Monday, 7 February 2022

राजनीति को कॉमेडी सर्कस बनाने वाले सिद्धू से न हँसते बन रहा है न रोते



आखिरकार पंजाब में कांग्रेस ने  मौजूदा मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया | चौंकाने वाली बात ये रही कि इसकी घोषणा  राहुल गांधी ने की  जो  फ़िलहाल पार्टी के सांसद भर हैं | 2019 में उनके द्वारा पार्टी का राष्ट्रीय पद छोड़ने के बाद उनकी माताजी सोनिया गांधी कार्यकारी अध्यक्ष बनीं और उसके बाद संगठन के चुनाव करवाने को लेकर पार्टी के भीतर  जबरदस्त खींचातानी मची हुई है | जी – 23 नामक एक गुट ने तो इसे लेकर विरोध का झंडा तक उठा रखा है |   इसके बावजूद  राहुल ही पार्टी के सारे मसले निपटाते हैं | उन्हीं की पहल पर पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू के अरमानों पर पानी फेरते हुए दलित चेहरे के नाम पर श्री चन्नी की ताजपोशी की गई थी | लेकिन नवजोत ने उनके विरुद्ध  भी वैसे ही मुंह चलाना जारी रखा जैसा वे कैप्टन अमरिंदर सिंह के समय किया करते थे | बीच – बीच में ये हवा भी उड़ती रही कि वे बगावत कर सकते हैं किन्तु आम आदमी पार्टी द्वारा  भगवंत  मान को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किये  जाने के बाद श्री सिद्धू के सामने कोई विकल्प नहीं बचा | हालाँकि गांधी परिवार ने ही उन्हें अमरिंदर के सिर पर बिठाकर  ताकतवर बनाया था किन्तु जल्द ही उसको समझ में आ गया कि वे  जरूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी  और अस्थिर दिमाग के इन्सान हैं | उनको पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के बाद से ही पंजाब में कांग्रेस में बिखराव शुरू होने लगा ] सुनील जाखड़ और मनीष तिवारी जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी उनका धूमकेतु की तरह उभरना रास नहीं आया | यही वजह है कि कांग्रेस पंजाब में बुरी तरह बिखर गई है | उसके तमाम नेता दूसरी पार्टियों में चले गए वहीं टिकिट कटने से नाराज अनेक बागी बनकर चुनाव मैदान में खड़े हैं | बीते दिनों श्री जाखड़ ने ये बयान देकर पार्टी आलाकमान की चिंता बढ़ा दी कि उनको हिन्दू होने के कारण  उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है | इस राज्य में चूँकि सिख समुदाय बहुमत में है इसलिए राजनीति में उसका ही वर्चस्व रहा है |  विशेष रूप से जाट सिखों का जिसका प्रतिनिधित्व श्री सिद्धू करते हैं | चूँकि  अकाली दल ने  32 फीसदी दलित मतों की चाहत में बसपा से गठबंधन कर लिया इस कारण  कांग्रेस को   दलित समुदाय के श्री चन्नी को अमरिंदर का उत्तराधिकारी बनाना पड़ा | उसके बाद भी श्री सिद्धू को उम्मीद रही कि वे लटके – झटके दिखाकर पार्टी हाईकमान को इस बात के लिए तैयार कर ही लेंगे कि आगामी चुनाव में उनको बतौर मुख्यमंत्री प्रत्याशी पेश किया जावे | पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष होने के बाद भी उन्होंने श्री चन्नी को कमजोर करने का कोई  अवसर नहीं गंवाया | हाल ही में खनिज घोटाले में  रिश्तेदारों के यहाँ पड़े छापों पर मुख्यमंत्री के विरुद्ध सार्वजनिक बयान देने में भी वे नहीं हिचके | उनकी हरकतों से पार्टी हाईकमान को भी ये डर बना रहा कि वे  रायता फैला सकते हैं | इसीलिए उसने आम आदमीं पार्टी के मुख्यमंत्री  उम्मीदवार की घोषणा होने तक अनिश्चितता बनाये रखी | उसके बाद ये शिगूफा भी छोड़ा गया कि  श्री चन्नी और श्री सिद्धू ढाई – ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे किन्तु  पहला अवसर किसे दिया जावे ये चुने हुए विधायकों की मर्जी पर होगा |  लेकिन  श्री जाखड़ ने इस फैसले पर ऐतराज जताते हुए  बागी स्वर में बोलना शुरू कर दिया | सुना तो ये भी गया कि भाजपा उन पर डोरे डालने लगी थी | अमरिंदर से भी उनके  अच्छे रिश्ते हैं | ये सब देखने के बाद ही कांग्रेस ने  आखिरकार श्री चन्नी के चेहरे को ही सामने लाने का निर्णय कर लिया जिसकी घोषणा गत दिवस श्री गांधी से करवाई गयी | इस मौके पर उन्होंने श्री सिद्धू की तारीफ भी की और श्री चन्नी ने भी ये कहकर उनको खुश  करना चाहा कि नई सरकार बनने पर वे सिद्धू मॉडल लागू करेंगे | इस बारे में सबसे बड़ी बात ये है कि श्री  चन्नी को ही भावी मुख्यमंत्री बनाये जाने का  फैसला श्री गांधी का है या इसमें उनकी माताजी और बहिन की भी भूमिका है , ये कोई नहीं बता सकता |  अब सवाल ये है कि जब श्री सिद्धू के लिए भविष्य की संभावनाएं भी खत्म कर दी गईं तब वे क्या करेंगे ? क्रिकेट के बाद राजनीति के साथ श्री सिद्धू कामेडी शो में भी बतौर एंकर काफी चर्चित हुए थे | मंत्री बनने के बाद उन्हें वह काम छोड़ना पड़ा | उनकी पत्नी ने हाल ही में अपना दुखड़ा रोते हुए कहा था कि वे  टीवी शो में घंटे भर में 25 लाख कमा लिया करते थे और राजनीति में मनमाफिक स्थान नहीं मिला तब वे  वापिस उसी काम में लौट जायेंगे क्योंकि यहाँ उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना  पड़ रहा है | स्मरणीय है  मुख्यमंत्री  पद पर आने के पहले श्री चन्नी को श्री सिद्धू का  समर्थक माना जाता था किन्तु सत्ता में आते ही उन्होंने रंग बदल लिया | अपनी ही सरकार के विरुद्ध श्री सिद्धू ने जिस तरह से खुले आम बयानबाजी की उससे ये लग रहा था कि वे पार्टी आलाकमान पर हावी होकर अपने पक्ष में फैसला करवा लेंगे किन्तु गत दिवस श्री गांधी ने उनके सामने ही उनका पत्ता काट दिया और वे मन - मसोसकर रह गये | सही बात तो ये है कि अमरिंदर को हटाने के लिए गांधी परिवार ने उनका चालाकी से उपयोग किया था  और काम होते ही उन्हें किनारे लगा दिया गया | वह भी ऐसे समय जब उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा | इस तरह दूसरों का तमाशा बनाने में सिद्धहस्त नवजोत खुद ही तमाशा बन गये हैं | वैसे आज की राजनीति भी सही मायनों में कॉमेडी सर्कस बनकर रह गई है जिसमें श्री सिद्धू जैसे एक – दो किरदार हर पार्टी में देखने मिलते हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 6 February 2022

