Saturday, 1 January 2022

वैष्णो देवी हादसा : आस्था के अतिरेक का दुखद परिणाम



वर्ष 2022 की सुबह-सुबह इस खबर ने मन दुखी कर दिया कि नए वर्ष पर माता वैष्णो देवी के दर्शन करने गये श्रद्धालुओं के बीच धक्का-मुक्की होने से मची भगदड़ में 12 लोगों की मौत हो गई और 14 घायल हैं जिनमें 3 की हालत गंभीर है। 31 दिसम्बर की रात वैष्णो देवी के दर्शन करने बहुत बड़ी संख्या में भक्तगण जमा हो गये थे। देर रात तकरीबन तीन बजे कुछ लोगों के बीच हुई कहा-सुनी के बाद अफरातफरी मचने से उक्त हादसा हुआ। घायलों के इलाज का इंतजाम प्रशासन द्वारा किया गया है। मृतकों और घायलों के परिवारों को आर्थिक मुआवजा देने का ऐलान केंद्र और राज्य दोनों ने कर दिया है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार नये साल के अवसर पर वैष्णो देवी के दर्शन करने श्रद्धालुओं की बेतहाशा भीड़ जमा होने के बावजूद वहां समुचित व्यवस्था नहीं थी। कटरा से पवित्र गुफा तक के मार्ग पर चूँकि 24 घंटे लोगों का आवागमन लगा रहता है इसलिए विद्युत् आपूर्ति भी निर्बाध रखी जाती है। बावजूद इसके रात में मची भगदड़ में लोग अपना बचाव नहीं कर सके होंगे। हालाँकि इसके पहले भी अनेक धार्मिक स्थलों पर इसी तरह की घटनाएँ दिन के समय होने पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मारे गये थे। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि लगभग हर वर्ष देश के किसी न किसी धार्मिक केंद्र पर इस तरह की जानलेवा घटनाएँ होती हैं। सरकार मुआवजा बाँटकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है वहीं प्रशासन दो-चार कर्मियों पर जिम्मेदारी थोपकर मामले की लीपापोती देता है। हालाँकि अनेक धार्मिक स्थलों पर ऐसे हादसों के बाद व्यवस्था में थोड़ा सुधार किया गया है लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि श्रद्धालुओं की निरंतर बढ़ती भीड़ के कारण सारी व्यवस्थाएं अपर्याप्त साबित होती हैं। वैष्णो देवी धाम में भी बीती रात व्यवस्था की कमी महसूस की गई। लेकिन इसके अलावा विचारणीय प्रश्न ये भी है कि जो श्रद्धालुजन पैसा और समय खर्च कर धार्मिक केन्द्रों पर आते हैं उनमें व्यवस्था का पालन करने की सहज प्रवृत्ति का अभाव होने से अनुशासनहीनता का बोलबाला हो जाता है। आवागमन के साधनों के साथ धार्मिक स्थलों पर भोजन और आवास के इंतजाम बढ़ते जाने से भी यात्रियों की संख्या में समय के साथ बढ़ोतरी होने लगी है। पहले केवल तीर्थयात्री ही ऐसे स्थानों पर जाते थे जिन्हें ज्यादा सुविधाओं की दरकार नहीं होती थी परन्तु अब धार्मिक यात्राओं के साथ पर्यटन का भाव जुड़ जाने से भीड़ बढ़ती जा रही है। जम्मू-कश्मीर जाने वाले अधिकतर सैलानी जाते या लौटते समय वैष्णो देवी के दर्शन करना नहीं भूलते। देश के जिन धार्मिक स्थलों में दर्शनार्थियों की सबसे ज्यादा संख्या आती है उनमें वैष्णो देवी प्रमुख हैं। बीते कुछ दशकों में यहाँ उपलब्ध सुविधाओं एवं व्यवस्थाओं में काफी सुधार हुआ है लेकिन जिस अनुपात में दर्शनार्थी बढ़ते जा रहे हैं उसे देखते हुए वे कम पड़ जाती हैं। नवरात्रि एवं अन्य विशेष अवसरों पर देश भर के मंदिरों एवं अन्य धार्मिक स्थलों पर औसत से ज्यादा भीड़ होती है। आज सुबह से आ रही खबरें इस तथ्य की पुष्टि करती हैं। म.प्र के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में आज सुबह 2 घंटे में 50 हजार श्रद्धालुओं ने दर्शन किये। प्राचीनकाल में बने मंदिरों में गर्भगृह बहुत छोटे होने से भी भक्तों की भीड़ परेशानी का कारण बन जाती है। वैष्णो देवी धाम में गत रात्रि जो हादसा हुआ उसका कारण भी मानवीय लापरवाही और अनुशासनहीनता ही है। श्रद्धालुओं का आपस में झगडऩा और उसके बाद भगदड़ होने से बेक़सूर लोगों का मारा जाना बहुत ही अफसोसनाक है। ऐसी घटना के जिम्मेदार लोगों की पहिचान भी शायद ही हो पायेगी। लेकिन बात केवल मुआवजे के वितरण और सरकारी अमले के दो-चार लोगों के निलम्बन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उल्लेखनीय है 1954 में प्रयागराज (तात्कालिक अलाहाबाद) के कुम्भ में मची भगदड़ में 1000 लोग मारे गये थे। उसके बाद इस मेले की व्यवस्थाओं में लगातार सुधार किया जाता रहा। बढ़ती जनसँख्या के कारण प्रयाग के कुम्भ मेले में विशेष स्नान के अवसर पर करोड़ों लोग पवित्र संगम में स्नान करते हैं। पूरे एक माह तक प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु वहां आते हैं। लेकिन दशकों पहले हुई दुर्घटना से सबक लेकर व्यवस्थाओं में किये सुधारों से प्रयाग का कुम्भ विश्वस्तर पर प्रबंधन विशषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय बन गया। ये बात भी गौर तलब है कि इस मेले में आने वाले यात्री भी व्यवस्थाओं में सहयोग देते हैं। लेकिन सभी धार्मिक स्थलों पर ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि समय-समय पर देश के किसी न किसी हिस्से में इस तरह की दुखद घटनाएँ हो जाती हैं। लोगों के बढ़ते आर्थिक स्तर ने भी धार्मिक पर्यटन में वृद्धि की है। उत्तराखंड में स्थित चार धाम जाने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या में साल-दर साल वृद्धि होने से समूचे गढ़वाल अंचल का पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा गया है। जिसकी वजह से वहां प्राकृतिक आपदाएं जल्दी-जल्दी आने लगी है। अब तो वहां हाइवे भी बन रहे हैं जिसके बाद आवक-जावक और बढ़ जायेगी। दरअसल गलतियों से सीखकर उन्हें सुधारने की बजाय उनको दोहराने की प्रवृत्ति ऐसे हादसों का कारण बनती है। धार्मिक आस्थाओं के पालन में संयम और अनुशासन का बड़ा महत्व होता है जिसका अभाव अनेक विकृतियों को जन्म दे रहा है।  वैष्णो देवी में हुई दुर्घटना का कारण दर्शनार्थियों के बीच हुआ झगड़ा था। इसके लिए निश्चित तौर पर प्रशासनिक अमले के साथ ही मंदिर प्रबंधन की लापरवाही का भी संज्ञान लिया जाना चाहिए। लेकिन तीर्थ स्थान की यात्रा  करने वालों को भी भीड़ की मानसिकता त्यागकर व्यवस्था के अनुरूप आचरण करने का संस्कार विकसित करना होगा। छोटी सी बात का बतंगड़ बनाकर अव्यवस्था फैला देना धार्मिक आस्था का मखौल है। बेहतर हो राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक केन्द्रों संबंधी नियम बनाये जाएँ किन्तु इन्हें लागू करने में साधु-संत, पण्डे और पुरोहित समुदाय की सहमति और सहयोग भी मिलना चाहिए। उनको ये बात समझनी होगी कि आबादी का विशाल आकार तथा आवागमन की सुविधाओं और साधनों के विकास के कारण अब धार्मिक स्थलों की व्यवस्था बदलते हालात के अनुसार की जानी चाहिए जिससे इस तरह की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 31 December 2021

