Monday, 20 December 2021

पंजाब में खालिस्तानी आतंक के लौटने का खतरा



 जो लोग पंजाब की राजनीति के बारे में जानते हैं उन्होंने ये भी सुना होगा कि नब्बे के दशक में वहां जरनैल सिंह भिंडरावाले नामक जो व्यक्ति  उग्रवाद का प्रवक्ता बन गया था उसे तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने ही ज्ञानी जैल सिंह की राजनीतिक वजनदारी कम करने  के लिए बढ़ावा दिया था किन्तु बाद में वही उनके लिए समस्या बन गया जिसकी दुखद परिणिति अंततः श्रीमती गांधी की नृशंस हत्या के तौर पर सामने आई | उल्लेखनीय है अमृतसर के विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में घुसे बैठे भिंडरावाले को ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार नामक फौजी कार्रवाई में मार गिराया गया था जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप ही श्रीमती गांधी को उनके दो सिख अंगरक्षकों ने ही मार दिया और तब दिल्ली में हुए दंगों में हजारों सिखों की हत्या कर दी गई | धीरे –  धीरे  पंजाब में शांति लौट आई और ऐसा लगने  लगा कि उस दौर को भुला दिया गया है | जिस कांग्रेस से सिख समुदाय बेहद नाराज था उसी की सरकार भी कालान्तर में बनीं और खालिस्तान नामक देश विरोधी आन्दोलन पर भी विस्मृति की धूल जम गई | लेकिन ऐसा लग रहा है राख के नीचे दबी चिंगारी फिर  भड़क सकती है | इसके अनेक संकेत बीते कुछ समय से मिल रहे हैं | 13 अप्रैल 2020 को पटियाला के सनौर नामक स्थान में कोरोना के कारण लगाये गये कर्फ्यू का उल्लंघन कर रहे निहंगों ने उनको रोकने वाले पुलिस इंस्पेक्टर  का हाथ तलवार से काट दिया  और भागकर समीपवर्ती गुरूद्वारे में जा घुसे | बाद में किसी तरह उन्हें पकड़ा जा सका | उनके पास से जो चीजें मिलीं वे किसी धार्मिक व्यक्ति से अपेक्षित नहीं थीं |  उस घटना को साधारण अपराध मानकर भुला देने की जो गलती की गई उसके दुष्परिणाम जल्द सामने आने लगे | तीन कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब  की जत्थेदारियों ने जो आन्दोलन शुरू किया उसका केंद्र बाद में दिल्ली बन गया  |  धरना देने वालों में  चूँकि सिख किसान ज्यादा थे  इसलिए उनके भोजन की व्यवस्था हेतु जो लंगर शुरू हुए उनके जरिये सिखों के बीच घुसे अलगाववादी तत्व भी आन्दोलन का हिस्सा बन बैठे | धरनास्थल पर भिंडरावाले के पोस्टर और खलिस्तानी झंडे जैसे सबूतों की आन्दोलन के नेताओं द्वारा की गई  उपेक्षा के  कारण ही 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर निहंग द्वारा शस्त्र प्रदर्शन  का दुस्साहस किया गया |राष्ट्रध्वज के अपमान और धार्मिक ध्वज फहराए जाने के दृश्य भी पूरे देश ने देखे | किसान नेताओं ने उस घटना की निंदा तो की लेकिन वे उपद्रवी तत्वों को धरना स्थल से हटाने का साहस नहीं जुटा सके | उस आन्दोलन के समर्थन में कैनेडा और ब्रिटेन में जो प्रदर्शन हुए उनमें भी खालिस्तानी नारे लगे | लेकिन जब भी इस बारे  में किसान नेताओं का ध्यान आकर्षित किया गया तो वे बहकी – बहकी  बातें करने लगे | जिससे उपद्रवी तत्वों का हौसला मजबूत हुआ और आन्दोलन के  अंतिम चरण में कुछ निहंगों द्वारा  धार्मिक प्रतीक के अपमान के आरोप में एक व्यक्ति की बेरहमी से हत्या कर दी गयी । उनकी गिरफ्तारी भी बड़ी मुश्किल से हो सकी | उस घटना के बाद योगेन्द्र यादव ने  निहंगों से धरना स्थल खाली  करने की मांग की जिसे  ठुकरा दिया गया  | खैर , किसान आन्दोलन तो खत्म हो गया लेकिन उसकी आड़ में नये सिरे से सिख उग्रवाद का जो बीज पनपा उसका असर सामने आने लगा है | विगत दो दिनों में पंजाब से निहंगों द्वारा बेअदबी के नाम पर की गई हत्याओं की जो खबरें आईं वे इस राज्य में पुराना दौर लौटने की आशंका को मजबूत कर रही हैं | कुछ महीनों बाद  विधानसभा चुनाव होने वाले हैं |  फिलहाल वहां जबरदस्त  राजनीतिक अनिश्चितता है | किसान आन्दोलन के जरिये सक्रिय हुई कुछ जत्थेदारियां राजनीतिक महत्वाकांक्षा के संकेत दे रही हैं | उनके एक नेता ने तो बाकायदे अपने उम्मीदवार उतारने  का ऐलान कर दिया है | सत्ताधारी कांग्रेस अपनी अंतर्कलह से जूझने के काण इस सम्वेदनशील मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रही | उसके प्रदेश अध्यक्ष नवजोत  सिंह सिद्धू  और मुख्यमंत्री के बीच खींचातानी की वजह से  प्रशासनिक व्यवस्था चौपट हो रही है | निहंगों द्वारा बेअदबी के नाम पर की जा रही हत्याओं को केवल धार्मिक कट्टरवाद से जोड़कर देखना गलत होगा क्योंकि अतीत में जो कुछ हो चुका है उसके मद्देनजर इन घटनाओं की उपेक्षा पंजाब को एक बार फिर अलगाववाद की  आग में झोंकने का कारण बन सकती है | आश्चर्य की  बात है लिंचिंग  के मामले में चिल्लाने वाली कांग्रेस अपने शासन वाले राज्य में धार्मिक उन्माद के विरुद्ध बोलने से डर रही है | ये कहना भी गलत न होगा कि किसान आन्दोलन का सहारा लेकर पंजाब में धार्मिक कट्टरवादी गुटों और अलगाववादी ताकतों का अघोषित गठबंधन आंतरिक शान्ति के लिए बड़ा खतरा बनने जा रहा है | चुनाव तो आते – जाते रहेंगे लेकिन पंजाब देश का सीमावर्ती राज्य होने से बेहद संवेदनशील है |  खालिस्तानी आतंक को प्रश्रय और प्रशिक्षण देने में पाकिस्तान की  सक्रिय भूमिका किसी से छिपी नहीं है | ये भी ध्यान देने योग्य है कि भारत के विरुद्ध छद्म युद्ध लड़ने की जो रणनीति बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तान ने बनाई थी उसी के तहत अस्सी और नब्बे के दशक में पंजाब में आतंकवाद की शुरुवात हुई थी | जिसके  नियंत्रण में आते ही पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देने की योजना पर अमल किया | धारा 370 हटने के बाद बीते दो वर्ष में वहां के  हालात पर काफी हद तक काबू किया जा सका  , जिससे पाकिस्तान परेशान हो उठा | ऐसा लगता है उसने उसके बदले पंजाब की धरती में दबे पड़े खालिस्तान के बीज को पुनः दाना - पानी देने की कार्ययोजना बनाई है | निहंगों का अचानक बदला व्यवहार बेअदबी के नाम पर किया जाने वाला उन्माद न होकर किसी बड़े षडयंत्र का सूत्रपात हो तो आश्चर्य नहीं होगा | इसके जरिये पंजाब में सिख और हिन्दुओं के बीच खाई पैदा करने का खतरनाक खेल भी हो सकता है | निहंग  , सिखों के संघर्षशील इतिहास का प्रतीक हैं  | लेकिन हाल  की  घटनाओं में उनमें से कुछ का आचरण ये साबित कर रहा है कि वे   सिख गुरुओं के बताये रास्ते से भटककर आतंक  और स्वेच्छाचरिता के प्रतीक बन बैठे हैं | सिख समुदाय में जो विवेकशील लोग हैं उनको निहंगों के इस आतंक के विरूद्ध आवाज उठानी चाहिए | गुरूद्वारों को उनकी पवित्रता और सिख समाज को उसकी  सेवा भावना के लिए पूरी दुनिया में सम्मान की नजर से देखा जाता है | ऐसे में कतिपय निहंगों द्वारा की जा रही हत्याओं से सिख कौम की  छवि पर आंच न आये ये देखा जाना जरूरी है | राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे अपने क्षणिक स्वार्थवश इस आग को भड़काने से बाज आयें वरना  उनके हाथ भी जले बिना नहीं रहेंगे | अतीत की गलतियों की मंहगी कीमत चुकाने के बाद भी  उसे दोहराना किसी दल या नेता से ज्यादा इस देश के लिए हानिकारक होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 December 2021