जब तक सुर और संगीत रहेंगे तब तक लता जी जीवंत रहेंगी



 जब तक सुर और संगीत रहेंगे  तब तक लता जी जीवंत रहेंगी


महान विभूतियों के जन्म और महाप्रयाण दोनों संयोग होते हैं | भारत रत्न कोकिला कंठी लता मंगेशकर का निधन इसका प्रमाण है | जीवनकाल में ही अमरत्व के शिखर को स्पर्श  कर लेने वाली इस स्वर साधिका को संगीत की अधिष्ठात्री  माँ सरस्वती का प्रतिरूप कहा जाने लगा था | ऐसे में ये बात मन को छू गई कि कल जब पूरे देश और दुनिया भर में फैले भारतीय संस्कृति के अनुयायी सरस्वती पूजा के अनुष्ठान में रत थे तब लता जी ने अपनी सांसों को रुकने नहीं दिया क्योंकि वे सरस्वती पूजा की खुशियों को खंडित होते नहीं देख सकती थीं | उनके जीवन की शुरुआत बहुत ही साधारण और कष्टप्रद रही | संगीत साधक पिता दीनानाथ की मृत्यु के बाद किशोरावस्था में ही उन्हें  अपनी माँ के अलावा तीन बहिनों और भाई के लालन - पालन का दायित्व  सम्भालना पड़ा | फिल्मों में अभिनय से पार्श्व गायन तक की उनकी यात्रा एक गुमनाम मुसाफिर का संघर्ष था लेकिन एक बार ज्योंहीं उनकी प्रतिभा सामने आई त्योंहीं वे शिखर पर जा बैठीं और जब तक उन्होंने खुद होकर नहीं चाहा वे उस पर बनी रहीं | गायन से अवकाश के बरसों बाद भी उनके स्थान को न कोई भर सका और न ही भविष्य में इसकी कोई सम्भावना  नजर आती है | इसका कारण मात्र इतना है कि लता जी ने संगीत को जीवन यापन का साधन न मानकर एक साधना के तौर पर लिया जिसके चलते उन्हें मनुष्य रूप में भी देवी स्वरूप मान्यता मिल गई | मराठी भाषी होने पर भी उनके उच्चारण में जो शुद्धता थी वह विलक्षण कही जायेगी | भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में गुणवत्ता  की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले स्व. बड़े गुलाम अली खां ने उनके बारे में  कहा था कि वह कभी बेसुरी नहीं होतीं | इससे बड़ी प्रशंसा किसी गायक की शायद ही उन्होंने की हो | हालांकि स्वयं लता जी ने पाकिस्तान के मशहूर ग़ज़ल गायक स्व. मेंहदी हसन को खुदा की आवाज कहा था लेकिन भारतीय फिल्म उद्योग के पहले शोमैन स्व. राज कपूर ने तो लता जी को साक्षात सरस्वती कहकर उनकी कलात्मक श्रेष्ठता का लोहा माना | देश  की लगभग हर भाषा में उन्होंने फिल्मी गीत गाये | लेकिन उसके अलावा उनके गाये अनेक गैर फिल्मी गीत भी लोकप्रियता की ऊंची पायदान चढ़े | 1962 के चीनी आक्रमण के बाद स्व. प्रदीप द्वारा रचित और स्व. सी. रामचंद्र द्वारा  संगीतबद्ध किया  गया ऐ मेरे वतन के लोगो , ज़रा आँख में भर लो पानी गीत की ताजगी आज भी  जस की तस है | इसे सुखद संयोग ही कहा जायेगा कि दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह  की समाप्ति पर होने वाले संगीतमय बीटिंग द रिट्रीट समारोह के अवसर पर इसी साल से सेना के बैंड ने ऐ मेरे वतन के लोगों की  स्वर लहरियां राजपथ पर बिखेरीं | भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से अलंकृत कर सही मायनों में तो खुद को ही सम्मानित किया क्योंकि लता जी का नाम ही अपने आप में सम्मान का पर्यायवाची बन चुका था | इससे भी बढ़कर कहें तो वे  अपनी विशिष्टताओं की वजह से अघोषित  विश्व रत्न बन चुकी थीं जिनकी ख्याति और सम्मान राष्ट्रों की सीमाओं से परे था | आजादी की बाद के भारत में जिन व्यक्तित्वों ने देश के हर वर्ग को दिल की गहराइयों तक प्रभावित किया उनमें लता मंगेशकर का नाम सबसे ऊपर रखा जाना सर्वथा उचित होगा क्योंकि वे किसीविचारधारा , भाषा , क्षेत्र और धर्म से परे एक ऐसी आवाज की स्वामिनी थीं जिसे सुनकर स्वर्गिक आनंद की अनुभूति होती  है | एक बार दिलीप कुमार ने कहा भी था कि जिस तरह शीतल हवा ,  बहते हुए झरने और बच्चे की किलकारी सबको सुख देती है क्योंकि  उनकी पवित्रता पूरी तरह संदेहरहित है , ठीक वैसे ही लता की आवाज में जो पाकीजगी है वह कुदरत की बेशकीमती देन है | स्व. ऋषिकेश मुखर्जी की यादगार फिल्म आनंद में अमिताभ बच्चन ने आनंद नामक  नायक ( स्व. राजेश खन्ना ) की मृत्यु पर एक संवाद में कहा था कि आनंद मरा नहीं , आनंद मरते नहीं | आनंद तो खैर फिल्म का एक काल्पनिक चरित्र था परन्तु  लता जी एक हकीकत हैं जिनके बारे में ये कहना अक्षरशः सत्य होगा कि वे मरी नहीं क्योंकि वे मर ही  नहीं सकतीं | जब तक इस दुनिया में सुर और संगीत रहेंगे तब तक लता मंगेशकर कला के आकाश में ध्रुव तारे की तरह अमर रहेंगी |

सरस्वती के इस साक्षात स्वरूप को  सांसारिक यात्रा की समाप्ति पर भरे  मन से विदाई |

रवीन्द्र वाजपेयी

संपादक

Saturday, 5 February 2022

रूस और चीन की दोस्ती भारत के लिए चिंताजनक : पुतिन और जिनपिंग दोनों तानाशाह हैं



राष्ट्रपति के अभिभाषण पर  बोलते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार की  विदेश नीति को विफल बताते हुए कहा कि उसके कारण पाकिस्तान और चीन करीब आ गये | हालाँकि उनका आरोप उन्हीं के गले पड़ गया और  विदेश मंत्री एस. जयशंकर सहित  अनेक जानकारों  ने उनको याद  दिलाया कि पाकिस्तान और चीन की नजदीकियां पुरानी हैं और अपने कब्जे वाले भारतीय भूभाग का एक हिस्सा वह पहले ही चीन को दे चुका था | दोनों दशों के बीच आर्थिक , सामरिक और राजनयिक रिश्ते भी  काफी प्रगाढ़ हैं जिसका मुख्य कारण  भारत विरोध है | बहरहाल पड़ोसी देशों में बांग्ला देश और भूटान को छोड़कर बाकी से भारत के  सम्बन्ध अपेक्षाकृत खराब हैं | श्रीलंका तो खैर लिट्टे द्वारा  किये गये संघर्ष के समय से ही  नाराज है लेकिन हाल के वर्षों में नेपाल का हमारे विरुद्ध आक्रामक हो जाना  चौंकाने वाला रहा | हालाँकि बीते दो दशक में इस राष्ट्र में चीन समर्थक माओवादी ताकतों की  उत्तरोत्तर वृद्धि  से भारत  विरोधी भावनाओं को जगह मिलती गई लेकिन जबसे राजतन्त्र समाप्त हुआ तबसे चीन  पूरी तरह हावी हो गया |  लेकिन इन सबसे हटकर भारत के लिए चिंता का ताजा -  तरीन कारण है चीन और  रूस में बढ़ती नजदीकियां | इस बारे में उल्लेखनीय  ये है कि रूस में हुई  साम्यवादी क्रांति से प्रेरित होकर माओत्से तुंग की अगुआई में 1949 में चीन में जो साम्यवादी सरकार बनी वह जल्द ही सोवियत संघ के प्रभाव  से निकलकर अपना खुद का आभामंडल बनाने में जुट गई |  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया शीत युद्ध के नाम पर अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले दो गुटों में बंट गई थी तब भारत ,  मिस्र ,युगोस्लाविया और इंडोनेशिया आदि ने मिलकर गुट निरपेक्ष आन्दोलन की बुनियाद रखी | लेकिन चीन अमेरिका और सोवियत संघ दोनों से दूर रहने के बाद भी गुट निरपेक्ष आन्दोलन का हिस्सा नहीं बना | लेकिन उसने अमेरिकी खेमे में घुसे पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखा जिससे भारत को घेरा जा सके | चीन के साम्यवादी शासक ये बात अच्छी तरह जानते थे कि पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका का पालित है जो सोवियत संघ पर नजर रखने के लिए उसका इस्तेमाल करता रहा | बावजूद उसके इस्लामाबाद और बीजिंग के बीच दोस्ताना बढ़ता गया  | लेकिन इसी के साथ  भारत की सोवियत संघ से दोस्ती बढ़ी | यद्यपि भारत  सोवियत संघ की अगुआई वाली वारसा संधि में शामिल नहीं था लेकिन अमेरिका और चीन से  तनावपूर्ण रिश्तों की वजह से  सोवियत संघ ने भारत को अपना रणनीतिक साझेदार बना लिया | कश्मीर पर संरासंघ की सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान  को जब भी अमेरिका और ब्रिटेन समर्थन देते तब सोवियत संघ भारत के पक्ष में वीटों का उपयोग कर देता था | पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा दी जाने वाली युद्ध सामग्री के जवाब में भी सोवियत सरकार ने भारत को उनकी आपूर्ति की | 1962 के चीनी हमले के दौरान जरूर मास्को तटस्थ रहा | उस समय सोवियत संघ का कहना था कि साम्यवादी होने से चीन उसका भाई और  भारत दोस्त है इसलिए वह इस झगड़े से दूर रहेगा | हालाँकि  1965 और 1971 की जंग में सोवियत संघ का झुकाव भारत की तरफ रहा जिसका कारण अमेरिका के वर्चस्व को कम करना था | चीन का पाकिस्तान को खुला समर्थन भी  सोवियत संघ के भारत प्रेम का कारण बना |लेकिन कालान्तर में सोवियत संघ के  बिखराव और वैश्विक  अर्थव्यवस्था में आये उदारीकरण ने शीत युद्ध को अतीत में धकेल दिया | जर्मनी एक हो गया वहीं  सोवियत संघ का विखडंन होने के बाद रूस नामक सबसे बड़ा देश आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता में फंसता दिखा | हालात यहाँ तक बन गये कि जिस अमेरिका से उसके सांप और नेवले जैसे सम्बन्ध थे वही उसका पालनहार बनता नजर आया | लेकिन जल्द ही ब्लादिमिर पुतिन के रूप में एक नया शासक रूस में उभरा और देखते ही देखते उसने अमेरिका की टक्कर में अपने देश को खड़ा करने का पुरजोर प्रयास किया | उसके बाद चाहे ईरान हो या सीरिया , जहां भी अमेरिका ने दादागिरी दिखाई रूस ने  उनकी मदद की | लेकिन इस दौरान ये देखने मिला कि अमेरिका द्वारा चीन की घेराबंदी के विरोध में रूस ने बीजिंग की त्तरफदारी की | बीते साल जब अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजें हटीं और तालिबान की सत्ता कायम हुई तब रूस और चीन दोनों एक साथ उसके साथ खड़े दिखाई दिये |  इस सम्बन्ध में ये भी गौरतलब है कि भारत बीते कुछ दशक में जिस तरह से आर्थिक , सामरिक और राजनयिक तौर पर अमेरिका के करीब आया उसने रूस को चौंकन्ना किया | लेकिन भारत ने उसे पूरी तरह दूर नहीं होने दिया | हाल ही में रक्षा उससे प्रणाली खरीदने के मामले में जब अमेरिका ने भारत को धमकाना चाहा तब उसे साफ़ शब्दों में समझा दिया गया कि भारत जिससे चाहे रक्षा उपकरण खरीदेगा | वैसे इस मामले में मोदी सरकार की नीति बहुत ही व्यवहारिक है |  रूस और अमेरिका दोनों को एक साथ साधे रहने की कूटनीति से हमारे राष्ट्रीय और रणनीतिक हित बहुत हद तक सुरक्षित हुए हैं | लेकिन बीते कुछ सालों में चीन और रूस दोनों में एक बात समान हुई और वह ये कि पुतिन और जिनपिंग दोनों ने आजीवन सत्ता में बने रहने का इंतजाम कर लिया | इसके साथ ही अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाईडेन के भी कड़क स्वभाव के होने से वैश्विक राजनीति में अचानक नया शक्ति संतुलन देखने मिलने लगा | बीते कुछ समय से रूस और यूक्रेन के बीच  तनाव में जिस तरह अमेरिका कूदा और यूक्रेन ने नाटो संधि का हिस्सा बनना चाहा उससे  चीन  और रूस करीब आ गये | विगत दिनों  पुतिन और जिनपिंग के बीच हुई बातचीत में चीन ने जहां यूक्रेन विवाद में रूस का साथ देने की बता कही वहीं रूस ने ताईवान को चीन का हिस्सा बताकर नए समीकरण का संकेत दे दिया | इस बारे में समान बात ये भी है कि रूस जिस तरह यूक्रेन को हथियाने के लिए युद्ध करने को आमादा है उसी तरह  चीन भी ताइवान को सैन्यबल से जीतकर अपने में मिलाने प्रयासरत है | दोनों जगह अमेरिका ही चूंकि रूस और चीन के विरुद्ध खड़ा है इसलिए वे दोनों यदि साथ आ रहे हैं तो ये अस्वाभाविक नहीं है किन्तु वह भारत के लिए चिंता का कारण बन सकता है | दक्षिण एशिया  में चीन की दादागिरी रोकने  अब तक भारत ने अमेरिका , जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर जो मोर्चेबंदी कर रखी है उसके चलते रूस यदि चीन की तरफ झुका तब वह भारत  के लिये नुकसानदेह हो सकता है | हालाँकि  जिस तरह समान विचारधारा के बावजूद स्टालिन के रूस और माओ के चीन में शत्रुता बनी रही वैसी ही पुतिन और जिनपिंग के बीच देर सवेर बन जाना अवश्यंभावी है किन्तु इसके पहले भारत के सामरिक  , आर्थिक और राजनयिक हित प्रभावित न हों ये देखना जरूरी है | उस दृष्टि से यूक्रेन और ताइवान संकट शीतयुद्ध के उस दौर की  यादों को ताजा कर रहा है जब क्यूबा के विरुद्ध अमेरिका की घेराबंदी के विरुद्ध सोवियत संघ की जवाबी कार्रवाई की आशंका ने तीसरे विश्व युद्ध के हालात पैदा कर दिए | यद्यपि कोई भी देश उस स्थिति तक नहीं जाना चाहेगा लेकिन अचानक वैश्विक परिदृश्य कुछ अति महत्वाकांक्षी नेताओं के कारण जिस तरह तनाव से भर उठा है उसमें भारत को बहुत संभलकर कदम आगे बढ़ाना होंगे क्योंकि हमारे पड़ोस में दो जन्मजात शत्रु बैठे हुए हैं और दुनिया अब राजनीतिक  विचार नहीं अपितु व्यापार से संचालित है | इसलिए कौन कब किसके साथ या विरोध में खड़ा हो जायेगा ये कहना कठिन है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 February 2022

क्रिप्टो की रहस्यमय दुनिया : न लेने वाले का पता न देने वाले का



 
आगामी वित्त वर्ष के बजट में क्रिप्टो करेंसी पर 30 फीसदी कर लगाये जाने के  प्रावधान  के साथ ही भारतीय क्रिप्टो करेंसी प्रारम्भ किये जाने की घोषणा भी शामिल है | बिटक्वाइन  नामक अदृश्य करेंसी के साथ शुरू हुआ ये चलन आज वैश्विक  स्तर पर समानांतर अर्थव्यवस्था का प्रतीक बन गया है | पूरी दुनिया के लाखों – करोड़ों लोग इस करेंसी में निवेश कर चुके हैं | ऐसा कहा जाता है कि बिटक्वाइन की विनिमय दर  बढ़ते जाने से इन लोगों को अकल्पनीय कमाई हो चुकी है | हालाँकि ज्यादा लालच से इस फेर में फंसे कुछ निवेशकों को नुकसान भी उठाना पड़ा है | यह एक ऐसा निवेश है जिसमें देने और लेने वाले का प्रत्यक्ष संवाद या सम्पर्क नहीं होता | इस व्यवस्था को कौन संचालित कर रहा है और निवेशक के हितों की गारंटी कौन  देता है , ये रहस्य के घेरे में है | शुरुआत में इसे शेयर बाजार की तरह का ही व्यवसाय समझा गया लेकिन धीरे – धीरे ये बात सामने आने लगी कि जिस तरह से दुनिया भर का काला धन स्विस बैंक में  जमा है ठीक उसी तरह से क्रिप्टो करेंसी के जरिये भी काले धन वालों ने अपनी राशि निवेश कर दी | इसका लाभ ये है स्विस बैंक में जमा गुप्त धन पर ब्याज नहीं मिलता जबकि क्रिप्टो करेंसी में जमा पूंजी पर शेयर की तरह मूल्य वृद्धि का लाभ मिलने की सम्भावना रहती है | इसकी शुरुवात किसने और कहाँ की ये अज्ञात है | इस व्यवस्था का संचालन किस शहर या देश से होता है ये भी किसी को नहीं मालूम | इसके लेनदेन की समूची व्यवस्था में मानवीय के साथ ही  बैंक अथवा अन्य वित्तीय संस्थान की किसी भी तरह की भूमिका नजर नहीं आती | बावजूद इसके पूरी दुनिया में इसका चलन हो चुका है | कितने निवेशक इसके साथ जुड़े हैं और उनका कितना धन क्रिप्टो करेंसी में लगा है ये जानकारी किस स्रोत से मिल सकती है ये भी कोई नहीं जानता | डिजिटल की दुनिया में विचरने वाले लोग क्रिप्टो को भविष्य की करेंसी मानने लगे हैं | लेकिन प्रश्न ये है कि जिस करेंसी का कोई भौतिक अस्तित्व  न हो और जिसके भुगतान की कोई वैधानिक गारंटी न हो उसमें निवेश किस हद तक वैध और स्थायी होगा ? मुद्रा के आने के पहले पुराने ज़माने में वस्तु - विनिमय का चलन  था | मुद्रा का आधुनिक स्वरूप भी सभ्यता के साथ ही विकसित होता गया | इसका बड़ा गुण ये है कि एक पैसे से लेकर सबसे बड़ी मुद्रा के भुगतान की वैधानिक जिम्मेदारी किसी न किसी की होती है | इसके पीछे सरकार या फिर केन्द्रीय बैंक होता है | इसीलिये एक देश की मुद्रा अन्य स्थान पर उसके विनिमय मूल्य पर स्थानीय करेंसी से बदली जा सकती है  | बैंक में जमा मुद्रा का विनिमय डेबिट कार्ड नामक प्लास्टिक मुद्रा से भी होता है |  इसके अलावा अच्छे ग्राहकों को क्रेडिट कार्ड भी दिए जाते हैं जिस पर तय सीमा तक उधारी मिल जाती है | आधुनिक मुद्रा प्रणाली का स्थान डिजिटल तकनीक ने आसान कर दिया है | लेकिन जहां  तक क्रिप्टो का इस्तेमाल करने की  बात है तो इसमें निवेशक जो जोखिम उठाता है उसमें होने वाली हानि या धोखाधड़ी से उसको संरक्षण कौन देगा ये भी अज्ञात है | शेयर बाजार में पूंजी  लगाने वाले अथवा बैंक के जमाकर्ता को सरकार और कुछ वैधानिक संस्थाओं द्वारा कुछ न कुछ कानूनी सुरक्षा तो मिलती ही है लेकिन क्रिप्टो में पैसा लगाने वालों के निवेश का मूल्य किस आधार पर बढ़ता या घटता है इसका कोई मान्य आधार या गणित गिनती के लोगों की जानकारी में हो तो हो वरना ये वह अँधा कुआ है जिसकी गहराई किसी को नहीं पता | ये भी  सुनने में आया है कि रातों – रात मालामाल होने के लालच में  दुनिया के लाखों जन क्रिप्टो के कारण कंगाल भी हो चुके हैं | लेकिन वे अपना दुखड़ा किसके सामने रोयें ये भी उनको नहीं पता | भारत में क्रिप्टो की वैधानिकता को लेकर भारी भ्रम की स्थिति है | चूँकि इसमें किया जाने वाला निवेश शायद ही कोई दर्शाता होगा इसलिए इस पर होने वाली आय  पर करारोपण करने से क्या हासिल हो जाएगा ये अब तक कम लोगों को ही पल्ले पड़ा है | हालांकि सरकार और रिजर्व बैंक समय – समय पर इस बारे में आगाह करते रहे हैं लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि काला धन रखने वालों को क्रिप्टो एक जरिया मिल गया अपने पैसे से बिना कुछ किये कमाई करने का | शेयर बाजार में तो क्रेता और विक्रेता की पहिचान होती है जबकि  क्रिप्टो पूरी तरह अनजान व्यक्तियों के बीच का धंधा है जो मांग और पूर्ति के मौलिक अर्थशास्त्रीय सिद्धांत पर आधारित है | जिसमें आभासी मुद्रा किसी वस्तु की तरह बेची और खरीदी जाती है | वायदे के सौदे या फारवर्ड ट्रेडिंग के जरिये तो भौतिक रूप से किसी वस्तु का लेनदेन हुए बिना व्यापार चला करता है जिसे सरल भाषा में सट्टा  भी कहा जा सकता है किन्तु क्रिप्टो के जरिये कौन , क्या और किससे खरीदता  बेचता है ये पूरी तरह से आभासी है | भारत सरकार अपनी जो क्रिप्टो  मुद्रा लाने जा रही है उसका उद्देश्य डिजिटल लेनदेन को प्रोत्साहित करना है | वैसे भी  भारत में ज्यादातर नई पीढ़ी नगदी की  बजाय डिजिटल में ही भुगतान और पैसे का ट्रांसफर करने लगी है | व्यापार जगत भी इसे तेजी से अपनाता जा रहा है | क्रिप्टो मुद्रा के प्रादुर्भाव के बाद मोबाइल लेन - देन में बैंक की भूमिका को भी सीमित किया जायेगा ,ऐसा कहा जा रहा है | हालाँकि इस बारे में अब तक पक्के तौर पर  कोई भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं है | ऐसे में  क्रिप्टो करेंसी से आय पर 30 फीसदी कर लगाने से सरकार को क्या हासिल होगा ये बड़ा सवाल है क्योंकि जिसके पास वैध तरीके से कमाया  धन होगा वह ऐसी किसी जगह निवेश  क्यों करेगा जिसमें उसको किसी भी सुरक्षा की गारंटी न हो | भारत सरकार जो क्रिप्टो करेंसी लाने जा रही  है वह डिजिटल लेनदेन का और भी विकसित रूप तो बन सकती है लेकिन उसके जरिये काले  धन की समस्या हल हो जायेगी ये सोचना बुद्धिमत्ता नहीं होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 February 2022