जीएसटी सरकारी मुनाफाखोरी का जरिया बना : एक देश , एक कर , एक दर का सपना अधूरा



 जुलाई 2017 से लागू हुई जीएसटी नामक एकीकृत कर प्रणाली का कितना लाभ हुआ ये आकलन करना समय की मांग है | एक देश एक टेक्स के नारे से ओतप्रोत यह व्यवस्था  लागू किये जाने के बाद राज्यों को अनेक प्रकार के करों को रद्द करना पड़ा  | उसके एवज में उन्हें पाँच वर्ष तक केंद्र द्वारा क्षति पूर्ति किये जाने का निर्णय भी किया गया था | दरअसल इस प्रणाली को जमीन पर उतारने के लिए राज्यों  के वित्तमंत्रियों की  एक  काउन्सिल बनाई गई थी | उसने लम्बे विचार – विमर्श के बाद जो ढांचा बनाया उसी के अनुसार इस कर प्रणाली को लागू किया गया जिसका उद्देश्य विभिन्न राज्यों में करों के अंतर को खत्म कर उपभोक्ता को लाभान्वित करने के साथ ही पारदर्शिता लाना था | हालाँकि इसे अपनाने में व्यापारी और उद्योगपति वर्ग को अनेकानेक परेशानियां उठानी पड़ीं | सरकार द्वारा जिस तेजी से नियमों , शर्तों , तथा दरों में बदलाव किये गये  उससे जबरदस्त अनिश्चितता बनी रही | वैसे प्रारम्भिक तौर पर ऐसा होना लाजमी भी था लेकिन इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि जीएसटी की दरों के साथ ही उसमें शामिल होने या बाहर रखी जाने वाली वस्तुओं को लेकर आज तक उहापोह कायम है और  साढ़े चार साल बीत जाने के बाद भी  काउंसिल किसी ऐसे मुकाम पर नहीं पहुंच सकी  जिससे ये कहा जा सके कि अब लम्बे समय तक  दरों के अलावा उसे जुड़ी प्रक्रियाओं में कोई बदलाव नहीं होगा | आज फिर काऊंसिल की बैठक है जिसमें करों के चार स्तरों की बजाय तीन किये जाने के साथ ही कुछ वस्तुओं पर  दरों में घटा - बढ़ी की सम्भावना व्यक्त की गई है | ये कहना गलत न होगा कि इस प्रणाली से कर चोरी काफी हद तक रुकी है और केंद्र सरकार को अपेक्षित राजस्व भी मिल रहा है | विभिन्न राज्यों के करों में विभिन्नता समाप्त होने से उनकी सीमाओं पर बने नाकों में होने वाले भ्रष्टाचार में भी कमी आई है | यद्यपि सरकारी अमले और कर चोरों के बीच संगामित्ति की खबरें भी आने लगी हैं लेकिन प्रति माह के आंकड़ों से ये साबित हो गया है कि जीएसटी केंद्र सरकार के लिए तो फायदेमंद है परन्तु  इससे राज्यों की समस्या बढ़ गईं क्योंकि  उनको जिस क्षतिपूर्ति का वायदा किया गया था वह समय पर नहीं मिलती | गत दिवस वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के साथ बजट पूर्व चर्चा हेतु   जो बैठक हुई उसमें अधिकतर राज्यों के प्रतिनिधियों ने ये मांग कर डाली कि क्षति पूर्ति का प्रावधान पाँच साल और बढ़ाया जावे |इसके पीछे ये तर्क दिया गया कि कोरोना के कारण उत्पन्न हालातों के कारण अर्थव्यवस्था जिस तरह डगमगाई  उसकी वजह से उनकी आर्थिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा है | उनकी मांग तर्कसंगत तो  है ही तथ्यपूर्ण भी है | आज हो रही  काउंसिल की बैठक में भी  इस बारे में  केंद्र की घेराबंदी होना तय है लेकिन मुख्य मुद्दा कुछ वस्तुओं पर कर बढ़ने और घटने के अलावा 5 फीसदी की दर समाप्त कर केवल 12 , 18 और 28 फीसदी रखना है | निष्पक्ष आकलन करने पर जीएसटी की तमाम अच्छाइयों के बीच जो सबसे बड़ी बुराई देखने में मिली वह है दरों की विभिन्न पायदानों के अलावा पेट्रोलियम पदार्थों को  जीएसटी से बाहर रखा जाना | जो राज्य काउंसिल की बैठक में अपने राजस्व के नुकसान का रोना रोते हैं वे जनता की परेशानियों के प्रति जिस तरह असंवेदनशील बने रहते हैं उसे  देखकर ये कहा जा सकता है कि सैद्धांतिक मतभेदों के बावजूद जनता के शोषण में  सब एक हैं | जिन देशों में जीएसटी काफी पहले से लागू है उनमें से अधिकतर ने करों की एक या अधिकतम दो दरें ही रखी हैं | विलासिता की चीजों पर अधिक करारोपण पर किसी को आपत्ति नहीं होती किन्तु आम जनता के दैनिक उपयोग की चीजों पर भी भारी - भरकम जीएसटी थोपना उसके प्रति अन्याय नहीं तो और क्या है ? यदि जीएसटी काउंसिल को जनता के प्रति जरा सी भी हमदर्दी है तो उसे एक देश एक कर और एक दर के सूत्र को लागू करने का साहस दिखाना चाहिए | बहरहाल विलासिता की वस्तुओं पर अधिभार लगाकर राजस्व बढ़ाया जा सकता है | इसी तरह पेट्रोल , डीजल सहित अन्य पेट्रोलियम वस्तुओं को जीएसटी के अंतर्गत लाकर आम जनता के कन्धों पर पड़ रहे बोझ को कम करना राष्ट्रीय अपेक्षा है | कोरोना काल के बाद अर्थव्यवस्था जिस तेजी से पटरी पर लौट रही है और उद्योग , व्यापार जगत के साथ ही उपभोक्ता बाजार में उत्साह नजर आ रहा है उसके चलते उक्त दोनों मांगों पर काउंसिल को विचार करना चाहिए क्योंकि कर प्रणाली में किया गया ये बदलाव सरकार का खजाना भरने के उद्देश्य के साथ ही आम उपभोक्ता को करों की विसंगतियों से बचाकर राहत देने के लिए  था | अभी तक जो देखने में आया है उसके अनुसार सरकार के खजाने में तो  अपेक्षित राजस्व आने लगा है  | कोरोना काल में सरकार के सामने जो आर्थिक संकट आ खड़ा हुआ उस दौरान जनता ने भी धैर्य रखते हुए कोई दबाव नहीं बनाया | लेकिन  अब जबकि खुद सरकार ये दावा करने में जुटी है कि आर्थिक मोर्चे पर भी कामयाबी के कारण विकास दर 9 फीसदी होने की संभावना बढ़ती जा रही है तब  आम उपभोक्ता उससे  ये उम्मीद करता है कि  आसमान छूती महंगाई से राहत दिलवाने के लिए जीएसटी की दरें घटाए जाने के साथ ही अधिकतम दो पायदानें ही रखी जावें | सबसे बड़ी मांग जनता के हर वर्ग की है पेट्रोल – डीजल आदि को जीएसटी के अंतर्गत लाने की क्योंकि महंगाई का सबसे बड़ा स्रोत यही है |  आज होने वाली बैठक केन्द्रीय बजट के पूर्व होने से उसके निर्णयों का असर श्रीमती सीतारमण द्वारा पेश किये जाने वाले आगामी बजट पर पड़ना स्वाभाविक ही है | रही बात काउंसिल की स्वायत्तता को बनाये रखने की तो लगभग डेढ़ दर्जन राज्यों में भाजपा या उसके अनुकूल सरकारें होने से यदि वह चाह ले तो जनहित के तमाम फैसले बहुमत से करवा सकती है | लेकिन इस बारे में अनेक तरह के विरोधाभास भाजपा शासित राज्यों के बीच भी देखने मिलते हैं | मसलन  उ.प्र और म.प्र में ही पेट्रोल – डीजल के दामों में 10 रु. प्रति लिटर का बड़ा अंतर है | स्मरणीय है केंद्र सरकार ने दीपावली के तोहफे के तौर पर इन दोनों पर करों में कमी की तो मजबूरन भाजपा राज्यों ने भी उसमें सहयोग दिया | देखा - सीखी अन्य दलों की राज्य सरकारों को भी  वैसा करना पड़ गया | उसके बाद से अर्थव्यवस्था में और सुधार हुआ है जिसे देखते हुए जीएसटी काउंसिल को कल से शुरू होने जा रहे नव वर्ष पर आम जनता को ऐसा उपहार देना चाहिए जिससे वह राहत अनुभव कर सके | पता नहीं सत्ता में बैठे राजनेताओं को ये बात कब समझ में आयेगी कि करों की कम दरें उनकी चोरी रोकती हैं वहीं महंगाई पर नियन्त्रण होने से उपभोक्ता की क्रय शक्ति में होने वाला इजाफा अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 30 December 2021

नेताओं के जलसों का बहिष्कार भी कोरोना से बचाव में सहायक होगा



 

वर्ष 2020 का अंत आते तक ये विश्वास हो चला था कि कोरोना विदा हो गया है | टीके की खोज होने के कारण लोगों का आत्मविश्वास भी बढ़ गया था | लॉक डाउन हटने के बाद  दीपावली के साथ  ब्याह – शादी पर बाजारों तथा जलसों में  भीड़ होने के बावजूद सब कुछ सामान्य लगने लगा था | ऐसा लग रहा था कि कोरोना नामक महामारी अलविदा कह चुकी है  किन्तु कुछ समय बाद ही वह दबे पाँव लौटी  और फिर ऐसा तांडव मचाया कि चारों तरफ मौत मंडराने लगी | लगभग 100 साल बाद मानव जाति के सामने महामारी की इतनी विशाल चुनौती आने से पूरी दुनिया हलाकान हो उठी | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि कोरोना ने न सिर्फ लोगों के स्वास्थ्य पर हमला किया अपितु पूरे विश्व की  अर्थव्यवस्था को भी हिलाकर रख दिया  | बीते कुछ महीने राहत के जरूर बीते लेकिन कोरोना के पीछे ओमिक्रोन नामक नया वायरस आ धमका | इसकी दहशत इतनी जबर्दस्त थी कि दक्षिण अफ्रीका में दो – चार मरीज मिलते ही दुनिया भर के शेयर बाजार गोते खाने लगे | इसकी संक्रमण क्षमता कोरोना से ज्यादा बताई गई | प्रारंभिक तौर पर ये भी कहा गया कि इसका इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं है और कोरोना का टीका लगवा चुके व्यक्ति को भी ये लपेटे में ले सकता है | इसी दौरान यूरोप के अनेक विकसित देशों में कोरोना की वापिसी हो गई | उल्लेखनीय है कुछ समय पहले ही अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें शुरू हुई थीं | जिनकी वजह से एक देश से दूसरे में लोगों का आना – जाना प्रारम्भ हो गया | भारत में चूंकि टीकाकरण जोरों से चल रहा था इसलिए ये विश्वास होने लगा था कि कोरोना विरोधी रोग प्रतिरोधक क्षमता का सामूहिक विस्तार होने से अब ये महामारी बेअसर हो जायेगी | लेकिन तमाम उम्मीदें और कयास संदेह के घेरे में आते जा रहे हैं | देश में ओमिक्रोन के मरीजों की संख्या में तो धीमी वृद्धि दिखाई दी तथा मृत्यु दर भी नहीं के बराबर देखी जा रही है | संक्रमित व्यक्ति की हालत भी ज्यादा गंभीर नहीं होती और न ही ऑक्सीजन की जरूरत ही पड़ती है | लेकिन ये संतोष ज्यादा समय तक बना नहीं रह सका क्योंकि बीते कुछ ही दिनों कोरोना के मरीजों की संख्या में तेजी से वृद्धि होने लगी | ताजे आंकड़ों के अनुसार लगभग एक महीने के बाद कोरोना के कुल मरीजों की संख्या 10 हजार हो गई | ये देखने के बाद टास्क फ़ोर्स ने तीसरी लहर आने का ऐलान भी कर दिया | अनेक राज्यों में  रात्रिकालीन कर्फ्यू पहले से ही लागू किया जा चुका है | यद्यपि सरकार लॉक डाउन जैसी किसी स्थिति के पुनरागमन से इंकार कर रही है किन्तु जैसी खबर मुंबई से गत दिवस मिली वह आगे भी जारी रही तब ये मान लेना पड़ेगा कि ओमिक्रोन के हल्ले के बीच कोरोना एक बार फिर आ धमका है  | ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है क्योंकि अभी तक पूरी आबादी को कोरोना का दूसरा टीका नहीं लग सका है | आने वाले साल में बच्चों के टीकाकरण का अभियान शुरू होने वाला है | बुजुर्गों को बूस्टर डोज लगाने की तैयारी भी सरकारी एजेंसियाँ कर रही हैं | ऐसे में तीसरी लहर के आ जाने से एक बार फिर देश संकट में फंस सकता है | नए साल के जश्न पर तो पहले से ही पाबंदियां लगा दी गई हैं लेकिन सबसे ज्यादा चिंता पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव को लेकर हैं | चुनाव आयोग ने तो उनको रद्द न करने का संकेत दे दिया है वहीं  नेताओं की सभाएं और रैलियां भी जारी हैं |  देश भर के पर्यटन स्थलों में सैलानियों की भीड़ बढ़ गई है | मकर संक्रांति के बाद विवाह शुरू हो जायेंगे | शालाएं और महाविद्यालय भी खोले जा चुके हैं | अनेक कम्पनियों ने वर्क फ्रॉम होम नमक व्यवस्था खत्म कर दी है | उद्योग - व्यापार भी लम्बे गच्चे के बाद पटरी पर लौट रहे हैं | आर्थिक विशेषज्ञ विकास दर के 9 फीसदी रहने का अनुमान लगाकर आशावादी बने हुए हैं | लेकिन क्या ये सब इतना आसान है जितना दिखाई दे रहा है क्योंकि कोरोना की तीसरी लहर की पदचाप सुनाई देने के बाद भी यदि जनता और सरकार दोनों सच्चाई से आँखें मूंदे  रहीं तो फिर 2021 के हालात दोहराए जा सकते हैं | भले ही चिकित्सा तंत्र पहले से ज्यादा सक्षम हो लेकिन ये बात बिलकुल सच है कि देश फ़िलहाल महामारी के तीसरे दौर को झेलने की हालत में नहीं है | दुर्भाग्य से वह आ गया तो भले ही मौतें कम हों और संक्रमण उतना गम्भीर न रहे लेकिन अर्थव्यवस्था के बढ़ते कदम न सिर्फ रुकने अपितु उनके पीछे लौटने का भी  अंदेशा है | ऐसे में अब जनता को चाहिए वह पिछले अनुभवों से सीखकर कोरोना , ओमिक्रोन अथवा इनसे जुड़े अन्य संक्रमणों से बचाव के प्रति पूरी सतर्कता बरते | देखने में आ रहा है कि मास्क के उपयोग जैसी सावधानी के प्रति भी लोगों  में अव्वल दर्जे का उपेक्षाभाव है | हमारे देश में  एक वर्ग ऐसा भी है  जो कोरोना को कपोल - कल्पित मानकर मास्क और  शारीरिक दूरी के प्रति तो लापरवाह है ही किन्तु टीका लगवाने को भी तैयार नहीं है | और की तो छोड़िये अखिलेश यादव जैसे सुशिक्षित नेता तक टीके का भी राजनीतिकरण करने में नहीं शर्माये | मुस्लिम समुदाय में भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो  कोरोना को सरकार द्वारा खड़ा किया गया  भय का भूत मानते हैं | बहुसंख्यक वर्ग में भी अशिक्षा के कारण कोरोना के प्रति सावधान रहने के प्रति हद दर्जे की लापरवाही है | ये कहने वाले भी मिल जाते हैं कि भारत में  आम आदमी जिस बदहाली में रहता है उसके कारण उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित देशों की तुलना में कहीं ज्यादा है | इस दावे की पुष्टि में ये तर्क दिया जाता है कि विशाल आबादी के बावजूद भारत में कोरोना से हुई मौतें अनेक यूरोपीय देशों से कम रहीं | इस बारे में विचारणीय बात ये है कि कोरोना के दो हमलों के बाद अब तीसरे के प्रति जन सामान्य में भी आवश्यक जागरूकता आ जानी चाहिए | आदर्श स्थिति तो वह होगी जब आम जनता नेताओं के जलसों का बहिष्कार करते हुए उनको ये एहसास करवाए कि उसे अपनी जान की कीमत समझ में आ गई है | कोरोना अब अपरिचित नहीं रहा | उसके खतरे से समाज का बड़ा वर्ग पूरी तरह परिचित है | करोड़ों लोग उसके संक्रमण का दंश भोग भी चुके हैं |  इसके बाद भी अगर लापरवाही दिखाई जाती है तब वह आत्मघाती होगी | कोरोना या उस जैसी महामारी केवल लोगों के स्वास्थ्य पर ही बुरा असर नहीं डालती अपितु उससे सामाजिक जीवन अस्त व्यस्त होने के अलावा अर्थव्यवस्था को भी बड़ा नुकसान होता है जो बमुश्किल रफ़्तार पकड़ रही है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 December 2021

अंग्रेजों ने हिन्दू – मुस्लिम में बाँटा अब नेता जातियों में बाँट रहे हैं



 म.प्र के पंचायत चुनाव कानूनी विवाद के चलते रद्द हो गये | ओबीसी आरक्षण के प्रतिशत को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक चली  कानूनी लड़ाई अनिर्णीत रहने के कारण उत्पन्न पेचीदगियों के चलते चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद रद्द करनी पड़ी | राज्य सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इस बात के पुख्ता प्रमाण  देने हैं कि म.प्र में ओबीसी आबादी और उसकी आर्थिक – सामाजिक स्थिति उसे 27 फीसदी आरक्षण देने का औचित्य साबित करने के लिए पर्याप्त है | इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय से समय मांगकर ओबीसी की गणना करवाए जाने की व्यवस्था भी की जा रही है | हालाँकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री उमाश्री भारती द्वारा सार्वजानिक तौर पर ओबीसी की जो जनसँख्या इशारों – इशारों में बताई गई वह तो 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है | ऐसे में जाति आधारित जनगणना किये जाने के बाद यदि यह वर्ग 27 फीसदी से भी  ज्यादा आरक्षण मांगने लगे तब सरकार क्या करेगी ये सोचने वाली बात है | उल्लेखनीय है केंद्र सरकार तमाम दबावों के बाद भी जातिगत जनगणना करवाए जाने के लिए राजी नहीं है | सर्वोच्च न्यायालय इस प्रकरण में क्या फैसला करता है और उसके बाद पंचायत चुनाव का  क्या स्वरूप होगा इसके लिए अब कुछ महीनों तक प्रतीक्षा करनी होगी | चुनाव रद्द होने को लेकर भी राजनीतिक पैंतरेबाजी चल पड़ी है | कांग्रेस और भाजपा दोनों इसे अपने – अपने नजरिये से  देखते हुए खुद को ओबीसी हितैषी साबित करने के लिए वाक्युद्ध कर रहे हैं | लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो प्रदेश में ओबीसी की आबादी का प्रतिशत उतना बड़ा मुद्दा नहीं है जितना ये कि क्या वाकई चुनाव में आरक्षण  देने मात्र से पिछड़ी जातियों का उत्थान हो जाएगा ? पंचायत और स्थानीय निकायों में अनु. जाति और जनजाति के अलावा ओबीसी के लिए आरक्षण काफी समय से चला  आ रहा है | ग्राम  , जनपद और  जिला पंचायत के अतिरिक्त नगर पालिका और निगमों में भी सदस्य , पार्षद , अध्यक्ष और महापौर आदि के पद उक्त वर्गों के लिए आरक्षित किये जाते रहे हैं | लेकिन उसका जैसा फायदा अपेक्षित था वह कहीं नजर नहीं आता | उलटे उसके नुकसान सबके सामने हैं | इसका कारण ये है कि चुनावी आरक्षण से इन वर्गों का उत्थान होना होता तो सत्तर साल बाद भी इसकी जरूरत न रहती | सरकारी नौकरियों की  मौजूदा और भावी दशा को देखते हुए ये माना जा रहा है कि आरक्षण रूपी रेवड़ी की मिठास बहुत लंबे समय तक कायम नहीं रखी जा सकेगी | सरकारी उद्यमों के विनिवेश , निजीकरण और निगमीकरण की वजह से आरक्षण अब नौकरी की गारंटी भी नहीं रह गया है | ले देकर चुनाव ही बच रहता है जिसमें आरक्षण नामक व्यवस्था कायम है और रहेगी | लेकिन इससे क्या हासिल हुआ और भविष्य में क्या होगा इस पर विचार नहीं किया गया तब आरक्षण नामक सुरक्षा के बावजूद भी अनु. जाति और जनजाति के साथ ही  ओबीसी समुदाय की शैक्षणिक , आर्थिक  और सामाजिक स्थिति में किसी सुधार की उम्मीद करना  व्यर्थ है जिसकी वजह है वंचित वर्गों के भीतर उत्पन्न वर्गभेद | भले ही इस बात को हवा में उड़ा दिया जाता हो किन्तु आरक्षण की बैसाखी का सहारा लेकर प्रगति कर गया वर्ग अपने ही समाज में अगड़े –  पिछड़े की  स्थिति बनाने में जुट गया है | सरकारी नौकरी अथवा राजनीतिक प्रभुत्व प्राप्त आरक्षित वर्ग के लोग अपने समाज के उत्थान की बजाय अपने परिवार का भविष्य संवारने में लगे हुए हैं | इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय तक को क्रीमी लेयर जैसी बात कहनी पड़ी | लेकिन दिक्कत ये है कि आरक्षित वर्ग का नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में है वे इस सुविधा को पात्र लोगों तक पहुँचने में बाधक बने हुए हैं | सरकारी नौकरियों में बैठे बड़े साहब और  राजनीति के माध्यम से सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा बन चुके आरक्षित वर्ग के लोगों का अपने ही समाज के वंचित वर्ग के सर्वागींण विकास में क्या और कितना योगदान है , ये गहन विश्लेषण और अध्ययन का विषय है | यही वजह है कि दलितों में महा दलित और पिछड़ों में भी अति पिछड़े जैसे वर्ग उभरने लगे जिसकी वजह से आरक्षण का भी बंटवारा होने लगा | निश्चित तौर पर इसके पीछे राजनेताओं की चालाकी है लेकिन जिस सामाजिक भेदभाव को मिटाने के लिए आरक्षण नामक व्यवस्था की गई थी वह नए स्वरूप में सामने आ गया | वरना क्या कारण है कि बहुजन समाज का नेतृत्व करने निकलीं मायावती के साथ जाटव भले जुड़े हों  लेकिन बाकी दलित जातियां छिटकती जा रही हैं | यही हाल लालू और मुलायम के बाद उनके बेटों का हो गया जो यादवों के मुखिया बनकर मुस्लिम समुदाय के साथ मिलकर एम - वाई  समीकरण के बल पर राजनीति कर रहे हैं | उ.प्र के वर्तमान चुनाव में राजभर , निषाद , मौर्य , कुर्मी और इन जैसी अनेक पिछड़ी जातियों के नेताओं ने सौदेबाजी के लिए अपनी पार्टियाँ बना ली हैं | इसके पीछे भी किसी जाति विशेष के प्रभुत्व से खुद को आजाद करने की लालसा है |  बहुजन समाज और ओबीसी जैसे शब्द सही मायनों में अब केवल कागज पर रह गये हैं |  जाति के भीतर उपजाति का जो नया दौर चल पड़ा है उससे तो लगता है भविष्य में आरक्षण नामक व्यवस्था में भी बंटवारे का झगड़ा मचेगा | ये देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सबका विकास नामक जो नारा दिया गया उसको सही अर्थों में लागू करने का समय आ गया है | जिस तरह मुफ्त अनाज के वितरण के साथ ही आयुष्मान योजना , वृद्धावस्था और निराश्रित पेंशन , उज्ज्वला योजना आदि में जाति की बजाय आर्थिक आधार पर पात्रता तय की जाती है उसी तरह अब आरक्षण को भी मौजूदा ढांचे से निकालकर व्यवहारिक रूप दिया जाना चाहिए जिससे कि आर्थिक दृष्टि से कमजोर हर व्यक्ति या वर्ग के विकास का उद्देश्य पूरा हो सके | इस सुझाव को आरक्षण विरोधी कहा जा सकता है किन्तु मौजूदा स्वरूप में आरक्षण को जारी रखना लकीर का फ़कीर बने रहना होगा | ये सवाल केवल म.प्र के पंचायत चुनाव को लेकर पैदा हुए विवाद  तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय स्तर पर विचार योग्य बन गया है | इस बारे में ये कहना भले ही कड़वा लगे लेकिन जिस तरह अंग्रेजों ने जाते – जाते भारत में हिन्दू और मुस्लिमों के बीच खाई पैदा की वही गलती हमारे राजनेता समाज को जातियों और उप जातियों में बाँटकर कर रहे हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 28 December 2021

बीमारू न सही लेकिन स्वस्थ भी तो नहीं है म.प्र



2003 के विधानसभा चुनाव में म.प्र के बीमारू राज्य होने का मुद्दा बहुत तेजी से उठा था। भाजपा ने बिसपा (बिजली, सड़क और पानी) को लेकर तत्कालीन दिग्विजय सरकार को ऐसा घेरा कि वे सत्ता से बाहर हो गए। उसके बाद लगातार 15 साल तक भाजपा की सरकार रही और फिर 15 महीने के छोटे से कालखंड को छोड़कर शिवराज सिंह चौहान पुन: सत्तासीन हो गये। यद्यपि ये जनादेश की बजाय दलबदल की कृपा थी किन्तु सत्ता सँभालते ही लॉक डाउन रूपी अग्नि परीक्षा सामने आ खड़ी हुई। उस दौर के जैसे-तैसे बीतने पर राहत की सांस ली ही जा रही थी कि पहले से ज्यादा खतरनाक अंदाज में कोरोना लौटा और सर्वत्र मौत का मंजर नजर आने लगा। अस्पतालों में बिस्तर के लिए मारामारी मचने लगी, किसी तरह भर्ती भी हुए तो ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की कमी ने न जाने कितनों की जान ले ली। श्मशान घाट में अंतिम संस्कार की जगह तक आसानी से नहीं मिल रही थी। अप्रैल और मई के महीने बहुत ही दर्दनाक यादें छोड़ गये। हालाँकि सरकार से उस दौरान जो और जैसा बन सका किया किन्तु ये बात खुलकर सामने आ गई कि आबादी के सात दशक बीत जाने के बाद भले ही भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया हो लेकिन 135 करोड़ की विशाल आबादी के स्वास्थ्य की रक्षा करने के मामले में हम वैश्विक मापदंडों के लिहाज से बहुत ही पीछे हैं। ये बात तो सत्य है कि विकसित देशों की तुलना में आबादी के आकार को देखते हुए हमारे देश में कोरोना से हुई मौतों का आंकड़ा कम रहा लेकिन उसके पीछे भी अनेक कारण हैं। टीके का उत्पादन जल्द शुरु कर टीकाकरण अभियान का संचालन भी छोटा काम नहीं था किन्तु अनेकानेक बाधाओं के बावजूद देश की बड़ी आबादी को कोरोना का टीका लगाया जा सका और तीसरी लहर की आशंका के चलते बुजुर्गों को बूस्टर डोज के अलावा अब बच्चों को टीका लगाये जाने की तैयारी भी चल रही है। म.प्र. ने भी इस कार्य में भरपूर योगदान दिया। आबादी के बड़े हिस्से को कोरोना के दोनों टीके लग जाने के कारण सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी अपेक्षित वृद्धि हुई। कोरोना काल से सीख लेकर म.प्र. में सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं के उन्नयन की दिशा में यूँ तो काफी काम हुआ लेकिन नीति आयोग की जो ताजा रिपोर्ट आई उसके अनुसार देश के 19 बड़े राज्यों की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में म.प्र का स्थान 17 वां है। इससे नीचे केवल बिहार और उ.प्र ही हैं। 2019-20 की इस रिपोर्ट में चिकित्सा सेवाओं के हर मापदंड पर प्रदेश पिछड़ा ही नहीं अपितु बदतर स्थिति में है। ये बात इसलिए भी विचारणीय है क्योंकि प्रदेश का स्वास्थ्य बजट लगभग 5 हजार करोड़ का है जिसमें चिकित्सा महाविद्यालय शामिल नहीं है। स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े हर पहलू में प्रदेश की दयनीय स्थिति ये दर्शाती है कि या तो शासन-प्रशासन का ध्यान इस तरफ नहीं है या फिर बजट में दी जा रही राशि का दुरूपयोग हो रहा है। शर्म करने की बात ये भी है कि म.प्र की स्थिति लगातार 16 वें स्थान से नीचे ही रही जबकि कुछ राज्यों ने अपनी व्यवस्थाओं को सुधार कर ऊपर की पायदान में जगह बनाई है। शिवराज सरकार ने बिजली और सड़क के क्षेत्र में अच्छा काम किया है तथा ग्रामीण विकास का लक्ष्य भी काफी हद तक पूरा हुआ है। कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण प्रतिवर्ष राज्य को कृषि कर्मणा पुरस्कार भी मिलता है। गेंहूं के साथ धान और दलहन के उत्पादन में आगे बढऩे के साथ ही पर्यटन और उद्योग के मामलों में भी स्थिति पूर्वापेक्षा काफी बेहतर कही जा सकती है। शिवराज सरकार ने प्रदेश में आधा दर्जन से ज्यादा नये मेडिकल कालेज खोलने की जो पहल की वह भविष्य में चिकित्सकों की कमी दूर करने में सहायक होगी। लेकिन इसी के साथ सोचने वाली बात ये है कि पहले से कार्यरत चिकित्सा महाविद्यालयों में ही पढ़ाने हेतु पर्याप्त शिक्षक नहीं होने से मेडिकल काउन्सिल ऑफ इण्डिया के निरीक्षण में उनकी मान्यता पर खतरे की तलवार लटका करती है। राजधानी भोपाल के वीआईपी कहे जाने वाले हमीदिया मेडिकल कालेज की दुरावस्था भी किसी से छिपी नहीं है। जो जिला अस्पताल काम कर रहे हैं उनमें भी चिकित्सकों के साथ नर्सिंग स्टाफ और दवाओं का टोटा बना हुआ है। प्रधानमंत्री की आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत गरीबों को 5 लाख तक के मुफ्त इलाज की जो सुविधा दी गई वह निजी क्षेत्र के अस्पतालों के लिए तो रूपये छापने की मशीन साबित हुई लेकिन उससे भी जन स्वास्थ्य की स्थिति में गुणात्मक सुधार नहीं हो सका। म.प्र से हजारों की संख्या में नौजवान काम धंधे की तलाश में महानगरों का रुख करते हैं। लेकिन बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है जो अच्छे इलाज के लिए नागपुर, मुम्बई, दिल्ली, अहमदाबाद अथवा अन्य किसी शहर में जाने मजबूर हैं। जबकि भोपाल में एम्स और इंदौर में पीजीआई जैसे संस्थान स्थापित हुए भी लंबा समय बीत चुका है। शिवराज सरकार के लिए नीति आयोग की ये रिपोर्ट वाकई शर्मिंदा करने वाली है। इसे झुठलाने का भी कोई आधार उसके पास नहीं है क्योंकि केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है। प्रश्न ये है कि ये हालात क्यों हैं और इसका सीधा-सपाट जवाब है शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का जन स्वास्थ्य के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया। भोपाल के हमीदिया अस्पताल में दर्जन भर बच्चे आग में झुलसकर जान गंवा बैठे लेकिन उसका ठोस कारण आज तक कोई नहीं जानता। दो-चार निलम्बन और स्थानान्तरण करने के बाद सब पहले जैसी स्थिति में आ गया। सरकारी अस्पतालों में कार्यरत अधिकतर चिकित्सक मनमाफिक स्थान पर नियुक्ति के लिये मंत्रियों और अधिकारियों की गणेश परिक्रमा करते रहते हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते भी चिकित्सा व्यवस्था चरमराती है। रही-सही कसर पूरी कर देता है भ्रष्टाचार। इस सबके कारण पूरा ढांचा कमजोर हो चला है। शिवराज सिंह ने म.प्र में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया है। उनके राज में प्रदेश अनेक क्षेत्रों में आगे आया है ये कहना भी पूरी तरह सही होगा। जनता के साथ उनका सम्पर्क और संवाद भी प्रभावशाली है। निजी तौर पर वे काफी सरल, मिलनसार और मितभाषी माने जाते हैं। भोपाल में बैठने की बजाय लगातर प्रदेश भर में दौरे करना उनकी विशेषता है। प्रशासनिक अनुभव के लिहाज से भी वे अब काफी समृद्ध हैं। ऐसे में ये अपेक्षा करना बेमानी नहीं है कि बीमारू राज्य के कलंक को धो डालने के बाद म.प्र की गिनती उन प्रदेशों में हो जो स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से उत्तम माने जाते हैं। सरकार के लिए ये सोचने वाली बात है कि आज भी तमाम वीआईपी सरकारी खर्च पर इलाज हेतु बाहर भेजे जाते हैं। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट विपक्ष के लिए एक हथियार की तरह है लेकिन कांग्रेस भी चूँकि इस मामले में बराबर की कसूरवार है इसलिए वह तो ज्यादा कुछ न कह सकेगी किन्तु मुख्यमंत्री को इस रिपोर्ट को चुनौती की तरह लेना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार विकास की आधारभूत आवश्यकता है। उस दृष्टि से म.प्र भले ही बीमारू न रहा हो लेकिन स्वस्थ भी नहीं है जो विरोधाभास से कहीं ज्यादा विडंबना है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 December 2021

आरक्षण के नाम पर समाज को बाँटने में नेताओं को न शर्म है और न ही संकोच


म.प्र में पंचायत चुनाव फिलहाल टल गये हैं। पिछली कमलनाथ सरकार द्वारा की गई आरक्षण व्यवस्था को बदलने के लिए वर्तमान शिवराज सरकार ने जो अध्यादेश निकाला वह राजनीति के साथ ही कानूनी विवादों के पेंच में ऐसा फंसा कि समूची चुनाव प्रक्रिया झमेले में फंस गई। उच्च और सर्वोच्च न्यायालय तक चली लड़ाई के बाद विधानसभा में भी सत्ता और विपक्ष में जमकर आरोप-प्रत्यारोप देखने मिले। कांग्रेस और भाजपा दोनों ये साबित करने में जुटे रहे कि ओबीसी समुदाय के सबसे बढ़ी हितैषी वही हैं। विधानसभा में मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि बिना ओबीसी आरक्षण के पंचायत चुनाव नहीं होंगे। न्यायालय में आ रही कानूनी रुकावटों के बाद राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षित सीटों को छोड़ बाकी के चुनाव करवाने की घोषणा कर डाली जिसके बाद नामांकन भी शुरू हो गये। कांग्रेस ने तो इसके विरोध में हल्ला मचाया ही किन्तु खुद भाजपा के भीतर ओबीसी तबके ने अपनी ही सरकार के विरूद्ध मोर्चा खोल दिया 8 पूर्व मुख्यमंत्री उमाश्री भारती ने तो सीधे मुख्यमंत्री श्री चौहान को फोन पर ही बड़े राजनीतिक नुकसान की चेतावनी दे डाली। अदालतों में भी सरकार को तत्काल राहत नहीं मिल पाने से समूची चुनावी प्रक्रिया बच्चों का खेल बनकर रह गई थी। आखिरकार राज्य सरकार ने चुनाव रद्द करवाने का फैसला ले लिया। जिस अध्यादेश पर समूचा बवाल मचा उसे भी वापिस लिया गया। अब चुनाव कब करवाए जायेंगे इसे लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इस मामले में शिवराज सरकार को जिस फजीहत का सामना करना पड़ा उसे देखते हुए ये माना जा रहा है कि चुनाव करवाने को लेकर अब जल्दबाजी में कोई भी निर्णय न लेते हुए ऐसी व्यवस्था की जावेगी जिससे कि सरकार और पार्टी दोनों की छवि खराब न होने के साथ ही राजनीतिक लाभ भी मिले। दरअसल श्री चौहान को इस बात की चिंता सता रही है कि 2023 का विधानसभा चुनाव होने के पहले यदि पार्टी के निचले स्तर को सत्ता में हिस्सेदारी न मिली तो फिर चुनाव मैदान में उतरने वाली सेना तैयार नहीं हो सकेगी। 2020 में सरकार बनते ही कोरोना का हमला हो गया। उसके कारण सभी राजनीतिक गतिविधियों पर विराम लग गया। पहली लहर खत्म होने के बाद स्थानीय निकायों के चुनावों की घोषणा तो कर दी गई किन्तु तब तक दूसरी लहर की आहट सुनाई देने लगी जिससे वे चुनाव भी अधर में फंसकर रह गये। जाहिर है इसकी वजह से भाजपा के भीतर काफी नाराजगी व्याप्त है। दमोह और उसके बाद हुए उपचुनावों में मुख्यमंत्री को जिस तरह से जोर लगाना पड़ा उससे कार्यकर्ताओं की नाराजगी और उदासीनता का एहसास हो चला था। वैसे भी सिंधिया गुट के लोगों को समायोजित करने के कारण पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं में नाराजगी है। यही वजह रही कि पंचायत चुनाव रद्द करवाने का मन बनाने के साथ ही मुख्यमंत्री ने निगम-मंडलों में थोक के भाव नियुक्तियां कर डालीं। लेकिन इससे भी समस्या का हल नजर नहीं आ रहा क्योंकि निचले स्तर पर भाजपा कार्यकर्ताओं में जो निराशा है उसे दूर किये बिना आगामी विधानसभा चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। मुख्यमंत्री भी 2018 में मिली पराजय के कारण बेहद सतर्क हैं। ऊपर से उनको हटाये जाने की अटकलें भी लगातार सुनाई देती रहती हैं। भाजपा के भीतर चलने वाली चर्चाओं का संज्ञान लेने पर ये संकेत मिलते हैं कि उ.प्र विधानसभा के चुनाव परिणामों के बाद श्री चौहान के भविष्य का फैसला भाजपा आलाकमान लेगा। यही वजह थी कि मुख्यमंत्री ने पंचायत चुनाव करवाने का दांव चला था। उसके पीछे उनकी सोच ये थी कि इन चुनावों में जीत हासिल कर पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को अपनी उपयोगिता और जिताऊ क्षमता से अवगत करवा सकेंगे और ग्रामीण इलाकों में भाजपा का प्रभाव नये सिरे से कायम होगा। लेकिन मुख्यमंत्री की वह कार्ययोजना आरक्षण के मकडज़ाल में उलझकर रह गई। चुनाव तो हुए नहीं लेकिन मुख्यमंत्री सहित उनकी सरकार के कुछ मंत्रियों ने जिस तरह आरक्षण के बिना चुनाव न करवाने की रट लगाई उससे पिछले विधानसभा चुनाव के पहले श्री चौहान द्वारा कोई माँ का लाल आरक्षण नहीं हटा सकता वाली घोषणा याद आ गई। जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप प्रदेश में भाजपा के परम्परागत सवर्ण मतदाताओं में जो नाराजगी फैली उसने भाजपा को 15 साल बाद सत्ता से बेदखल कर दिया। पंचायत चुनाव के लिए की गई आरक्षण व्यवस्था के विवादित होने के कारण प्रदेश सरकार के साथ ही भाजपा संगठन की निर्णय क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं। ओबीसी आरक्षण को लेकर प्रदेश सरकार ने अदालत और उसके बाहर जिस तरह से मोर्चेबंदी की उससे अनारक्षित तबके में एक बार फिर ये एहसास जागा कि समूचा राजनीतिक विमर्श केवल वोट बैंक के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गया है। भाजपा की स्थायी समर्थक जातियों में ये भावना तेजी से फैलती जा रही है कि बुरे दिनों में वे उसके साथ रहीं लेकिन अच्छे दिन आते ही पार्टी नेतृत्व को सोशल इंजीनियरिंग दिखने लगी। चुनाव जीतने के लिए जतिवादी संतुलन आवश्यक हो गया है ये तो सब मानते हैं परन्तु कभी-कभी ऐसा लगता है जातिवादी नेताओं की देखा-सीखी भाजपा भी आरक्षण को ब्रह्मास्त्र मान बैठी है। इसकी प्रतिक्रिया फिलहाल उ.प्र में देखी जा सकती है जहाँ अटल जी के समय से भाजपा के साथ जुड़े ब्राह्मण मतदाता इस चुनाव में उससे नाराज बताये जाते हैं और उनको रिझाने के लिए पार्टी ने ब्राह्मण विधायकों और सांसदों से विचार-विमर्श शुरू कर दिया है। स्मरणीय है 2007 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं द्वारा बसपा को समर्थन दिए जाने से मायावती को पूर्ण बहुमत हासिल हो गया था। 2017 में उ.प्र में भाजपा को मिली धमाकेदार जीत के बाद गुजरात विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी का हिन्दू प्रेम ऐसा जागा कि उनको जनेऊधारी साबित करने का अभियान चला और उनके सारस्वत गोत्रधारी कश्मीरी ब्राहमण होने का भी प्रचार किया जाने लगा। भाजपा तो सवर्णों और व्यापारियों की पार्टी ही मानी जाती रही है लेकिन बीते कुछ सालों में उसने भी जातिगत समीकरणों के महत्व को समझकर पिछड़ी जातियों के अलावा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बीच भी अपनी पैठ बढाने के लिए हाथ पैर मारे और केंद्र सहित अनेक राज्यों में बहुमत हासिल कर सरकारें बना लीं। बावजूद इसके पार्टी पर जातिवादी होने का ठप्पा नहीं लगा लेकिन अब ऐसा लगने लगा है कि भाजपा के अनेक बढ़े नेता अगड़े-पिछड़े, दलित और जनजाति की खेमेबाजी में लग गये हैं। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सन्यासी हैं लेकिन सत्ता में आते ही उनके क्षत्रिय होने की बात उजागर की जाने लगी। माफिया सरगना विकास दुबे को पुलिस द्वारा मारे जाने के बाद योगी को ब्राह्मण विरोधी साबित करने की मुहिम के पीछे भाजपा का एक वर्ग भी बताया जाता है। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले पिछले चुनाव में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे केशवदेव मौर्य की बजाय योगी को मुख्यमंत्री बना दिए जाने के फैसले को ओबीसी विरोधी बताकर दबाव बनाया जा रहा है। इन सब बातों से ये पता चलता है कि भाजपा कहे कुछ भी किन्तु आरक्षण के नाम पर समाज को बांटने के खेल में वह भी बढ़े खिलाड़ी के रूप में उतर चुकी है। महज वोट बैंक के लिए आजकल जनजातियों को खुश करने के लिए उठापटक चल रही है। सामाजिक समरसता और समूचे हिन्दू समाज को एकजुट करने की जो मुहिम रास्वसंघ द्वारा चलाई जाती है उसके विपरीत भाजपा में बढ़े कहलाने वाले अनेक नेता अपनी जाति को भुनाने के लिए जिस तरह के सियासती दाँव चलते हैं उससे संघ की कोशिशों को भी नुकसान पहुँचता है। पंचायत चुनाव के नाम पर एक बार फिर ये जाहिर हो गया कि आरक्षण और जातिगत समीकरणों ने समूचे राजनीतिक विमर्श पर अतिक्रमण कर लिया है। इसके कारण आरक्षित वर्ग को मुख्यधारा में लाने के प्रयासों को भी झटका लग रहा है। केवल सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा हेतु प्रवेश की सुविधा से ही आरक्षित वर्ग का उत्थान हुआ होता तब शायद आरक्षण की आज जरूरत ही नहीं रहती। आजादी का अमृत महोत्सव मनाते समय भी अगड़े-पिछड़े और दलित-जनजाति के नाम पर की जाने वाली राजनीति समाज के विखंडन का कारण बन रही है। म.प्र के पंचायत चुनाव रद्द होने से ये बात साबित हो चुकी है कि चाहे कांग्रेस हो या भाजपा सभी सत्ता के पीछे पागल हैं और उसके लिए समाज को बांटने में उन्हें न कोई शर्म है न ही संकोच।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 December 2021

जान से बड़ा नहीं मतदान : चुनाव पर भी फिलहाल लगे लॉक डाउन



म.प्र में पंचायत चुनावों को लेकर चल रही कानूनी और राजनीतिक रस्साकशी के बीच गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का ये बयान काबिले गौर है कि चुनाव किसी की जिन्दगी से बड़ा नहीं है और कोरोना को देखते हुए वे टाले जाने चाहिये। इसी आशय की टिप्पणी करते हुए अलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक पीठ द्वारा केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को सलाह दी गई है कि कोरोना के नए हमले को देखते हुए रैलियों और सभाओं पर रोक लगाने के साथ जरूरी हो तो विधानसभा चुनाव ही रोक दिए जाएँ। श्री मिश्र और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश महोदय दोनों ने जान है तो जहान है जैसी प्रचलित कहावत को ही आधार बनाते हुए ये बात कही है। कुछ समय पहले इसी स्तम्भ में चुनाव जनता के लिए बने या जनता चुनाव के लिए, शीर्षक से लिखे आलेख पर अनेक पाठकों ने आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करते हुए कहा था कि चुनाव रोकना लोकतंत्र के हित में नहीं होगा। उनकी बात एक हद तक सही होते हुए भी वर्तमान परिस्थितियों से मेल नहीं खाती। लोकतन्त्र दरअसल लोक अर्थात जनता के लिए बनाया गया तंत्र अथवा व्यवस्था है। जनता की राय से शासन चलाने के लिए ही चुनाव और मतदान रूपी प्रणाली अपनाई जाती है। चूंकि लोकतंत्र के अंतर्गत बहुमत का शासन होता है इसलिए हर प्रत्याशी और पार्टी ज्यादा से ज्यादा मत हासिल करने के लिए पूरा जोर लगाती है। घर-घर जाकर सम्पर्क करने के अलावा बड़े नेताओं की सभाएं, रैलियां और जुलूस भी चुनाव प्रचार का अभिन्न हिस्सा होते हैं जिनमें भीड़ जमा होती है। भारत सरीखे देश में चुनाव किसी उत्सव या मेले जैसा एहसास करवाते हैं। सामान्य समय में तो ये सब आनंदित करता है किन्तु जबसे कोरोना का कहर शुरू हुआ तबसे लोगों का जमावड़ा आनंदित करने की बजाय आतंकित करने लगा है। इसीलिये सरकार ने तरह-तरह के प्रतिबंध लगाकर कोरोना के संक्रमण को फैलने से रोकने के उपाय किये। लम्बे-लम्बे लॉक डाउन के पीछे भी वही कारण था। कोरोना के दो हमले झेल चुके देशवासी उसके दिल दहलाने वाले परिणामों को भूले नहीं हैं। इसीलिये तीसरी लहर की सुगबुगाहट शुरू होते ही दहशत बढऩे लगी और सरकार ने भी आगाह करना शुरू कर दिया। जिनको टीके की दोनों खुराक लग चुकी हैं उनको बूस्टर डोज लगाने की तैयारी के अलावा बच्चों के टीकाकरण की योजना भी बन रही है। अभी भी देश में ऐसे लोगों की काफी बढ़ी संख्या है जिन्हें कोरोना के टीके नही लग सके हैं। इसके पीछे सरकारी अव्यवस्था के साथ ही लोगों की उदासीनता भी है। लेकिन ये बात पूरी तरह सही है कि चाहे डेल्टा हो या ओमिक्रोन किन्तु किसी न किसी रूप में कोरोना या उस जैसा कई संक्रमण हमारे इर्द-गिर्द घूम रहा है। जब भी ये मान लिया गया कि महामारी अपनी मौत मर रही है तभी उसने पलटवार किया और ऐसी ही सम्भावना एक बार फिर दिखाई दे रही है। भले ही तीसरी लहर का संक्रमण अपेक्षाकृत कम खतरनाक माना जा रहा है लेकिन वह कब विकराल रूप धारण कर ले इस बारे में चिकित्सा विशेषज्ञ पूरी तरह से भ्रमित हैं। आये दिन नए-नए दावे और जानकरियां सुनाई दे जाती हैं। लेकिन इस दौरान ये बात सामने आई है कि खतरा दरवाजे पर आहट दे रहा है और जरा सी लापरवाही से वह भीतर आ धमकेगा। इसीलिये केंद्र और राज्य सरकारों ने विभिन्न प्रकार की रोक लगाई हैं। रात्रिकालीन कफ्र्यू के अलावा शादी और अन्य समारोहों में अतिथि संख्या सीमित की जा रही है। हवाई यात्रियों को कोरोना की ताजी जांच रिपोर्ट दिए बिना यात्रा नहीं करने दी जा रही। मास्क न लगाने वालों पर अर्थदंड लगाया जा रहा है। अर्थात वे सभी सावधानियां दोबारा अपेक्षित हैं जो कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान जरूरी मानी गईं थीं। हालाँकि बाजार, होट, रेस्टारेंट, शापिंग माल, सिनेमा, दफ्तर आदि खुल गये हैं और रेल तथा बस यात्रा भी चल रही है। दूसरी ओर इसी के साथ सार्वजनिक जलसों पर कसावट किये जाने की खबरें भी हैं। विद्यालय और महाविद्यालय खुलने के बाद भी उनमें उपस्थिति कम है। छोटे बच्चों को विद्यालय भेजने में अभिभावक हिचकिचा रहे हैं। ऐसे में चुनावी सभाओँ और रैलियों का औचित्य समझ से परे है। लोकसभा के चुनाव तो अभी दूर हैं परन्तु जिन राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव निकट भविष्य में होने जा रहे हैं उनको रोकना कठिन नहीं है। विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने के बाद चुनाव न होने पर राष्ट्रपति शासन लगाने का संवैधानिक प्रावधान है जिसका उपयोग दर्जनों मर्तबा किया भी जा चुका है। 1992 में बाबरी ढांचा गिरने के बाद भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को बर्खास्त किया गया था और देश के तत्कालीन माहौल को देखते हुए उन राज्यों के चुनाव बजाय छह महीने के बजाय एक साल बाद करवाए गये थे। 1975 में आपातकाल लगाये जाने के बाद इंदिरा जी ने भी लोकसभा का कार्यकाल एक साल बढ़वाया था। ऐसे में आगामी वर्ष की शुरुवात में होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव यदि टाल दिए जाएँ तो आसमान टूटकर नहीं गिर जाएगा। म.प्र के गृह मंत्री श्री मिश्र द्वारा पंचायत चुनाव रोकने संबंधी टिप्पणी के साथ अलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने भी चुनाव रोकने की जो सलाह दी उस पर गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए। सबसे बढ़ी जरूरत है राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की। चुनाव में होने वाले खर्च से बढ़कर बात जनता के प्राणों की रक्षा करने की है। चुनाव संवैधानिक आवश्यकता हो सकती है लेकिन वह इंसानी जिन्दगी से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। चुनाव प्रचार के प्रचलित तौर-तरीकों में जनता की भीड़ जमा होना अवश्यम्भावी है और उस दौरान संक्रमण का फैलाव रोकना बहुत कठिन है। ये सब देखते हुए जरूरी लगता है कि हाल-फिलहाल चुनाव जैसे गतिविधियों पर भी लॉक डाउन लगाया जाए। इस बारे में केवल एक वाक्य में ही कहें तो मतदान इंसानी जान से बड़ा नहीं हो सकता।

-रवीन्द्र वाजपेयी