंगे पर किसी फौजी का जाना अपूरणीय क्षति है


हेलीकाप्टर तो एक मानव निर्मित मशीन है जो पैसे से बनाई और खरीदी जा सकती है। लेकिन सेना का एक प्रशिक्षित जवान तैयार करने में जितना समय और प्रशिक्षण लगता है उसका पैसे से मूल्यांकन संभव नहीं है। और जिस हेलीकाप्टर पर देश की तीनों सेनाओं का प्रमुख सवार हो , यदि वह दुर्घटनाग्रसित हो जाए तथा एक को छोड़ उसमें सवार शेष सभी सैन्य अधिकारी और सैनिक जान गँवा बैठें तो उस क्षति का आकलन करना असम्भव है। गत दिवस तमिलनाडु की कुन्नूर घाटी में सेना का एक अत्याधुनिक हेलीकाप्टर दुर्घटना का शिकार हो गया जिसमें देश के चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ जनरल बिपिन रावत और उनकी पत्नी के अलावा सेना के अनेक अधिकारी तथा निचले स्तर के सैन्यकर्मी थे। कुल 14 लोगों में से केवल एक ही जीवित बच सका। हादसे का प्रारम्भिक कारण खराब मौसम बताया जा रहा है। हालाँकि सरकार और सेना द्वारा गठित उच्चस्तरीय जाँच टीम की रिपोर्ट आने तक पक्के तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी किन्तु विश्व के बेहतरीन सैन्य हेलीकाप्टर का इस तरह दुर्घटनाग्रस्त हो जाना चिंता का विषय है। इसका उपयोग कारगिल युद्ध में भी सफलतापूर्वक किया जा चुका था। अति विशिष्ट व्यक्तियों के आवागमन हेतु इसकी सेवाएँ ले जाती हैं और अनुभवी पायलट ही इसे उड़ाते हैं। प्रधानमन्त्री के लिए भी इसका प्रयोग होने की जानकारी आई है। जो पायलट उक्त हेलीकाप्टर उड़ा रहे थे वे भी काफी अनुभवी बताये जा रहे हैं। इसलिए ये माना जा रहा है कि मानवीय गलती की सम्भावना बेहद कम है। एमआई श्रेणी का ये हेलीकाप्टर तकनीकी दृष्टि से इतना उन्नत है कि उसे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सुरक्षित उतारा जा सकता है। ये सब देखते हुए दुर्घटना की तह में जाना सेना के लिए भी बहुत जरूरी है। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो तीनों सेनाओं के मुखिया जनरल रावत की इस तरह से मृत्यु से देश को जो क्षति हुई उसकी पूर्ति बेहद कठिन होगी। वे इस ओहदे को सुशोभित करने वाले वाले पहले सैन्य अधिकारी थे। थल सेनाध्यक्ष बनने से पूर्व भी श्री रावत ने सेना के विभिन्न पदों पर रहते हुए जिस जिम्मेदारी, साहस और सूझबूझ का परिचय दिया वह उन्हें उच्चस्तरीय सैनिक साबित करने के लिए पर्याप्त थी। पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवादियों के हमले के जवाब में भारतीय कमांडो सैनिक सीमा पार बैठे आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट करने घुसे और सफल होने के बाद बिना किसी मानवीय हानि के सुरक्षित लौट आये। उस सर्जिकल स्ट्राइक के पहले म्यांमार की सीमा में घुसकर आतंकवादी दस्तों को मार गिराने का पराक्रम भी उनकी अगुआई में किया गया। ये कहना गलत न होगा कि उसके बाद ही बालाकोट जैसी सर्जिकल स्ट्राइक करने का हौसला हमारी सेना और राजनीतिक नेतृत्व में पैदा हुआ। भारत में जनरल करिअप्पा और जनरल मानेक शॉ नामक दो फील्ड मार्शल हुए लेकिन तीनों सेनाओं के प्रमुख का जो पद लंबे समय से विचाराधीन था उसे मोदी सरकार ने सृजित किया और थल सेनाध्य्क्ष पद से निवृत्त होते ही जनरल रावत को देश का पहला चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ नियुक्त कर उनकी योग्यता और अनुभव का लाभ लेने का रास्ता साफ़ किया। श्री रावत का थल सेनाध्यक्ष और बतौर सीडीएस कार्यकाल ऐसा रहा जब सीमा पर पाकिस्तान और चीन दोनों ने बड़े पैमाने पर आक्रामक रवैया दिखाया। चीन के साथ तो लद्दाख सेक्टर में काफी हद तक युद्ध के हालात बन गये थे। उसकी शह पर नेपाल तक भारत को ऑंखें दिखाने लगा । लेकिन जनरल रावत ने संकट की उन घडिय़ों में सेना का नेतृत्व जिस आत्मविश्वास से करते हुए आक्रामक शैली में चीन, पाकिस्तान और नेपाल को कड़ा जवाब दिया उससे पूरे विश्व में भारतीय सैन्य बल और कुशल नेतृत्व की धाक जमी। विशेष रूप से चीन के साथ लगी सीमा पर जिस तरह की मोर्चेबंदी भारत द्वारा की गई वह राजनीतिक नेतृत्व की दृढ़ता के साथ ही जनरल रावत के लम्बे अनुभव और साहसिक स्वभाव का परिणाम ही थी। मृत्यु से ठीक पहले उन्होंने जैविक हथियारों के उपयोग के प्रति जो चिंता व्यक्त की वह भविष्य को देख पाने की उनकी क्षमता का प्रमाण है। उनके कार्यकाल में सेना के आधुनिकीकरण के साथ ही साजो-सामान की दृष्टि से आत्मनिर्भरता जैसी उपलब्धि भी हासिल हुईं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि 2004 से 2014 तक के यूपीए सरकार के कार्यकाल में रक्षा सौदों पर विवाद की जो छाया पड़ी रही उसके कारण सेना के तीनों अंगों की मारक क्षमता पर बुरा असर पड़ा था। नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही इस कमी को पूरा करने का बीड़ा उठाया जिसकी वजह से ही आज भारतीय सेना चीन जैसी महाशक्ति को उसी की शैली में जवाब देने का साहस जुटा सकी। इस उपलब्धि का काफी श्रेय श्री रावत को भी जाता है जिनके बारे में ये प्रसिद्ध रहा कि वे युद्ध का अर्थ केवल जीत ही मानते थे। यही कारण है कि असमय और दुर्भाग्यपूर्ण हालत में उनका निधन होने से पूरे देश में शोक की लहर व्याप्त है। भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में सेना प्रमुखों का जनता से सीधा जुड़ाव नहीं होता। पड़ोसी पाकिस्तान की तरह पद पर रहते हुए सेनाध्यक्ष राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते। चुनी हुई सरकार के प्रति वफादारी सेना का चारित्रिक गुण है। इसी के साथ ये कहना भी पूरी तरह सही है कि राजनीतिक नेतृत्व भी सेना के उच्च अधिकारियों को पूरा सम्मान देता है। इसी का परिणाम है कि नेताओं के प्रति जनता की धारणा भले बदलती रहे लेकिन सेना की वर्दी धारण करने वाले सैनिक से लेकर सेनाध्यक्ष तक को हर देशवासी सम्मान देता है। जनरल रावत के निधन पर आम जनता की जो प्रतिक्रिया आ रही है उससे यह पूरी तरह से प्रमाणित भी हो गया। उनके साथ हेलीकाप्टर में उनकी पत्नी के साथ जितने भी सैन्य अधिकारी और जवान थे सब देश की सेवा के प्रति समर्पित रहे। ऐसे में जितना नुकसान श्री रावत के जाने से हुआ उतना ही उन सबके न रहने से होगा क्योंकि सेना दरअसल सेनापति और सैनिक की सामूहिक शक्ति से बनती है। इसीलिए ये हादसा दोहरी चिंता का विषय है क्योंकि जो हेलीकाप्टर इसका कारण बना एक तो वह तकनीकी दृष्टि से उच्च कोटि का होने से अति विशिष्ट लोगों के आवगमन हेतु उपयोग में आता रहा और दूसरी ये कि सेना ने अपने बेहद अनुभवी और योग्य सेनापति के साथ कुछ अधिकारियों और जवानों को भी खो दिया जिन्हें तैयार करने में केवल धन ही नहीं, बरसों का समय और मेहनत लगती है। इस लिहाज से ये देश के लिए गहन शोक की घड़ी है। हर देशवासी की आंख उन फौजियों के सम्मान में नम है जिन्होंने सुख-सुविधाओं की जि़न्दगी छोड़ देश की रक्षा करने जैसा चुनौतीपूर्ण दायित्व ग्रहण किया।
भारत माता के इन सपूतों को अश्रुपूरित श्रद्धान्जलि।

Wednesday, 8 December 2021

नेताओं का वीआईपी इलाज तो सरकारी खर्च पर हो जायेगा लेकिन ...



अब इस बारे में किसी भी प्रकार के शक की गुंजाईश नहीं रह गई कि कोरोना का नया संस्करण ओमिक्रोन भारत में विधिवत प्रवेश कर चुका है | ये बात भी सामने आई है कि विदेशों से आ रहे यात्री ही इसके संवाहक बन रहे हैं | कोरोना की विदाई के प्रति आश्वस्त अनेक लोगों में इस नए संक्रमण को लेकर सतर्कता भी दिखाई देने लगी है | अपने और दूसरों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहने वाले जिम्मेदार किस्म के लोग मास्क सहित अन्य सावधानियों  का पालन भी करने लगे हैं | लेकिन ऐसे लोगों की संख्या उँगलियों पर गिनने योग्य ही है | हालाँकि सरकारी स्तर पर हो रही हलचल से ये तो लगता है कि दूसरी लहर के कटु अनुभवों को सरकारी अमला अब तक भूला नहीं है किन्तु इसी के साथ ये भी समझने वाली बात है कि  तमाम चेतावनियों के बावजूद राजनीतिक पार्टियां इस बारे में बेहद लापरवाह या यूँ कहें कि असहयोगात्मक  हैं | आज ही म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोगों को तीसरी लहर के प्रति आगाह करते हुए सतर्कता बरतने कहा जिससे लॉक डाउन की स्थिति न आये | दूसरी तरफ इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी साफ़  शब्दों में कहा है कि यूरोप में ओमिक्रोन का कहर जारी रहने से भारत में सतर्कता न रखी गई तो तीसरी लहर का आना अवश्यम्भावी है जो पहले से भी ज्यादा खतरनाक हो सकती है क्योंकि इस संक्रमण की चपेट में बच्चे भी  आ रहे हैं | भारत में अभी तक बच्चों को कोरोना का टीका लगाये जाने की तैयारी ही चल रही है और देश के बड़े हिस्से में शिक्षण संस्थान खोल दिए गये हैं | कोरोना काल  में लगाई गईं अधिकतर पाबंदियां तो पहले ही हटाई जा चुकी हैं जिसके कारण बाजार ,  मॉल , सिनेमागृह आदि में लोगों की आवाजाही शुरू हो  चुकी है | शादी जैसे अन्य  आयोजनों में उपस्थित जनों की संख्या को सीमित रखने संबंधी आदेश भी वापिस ले लिया गया है | ऐसे में जनजीवन पूरी तरह सामान्य हो चला है | रेल गाड़ियों में भी पूर्ववत भीड़ नजर आ रही है जिसकी वजह से आरक्षित  टिकिट में प्रतीक्षा सूची की नौबत आने लगी है | अर्थव्यवस्था की दृष्टि से ये सब शुभ संकेत हैं किन्तु कोरोना संक्रमण के नए रूप के सामने आने के बाद चिकित्सा जगत और वैज्ञानिक जिस तरह की चेतावनियाँ लगातार दे रहे हैं उनके मद्देनजर ये देखने पर  कि सामाजिक जीवन की वे कौन सी गतिविधियाँ हैं जिनमें कोरोना संबंधी शिष्टाचार की  सबसे ज्यादा धज्जियाँ उड़ाई  जाती हैं तो राजनीतिक जलसों पर ही नजर जाती है | चूँकि उन पर रोक – टोक का साहस  प्रशासन में नहीं होता इसलिए नेता और उनके उत्साही समर्थक पूरी तरह स्वछंद हो जाते हैं | इसी वर्ष की शुरुवात में प.बंगाल सहित चार राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए तब कोरोना की पहली लहर बिदाई के कगार पर थी किन्तु जब देश भर के दिग्गज नेता चुनाव मैदान में उतरकर सभा और रैलियों के माध्यम से प्रचार करने उतरे तब भारी भीड़ उनको सुनने और देखने आई |  सबसे लंबा चुनाव प. बंगाल का था जिसके आधे चरण पूरे होते – होते  ही कोरोना ने दूसरा हमला कर दिया था | इसे लेकर प्रधानमन्त्री सहित अन्य नेताओं की काफी आलोचना भी हुई | ममता बैनर्जी ने आखिर – आखिर में बचे हुए चरणों का मतदान एक साथ करवाने का आग्रह तक कर  डाला | चुनाव के बाद प. बंगाल में कोरोना का प्रकोप बढ़ा ये किसी से छिपा नहीं है | उल्लेखनीय है तमिलनाडु , पुडुचेरी और केरल में  मतदान एक दिन में ही संपन्न हो गया था | इस विषय को दोहराने का उद्देश्य आगामी वर्ष फरवरी माह में उ.प्र , उत्तराखंड , पंजाब , मणिपुर और गोवा में होने जा रहे विधानसभा चुनाव और कोरोना की तीसरी लहर के संयोग पर ध्यान आकर्षित करना है | इन राज्यों में चुनावी तैयारियों के मद्देनजर राजनीतिक गतिविधियाँ पूरे शबाब पर हैं | नेताओं की यात्रायें और रैलियां जमकर हो रही हैं |  सरकारी जलसों में नए विकास कार्यों का शिलान्यास और पूरे हो चुके प्रकल्पों का उद्घाटन किया जा रहा है | ज्यों – ज्यों चुनाव की तारीख नजदीक आयेगी राजनीतिक सरगर्मियां भी बढेंगी जिनके वजह से भीड़भाड़ होना स्वावाभाविक होगा | पिछले अनुभव बताते हैं कि राजनीतिक जलसों में कोरोना संबंधी सावधानियों के प्रति जबर्दस्त उपेक्षा भाव नजर आता है | जनता तो छोडिये , नेता गण खुद उनका पालन नहीं करते | चूंकि चुनाव आयोग इस बारे में पूरी तरह अधिकारविहीन है इसलिए राजनेताओं को किसी भी प्रकार का भय भी नहीं रहता | इस बारे में सबसे प्रमुख  बात  गंभीरता से विचारयोग्य है  कि उ.प्र देश का सबसे अधिक आबादी वाला प्रदेश है जहाँ घनी बसाहट होने से शारीरिक दूरी का पालन करना असंभव होता है | इसी तरह पंजाब में विदेशों से आने - जाने    वालों की संख्या काफी है जिससे वहां संक्रमण की आशंका वैसे भी  ज्यादा है | उत्तराखंड में भी  जनवरी – फरवरी महीना त्यौहारों और यात्राओं  का होता है | गोवा में  इन महीनों में विदेशी पर्यटकों की भरमार के होने से वहां सतर्कता की बेहद जरूरत है | ऐसे में इन राज्यों में  चुनाव की तैयारियों में जुटा प्रशासन तीसरी कहर से बचाव के उपाय किस तरह कर सकेगा ये यक्ष प्रश्न है | सत्ता में बैठे नेतागण भी चुनावी अभियान के कारण इस तरफ ज्यादा ध्यान देने में असमर्थ होंगे | और फिर  आचार संहिता लग जाने से भी शासन का काम प्रभावित होता ही है | इन सब हालातों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग को चाहिए वह सर्वदलीय बैठक बुलाकर उक्त राज्यों के चुनाव टालने पर सहमति बनाये | देश के करोड़ों  लोग इन राज्यों में रहते हैं |  यदि चुनाव के दौरान तीसरी लहर का विस्फोट हुआ तो लेने के देने पड़ जायेंगे | और फिर जो सरकारी अमला चुनाव प्रबंध में जुटता है उसकी जान भी फालतू तो हैं नहीं | स्मरणीय है उ.प्र  के पंचायत चुनाव में बड़ी संख्या में उन सरकारी कर्मचारियों की जानें गईं थी जो मतदान केन्द्रों पर तैनात थे | अब जबकि केंद्र से लेकर राज्य और इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन तक ओमिक्रोन के आने की पुष्टि करते हुए जनवरी – फरवरी में सबसे ज्यादा संक्रमण होने के प्रति आगाह कर ही रहे हैं तब पांच राज्यों के  चुनाव आग में घी डालने की कोशिश होगी | राजनीतिक जमात इस सुझाव को संविधान और लोकतंत्र विरोधी बताकर विरोध व्यक्त करने में पीछे नहीं  रहेगी किन्तु संविधान जिन  भारत के लोगों के लिए बनाया गया है उनके प्राण खतरे में डालकर किसी प्रक्रिया को पूरा करने की जिद जनविरोधी है | इस बारे में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि बीमार होने पर नेताओं का इलाज तो वीआईपी के तौर पर देश – विदेश में सरकारी खर्च पर हो भी जाता है लेकिन आम जनता को पैसे होने के बाद भी अस्पताल में बिस्तर नसीब हो सकेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है | पिछले अनुभवों के बाद भी यदि  कोई सबक न लिया गया तब ये मान लेने में कुछ भी गलत न होगा कि राजनीतिक नेता आम जनता को कीड़े –मकोड़े से ज्यादा नहीं समझते |                                                                                                                                  -रवीन्द्र वाजपेयी                                                

Tuesday, 7 December 2021

मध्यमवर्ग को घर की मुर्गी समझने की भूल भाजपा को भारी पड़ सकती है



गत दिवस एक छोटी सी खबर आई कि अर्थव्यवस्था कोरोना पूर्व के स्तर से भी बेहतर स्थिति में आ गई है। कृषि क्षेत्र तो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर ही रहा था लेकिन अब औद्योगिक इकाईयोँ में भी उत्पादन बढ़ रहा है और जमीन-जायजाद के व्यवसाय में भी खरीद-फरोख्त बढ़ने के प्रमाण मिलने लगे हैं। ऑटोमोबाइल का व्यवसाय जरूर सेमी कंडक्टर की कमी की वजह से ठहरा हुआ है लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि संभवत: फरवरी तक ताइवान से आपूर्ति शुरू होने के बाद कारों और दोपहिया वाहनों के बाजार में भी रौनक आ जायेगी। अर्थव्यवस्था में मजबूती का सबसे बड़ा पैमाना है जीएसटी की वसूली जो बीते कुछ महीनों से निरंतर लक्ष्य से ज्यादा हो रही है और जिसके कारण मौजूदा वित्तीय वर्ष में अनुमानित राशि का 80 फीसदी नवम्बर तक सरकारी खजाने में जमा हो चुका था। इसी से उत्साहित होकर केंद्र और अनेक राज्यों द्वारा दीपावली पर पेट्रोल और डीजल सस्ता किया गया। इसके बाद कोरोना काल में शुरू की गई मुफ्त खाद्यान्न योजना को प्रधानमंत्री ने 31 मार्च 2022 तक बढ़ा दिया। सरकारी गोदामों में अन्न का भरपूर भण्डार होने के साथ ही विदेशी मुद्रा का खजाना भी लबालब है। जैसे संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार वार्षिक विकास दर के अनुमान भी उत्साहवर्धक हैं और विदेशी निवेश भी उम्मीद के मुताबिक आ रहा है। विवाह का सीजन अच्छा – खासा चलने से बाजार में पैसे का आवागमन अपेक्षानुसार ही है। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था पर छाया कोहरा छंटने लगा है। हालाँकि कोरोना की तीसरी लहर और ओमिक्रोन की आशंका से थोड़ी चिंता है लेकिन इस बार चिकित्सा व्यवस्था को चाक-चौबंद किये जाने और बड़े पैमाने पर हो रहे टीकाकरण के कारण नए संक्रमण की भयावहता पूर्वापेक्षा कम रहने का आत्मविश्वास भी कारोबारी जगत पर देखा जा रहा है। कोरोना कल में लगाये गए लॉक डाउन के दौरान ये मांग लगातार उठ रही थी कि सरकार को विकास योजनाओं पर ज्यादा खर्च करना चाहिए ताकि रोजगार बढ़े और जनता की जेब में पैसा आये। उस दृष्टि से देखें तो लॉक डाउन के दौरान भी भारतीय रेलवे ने अपनी विकास परियोजनाओं को जिस तेजी और कुशलता से पूरा किया वह समय के सदुपयोग का अच्छा उदाहरण है और ज्योंही हालात सामान्य हुए त्योंही अधो-संरचना के कार्यों में तेजी आने से औद्योगिक क्षेत्र को बढ़ी हुई मांग का सहारा मिला , वहीं श्रमिकों को भी काम मिलने से उनके हाथ में नगदी आने लगी। केंद्र सरकार ने बीते कुछ समय में राजमार्ग, पुल और फ्लायओवर जैसे प्रकल्पों में जिस तेजी से स्वीकृति प्रदान की उसकी वजह से भी आर्थिक जगत में छाई निराशा काफी हद तक दूर हुई है। लेकिन इस सबके बीच लाख टके का सवाल ये है कि जब सब कुछ अच्छा हो रहा है तब जनता के खाते में उसके लाभ क्यों नहीं पहुँच रहे? कहने का आशय ये है कि किसी भी सरकार का समूचा आर्थिक नियोजन देश के विकास के साथ ही जनता के कल्याण के लिए होता है। उस दृष्टि से देखें तो केंद्र सरकार को कोरोना के दौरान उत्पन्न हुई विषम परिस्थितियों से सफलतापूर्वक निपटने के बाद अब जनता द्वारा उस दौरान दिए गये सहयोग का प्रतिफल उसे देना चाहिए। देश के 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त खाद्यान्न देने की प्रधानमंत्री की दूरगामी सोच को पूरी दुनिया ने सराहा। ये कहना भी गलत न होगा कि यदि वह योजना लागू न की जाती तब लॉक डाउन के दौरान लूटपाट और अराजकता की स्थिति उत्पन्न होने से कोई नहीं रोक सकता था। लेकिन दूसरी तरफ ये बात भी सही है कि गरीबों के अलावा समाज के बहुत बड़े तबके ने लॉक डाउन के दौरान जो कुछ भी भोगा उसकी कड़वी यादें आज भी उसके मानस पटल पर ताजा हैं। सरकारी नौकरी के अतिरिक्त जो मध्यमवर्ग है उसने कोरोना काल में असहनीय परेशानियाँ झेलने के बाद भी सरकार से सहयोग किया। इसमें नौकरीपेशा और छोटे तथा मझोले किस्म के व्यापारी भी हैं। ये कहना पूरी तरह सच है कि इस वर्ग को सिवाय मुफ्त वैक्सीन के और कुछ नहीं मिला। आज जबकि स्थितियां पहले से बेहतर होने के दावे किये जा रहे हैं और उनके आधार पर नई उम्मीदें हिलोरें मारने लगी हैं तब इस बात की आवश्यकता है कि समाज का जो वर्ग दबाव समूह बनाने में असमर्थ है और जिसे वाकई राहत की जरूरत है उसकी तरफ भी सरकार देखे। ये बात सर्वविदित है कि कोरोना काल के बाद ज्योंहीं अर्थव्यवस्था ने गति पकड़ी त्योंही महंगाई भी उसके समानांतर दौड़ने लगी। इसका सबसे ज्यादा असर उस मध्यमवर्ग पर पड़ रहा है जिसके पास आय के सीमित साधन हैं और जिसे न मुफ्त या सस्ती बिजली मिलती है न ही राशन या अन्य सुविधाएँ। ये कहना कदापि गलत न होगा कि इस वर्ग के पास किसानों और सरकारी कर्मचारियों की तरह सरकार से लड़ने की संगठित शक्ति नहीं है और इसीलिए राजनेता भी इसकी समुचित चिंता नहीं करते। कोरोना काल के बाद अर्थव्यवस्था के रफ़्तार पकड़ने के साथ ही मध्यमवर्ग पर महंगाई का जो बोझ आया है उससे राहत दिलवाने की दिशा में सोचना समय की मांग है। सरकार ने जितनी भी कल्याणकारी योजनायें चला रखी हैं उनमें मध्यमवर्ग के लिए कुछ खास नहीं है जिससे सबका विकास का प्रधानमंत्री का नारा गलत साबित हो रहा है। पेट्रोल-डीजल के दामों में जो कमी की गई उससे निश्चित तौर पर राहत मिली है। लेकिन सरकार की सोच वाकई जनता को राहत देने की है तब उसे पेट्रोलियम वस्तुओं को अविलम्ब जीएसटी के दायरे में लाकर जनता के हित में अपनी प्रतिबद्धता साबित करनी चाहिए। भाजपा को ये भरोसा हो चला है कि प्रधानमंत्री की छवि के बलबूते भावी चुनावी वैतरणी पार कर ली जायेगी किन्तु उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक परिवर्तनों में मध्यमवर्ग की भूमिका बहुत ही निर्णायक होती है। ये वर्ग भले ही सड़क पर तम्बू गाड़कर न बैठता हो लेकिन सरकार के बारे में जनमत बनाने में इसकी महती भूमिका रहती है। भाजपा को याद रखना चाहिए कि उसे चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने में इसी मध्यमवर्ग का सबसे ज्यादा योगदान है इसलिए प्रधानमंत्री को इस परम्परागत समर्थक वर्ग के कुशल क्षेम की चिंता भी करनी चाहिए , अन्यथा इसे घर की मुर्गी दाल बराबर समझने की भूल भारी पड़ सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी