Monday, 17 January 2022

ये तेवर कभी-कभार ही क्यों : मुख्यमंत्री इस शैली को स्थायित्व प्रदान करें



म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आम तौर पर शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं किन्तु यदा-कदा उन्हें गुस्सा आता है और उस दौरान वे दो-चार सरकारी अफसरों अथवा कर्मियीं को निलम्बित या स्थानांतरित कर देते हैं। बीते कुछ दिनों में ऐसे अनेक वाकये हुए जब मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक जलसों में सरकारी अमले पर गाज गिराई। इसके पहले भी अनेक मर्तबा उन्होंने इसी तरह के तेवर दिखाए जिसे आम जनता में सिंघम अवतार कहा गया। उ.प्र में मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती भी ऐसे ही जनता के बीच खड़ी होकर प्रशासनिक अमले पर गुस्सा उतारती थीं। जिस तरह फिल्मों में नायक द्वारा खलनायक की पिटाई किये जाने पर दर्शक प्रसन्न होते हैं उसी तरह सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता द्वारा नौकरशाही पर इस तरह हंटर चलाये जाने से वहां मौजूद जनता खुश होती है। इसके साथ ही नेताजी का रुतबा भी कायम होता है। हालांकि बाद में दण्डित अधिकारी अथवा कर्मी कब बहाल हो जाता है ये किसी को पता ही नहीं चलता। शिवराज जी लम्बे समय से प्रदेश की सत्ता पर विराजमान हैं। इसीलिये नौकरशाही उनके स्वभाव और कार्यप्रणाली से अच्छी तरह वाकिफ है। सबसे बड़ी बात ये है कि वे सचिवालय में बैठकर राज करने वाले न होकर राज्य में निरंतर भ्रमण करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में पहिचान बना चुके हैं। इस वजह से उनका चेहरा आम जनता में जाना-पहिचाना है। सत्ता में आने से पहिले उन्होंने पार्टी संगठन का भी काम किया जिसके कारण उनका दलीय कार्यकर्ताओं और नेताओं से आत्मीय सम्बन्ध है। यही वजह है कि सत्ता की दौड़ में प्रतिद्वंदी भी उनके विरुद्ध बोलने से बचते हैं। यहाँ तक कि विपक्ष के नेता भी सौजन्यता के निर्वहन में श्री चौहान की प्रशंसा करते हैं। लेकिन इसके साथ ही ये बात भी कही जाती है कि म.प्र में शासकीय अमला समूची व्यवस्था पर हावी है जिसकी वजह से भ्रष्टाचार चरम पर है। इसका प्रमाण समय-समय पर लोकायुक्त और आर्थिक अपराध विंग द्वारा मारे जाने वाले छापों में शासकीय अमले के पास से मिलने वाली अनाप-शनाप राशि के साथ ही चल-अचल सम्पत्ति का मिलना है। ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार की शुरुआत शिवराज सरकार के कार्यकाल में ही हुई हो लेकिन ये कहना जरा भी गलत नहीं होगा कि तमाम दावों के बाद भी सरकारी दफ्तरों में होने वाला लेन-देन और घूसखोरी रुकने की बजाय बढ़ गई। अनेक सेवाओं को ऑनलाइन करने के बाद भी प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े लोग अपनी कमाई का रास्ता तलाश ही लेते हैं। इसमें दो मत नहीं हैं कि शिवराज सरकार ने म.प्र को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर निकाला है। सड़क और बिजली के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियाँ काबिले गौर हैं। कृषि उत्पादन में आगे बढऩे के साथ ही पर्यटन में भी अच्छी-खासी वृद्धि हुई है और अधो संरचना के काम भी खूब हो  रहे हैं। लेकिन इतना सब होते हुए भी प्रदेश में नौकरशाही की चाल और चरित्र में लेश मात्र भी सुधार देखने में नहीं मिलता। ऐसे में श्री चौहान द्वारा थोड़े-थोड़े अंतराल के उपरान्त दिखाया जाने वाला गुस्सा दूरगामी असर नहीं छोड़ पाता। इसके लिए उन्हें केवल सीएम हेल्पलाइन के अंतर्गत आने वाली शिकायतों के निराकरण की स्थिति का जायजा लेना होगा जिससे वे अच्छी तरह जान सकेंगे कि प्रदेश की पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी में मुख्यमंत्री का कितना खौफ है? भाजपा खुद को पार्टी विथ डिफऱेंस कहती है किन्तु म.प्र में सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भर्राशाही को रोकने में उसकी सरकार क्यों विफल है ये बात पार्टी के नेतृत्व को समझना होगी क्योंकि विकास सम्बन्धी बाकी बातें सरकारी अमले के भ्रष्टाचार के आगे बेमानी होकर रह जाती हैं। उस दृष्टि से मुख्यमंत्री यदि कड़ा रुख दिखा रहे हैं तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए परन्तु उसका औचित्य तभी तक है जब वह स्थायी रूप ले सके। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि सरकारी अधिकारी और कर्मचारी भले ही प्रत्यक्ष तौर पर राजनीति न करते हों किन्तु उनमें से ज्यादातर की राजनेताओं के साथ अघोषित भागीदारी है। इसीलिए ये कहना कदापि गलत न होगा कि भ्रष्टाचार को सत्ता में बैठे कतिपय लोगों का संरक्षण मिलता है अन्यथा भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी इतने निडर होकर जनता की मजबूरी का फायदा उठाने की हिम्मत न कर पाते। इस बारे में ध्यान रखने वाली बात ये है कि सत्ता के शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार का खात्मा कठिन हो गया है क्योंकि हमारे देश में हर समय चलने वाले चुनाव की वजह से सत्ता  में बैठे नेताओं को चंदे का जो जुगाड़ करना पड़ता है उसने भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देते हुए स्थायित्व प्रदान कर दिया। चुनावी खर्च जिस तेजी से बढ़ता जा रहा है उसके कारण सरकार में बैठे लोगों पर भी दबाव बना रहता है। उद्योग और व्यापार जगत के अलावा नौकरशाही के चुनावी चंदे का बड़ा स्रोत बन जाने से भ्रष्टाचार रोकना किसी सरकार के बस में नहीं रहा। लेकिन आम जनता को उससे मुक्ति दिलवानी है तो सरकार को अपने घर से ही शुरूआत करनी होगी। इसके लिए सबसे बड़ी बात है इच्छा शक्ति। देश में अनेक ऐसे सत्ताधारी नेता हुए हैं जिन्होंने काजल की कोठरी में से बेदाग़ निकलने का कारनामा कर दिखाया। उनकी तारीफ़ तो समर्थक और विरोधी दोनों करते हैं लेकिन दुर्भाग्य से वे उनका आदर्श नहीं बन सके। आज देश में विश्वास का जो संकट है उसका सबसे बड़ा कारण सत्ताधारी नेताओं का भ्रष्टाचारी हो जाना है। जो व्यक्तिगत घूस नहीं लेता उसे भी पार्टी फंड के नाम पर उगाही करना होती है। प्रदेश में बैठे सत्ताधारियों से उनकी पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व उम्मीद करता है कि वे पार्टी के लिए पैसे का इंतजाम करें। ये चलन आजादी के बाद से ही चला आ रहा है। ऐसे में शिवराज सिंह द्वारा समय-समय पर सिंघम शैली का प्रदर्शन दो चार दिन की सुर्खियों से ज्यादा और कुछ नहीं रहेगा। यदि मुख्यमंत्री वाकई चाहते हैं कि उनके राज में नौकरशाही की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगे तो उन्हें संदर्भित सख्ती को स्थायी कार्यशैली बनाना होगा। वरना एक कदम आगे, दो कदम पीछे की स्थिति बनी रहेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 15 January 2022

स्वामीप्रसाद का बड़बोलापन अखिलेश की मेहनत पर पानी फेर सकता है



उ.प्र विधानसभा चुनाव में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस बार छोटी – छोटी जातिवादी पार्टियों को अपने साथ मिलाकर जो गठबंधन बनाया उसके बारे में विश्लेषक ये मान रहे थे कि उन्होंने 2017 में भाजपा द्वारा अपनाई रणनीति पर ही काम किया और बिखरे हुए मतदाता समूहों को अपने झंडे तले लाकर कड़ी चुनौती पेश कर दी | इसके कारण सब दूर ये चर्चा होने लगी  कि  लड़ाई भाजपा और अखिलेश के बीच है | यादव और मुस्लिम समुदाय के बीच जो नजदीकी मुलायम सिंह यादव ने पैदा की थी वह पिछले कुछ चुनावों में नहीं  दिखाई दी | लेकिन जैसी परिस्थितियाँ नजर आ रही हैं उनके मद्देनजर ये कहा जा रहा है कि इस बार के चुनाव में एम – वाई समीकरण फिर बैठने जा रहा है | अखिलेश ये जानते हैं कि तमाम कोशिशों के बाद भी सवर्ण जातियों के बीच उनका प्रभाव ज्यादा नहीं रहेगा | इसी तरह प. उ.प्र में किसान आन्दोलन के कारण भाजपा से नाराज बताये जा रहे जाट समुदाय में भी जो गाँव के बाहर हैं उनमें भाजपा के प्रति झुकाव है | ऐसे में मुस्लिम – यादव की गोलबंदी के साथ पिछड़े जाति समूहों को मिला लिया जावे तो चुनावी नैया पार हो सकती है | इसी सोच के साथ उन्होंने बीते कुछ महीनों में तमाम छोटी पार्टियों को अपने पाले में खींचकर भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण हालात बना दिए | उनमें सबसे ज्यादा चर्चा ओमप्रकाश  राजभर की हो रही थी | लेकिन विगत तीन – चार दिनों से योगी मंत्रीमंडल छोड़कर सपा में  आये स्वामीप्रसाद मौर्य ,  अखिलेश द्वारा जमाये गये मजमे को लूटने में लगे हुए हैं | गत दिवस लखनऊ में उन्होंने सपा कार्यालय में जो भाषण दिया उससे ऐसा  लगा जैसे उनका मकसद अपने आपको तुरुप का इक्का साबित करने का है और इसी धुन में वे खुद को अखिलेश की बराबरी का नेता साबित करने में लग गये | पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और लोकसभा  चुनाव में बसपा से गठबंधन करने का जो कड़वा अनुभव अखिलेश को हुआ उससे उन्होने ये सीखा कि अपने से बड़े कद के नेता से जुड़ने पर उसकी शख्सियत भारी पड़ जाती है | राहुल गांधी और मायावती उस दृष्टि से उनके लिए बोझ बन गये | इसीलिए उन्होंने इस चुनाव में छोटे – छोटे दलों को साथ लिया जिनकी वजनदारी उनकी तुलना में बेहद कम है | ओमप्रकाश राजभर ने भी अभी तक किसी तरह के बडबोलेपन से परहेज ही किया किन्तु श्री मौर्य ने आते ही जिस तरह की बयानबाजी की  उससे तो लगता है जैसे वे मुकाबले को योगी बनाम स्वामी बनाने के लिए आतुर हैं | रास्वसंघ को नाग और भाजपा को सांप कहने के बाद खुद ,को नेवला बताने के बाद वे ये डींग हांकते सुने  गए कि वे जिसके साथ रहते हैं उसे मुख्यमंत्री बनवा देते हैं |गत दिवस के भाषण में उन्होंने इस चुनाव को 85 और 15 फीसदी के बीच की जंग  निरुपित करते हुए सवर्ण जतियों को महज 15 फीसदी बताने के साथ  कहा  कि वे भी विभाजित हैं | उनके कहने  का आशय ये रहा कि भाजपा के पास केवल उच्च जातियां रह गई हैं जो कि बिखरी हुई हैं | इसी के साथ श्री मौर्य ने ये भी कह डाला कि लोहियावादियों के साथ अब आम्बेडकरवादी भी आ गये हैं | वैसे मौर्य दलित न होकर पिछड़े माने जाते हैं | स्वामीप्रसाद बसपा  की सरकार में मंत्री रहने के बाद अखिलेश सरकार के समय नेता प्रतिपक्ष भी रहे किन्तु फिर मायावती पर तरह – तरह के आरोप लगाते हुए भाजपाई बन गये |  इसलिए उनका खुद को आम्बेडकरवादी कहना जमता नहीं है | बसपा में रहते हुए भी वे कभी दलित समुदाय के नेता नहीं माने गये | लेकिन इस सबसे अलग हटकर भाजपा छोड़ते ही वे जिस शैली में बात कर रहे हैं उससे ऐसा लगता है मानों वे अखिलेश की मजबूरी भांप चुके हैं | मुख्यमंत्री बनवाने की अपनी क्षमता का बखान उनके द्वारा जिस अंदाज में किया जा रहा है उससे ये लगता है वे अपनी कीमत बताने में जुटे हैं | जिससे  ज्यादा से ज्यादा सीटें अपने समर्थकों को दिलवा सकें | सवाल ये है कि श्री मौर्य के इस अंदाज को श्री यादव किस हद तक सहन कर पाएंगे क्योंकि अभी तो चुनाव प्रक्रिया शुरू ही हुई है और उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया जारी है | प्रदेश की 150  सीटों में  जीत – हार का फैसला करवाने का उनका दावा अखिलेश पर दबाव बढ़ाने की रणनीति हो सकती है | लेकिन लगातार मजबूत होते दिख रहे अखिलेश को ये सावधानी रखनी होगी कि बिना सोचे समझे आयात किये जाने से उनको वैसा ही नुकसान हो सकता है जैसा प. बंगाल में भाजपा भोग चुकी है | जिसने ममता बैनर्जी से सत्ता छीनने की जल्दबाजी में तृणमूल से बड़ी संख्या में विधायकों और अन्य नेताओं को पार्टी में लाकर टिकिट दी जिससे उसका परम्परागत समर्थक वर्ग उदासीन हो गया | स्वामीप्रसाद के तेवर देखकर ऐसा लगता है जैसे वे अखिलेश पर हावी होने के मूड में हैं | इसलिए उनको ये ध्यान रखना होगा कि 2017 के चुनाव में कांग्रेस के लिए 100 सीटें छोड़ने से सपा के वे नेता और कार्यकर्ता घर बैठ गये जिनकी टिकिट काटी गई | वहीं दूसरी तरफ जिन 300 सीटों पर पार्टी उनमें कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कोई रूचि नहीं दिखाई | ऐसा ही खेल लोकसभा चुनाव में हुआ | जिसके बाद अखिलेश ने कांग्रेस और बसपा से तो तौबा कर ली किन्तु ऐसा लगता है भाजपा को झटका  देने के फेर में खुद का नुकसान न कर बैठें | इस चुनाव में कांग्रेस ने सभी सीटें लड़ने की जो रणनीति बनाई है उससे कुछ हासिल हो न हो लेकिन इतना तो जरूर होगा कि पूरे प्रदेश में उसका झंडा उठाने वाले होंगे | अखिलेश यादव के पास पूरे उ.प्र में संगठनात्मक ढांचा है | रालोद के साथ उनका गठबंधन भी फायदेमंद हो सकता है लेकिन जयंत चौधरी और ओमप्रकाश राजभर ने अभी तक ऐसा कुछ ही नहीं कहा जिसे  खुद को अखिलेश से बड़ा सबित करने का प्रयास कहा जाता | लेकिन श्री मौर्य ने पूत के पांव पालने में वाली कहावत की याद दिलाते हुए जैसी शुरुआत की वह अखिलेश की अब तक की मेहनत पर पानी फेर सकती है | उनका कल का भाषण सीधे – सीधे जातिवादी ध्रुवीकरण का आधार बन सकता है जिसके कारण जिस इन्द्रधनुषी गठबंधन की बात सपा कर रही थी उसकी छटा धूमिल हो सकती है | इस बारे में याद  रखने वाली बात ये है कि जाति समूहों को एक साथ जोड़े रखना मेंढ़क तौलने जैसा है | पिछड़ी और दलित जातियों के बीच भी ऊंच - नीच की जो विभाजन रेखा है वह चुनाव के समय और गहरी हो जाती है | भाजपा ने श्री मौर्य के नखरे क्यों नहीं उठाये इसका पता लगाने के बाद ही उनकी नीयत और ताकत का आकलन अखिलेश को करना चाहिए | वैसे भी उनके चुनाव प्रचार में मुद्दे गायब होकर आयाराम और उनकी अहमियत हावी हो गई है | उनको ये याद रखना चाहिये कि बिहार में तेजस्वी यादव ने भी एनडीए के विरोध में महागठबंधन नामक जो चुनौती पेश की थी वह भी इसी तरह ताकतवर नजर आ रही थी | समाचार माध्यमों में भी तेजस्वी को धूमकेतु की तरह पेश किया जा रहा था | उनकी सभाओं में  भीड़ उमड़ रही थी | नीतीश कुमार को थका हुआ मानकर उनके हारने की भविष्यवाणी  हर कोई कर रहा था किन्तु तेजस्वी अंत में गच्चा खा गये | कांग्रेस उनके साथ थी लेकिन उसका कमजोर प्रदर्शन राजद की संभावनाओं को धूमिल कर गया | उ.प्र के चुनाव में भी विपक्ष के पास मुद्दे हैं लेकिन लड़ाई चार खेमों में बंटी है | मायावती और प्रियंका वाड्रा जानती हैं कि उनकी पार्टी सरकार नहीं बना सकेगी किन्तु वे अखिलेश को भाजपा का विकल्प न बनने देने की कोशिश में पीछे नहीं रहेंगी | अखिलेश ने प्रारम्भिक तौर पर जो हवा बनाई उसे बनाए रखना असली चुनौती है क्योंकि कहीं  ऐसा न हो कि असली  लड़ाई शुरू होते – होते उनका तरकश खाली हो जाए और उनको स्वामीप्रसाद  जैसों की मदद लेनी पड़े जो पूरी तरह गैर भरोसेमंद हैं | भाजपा निश्चित रूप से फिलहाल दबाव में है लेकिन वह इतनी आसानी से बाजी हाथ से नहीं जाने देगी |  स्वामीप्रसाद का बडबोलापन अखिलेश के किये कराये पर भारी पड सकता है | जिस तरह से गत दिवस उन्होंने भाषण दिया वैसे एक – दो वाकये  और हो गये तो जातीय समीकरण उलट – पुलट होते देर नहीं लगेगी |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 13 January 2022

भाजपा समझ ले उधार की बैसाखियों से लम्बा सफर तय नहीं किया जा सकता



उ.प्र में  दो मंत्रियों के त्यागपत्र देकर सपा में शामिल होने के संकेत के बाद भाजपा के महारथी भी हरकत में आये और कांग्रेस तथा सपा से कुछ नेताओं को तोड़कर ये साबित करने की कोशिश की कि वह भी जवाबी हमला  करने में सक्षम है | भाजपा द्वारा बड़ी संख्या में  विधायकों के टिकिट काटे जाने की अटकलों के कारण ही उसे छोड़ने वालों का सिलसिला जारी है | राजनीति में रूचि रखने वालों को याद होगा कि 2017 में भाजपा में आने वालों का तांता भी इसी तरह लगा हुआ था | श्री मौर्य उसी समय बसपा से निकलकर आये थे | भाजपा ने बीते पांच साल में दूसरी पार्टियों के दर्जनों नेताओ को अपने घर में जगह दी | उ.प्र से उसके जो लोकसभा सदस्य हैं उनमें भी दल बदलुओं की अच्छी खासी संख्या है | इसमें कोई शक नहीं है कि उ.प्र जैसे बड़े  राज्य में  सिक्का ज़माने के लिए अपने दरवाजे खोल  दिए जाने से पार्टी को जबरदस्त लाभ मिला किन्तु ये बात भी पूरी तरह सही है कि इस प्रक्रिया में तमाम ऐसे लोग भी  आ बैठे जिन्हें पार्टी की संस्कृति और संस्कारों से लेश मात्र भी लगाव नहीं था | श्री मौर्य ने अपने इस्तीफे में वैचारिक मतभिन्नता शब्द का इस्तेमाल भी किया है | दरअसल वे भाजपा के सदस्य  इसलिए बने थे क्योंकि  वे जिस बसपा में थे उसके सत्ता में आने की संभावनाएं शून्य हो चली थीं और तब  सपा उनको भाव देने तैयार न थी |  भाजपा का कहना है श्री मौर्य अपने बेटे सहित कुछ  नजदीकी लोगों की उम्मीदवारी चाह रहे थे  जो दो बार चुनाव हार चुका  था  | पार्टी छोड़ने वाले शेष नेताओं के साथ भी ऐसी ही बातें जुड़ी हुई हैं | भाजपा ने हाल ही के वर्षों में क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन बनाने के लिए अनेक ऐसे चेहरों को  सत्ता तथा संगठन में हिस्सेदारी दी जिनके कारण उसके प्रतिबद्ध नेता और कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित और असहज महसूस करने लगे |   जाहिर तौर पर भाजपा का दबदबा बनाने में डेढ़ दर्जन राज्यों में उसकी सरकारों का होना भी सहायक बना किन्तु इसका अप्रत्यक्ष नुकसान ये हुआ कि उसकी वैचारिक पहिचान धूमिल होने लगी | पांच साल तक  उसके साथ रहकर सत्ता की मलाई खाते रहने के बाद भी आयातित नेता  उसके रंग में नहीं रंग सके | प. बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने जिस बड़ी संख्या में दल बदलुओं को उम्मीदवारी दी उसकी वजह से उसके समर्पित कार्यकर्ता और नेताओं में नाराजगी फ़ैल गयी जिसकी वजह से उसका चुनाव अभियान अपेक्षित नतीजे न दे सका | ममता बैनर्जी ने तीसरी बार सत्ता हासिल करने के बाद जिस तरह की आक्रामकता दिखाई उसकी वजह से भाजपा में आये अनेक तृणमूल नेता वापिस लौट गये | उनमें कुछ जीते हुए कुछ विधायक भी हैं | पार्टी के राज्यसभा सदस्य और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल रॉय ने इस राज्य में भाजपा की जड़ें ज़माने में काफी योगदान दिया था लेकिन वे एक झटके में उसी ममता  के साथ चले गये जिससे उनका छत्तीस का आँकड़ा  था | इसी तरह केन्द्रीय मंत्री पद से हटाये जाते ही बाबुल सुप्रियो ने पार्टी को अलविदा कह दिया | मेघालय के राज्यपाल  सत्यपाल मलिक संवैधानिक पद पर बैठे हुए भी प्रधानमंत्री को घमंडी कहने का दुस्साहस करते हैं लेकिन पार्टी उनको बर्दाश्त कर रही है क्योंकि उ.प्र के चुनाव के पहले उन्हें छेड़ने से पश्चिमी उ.प्र के जाट समुदाय की नाराजगी और न बढ़ जाए | ये सब देखते हुए भाजपा को ये ध्यान  रखना होगा कि  कहीं आगे पाट पीछे सपाट वाली कहावत लागू न होने लगे | आज उसके नेता और प्रवक्ता श्री मौर्य  को अवसरवादी और दल बदलू कहकर उनका उपहास कर रहे हैं लेकिन पांच साल पूर्व जब इन जैसों की भीड़  भाजपा में आ रही थी तब भी अवसरवाद और सत्ता लोलुपता का दाग उनके दामन पर था | म.प्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से बगावत करते हुए कमलनाथ सरकार गिरवाने की कीमत राज्यसभा की सीट के साथ ही केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद के साथ अपने तमाम अनुयायियों को प्रदेश सरकार में मंत्रीपद दिलवाकर वसूल कर ली | समय आ गया है जब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ उसके बौद्धिक अभिभावक के तौर पर रास्वसंघ को ये सोचना चाहिए कि विचारधारा के प्रसार के लिए किसी भी कीमत पर  सत्ता हथियाने की बजाय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि पार्टी की जड़ें गहरी हों और जो लोग अन्य दलों से आयें उनको ज्यादा सिर पर न बिठाया जाए | किसी भी विचारधारा वाली पार्टी में बाहर से आने वाले को पूरी तरह परखे बिना  महत्वपूर्ण पद या दायित्व नहीं दिया जाता किन्तु भाजपा ने इस तरफ से आँखें मूँद रखी हैं | कई दिनों से सुनने में आ रहा था कि भाजपा आलाकमान श्री  मौर्य सहित अन्य नाराज नेताओं की मिजाजपुर्सी में जुटा रहा लेकिन सफलता नहीं मिली | सवाल ये है कि ऐसे नेताओं की चिरौरी करने की बजाय इनको खुद होकर बाहर कर देना चाहिए था जिससे उनकी  वजनदारी कम होती | वैसे भाजपा तमाम विसंगतियों के बाद भी अपनी वैचारिक पहिचान रखती है | निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों का उद्देश्य सत्ता हासिल करना होता है जो कि गलत भी नहीं है | लेकिन ऐसा करने के लिए यदि वे अपने सिद्धांतों और नीतियों से  समझौता  करते हैं तब उनका  भविष्य असुरक्षित हो जाता है | इसके दो सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं समाजवादी और साम्यवादी पार्टियाँ | समाजवादी आन्दोलन चंद परिवारवादी  नेताओं की निजी जागीर बनकर रह गया है , वहीं वामपंथी मोर्चा भी सुदूर केरल छोड़कर और कहीं नजर नहीं आता | इसके पीछे कारण सत्ता की राजनीति में उलझकर सिद्धांतों के साथ समझौता करना ही रहा | डा. लोहिया ने देश को गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था लेकिन उनकी विरासत के लगभग सभी दावेदारों ने समय – समय पर कांग्रेस की गोद में बैठने से परहेज नहीं किया | यही हाल हुआ वामपंथी मोर्चे का जिसने देश को आर्थिक उदारवाद के रास्ते पर ले जाने वाले डा.मनमोहन सिंह की सरकार को  टेका लगाकर अपनी छवि को पलीता लगा लिया | भाजपा ने बीते कुछ दशकों में राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जो पहिचान बनाई वह नीतिगत स्पष्टता और सैद्धांतिक दृढ़ता के कारण ही संभव हो सकी | राम मंदिर का निर्माण , धारा 370 को विलोपित करना , तीन तलाक पर रोक ,नागरिकता संशोधन कानून बनाने जैसे कामों ने जनमानस पर असर छोड़ा है परन्तु  राज्यों में सत्ता हासिल करने की आपाधापी में वह अपनी पुण्याई का ह्रास कर रही है | उ.प्र में जीत भाजपा के भविष्य के लिए बहुत जरूरी है | विधानसभा में सीटों की संख्या आगामी राष्ट्रपति चुनाव पर असर डालेगी | लेकिन सोचने वाली बात ये है कि पांच साल तक विशाल बहुमत वाली सरकार चलाने के बाद भी यदि वह आयाराम और गयाराम में उलझी है तो इससे उसका अपना समर्थक मतदाता भी भ्रमित और निराश होता है | राज्य सरकारें निश्चित रूप से पार्टी के लिए बड़ा सहारा होती हैं जिनके जरिये वह अपनी पकड मजबूत करती है | गुजरात में अच्छी सरकार चलाने के कारण ही नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय पहिचान मिली | उ.प्र में भी  योगी आदित्य नाथ ने कानून व्यवस्था के मोर्चे पर अच्छा काम किया और भ्रष्टाचार के आरोपों से भी वे मुक्त हैं | लेकिन उसके बाद भी पार्टी को जातीय समीकरण साधने की जरूरत पड़े तो ऐसा लगता है कि सत्ता चलाने की व्यस्तता में संगठन का काम प्रभावित हुआ है | ऐसा कहा जा रहा है कि योगी जी की सरकार लौटेगी तो जरूर लेकिन उसका बहुमत कम हो जाएगा | यदि ऐसा होता है और भाजपा 2017 वाला प्रदर्शन नहीं दोहरा पाती तब ये कहना गलत न होगा कि उधार की बैसाखियों के बल पर लम्बा सफर तय नहीं किया जा सकता | और उसके लिए अपने पांवों को ही मजबूत करना पड़ता है | उ.प्र में भाजपा छोड़कर जाने वालों के बदले जो बाहरी तबका आ रहा है वह भी भविष्य में ऐसा ही  करेगा क्योंकि उसकी भी पार्टी के सिद्धांतों की बजाय सत्ता में रूचि है |  

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 January 2022

मायावती की चुप्पी के पीछे है सोची-समझी रणनीति : राजनीतिक भविष्य दांव पर



उ.प्र के विधानसभा चुनाव इस समय सबसे ज्यादा चर्चित हैं क्योंकि 80 लोकसभा सीटें देने वाले इस राज्य के बारे में ये  मशहूर है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होते हुए जाता है। देश में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें से 9 इसी राज्य के रहे। भले ही स्व.अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी को पूरी तरह उ.प्र का न माना जाए लेकिन वे प्रधानमन्त्री तभी बन सके जब उन्होंने उ.प्र से लोकसभा चुनाव जीता। अटल जी तो कहते भी थे कि वे एमपी (सांसद) तो अनेक स्थानों से बने लेकिन पीएम (प्रधानमंत्री) उनको लखनऊ ने ही बनाया। 2014 में श्री मोदी का नाम जब भाजपा ने प्रधानमन्त्री पद हेतु आगे बढ़ाया तब वे भी गुजरात से निकलकर वाराणसी आये। इसके बाद की कहानी सभी को पता है। इसीलिए पूरे देश की निगाहें यदि इस राज्य के विधानसभा चुनाव पर टिकी हुई हैं तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जिन चार अन्य राज्यों में भी इसी के साथ चुनाव होने जा रहे हैं उनके बारे में भी चर्चा होती है लेकिन जितना ध्यान उ.प्र पर राजनीति में रूचि रखने वालों का है उतना बाकी पर नहीं। समीक्षक, विश्लेषक और सर्वेक्षण करने वाले भी उ.प्र पर ही निगाहें लगाये हुए हैं। इस राज्य में बीते पांच साल से भाजपा का शासन है। 2017 में पार्टी को पहली बार अपनी दम पर जबरदस्त बहुमत मिला था। अपने सहयोगियों सहित वह 325 तक जा पहुँची। उसके बाद 2019  के लोकसभा चुनाव में भी मोदी लहर के चलते उसे भारी सफलता हासिल हुई। उसके बाद से ये माना  जाने लगा था कि इस राज्य में भाजपा चुनौती विहीन हो चली है। उल्लेखनीय है 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के गठबंधन ने भाजपा को हराने की कोशिश की थी लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने मायावती के साथ गठजोड़ किया जिसे बुआ और बबुआ की जोड़ी कहकर वजनदार माना जा रहा था लेकिन नतीजा फुस्स रहा...। उस परिणाम से भाजपा को ये गुमान होने लगा कि वह अजेय हो चली है परन्तु बीते एक साल के भीतर ही माहौल में बदलाव आ गया। बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कानून व्यवस्था के साथ ही विकास के काफी काम किये लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के कहर और फिर किसान आन्दोलन की वजह से उ.प्र में भाजपा विरोधी मुखर होते हुए उत्साहित हुए और आज आलम ये है कि सभी ये मानकर चलने लगे कि मुकाबला कड़ा है। राममंदिर निर्माण की बाधाएं दूर होने और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के साथ राजमार्गों के जबरदस्त विकास के कारण भाजपा का जो दबदबा अपेक्षित था वह काफी कुछ ठंडा पड़ता दिख रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सोशल इंजीनियरिंग का जो तानाबाना बुना उसने न सिर्फ पिछड़ी अपितु दलित जातियों में भी उसका जनाधार बढ़ा दिया था। मंडल आन्दोलन से जुड़ी जातियों का मंदिर आन्दोलन के साथ जुड़ना बड़ा सामाजिक बदलाव माना गया। उसकी वजह से भाजपा को उच्च जातियों की पार्टी मानने  वालों को अपनी धारणा बदलना पड़ी। लेकिन इस चुनाव के आने से पहले ही पिछड़ी जातियों के कुछ नेताओं के भाजपा का साथ छोड़कर अखिलेश यादव से हाथ मिलाते ही ये अवधारणा फैलने लगी कि उ.प्र में भाजपा और अखिलेश के बीच सीधा मुकाबला है। अपने पिता  मुलायम सिंह यादव की अस्वस्थता के कारण अखिलेश ही सपा के सर्वेसर्वा बन बैठे हैं।  नाराज होकर अलग हो गये चाचा शिवपाल सिंह को भी वे मनाने में कामयाब हो गये। लेकिन श्री यादव को सबसे बड़ा लाभ मिला किसान आन्दोलन का जिसकी वजह से भाजपा को अपने सबसे मजबूत गढ़ पश्चिमी उ.प्र में जाट समुदाय की जबरदस्त नाराजगी झेलनी पड़ रही है जिसका देखते हुए अखिलेश ने स्व. चौ. चरण सिंह के पौत्र और स्व. अजीत सिंह के पुत्र रालोद नेता जयंत चौधरी से गठबंधन कर लिया। इस अंचल में काफी प्रभावशाली माने जाने वाले जाटों के नेता बनकर उभरे किसान नेता राकेश टिकैत के नेतृत्व में गाजीपुर में एक साल तक चले धरने के बाद किसानों में भाजपा के विरुद्ध जो गुस्सा खुलकर सामने आया उसने पूरे राज्य में योगी-मोदी की जोड़ी की इकतरफा जीत पर संशय उत्पन्न कर दिए। हर कोई ये मान रहा है कि अखिलेश ने भाजपा से पिछड़ी जातियों का थोक समर्थन छीन  लिया है। वहीं योगी जी के  कथित ठाकुर प्रेम के कारण ब्राह्मण भी भाजपा से छिटके हैं। यादव और मुसलमान तो सपा की जेब में ही माने जाते हैं। इसलिए ये कहने वाले काफी हैं कि अखिलेश सत्ता में लौट रहे हैं। यद्यपि प्रियंका वाड्रा की अगुआई में कांग्रेस उ.प्र में अपना खोया जनाधार वापिस प्राप्त करने के लिए काफी हाथ पाँव मार रही है और हैदराबाद से आकर असदुद्दीन ओवैसी भी मुस्लिम मतदाताओं को दूसरी पार्टियों का दुमछल्ला बनने की बजाय अपना स्वतंत्र अस्तित्व कायम करने के लिए उकसा रहे हैं किन्तु उसके बाद भी साधारण तौर पर ये मान लिया गया है कि अखिलेश ने भाजपा के सामने जबरदस्त मोर्चेबंदी करते हुए सत्ता परिवर्तन की सम्भावना को मजबूती प्रदान कर दी है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि जिस तरह 2017 में सपा-बसपा छोड़कर नेता भाजपा में आ रहे थे उसी तरह इस बार भाजपा में भगदड़ जारी है और सपा का ग्राफ ऊपर जाते देख सारे नेता अखिलेश में संभावनाएं देख रहे हैं। गत दिवस स्वामी प्रसाद मौर्य नामक पिछड़े नेता भी मंत्री पद छोड़कर सपा की ओर झुक गए। पिछली बार वे बसपा से भाजपा में आये थे। कहा जा रहा है कि अखिलेश ने राजभर, मौर्य, सैनी आदि पिछड़ी जातियों को अपनी तरफ खींचकर भाजपा की हवा निकाल दी है। कुछ और भाजपा विधायकों के पार्टी छोड़ने की अटकलें भी तेज हैं। लेकिन समूचे परिदृश्य में कांग्रेस की उपेक्षा तो एक बार सही भी लगती है क्योंकि उसका प्रदर्शन चुनाव दर चुनाव निराशाजनक ही रहा है किन्तु तमाम राजनीतिक समीक्षक बसपा को जिस तरह उपेक्षित कर रहे हैं वह आश्चर्यचकित करता है क्योंकि 2017 के चुनाव में जब उसे 19 सीटें मिली थीं तब भी उसका 22 फीसदी मत प्रतिशत बरकरार रहा था। दरअसल मायावती बीते कुछ समय से जिस तरह सार्वजनिक तौर पर कम दिखाई दीं उससे बसपा को कमजोर माना जाने लगा। अखिलेश और भाजपा बीते अनेक महीनों से चुनावी मैदान में सक्रिय हैं लेकिन मायावती ने न कोई रैली की और न ही अन्य आयोजन। गठबंधन के बारे में भी बसपा पूरी तरह से उदासीन नजर आ रही है। लेकिन हाल ही में मायावती ने पत्रकार वार्ता में सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का संकेत देकर बसपा की उपस्थिति दर्ज करवा दी। उसके बाद से ही अब इस बात के कयास लगाये जाने लगे हैं कि बसपा की रणनीति क्या रहेगी और वह इतनी देर से सक्रिय क्यों हुई? चुनाव विश्लेषक ये मानने लगे हैं कि राज्य में भाजपा के अलावा किसी और के पास समर्पित और स्थायी कैडर है तो वह है बसपा के पास। सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों में दलित वर्ग के जो लोग हैं वे बसपा को पर्दे के पीछे से समर्थन देते हैं। भले ही आर्थिक संसाधनों की कमी के नाम पर मायावती ने बड़े आयोजन न करने का ऐलान किया लेकिन उनके कार्यकर्ताओं का काम चुपचाप शुरू हो गया है। जैसी जानकारी मिल रही है उसके अनुसार बसपा की सोच ये है कि उ.प्र में त्रिशंकु विधानसभा बनने जा रही है और उस स्थिति में वह सौदेबाजी करने में कामयाब हो जायेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि उसने यदि अपने परम्परागत जनाधार को बनये रखा तब अखिलेश के अरमानों पर पानी फिर सकता है। उल्लेखनीय है बसपा मुसलमानों को भी बड़ी संख्या में टिकिट देती है। मायावती ने जिस ठंडे अंदाज में चुनाव में उतरने की घोषणा की वह राजनीतिक विश्लेषकों को इसलिए हैरान कर रहा है क्योंकि वे तामझाम पसंद करने वाली नेता हैं। उनके शैली में आक्रामकता का अभाव रणनीति में बदलाव है या परदे के पीछे चल रहे किसी खेल का हिस्सा ये फि़लहाल कह पाना कठिन है किन्तु मायावती किसी भी सूरत में अखिलेश को दोबारा मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहेंगी क्योंकि वैसा होने पर उ.प्र में उनका भविष्य अंधकार मय हो जाएगा। भाजपा भी इसीलिये बसपा पर हमले करने से बच रही है। अभी टिकिटों की घोषणा नहीं हुई है इसलिए सारे अनुमान बौद्धिक विश्लेषण पर आधारित हैं। ज्योंही सभी पार्टियाँ उम्मीदवारों की सूची निकालेंगी त्योंही समीकरण भी  बदलेंगे। भाजपा से मची भगदड़ के पीछे बड़े पैमाने पर विधायकों की टिकिटें काटे जाने की आशंका है। सूची जारी होने के बाद सपा को भी दिक्कतें हो सकती हैं। और उस सूरत में बसपा अपनी जगह बनाने में जुटेगी क्योंकि योगी और अखिलेश के साथ ही ये चुनाव मायावती के राजनीतिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 11 January 2022

भ्रम और भय फ़ैलने से रोकने के लिए कोरोना का अधिकृत सूचना तंत्र होना जरूरी



कोरोना , डेल्टा और  ओमिक्रोन से होते हुए अब बात डेल्टाक्रोन तक आ पहुँची है | अख़बारों  और  टीवी पर आने वाले समाचारों के अलावा डिजिटल प्लेटफार्म नामक माध्यम पर भी कोरोना के बाद नए नाम वाले संक्रमणों के बारे में तरह – तरह की जानकारी के अतिरिक्त  सुझाव , संभावनाएं और भविष्यवाणियाँ भरी पड़ी हैं | तीसरी लहर कितने दिन जारी रहेगी , उसका असर क्या होगा , चरमोत्कर्ष कब आयेगा आदि – अदि पर इतनी बातें परोसी जा रही हैं कि आम जनता भ्रमित भी है और भयभीत भी | केंद्र और राज्य सरकारें लोगों से सावधान रहने की अपील तो कर रही हैं लेकिन दफ्तरों , शैक्षणिक संस्थानों , बाजारों और सार्वजनिक समारोहों को लेकर आये दिन विरोधाभासी  घोषणाएं होने से लोग तय  नहीं कर पा रहे हैं कि वे क्या करें और क्या न करें ? शादी आदि में कितने अतिथि बुलाये जा सकते हैं , ये भी अनिश्चित है | केवल एक बात की पूरी छूट है और वह है राजनीति | नेताओं के दौरे बदस्तूर जारी हैं | लोगों से उनके मिलने में मास्क और शारीरिक दूरी जैसी सावधानियां पूरी तरह उपेक्षित की जाती हैं |  तीसरी लहर के आगमन की पुष्टि करने के बाद प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों ने उच्च स्तरीय बैठकें करते हुए कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हुई गलतियों से बचते हुए माकूल इंतजाम करने के निर्देश प्रशासन को दे दिए जिसके अंतर्गत सरकारी अमले ने भी मुस्तैदी दिखाना शुरू कर दिया |  लेकिन  शिक्षण संस्थान खुलेंगे या नहीं और कितनी उम्र तक के बच्चे कक्षाओं में पढ़ने आ सकते हैं इस बारे में भी स्थिति अस्पष्ट है | अभिभावक इतने डरे हुए हैं कि वे ऑन लाइन पढाई पर ही जोर दे रहे हैं | शासकीय और अशासकीय कार्यालयों में भी पूरी उपस्थिति से काम हो रहा है | अदालतों में कुछ जगह आभासी तो कुछ जगह सामान्य तरीके से काम चल रहा है | रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाते हुए बाजार जल्दी बंद कराने के निर्देश  दे दिए गए हैं | टीकाकरण को लेकर भी सरकारी व्यवस्थाओं की जानकारी रोजाना प्रसारित हो रही है | लेकिन इन सभी में सामंजस्य का अभाव होने से संचार क्रान्ति के इस युग में भी आम जनता को ये समझ में नहीं आ रहा कि उसे आखिर करना क्या है ? पिछले  अनुभवों के आधार पर अर्थव्यवस्था को चलायमान  रखने के लिए लॉक डाउन लगाने से सरकार बच रही है | पहली लहर में इकतरफा घोषणा से हुई आलोचना के कारण दूसरी लहर में केंद्र सरकार ने लॉक डाउन का निर्णय राज्यों पर छोड़ दिया था | इस बार भी  केंद्र की नीति वही है | लेकिन उद्योग – व्यापार को रोकने के दूरगामी दुष्परिणाम बीते दो लॉक डाउन के दौरान सामने आ चुके हैं , इसीलिये कोई भी सरकार इसे लागू करने से कतरा रही है | लेकिन ओमिक्रोन की प्रसार क्षमता का जो पूर्वानुमान लगाया गया था वह जिस तरह से सही साबित हो रहा है उसके बाद लोगों को प्रामाणिक जानकारी देने की पुख्ता व्यवस्था की जानी चाहिए | इस बारे में ये बात ध्यान रखनी होगी कि पिछली दोनों लहरों के दौरान लोगों को जो अनधिकृत जानकारियां मिलती रहीं उसके कारण काफी परेशानियाँ बढ़ीं | पहले - पहले संक्रमण को हलके में लिया गया और उसके बाद जब हालात बिगड़े तब अफरा - तफरी मची | इसलिए बेहतर होगा सरकार तीसरी लहर के बारे में चिकित्सा व्यवस्थाओं संबंधी जानकारी देने के लिए अधिकृत एजेसियाँ तय कर बाकी सभी को इस संदर्भ में ज्ञान बांटने से रोके | बीते कुछ दिनों में विभिन्न माध्यमों के जरिये जिस तरह की सूचनाएँ मिल रही हैं उनकी सत्यता की पुष्टि करने का कोई जरिया आम जनता के पास नहीं होने से जितने मुंह उतने सुझाव सुनने मिल जाते हैं | टीके के तीसरे या बूस्टर डोज को लेकर भी भारी अनिश्चितता है | इसके अलावा देश भर के वैज्ञानिक , चिकित्सक , आईआईटी शोधकर्ता और उनके  अलावा भी अनेक लोग लगभग रोजाना नई – नई बातें बताकर लोगों को भ्रमित और भयभीत करने का कारण बन रहे हैं | ये देखते हुए केंद्र और राज्य स्तर पर अधिकृत एजेंसियों को ही इस बारे में लोगों को सूचनाएँ देने हेतु अधिमान्य किया जाना चाहिए | बीते एक सप्ताह में संक्रमण जिस तेजी से बढ़ा है उसके बारे में भी विभिन्न प्रकार के अनुमान सुनने  मिल रहे हैं | संक्रमण का चरमोत्कर्ष कब आएगा और कब तक रहेगा इसे लेकर विरोधाभासी बातें कही जा रही हैं | ओमिक्रोन नामक वायरस की समुचित जांच हेतु सरकार और निजी पैथालोजी लैब के पास पर्याप्त साधन न होने के बाद भी जाँच किस आधार पर की जा रही है इसे लेकर भी असमंजस  है | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि सरकारी स्तर पर चिंता और बेफिक्री दोनों एक साथ चल रही हैं , जिसका लाभ लेकर  अनधिकृत लोग अधकचरी जानकारी प्रसारित कर अपने मियाँ मिट्ठू बने फिर रहे हैं | हालाँकि हमारे देश में झोला छाप डाक्टर भी स्वास्थ्य सेवाओं का अभिन्न हिस्सा हैं | लेकिन कोरोना काल में महामारी के बारे में बताने वाले ऐसे लोग पैदा हो गये हैं जिन्हें चिकित्सा विज्ञानं और आपदा प्रबंधन के बारे में समुचित ज्ञान नहीं है | तीसरी लहर की तीव्रता , इलाज , चिकित्सा प्रबंध और टीकाकरण आदि के बारे में अनधिकृत जानकारी न आये इस बात का केंद्र और राज्य सरकारों को ध्यान रखना चाहिए | जैसी आशंका है आने वाले कुछ दिनों में ही संक्रमण में और तेजी आयेगी और उस दौरान अप्रामाणिक सूचनाएं भीड़ वाली मानसिकता उत्पन्न करने का कारण बन सकती हैं , जो खतरनाक होगा | इस तरह की स्थितियों में लोगों का अनुशासित रहना बहुत जरूरी है परन्तु ये तभी संभव होगा जब उन्हें सही समय पर सही जानकारियाँ मिलें | मास्क और सैनिटाइजर जैसी चीजों की मुनाफाखोरी रोकना भी जरूरी होगा | वैसे समाज का बड़ा वर्ग पिछले दो वर्ष में इस आपदा से निपटने का अभ्यस्त और प्रशिक्षित हो चुका है किन्तु  संक्रमण जिस तरह रूप बदल रहा है उसे देखते हुए हर तरह की सावधानी रखना जरूरी है | उम्मीद है सरकार अपने सूचनातंत्र को अधिक विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाने के साथ ही अनधिकृत लोगों को इस बारे में बोलने से रोकेगी ताकि किसी भी प्रकार का भ्रम न फैले |

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 10 January 2022

बरसात में भीगता अनाज राष्ट्रीय क्षति : भण्डारण क्रान्ति की सख्त जरूरत



एक साल से ज्यादा चले किसानों के धरने में कृषि कानून वापिस लिए जाने के साथ ही इस बात पर भी  जोर रहा कि कृषि उत्पादों के लिए निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी स्वरूप प्रदान किया जाए | हालाँकि धरना तो खत्म हो गया लेकिन इस मांग पर किसान संगठन अभी भी अड़े हुए हैं और केंद्र सरकार शीघ्र ही इस बारे में  एक समिति गठित करने वाली है | ये समस्या इसलिए खड़ी  हुई क्योंकि सत्तर के दशक में  आयात खत्म कर देश को खाद्यान्न आत्मनिर्भर बनाने हेतु तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने जिस हरित क्रांति की शुरुआत की उसने पूरी कृषि व्यवस्था को बदल डाला | सिंचाई सुविधाओं के विकास के साथ ही तकनीक आधारित उन्नत खेती की वजह से अनाज का उत्पादन तेजी से बढ़ने लगा | व्यावसायिक दृष्टिकोण वाले किसानों ने सब्जियों  , फलों  और फूलों की खेती करना शुरु किया | परिणाम ये हुआ कि भारत गेहूं और चावल का निर्यात करने की सुखद स्थिति में आ गया | इस वर्ष देश के पास  इतना अनाज सरकारी गोदामों में है जिससे आगामी दो  साल तक काम चलाया जा सकता है | कहा जाता है यदि केंद्र सरकार कोरोना काल में 80 करोड़ लोगों  को मुफ्त अनाज न बांटती तब उसको रखने की जगह नहीं बचती | 2020 और 2021 में लगाये गए लॉक डाउन के दौरान जब उद्योग – व्यापार बुरी तरह चौपट होकर रह गये थे,  उस समय भी किसानों ने अपनी उद्यमशीलता से रिकॉर्ड उत्पादन करते हुए देश को खाद्यान्न सुरक्षा के प्रति निश्चिन्त रखा | लेकिन इस उपलब्धि पर हर साल भण्डारण क्षमता की कमी पानी फेर देती है | बीते कुछ दिनों से देश के अनेक राज्यों में बरसात हो रही है | इस मौसम में बिना ओले वाली वर्षा रबी फसल के लिए अमृत समान मानी जाती है | लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि अगली फसल के लिए लाभदायक इस मौसम की वर्षा पिछले मौसम की उपज को बर्बाद करने का कारण भी बनती  है | म.प्र को ही लें तो यहाँ सरकार द्वारा खरीदी जा रही लाखों टन धान उचित भण्डारण नहीं होने के कारण खुले आकाश के नीचे रखी – रखी भीग गई | इसी के साथ ही जिन किसानों की धान कृषि उपज मंडियों में सरकारी खरीद हेतु तुलाई का इंतजार कर रही थी , वह भी बरसात का शिकार हो गई | ज्यादा दूर न जाएं तो केवल जबलपुर जिले में ही एक लाख क्विंटल धान के भीगने की खबर है | यदि समूचे प्रदेश में हुए नुकसान का आँकड़ा एकत्र किया जाए तो अंदाज लगाया जा सकता है कि किसान की मेहनत और सरकार के पैसे किस तरह बर्बाद हो रहे हैं |  | इस बारे में ये भी जानकारी आई है कि मंडियों में रखे जाने वाले अनाज को ढांकने के लिए पर्याप्त मात्रा में तिरपाल तक उपलब्ध नहीं हैं | ये वाकया हर साल और हर फसल के दौरान दोहराया जाता है | रबी फसल की ख्ररीदी होते – होते जब मानसून आ टपकता है ,  तब मंडियों में रखा गेंहू तथा चना  वगैरह  भीगते हैं और खरीफ फसल के समय शीतकालीन वर्षा से अनाज बर्बाद होता है | देश में  अनाज के साथ ही सब्जियों और फलों का उत्पादन जिस मात्रा में बढ़ रहा है उस लिहाज से भण्डारण और प्रसंस्करण ( प्रोसेसिंग ) क्षमता में वृद्धि न होने से प्रतिवर्ष जितना नुकसान होता है वह अक्षम्य अपराध की श्रेणी में रखे जाने लायक है | भारतीय खाद्य निगम अपनी गोदामों के अलावा निजी क्षेत्र की गोदामों को भी अनुबंध पर किराये से लेता है | गोदाम बनाने के लिए बैंकों से ऋण के अलावा सरकार से अनुदान भी मिलता है | हालाँकि स्थिति पहले से कुछ सुधरी है किन्तु कृषि उत्पादन जिस अनुपात में बढ़ रहा है उसकी तुलना में भंडारण व्यवस्था न होने से अनाज की बर्बादी का निर्बाध क्रम जारी है | सब्जियों और फलों के भंडारण के लिए कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण इकाइयों के अभाव में भी प्रगतिशील किसानों को उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं मिल पाता ,  वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय  अर्थव्यस्था को भी नुकसान होता है | हरित क्रान्ति के सूत्रपात के समय ही यदि इस दिशा में समानांतर और सार्थक प्रयास किये जाते तो ये समस्या उत्पन्न नहीं होती | लेकिन हमारे देश में योजना बनाने वालों में समग्र सोच का अभाव होने से समय और धन का समुचित उपयोग नहीं हो पाता | इसका एक उदाहरण बड़े बांधों के बन जाने के बरसों बाद तक उनसे जोड़ी जाने वाली नहरों का निर्माण न होना है | ऐसे  में  उनसे बिजली भले बनती हो लेकिन किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करवाने का मूल उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता | देश आज जिस मुकाम पर खड़ा है वहां उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए स्वयं को तैयार करना है तो  किसी भी चीज के उत्पादन के  साथ ही उसके निर्यात की व्यवस्था भी करनी होगी | यदि उचित भंडारण और प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था की जाए तो बड़ी बात नहीं भारत कृषि उत्पादों के निर्यात  में भी बड़ी ताकत बन सकता है | सरकार द्वारा  खरीदे जाने वाले खाद्यान्न की बर्बादी के साथ भ्रष्टाचार भी काफी नजदीकी से जुड़ा है | गोदामों में रखे अनाज को चूहे  जितना खाते हैं उससे ज्यादा तो सरकार का भ्रष्ट अमला हजम कर जाता है | इसी तरह की  और भी बातें हैं लेकिन कुछ दिन उछलने के बाद सारे मामले ठन्डे पड़ जाते हैं , अगली बरसात के लिए | सरकार को ये सब न दिखता हो ऐसा नहीं है किन्तु सरकारी मंडियों और समितियों में बैठी  राजनीतिक जमात भी इस लूटमार में बराबरी से चूंकि शामिल रहती है इसलिए हल्ला चाहे कितना मचे , परन्तु  स्थिति वही ढाक के तीन पात की बनी रहती है | जबलपुर जिले में एक लाख क्विंटल धान के भीग जाने से नुकसान किसानों का हुआ या सरकार का ये उतना महत्वपूर्ण नहीं बल्कि चिंता का विषय है कि ये सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले  रहा |   सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के लिए जो प्रयास कर  रही है वे अपनी जगह हैं लेकिन यदि भंडारण और प्रसंस्करण की समुचित व्यवस्था की जा सके तो किसान और सरकार दोनों हर साल होने वाले बड़े नुकसान से बच सकते हैं | पता नहीं किसान आन्दोलन के कर्ताधर्ताओं की समझ में ये मुद्दा क्यों नहीं  आया जबकि इस दिशा में उसी तरह के समयबद्ध प्रयास जरूरी हैं जैसे परिवहन मंत्री नितिन गडकरी राजमार्गों के निर्माण में कर  रहे हैं |  

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 January 2022

समृद्धि से ज्यादा स्वस्थ शरीर और मानसिक शांति महत्वपूर्ण भारतीय संस्कृति में ज़िन्दगी केवल सांसों का सफर नहीं ......


 
एक पुरानी कहावत है भूत मारता भले न हो लेकिन परेशान जरूर करता है | कोरोना की तीसरी लहर  और उसके साथ ओमिक्रोन नामक नए वायरस के बारे में भी यही कहा जा रहा है कि वह दूसरी लहर की तरह जानलेवा नहीं होगा परन्तु  उसके चंगुल में आने वाले व्यक्ति को कुछ समय तक परेशानी उठानी पड़ेगी | लगे हाथ ये चेतावनी भी दी जा रही है कि इसे हल्के में न लें क्योंकि इसके लक्षण पहली और दूसरी लहर से भिन्न हैं जिनकी अनदेखी घातक  हो सकती है | सबसे बड़ी बात जो देखने में आ रही है वह ये कि कोरोना के दोनों टीके लगवा चुके व्यक्ति को भी ये वायरस संक्रमित कर रहा है | हालाँकि अब तक के निष्कर्षों के अनुसार ओमिक्रोन से पीड़ित मरीज को अस्पताल और ऑक्सीजन की जरूरत नहीं पड़ रही और घर में ही अलग  रहकर वह साधारण इलाज से स्वस्थ हो जाता है किन्तु इसके साथ नुकसानदेह बात ये है कि इसका संक्रमण कोरोना से कई गुना ज्यादा फैलता है | यही वजह है कि बीते कुछ दिनों के भीतर ही देश में संक्रमितों  का नियमित आंकड़ा डेढ़ लाख के निकट जा पहुंचा है | चिकित्सा वैज्ञानिक ये मान  रहे हैं कि जनवरी का अंत आते तक ये संख्या 10 और 20 लाख से भी ऊपर  जा सकती है | लेकिन दूसरी तरफ ये भी आश्वासन मिल रहा है कि कोरोना की दूसरी लहर का चरमोत्कर्ष जहाँ तीन माह बाद आया था वहीं  ओमिक्रोन  फरवरी के मध्य तक उतार पर आने लगेगा | विश्व भर के चिकित्सा विशेषज्ञ ये भी मान रहे हैं कि 2022 खत्म होते – होते कोरोना का चक्र पूरा हो जाएगा | लेकिन दबी जुबान कहा जा रहा है कि अनुकूल परिस्थितियों के चलते इसी तरह की कुछ और बीमारियाँ  मानव जाति के लिए परेशानी का कारण बनी रहेंगीं | 

जिस तरह समुद्र के किनारे रहने वाले ज्वार भाटा , चक्रवात और तूफ़ान आदि के अभ्यस्त हो जाते हैं ठीक वैसे ही अब हमें भी इसी तरह के वायरस हमलों के लिए खुद को तैयार  रखना होगा क्योंकि बीती एक सदी में मानव जाति ने विकास की वासना के वशीभूत होकर जो कुछ हासिल किया उसके दुष्प्रभाव अप्रत्यक्ष  तौर पर ही सही किन्तु सामने आने लगे हैं | ये देखते हुए विज्ञान से जुड़े महानुभावों का ये दायित्व है कि वे पूरी दुनिया को उस जीवनशैली को  अपनाने हेतु प्रेरित करें जो प्रकृति से संघर्ष की बजाय  सामंजस्य बनाते हुए सह - अस्तित्व के उस सिद्धांत पर आधारित है जिसमें चीटी से लेकर हाथी और कंकड़ - पत्थर से पर्वत तक का महत्व स्वीकार किया गया था | घास का तिनका हो या वट वृक्ष , सभी को पूजित मानने का भारतीय चिंतन वैज्ञानिक अध्ययन और शोध पर ही आधारित था किन्तु  सैकड़ों वर्षों की गुलामी के कारण विदेशी प्रभाव के मोहपाश में  जिस भोगवादी जीवनशैली ने हमारी सोच पर आधिपत्य कायम कर लिया उसके कारण ही  तरह – तरह की ऐसी समस्याएं आपदा के रूप में आ धमकने लगी हैं जिनके सामने पूरा का पूरा विज्ञान लाचार नजर आता है | अन्तरिक्ष की अनंत ऊंचाइयों को छूने का पराक्रम करने वाला विज्ञान एक अदृश्य वायरस के हमले से हतप्रभ  हो गया | आज तक वह ये खोज कर पाने में सफल न हो सका कि उसकी उत्पत्ति क्यों , कहाँ और कैसे हुई ? पहले दावा किया गया था कि टीके की दो खुराक इसके प्रकोप से बचा लेगी लेकिन वह दावा भी विश्वसनीय साबित नहीं हुआ | पूरी दुनिया उसके हमले से किस तरह  हिल गई है , ये बताने की जरूरत नहीं है | ज्ञान – विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र पर इसका असर पड़ा  है और ये कहने में कुछ भी गलत  नहीं है कि 21वीं सदी के पहले दो दशक में दुनिया जितनी आगे बढ़ी थी उतनी ही बीते दो  साल में पीछे हो गई  |

दूसरी तरफ ये उम्मीद भी  है कि मानव जाति में संघर्ष की जो नैसर्गिक क्षमता है उसके बल पर वह इस झंझावात से भी बचकर बाहर आ जायेगी परन्तु उसे इससे कुछ सबक जरूर लेना चाहिए | हर आपदा अपने पीछे कुछ न कुछ ऐसा छोड़ जाती है जिसमें भविष्य  के लिए संकेत होते हैं | प्रकृति की अपनी कोई भाषा भले न हो लेकिन जिस सांकेतिक शैली में वह हमें आने वाले  खतरों से सावधान करती है उसे समझ लेने पर उनसे बचाव संभव है | कोरोना की तीसरी लहर , जैसा कहा जा रहा है जल्द ठंडी पड़ जायेगी परन्तु  इसके बाद भी निश्चिन्त होकर बैठ जाना मूर्खता होगी | समय आ गया है जब हम  अपनी जिम्मेदारी समझते हुए अपनी संतानों के लिए ऐसी दुनिया छोड़ जाने की दिशा में प्रयासरत हों जिसमें शुद्ध हवा और पानी उपलब्ध हो | देश के जिन महानगरों में विकास और आर्थिक समृद्धि की चकाचौंध नजर आती है उनमें रहने वालों की सांसों में कितना जहर घुल रहा है ये बताने की जरूरत नहीं है | दुनिया के कुछ समझदार देशों ने विकास के साथ ही सुखमय जीवन को अपना लक्ष्य बनाया , जिसके कारण वहां रहने वालोँ की जीवन शैली पूरे विश्व के लिए आकर्षण का विषय बन गई है | भारत के पड़ोसी  पहाड़ी  देश भूटान को भी ऐसे ही देशों में शुमार किया जाता है | हमारे देश में  बेहतर जीवन जीने के लिए जो तौर – तरीके अपनाये जाते रहे हैं उनसे अपने बच्चों का परिचय करवाते हुए उनमें उनके बीज रोपित करना मौजूदा समय की सबसे बड़ी जरूरत है | कोरोना नामक महामारी के बाद बड़ी संख्या में लोगों को इस बात का  एहसास हुआ कि जीवन में समृद्धि से ज्यादा स्वस्थ शरीर और मानसिक शांति  महत्वपूर्ण है | लेकिन इसके लिए हमें अपनी  सोच में जरूरी बदलाव करना होंगे | भारतीय संस्कृति में ज़िन्दगी केवल सांसों का सफर नहीं अपितु ईश्वर प्रदत्त  दायित्वों के निर्वहन करने का अवसर है | रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने बड़े ही  सरल शब्दों में लिखा है :-

बड़े भाग मानुष तन पावा , 
सुर दुर्लभ सद्ग्रंथहिं गावा |

काश , हम इसका आशय समझ सकें तो मृत्युलोक में भी स्वर्ग का एहसास हो सकता है |

-आलेख रवीन्द्र वाजपेयी