खाई तो उसी दिन बन गई थी जिस दिन टाटा को नमक बनाने का लाइसेंस मिला



कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गत दिवस लोकसभा में सरकार पर जोरदार  हमला किया | राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए उन्होंने बहुत सारी बातें कहीं |   विपक्षी सांसद होने के नाते श्री गांधी से सरकार की तारीफ अपेक्षित नहीं होती लेकिन उनके भाषण में एक बिंदु ऐसा था जिस पर राजनीति से परे हटकर विचार किया जाना चाहिए | देश में बढ़ती जा रही आर्थिक विषमता का बखान करते हुए उन्होंने कहा कि अमीर और गरीब नामक दो भारत बन गये हैं जिनके बीच खाई चौड़ी होती जा रही है | उनकी इस बात से शायद ही कोई असहमत होगा | जिस तरह से कुछ धनकुबेरों की सम्पन्नता में वृद्धि होती जा रही है उससे आर्थिक असमानता का दायरा बढ़ता जा रहा है | श्री गांधी की चिंता पूरी तरह जायज है | ये सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि जब कोरोना काल में पूरी अर्थव्यवस्था अस्त व्यस्त हो गयी और छोटे बड़े सभी प्रकार के काम धंधे ठन्डे पड़ गये थे तब भी कुछ उद्योगपतियों की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई | चूंकि इनमें दो जो शीर्ष पर हैं वे केंद्र की वर्तमान सरकार के करीबी बताये जाते हैं इसलिए श्री गांधी सदैव उन पर निशाना  साधते हैं | गत दिवस के भाषण में उन्होंने अंगरेजी के AA का उल्लेख भी  किया जिसका सांकेतिक आशय अंबानी और अडानी नामक उद्योग समूहों से था | श्री गांधी के इस कथन में कुछ भी गलत नहीं है कि बीते कुछ सालों में उक्त दोनों के कारोबार में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है | इस कारण से टाटा , बिरला , बजाज , डालमिया , गोयनका जैसे नाम पीछे चले गए | अब देश के सबसे रईस व्यक्तियों की दौड़ केवल इन्हीं  दो नामों के बीच सिमटकर रह गयी है | हालाँकि कुछ आईटी कम्पनियां और वैक्सीन बनाने वाले उद्यमी भी अरबपतियों की कतार में हैं | लेकिन मोदी सरकार आने के बाद जिस तरह से अंबानी और अडानी की कमाई को पंख लगे वह जनचर्चा का विषय तो है | देश की ज्यादातर संपत्ति कुल 100 परिवारों के कब्जे में होना भी समतामूलक समाज और सबका विकास की मूल अवधारणा का मखौल  है | लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सब बीते कुछ  सालों में ही हुआ और क्या इसके पहले देश में पूरी तरह समाजवाद था ? राहुल ने अपने परनाना , दादी और पिताजी का जिक्र करते हुए सरकार पर तंज कसा कि हम देश को आपसे ज्यादा जानते हैं | उनके इस कथन में ही सामन्तवाद झलकता है | जिसका शिकार होकर कांग्रेस आज इस दुरावस्था में  है कि उक्त्त तीनों की कर्मभूमि रहे उ.प्र में उसका मत प्रतिशत दहाई के आंकड़े से भी नीचे आ चुका है | इसमें दो राय नहीं है कि भारत में आर्थिक विषमता निरंतर बढ़ती जा रही है | कुछ घरानों के पास धन रखने की जगह नहीं है ,  वहीं करोड़ों लोग गरीबी रेखा से भी नीचे के स्तर पर रह रहे हैं | आजादी के बाद देश में समाजवादी रुझान रखने वाले नेहरु जी प्रधानमन्त्री बने जो सोवियत संघ की साम्यवादी क्रांति के साथ ही चीन में माओवादी सत्ता के बड़े समर्थक थे | सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक बड़े उद्योगों की नींव भी उनके दौर में रखी गई | उनके बाद का संक्षिप्त काल  शास्त्री जी के नाम लिखा गया लेकिन फिर नेहरू जी की पुत्री इंदिरा गांधी सत्ता में आईं जिन्होंने पार्टी के भीतर मिली चुनौतियों से निपटने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण  और राजाओं के प्रीवीपर्स खत्म करने जैसे कदम उठाकर लोकप्रिय बनने का दांव चला तथा  1971 का लोकसभा चुनाव गरीबी हटाओ नारे पर जीत लिया | 1977 से 1980 के बीच 27 महीने का कालखंड जनता पार्टी सरकार का था जिसके बाद इंदिरा जी पुनः लौटीं और 1984 में अपनी हत्या तक पद पर रहीं | पंडित नेहरु का जमाना देश में बिरला , बजाज और टाटा जैसे उद्योगपतियों का माना जाता था | इनमें टाटा को अगर अलग कर दें तो बिरला और बजाज महात्मा गान्धी के जमाने से कांग्रेस के करीब रहे | वर्धा में बजाज द्वारा बनवाया आश्रम बापू का ठिकाना था वहीं दिल्ली में वे बिरला हॉउस में रहा करते थे | आजादी के बाद बिरला और बजाज दोनों परिवारों ने खूब तरक्की की वहीं टाटा ने राजनीति से सीधे जुड़ने के बजाय व्यावसायिक प्रबंध कौशल का परिचय देते हुए अपना कारोबार बढ़ाया | लेकिन इंदिरा जी की सत्ता में जब प्रणव मुखर्जी का उदय हुआ तब अंबानी नामक औद्योगिक धूमकेतु उभरा जिसने देखते – देखते अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया | अडानी समूह का उत्थान भले ही ऊंची छलांग है लेकिन वह रातों – रात खड़ा हो गया हो ऐसा भी नहीं है | राजीव गांधी ने जरूर लायसेंस प्रणाली ख़त्म कर कुछ घरानों के एकाधिकार को तोड़ने का साहस किया किन्तु उनके राज में सत्ता के गलियारों में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दलालों की जो आवाजाही बढ़ी उसकी वजह से  वे सत्ता गंवा बैठे | ये सब देखते हुए राहुल ने अमीर और गरीब भारत को लेकर जो पीड़ा व्यक्त की उन्हें उसकी बुनियाद कब और कैसे पड़ी उसका अध्ययन भी करना चाहिए | उनकी दादी ने जिस गरीबी  हटाओ का नारा दिया वह वास्तविकता क्यों नहीं बन सका ये बड़ा सवाल है | आजादी के दिन तक देश में गरीब ही होते थे लेकिन उसके बाद गरीब से भी गरीब जैसी स्थिति बन जाना क्या उन सत्ताधारियों की विफलता का प्रमाण नहीं है जिन्होंने अनेक दशकों तक निर्बाध होकर सत्ता का सञ्चालन किया | श्री गांधी को याद रखना चाहिए कि गलती उसी दिन हो गई थी जिस दिन टाटा को नमक बनाने की अनुमति दी गई | इस नमक को देश का नमक प्रचारित करने पर किसी ने भी आपत्ति नहीं की | बिरला की बनाई कार की सबसे बड़ी खरीददार सरकार ही थी और बजाज के बनाये स्कूटर की खुलकर कालाबाजारी होती थी | ट्रक बनाने में टाटा का वर्चस्व  था और जब अंबानी सामने आये तब पालिस्टर यार्न के व्यवसाय में उनका एकाधिकार किसकी कृपा से हुआ ये पूरा देश जानता है | कहने का आशय ये है कि अमीर और गरीब भारत के बीच की खाई तो आजादी के बाद ही बन गई थी | हालांकि चुनावी राजनीति के चलते समाजवाद और गरीबी हटाओ के नारे खूब सुनाई देते रहे लेकिन उनकी आड़ में पूंजीवादी ताकतों को मजबूत करने का काम भी जमकर हुआ | चुनावी चंदे का स्रोत पहले भी औद्योगिक घराने थे ,  आज भी हैं और आगे भी रहेंगे | जब तक देश की मौजूदा चुनाव व्यवस्था नहीं बदलती तब तक राहुल गांधी  सत्ता में आ जाएँ तो भी वे इस खाई को पाटने में सफल नहीं होंगे | इंदिरा जी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया और सोनिया गांधी ने खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था करवाकर गरीब हितैषी होने का दावा किया लेकिन 1971 से 2009 तक के लगभग चार दशक में गरीब यदि और गरीब होते हुए गरीबी के स्वीकृत मापदंड से भी नीचे चले गये तब उसके लिए किसी और को कसूरवार ठहराने की जगह श्री गांधी को आत्मावलोकन करते हुए आजादी के बाद से अब तक आई सभी सरकारों को कसौटी पर कसना चाहिए था | लेकिन वे चाहकर भी ऐसा नहीं कर  सकेंगे क्योंकि तब चार उँगलियाँ उनकी अपनी पार्टी और परिवार पर भी उठेंगीं | आज देश जिस स्थिति में  है  उसके लिए पूरा राजनीतिक कुनबा दोषी है क्योंकि राजनेता चाहे वे किसी भी दल के हों अगले चुनाव से आगे की सोच ही नहीं सकते | उनकी अपनी पार्टी उन पर येन केन प्रकारेण चुनाव जितवाने का दबाव बनाती रहती है | चुनाव में अनाप – शनाप धन और संसाधन लगते हैं जो उस जनता से नहीं मिलते जिसकी गरीबी  दूर करने का आश्वासन बीते सात दशकों से बांटा जाता रहा है | ऐसे में अंततः   टाटा  , बिरला , बजाज , अंबानी और अडानी जैसों की शरण ली जाती है जिन्हें बाद में गालियाँ भी दी जाती हैं | देश के तमाम उद्योगपति राज्यसभा में जिन राजनीतिक दलों  के समर्थन से जा पहुँचते हैं वे गरीबों के हमदर्द बनने का दावा करते नहीं थकते | ऐसे में उस खाई को कोई नहीं मिटा सकता जिसका रोना श्री गांधी आजकल कुछ ज्यादा ही रोते हैं | बेहतर होता वे उस दिन को भी याद कर लेते जब 2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के एक दिन पहले ही मुकेश अंबानी सोनिया जी से मिलने पहुंच गये थे | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 2 February 2022

कमजोरी दूर करने ग्लूकोज की बोतल भी चढ़ाई जाती है वित्तमंत्री जी



वित्तीय वर्ष 2022 – 23 का जो आम बजट गत दिवस वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया उसे न सिर्फ सत्ता पक्ष अपितु आर्थिक विशेषज्ञ और उद्योग जगत भी दूरगामी लक्ष्यों से प्रेरित बता रहा है | इस बात के लिए केंद्र सरकार  की प्रशंसा भी हो रही है कि उसने पांच राज्यों के चुनाव सिर पर होने के बावजूद बजट को लोक - लुभावन बनाने की बजाय पिछली आर्थिक नीतियों को जारी रखने के दिशा में केन्द्रित रखा | बेतहाशा  महंगाई , घटती आय , बेरोजगारी का संकट , उद्योग – व्यापार पर कोरोना की मार , किसानों और युवाओं में नाराजगी आदि वे मुद्दे थे जिन पर बजट में सीधे ध्यान दिए जाने की अपेक्षा वही लोग कर रहे थे जो आज इस बजट के अभिनंदन गीत गा रहे हैं | बीते एक सप्ताह से बजट से  जिस तरह की उम्मीदें की जा रही थीं वे ठीक उसी तरह से फुस्स साबित हुईं जिस तरह से अनेक  चुनाव पूर्व सर्वेक्षण और एग्जिट पोल  गलत हो जाते हैं | अभी तक का जो चलन रहा है उसमें लगभग सभी वित्तमंत्री बजट के छोटे से हिस्से में आम जनता को सीधे लाभान्वित करने वाली बातें समाहित किया करते थे | बजट का बड़ा हिस्सा आर्थिक मामलों के जानकारों और बड़े कारोबारियों की  तो  समझ में आ जाता है लेकिन जहां तक आम जनता का सवाल है तो उसके लिए आयकर की दरें और महंगाई पर बजट का प्रभाव ही मायने रखते हैं | वैसे भी बजट जैसे गूढ़ विषय का  सतही तौर पर विश्लेषण करना आसान  नहीं होता | चूंकि इसका प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समाज के हर वर्ग पर पड़ता है इसलिए औसत रूप से शिक्षित  और जागरूक लोग भी बजट की प्रतीक्षा और समीक्षा करने लगे हैं | उस लिहाज से श्रीमती सीतारमण का यह बजट  जटिलताओं से भरा है | आर्थिक समीक्षक इसे भविष्य पर केन्द्रित मान रहे हैं | सरकार ने जिस तरह से इन्फ्रास्टक्चर , शहरी  और ग्रामीण विकास के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण का लक्ष्य रखा है वह निश्चित तौर पर दूरदर्शिता का प्रतीक है | लघु और मध्यम उद्योग – व्यवसाय के विकास के साथ ही फसल की सरकारी खरीद बढ़ाकर  उसका भुगतान सीधे  किसान के खाते में जमा करने जैसे प्रावधान व्यवस्थाजनित विसंगतियों को दूर करने में सहायक होंगे  | डिजिटल करेंसी का प्रादुर्भाव भी एक क्रन्तिकारी कदम कहा जा सकता है | करदाताओं को होने वाली परेशानियाँ दूर करने की मंशा भी स्वागतयोग्य है | वित्तमंत्री के साथ ही बजट समर्थकों का ये कहना पूरी तरह सही है कि अर्थव्यवस्था को तदर्थवाद और तात्कालिक उद्देश्यों तक सीमित रखने की बजाय लम्बी दूरी की यात्रा की तैयारी इसमें झलकती है | लेकिन सरकार से अपेक्षा की जा रही थी कि वह कोरोना काल के घावों पर मरहम लगाने की दरियादिली भी दिखायेगी | उस दौरान लगाये गए लॉक डाउन से उद्योग व्यापार जगत को हुए घाटे , और बड़ी संख्या में रोजगार छिन  जाने के बाद किसान आन्दोलन का  जो  मानसिक दबाव सरकार पर था उससे बीते कुछ महीनों में वह उबरती नजर आ रही थी | आयकर और जीएसटी के रूप में आने वाला राजस्व भी आशा से ज्यादा होने से उसके हाथ खुलने लगे थे | ओमिक्रोन नामक संकट आया तो जरूर लेकिन उसने  अर्थव्यवस्था पर  प्रारंभिक तौर पर भले ही थोड़ा असर छोड़ा हो लेकिन जल्द ही स्थितियों पर नियन्त्रण पा लिया गया |  चूंकि हमारे देश में सरकार का हर काम चुनाव के मद्देनजर किया जाता है  इसलिए  भी हर कोई ये मानकर चल रहा था कि पांच राज्यों के चुनाव देखते हुए वित्तमंत्री उपहारों की झड़ी लगा देंगी | विशेष रूप से उ.प्र , उत्तराखंड और पंजाब वे राज्य हैं जिनकी किसान आन्दोलन में बड़ी हिस्सेदारी रही इसलिए वहां राहत की बरसात करना केंद्र सरकार की मजबूरी थी किन्तु वित्तमंत्री ने इन कयासों को किनारे रखते हुए पूरा ध्यान  भविष्य केन्द्रित रखने का जो दुस्साहस किया वह आर्थिक नियोजन की दृष्टि से तो  प्रशंसित हो सकता है | प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था को  लोकप्रिय नीतियों के दबाव से मुक्त करने की जो नीति अपनाई है वह भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने में सहायक भी है और सक्षम भी | कोरोना जैसे अकल्पनीय संकट का देश ने जिस तरह सामना किया उससे पूरी दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ा है | महीनों तक लगे रहे लॉक डाउन के दौरान करोड़ों लोगों के घर बैठ जाने से देश में अराजकता फ़ैल सकती थी लेकिन सरकार ने उस स्थिति को पूरी तरह टालकर सराहनीय कार्य किया | लेकिन उसे ये भी स्वीकार करना चाहिए कि संकट के उस दौर में जनता ने भी अप्रतिम  धैर्य और अनुशासन का परिचय देते हुए सरकार की  भरपूर मदद की | जरूरतमंदों की सहायता के लिए समाज में जिस तरह की संवेदनशीलता देखने मिली उससे सरकार का हौसला मजबूत हुआ | लगभग दो साल तक चले उस संकट के गुजरने के बाद ये सरकार का फर्ज बनता है कि वह ऐसा कुछ करे जिससे जनता के चेहरे पर  मुस्कुराहट लौट सके | पिछली दीपावली के पहले प्रधानमंत्री ने पेट्रोल – डीजल के दाम घटाने की जो घोषणा की उसने त्यौहार की खुशियाँ दोगुनी कर दी  थीं |  बजट से आम जनता ऐसी ही किसी राहत की उम्मीद लगाये बैठी थी जिस पर वित्तमंत्री ने लेशमात्र भी ध्यान नहीं दिया | ऊपर से उनका ये कटाक्ष जले पर नमक का काम  कर गया कि दो साल से आयकर बढ़ाया नहीं ये क्या कम है | सरकार की नीतियों से देश में विकास नजर आने लगा है |  हाईवे पर चलते हुए हर व्यक्ति इस सरकार की तारीफ़ करता है | रेलवे में ढांचागत सुधार के कार्य भी बड़े पैमाने पर हुए हैं | सीमावर्ती दुर्गम पहाडी क्षेत्रों के साथ ही उत्तर पूर्वी राज्यों में विकास की किरणें पहुंच रही हैं | रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार ने पिछली कमियों को दूर करने का जो काम किया वह निश्चित रूप से सराहनीय है | लेकिन ये कहने में कुछ भी  गलत नहीं है कि बीते दो साल में आम आदमी ही नहीं अपितु समाज के हर वर्ग के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हुई हैं | ऐसा नहीं है कि सरकार की तरफ से  कुछ नहीं किया गया लेकिन वह इस प्रचार  को गलत साबित करने में सफल नहीं हो पा रही कि ये सरकार उद्योगपतियों की हितैषी है | कोरोना काल में जब हर किसी की आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई तब कुछ उद्योगपतियों की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि से उक्त अवधारणा को बल ही मिला है | ये देखते हुए यदि वित्तमंत्री  आयकर की दरों में कुछ कमी कर देतीं या पेट्रोल – डीजल की कीमतों में कटौती जैसी दरियादिली दिखा देती तब ये बजट आम जनता द्वारा भी उतना ही सराहा जाता जितना अर्थशास्त्री उसे पसंद कर रहे हैं | जहाँ तक बात दूरगामी फायदों की है तो उससे किसी को ऐतराज नहीं है लेकिन बीमारी से उठे मरीज की कमजोरी दूर करने के लिए लम्बे समय तक विटामिन और प्रोटीन की गोलियां खाने की सलाह देने के साथ ही उसे ग्लूकोज की बोतल भी चढ़ाई जाती है जिससे वह चलने - फिरने में आसानी महसूस कर सके |  जहां तक बात  दूरदृष्टि की है तो वाहन चालक का सड़क को दूर तक देखना अच्छा होता है लेकिन इसी के साथ उसे आस पास के गड्ढों की ओर भी ध्यान देना चाहिए अन्यथा दुर्घटना का खतरा बना रहता है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 1 February 2022

पुराने संसदीय संस्कारों के बिना नये संसद भवन का कोई औचित्य नहीं



कल एक समाचार काफी तेजी से चर्चित हुआ। संसद भवन की सीढ़ियों से उतरते सपा नेता मुलायम सिंह यादव के केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने पैर छुए तो उन्होंने भी आशीर्वाद स्वरूप अपना हाथ उनके सिर पर रखने जैसा भाव प्रकट किया। पास ही खड़े दूसरे केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अहमद नकवी ने भी श्री यादव की सीढियां उतरने में मदद की। उल्लेखनीय है सपा नेता आयु जनित बीमारियों के कारण काफी अशक्त हो चले हैं। संसद में विरोधी विचारधाराओं के सदस्यगण आपस में मिला करते हैं। केन्द्रीय कक्ष में तो कॉफ़ी हाउस सरीखा माहौल होता है। निजी तौर पर सांसदों के आपसी सम्बन्ध भी होते हैं। लेकिन उ.प्र में विधानसभा चुनाव चूंकि चल रहे हैं इसलिए श्रीमती ईरानी द्वारा श्री यादव के चरण स्पर्श करना समाचार बन गया जिसके साथ में ये भी जोड़ा गया कि अमेठी सांसद ने उ.प्र के यादवों को भाजपा के पक्ष में रिझाने का दांव चला है। उल्लेखनीय है कुछ समय पहले दिल्ली में एक राजनीतिक हस्ती के यहाँ विवाह में मुलायम सिंह और रास्वसंघ के सरसंघ चालक डा. मोहन भागवत का एक साथ बैठे हुए  चित्र प्रकाशित हुआ तो उसे भी उ.प्र चुनाव से जोड़कर देखा जाने लगा। इस तरह की खबरों से ये पता लगता है कि हमारे देश में निजी जीवन पर भी राजनीति किस हद तक हावी हो चुकी है। कल ही जिस स्थान पर श्री यादव और श्रीमती ईरानी के बीच सम्मान और सौजन्यता का आदान-प्रदान हुआ उन्हीं सीढिय़ों पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और स्मृति भी पास आये लेकिन उनके बीच बातचीत नहीं हुई। स्मरणीय है दोनों के बीच अमेठी में दो बार मुकाबला हो चुका है। 2014 के लोकसभा चुनाव में श्रीमती ईरानी को राहुल ने हरा दिया था लेकिन 2019 में बाजी पलट गई। संसद की सीढ़ियों पर दोनों करीब थे किन्तु नजरें मिलने के बाद भी अनदेखा कर  दिया गया। इस प्रकार एक ही दिन में एक ही जगह दो अलग-अलग व्यवहार देखने मिले। भारत में नेताओं का आपस में सहज मिलना-जुलना भी राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगा है। इसके लिए कौन दोषी है ये कह पाना कठिन है क्योंकि अब राजनीति सिद्धांतों और आदर्शों की राह से फिसलते हुए निजी स्वार्थ और अहं पर आकर सिमट गई है। हाल ही में म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निवास के निकट धरने पर बैठ गये क्योंकि श्री चौहान उन्हें मिलने का समय नहीं दे रहे थे। संयोग से उसी दिन भोपाल के हवाई अड्डे पर श्री चौहान की पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ से भेंट हो गई। हुआ यूँ कि श्री चौहान सरकारी विमान से आये और श्री नाथ हेलीकॉप्टर से। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो निकट आकर खड़े-खड़े ही कुछ देर बातें कर लीं। इसका चित्र पलक झपकते प्रसारित हो गया। बाहर खड़े पत्रकारों ने श्री नाथ से पूछा कि दिग्विजय सिंह को श्री  चौहान मुलाकात का समय नहीं दे रहे किन्तु आपको इतना वक्त दे दिया। इस पर श्री नाथ ने झल्लाते हुए कहा कि कोई समय-वमय नहीं दिया। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो बातचीत हो गई। लोकतंत्र में परस्पर विरोधी नेताओं का एक-दूसरे से मिलकर हँसने-बतियाने के पीछे राजनीति के अलावा और कुछ नहीं होता ये मान लेना छोटी सोच है। देश के तीन पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव, चंद्रशेखर और अटलबिहारी वाजपेयी के बीच के आत्मीय सम्बन्ध जगजाहिर थे। जिनेवा में हुए एक सम्मेलन में पाकिस्तान की मोर्चेबंदी को ध्वस्त करने के लिए राव साहब ने श्री वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाया था जबकि तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री सलमान खुर्शीद उपनेता बनाये गये। उसी सरकार ने अटल जी को पद्म विभूषण से अलंकृत भी किया था। चन्द्रशेखर तो वाजपेयी जी को सार्वजनिक तौर पर अपना गुरु कहते थे। लेकिन उन तीनों के बीच राजनीतिक तौर पर जो विरोध था उसमें कोई कमी नहीं आई। इसके उलट हाल ही में गणतंत्र दिवस पर वरिष्ट कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद को पद्म भूषण अलंकरण दिए जाने की घोषणा का कांग्रेस के एक खेमे ने विरोध किया। इसके पीछे कारण ये बताया जाता है कि श्री आजाद उस जी-23 समूह में शामिल हैं जो पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अध्यक्ष का चुनाव करवाए जाने की मांग करता रहा। देश आजाद होने के बाद अनेक नेताओं ने कांग्रेस छोड़कर पंडित नेहरु की नीतियों के विरोध में अपने दल बना लिए। संसद में वे सब नेहरू जी की तीखी आलोचना करते थे किन्तु उनके आपसी रिश्तों में कभी कटुता या रूखापन नजर नहीं आया। नेहरु जी  के निधन पर संसद में अटल जी ने श्रद्धांजलि के तौर पर जो भाषण दिया वह लोकतांत्रिक आदर्शों का सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है। आशय ये है कि जिस लोकतंत्र को परिपक्व और सुदृढ़ कहकर हम आत्ममुग्ध होते हैं उसका आधारभूत गुण है सामन्जस्य और सौजन्यता। दुर्भाग्य से आज के राजनेताओं के बीच वह नजर नहीं आता। ये सब क्यों और कैसे हुआ यह विश्लेषण का विषय है। आजादी के अमृत  महोत्सव के दौरान इस बारे में भी विचार होना चाहिए कि राजनीति का वह स्वर्णिम दौर कैसे वापिस लाया जावे जब मतभेद और मनभेद में अंतर होता था और संसद के भीतर किये जाने विरोध में मर्यादा का ध्यान रखा जाता था। बीते कुछ दशकों में भारतीय राजनीति में जिस तरह का जहर घुलता गया उसकी वजह से उसका रंग-रूप विकृत होता जा रहा है। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब वह अपनी बची-खुची गरिमा भी खो बैठेगी। हाल ही में खबर आई थी कि आगामी शीतकालीन सत्र से संसद की बैठकें नए भवन में होंगीं। लेकिन ध्यान देने योग्य बात ये है कि संसद का नया भवन कितना भी आकर्षक और आधुनिक सुविधाओं से युक्त हो लेकिन यदि पुराने संसदीय संस्कार इसी तरह लुप्त होते गये तब नए भवन का कोई औचित्य नहीं रहेगा और वह रूपवती भिखारिन जैसा कहलायेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी