Saturday, 8 January 2022

पंजाब में जहर की खेती रोकना जरूरी : राष्ट्रविरोधी ताकतों से बचे कांग्रेस



 पंजाब में प्रधानमन्त्री की सुरक्षा को लेकर हुई  चूक के बाद जिस तरह की बयानबाजी हो रही है वह इस बात का परिचायक है कि राजनेताओं ने अपने विवेक को गहराई तक दफना दिया है | पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को इस घटना में पंजाबियों का अपमान नजर आ रहा है | किसान आन्दोलन के स्वयंभू प्रवक्ता राकेश टिकैत को प्रधानमंत्री के सड़क मार्ग से जाने पर ही आपत्ति है | जिन किसानों के कारण प्रधानमंत्री का काफिला रुका उनके नेता कह रहे हैं कि वे तो जिलाधिकारी के सामने प्रदर्शन करने जा रहे थे किन्तु  पुलिस ने उन्हें उस फ्लायओवर के पास रोक दिया जहाँ से प्रधानमंत्री को जाना था | पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने पहले  – पहल तो किसी भी जाँच की जरूरत से ही इंकार कर दिया था लेकिन जब सोनिया गांधी ने उन्हें निर्देश दिए तब जाकर जाँच समिति गठित की किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने फ़िलहाल उस पर रोक लगा दी है | इस प्रकरण में कुछ वीडियो भी सामने आये हैं जिनमें कुछ सिख युवक लाठी और तलवारों से लैस भाजपा के बैनर पोस्टर फाड़ते देखे जा रहे हैं | इस तरह की खबरें भी आई हैं कि प्रधानमन्त्री की जिस सभा में कुर्सियां खाली दिखाई गईं उनमें जाने वाले  श्रोताओं को धमकाकर रोका गया | खैर , राजनीति में आ रही गंदगी देखते हुए ये सब अनपेक्षित नहीं है | वैसे इन दिनों  राजनीतिक विश्लेषक सबसे ज्यादा उ.प्र की चर्चा करते हैं क्योंकि  80 लोकसभा सीटें होने से वहां  के परिणामों का असर 2024 के महासंग्राम पर पड़ने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता | जहाँ तक प्रश्न राजनीतिक कटुता का है तो वह उन सभी पांच राज्यों में देखी जा रही है जहां विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं लेकिन पंजाब उन सभी में अलग है | सीटों के लिहाज से राष्ट्रीय राजनीति पर उसका दबाव भले ही उ.प्र या अन्य बड़े राज्यों की तुलना में कम हो लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति देखते हुए वह राजनीतिक से कहीं ज्यादा रणनीतिक महत्व रखता है | जहां तक बात श्री टिकैत के अलावा श्री चन्नी और नवजोत जैसे नेताओं के बयानों की है  तो उनका भाजपा अथवा मोदी विरोध समझ में आता है लेकिन पंजाब के मौजूदा हालात में केवल विधानसभा चुनाव ही मुद्दा नहीं रहा | सोशल मीडिया पर कश्मीर का  एक वीडियो प्रसारित हो रहा है जिसमें सिख युवकों को भारत विरोधी नारेबाजी करते हुए दिखाया गया है | इसकी सच्चाई प्रमाणित नहीं हो सकी लेकिन पंजाब के भीतर किसान आन्दोलन की आड़ लेकर जिस तरह से सिखों को श्री मोदी और भाजपा विरोधी पेश करने का कुचक्र रचा जा रहा है उसके दूरगामी परिणाम बहुत ही खतरनाक होंगे | अलगाववादी ताकतें  कश्मीर , पूर्वोत्तर या पंजाब कहीं कहीं की भी हों किन्तु उन सबका उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाना है | पंजाब में भाजपा  का अपना स्वतन्त्र जनाधार न बन पाने की वजह अकाली दल  के साथ चला लम्बा गठबंधन है |  शहरी इलाकों विशेष तौर पर हिन्दू मतदाताओं में उसके प्रति आकर्षण है किन्तु वह चुनावी जीत दिलवाने में कितना मददगार होगा ये चुनाव परिणाम बताएँगे | कैप्टन अमरिंदर सिंह भाजपा के साथ जो गठबंधन बना  रहे हैं उसकी वजह से उनको भाजपा समर्थक हिन्दू और अन्य मतदाताओं का समर्थन तो मिल जाएगा लेकिन वे सिखों को भाजपा के पक्ष में कितना झुका पाएंगे ये बड़ा सवाल है | ये देखते हुए इस बात पर मंथन होना  चाहिए कि यह चुनाव कहीं हिन्दू और सिखों के परंपरागत भाई - चारे को नुकसान न पहुंचा सके |  सबसे ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि  जिन गलतियों से पंजाब में खालिस्तानी आतंक अस्सी और नब्बे के दशक में फ़ला - फूला , उनको दोहराने की गलती कांग्रेस की राज्य सरकार दोहरा रही है | मुख्यमंत्री श्री चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री  सिद्धू के बीच की रस्साकशी के चलते राज्य में जिस तेजी से खालिस्तानी आतंक का पदार्पण हुआ वह किसी बड़े खतरे का संकेत है | जैसी कि खबरें आ रही हैं उनके अनुसार पंजाब में कांग्रेस का पराभव निश्चित है | आम आदमी  पार्टी के सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने के अनुमान विभिन्न सर्वेक्षणों में सामने आने से कांग्रेस में घबराहट होना स्वाभाविक है | लेकिन बजाय उस पार्टी के कांग्रेस के हमले का निशाना भाजपा बन रही है जो चौंकाने वाला है | चंदीगढ़ नगर निगम के हालिया चुनाव में आम आदमी पार्टी सबसे बड़ा दल बन गई जबकि भाजपा दूसरे और कांग्रेस तीसरे पर आई | त्रिशंकु की स्थिति बन जाने के कारण  महापौर का फैसला नहीं हो पा रहा | इस चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी का हौसला बुलंद हुआ जबकि कांग्रेस में हताशा है | उसके नेता टूटकर आम आदमी पार्टी के अलावा कैप्टन अमरिंदर सिंह और  भाजपा के साथ  जा रहे हैं | प्रदेश सरकार की फजीहत करने में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री सिद्धू की भूमिका किसी से छिपी नहीं है | सांसद मनीष तिवारी के स्वर भी बगावत के संकेत दे रहे हैं | पार्टी  की अंदरूनी हालत जिस तरह लगातार बिगड़ रही है उसके कारण उसका विक्षिप्त होना स्वाभाविक है लेकिन उसकी वजह से वह राष्ट्र विरोधी ताकतों को प्रोत्साहित करे ये चिंता का विषय है | कांग्रेस ने पंजाब के आतंकवाद की कितनी बड़ी कीमत चुकाई है ये किसी से छिपा नहीं है किन्तु वह उस घाव को क्यों भूल रही है ये बड़ा सवाल है | वहां  भाजपा को कितनी सीटें मिलेंगीं ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि इस राज्य में खालिस्तानी आतंक का पुनरागमन न हो और सिखों के हिन्दुओं के  साथ रोटी - बेटी के जो ऐतिहासिक रिश्ते हैं उनमें दरार न पड़े | किसान आन्दोलन के दौरान देश विरोधी ताकतों ने जिस  तरह का षडयंत्र रचा  पंजाब में उसी का अमल होता दिख रहा है | गौरतलब है कि कृषिप्रधान होने के बाद भी वहां  सभी खेती करते हों ये जरूरी नहीं है | वहां हिन्दू भी बड़ी संख्या में रहते हैं | केंद्र शासित होने से चंडीगढ़ में देश के विभिन्न हिस्सों से आकर लोग बसे हैं | हिन्दू बहुल हरियाणा से भी पंजाब का निकट सम्बन्ध है | ऐसे में इस राज्य की राजनीति में घोला जा रहा जहर देश को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है | कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को यदि जरा सी भी समझ है तो उसे अपनी राज्य सरकार और पार्टी संगठन को देश विरोधी ताकतों से दूर रहने का निर्देश देना चाहिये | पंजाब की देश की सुरक्षा में  बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है | भारतीय सेना में सिखों की मौजूदगी गौरवशाली परंपरा का हिस्सा है | अन्य क्षेत्रों में भी यह  समुदाय काफ़ी आगे है | देश के हर हिस्से में उनकी उपस्थिति का एहसास तो होता ही है किन्तु पूरी दुनिया में सिख कौम भारत के प्रतीक चिन्ह के तौर पर प्रसिद्ध है | ये देखते हुए किसान आन्दोलन के बहाने पंजाब की सरजमीं पर देशविरोधी जहर के जो बीज बोये जा रहे हैं उसे रोकने के लिए  कांग्रेस को पूरी ताकत से जुटना चाहिए | राज्य में सरकार होने से इस बारे में उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है | भाजपा और मोदी से लड़ने के मौके तो उसके सामने और भी आयंगे लेकिन उसके लिए पंजाब के साथ -साथ हिन्दू – सिख एकता को दांव पर लगाना  अक्षम्य अपराध होगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 7 January 2022

नोटतंत्र में बदलता लोकतंत्र : चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाना समझ से परे



चुनाव खर्च कम करने के तमाम सुझाव और प्रयास एक बार फिर धरे  के धरे रह गये | चुनाव आयोग द्वारा गत दिवस  छोटे राज्यों के  विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी द्वारा  किये जाने वाले खर्च की राशि 20 से बढ़ाकर 28 और बड़े राज्यों  में 28 से बढाकर 40 लाख कर दी गई | इसी तरह लोकसभा  चुनाव में छोटे राज्यों में खर्च की सीमा 54 की बजाय 75 और बड़ों में 70 से बढाकर 95 लाख हो गई | जाहिर है ऐसा करने के पीछे राजनीतिक दलों का दबाव रहा होगा | महंगाई  के कारण इस  वृद्धि को सामान्य कहा जा सकता है  लेकिन जब चुनाव आयोग ही मान बैठा है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में इतनी  मोटी रकम खर्च की जा सकती है तब अघोषित खर्च कितना होता होगा ये अंदाज लगाना कठिन नहीं है |  विचारणीय बात ये है कि चुनावों को कम खर्चीला बनाने की बजाय उनमें धन के उपयोग को और बढ़ाने की छूट दी जा रही है | इस वजह से बड़े राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को तो सहूलियत रहती है किन्तु छोटी पार्टी के साथ ही निर्दलीय उम्मीदवारों का  चुनाव मैदान में उतरना टेढ़ी खीर होता जा रहा है | कुछ क्षेत्रीय पार्टियाँ भी धन बटोरने में सक्षम हो जाती हैं लेकिन साधारण हैसियत वाला कोई व्यक्ति स्वतंत्र उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़ना चाहे तो उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती और दुस्साहस कर भी ले तो जगहंसाई का पात्र बनता है | इस बात की पुष्टि केवल इस बात से हो जाती है कि 1952 के प्रथम आम चुनाव में जहाँ 36 निर्दलीय सांसद लोकसभा के लिए चुने गए वहीं 2019 में ये संख्या घटकर महज 4 रह गई | राजनीति में रूचि रखने वालों को याद होगा कि आजादी के बाद के तीन - चार चुनावों तक आचार्य जे. बी . कृपालानी और प्रकाशवीर शास्त्री जैसे अनेक नेता भी निर्दलीय जीतकर आते थे | लोकसभा में उनकी उपस्थिति से सदन की गरिमा बढ़ती थी | विभिन्न विषयों पर उनके भाषण आज भी संदर्भ के रूप में नए सांसदों के लिए किसी पाठ से कम नहीं हैं | उन जैसों के  चुनाव में खड़े होने पर राजनीतिक पार्टियाँ अपने उम्मीदवार हटा लेती थीं | साठ के दशक में आचार्य नरेंद्र देव समाजवादी विचारधारा के बड़े नेता हुआ करते थे | एक बार लोकसभा चुनाव में उनके विरुद्ध कांग्रेस ने  प्रत्याशी खड़ा कर दिया लेकिन जब पंडित नेहरु को ये पता चला तो वे काफी  नाराज हुए | धीरे – धीरे चुनाव महंगे होते जाने से निर्दलीय बनकर  चुनाव जीतना उन लोगों के लिए कठिन होता गया जो पेशेवर योग्यता और बौद्धिक संपदा से तो सम्पन्न थे लेकिन उनके पास चुनाव लड़ने और जीतने के लायक धन नहीं था | ऐसे लोग चूंकि लोगों के निजी हितों की पूर्ति नहीं कर पाते इसलिए उनको चंदा भी नहीं मिलता | लेकिन उनका स्थान लेने के लिए धीरे – धीरे अपराधी प्रवृत्ति के माफिया सामने आने लगे  जिन्होंने धन और आतंक  के बल पर चुनाव जीतने में सफलता हसिल कर ली | कुछ तो राजनीतिक सौदेबाजी का लाभ उठाकर मंत्री भी बन बैठे | पराकाष्ठा तो तब हो गई जब जेल में रहने वाले कतिपय अपराधी तत्व बतौर निर्दलीय लोकसभा का चुनाव जीतने लगे  | ऐसे ही एक सदस्य को राष्ट्रपति चुनाव में मतदान हेतु पुलिस के पहरे में जब संसद भवन लाया गया तब निश्चित रूप से लोकतंत्र के इस मंदिर को प्रतिष्ठित करने वाले महान नेताओं की आत्मा को ठेस पहुंची होगी | हमारे देश में अनु. जाति और जनजाति के लिए भी विधानसभा और लोकसभा सीटें सुरक्षित हैं लेकिन इस वर्ग का  साधारण आर्थिक हैसियत वाला कोई व्यक्ति बिना राजनीतिक दल की टिकिट पाए निर्दलीय लड़ने की हिम्मत भले कर ले किन्तु उसके जीतने की  उम्मीद न के बराबर होती है | चुनाव आयोग ही नहीं अपितु चुनाव सुधार हेतु बनी तमाम समितियां चुनाव खर्च कम करने की बातें करती रही हैं | टी .एन शेषन ने चुनाव आयोग की कमान सँभालने के बाद इस दिशा में बहुत ही जोरदार काम किया था | जिसकी वजह से शोर - शराबा  , बैनर – पोस्टर , दीवारों की  रंगाई – पुताई आदि पर तो काफी रोक लगी , देर रात तक चलने वाली सभाएं और जुलूस आदि भी नियंत्रित हुए | आचार संहिता लगने के बाद शासन में बैठे लोगों की सुविधाएँ कम करने जैसी वयवस्था भी हुई | इस सबका असर निश्चित तौर पर दिखाई देने लगा लेकिन ये बात अकाट्य सत्य है कि चुनाव आयोग कितनी भी सख्ती कर ले लेकिन चुनावों में काले धन की जो नदियाँ बहती हैं उस पर रोक लगाने की कोशिशें नाकाम ही रही हैं | हर चुनाव में काले धन की जप्ती होती है परन्तु  चुनाव खत्म होते ही रात गई बात गई की तर्ज पर सब भुला दिया जाता है | चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपने खर्च का विवरण चुनाव आयोग के पास देना होता है | निर्धारित सीमा से ज्यादा खर्च करने पर  चुनाव रद्द किया जा सकता है अथवा आगे लड़ने पर रोक लगाई जा सकती है | कुछ और भी दंड  प्रावधान हैं किन्तु प्रत्याशियों द्वारा खर्च का जो हिसाब शपथ पत्र के तौर पर दिया जाता है उससे बड़ा झूठ शायद ही और कोई होगा क्योंकि अब तक जो सीमा खर्च की थी या जो गत दिवस तय की गई है उसमें कम से कम बड़ी राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार तो चुनाव नहीं लड़ते | इसीलिए पार्टियों की टिकिट हासिल करने के लिए की जाने वाली उठापटक का कारण ये होता है कि एक तो उनके प्रतिबद्ध मत मिल जाते हैं वहीं वे मोटी रकम भी देती हैं | आजकल स्टार प्रचारक जिस तरह हेलीकाप्टरों का उपयोग करते हैं उसे देखकर लगता ही नहीं कि ये वह देश है जहां 80 करोड़ लोग मुफ्त अनाज के मोहताज हैं और करोड़ों लोगों के पास रहने के लिए घर और पीने के लिए साफ़ पानी नहीं है , शिक्षा और स्वास्थ्य तो बहुत बड़ी बात है | कोरोना काल में न सिर्फ जनता वरन सरकार ने भी अपने खर्च कम किये हैं | उद्योग – व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ  है | रोजगार और प्रति व्यक्ति आय में भी जबरदस्त कमी आई है | ऐसे में विधानसभा और लोकसभा चुनाव के लिए खर्च की सीमा में कमी किये जाने की जगह उसे और बढ़ा देने का औचित्य समझ से परे है | कोरोना की तीसरी लहर पूरे जोर के साथ आ चुकी है | विभिन्न राज्यों में तरह – तरह के प्रतिबंध लगना भी शुरू हो गया है | चुनाव प्रचार के तौर - तरीके बदले जाने की बातें  नेताओं को छोड़ बाकी सभी कर रहे हैं | बेहतर होता चुनाव आयोग बजाय खर्च की सीमा में वृद्धि के चुनाव को सस्ता बनाने के उपाय सुझाता किन्तु  उसने तो उल्टा काम किया | संचार क्रांति के इस दौर में भारत सरीखे विकासशील देश में गरीबी की रेखा से  भी नीचे जीवन बसर कर रहे करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले को चुनाव में इतनी भारी – भरकम  राशि खर्च करने की छूट देना क्रूर मजाक से कम नहीं है | राजनीति में आती जा रही गंदगी के मद्देनजर हर किसी की अपेक्षा है कि अच्छे और साफ सुथरे लोग इसमें आयें किन्तु चुनावी खर्च सुनकर शायद ही बिना पार्टी टिकिट के अच्छे कहे जाने किसी व्यक्ति की हिम्मत मैदान में उतरने की होगी | प्रकाशवीर शास्त्री और आचार्य कृपालानी जैसे नेता इसीलिये किसी के आदर्श नहीं रहे | मौजूदा लोकसभा में जीतकर आये चार निर्दलीय सांसदों के बारे में सामान्य ज्ञान के विद्यार्थी भी शायद ही जानते होंगे क्योंकि चर्चा का विषय तो ये है कि मुख्तार अंसारी जेल में रहते हुए भी कितने मतों से जीतेगा ? 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 January 2022

प्रधानमंत्री को रोकने से खालिस्तानी आतंक के पुनर्जीवित होने की आशंका बढ़ी



पंजाब में गत दिवस जो हुआ वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है | पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाके में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कफिले को बीच सड़क पर 20 मिनिट रोककर रखना और फिर उनका वापिस लौटना निश्चित रूप से सुरक्षा प्रबंधन की  बड़ी चूक है | पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने इस घटना पर जिस तरह का दोमुंहापन  दिखाया उससे ये साबित हो गया कि वे बहुत ही घटिया मानसिकता वाले व्यक्ति हैं | एक तरफ तो उनका ये कहना कि प्रधानमंत्री की  सभा में 70 हजार श्रोताओं की उम्मीद थी लेकिन 700 भी नहीं आये इसलिए वे लौट गये वहीं  दूसरी तरफ उन्होंने ये भी माना कि प्रधानमंत्री का रास्ता रोकने वाले किसान थे जिन पर बलप्रयोग नहीं किया जा सकता था | उल्लेखनीय है कुछ समय पूर्व श्री चन्नी की सभा में विरोध जताने आये किसानों को पुलिस ने घसीट कर भगाया था | मुख्यमंत्री की बदनीयती उस समय खुलकर सामने आ गई जब उन्होंने बिना जांच हुए ही ये सफाई दे डाली कि श्री मोदी की सुरक्षा में कोई चूक नहीं हुई इसलिए किसी पर कार्रवाई करने का सवाल ही नहीं है | हालाँकि बाद में अपराधबोध के दबाव में उन्होंने ये कहा कि प्रधानमंत्री की  सुरक्षा को खतरा हुआ तो अपना खून बहा दूंगा | दूसरी तरफ जिस किसान संगठन ने श्री मोदी के काफिले का रास्ता रोका उसने साफ़ कहा है कि जब तक किसानों की सभी मांगें पूरी नहीं हो जातीं तब तक उनको पंजाब में सभा नहीं करने दी जायेगी | गौरतलब है श्री मोदी को हेलीकाप्टर से सभास्थल  जाना था लेकिन मौसम खराब होने से वे बठिंडा हवाई अड्डे से सड़क मार्ग से गन्तव्य की और चले लेकिन रास्ते में किसानों ने रास्ता जाम कर दिया जिनको हटाने के लिए पुलिस ने कोई प्रयास नहीं किया | प्रधानमंत्री के मार्ग संबंधी जानकारी प्रदर्शनकारियों को किसने दी और जिस स्थान पर रास्ता रोका गया वहां से नजदीक स्थित एक धर्मस्थल में लगे लाउड स्पीकर पर लोगों को रास्ता रोकने कौन बुला रहा था , ये सवाल उठ खड़े हुए हैं | राज्य के पुलिस महानिदेशक ने प्रधानमंत्री के मार्ग  को पूरी तरह आवागमन के लिए उपलब्ध  बताया था जिसके बाद ही उनका काफिला सड़क मार्ग से निकला | पंजाब के मुख्यमंत्री के बेहद लापरवाही भरे रवैये के बाद केंद्र सरकार ने मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है | इस घटना पर राजनीति भी शुरू हो चुकी है | लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि कांग्रेस के विधानसभा चुनाव संचालन समिति के मुखिया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने ही मोर्चा खोलते हुए राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया | चन्नी सरकार के एक मंत्री राणा गुरजीत ने कैबिनेट की बैठक बुलाने की मांग करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री रास्ता रोका जाना गलत है और  राज्य के डीजीपी और गृहमंत्री को वैकल्पिक और सुरक्षित मार्ग का प्रबन्ध करना था तथा इस मामले में सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी तय होना चाहिये | इसी तरह कांग्रेस विधायक परमिंदर पिंकी ने कहा प्रधानमंत्री पार्टी नहीं अपितु पूरे देश का होता है | उन्होंने फरीदकोट और फिरोजपुर के एसएसपी को निलम्बित किये जाने की  अटकलों के बीच कहा कि इसके लिए पुलिस महानिदेशक जिम्मेदार हैं जिनको प्रधानमंत्री के कार्यक्रम वाली जगह कैम्प करना चाहिए था | इन बयानों से लगता है कि मुख्यमंत्री अपने ही घर में घिर गये हैं | कांग्रेस नेताओं को ये समझ में आ रहा है कि इस घटना  से प्रदेश सरकार  की पहले से खराब छवि और खराब हो गई है जिसका असर आगामी चुनाव में पड़ना तय है | सबसे ज्यादा चिंता की बात ये है कि किसानों की आड़ में खालिस्तानी तत्व किसी बड़े खतरे की जमीन तैयार कर रहे हैं | पंजाब तीन दशक पहले भी इसी तरह  आतंकवाद के जाल  में फंसा था और  खालिस्तान के रूप में  पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवादी पंजाब को देश  से अलग करने पर आमादा थे | राज्य के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के अलावा देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी  खालिस्तानी  आतंक के कारण जान गँवा बैठी थीं  | पंजाब में हजारों निर्दोष मारे गये | इंदिरा जी की  हत्या के बाद दिल्ली में हुए दंगों में हजारों सिखों की नृशंस हत्या की गई | यद्यपि  पंजाब के राष्ट्रवादी लोगों ने उस षडयंत्र को विफल कर दिया परन्तु अलगाववाद की भावना देश से दूर कैनेडा में फलती – फूलती रही जिसे किसान आन्दोलन के बहाने जोर पकड़ने का अवसर मिल गया | दिल्ली में चल रहा धरना खत्म होने के बाद भी  पंजाब में किसान आन्दोलन जिस तरह जारी है वह जाँच का विषय है क्योंकि उसका कोई संगठित रूप नजर नहीं आ रहा | हाल ही में विस्फोट के साथ ही निहंगों द्वारा हत्या किये जाने की वारदातें सामने आई हैं | कांग्रेस पार्टी की अंतर्कलह के कारण चन्नी सरकार का शासन और प्रशासन पर नियन्त्रण पूरी तरह समाप्त हो चुका है | प्रधानमंत्री के काफिले को गत दिवस जिस तरह रोका गया वह साधारण बात नहीं थी किन्तु श्री चन्नी ने उस पर जिस तरह से प्रतिक्रिया दी वह उनके सस्तेपन का प्रमाण ही है | पंजाब जैसे सीमावर्ती और संवेदनशील राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में श्री  चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर नवजोत सिंह सिद्धू को बिठाना पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की निर्णय क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए काफी है | कल की घटना के बाद राज्य में पार्टी और सरकार के भीतर से जो बयान आये हैं वे आँखें खोलने वाले हैं | पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस  का क्या हश्र होगा ये उतनी बड़ी चिंता का विषय नहीं है जितना ये कि राज्य सरकार प्रधानमंत्री के आवागमन का इंतजाम तक नहीं कर सकी | पाकिस्तान की सीमा करीब होने और पंजाब में हाल ही में घटी घटनाओं के कारण कल जो भी हुआ उसे महज किसानों के आन्दोलन से जोड़कर शांत हो जाना सही नहीं होगा | प्रधानमंत्री के कार्यक्रम पहले भी रद्द होते रहे हैं परंतु ये पहला वाकया है जब उनका रास्ता रोककर  वापिस लौटने मजबूर किया गया | बठिंडा लौटकर उन्होंने मुख्यमंत्री पर जो तंज कसा उसे उनकी झल्लाहट भी कहा जा सकता है किन्तु देश के लोकतंत्र और संघीय ढांचे के साथ ही सुरक्षा के मद्देनजर इस घटना की तह में जाना बेहद जरूरी है | केंद्र सरकार को चाहिए कि वह हर कोण से जांच करवाए क्योंकि जिस देश में प्रधानमंत्री निर्बाध आवागमन नहीं कर सकता वहां आम आदमी की स्थिति समझी जा सकती है | पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाये जाने की मांग कहाँ तक जायज है ये कहना फ़िलहाल कठिन है | लेकिन वे भी पंजाब को इस हालत में लाने  के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं | किसान आन्दोलन रूपी अपने सिरदर्द को दिल्ली भेजकर उन्होंने उसे पंजाब विरुद्ध केंद्र का जो रूप दिया ये उसका ही प्रतिफल है | आने वाले दिन पंजाब के लिए काफ़ी संवेदनशील होंगे | चुनाव के दौरान होने वालीराजनीतिक खींचातानी देश के सम्मान और सुरक्षा पर भारी न पड़ जाए ये चिंता का विषय है | चुनाव तो आते – जाते रहेंगे किन्तु इस तरह की घटनाओं  की पुनरावृति आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है और खालिस्तानी आतंकवाद को पुनर्जीवित करने वालों का मकसद भी यही है |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 5 January 2022

सूर्य नमस्कार का विरोध मुस्लिम समाज को मुख्यधारा से दूर रखने की शरारत



सूर्य नमस्कार को लेकर आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने एक बार विरोध में आवाज उठाई है | उसके महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने कहा है कि आजादी के अमृत महोत्सव पर आयोजित सूर्य नमस्कार  के कार्यक्रम में मुस्लिम छात्र हिस्सा न लें | बोर्ड के प्रवक्ता ने भी श्री रहमानी के मत का समर्थन करते हुए कहा कि सूर्य नमस्कार के अंतर्गत लगाये  जाने वाले आसन चूँकि सूर्य की  आराधना हैं और इस्लाम में अल्लाह के अलावा अन्य  किसी की पूजा नहीं की जाती इसलिए मुस्लिम छात्रों को सूर्य नमस्कार की अनुमति नहीं है | हालाँकि इसके विरोध में  मुस्लिम समाज के भीतर से भी आवाजें आईं हैं | जिनमें कहा गया है कि सूर्य नमस्कार शरीर के लिए लाभदायक एक व्यायाम है जिसे करते समय सूर्य संबंधी मंत्र बोलना भी  अनिवार्य नहीं है | नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद योग को प्रोत्साहित करने के लिए जो प्रयास हुए उसी के कारण संरासंघ ने 21 जून  को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया | अनेक देशों में इसके प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई है | लेकिन हमारे देश में  एक तबका इस व्यायाम में भी धर्म का तड़का लगाने से नहीं चूकता | इस्लाम में सूर्य की बजाय चाँद को महत्व दिया जाता है जिससे किसी को आपत्ति भी नहीं है | इस मजहब में अनेक ऐसी बातें  हैं जो अन्य किसी भी धर्म में नहीं देखी जातीं | एक ही धर्म का पालन करने वालों के रीति – रिवाजों में भी अंतर होता है | उस दृष्टि से यदि मुस्लिम सूर्य उपासना नहीं करते तो ये उनका अपना मामला है |  लेकिन व्यायाम के किसी तरीके को धर्म के नाम पर नकारना बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती |   सूर्य और चंद्रमा को सभी धर्म अपने – अपने दृष्टिकोण से देखते हैं | इस्लाम में चंद्रमा के आधार पर त्यौहार और तिथियाँ तय होती हैं |  लेकिन सूर्य समूचे ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का ऐसा स्रोत है जिसकी वजह से पूरी सृष्टि संचालित होती है | इस्लाम के अनुयायी देश पाकिस्तान या सऊदी अरब में भी  सुबह तभी होती है जब सूर्य का उदय होता है | किसी भी धर्म या देश में सूर्योदय के  बाद ही दैनिक जीवन की  गतिविधियाँ प्रारंभ होती हैं | यहाँ तक कि पशु – पक्षी तक उसके बाद ही सक्रिय होते हैं | कुछ साल पहले दिन के समय पूर्ण सूर्य ग्रहण होने के कारण कुछ देर के लिए रात का एहसास हुआ तब पक्षी भी  हतप्रभ होकर अपने ठिकानों पर लौटते देखे गये थे | सही बात तो ये है कि पृथ्वी के सृजन के पहले भी सूर्य और अन्य गृह अस्तित्व में थे | मनुष्य की उत्पत्ति उसके बाद हुई और धर्म तो बहुत बाद में आई चीज है | इस्लाम तो सबसे बाद में अस्तित्व में आया | ऐसे में सूर्य नमस्कार नामक व्यायाम को इस्लाम विरोधी बताने वालों को धर्म का कितना ज्ञान है ये विचारणीय प्रश्न है | समूची दुनिया में जो मुर्गा पाया जाता है वह सूर्योदय पर ही बांग देता है | वहीं उल्लू और चमगादड़ रात के अँधेरे में विचरण करने वाले प्राणी हैं | ऐसे में क्या एक को सूर्य पूजक और दूसरों को चन्द्रमा उपासक के तौर पर विभाजित किया जा सकता है | सवाल और भी हैं लेकिन उनका जवाब तभी दिया जा सकेगा जब मन साफ़ हो | मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड को यदि व्यायाम में  भी धर्म नजर आ रहा है तब तो उसे भारतीय शास्त्रीय संगीत की उन राग – रागिनियों का भी विरोध करना चाहिए जिनका मुसलमान संगीतकार और गायक उपयोग करते हैं | सूर्य नमस्कार के अलावा भी अनेक ऐसी बातें हैं जिनको इस्लाम विरोधी ठहराकर मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड मुसलमानों को उनका पालन करने से रोक सकता है | लेकिन ऐसा करना मुस्लिमों के हित में नहीं होगा और वे मुख्य धारा से कटे  रहेंगे | भारत में कट्टरता के समर्थक मुस्लिम संगठनों को इस्लाम के सबसे बड़े संरक्षक सऊदी अरब से कुछ सीखना चाहिए जहाँ शाही परिवार ने समाज को कठमुल्लेपन से मुक्ति दिलाने की  शुरुआत कर दी है | महिलाओं को कार चलाने , खेलकूद में हिस्सा लेना , अकेले विदेश यात्रा करने की छूट देने के साथ ही  शादी के लिए पिता की अनुमति जैसी बंदिश हटा ली | पड़ोसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी हाल ही में अशरा-ए रहमतुल-इल-अलामीन कांफ्रेंस में कहा कि विद्यार्थियों और युवाओं को अन्य धर्मों के बारे में भी पढ़ाया जाना चाहिए | उल्लेखनीय है उक्त दोनों देश कट्टर इस्लामी हैं | हालाँकि भारत के  मुस्लिम समाज में अनेक सुधारवादी लोग खुलकर सामने आने लगे हैं | युवक – युवतियों में धर्म के साथ आधुनिकता और शिक्षा के प्रति रुझान भी बढ़ रहा है | लेकिन मुस्लिम संगठन अभी भी सीमित दायरे से निकलने की मानसिकता नहीं बना पा रहे | सूर्य नमस्कार को सूर्य की आराधना से जोड़ना एक अच्छी चीज से अपने समुदाय को वंचित करना है | जिस तरह किसी मजार पर जाने से हिन्दू व्यक्ति का धर्म परिवर्तन नहीं हो जाता उसी तरह कोई मुसलमान सूर्य नमस्कार व्यायाम कर लेने मात्र से काफ़िर हो जायेगा , ये मान लेना दिमागी दिवालियेपन का ही प्रतीक है | कभी वन्दे मातरम तो कभी सूर्य नमस्कार का विरोध कर मुस्लिम संगठन और उनके पदाधिकारी अपने  समाज को अलग - थलग रखने का षडयंत्र इसलिए रचा करते हैं जिससे उनका रूतबा कायम रहे | यही लोग हैं जिनकी वजह से मुस्लिम समाज नेतृत्वविहीन होकर ऐसे दलों का बंधुआ बन जाने मजबूर है जो चुनावी सफलता के लिए  उपयोग करने के बाद उसको बदहाली में जीने छोड़ देते हैं | मुसलमानों की नई पीढ़ी को ये सोचना चाहिए कि समय के साथ चले बिना वे विकास नहीं कर पाएंगे | धर्म का पालन  बुरा नहीं है लेकिन कालातीत हो चुकी कुरीतियों से बंधे रहने से प्रगति रुक जाती है | भारत के मुसलमान आजादी के सात दशक बाद भी अगर अशिक्षित और अच्छे जीवन स्तर से वंचित हैं तो उसकी मुख्य वजह वे संगठन हैं जो किसी भी सुधारवादी प्रयास को इस्लाम विरोधी बताकर  लागू होने से रोक देते हैं | भारत में हिन्दू बाहुल्य के बावजूद मुस्लिम , ईसाई और पारसी भी रहते हैं | वैसे तो जैन , बौद्ध  और सिख भी अपने को अल्पसंख्यक मानते हैं किन्तु उनका हिन्दू धर्म से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रिश्ता है | इन सबके बीच तुलनात्मक विश्लेषण किया जावे तो सबसे पिछड़े मुस्लिम ही हैं  | उनमें शिक्षा का प्रसार नहीं हो पाना इसका कारण है | आजादी के पहले मुस्लिमों के सामाजिक नेताओं द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विवि की स्थापना के पीछे जो दूरदर्शिता दिखाई थी उसे आजादी के बाद उपेक्षित  कर दिया गया | कहने को तो देश में सरकारी खर्च पर चलने वाले लाखों मदरसे हैं लेकिन उनमें दी जा रहे शिक्षा प्रगतिशीलता को रोकने का साधन बनकर रह गयी | ऐसा नहीं है कि बाकी धर्मों में कट्टर सोच रखने वाले न हों | लेकिन उनका विरोध करने वाले भी कम नहीं मिलेंगे  जबकि मुस्लिम समाज के भीतर किसी भी नई बात को अपनाने का जो विरोध होता है उसकी मुखालफत करने वाले साहसी गिने - चुने ही हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 January 2022

सत्यपाल मलिक के जहर बुझे तीर क्यों सहन कर रही भाजपा



मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक कृषि कानूनों के विरोध में हुए आन्दोलन के समर्थन में लगातार बयानबाजी करते आ रहे हैं | केंद्र सरकार पर किसान संगठनों से बातचीत कर न्यूनतम समर्थन मूल्य सहित उनकी बाकी मांगों को मंजूर किये जाने का दबाव जिस तरह से सार्वजनिक तौर पर  उनके द्वारा बनाया जाता रहा   वह आम तौर पर एक राज्यपाल से अपेक्षित नहीं होता | श्री मलिक मूलतः प. उप्र के हैं और जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है | चौधरी चरण सिंह के साथ राजनीति में आने के बाद से लोकदल , कांग्रेस , जनता दल और भाजपा तक की यात्रा वे कर चुके हैं | लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य भी रहे | 2017 में बिहार के राज्यपाल बनकर सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद भी वे राजनीतिक मसलों पर यदाकदा अपनी बात रखते रहे | अभी तक वे अनेक राज्यों के राजभवनों की शोभा बढ़ा चुके हैं लेकिन जम्मू – कश्मीर के राज्यपाल के तौर पर उनका कार्यकाल ऐतिहासिक रहा क्योंकि उसी दौरान धारा 370 विलोपित कर पूर्ण राज्य का दर्जा छीनकर उसे भी दिल्ली और पुडुचेरी की तरह उप राज्य की श्रेणी प्रदान की  गयी जो  निर्वचित विधानसभा के बाद भी  केंद्र के अधीन रहेगा और संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल की जगह उप राज्यपाल ( लेफ्टीनेंट गवर्नर ) होंगे | चूंकि श्री मलिक राज्यपाल थे इसलिए उनको पदावनत करना अनुचित था अतः उन्हें गोवा का राज्यपाल बना दिया गया परंतु  कुछ समय बाद वहां से वे मेघालय स्थानांतरित कर दिए गये | हालांकि अभी भी उनको राज्यपाल बनाकर ही रखा गया है किन्तु ऐसा लगता है वे गोवा और मेघालय जैसे राज्य के राजभवन में बिठाए जाने से असंतुष्ट हैं | बतौर राजनेता उनको लगता रहा होगा कि जम्मू –कश्मीर में हुए ऐतिहासिक परिवर्तन के समय उत्पन्न हालातों को उन्होंने जिस तरह संभाला उसके बाद उन्हें और बड़ा दायित्व् मिलना था | वहां आने से पहले चूँकि वे बिहार जैसे बड़े और राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण राज्य के राज्यपाल रहे इस कारण उनकी अपेक्षा किसी बड़े राज्य में भेजे जाने के अलावा राजनीति की  मुख्यधारा में आकर किसी बड़े पद पर आने की रही होगी | गोवा और मेघालय भले ही पूर्ण राज्य हों लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनका विशेष महत्व नहीं होने से श्री मलिक खुद को अलग – थलग महसूस कर  रहे होंगे और यही पीड़ा संभवतः किसान आन्दोलन के बहाने अभिव्यक्त होती रही | उन्होंने खुले तौर पर किसान आन्दोलन के नेताओं के साथ बातचीत में मध्यस्थता की पेशकश भी की | इसके पीछे उनके जाट होने और प. उ.प्र से जन्मजात सम्बन्धों के चलते राकेश टिकैत से नजदीकी थी | लेकिन ऐसा लगता है उनकी पहल को भाजपा और केंद्र सरकार ने भाव नहीं दिया | इसके अलावा एक वजह और भी है जिसने उन्हें राजभवन में रहते हुए भी प्रधानमंत्री से सीधे पंगा लेने को उकसाया और वह है  इसी  वर्ष जुलाई में बतौर राज्यपाल उनका पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा होना  | भाजपा ने चूंकि 75 वर्ष की आयु सीमा पद पर बने रहने की बना रखी है अतः  श्री मलिक भी जुलाई में घर बिठा दिए जायेंगे | उल्लेखनीय है इसी  आधार पर कल्याण सिंह , कलराज मिश्र और नजमा हेपतुल्ला को राज्यपाल पद से निवृत्ति के बाद भी कोई पद नहीं दिया गया | श्री मलिक को लगता है  उनके भीतर अभी राजनीति में सक्रिय रहने की  क्षमता है | लेकिन राजभवन से विदाई के बाद नई पारी शुरू करना शायद आसान नहीं रहेगा इसलिए वे कुछ न कुछ ऐसा कर रहे हैं जिससे केंद्र सरकार उनको हटाने का मन बनाये और वे किसान आन्दोलन के लिए राज्यपाल पद की बलि देने का  ढिंढोरा पीटते हुए उ.प्र विधान सभा चुनाव में किस्मत आजमाएं या फिर सपा अथवा लोकदल की मदद से राज्यसभा का जुगाड़ कर लें | गौरतलब है प. उ.प्र में राजनीतिक दृष्टि से बेहद ताकतवर माने  जाने वाले जाट समुदाय में फिलहाल श्री  मलिक सबसे अनुभवी नेता हैं | मैदानी राजनीति के लम्बे अनुभव के साथ  ही उनकी पृष्ठभूमि किसान और समाजवादी रुझान की रही है | हालाँकि काफी समय से वे भाजपा में है और उसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक रहे किन्त्तु उनको ये लगने लगा है कि इस पार्टी में उनको जो मिलना था वह हासिल होने के बाद अब और गुंजाईश  नजर नहीं आती | लेकिन घर बैठकर किताब लिखना शायद उनको पसंद नहीं आयेगा इसलिए उनकी जुबान से बिगड़े बोल निकल रहे हैं | लेकिन सवाल ये है कि उनके इस दुस्साहस पर भाजपा मौन क्यों है ? और जैसे संकेत हैं उसके अनुसार केंद्र सरकार और पार्टी दोनों उ.प्र चुनाव के पहले श्री मलिक को छेड़ने से बच रही हैं | दो दिन पहले उन्होंने प्रधानमंत्री के लिए घमंडी  शब्द इस्तेमाल करने की जुर्रत  कर डाली किन्तु भाजपा ने उस पर प्रतिक्रिया देने तक से परहेज किया | किसी राज्यपाल का प्रधानमंत्री से मिलना सामान्य बात होती है | मेघालय यूँ भी पूर्वोत्तर का राज्य है जहां की  समस्याएँ भी अलग हटकर हैं | लेकिन उस दौरान हुई बातों को पद पर रहते हुए  ही सार्वजनिक कर देना और प्रधानमंत्री के लिए घमंडी  समान  शब्द का प्रयोग असाधारण बात है जो श्री मलिक जैसे अनुभवी और अच्छी छवि के नेता से अपेक्षित नहीं थी | ज़ाहिर है वे जान - बूझकर और पूरे होशो – हवास में किसानों के पक्षधर बनकर राजनीतिक बलिदान देने की चाल चल रहे हैं |  चतुर राजनेता की तरह श्री मलिक ने ये भांप लिया है कि जाट समुदाय के वोट और किसान आन्दोलन उ.प्र और उत्तराखंड चुनाव तक भाजपा की  कमजोर नस है ,  जिसे दबाकर जो मांगोगे वही मिलेगा वाली स्थति पैदा की जा सकती है | इसीलिये उन्होंने किसानों पर मुकदमे हटाने , न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देने जैसी मांगें पूरी होने तक आन्दोलन जारी रहने जैसी विशुद्ध नेतागिरी शैली की  बात कह डाली | हालाँकि प्रधानमंत्री के बारे में की गई टिप्पणी के बाद उन्होंने बात संभालने की कोशिश भी की किन्तु पहला तीर इतना जहर बुझा था कि उसके असर को कम करना आसान नहीं था | जब राजभवन में रहते हुए श्री मलिक ने किसान आन्दोलन के पक्ष में बयानबाजी की थी तब एकबारगी ये लगा था कि केंद्र सरकार उनको मध्यस्थ बनाकर इस मुसीबत से छुटकारा पाने का दांव खेल रही थी परन्तु  अब वह कयास हवा – हवाई होकर हो जाने  के बाद उन्हें भाजपा किस हद तक बर्दाश्त कर सकेगी ये बड़ा सवाल है | और सबसे बड़ी बात ये है कि प्रधानमंत्री अपने विरोधी को राजनीतिक तौर पर  किस तरह प्रभावहीन कर देते हैं ये भी सर्वविदित है | ये देखते हुए श्री मलिक का आक्रामक रवैया क्या मोड़ लेता है ये देखना रोचक होगा | यदि उ.प्र का चुनाव सिर पर न होता तब प्रधानमंत्री अभी तक कुछ न कुछ कर गुजरते किन्तु फिलहाल तो वे चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं | श्री मलिक ने  जो जुबानी तीर छोड़े हैं उनको वापिस लेना नामुमकिन है | इस पैंतरे से उनको क्या राजनीतिक लाभ होगा ये तो समय ही बताएगा लेकिन राजभवन में रहते हुए यदि कोई प्रधानमंत्री को घमंडी कहने का खतरा मोल ले रहा है तब उसे भी इतना तो मालूम होगा ही कि उसका अंजाम  राजनीति से जबरन  सेवा निवृत्ति  भी हो सकता है | और ये भी कि अखिलेश यादव , जयंत चौधरी और राकेश टिकैत अपनी जमी - जमाई दूकान में किसी और को भागीदार क्यों बनायेंगे ?

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 3 January 2022

भारत छुट्टियों और मुफ्त चुनावी उपहारों का देश बनकर रह गया



2022 के पहले और दूसरे दिन क्रमश: शनिवार और रविवार होने के कारण कार्यालयों में अवकाश रहा। इस वजह से लोगों ने जमकर जश्न मनाया और सैर-सपाटा भी किया। तनावों से भरी जि़न्दगी में आनन्द के क्षण यूं भी कम ही आते हैं। आधुनिक जीवन शैली में इतनी ज्यादा भाग-दौड़ हो चली है कि इंसान के पास खुद के लिए भी वक्त नहीं रहा। पहले ये समस्या केवल विकसित देशों में ही सुनाई देती थी लेकिन अब भारत जैसे देश में भी मानसिक तनाव लोगों की मानसिकता पर हावी होता जा रहा है। लेकिन इसी के साथ ही एक समस्या कार्य संस्कृति के अभाव के रूप में भी सामने आ रही है। बेरोजगारी के कारण करोड़ों लोग बेकार हैं किन्तु इससे भी बड़ी बात ये है कि जिनके पास नौकरी रूपी काम है उनमें से भी अधिकतर अपनी 100 प्रतिशत क्षमता से काम नहीं करते। इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि हमारा देश छुट्टियों का देश हो गया है। राजीव गांधी के सत्ता में आने के बाद केंद्र सरकार के कार्यालयों में पांच दिवसीय कार्य सप्ताह की शुरुवात हुई जिसे धीरे-धीरे कारपोरेट व्यवस्था में भी स्वीकार कर लिया गया। कोरोना के बाद म.प्र जैसे राज्य में भी सरकारी कार्यालयों में पांच दिवसीय सप्ताह शुरू हो गया। विश्व श्रम संगठन द्वारा बनाये गए नियमों के अंतर्गत ही सप्ताह में काम के घंटे तय किये गये हैं। निजी क्षेत्र में तो श्रमिक कानूनों का पालन उतनी ईमानदारी से नहीं होने से शोषण की प्रवृत्ति विद्यमान है किन्तु सरकारी नौकरी में जहां वेतनमान, भत्ते, चिकित्सा एवं सेवा निवृत्ति के उपरान्त मिलने वाली राशि जैसी सुविधाएँ हैं, उसमें भी कार्यसंस्कृति निरंतर घटती जा रही है। यही वजह है देश में प्रति व्यक्ति उत्पादन का अनुपात अपेक्षा से कम है। न सिर्फ कार्यालयों अपितु सरकारी क्षेत्र के कारखानों में भी काम के प्रति समर्पण नहीं होने से विकास के आँकड़े उम्मीद से कम ही रहते हैं। एक समय था जब केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान में अंतर होता था लेकिन श्रमिक कल्याण की योजनाओं के चलते वेतनमानों में तो एकरूपता आ गई परन्तु कार्य की गुणवत्ता में अंतर नहीं आया। निजी क्षेत्र के कारपोरेट जगत में वेतन और सुविधाएँ भले ही आकर्षित करती हों लेकिन बाकी में काम की शर्तें कठिन और सुविधाएँ कम हैं। भविष्य की सुरक्षा भी नहीं होती ,इसीलिये आज भी हमारे देश में सरकारी नौकरी का आकर्षण बरकरार है। लेकिन धीरे-धीरे सरकार के लिए उसका अपना अमला ही बोझ बनता जा रहा है। कोरोना काल में लगे लॉक डाउन के दौरान निजी क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कम्पनियों तक ने वेतन भत्ते कम कर दिए और छटनी भी हुई। छोटे और मध्यम श्रेणी के व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में तो लॉक डाउन के दौरान वेतन बंद कर दिया गया किन्तु सरकार के लिए वैसा करना संभव नहीं था। हालाँकि बैंक , पुलिस, नगर निगम, अस्पताल तथा अन्य आवश्यक सेवाएं तो कार्यरत रहीं किन्तु स्कूल, कॉलेज सहित तमाम प्रशासनिक कार्यालयों में तालाबंदी के बाद भी वेतन अदि समय पर मिलते रहे। लेकिन अब जब स्थितियां सामान्य होने को हैं और कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के बाद भी ये माना जा रहा है कि उसका प्रकोप पिछली लहर जैसा भयावह नहीं होगा तब इस बात की जरूरत है कि नए साल को कार्यकुशलता वर्ष के रूप में मनाया जाए। इसके लिए सरकारी दफ्तरों और शिक्षण संस्थानों में दिए जाने वाले अवकाश घटाए जाने चाहिए। हमारे देश में विभिन्न धर्मों का पालन करने वाले रहते हैं। उनसे जुड़े महापुरुषों की जयन्ती अथवा निर्वाण दिवस पर सरकारी अवकाश रहता है। वोट बैंक की राजनीति ने जातीय महापुरुषों के नाम पर भी छुट्टी रखे जाने का चलन शुरू कर दिया। इस सबके कारण भारत छुट्टियों का देश बनकर रह गया है। इसका असर अब असंगठित क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। निर्माण कार्यों में कार्यरत श्रमिक और घरेलू कर्मचारी तक छुट्टी संस्कृति से प्रेरित-प्रभावित होते जा रहे हैं। इसका दुष्प्रभाव दफ्तरों में आज का काम कल पर टालने के साथ ही उत्पादन के लक्ष्य समय पर पूरे न होने से विकास के सभी अनुमान धरे के धरे रह जाते हैं। सरकारी निर्माण कार्य में समय-सीमा का पालन नहीं होने से लागत बढ़ जाती है। भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के तौर पर उभर रहा है लेकिन कार्य संस्कृति का विकास उस अनुपात में नहीं होने से एक कदम आगे , दो पीछे की स्थिति बनी हुई है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत निश्चित तौर पर वैश्विक मापदंडों के अनुरूप कार्य कर रहा है। हाल ही में साफ्टवेयर निर्यात के जो आंकड़े आये वे उत्साहित करने वाले हैं लेकिन अन्य क्षेत्रों में कार्य संस्कृति का विकास आशानुरूप नहीं होने से भारत आज भी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाता है। 2020 में चीन द्वारा लद्दाख में की गयी घुसपैठ के बाद दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते भी तनावपूर्ण रहे। जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल जैसे नारे देते हुए स्वदेशी के भाव को उभारने का आह्वान किया। उसके प्रभावस्वरूप चीन से होने वाले आयात में कुछ समय के लिए तो कमी आई तथा कच्चे माल पर निर्भरता खत्म करने का भी सराहनीय प्रयास हुआ । लेकिन कुछ दिनों पूर्व जो आँकड़े आये उनके अनुसार चीन से आयात कोरोना पूर्व की स्थिति से भी ज्यादा हो गया। इसकी वजह कीमतों में अंतर ही है। यदि भारत वाकई विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनना चाहता है तो उसे कामचोरी की मानसिकता से निकलकर कार्यसंस्कृति को राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाना होगा। हालाँकि इसमें हमारे देश की चुनाव प्रणाली बड़ी बाधा बने बिना नहीं रहेगी। देश में हर वर्ष होने वाले चुनाव विकास को प्रभावित करते हैं। इसके कारण नीतिगत अनिश्चितता और असमंजस कायम रहने से देशहित के अनेक निर्णय लंबित पड़े रहते हैं। चुनावी खर्च का असर भ्रष्टाचार के रूप में सामने आता है। सबसे बड़ी बुराई है मुफ्तखोरी को राजनीतिक औजार बनाने की। मुफ्त अनाज, मुफ्त बिजली-पानी, नगद राशि आदि के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग निठल्ला बैठा हुआ है। यदि इसका उपयोग उत्पादन प्रक्रिया में होने लगे तो न सिर्फ समय पर काम होंगे अपितु लागत भी घटेगी। लेकिन चुनावों की कभी न टूटने वाली श्रृंखला के कारण कोई भी राजनीतिक दल मुफ्तखोरी की संस्कृति को रोकने का साहस नहीं कर पाता। इसके विपरीत वह और बढ़ती जा रही है। बाहरी तौर पर तो सभी राजनीतिक दल देश और जनता के हित की बात सोचते हैं परन्तु सत्ता प्राप्त करने की लालसा उन्हें चुनाव जीतने के फेर में उलझाकर रख देती है। शुरू – शुरू में श्री मोदी से ये अपेक्षा की जा रही थी कि वे कड़े निर्णय लेकर देश को इस ढर्रे से मुक्ति दिलवाएंगे किन्तु येन-केन-प्रकारेण चुनाव जिताने की जिम्मेद्दारी कन्धों पर आ जाने की वजह से वे भी मजबूर नजर आने लगे हैं। यदि देश को सही मायनों में विश्व शक्ति बनना है तो उसे इन विसंगतियों पर विजय हासिल करना होगी। अन्यथा बड़े-बड़े दावों और वायदों के बावजूद सुधार प्रक्रिया कछुआ गति से चलती रहेगी और आंकड़ों की वह फसल यूँ ही लहलहाती रहेगी जिससे किसी का पेट नहीं भरता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 January 2022

वैष्णो देवी हादसा : आस्था के अतिरेक का दुखद परिणाम



वर्ष 2022 की सुबह-सुबह इस खबर ने मन दुखी कर दिया कि नए वर्ष पर माता वैष्णो देवी के दर्शन करने गये श्रद्धालुओं के बीच धक्का-मुक्की होने से मची भगदड़ में 12 लोगों की मौत हो गई और 14 घायल हैं जिनमें 3 की हालत गंभीर है। 31 दिसम्बर की रात वैष्णो देवी के दर्शन करने बहुत बड़ी संख्या में भक्तगण जमा हो गये थे। देर रात तकरीबन तीन बजे कुछ लोगों के बीच हुई कहा-सुनी के बाद अफरातफरी मचने से उक्त हादसा हुआ। घायलों के इलाज का इंतजाम प्रशासन द्वारा किया गया है। मृतकों और घायलों के परिवारों को आर्थिक मुआवजा देने का ऐलान केंद्र और राज्य दोनों ने कर दिया है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार नये साल के अवसर पर वैष्णो देवी के दर्शन करने श्रद्धालुओं की बेतहाशा भीड़ जमा होने के बावजूद वहां समुचित व्यवस्था नहीं थी। कटरा से पवित्र गुफा तक के मार्ग पर चूँकि 24 घंटे लोगों का आवागमन लगा रहता है इसलिए विद्युत् आपूर्ति भी निर्बाध रखी जाती है। बावजूद इसके रात में मची भगदड़ में लोग अपना बचाव नहीं कर सके होंगे। हालाँकि इसके पहले भी अनेक धार्मिक स्थलों पर इसी तरह की घटनाएँ दिन के समय होने पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मारे गये थे। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि लगभग हर वर्ष देश के किसी न किसी धार्मिक केंद्र पर इस तरह की जानलेवा घटनाएँ होती हैं। सरकार मुआवजा बाँटकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है वहीं प्रशासन दो-चार कर्मियों पर जिम्मेदारी थोपकर मामले की लीपापोती देता है। हालाँकि अनेक धार्मिक स्थलों पर ऐसे हादसों के बाद व्यवस्था में थोड़ा सुधार किया गया है लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि श्रद्धालुओं की निरंतर बढ़ती भीड़ के कारण सारी व्यवस्थाएं अपर्याप्त साबित होती हैं। वैष्णो देवी धाम में भी बीती रात व्यवस्था की कमी महसूस की गई। लेकिन इसके अलावा विचारणीय प्रश्न ये भी है कि जो श्रद्धालुजन पैसा और समय खर्च कर धार्मिक केन्द्रों पर आते हैं उनमें व्यवस्था का पालन करने की सहज प्रवृत्ति का अभाव होने से अनुशासनहीनता का बोलबाला हो जाता है। आवागमन के साधनों के साथ धार्मिक स्थलों पर भोजन और आवास के इंतजाम बढ़ते जाने से भी यात्रियों की संख्या में समय के साथ बढ़ोतरी होने लगी है। पहले केवल तीर्थयात्री ही ऐसे स्थानों पर जाते थे जिन्हें ज्यादा सुविधाओं की दरकार नहीं होती थी परन्तु अब धार्मिक यात्राओं के साथ पर्यटन का भाव जुड़ जाने से भीड़ बढ़ती जा रही है। जम्मू-कश्मीर जाने वाले अधिकतर सैलानी जाते या लौटते समय वैष्णो देवी के दर्शन करना नहीं भूलते। देश के जिन धार्मिक स्थलों में दर्शनार्थियों की सबसे ज्यादा संख्या आती है उनमें वैष्णो देवी प्रमुख हैं। बीते कुछ दशकों में यहाँ उपलब्ध सुविधाओं एवं व्यवस्थाओं में काफी सुधार हुआ है लेकिन जिस अनुपात में दर्शनार्थी बढ़ते जा रहे हैं उसे देखते हुए वे कम पड़ जाती हैं। नवरात्रि एवं अन्य विशेष अवसरों पर देश भर के मंदिरों एवं अन्य धार्मिक स्थलों पर औसत से ज्यादा भीड़ होती है। आज सुबह से आ रही खबरें इस तथ्य की पुष्टि करती हैं। म.प्र के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में आज सुबह 2 घंटे में 50 हजार श्रद्धालुओं ने दर्शन किये। प्राचीनकाल में बने मंदिरों में गर्भगृह बहुत छोटे होने से भी भक्तों की भीड़ परेशानी का कारण बन जाती है। वैष्णो देवी धाम में गत रात्रि जो हादसा हुआ उसका कारण भी मानवीय लापरवाही और अनुशासनहीनता ही है। श्रद्धालुओं का आपस में झगडऩा और उसके बाद भगदड़ होने से बेक़सूर लोगों का मारा जाना बहुत ही अफसोसनाक है। ऐसी घटना के जिम्मेदार लोगों की पहिचान भी शायद ही हो पायेगी। लेकिन बात केवल मुआवजे के वितरण और सरकारी अमले के दो-चार लोगों के निलम्बन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उल्लेखनीय है 1954 में प्रयागराज (तात्कालिक अलाहाबाद) के कुम्भ में मची भगदड़ में 1000 लोग मारे गये थे। उसके बाद इस मेले की व्यवस्थाओं में लगातार सुधार किया जाता रहा। बढ़ती जनसँख्या के कारण प्रयाग के कुम्भ मेले में विशेष स्नान के अवसर पर करोड़ों लोग पवित्र संगम में स्नान करते हैं। पूरे एक माह तक प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु वहां आते हैं। लेकिन दशकों पहले हुई दुर्घटना से सबक लेकर व्यवस्थाओं में किये सुधारों से प्रयाग का कुम्भ विश्वस्तर पर प्रबंधन विशषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय बन गया। ये बात भी गौर तलब है कि इस मेले में आने वाले यात्री भी व्यवस्थाओं में सहयोग देते हैं। लेकिन सभी धार्मिक स्थलों पर ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि समय-समय पर देश के किसी न किसी हिस्से में इस तरह की दुखद घटनाएँ हो जाती हैं। लोगों के बढ़ते आर्थिक स्तर ने भी धार्मिक पर्यटन में वृद्धि की है। उत्तराखंड में स्थित चार धाम जाने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या में साल-दर साल वृद्धि होने से समूचे गढ़वाल अंचल का पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा गया है। जिसकी वजह से वहां प्राकृतिक आपदाएं जल्दी-जल्दी आने लगी है। अब तो वहां हाइवे भी बन रहे हैं जिसके बाद आवक-जावक और बढ़ जायेगी। दरअसल गलतियों से सीखकर उन्हें सुधारने की बजाय उनको दोहराने की प्रवृत्ति ऐसे हादसों का कारण बनती है। धार्मिक आस्थाओं के पालन में संयम और अनुशासन का बड़ा महत्व होता है जिसका अभाव अनेक विकृतियों को जन्म दे रहा है।  वैष्णो देवी में हुई दुर्घटना का कारण दर्शनार्थियों के बीच हुआ झगड़ा था। इसके लिए निश्चित तौर पर प्रशासनिक अमले के साथ ही मंदिर प्रबंधन की लापरवाही का भी संज्ञान लिया जाना चाहिए। लेकिन तीर्थ स्थान की यात्रा  करने वालों को भी भीड़ की मानसिकता त्यागकर व्यवस्था के अनुरूप आचरण करने का संस्कार विकसित करना होगा। छोटी सी बात का बतंगड़ बनाकर अव्यवस्था फैला देना धार्मिक आस्था का मखौल है। बेहतर हो राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक केन्द्रों संबंधी नियम बनाये जाएँ किन्तु इन्हें लागू करने में साधु-संत, पण्डे और पुरोहित समुदाय की सहमति और सहयोग भी मिलना चाहिए। उनको ये बात समझनी होगी कि आबादी का विशाल आकार तथा आवागमन की सुविधाओं और साधनों के विकास के कारण अब धार्मिक स्थलों की व्यवस्था बदलते हालात के अनुसार की जानी चाहिए जिससे इस तरह की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

-रवीन्द्र वाजपेयी