मंत्री का त्यागपत्र : सरकार और भाजपा दोनों चूक गये



केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे पर लखीमपुर खीरी में चार किसानों को अपने वाहन से कुचलकर मार देने के मामले में विशेष जाँच दल की रिपोर्ट पर गैर इरादतन हत्या को बदलकर इरादतन हत्या का आरोप लगाये जाने के बाद मंत्री के त्यागपत्र की मांग तेज हो गई है। अभी तक तो किसान आन्दोलन में ही ये मुद्दा शामिल था लेकिन अब संसद के भीतर विपक्ष इसे लेकर आक्रामक हो चला है। खबर है श्री मिश्र को दिल्ली आने का निर्देश दिया गया है जिससे लगता है सरकार के साथ ही भाजपा का नेतृत्व उनके पद पर बने रहने से होने वाले नफे-नुकसान का हिसाब लगाकर कोई निर्णय लेने वाला है। इस विवाद के छींटे मंत्री पर न पड़े होते यदि वे घटना के बाद अपने पुत्र के बचाव में आकर ये न कहते कि वह तो घटनास्थल पर था ही नहीं। इसके बदले यदि उनके द्वारा कहा गया होता कि जो भी दोषी हो उसे दंड मिलना चाहिए चाहे वो मेरा बेटा ही क्यों न हो तो वे प्रशंसा के पात्र बन जाते। उनके पुत्र की गिरफ्तारी में भी उ.प्र पुलिस ने जो समय लगाया उससे भी मंत्री और पार्टी दोनों बदनाम हुए। इस घटना को राजनीतिक चश्मा उतारकर देखा जाना ही सही होगा। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के रूप में श्री मिश्र की जिम्मेदारी देश में कानून व्यवस्था बनाये रखने की है। लेकिन उनके अपने क्षेत्र में उनके बेटे द्वारा चार किसानों की निर्दयता पूर्वक हत्या कर देना उनके लिए दोहरी शर्म का विषय था। लेकिन उन्होंने पुत्र मोह में आकर त्यागपत्र देना तो दूर एक अपराधी का बचाव करने की हिमाकत कर डाली। कहा जाता है भाजपा नेतृत्व भी उनको मंत्रीपद से हटाने का निर्णय करने में इसलिए आगे-पीछे होता रहा क्योंकि उसे डर था कि वैसा करने से उस इलाके के ब्राह्मण मतदाता नाराज हो जायेंगे। घटना के फौरन बाद अनेक ब्राह्मण संगठनों ने मंत्री के पक्ष में पोस्टरबाजी भी की। लेकिन जब वीडियो में उनके बेटे की वहां मौजूदगी प्रमाणित हो गई जिसके द्वारा चार किसानों को कुचला गया तब उसकी गिरफ्तारी के सिवाय कोई चारा नहीं बचा था। श्री मिश्र द्वारा पद पर बने रहने का सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि कुचलकर मारे गए चार किसानों की मौत के बाद आक्रोशित भीड़ ने प्रतिहिंसा में जिन चार भाजपा कार्यकर्ताओं को पीट-पीटकर मार डाला उनकी मौत पर उपेक्षा का पर्दा पड़ गया। जबकि जितना बड़ा अपराध चार किसानों की हत्या थी उतनी ही जघन्यता चार भाजपा कार्यकर्ताओं की ह्त्या में बरती गई। लेकिन किसान आन्दोलन के शोर में उन चारों की मौत पर न किसान नेता रोये और न ही भाजपा नेतृत्व उसे मुद्दा बना पाया। और इसका कारण अपने पुत्र की निर्दयता के बाद भी श्री मिश्र का पद पर बने रहने से उपजा अपराधबोध ही था। अब जबकि किसान आन्दोलन मैदानी रूप से खत्म हो चुका है और मंत्री पुत्र पर जानबूझकर हत्या की धारा भी लग चुकी है तब होना तो ये चाहिये था कि श्री मिश्र खुद आगे आकर ये कहते कि वे अदालत के फैसले तक मंत्री नहीं रहेंगे किन्तु जैसा ज्ञात हुआ है वे असंतुलित होकर अमर्यादित व्यवहार करने लगे हैं। भाजपा नेतृत्व ने उनको दिल्ली बुलाया है तो जाहिर तौर पर बात उनको मंत्री पद से हटाये जाने से ही जुड़ी हुई होगी। संसद में विपक्ष के हंगामे से भी सरकार की छवि पर आंच आ रही है। हो सकता है अभी तक विशेष जांच दल की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा हो किन्तु अब जबकि मंत्री पुत्र पर इरादतन हत्या की धारा भी लगा दी गई तब किसी असमंजस की गुंजाईश ही नहीं रही। ये बात बिलकुल सही है कि आरोप लग जाने मात्र से अपराध प्रमाणित नहीं हो जाता, जब तक न्यायालय उसकी पुष्टि करते हुए आरोपी को दण्डित न कर दे। लेकिन लोकतान्त्रिक व्यवस्था क़ानून के अलावा परम्पराओं पर भी आधारित होती है और उसमें नियमों के समानांतर नैतिकता को भी बराबर का महत्व दिया जाता है। ऐसे में श्री मिश्र को तत्काल पद त्याग देना चाहिये था क्योंकि वे जिस विभाग के राज्य मंत्री हैं उसके अंतर्गत पुलिस भी आती है और केंद्र के साथ ही राज्य में भी उन्हीं की पार्टी का शासन है। उल्लेखनीय है भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे बंगारू लक्षमण किसी से नगदी लेते कैमरे में कैद हो गये थे। ज्योंही वह वीडियो सार्वजनिक हुआ पार्टी ने उनको हटा दिया। केन्द्रीय मंत्री एम. जे. अकबर पर भी एक महिला ने बरसों पहले उनके साथ आपत्तिजनक व्यवहार का आरोप लगाया तो उनको सरकार से हटा दिया गया। यद्यपि वे बाद में निर्दोष साबित हुए। ऐसे फैसले पार्टी और सरकार के साथ ही संदर्भित व्यक्ति की छवि सुधारने में सहायक बनते हैं। उस दृष्टि से श्री मिश्र और भाजपा दोनों ने गलती कर दी। अब विपक्ष के दबाव में वे पद से हटाये जाते हैं तो भी जो नुकसान उन्हें और पार्टी को हो चुका उसकी भरपाई आसानी से नहीं हो सकेगी। किसान आन्दोलन के दबाव में प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानून वापिस ले लिए और अन्य मांगें भी मंजूर कर लीं। श्री मिश्र के त्यागपत्र की मांग भी किसान नेताओं द्वारा की गई थी। हालांकि बाद में वे ठन्डे पड़ गए लेकिन अब विपक्ष ने संसद में मोर्चा सम्भाल लिया है। संसद का कामकाज भी इससे प्रभावित हो रहा है। बेहतर होगा प्रधानमंत्री और भाजपा नेतृत्व इस बारे में तुरंत निर्णय लेकर श्री मिश्र को मंत्री पद से हटायें। ऐसे मामलों में राजनीति से परे नैतिकता के आधार पर फैसले लिए जाने चहिये। पार्टी विथ डिफरेंस का दावा करने वालों से तो कम से कम ये अपेक्षा की ही जा सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 December 2021

सऊदी अरब के बाद अब किसी और के प्रमाणपत्र की क्या जरूरत



सऊदी अरब को इस्लाम का संरक्षक देश माना जाता है। दुनिया भर के मुसलमान जिस मक्का में हज करने जाते हैं वह यहीं स्थित है। इस देश की अर्थव्यवस्था में हज यात्रियों से होने वाली करोड़ों रु. की सालाना आय का बड़ा योगदान है। कच्चे तेल के अकूत भंडारों के कारण ये अरब जगत के सबसे समृद्ध मुल्कों में से एक है। यहाँ अभी भी राजतन्त्र है और शाही परिवार का ही देश पर शासन है। इस्लामी परम्पराओं और कानूनों का कड़ाई से पालन करने वाले इस देश में महिलाओं पर तरह-तरह की पाबंदियां थीं। हाल ही में सऊदी अरब सरकार ने 18 साल से ऊपर की लड़कियों को अकेले विदेश यात्रा करने, बिना अभिभावक की अनुमति के शादी करने, कार चलाने और महिला फ़ुटबाल लीग शुरु करने जैसी आजादी दी है। इसे इस्लामिक जगत में आये बड़े बदलाव के तौर  पर देखा जा रहा है क्योंकि इस्लाम के नाम पर सबसे कट्टर शासन इसी देश में  है। ये बात भी जगजाहिर है कि दुनिया भर में मस्जिदों के नवीनीकरण के साथ इस्लाम के फैलाव के लिए सऊदी अरब से बड़ी मात्रा  में जो आर्थिक सहायता आती है उसका उपयोग आतंकवादी संगठनों द्वारा होता है। ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी को पैदा करने का काम सऊदी अरब द्वारा ही किया गया था। उसके अलावा और भी इस्लामी आतंकवादी गुट उसकी मदद से पलते रहे हैं। दूसरी तरफ अरब जगत में सऊदी अरब ही वह देश है जिसके अमेरिका से बहुत करीबी रिश्ते रहे हैं। शाही परिवार के अरबों डालर अमेरिकन कम्पनियों  में निवेश होने की बात भी सर्वविदित है। इसे लेकर प. एशिया के अनेक कट्टर  इस्लामी देश सऊदी अरब के विरोध में भी आवाज उठाते  रहे है।  फिलिस्तीन का समर्थन करने के बावजूद सऊदी अरब ने इजरायल से रिश्ते सुधारने की पहल की जिसे बाद में यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) ने भी अपनाया। दरअसल बीते कुछ समय से सऊदी अरब अपनी कट्टर छवि को सुधारकर उदारवादी चेहरा दुनिया के सामने पेश करने की कोशिश में जुटा हुआ है। महिलाओं को दी जा रही छूट के पीछे भी यही वजह मानी जा रही है। इस बारे में एक बात और जो सुनने मिली है वह है आगामी दस सालों में कच्चे तेल की मांग में आने वाली गिरावट। दुनिया भर में जिस तेजी से बैटरी चलित वाहनों का चलन बढ़ रहा है और पर्यावरण के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है उसे देखते हुए सऊदी शासकों को भी ये लगने लगा है कि धरती के भीतर से निकलने वाले कच्चे तेल रूपी जिस सोने  के बलबूते बीती एक सदी में उनका देश मालामाल हो गया उसकी मांग घटने के पहले ही आय के वैकल्पिक स्रोत तैयार कर लिए जावें। यूएई का उदाहरण उसके सामने है जिसने कच्चे तेल की बिक्री के अलावा अपने देश को पर्यटन और विदेशी निवेश के लिए खोलकर अनाप – शनाप कमाई से भविष्य के लिए मजबूत बुनियाद तैयार कर डाली। महिलाओं को सामाजिक तौर पर अनेक तरह की पाबंदियों से मुक्ति  देने के बाद सऊदी सरकार ने तबलीगी जमात नामक वहाबी संगठन को शुक्रवार की नमाज के पहले मस्जिदों से हट जाने का हुक्म देते हुए उसको आतंकवाद का द्वार निरूपित कर दिया। उल्लेखनीय है खुद सऊदी अरब इस्लाम में वहाबी धारा का पालक-पोषक माना जाता है। तबलीगी जमात की शुरुवात 1927 में भारत से हुई और आज भी इसका मुख्यालय भारत में ही है। गत वर्ष कोरोना के फैलाव के आरोप में इसके दिल्ली स्थित मुख्यालय पर छापा मारकर पूरे देश में जमातियों की धरपकड़ की गई थी। उन पर आरोप था कि दिल्ली स्थित मरकज में देश-विदेश के हजारों वहाबियों के जमा रहने से कोरोना फैला। बहरहाल सऊदी अरब का फैसला चौंकाने वाला है। तबलीगी जमात का काम पूरे विश्व में फैला हुआ है। यह एक तरह से इसाई मिशनरियों जैसा संगठन है जिसके सदस्य घूम – घूमकर इस्लाम का प्रचार करते हैं। इस संगठन की गतिविधियाँ  संदिग्ध मानी जाती रही हैं। लेकिन सऊदी अरब के समर्थन का ही नतीजा रहा कि भारत सरकार अब तक इस संगठन के मुखिया को पकड़ने  से बचती आ रही है। लेकिन अब जबकि सऊदी अरब जैसे कट्टर इस्लामिक देश ने ही तबलीगी जमात को मस्जिदें खाली करने का निर्देश देते हुए उसे आतंकवाद का द्वार बता दिया तब फिर किसी और प्रमाणपत्र की गुंजाईश ही कहाँ  बचती है। भारत में देवबंद नामक इस्लामिक केंद्र ने सऊदी सरकार के निर्णय को अमेरिका के दबाव का परिणाम बताते हुए कहा कि इस फैसले को वापिस लिया जाना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ खबर तो ये भी है कि अफगानिस्तान पर काबिज तालिबान ने भी तबलीगी जमात का विरोध किया है। अब जहाँ तक भारत का सम्बन्ध है तो तबलीगी जमात पर शिकंजा कसने का यही सबसे सही अवसर है। इस संगठन की गतिवधियों को लेकर समर्थन और विरोध दोनों सामने आये हैं। भले ही ये अपने को शांतिप्रिय बताते हों लेकिन दिल्ली स्थित मरकज में पकड़े गये जमातियों ने जिस तरह का उत्पात मचाया और गिरफ्तारी से बचने यहाँ-वहां छिपते फिरे उसके कारण भी इस संगठन को लेकर आशंकाएं पैदा हुईं। सऊदी अरब द्वारा तबलीगी जमात को आतंकवाद का द्वार कहा जाना मामूली बात नहीं है। भारत सरकार को चाहिए वह सऊदी प्रशासन से तबलीगी जमात के विरोध में ऊठाये गए कदमों की वजह पता करे। इस्लाम के सबसे प्रमुख देश द्वारा ही जब तबलीगी जमात को आतंकवाद का द्वार बताते हुए मस्जिदों से हकाला जा रहा है तब भारत सरकार को भी सतर्क हो जाना चाहिये क्योंकि सऊदी अरब किसी वहाबी संगठन को आतंकवाद से जुड़ा बताये तो ये बात मायने रखती  है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 December 2021

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर एक नई यात्रा की शुरुआत



 काशी या वाराणसी को विश्व की प्राचीनतम नगरी कहा जाता है | भगवान शंकर का ज्योतिर्लिंग यहाँ स्थित है जिसे बाबा विश्वनाथ कहा जाता है | काशी भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का केंद्र रही  है | यहाँ के  आध्यात्मिक वातावरण में भक्ति , वैराग्य , कला , संगीत , साहित्य , संस्कृति , शिल्प , शिक्षा , उद्योग  सभी का अद्भुत समावेश है | ये नगरी भारतीय संस्कृति के लगभग सभी रंगों को अपने आँचल में समाहित किये हुए है | यहाँ का खान – पान , गान और तो और श्मसान तक ख्यातलब्ध है | काशी अध्ययन , आराधना और साधना का विश्वप्रसिद्ध केंद्र है | भगवान बुद्ध ने यहीं सारनाथ में सबसे पहले अपने ज्ञान का प्रकाश बिखेरा था | लेकिन काशी विरोधाभासों का भी  शहर है | पूर्वी भारत का यह प्रवेश द्वार अपनी विलक्षणताओं के साथ ही अव्यवस्थाओं के लिए भी जाना जाता रहा है | भीड़ , गंदगी , संकरी  गलियाँ , बेतरतीब यातायात और सबसे बढ़कर तो शिव के गणों जैसा लोक व्यवहार | जिन बाबा विश्वनाथ की वजह से वाराणसी पूरे भारत में आस्था का केंद्र  होने के साथ ही वैश्विक आकर्षण का केंद्र है , उनके ऐतिहासिक मंदिर के आस पास का समूचा क्षेत्र  अव्यवस्था का साक्षात अनुभव करवाने वाला था | मंदिर जाने के लिए आने वाले श्रृद्धालुओं को घनी बस्ती के अलावा संकरी गलियों से गुजरना होता था | जिनमें शिव के वाहन का निर्बाध आवागमन  आने – जाने वालों को भयभीत कर देता था | अवैध निर्माण और अतिक्रमणों के कारण विश्वनाथ  मंदिर के चारों तरफ बने दर्जनों मंदिर पूरी  तरह छिप गये थे | लेकिन गत दिवस पूरी दुनिया ने काशी के कायाकल्प को देखा | काशी विश्वनाथ कॉरिडोर नामक परियोजना का प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने लोकार्पण कर काशी को क्योटो बना देने के वायदे को पूरा करने के सिलसिले को और आगे बढ़ा दिया |  2014 में वाराणसी से उनका लोकसभा चुनाव लड़ना विशुद्ध रूप से राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था | भाजपा का वह दांव कारगर साबित हुआ | वाराणसी से श्री मोदी तो जीते ही वहीं  उ.प्र में भी भाजपा को  अभूतपूर्व सफलता हासिल हुई | जैसी कि उम्मीद थी श्री मोदी प्रधानमंत्री  बन गये और उसके बाद उन्होंने वाराणसी की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाया | उ.प्र ने उसके पहले भी देश को आधा दर्जन प्रधानमंत्री  दिए | उन सभी के निर्वाचन क्षेत्र अति विशिष्ट ( वीआईपी ) कहलाये | लेकिन फूलपुर , रायबरेली और अमेठी की दशा देखकर कोई नहीं कहेगा कि यहाँ से जीतने वाले   देश के प्रधानमंत्री  रहे | लेकिन श्री मोदी ने वाराणसी से चुनाव जीतने के तत्काल बाद ही वहां के विकास पर ध्यान दिया  | बीते सात  साल के भीतर ही वहां ये विश्वास पैदा हो गया है कि  इच्छा शक्ति हो तो बदरंग तस्वीर को भी  संवारा जा सकता है |  प्रधानमंत्री  जाहिर तौर पर एक  राजनेता हैं |  उनके कन्धों पर भाजपा को जिताने  की भी जिम्मेदारी है | उ.प्र में दो – ढ़ाई महीने  बाद विधानसभा चुनाव हैं  जिसमें भाजपा को कड़ी चुनौती मिलने की बात कही जा रही है | उस दृष्टि से पूर्वांचल का प्रमुख केंद्र होने से वाराणसी बहुत ही महत्वपूर्ण है | ये भी कहा जा रहा है कि चुनावी फायदे के लिए काशी  विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास कार्य  समय से पहले करवा लिया गया | प्रधानमंत्री  चूँकि हर आयोजन में भव्यता और सुव्यवस्था के लिए जाने जाते हैं इसलिए गत दिवस काशी में जो हुआ वह भव्यता   और दिव्यता दोनों लिहाज से बेमिसाल था | राजनीति से अलग हटकर देखें तो वाराणसी से अतीत में भी  अनेक दिग्गज लोकसभा चुनाव जीतकर जाते रहे |  उनके द्वारा भी इस प्राचीन नगरी के विकास के लिए काफी कुछ किया गया | मसलन स्व. कमलापति  त्रिपाठी ने रेलमंत्री रहते हुए  रेल सुविधाओं के विकास के लिए उल्लेखनीय कार्य किये | लेकिन ये कहने में लेश मात्र भी संकोच नहीं होना चाहिए कि  श्री मोदी ने बीते सात साल में ही वाराणसी को उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप विकसित करने का जो प्रयास किया वह वाकई प्रशंसनीय  है | दुनिया भर से बौद्ध धर्मावलम्बी वाराणसी के उपनगरीय क्षेत्र सारनाथ आते हैं | श्री मोदी ने जापान के प्रधानमंत्री  को वाराणसी की  गंगा आरती में शामिल करवाकर  जापान के धार्मिक शहर क्योटो की तरह से ही काशी को भी विकसित करने का इरादा जताया | उसे लेकर प्रधानमन्त्री का उपहास भी किया  जाता रहा किन्तु उन्होने   अपने संकल्प को न सिर्फ याद रखा अपितु उसे कार्यरूप में परिणित भी कर दिखाया | काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास को केवल धार्मिक  दृष्टि से देखा  जाना उचित न होगा | यह हिन्दू तीर्थों की अव्यवस्था को दूर कर उन्हें साफ़ - सुथरा , सुंदर और सुविधासंपन्न बनाने की दिशा में एक दिशा निर्देशक बन सकता है | काशी विश्वनाथ के दर्शन करने आये महात्मा गांधी ने भी वहां की गंदगी और अव्यवस्थाओं  पर असंतोष  व्यक्त किया था | देश में हिन्दू धर्म के अधिकतर धार्मिक केंद्र और तीर्थ स्थल इसी तरह की हालत में हैं | श्री मोदी ने वाराणसी के प्राचीन गौरव के अनुरूप उसके विकास का जो उदाहरण पेश किया वह पर्यटन और उससे उत्पन्न होने वाले रोजगार को बढ़ावा देने वाला साबित होगा इसमें कोई संदेह नहीं है | इसे सुखद  संयोग ही कहा जायेगा कि उ.प्र में ही अयोध्या में विकास का महा अभियान जोर – शोर से जारी है और यदि कार्य योजनानुसार ही चलता रहा तो आगामी दो वर्ष के भीतर अयोध्या भी विश्व के  मानचित्र पर उसी तरह स्थापित हो जायेगी जैसे वेटिकन और मक्का हैं | ये कहना कदापि गलत न होगा कि राममंदिर विवाद के बाद अयोध्या को लेकर पूरे विश्व से  हिन्दू  धर्मावलम्बी वहां आने के लिए लालायित हैं लेकिन पर्याप्त व्यवस्था के अभाव में अपनी इच्छा दबाकर रह जाते हैं | अयोध्या में राम मंदिर के साथ ही उसे विश्व के सबसे प्रमुख धार्मिक केंद्र में परिवर्तित करने के लिए जिस तरह की सुविधाओं  का विकास किया जा रहा है उसे देखते हुए आगामी कुछ सालों बाद पूरी दुनिया से लोग अयोध्या आएंगे | वाराणसी में भी काशी विश्वनाथ कॉरिडोर  बन जाने से पर्यटकों के लिए दोहरा आकर्षण रहेगा  | स्मरणीय है आजादी के बाद सरदार पटेल की पहल पर गुजरात में सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था | उसके लोकार्पण में पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद गये थे | लेकिन तब के प्रधानमंत्री  पं. जवाहर लाल नेहरु ने उनसे ये कहते न जाने का आग्रह किया कि उससे  देश  की धर्म निरपेक्ष छवि प्रभावित होगी | राजेन्द्र बाबू ने नेहरू जी की आपत्ति को दरकिनार कर दिया और कहा कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार राष्ट्रीय गौरव की पुनर्स्थापना होने से उनका वहां जाना सही रहेगा | काशी  विश्वनाथ परिसर का जो रूप निखरकर सामने आया है वह दिव्यता और भव्यता का सुंदर समन्वय है | याद  रखने वाली बात ये है कि भारत रत्न स्व. बिस्मिल्लाह खान भी बाबा विश्वनाथ के परम भक्त थे और अक्सर भोर की बेला में मंदिर प्रांगण में शहनाई बजाने पहुंच जाया करते थे | काशी के इस कायाकल्प से प्रेरित होकर अन्य ज्योतिर्लिंगों और शक्तिपीठों को भी इसी तरह विकसित और व्यवस्थित किया जावे तो देश ही नहीं अपितु विदेशों तक से श्रद्धालुजन इनकी यात्रा  करने आयेंगे | विश्वनाथ मंदिर के इर्द गिर्द हुए अतिक्रमण हटा दिए जाने के बाद से गंगा जी से ही मंदिर का दर्शन होना वाकई सुखद अनुभूतिदायक होगा | भारत विविधताओं से भरा देश है | लेकिन संस्कृति और धर्म सदियों से उसे एकता के सूत्र में बांधकर रखे हुए है | हमारे तीर्थ और धार्मिक केंद्र इस एकता को बनाये  रखने के सशक्त माध्यम हैं | उस दृष्टि से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ समूचे क्षेत्र में मूलभूत ढांचा खडा करने का जो अभियान चल पड़ा है उससे उ.प्र के पिछड़े कहे जाने वाले क्षेत्रों का भाग्योदय होना तय है | वैसे भी  भारत में धार्मिक पर्यटन का इतिहास बहुत पुराना है | उसे और सुविधा सम्पन्न बनाने से देशी और विदेशी पर्यटक ज्यादा संख्या में आकर्षित हो सकेंगे जिससे आसपास के इलाके में रोजगार  तथा  व्यवसाय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी | गुजरात में सरदार पटेल की जो मूर्ति लगाई गई वह विश्व में सबसे ऊंची है | उसके निर्माण पर हुए खर्च को लेकर प्रधानमंत्री की आलोचना भी हुई लेकिन कुछ सालों के भीतर ही उस क्षेत्र में पर्यटकों के रिकार्डतोड़ आवागमन ने उस प्रकल्प की सार्थकता साबित कर दी | उस दृष्टि से  काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास को एक नई यात्रा की शुरुआत माना जा सकता है  |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 December 2021

राष्ट्रीय आंदोलन के शोर में राज्यों में किसानों की समस्याएँ दबकर रह गईं



संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा एक साल से चलाया जा रहा आन्दोलन औपचारिक तौर पर समाप्ति के बाद दिल्ली से  किसानों के जत्थे वापिस लौटने लगे हैं | इनमें  सबसे ज्यादा पंजाब के किसान हैं | गत दिवस आयोजित  विदाई सभा में राकेश टिकैत ने कहा कि बीते एक साल में किसानों को आन्दोलन का प्रशिक्षण मिल गया है | अब वे और अन्य किसान नेता देश के विभिन्न राज्यों में जाकर किसानों को आन्दोलन के तौर – तरीके सिखाएंगे | प्रति वर्ष आन्दोलन मेला लगाकर देश भर के किसानों को एकत्र कर उनमें सम्पर्क और एकता बनाये रखने का प्रयास भी होगा | श्री टिकैत के अनुसार मोर्चा हर माह अपनी बैठक कर भावी  रणनीति तय करेगा | लेकिन वे ये बताने से बचे कि उ.प्र , उत्तराखंड और पंजाब के विधानसभा चुनाव में किसान संगठन किसका समर्थन करेंगे , जबकि मोर्चे के प्रमुख नेताओं में से एक भारतीय किसान यूनियन के गुरनाम सिंह चढूनी ने पंजाब में किसान उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दिया है | इसी के साथ ही पंजाब के कुछ किसान संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर रेल रोकने का प्रयास भी किया | दिल्ली से लौटने के पहले ही पंजाब के किसान संगठनों ने राज्य सरकार को चेतावनी दे डाली कि वह पांच साल पहले किये गये वायदे के अनुसार किसानों के कर्जे माफ करें | उल्लेखनीय है 2017 के चुनावी  घोषणापत्र में कांग्रेस ने किसानों से कर्ज माफी का वायदा किया था | संयुक्त किसान मोर्चे के आन्दोलन में शामिल  40  संगठनों में से 32 पंजाब के थे | ये बात भी निकलकर आई है कि श्री टिकैत द्वारा आन्दोलन जारी रखने के सुझाव का पंजाब के संगठनों ने विरोध करते हुए दिल्ली से डेरा उठाने का दबाव बना दिया |  जबकि श्री टिकैत को लग रहा था कि कि जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर वे सरकार को झुकाना चाहते थे वह तो अभी भी उलझा रह गया | चूँकि पंजाब और हरियाणा के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का भरपूर लाभ पहले से ही प्राप्त होता रहा है इसलिए उनमें  लड़ाई जारी रखने में रूचि नहीं थी | उनको ये भी लग रहा था कि राज्य सरकार से उनकी लम्बित मांगों को पूरा करवाने के लिए समय बहुत कम बचा है क्योंकि जनवरी में विधानसभा चुनाव के लिए आचार संहिता लग जायेगी | पंजाब से आ रहे संकेतों के अनुसार कांग्रेस सरकार की वापिसी की सम्भावना दिन ब दिन धूमिल होती जा रही है | किसान संगठनों को लग रहा है कि यही मौका है दबाव बनाकर कर्ज माफ़ करवाने का | ऐसी स्थिति में यदि श्री चढूनी की मंशानुसार किसानों के उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे तब श्री टिकैत और संयुक्त किसान मोर्चे के बाकी नेता उनका प्रचार करने आयेंगे या नहीं ये बड़ा सवाल है | उल्लेखनीय है अपने प्रभाव क्षेत्र पश्चिमी उ.प्र में किसानों का समर्थन किसे दिया जावेगा ये खुलासा भी  श्री टिकैत नहीं कर पा रहे हैं | ये देखते हुए किसान आन्दोलन अघोषित  बिखराव की और बढ़ रहा है | संयुक्त किसान मोर्चे के नेताओं को इस बात की खुन्नस है कि उनकी मेहनत पर श्री टिकैत महानायक बन बैठे | आन्दोलन  के दौरान और खत्म होने के ठीक पहले योगेन्द्र यादव द्वारा की गई टिप्पणी से ये साफ़ हो गया कि श्रेय लूटने के लिए हुई खींचातानी आखिर में खटास पैदा कर गयी | वैसे भी आंदोलन का केंद्र दिल्ली बन जाने से उस पर जाटों का कब्ज़ा हो गया | खाप पंचायतों के जरिये श्री टिकैत ने उ.प्र और हरियाणा में जाटों का ध्रुवीकरण करने का जो दांव चला उससे भी पंजाब के किसान नेता अपने को ठगा महसूस करते रहे | अपने बयानों में श्री टिकैत ने उ.प्र के गन्ना किसानों के भुगतान और बिजली बिलों की बात तो उठाई लेकिन पंजाब के किसानों की  कर्ज माफी पर वे कुछ नहीं बोले | इसीलिये अब ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि दिल्ली से लौटे पंजाब के किसान अब अपने राज्य में मोर्चा खोलेंगे जिसकी बानगी गत दिवस रेल रोके जाने के रूप में सामने आ गई | श्री टिकैत ने विभिन्न राज्यों में जाकर सरकार से चर्चा कर किसानों की मांगें पूरी करने की जो बात कही वह उतनी आसान नहीं  जितनी वे समझ रहे हैं | दिल्ली में तो सिख और जाट किसानों ने आन्दोलन को मजबूती दे दी | लेकिन अन्य राज्यों में संयुक्त किसान मोर्चा और श्री टिकैत  का कोई आभामंडल नहीं है | गौरतलब है कि मोर्चे में शरीक 40  में से 32 संगठन तो पंजाब के ही थे | श्री टिकैत के अपने संगठन को भी मिला लें तो पूरे देश से कुल सात – आठ ही इस आन्दोलन के साथ खड़े हुए दिखे | इनमें से भी कुछ ऐसे हैं जिनके नेताओं का अपने राज्य में धेले भर का असर नहीं है | ये सब देखते हुए  कहना गलत न होगा कि इस आन्दोलन के बाद अब विभिन्न राज्यों में किसानों के नाम पर नेतागिरी चमकाने के लिए नए – नए संगठन उभरेंगे जिनके नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसानों का उपयोग करेंगे | खुद श्री टिकैत के मन में चुनाव जीतने की लालसा है जो दो बार लड़कर अपनी जमानत जप्त करवा चुके हैं | इस आन्दोलन में राजनीतिक दलों को दूर रखने का प्रयास किया जाता रहा लेकिन राज्य स्तर पर किसान संगठन गैर राजनीतिक नहीं रह सकेंगे | पंजाब की भी जो 32 जत्थेबंदी आन्दोलन की असली ताकत बनीं वे भी  तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह द्वारा प्रायोजित थीं और तीन कानून वापिस होते ही पंजाब के किसानों के वापिस लौटने के फैसले के पीछे भी अमरिन्दर ही थे | इसी तरह पश्चिमी उ.प्र के जाट किसानों को दिल्ली में बिठाए रखने में सपा के अखिलेश यादव और रालोद के जयंत चौधरी का स्वार्थ था क्योंकि उन्हें इस बात का भय है कि आन्दोलन शांत होते ही जाट समुदाय के बीच भाजपा अपनी पैठ फिर बना लेगी | दिल्ली से लौटते हुए किसानों के चेहरों पर जीत की जो खुशी थी वह घर लौटते ही गायब हो जायेगी क्योंकि वहां जाते ही उनको ये एहसास होगा कि उनकी जो स्थानीय समस्या है उस पर तो संयुक्त किसान मोर्चा पूरी तरह उदासीन रहा |  तीनों कानूनों की वापिसी के बाद केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में समिति तो बना दी किन्तु वह कब तक निर्णय करेगी ये निश्चित नहीं है | जिन राज्यों में सरकारी खरीद होती है उनके किसानों को इसकी ज्यादा चिंता नहीं है | उनकी प्राथमिकता बिजली के बिल और कर्ज जैसे मुद्दे हैं | चूँकि संयुक्त किसान मोर्चा तीन कानूनों में उलझ गया इसलिए किसानों की बाकी मांगें उपेक्षित रह गईं | यही कारण है कि पंजाब के किसान संगठन  दिल्ली से लौटने की जल्दबाजी में थे | अब सवाल ये है कि कर्जमाफी सहित  उनकी मांगों के समर्थन में क्या श्री टिकैत और मोर्चे के बाकी नेता पंजाब सरकार के विरोध में रेल रोको और टोल नाकों पर कब्जे का समर्थन करने आयेंगे ? इसी तरह क्या पंजाब की 32 जत्थेबंदियां उ.प्र के गन्ना किसानों के बकाया भुगतानों के लिए लड़ने जायेंगी ? इस तरह के सवाल और भी हैं | श्री टिकैत गत दिवस कह रहे थे कि इस आन्दोलन पर शोध होंगे क्योंकि यह अपनी तरह का अनूठा प्रयोग था जिसमें एक साल तक किसान धरने पर बैठा  रहा | उनकी बात बिल्कुल सच है किन्तु इस शोध में ये बात भी उभरकर आयेगी कि आन्दोलन से किसानों की एक भी समस्या  स्थायी रूप से हल नहीं हुई | बिजली बिल और गन्ना के भुगतान की समस्या पूरी तरह राज्यों से सम्बंधित है | इसी तरह कर्ज माफी के पंजाब कांग्रेस के घोषणापत्र से हरियाणा और राजस्थान के किसान उदासीन हैं | देश के सभी राज्यों में तो अनाज की सरकारी खरीद तक नहीं होती | किसानों की कर्ज माफी की मांग भी राष्ट्रीय आन्दोलन का मुद्दा नहीं बन सकी |  श्री टिकैत का ये कहना यदि सही भी है कि एक वर्ष चले धरने  में किसानों को आन्दोलन का प्रशिक्षण मिल गया किन्तु उसी के साथ ये भी सही है कि इस दौरान  स्थानीय समस्याओं को केन्द्रीकृत करने में संयुक्त किसान मोर्चा असफल रहा क्योंकि उसका ध्यान एक ही मुद्दे पर जाकर ठहर गया | इसीलिये राष्ट्रीय स्तर पर जो छोटा और मध्यम श्रेणी का किसान है उसे इस आन्दोलन की  सफलता अथवा विफलता में कोई रूचि नहीं रही | चूंकि हमारे देश में अधिकतर जनांदोलनों की परिणिति चुनाव और सत्ता पाने के रूप में होती है इसलिए इस आन्दोलन का भविष्य भी फरवरी  में होने वाले उ.प्र , उत्तराखंड और पंजाब के चुनाव परिणामों के बाद तय होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 11 December 2021

हेलीकाप्टर दुर्घटना पर निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी ठीक नहीं



हेलीकाप्टर दुर्घटना में चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ जनरल बिपिन रावत और दर्जन भर लोगों की मौत के बाद दुर्घटना के कारणों को लेकर कुछ लोग जिस तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं उनसे लगता है जैसे वे ऐसे मामलों के जन्मजात विशेषज्ञ हों। इनमें कुछ राजनेता, पत्रकार और सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले वे लोग हैं जिन्हें हर मामले में टांग अड़ाने की आदत है। कुछ लोगों को इस बात का भी दर्द है कि समाचार माध्यमों में उक्त दुर्घटना को लेकर वैसी चर्चा नहीं हो रही जैसी सुशांत राजपूत और आर्यन खान के मामले में हुई थी। सांसद डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने इस घटना में षडयंत्र की आशंका जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश से जांच कराये जाने की मांग कर डाली ताकि किसी तरह का दबाव न आये। उनके अलावा अनेक लोगों का कहना है कि हादसे के पीछे चीन, पाकिस्तान और श्री लंका के तमिल उग्रवादी संगठन लिट्टे का हाथ हो सकता है जो दोबारा जीवित हो रहा है। कुछ लोगों ने ताईवान में हुई इसी तरह की दुर्घटना के तार इससे जोड़ते हुए अपना निष्कर्ष निकाल लिया। रूस के राष्ट्रपति पुतिन के संक्षिप्त भारत दौरे के फौरन बाद हुई उक्त दुर्घटना को हथियारों के सौदों में चल रही प्रतिद्वंदिता से जोड़कर भी देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है भारत ने रूस से हाल ही में रक्षा प्रणाली खरीदने का जो सौदा किया उससे अमेरिका बहुत नाराज है। साथ ही चीन को भी ये डर है कि भारत इसका उपयोग उसके विरुद्ध करेगा। स्व. रावत द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध की गई जमीनी सर्जिकल स्ट्राइक से उत्पन्न उसकी नाराजगी को भी इस दुर्घटना की वजह मानने वाले कम नहीं है। सबसे नया कयास लेसर तकनीक से हेलीकाप्टर गिराये जाने के तौर पर लगाया जा रहा है। तीनों सेनाओं के प्रमुख के तौर पर स्व. जनरल रावत सेना के आधुनिकीकरण के अभियान से करीबी से जुड़े रहे। रक्षा उपकरणों के सौदों में भी उनकी सलाह काफी महत्वपूर्ण मानी जाती थी। सबसे प्रमुख बात ये है कि उनके सरकार के साथ काफी नजदीकी सम्बन्ध होने से रक्षा मामलों में निर्णय प्रक्रिया तेज हुई थी। गत वर्ष गर्मियों में चीन द्वारा लद्दाख क्षेत्र की गलवान घाटी में की गई घुसपैठ का भारतीय सेना ने दबंगी से जवाब देने के बाद पूरे इलाके में जबरदस्त मोर्चेबंदी की उसकी वजह से चीन को काफी शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी और वह बजाय अकड़े रहने के वार्ता करने राजी हुआ जिसका सिलसिला अभी भी जारी है। केंद्र सरकार द्वारा तीनों सेनाओं का एक स्थायी प्रमुख (सीडीएस) नियुक्त करने से सेना के तीनों अंगों में तालमेल और अच्छा हुआ जिसके कारण ही लद्दाख जैसे दुर्गम इलाके में हवाई पट्टी बनाकर आधुनिक लड़ाकू विमान और मिसाइलें लगाई जा सकीं। जाहिर है शत्रु राष्ट्र इससे परेशान होकर ऐसा कुछ करने की ताक में रहते हैं जिससे हमारी सैन्य तैयारियों में व्यवधान आये। जनरल रावत बीते कुछ समय से भारत की रक्षा नीति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे थे और उस लिहाज से उनका दुश्मनों की नजर में खटकना स्वाभाविक ही था। दुनिया भर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों के पास आजकल अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र और तकनीक आ गयी है। अफगानिस्तान जैसे गरीब देश में सड़क चलते लोगों के कन्धों पर रखे रॉकेट लांचर इसके जीवंत सबूत है। ऐसे में ये सोचना पूरी तरह निराधार नहीं है कि जनरल रावत के हेलीकाप्टर की दुर्घटना के पीछे कोई शत्रु देश अथवा ऐसा आतंकवादी संगठन हो सकता है जो भारत की रक्षा तैयारियों में खलल डालने के साथ देश को आन्तरिक तौर पर कमजोर करना चाहता हो। लेकिन ऐसे मामलों में सार्वजनिक चर्चा और अनधिकृत टिप्पणियों से बचा जाना चाहिए। जिस हेलीकाप्टर में स्व. रावत और उनका दल सवार था वह अपनी गुणवत्ता और विश्वसनीयता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। युद्ध के अलावा अति विशिष्ट व्यक्तियों के आवागमन के लिए भी उसका उपयोग किया जाता है। हालाँकि वह अनेक बार दुर्घटना का शिकार हो चुका है किन्तु तकनीकी श्रेष्ठता और सुरक्षा मानकों पर खरा साबित होने के कारण उसकी साख पर असर नहीं पड़ा। दुर्घटना के फौरन बाद सरकार और वायुसेना ने जांच शुरू कर दी। चूँकि हादसे में सीडीएस भी जान से हाथ धो बैठे और हेलीकाप्टर भी उच्च कोटि का था इसलिये जांच भी उसी स्तर की होगी। ये देखते हुए अनुमानों के दिशाहीन तीर छोड़ना जल्दबाजी के साथ ही गैर जिम्मेदार रवैया ही है। किसी तोड़फ़ोड़ या आतंकवादी हरकत की आशंका अपनी जगह स्वाभाविक है लेकिन जिस जगह और मौसम में हादसा हुआ उन्हें देखते हुए यही सम्भावना ज्यादा है कि पायलट हेलीकाप्टर को सामान्य ऊंचाई से भी कम पर उड़ाने बाध्य हुआ और वही जानलेवा बना। उड़ान का समय यद्यपि बहुत ही संक्षिप्त था किन्तु हवाई यातायात का नियन्त्रण बहुत ही सावधानी से किया जाता है। और फिर जब जिस उड़ान में देश की सुरक्षा से जुड़ा बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति बैठा हो तब सतर्कता और भी ज्यादा रखी जाती है। जिस इलाके में दुर्घटना घटित हुई वह घने जंगलों वाला है। इस तरह की उड़ान का जो मार्ग है वह सार्वजानिक भी नहीं किया जाता। ऐसे में बेहतर यही होगा कि वायुसेना द्वारा की जा रही जाँच के परिणामों का इंतजार किया जावे। उससे निकलने वाले निष्कर्षों का विश्लेषण जरूर किया जा सकता है। बहरहाल किसी के पास या उसके दिमाग में ऐसी कोई बात हो जो दुर्घटना के कारणों को पता लगाने में सहायक हो सकती है तब उसे जाँच एजेंसियीं तक पहुंचाना समझदारी होगी। लेकिन बैठे-बैठे अन्दाजिया तीर छोड़ते रहने से हासिल तो कुछ होता नहीं, उलटे जांच करने वाले दबाव में आ जाते हैं। इस बारे में ये भी ध्यान रखना चाहिए कि हादसे का शिकार हुआ हेलीकाप्टर वायुसेना का था जिसमें तीनों सेनाओं के प्रमुख सवार थे। सेना, सुरक्षा और सेनापति से जुड़े इस घटनाक्रम में बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन्हें सार्वजनिक करना देशहित में नहीं होगा। ये देखते हुए अति उत्साह में अपनी काल्पनिकता का उपयोग करने की बजाय जिम्मेदारी के साथ धैर्य रखने में ही बुद्धिमत्ता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 December 2021

नेताओं का अहं तो संतुष्ट हुआ लेकिन किसान खाली हाथ ही रहे




आखिऱकार किसान आन्दोलन समाप्त हो ही गया। 11 दिसम्बर से दिल्ली में  धरना दे रहे जत्थे वापिस लौटने लगेंगे। किसान नेताओं के चेहरे पर जीत की खुशी है। एक साल से भी ज्यादा आन्दोलन को खींचना वाकई बड़ी बात थी। इतने लम्बे समय तक धरना स्थल पर भोजन-पानी और अन्य व्यवस्थाओं को देखकर ये तो पता चलता ही था कि किसानों के पीछे कुछ अदृश्य ताकतें भी रहीं  । वरना अपनी पैदावार का उचित मूल्य न मिलने से कर्ज में डूबा किसान काम-धंधा छोड़कर घर परिवार से दूर कैसे रहा ,ये सवाल भी उठना स्वाभाविक है। इसी के साथ  गौरतलब है कि समूचे विपक्ष के समर्थन और समाचार माध्यमों में बेतहाशा प्रचार के बावजूद आन्दोलन दिल्ली के निकटवर्ती तीन-चार राज्यों में ही क्यों सिमटा रहा ? निश्चित रूप से संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में एक बड़ी लड़ाई लड़ी गई। लेकिन उससे जो हासिल हुआ और अब उसका असर अन्य क्षेत्रों में होने वाले आन्दोनों पर किस तरह पड़ेगा ये गहन विश्लेषण का विषय है। गत दिवस एक चैनल के पत्रकार ने जब राकेश टिकैत से पूछा कि आन्दोलन की उपलब्धि क्या है, तब वे बड़ी ही मासूमियत से बोले कि देश का किसान आन्दोलन के तौर-तरीके सीख गया, सरकार के साथ बातचीत में आने वाले पेच भी उसे पता चले और सबसे बड़ी बात हुए किसान संगठनों का एकजुट होना। हालाँकि उन्होंने ये माना कि सरकार के साथ  आमने-सामने बैठकर फैसला करने की हसरत अधूरी रह गई। वस्तुत: प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा कृषि कानून वापिस लेने की घोषणा के बाद ही ये तय था कि आन्दोलन जल्द समेट लिया जाएगा। काफी किसान तो घोषणा के फ़ौरन बाद धरना स्थल से लौट भी गये किन्तु किसान नेताओं ने सरकार पर इस बात का दबाव बनाया कि आन्दोलन के दौरान जान गंवा बैठे किसानों के परिजनों को क्षतिपूर्ति, आपराधिक मुकदमे वापिस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ठोस निर्णय के बिना वे वापिस नहीं लौटेंगे। बिजली और पराली संबंधी आश्वासन तो पहले ही मिल चुका था। राकेश टिकैत चाह रहे थे कि सरकार उनको बैठक हेतु बुलाये किन्तु उसने फोन और चिट्ठियों से ही आन्दोलन समाप्त करने की परिस्थितियां बना दीं। सबसे बड़ा पेंच फंसा न्यूनतम समर्थन मूल्य का , लेकिन पंजाब और हरियाणा के किसान संगठन इस मुद्दे पर उदासीन रहे क्योंकि उनकी 90 फीसदी उपज सरकार खरीद लेती है। बाकी मुद्दों पर उनको ये एहसास था कि पंजाब की तरह अन्य राज्य  भी मौतों पर  मुआवजा और मुकदमे वापिस ले ही लेंगे। पराली और  बिजली संबंधी कानून भी सरकार ने वापिस लेने की बात कह दी थी। आन्दोलन शुरू होने के बरसों पहले से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग उठती रही है। इस बारे में अनेक समितियों की रिपोर्ट भी सरकारी फाइलों में धूल  खा रही है। ऐसे में जब कृषि कानून आये तब जिन किसान संगठनों ने उनके विरोध में दिल्ली की सीमा पर धरना दिया वे प्रारम्भिक दौर में ही कानून रद्द करने की जिद पकड़ने की गलती कर गये । कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ हुई दर्जन भर बैठकों में यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में भी किसानों का पक्ष रखते हुए बातचीत जारी रखी जाती तो बड़ी बात नहीं इस विषय पर अब तक कुछ न कुछ हो गया होता। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चे में योगेन्द्र यादव जैसे  कुंठित सलहाकार घुसे थे जिनकी रूचि गतिरोध बनाये रखने में थी क्योंकि उनके पास सुर्खियों  में बने रहने का और कोई जरिया नहीं है। इसीलिए सरकार के साथ हुई वार्ता केवल एक मुद्दे पर आकर अटकती रही कि पहले तीनों कानून रद्द हों तब बात होगी। इसके कारण ही सरकार ने बातचीत करना बंद कर दिया जिसके बाद संयुक्त किसान मोर्चा टेबिल पर बैठकर बात करने की गुहार लगाता रहा लेकिन पिछली जनवरी के बाद सरकार ने उसको कोई तवज्जो नहीं दी। किसान संगठनों को इस बात का भी अफसोस रहा कि श्री मोदी ने उनसे चर्चा किये बिना ही कानून वापिस  लेने की इकतरफा घोषणा कर उनके हाथ से हथियार छीन लिया। आन्दोलन की शुरुवात चूँकि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री  कैप्टन अमरिंदर सिंह ने करवाई थी इसलिए कानून वापिस होते ही उनके प्रभाव वाले पंजाब के 32 संगठनों ने बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी कर ली। उससे घबराई टिकैत एंड कम्पनी ने मुक़दमे वापिस लेने और मृतकों के परिजनों को मुआवजे के ऐलान तक रुकने की अपील की जिसके संकेत सरकार संदेशों के जरिये दे ही चुकी थी। संयुक्त किसान  मोर्चे ने लखीमपुर खीरी कांड के आरोपी के पिता केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री को हटाये जाने का जो दबाव बनाया था उसे भी केंद्र सरकार ने कोई भाव नहीं  दिया। इसी तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानूनी गारंटी दिए बिना आंदोलन खत्म न करने वाली जिद भी पूरी नहीं हुई। प्रधानमंत्री ने इस हेतु समिति बनाने की घोषणा की जिस पर संयुक्त किसान मोर्चे ने इस शर्त पर सहमति दी कि उसमें केवल उनके मोर्चे के सदस्य रहेंगे लेकिन गत दिवस जिस पत्र के बाद आन्दोलन खत्म करने की घोषणा हुई उसमें साफ लिखा है कि राज्य सरकारों के अलावा अन्य किसान संगठनों के प्रतिनिधि और कृषि विशेषज्ञ भी उसमें होंगे। समिति निर्णय करने हेतु कितना समय लेगी और सरकार तथा किसान उसकी सिफारिशों को मान लेने बाध्य होंगे ये भी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में  सोचने वाला मुद्दा है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीनों कानूनों के क्रियान्वयन  पर रोक लगा देने के बाद किसान नेता हठयोग का प्रदर्शन छोड़ आन्दोलन स्थगित करते हुए  सरकार के साथ सकारात्मक माहौल में बातचीत जारी रखते तब शायद वे इससे ज्यादा और जल्दी हासिल करने में सफल रहते। 700 से ज्यादा जिन किसानों की मौत आन्दोलन के दौरान बताई जा रही है उसके लिए सरकार से मुआवजा लेने की  मांग करने वाले किसान नेताओं को इस बात के लिए प्रायश्चियत करना चाहिए कि उनके द्वारा भावानाएं भड़काए जाने और धरना स्थल पर जरूरत से ज्यादा भीड़ जमा करने से हुई  बदइन्तजामी भी अनेक किसानों की जान ले बैठी। अब जबकि आन्दोलन औपचारिक तौर पर समाप्त हो गया है तब उसकी समीक्षा करने पर ये कहना गलत न होगा कि देश का किसान जहाँ एक साल पहले था वहीं आज भी खड़ा है और जो विजयोल्लास मनाया जा रहा है वह दरअसल राकेश टिकैत नुमा कुछ चेहरों के अहं की संतुष्टि बनकर रह गया। जैसा कि संयुक्त किसान मोर्चे के तमाम नेता स्वीकार कर रहे हैं कि असली मांग तो न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप देने की थी। बाकी मांगें तो तात्कालिक तौर पर सामने आईं जिनका पूरा होना उतना कठिन नहीं था जितना  हल्ला मचाया गया। अनेक कृषि विशेषज्ञ भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि यदि किसान संगठन न्यूनतम समर्थन मूल्य पर इतनी लम्बी लड़ाई लड़कर सफलता हासिल करते तब शायद कृषि कानून लागू होने के बाद भी कारगर न हो पाते। लेकिन पंजाब में बिचौलियों के हाथ से कृषि उपज मंडियों का कारोबार छिन जाने के भय से कृषि कानूनों का विरोध शुरू हुआ। चूंकि राज्य के राजनेताओं को ये आढ़तिया आर्थिक मदद करते हैं इसलिए कांग्रेस और अकाली दल दोनों ने कानूनों के विरोध को प्रायोजित किया परन्तु  दिल्ली आने के बाद उसकी बागडोर राकेश टिकैत और योगेन्द्र यादव जैसों ने छीन ली। इसमें दो राय नहीं है कि पंजाब के गुरुद्वारे व्यवस्था अपने हाथ न लेते तब दिल्ली में धरना इतना लम्बा नहीं चलता। पंजाब-हरियाणा, उत्तराखंड, उ.प्र और राजस्थान के जो किसान धरना स्थल से जा रहे हैं उनसे आन्दोलन की उपलब्धि पूछने पर वे इधर-उधर देखने लगते हैं क्योंकि उनके पास उस प्रश्न का कोई जवाब नहीं है। इसी तरह श्री टिकैत अब कह रहे हैं कि उ.प्र के गन्ना किसानों के भुगतान और बिजली बिलों  की समस्या के लिए योगी सरकार से बात करेंगे। सवाल ये भी है कि इस आन्दोलन से दिल्ली के प्रवेश मार्ग पर अवरोध उत्पन्न होने के कारण प्रतिदिन लाखों लोगों को जो तकलीफ हुई और कारोबारियों को करोड़ों का नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कौन करेगा? संयुक्त किसान मोर्चा को जीत का जश्न मनाने का पूरा अधिकार है लेकिन साथ ही उसको जनता और व्यापारियों से क्षमा याचना के साथ ही  पूरे देश से गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर राष्ट्र ध्वज और स्वाधीनता के उत्सव के प्रतीक स्थल के अपमान के लिए खेद भी जताना चाहिए । केंद्र सरकार ने किसानों की मांगों के समक्ष झुकने की जो रणनीति अपनाई वह हालात से उत्पन्न मजबूरी थी या उसके पीछे कुछ और है ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन इतना तो साफ़ है कि सरकार ने रणछोड़ दास की भूमिका का निर्वहन कर किसान नेताओं से बिना बात किये उनको धरना स्थल खाली करने राजी कर लिया। जहाँ तक न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात है तो उसके लिए बनी समिति कब और कितने समय में निर्णय तक पहुंचेगी इस बारे में कोई ठोस बात न होना ये साबित करता है कि कानून वापिस लिए जाते ही आन्दोलन अपना जोश खो चुका था। राकेश टिकैत यदि अब भी अड़े रहते तो बड़ी बात नहीं धरना स्थल पर केवल वे  और उनके साथी ही नजर आते।

-रवीन्द्र वाजपेयी