Friday, 24 December 2021

अटल जी से अविस्मरणीय मुलाकात



जून 2003 में जबलपुर के डुमना हवाई अड्डे पर स्व. अटल जी के साथ कुछ समय बिताने का अवसर मिला था। प्रधानमंत्री की कड़ी सुरक्षा के बीच उन्होंने हमारे पूरे परिवार को 3 मिनिट के नियत समय की बजाय अपने विश्राम के 40 मिनिट भी दे दिए। पूरी भेंट विशुद्ध पारिवारिक माहौल और हास - परिहास से भरी रही। माताजी श्रीमती उर्मिला वाजपेयी और पिताश्री स्व. पं.भगवतीधर वाजपेयी से तो वे ग्वालियर के दिनों  की यादें ताजा करते रहे किन्तु हम सबसे भी बड़े ही आत्मीय भाव से पेश आये। अटल जी से अनगिनत मुलाकातें हुईं । वे हमारे निवास पर भी आते रहे किन्तु प्रधानमंत्री के रूप में उनसे हुई वह भेंट स्मरणीय बन गई। उनकी सहजता और अपनत्व में लेशमात्र बदलाव नहीं आया जो उन्हें राजनेता से बढ़कर एक श्रेष्ठ मानव की श्रेणी प्रदान करने पर्याप्त था।
आज उनके जन्मदिवस पर उनके साथ जुड़ी अनगिनत स्मृतियाँ सजीव हो उठीं।
भारतीय राजनीति में वे राष्ट्रीय नेताओं की अंतिम कड़ी थे।
पावन स्मृति में शत-शत नमन।

-रवीन्द्र वाजपेयी

मिटने की बजाय जाति की विभाजन रेखा और गहरी होती जा रही



म.प्र विधानसभा में गत दिवस एक संकल्प सर्वसम्मति से पारित हुआ कि पंचायत चुनाव ओबीसी ( अन्य पिछड़ा वर्ग ) आरक्षण के बिना नहीं कराये जायेंगे | इसे लेकर म.प्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय जा पहुँची जिसने शीतकालीन अवकाश के बाद तीन जनवरी को मामले की सुनवाई करने का निर्णय किया | बहरहाल इस मुद्दे पर प्रदेश की राजनीति बीते कुछ समय से गरमाई  हुई है | सत्ता और विपक्ष दोनों एक दूसरे पर ओबीसी विरोधी होने का आरोप लगाते घूम रहे हैं | चूंकि मामले में  कानूनी पेंच फंस गया है इसलिए प्रदेश सरकार की स्थिति एक कदम आगे , दो कदम पीछे की हो रही है | लेकिन इससे अलग हटकर देंखें तो आरक्षण नामक सुविधा जिन वर्गों  को दी गई  उसका उद्देश्य सामाजिक भेदभाव दूर करना था | महात्मा गांधी तो वर्ण व्यवस्था के लिहाज से वैश्य समुदाय के थे किन्तु उन्होंने आजादी के आन्दोलन के साथ ही अछूतोद्धार आन्दोलन चलाया | बहुत कम लोग जानते होंगे कि दक्षिण भारत में अछूतों को अधिकार दिलाने वाला  वाइकोम  नामक  जो अभियान गांधी जी के कहने से शुरू हुआ उसका नेतृत्व पेरियार रामास्वामी ने किया था जो बाद में द्रविड़ आन्दोलन के प्रणेता बनकर ब्राह्मणवाद और आर्यवादी सोच के कट्टर विरोधी बने और कांग्रेस से अलग होकर जस्टिस पार्टी बना ली | इस प्रकार कहना  गलत न होगा कि जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था में छुआछूत नामक जो अमानवीय प्रथा थी  उसके विरुद्ध सबसे पहले राष्ट्रव्यापी  आन्दोलन खड़ा करते हुए उसे जन स्वीकृति दिलवाने का काम गांधी जी ने ही किया | हालांकि दलित वर्ग को मुख्य धारा में लाने के लिए छोटे – छोटे प्रयास अनेक लोगों ने किये किन्तु उसे राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने का बापू का कारनामा ही कारगर हुआ | अन्यथा स्वाधीनता के उपरांत सवर्ण नेताओं के वर्चस्व वाली संविधान सभा में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण देने की व्यवस्था संभव  न हो पाती | संविधान  ड्राफ्ट समिति के प्रमुख होने के बावजूद डा.भीमराव आम्बेडकर इस बारे में ज्यादा कुछ न कर पाते यदि सभा सर्वसम्मति से आरक्षण मंजूर नहीं करती | यहाँ ये भी उल्लेखनीय है कि बनारस हिन्दू विवि के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय ने ही जगजीवन राम को अपने यहाँ प्रवेश दिलवाया था जो बाद में देश के सबसे बड़े  दलित चेहरे बने | आजादी के बाद समाजवादी आन्दोलन  भी राजनीति की प्रमुख धारा बना | इसका स्वरूप वामपंथी और कांग्रेसी विचारधारा के बीच का था | समाजवादी आन्दोलन का वैचारिक पक्ष जहाँ आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण से जुड़ा रहा वहीं उसके राजनीतिक प्रवक्ता बनकर उभरे डा. राममनोहर लोहिया | आज देश में ओबीसी के नाम पर पिछड़ा वर्ग की जो राजनीति चल रही है उसे सबसे पहले लोहिया जी ने ही मुखरित किया था | उनका नारा पिछड़ा पावें सौ में साठ बहुत चर्चित हुआ था | इस बारे में स्मरणीय है कि लोहिया जी खुद  अगड़े वर्ग के थे | उनके राजनीतिक विचार इतने प्रभावी हुए कि  समाजवादी खुद को लोहियावादी कहने लग गये | उनके न रहने पर मधु दंडवते , मधु लिमये , एस.एम . जोशी , हरिविष्णु कामथ , अशोक मेहता , चन्द्र शेखर , राजनारायण , जॉर्ज फर्नांडीज और जनेश्वर मिश्र जैसे जो प्रभावशाली समाजवादी नेता हुए वे  भी पिछड़ी जाति के नहीं होने के बाद भी पिछड़ों को उनका हक़ दिलवाने की डा.लोहिया जी की इच्छा का सम्मान करते रहे | 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार के जमाने में बने मंडल आयोग ने ओबीसी आरक्षण की जो सिफारिशें कीं उनको बाद की कांग्रेस सरकारें दबाकर बैठ गई | लेकिन 1974 में जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन से उभरे युवा नेताओं की पौध में पिछड़ी जातियों के अनेक चेहरे सामने आये जो 1989 आते – आते राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने में सक्षम हो गये थे और इसीलिये विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार पर दबाव डालकर मंडल आयोग की सिफारिश लागू करते हुए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान कर दिया गया | उसके विरुद्ध देश भर में युवाओं के आन्दोलन हुए | जिनमें आत्मदाह जैसी दुखद घटनाएँ भी हुई | लेकिन जिस तरह अनु. जाति और जनजाति को मिलने वाले आरक्षण का विरोध करना राजनीतिक तौर पर आत्महत्या करने जैसा है वही स्थिति  आखिरकार ओबीसी आरक्षण को लेकर निर्मित हो चुकी है | 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान रास्वसंघ प्रमुख डा. मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा किये जाने जैसा जो बयान दिया उसने भाजपा को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया | बाद में संघ प्रमुख को अनेक मर्तबा सार्वजानिक रूप से ये दोहराना पड़ा कि जब तक जरूरत है आरक्षण को जारी रखा जाना चाहिए | उस चुनाव में  लालू – और नीतीश के गठबंधन की सफलता ने सवर्णों की पार्टी समझे जाने वाली भाजपा को भी सोशल इंजीनियरिंग जैसे फार्मूले पर ध्यान देने की जरूरत समझाई और उसने 2017  के उ.प्र विधानसभा चुनाव में ओबीसी जाति समूहों से बेहतर  तालमेल कायम करते हुए समाजवादी पार्टी के वर्चस्व को तोड़ दिया | वहां फरवरी 2022 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के बारे में जितने भी  पूर्वानुमान  लगाए जा रहे हैं वे जातिवादी समीकरण पर ही आधारित हैं | राजनीतिक नफे – नुकसान के लिये समाज को जातियों के बाद अब उप - जातियों में बांटने का प्रयास तेजी से चल रहा है | इस काम में केवल सपा और बसपा ही नहीं वरन कांग्रेस और भाजपा भी जुटी रहती हैं | प्रत्याशी चयन का आधार भी उसकी योग्यता से ज्यादा जाति हो गई है | आरक्षण का मुख्य उद्देश्य दलित और पिछड़े समुदाय को मुख्य धारा में लाना था लेकिन कड़वा सच ये ये है कि यह सुविधा सामाजिक उपाय से राजनीतिक औजार बन गया | सबसे बड़ी दुखद और खतरनाक बात  ये देखने में मिल रही है कि इसकी वजह से सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ने की स्थिति बनती जा रही है | कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के भीतर भी जातिवादी दबाव समूह बन गये हैं | इसकी वजह से समूचा  राजनीतिक विमर्श असली मुद्दों से भटककर जातिगत दांव पेंच में फंसता जा रहा है | वैसे तो देश की एकता और अखंडता की रक्षा हर पार्टी और नेता की प्राथमिकता नजर आती है | उनकी देशभक्ति पर भी संदेह  नहीं हें लेकिन जिन सामजिक बुराइयों के कारण देश सैकड़ों सालों तक परतंत्र रहा वे पहले से भी बड़ी मात्रा में समूचे परिदृश्य पर हावी हो चली हैं | इसके लिए कौन दोषी है इसका निर्णय करना आसान नहीं है क्योंकि जिनके कन्धों पर जातिवादी आग बुझाने की जिम्मेदारी है वही इसमें घी उड़ेलने पर आमादा है | आरक्षण का उद्देश्य बहुत ही पवित्र और राष्ट्रहित में था | लेकिन आजादी के सात दशक से ज्यादा  बीतने के बाद भी उस उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकी क्योंकि जिस जातिगत विभाजन रेखा को मिटाने का सपना गांधी जी और डा. लोहिया ने देखा था वह उन्हीं के अनुयायियों द्वारा और गहरी होती जा रही है |

-रवीन्द्र वाजपेयी
 

Thursday, 23 December 2021

राम धाम में लूट है, लूट सके तो लूट : अयोध्या से पहले अपने विकास की वासना




अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण जोरशोर से चल रहा है। इसी के साथ इस प्राचीन नगरी के चौतरफा विकास की परियोजना पर भी काम शुरू कर दिया गया है। वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तरह ही अयोध्या को भी वैश्विक स्तर का तीर्थ स्थल बनाने की महत्वाकांक्षा केंद्र सरकार की है। अयोध्या उ.प्र के सबसे पिछड़े इलाकों में रहा है। राम जन्मभूमि विवाद के कारण इसकी चर्चा भले ही दुनिया भर में हो गई और राष्ट्रीय राजनीति में ये मुद्दा बड़े बदलाव का आधार भी बना लेकिन सनातन धर्म के अनुयायियों के आराध्य भगवान राम की ये नगरी विकास की दृष्टि से आज भी पिछड़ी हुई ही है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम जन्मभूमि प्रकरण का फैसला किये जाने के बाद विवादित भूमि हिन्दुओं को मिलते ही अनिश्चितता खत्म हो गई और मंदिर निर्माण का काम भी जोरशोर से शुरू हो गया। इसी के साथ अयोध्या में वे सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाने की योजना भी बनी जिनसे धार्मिक पर्यटन बढ़े। हवाई अड्डा, रेलवे स्टेशन, चारों तरफ  उच्चस्तरीय राजमार्गों का निर्माण, होटल आदि इसमें शामिल हैं। राम जन्मभूमि मुद्दे ने दुनिया भर में फैले हिन्दुओं के मन में अयोध्या आने की जो उत्कंठा पैदा की उसके मद्देनजर आने वाले कुछ सालों के भीतर ये शहर दुनिया भर के सैलानियों की पसंद बनना निश्चित है। इस कारण से देश भर के होटल व्यवसायी और बिल्डरों ने अयोध्या में जमीनें खरीदने में रूचि दिखाई जो नितांत स्वाभाविक है। लेकिन ऐसा हो पाता उसके पहले ही स्थानीय राजनेताओं के अलावा प्रशासन और पुलिस के तमाम अधिकारियों ने बिना देर लगाये सस्त्ती दरों पर जमीनें खरीद लीं। चूँकि यही वह वर्ग है जिसकी जानकारी में किसी क्षेत्र की विकास परियोजना का खाका सबसे पहले आता है इसलिए नेताओं और नौकरशाहों के पास मौके की जमीनें सस्ते दामों पर खरीदने का भरपूर अवसर रहता है। उस दृष्टि से अयोध्या में जो हुआ उसमें अनपेक्षित कुछ भी नहीं है। व्यवसाय करना हर किसी का मौलिक अधिकार है लेकिन राम जन्मभूमि से पहले अपना विकास करने की वासना निश्चित रूप से पद का दुरूपयोग है। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले की जांच करते हुए एक सप्ताह में रिपोर्ट माँगी है। जो जानकारी आई है उसके अनुसार अयोध्या के महापौर सहित एक विधायक और ओबीसी आयोग के सदस्य ने अपने नाम से महत्वपूर्ण स्थलों पर जमीनें खरीद डालीं , वहीं संभागायुक्त, डीआईजी, सूचना आयुक्त और एक विधायक के अलावा कुछ सेवा निवृत्त नौकरशाहों ने अपने रिश्तेदारों के नाम से भी जमीनों में भारी-भरकम निवेश किया है। मुख्यमंत्री के आदेश पर होने वाली जांच में यदि इसकी पुष्टि हो जाती है तब भी जमीनें खरीदने वालों के विरुद्ध कौन सा अपराध साबित होगा ये बड़ा सवाल है। यदि उनके द्वारा अपनी वैध कमाई से भूमि की खरीदी की गयी तब उसमें कुछ भी गलत नहीं कहा जा सकता। हालांकि रिश्तेदारों के नाम पर जमीनें खरीदने का मकसद काले को सफेद करना ही होता है। यदि निजी जमीनें खरीदी गईं तब उसमें किसी भी प्रकार की गलती शायद ही मिले लेकिन सरकारी भूमि का क्रय हुआ तब जरूर ये देखा जाना चाहिए कि समूची प्रक्रिया विधि सम्मत और निष्पक्ष थी या नहीं? वैसे इस समाचार से किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ होगा क्योंकि ये चलन पूरे देश में एक समान है। जमीन हथियाने के मामले में सभी राजनीतिक दलों के नेता और विभिन्न राज्यों के नौकरशाहों में जबरदस्त समानता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है जैसा नारा ऐसे प्रकरणों में सटीक साबित होता है। देश की राजधानी दिल्ली के चारों तरफ  बने आलीशान फॉर्म हाउसों का सर्वेक्षण करने पर ये बात सामने आना तय है कि उनके मालिकों में बड़ी संख्या नेताओं और नौकरशाहों की ही है। आजकल शहरों के बाहर रिसॉर्ट और मैरिज गार्डन बनाने का व्यवसाय भी जोरों पर है। नेता और नौकरशाह इस बात को समय रहते जान लेते हैं कि शहर के बाहर किस इलाके का विकास होना है। इसके पहले कि विकास परियोजना सार्वजानिक हो वहां की महत्वपूर्ण जमीनों का सौदा हो चुका होता है। चूँकि जमीन ही वह चीज है जिसकी खरीद में काले धन का निवेश आसानी से संभव है इसलिए भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की जुगलबंदी बिना शोर मचाये पीढ़ियों का इंतजाम कर लेती है। उस दृष्टि से अयोध्या में भी जमीनों की खरीदी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नेताओं और नौकरशाहों द्वारा की गई तो उसमें नया कुछ भी नहीं है। कटु सत्य ये है कि जमींदारी प्रथा भले ही कानूनी तौर पर समाप्त हो गई हो लेकिन जमीनी सच्चाई ये है कि जमींदारी मिटाने का दावा करने वाले ही नये जमींदार बन बैठे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 22 December 2021

पंजाब के किसानों को अकेला छोड़ दिया टिकैत एंड कं. ने



संयुक्त किसान मोर्चा के नेता गण इन दिनों विश्राम की मुद्रा में हैं। मोर्चे की इस शांति के पीछे उ.प्र, उत्तराखंड और पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव भी माने जा रहे हैं। किसान आन्दोलन की दिशा चूँकि भाजपा विरोधी हो गई थी इसलिए ये धारणा तेजी से फ़ैली कि पश्चिमी उ.प्र के जाट और उत्तराखंड के तराई वाले सिख बहुल इलाकों में किसान भाजपा को हरवाने के लिए कटिबद्ध हैं। हालाँकि श्री टिकैत ने खुद चुनाव न लडऩे और मोर्चा द्वारा किसी पार्टी का समर्थन नहीं करने का ऐलान कर रखा है। इसके पीछे की सोच ये हो सकती है कि किसान आन्दोलन को चूंकि समूचे विपक्ष का समर्थन मिलता रहा इसलिए एक को समर्थन देकर किसान नेता बाकी को नाराज नहीं करना चाहते। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी दुविधा आ खड़ी हुई है पंजाब में। किसान आन्दोलन की शुरुआत इसी राज्य से हुई थी और पंजाब के किसानों ने ही दिल्ली में साल भर से ज्यादा चले धरने को सफल बनाया। लेकिन इतने लम्बे आन्दोलन के बाद भी पंजाब के किसानों की समस्या यथावत है। दिल्ली के मोर्चे से लौटने के बाद उनको ये महसूस हुआ कि संयुक्त किसान मोर्चा को ताकतवर बनाने के फेर में वे कमजोर हो गये और उनकी जो मांगें पंजाब सरकार के पास लंबित थीं वे जस की तस रह गईं। किसान आन्दोलन को प्रारम्भिक स्तर पर शक्ति और संसाधन उपलब्ध करवाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री पद से हटा दिये गये और उसके बाद से सत्तारूढ़ कांग्रेस की अंतर्कलह से पंजाब में जबरदस्त राजनीतिक अनिश्चितता है। ऐसे में वहां के किसान अधीर हो उठे और बिना संयुक्त किसान मोर्चा के ही आन्दोलन करने लगे। रेल रोकने के साथ ही प्रशासनिक मुख्यालयों पर धरना भी दिया जा रहा है। आश्चर्य की बात ये है कि अभी तक किसी भी किसान नेता या राष्ट्रीय स्तर के संगठन ने पंजाब के किसान आन्दोलन को समर्थन देने की जरूरत नहीं समझी। श्री टिकैत भी उससे दूरी बनाये हुए हैं। शायद इसका कारण ये है कि पंजाब में कांग्रेस की सरकार है जिसका विरोध करने से संयुक्त किसान मोर्चे पर कांग्रेस विरोधी होने की छाप लग जायेगी। दिल्ली में चले आन्दोलन को समर्थन देने वाले राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने अब तक पंजाब के किसानों के आन्दोलन पर एक शब्द भी नहीं कहा जबकि उसमें वही सब कुछ है जिसका वायदा कांग्रेस ने 2017 के चुनाव घोषणापत्र में किया था। ऐसे में राहुल और प्रियंका से अपेक्षा थी कि वे जिस तरह से दिल्ली के किसान आन्दोलन का समर्थन करते रहे वैसा ही किसान प्रेम पंजाब में आकर दिखाएं। इस राज्य के किसानों की मांगें भी लगभग वही हैं जिनकी चर्चा दिल्ली धरने के दौरान सुनाई देती रही। पंजाब के किसानों ने घर लौटकर आन्दोलन शुरू किया तब उन्हें अकेला छोड़ देना एहसान फरामोशी के साथ ही किसान संगठनों की एकता पर भी सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है। श्री गांधी और श्रीमती वाड्रा दोनों केंद्र सरकार को किसान विरोधी ठहराने में आगे-आगे रहे लेकिन अब अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार द्वारा किसानों से किये गये वायदे निभाने में की जा रही बेईमानी पर मौन धारण किये रहने से ये साफ़ हो गया है कि किसानों से उनकी सहानुभूति घडिय़ाली आंसू थे। पंजाब के किसान ये समझ रहे हैं कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के पहले यदि उनके मांगें पूरी नहीं हुईं तो फिर वे खाली हाथ रह जायेंगे। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा उन्हें जिस तरह अकेला छोड़ दिया गया उसके कारण किसान आन्दोलन में दरार आये बिना नहीं रहेगी। उ.प्र, उत्तराखंड और हरियाणा में किसान पंचायतें करने वाली टिकैत एंड कम्पनी पंजाब के किसानों के पक्ष में आकर खड़े होने से पीछे क्यों हट रही है, ये बड़ा सवाल है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

उच्च सदन में निम्न स्तरीय आचरण शर्मिंदा करता है



राज्यसभा से 12 विपक्षी सांसदों के निलम्बन का विवाद चल ही रहा था कि गत दिवस तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सदस्य डेरेक ओ ब्रायन द्वारा आसंदी की तरफ नियम पुस्तिका फेंके जाने के बाद उन्हें भी इस सत्र की शेष अवधि के लिए निलम्बित कर दिया गया। श्री ब्रायन तृणमूल के प्रवक्ता हैं। सदन के भीतर उनकी सक्रियता और संसदीय ज्ञान प्रभावित्त करता हैं। आयरिश मूल के परिवार से होने की वजह से वे एंग्लो इन्डियन समुदाय के अंतर्गत आते हैं। उनका संसदीय ज्ञान और बहस करने की क्षमता काफी अच्छी है। राजनीति में आने से पहले वे विज्ञापन पेशेवर रहे और बाद में क्विज मास्टर के तौर पर बहुत सफल और लोकप्रिय हुए। उनके द्वारा संचालित क्विज शो देश-विदेश में सराहे गये। संसद का उच्च सदन दरअसल बना ही ऐसे लोगों के लिए है। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस प. बंगाल में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के बाद आत्मविश्वास से भरपूर है। उसकी नेत्री ममता बैनर्जी स्वयं को प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का विकल्प मानकर कांग्रेस को तोडऩे में लगी हैं। बंगाल की सीमा से निकलकर सुदूर गोवा के विधानसभा चुनावों में तृणमूल ने कूदने के साथ ही जिस तरह से कांग्रेस में तोडफ़ोड़ मचाई हुई है उससे पार्टी की तेज चाल का एहसास होने लगा है। इसी कारण से वह संसद में भी आक्रामक दिखना चाहती है। जिन राज्यसभा सदस्यों को पिछले सत्र में आपत्तिजनक आचरण के कारण पूरे शीतकालीन सत्र के लिए निलम्बित किया गया उनमें दो तृणमूल के भी हैं। समूचा विपक्ष सभापति वेंकैया नायडू पर निलबंन वापिस लेने का दबाव बनाता रहा किन्तु वे टस से मस नहीं हुए। विपक्ष का कहना है कि ऐसा करने से उच्च सदन में सरकार के पास बहुमत हो गया जिसके बल पर वह अपने सभी प्रस्ताव पारित कराने में सफल हो रही है। वैसे भी मौजूदा सत्र किसी भी समय समाप्त किया जा सकता है। ऐसे में श्री ब्रायन जैसे सदस्य का सदन में न होना अच्छा नहीं है। संसदीय प्रणाली में सदन का बड़ा महत्व है और उस पर भी विपक्ष का जागरूक और सक्रिय होना निहायत जरूरी। लेकिन ये उसका भी दायित्व है कि अपनी उपयोगिता के साथ ही दायित्व को भी समझे। लोकसभा में न सही लेकिन राज्यसभा में विपक्ष की अच्छी-खासी संख्या है लेकिन वह इसका सही उपयोग सत्ता पक्ष पर दबाव बनाने में नहीं कर पा रहा जिसके लिए वह किसी और को दोष नहीं दे सकता। उसका सदैव ये आरोप रहता है कि सत्ता पक्ष उसे अपनी बात रखने का अवसर नहीं देता और आसंदी से उसे जो संरक्षण मिलना चाहिए वह भी नहीं मिल पाता। पिछले सत्र में जिन सदस्यों को उपद्रव के आरोप में निलम्बित किया गया वे आसंदी के रवैये को पक्षपातपूर्ण मानते हैं। हालाँकि अतीत में भी इस तरह के टकराव होते रहे हैं। लेकिन विपक्ष को अपनी भूमिका पर भी आत्मावलोकन करना चाहिए। मसलन श्री ब्रायन द्वारा उप सभापति के किसी निर्णय पर नाराज होकर सदन से चला जाना तो संसदीय विरोध का प्रचलित तरीका है किन्तु जाते-जाते नियमावली की पुस्तिका आसंदी की तरफ उछालना बहुत ही अशोभनीय कार्य था। ऐसा आचरण किसी अल्पशिक्षित सदस्य द्वारा किया जाए तो भी उसे उपेक्षित कर दिया जाता लेकिन डेरेक जैसे पढ़े-लिखे और अनुभवी सांसद से ये अपेक्षा की जाती है कि वे न सिर्फ स्वयं संसदीय मर्यादाओं का पालन करेंगे अपितु अन्य सदस्यों को भी इस हेतु प्रेरित करेंगे। ये देखते हुए उनके द्वारा नियम पुस्तिका को फेंकना अक्षम्य कार्य था जिसके लिए निलम्बन जैसी कार्रवाई सर्वथा उचित है। राज्यसभा के सभापति पद को देश के उपराष्ट्रपति सुशोभित करते हैं। अत: सदस्यों को उनकी संवैधानिक हैसियत का सम्मान करना चाहिए। और फिर उच्च सदन के सदस्यों का व्यवहार भी उच्च स्तर का होना चाहिए। उस दृष्टि से श्री ब्रायन ने जो कुछ किया उसके लिए उन्हें दण्डित किया जाना जरूरी था। नव निर्वाचित सदस्यों को संसदीय गरिमा का पाठ पढ़ाने के लिए वरिष्ठ सदस्यों की सेवाएँ ली जाती हैं। भविष्य में श्री ब्रायन भी वरिष्ठ होने के नाते नए सांसदों के शिक्षक बन सकते है और तब क्या वे उन्हें यही सीख देंगे कि सदन के नियमों का पालन करने की बजाय नियम पुस्तिका आसंदी की तरफ फेंकते हुए सदन से चले जाएँ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 21 December 2021

आरक्षण का असली लाभ तो नेताओं और उनके परिवारों को मिल रहा



 

म.प्र में पंचायत चुनाव ओबीसी आरक्षण के फेर में उलझा हुआ है | न्यायालयों में  याचिकाओं के  दौर के साथ राजनीतिक आरोप – प्रत्यारोप का अनवरत सिलसिला जारी है | कांग्रेस  आरोप लगा रही है कि भाजपा   ओबीसी विरोधी  है वहीं  भाजपा उसे इस बात के लिये  कठघरे में खड़ा कर रही है कि अदालत जाकर उसने चुनाव टलवाने की चाल चली | जहाँ तक बात न्यायपालिका की है तो उसे केवल इस बात से सरोकार है कि निर्वाचन प्रक्रिया कानून के दायरे के भीतर संचालित हो | इसी बीच म.प्र सरकार की मंशा पर चुनाव आयोग ने ओबीसी को छोड़कर बाकी सीटों के चुनाव करवाने की घोषणा कर दी  | वैसे भी चुनावों की अधिसूचना जारी होने के बाद उसे रद्द नहीं किया जाता |  ऐसे में  मप्र के पंचायत चुनाव दरअसल  उस दलदल में फंस गये हैं जिसे जाति कहा जाता है |  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद भी अन्य पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं किन्तु उन्हीं की पार्टी की नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रहीं साध्वी उमाश्री भारती ने भी गत दिवस ओबीसी सीटों को छोड़कर शेष पर चुनाव करवाने के विरुद्ध मुख्यमंत्री को चेतावनी देते हुए कहा कि 70 फीसदी  आबादी को उपेक्षित नहीं किया जा सकता | उल्लेखनीय है सन्यास ग्रहण करने के बावजूद उमाश्री खुद को पिछड़े वर्ग की नेत्री के तौर पर ही पेश करने में तनिक भी संकोच नहीं करतीं | इस मुद्दे पर विधानसभा में कांग्रेस के स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा होने वाली है जिसमें सत्ता और प्रतिपक्ष एक – दूसरे पर ओबीसी विरोधी होने का आरोप लगायेंगे , हंगामा होगा , स्थगन प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया जावेगा और  फिर विपक्ष नारे लगाते हुए सदन से बाहर निकलकर सरकार पर अलोकतांत्रिक होने का आरोप लगाएगा | ये पटकथा हमारे देश में रोजाना फ़िल्माई जाती है | सही बात ये है कि सभी पार्टियाँ  ओबीसी , अजा  और अजजा की हितचिन्तक न होकर केवल वोटों की लालची हैं  | वरना क्या कारण है कि स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती तक पहुंचने के बाद भी देश में  अगड़ा और पिछड़ा होने का आधार जाति ही बनी हुई है | अजा और अजजा को तो संविधान  बनते ही आरक्षण मिल गया था जबकि ओबीसी आरक्षण आया 1990 में | उसको लागू हुए भी तीन दशक बीत गये लेकिन आज भी ओबीसी वर्ग में आने वाली जातियों के पिछड़ेपन को दूर करने का लक्ष्य अधूरा है | इसका कारण ये है कि जिस तरह अजा और अजजा केवल मतदाता बनकर रह गये उसी तरह ओबीसी का आर्थिक उत्थान तो पृष्ठभूमि में चला गया और उसका राजनीतिक लाभ लेने की प्रवृत्ति हावी हो गयी | इस बारे में देखने वाली बात ये है कि  अजा , अजजा और ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण से उस समुदाय के छोटे से तबके को तो  सरकारी नौकरी के अलावा और कुछ नहीं मिला | लेकिन उनके नेता बने लोगों का आर्थिक , सामाजिक और राजनीतिक उत्थान जरूर हो गया | यही वजह है कि जिस वर्ग को  आरक्षण रूपी लाभ  प्रदान किया गया वह समाज की मुख्यधारा में आने की बजाय और दूर होता जा रहा है | जिसका कारण इस वर्ग के  नेता हैं जो अजा , अजजा और ओबीसी के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के बजाय अपने और अपने परिवार के सुख – समृद्धि और प्रभाव की वृद्धि में लिप्त हैं | इसी कारण ये सवाल स्वाभाविक रूप से उठता रहा है कि सात दशक के बाद भी  समाज का यह वर्ग वंचित क्यों बना  हुआ है ? उमाश्री , मायावती , मुलायम सिंह यादव , लालूप्रसाद  यादव , रामविलास पासवान , शिबू सोरेन आदि का नाम पूरे देश में जाना जाता है | इन सबके परिजनों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर इनके राजनीतिक प्रभाव का लाभ मिला | लेकिन जिस वर्ग के ये नेता  कहे जाते हैं उसकी जो  स्थिति है वह  देखने से लगता है कि उसे जानबूझकर कमजोर बनाकर रखा जा रहा है ताकि  उनका राजनीतिक दोहन किया जा सके | आरक्षण की प्रासंगिकता सरकारी नौकरियों के अलावा केवल चुनाव में ही है | इसीलिये इन  वर्गों में भी राजनीतिक आधार पर वर्ग भेद पैदा हो गया है | लेकिन   अजा , अजजा और ओबीसी समुदाय के सभी बड़े नेताओं का परिवार ही उनकी विरासत का हकदार बन गया है | यहाँ तक कि साध्वी होने के बावजूद उमाश्री जब मुख्यमंत्री बनीं तो उनके भाई और भतीजे राजनीतिक तौर पर ताकतवर होकर उभरे थे | उक्त सभी नेताओं के बेटी – बेटे , पत्नी , भाई और भतीजे ही उनकी राजनीतिक पूंजी के मालिक बन बैठे | ऐसे में जब वे वंचित वर्ग की आवाज उठाते हैं तब उसके पीछे  अपने महत्व को बनाये रखने की चिंता होती है | ये देश का दुर्भाग्य ही है कि 21 वीं सदी में भी जाति हमारी सोच पर हावी है | सैकड़ों साल से आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़े और प्रताड़ित रहे वर्ग को मुख्यधारा में लाने का विचार हमारे संविधान निर्माताओं की ईमानदार सोच का प्रमाण था | लेकिन धीरे – धीरे ऐसे नेता पैदा हो गये जिनके द्वारा  वंचित वर्ग का  भावनात्मक शोषण किया जाता रहा | जरूरत इस बात की थी कि अजा , अजजा और ओबीसी जातियों का नेतृत्व करने वाले नेता इस वर्ग में 100 फीसदी शिक्षा का लक्ष्य तय कर उस पर काम करते | लेकिन उनके अपने बेटे – बेटी तो शिक्षित हो जाते हैं परन्तु  उनका  समाज  अशिक्षित बना रहने से समय के साथ कदम मिलाकर चलने में असमर्थ बना हुआ है | पंचायत चुनाव को लेकर म.प्र में जो राजनीतिक रस्साकाशी  चल रही है उसका उद्देश्य अपना राजनीतिक स्वार्थ साधना ही है | राजनेताओं के मन में ये बात बैठ गई है कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से वंचित वर्ग को बदहाली में ही रहने दिया जावे जिससे वे उनके इशारे पर नाचते रहें | ये सवाल इसलिए उठता है कि उक्त सभी नेताओं ने वंचित वर्ग के शैक्षणिक विकास हेतु कुछ भी नहीं किया | सरकारी नौकरी में अजा , अजजा और ओबीसी वर्ग के जो लोग  हैं उन्होंने भी जाति आधारित  संगठन  बना लिए हैं जबकि उम्मीद ये की जाती थी कि वे संकुचित सोच को त्यागेंगे  | कुल मिलाकर बात ये है कि अजा , अजजा और ओबीसी वर्ग का उत्थान राजनीतिक दांव – पेंच में उलझकर रह गया है | जब तक इस वर्ग के लोगों को वोट बैंक बनाकर रखा जायेगा तब तक इनका  उत्थान असम्भव है | इस बारे में मुस्लिम समुदाय का उदाहरण सामने है जिसके मत हासिल करने के लिए राजनीतिक दल धर्म निरपेक्षता का राग अलापते हुए उनका भयादोहन तो करते हैं किन्तु आज भी देश के अधिकांश मुसलमान यदि मुख्यधारा से अलग - थलग हैं तो उसका कारण उनमें शिक्षा का विकास  न होना है जिसकी वजह से वे राजनेताओं के शिकंजे में फंसे हुए हैं | पहले कांग्रेस ने उनका इस्तेमाल किया और अब लालू – मुलायम तथा ममता जैसे नेता उनका दोहन कर रहे हैं | आरक्षण नामक सुविधा हासिल करने के लिये नई – नई जातियां सामने आ रही हैं | इनमें वे भी हैं जो आर्थिक और सामाजिक तौर पर काफी अच्छी स्थिति में हैं | इसके पीछे  भी राजनीति ही है | उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव का पूर्वानुमान इस बात पर ज्यादा लगाया जा रहा है कि कौन सी जाति किस पार्टी के साथ जायेगी | अजा और ओबीसी में शामिल जातियों के बीच भी राजनीति ने फूट पैदा कर दी है | यही वजह है कि सभी अजा मतदाता मायावती के साथ नहीं हैं | यही स्थिति ओबीसी की है जिनमें  यादव , निषाद , मौर्य , कुर्मी नामक जातियों के भी अलग नेता हैं जो अपनी राजनीतिक हैसियत बनाये रखने के लिए सौदेबाजी करने में नहीं शर्माते | चूँकि वंचित माने जाने वर्ग में शिक्षा का अभाव है इसलिए वे चंद नेताओं के पिछलग्गू बने रहते हैं | आरक्षण का उदेश्य  ऊंच - नीच का भेदभाव मिटाकर  सामाजिक समरसता की स्थापना करना था परन्तु हुआ उसका उल्टा जिससे  आज के भारत में जातिगत अलगाव और ईर्ष्या  अपने चरम पर है | इसे दूर करना बेहद जरूरी है लेकिन जिन नेताओं पर ये जिम्मेदारी है वे ही जाति को जिन्दा रखने पर आमादा हैं क्योंकि उनको देश  से ज्यादा अपनी  चिंता जो है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 December 2021

पंजाब में खालिस्तानी आतंक के लौटने का खतरा



 जो लोग पंजाब की राजनीति के बारे में जानते हैं उन्होंने ये भी सुना होगा कि नब्बे के दशक में वहां जरनैल सिंह भिंडरावाले नामक जो व्यक्ति  उग्रवाद का प्रवक्ता बन गया था उसे तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने ही ज्ञानी जैल सिंह की राजनीतिक वजनदारी कम करने  के लिए बढ़ावा दिया था किन्तु बाद में वही उनके लिए समस्या बन गया जिसकी दुखद परिणिति अंततः श्रीमती गांधी की नृशंस हत्या के तौर पर सामने आई | उल्लेखनीय है अमृतसर के विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में घुसे बैठे भिंडरावाले को ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार नामक फौजी कार्रवाई में मार गिराया गया था जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप ही श्रीमती गांधी को उनके दो सिख अंगरक्षकों ने ही मार दिया और तब दिल्ली में हुए दंगों में हजारों सिखों की हत्या कर दी गई | धीरे –  धीरे  पंजाब में शांति लौट आई और ऐसा लगने  लगा कि उस दौर को भुला दिया गया है | जिस कांग्रेस से सिख समुदाय बेहद नाराज था उसी की सरकार भी कालान्तर में बनीं और खालिस्तान नामक देश विरोधी आन्दोलन पर भी विस्मृति की धूल जम गई | लेकिन ऐसा लग रहा है राख के नीचे दबी चिंगारी फिर  भड़क सकती है | इसके अनेक संकेत बीते कुछ समय से मिल रहे हैं | 13 अप्रैल 2020 को पटियाला के सनौर नामक स्थान में कोरोना के कारण लगाये गये कर्फ्यू का उल्लंघन कर रहे निहंगों ने उनको रोकने वाले पुलिस इंस्पेक्टर  का हाथ तलवार से काट दिया  और भागकर समीपवर्ती गुरूद्वारे में जा घुसे | बाद में किसी तरह उन्हें पकड़ा जा सका | उनके पास से जो चीजें मिलीं वे किसी धार्मिक व्यक्ति से अपेक्षित नहीं थीं |  उस घटना को साधारण अपराध मानकर भुला देने की जो गलती की गई उसके दुष्परिणाम जल्द सामने आने लगे | तीन कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब  की जत्थेदारियों ने जो आन्दोलन शुरू किया उसका केंद्र बाद में दिल्ली बन गया  |  धरना देने वालों में  चूँकि सिख किसान ज्यादा थे  इसलिए उनके भोजन की व्यवस्था हेतु जो लंगर शुरू हुए उनके जरिये सिखों के बीच घुसे अलगाववादी तत्व भी आन्दोलन का हिस्सा बन बैठे | धरनास्थल पर भिंडरावाले के पोस्टर और खलिस्तानी झंडे जैसे सबूतों की आन्दोलन के नेताओं द्वारा की गई  उपेक्षा के  कारण ही 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर निहंग द्वारा शस्त्र प्रदर्शन  का दुस्साहस किया गया |राष्ट्रध्वज के अपमान और धार्मिक ध्वज फहराए जाने के दृश्य भी पूरे देश ने देखे | किसान नेताओं ने उस घटना की निंदा तो की लेकिन वे उपद्रवी तत्वों को धरना स्थल से हटाने का साहस नहीं जुटा सके | उस आन्दोलन के समर्थन में कैनेडा और ब्रिटेन में जो प्रदर्शन हुए उनमें भी खालिस्तानी नारे लगे | लेकिन जब भी इस बारे  में किसान नेताओं का ध्यान आकर्षित किया गया तो वे बहकी – बहकी  बातें करने लगे | जिससे उपद्रवी तत्वों का हौसला मजबूत हुआ और आन्दोलन के  अंतिम चरण में कुछ निहंगों द्वारा  धार्मिक प्रतीक के अपमान के आरोप में एक व्यक्ति की बेरहमी से हत्या कर दी गयी । उनकी गिरफ्तारी भी बड़ी मुश्किल से हो सकी | उस घटना के बाद योगेन्द्र यादव ने  निहंगों से धरना स्थल खाली  करने की मांग की जिसे  ठुकरा दिया गया  | खैर , किसान आन्दोलन तो खत्म हो गया लेकिन उसकी आड़ में नये सिरे से सिख उग्रवाद का जो बीज पनपा उसका असर सामने आने लगा है | विगत दो दिनों में पंजाब से निहंगों द्वारा बेअदबी के नाम पर की गई हत्याओं की जो खबरें आईं वे इस राज्य में पुराना दौर लौटने की आशंका को मजबूत कर रही हैं | कुछ महीनों बाद  विधानसभा चुनाव होने वाले हैं |  फिलहाल वहां जबरदस्त  राजनीतिक अनिश्चितता है | किसान आन्दोलन के जरिये सक्रिय हुई कुछ जत्थेदारियां राजनीतिक महत्वाकांक्षा के संकेत दे रही हैं | उनके एक नेता ने तो बाकायदे अपने उम्मीदवार उतारने  का ऐलान कर दिया है | सत्ताधारी कांग्रेस अपनी अंतर्कलह से जूझने के काण इस सम्वेदनशील मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रही | उसके प्रदेश अध्यक्ष नवजोत  सिंह सिद्धू  और मुख्यमंत्री के बीच खींचातानी की वजह से  प्रशासनिक व्यवस्था चौपट हो रही है | निहंगों द्वारा बेअदबी के नाम पर की जा रही हत्याओं को केवल धार्मिक कट्टरवाद से जोड़कर देखना गलत होगा क्योंकि अतीत में जो कुछ हो चुका है उसके मद्देनजर इन घटनाओं की उपेक्षा पंजाब को एक बार फिर अलगाववाद की  आग में झोंकने का कारण बन सकती है | आश्चर्य की  बात है लिंचिंग  के मामले में चिल्लाने वाली कांग्रेस अपने शासन वाले राज्य में धार्मिक उन्माद के विरुद्ध बोलने से डर रही है | ये कहना भी गलत न होगा कि किसान आन्दोलन का सहारा लेकर पंजाब में धार्मिक कट्टरवादी गुटों और अलगाववादी ताकतों का अघोषित गठबंधन आंतरिक शान्ति के लिए बड़ा खतरा बनने जा रहा है | चुनाव तो आते – जाते रहेंगे लेकिन पंजाब देश का सीमावर्ती राज्य होने से बेहद संवेदनशील है |  खालिस्तानी आतंक को प्रश्रय और प्रशिक्षण देने में पाकिस्तान की  सक्रिय भूमिका किसी से छिपी नहीं है | ये भी ध्यान देने योग्य है कि भारत के विरुद्ध छद्म युद्ध लड़ने की जो रणनीति बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तान ने बनाई थी उसी के तहत अस्सी और नब्बे के दशक में पंजाब में आतंकवाद की शुरुवात हुई थी | जिसके  नियंत्रण में आते ही पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देने की योजना पर अमल किया | धारा 370 हटने के बाद बीते दो वर्ष में वहां के  हालात पर काफी हद तक काबू किया जा सका  , जिससे पाकिस्तान परेशान हो उठा | ऐसा लगता है उसने उसके बदले पंजाब की धरती में दबे पड़े खालिस्तान के बीज को पुनः दाना - पानी देने की कार्ययोजना बनाई है | निहंगों का अचानक बदला व्यवहार बेअदबी के नाम पर किया जाने वाला उन्माद न होकर किसी बड़े षडयंत्र का सूत्रपात हो तो आश्चर्य नहीं होगा | इसके जरिये पंजाब में सिख और हिन्दुओं के बीच खाई पैदा करने का खतरनाक खेल भी हो सकता है | निहंग  , सिखों के संघर्षशील इतिहास का प्रतीक हैं  | लेकिन हाल  की  घटनाओं में उनमें से कुछ का आचरण ये साबित कर रहा है कि वे   सिख गुरुओं के बताये रास्ते से भटककर आतंक  और स्वेच्छाचरिता के प्रतीक बन बैठे हैं | सिख समुदाय में जो विवेकशील लोग हैं उनको निहंगों के इस आतंक के विरूद्ध आवाज उठानी चाहिए | गुरूद्वारों को उनकी पवित्रता और सिख समाज को उसकी  सेवा भावना के लिए पूरी दुनिया में सम्मान की नजर से देखा जाता है | ऐसे में कतिपय निहंगों द्वारा की जा रही हत्याओं से सिख कौम की  छवि पर आंच न आये ये देखा जाना जरूरी है | राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे अपने क्षणिक स्वार्थवश इस आग को भड़काने से बाज आयें वरना  उनके हाथ भी जले बिना नहीं रहेंगे | अतीत की गलतियों की मंहगी कीमत चुकाने के बाद भी  उसे दोहराना किसी दल या नेता से ज्यादा इस देश के लिए हानिकारक होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी