Tuesday, 15 February 2022

80 फीसदी मतदान करने वाले गोवा के मतदाता अभिनंदन के पात्र हैं



 जिन पांच   राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं  उनमें सबसे अधिक चर्चा उ.प्र की  है | उसके बाद क्रमशः पंजाब , उत्तराखंड , गोवा और मणिपुर आते हैं | हालाँकि इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं  कहा जायेगा  क्योंकि उ.प्र भारतीय  राजनीति को सबसे जयादा प्रभावित करने वाला राज्यं है | सबसे बड़ी  आबादी के कारण वहां विधानसभा की 403 सीटें हैं जो बाकी चार राज्यों की सीटें  मिलाने के बाद भी ज्यादा हैं | पंजाब की चर्चा इस बार किसान आन्दोलन के अलावा कांग्रेस में हुई टूटन के कारण ज्यादा हुई जबकि बाकी तीन राज्यों में उत्तराखंड पर भी चूंकि उ.प्र की छाप अभी भी जारी है और उसके मैदानी इलाके किसान आन्दोलन से  प्रभावित रहे इसलिए वहां  की राजनीति भी खबरों  में रहती है | मणिपुर पूर्वोत्तर के कारण  मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति से दूर होने से समाचार माध्यमों को उतना आकर्षित नहीं करता | इन सबसे अलग गोवा वह राज्य है जो अपने नैसर्गिक सौंदर्य और मौज - मस्ती वाली पश्चिमी संस्कृति के कारण पर्यटकों के स्वर्ग के रूप में जाना जाता है | देशी ही नहीं अपितु विदेशी पर्यटक भी यहाँ बड़ी संख्या में आते हैं | जिनके कारण इस छोटे से तटवर्ती राज्य की अर्थव्यवस्था को बीते कुछ दशकों में काफी बल मिला | महज चालीस विधानसभा सीटों वाले इस राज्य का चुनाव इस बार इसलिए कुछ ज्यादा चर्चा में आ गया क्योंकि आम आदमी पार्टी के अलावा तृणमूल कांग्रेस पार्टी भी वहां मैदान में है | इस प्रकार कांग्रेस और भाजपा के अलावा दिल्ली और बंगाल से आई इन दो पार्टियों ने चुनावी मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया | बावजूद इसके राजनीति में रूचि रखने वाले विश्लेषकों और आम जनता के बीच  उ.प्र ही सुर्ख़ियों में बना हुआ  है | इस राज्य के आम नागरिक भी सियासत के बारे में खुलकर बोलते – बतियाते हैं | शहर में रहने वाले ही नहीं अपितु ग्रामीण इलाकों में भी राजनीति यहाँ आम चर्चा का सबसे प्रमुख विषय होता है परन्तु विधानसभा चुनाव के दो चरणों के बाद मतदान के जो आँकड़े सामने आये उन्हें देखकर हैरानी हुई | इस बार उ.प्र में किसान आन्दोलन के कारण विधानसभा चुनाव की सरगर्मी चरम पर है | प्रधानमन्त्री खुद इस राज्य से सांसद हैं जिसके कारण  राष्ट्रीय राजनीति में उसकी परम्परागत वजनदारी बनी हुई है | लेकिन इतना सब होने के बावजूद दो चरणों में हुआ मतदान 2017 के चुनाव से भी या तो कम या फिर उसी के करीब है | मुस्लिम बहुल कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में यद्यपि थोड़ी बढ़ोतरी हुई किन्तु औसतन मत प्रतिशत में गिरावट या ठहराव देखा  गया जो इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक दृष्टि से जागरूक समझे जाने वाले इस राज्य के 35 से 40 फीसदी मतदाता निर्णय प्रकिया से दूर  रहे  | कमोबेश यही स्थिति उत्तराखंड में भी देखने मिली जहां पिछले चुनाव की तुलना में कम मतदान हुआ या फिर उसमें मामूली वृद्धि देखी गई | हालांकि  बीते पांच साल में सूचना तंत्र का जबरदस्त विस्तार हुआ है ,  बावजूद इसके यदि मतदान के  प्रति एक बड़ा वर्ग उदासीन है तो ये राजनीतिक दलों के लिए भी विचारणीय हैं  | लेकिन दूसरी तरफ गोवा में कल एक साथ सभी 40 सीटों के लिए हुए चुनाव में लगभग 80 फीसदी मतदाताओं ने लोकतंत्र के इस अनुष्ठान में अपनी सहभागिता दी | गोवा में साक्षरता केरल जैसी नहीं है | वहां भी बड़ी आबादी  सामाजिक , आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े लोगों की है | राजनीतिक अस्थिरता और  भ्रष्टाचार आदि को लेकर भी गोवा में बाकी राज्यों जैसा ही माहौल है | दलबदल की परिपाटी भी चली आ रही है | इस चुनाव के पहले भी बड़ी संख्या में नेताओं ने पार्टी बदलने का काम किया | लेकिन मतदान का प्रतिशत  देखने के बाद ये कहना गलत न होगा कि वहां के मतदताओं ने जागरूकता के मामले में देश के सबसे बड़े और राजनीतिक तौर पर सर्वाधिक  महत्वपूर्ण और ताकतवर राज्य को पीछे छोड़ते हुए ये  साबित किया कि गोवा में केवल मौज - मस्ती नहीं होती , अपितु इस राज्य के लोग अपने भविष्य के प्रति चिंता और चिन्तन दोनों करते हैं | प्रजातंत्र में जनता को अनेकानेक अधिकार दिए जाते हैं किन्तु मताधिकार उन सबका मूल है | यही वह  अधिकार हैं जिसके जरिये आम जनता अप्रत्यक्ष रूप से ही सही किन्तु शासन तंत्र पर अपना नियन्त्रण रख सकती है और जिसके कारण संसद और विधानसभा में बैठने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों को  जनता के कल्याण की फ़िक्र रहती है | हमारे देश के पिछड़े राज्यों में उ.प्र अग्रणी है | इसीलिए यहाँ से सबसे ज्यादा पलायन होता रहा है | देश के हर हिस्से में यहाँ के श्रमिकों की।मौजूदगी इसका प्रमाण है | अब तक चार को छोड़कर शेष सभी प्रधानमन्त्री इसी राज्य से बने | लेकिन इसके बावजूद यदि उ.प्र आज भी विकास की दौड़ में अव्वल न आ सका तो उसका सबसे बड़ा कारण यही लगता है कि पूरे पांच साल तो भरपूर  राजनीतिक चर्चा यहाँ के लोग करते हैं किन्तु जब चुनाव आते हैं तब मतदान करने के प्रति वैसा उत्साह नहीं दिखाते जिसकी जरूरत होती है |  उ.प्र में अभी कई चरणों का मतदान बाकी है | यदि वहां के मतदाता गोवा से प्रेरणा लेकर अपने मताधिकार का उपयोग करने में अपेक्षित उत्साह दिखाएँ तो उससे लोकतंत्र के प्रति उनकी सम्वेदनशीलता उजागर होगी वरना ये माना जायेगा कि वे बहस तो खूब करते हैं लेकिन जब  राय देने का अवसर  आता है तब खिसक लेते हैं | कम मतदान से परिणाम का आकलन करने वाले अपनी – अपनी तरह से विश्लेषण में जुटे हैं | कुछ का कहना है कि कम मतदान यथास्थिति बने  रहने का  संकेत है वहीं  कुछ मानते हैं सत्ता समर्थक मतदाता नाराजगी वश घर बैठे रहे जबकि परिवर्तन के इच्छुकों ने जमकर मतदान किया |  कौन सही है ये तो अंतिम परिणाम से ही स्पष्ट होगा लेकिन आगामी चरणों में भी  मतदान के आंकड़े ऐसे ही रहे तब ये मानना पड़ेगा कि उ.प्र के राजनीतिक दल और उनके स्वनामधन्य नेता जनता के एक बड़े वर्ग को उत्साहित करने में नाकामयाब साबित हुए हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 14 February 2022

बुआ-भतीजे के विवाद से एक और पारिवारिक दल में बिखराव के संकेत




ऐसा लगता है क्षेत्रीय दल और टूटन समानार्थी शब्द बन गये हैं। आजादी के बाद कांग्रेस से निकले अनेक नेताओं ने अपनी पार्टियाँ बनाईं।   डा. राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव, आचार्य कृपलानी, जैसे नेताओं ने समाजवादी आन्दोलन को मुख्यधारा की राजनीति बनाने की भरपूर कोशिश की।  डा. लोहिया ने ही आगे चलकर  देश को गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया जिसके परिणामस्वरूप 1967 और उसके बाद अनेक  राज्यों में संविद सरकारें बनीं जिनमें परस्पर विरोधी विचारधारा वाले दल भी शामिल हुए। यद्यपि उनमें से अधिकतर कांग्रेस से टूटकर ही बने थे किन्तु दक्षिणपंथी जनसंघ और वामपंथी साम्यवादी भी उन सरकारों के हिस्से बने। हालाँकि वह प्रयोग लंबे समय तक न चल सका क्योंकि नेताओं की निजी महत्वाकांक्षाओं के कारण वे सरकारें जैसे आईं, वैसे ही चली भी गईं तथा कांग्रेस से बगावत करने वाले अनेक नेता घर लौट गये। लेकिन उस प्रयोग से क्षेत्रीय दलों का दौर जरूर प्रारंभ हुआ जिसने देश में कांग्रेस के एकाधिकार को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के पीछे भी गैर कांग्रेसवाद के नारे की महती भूमिका रही। जिसका प्रमाण जनता पार्टी थी जिसमें तमाम वे दल शामिल हुए जो संविद सरकार में साथ-साथ काम करने के बाद अलग हो चले थे। लेकिन इस कारण जो क्षेत्रीय नेता उभरे उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय अपने राज्य की भाषा और जातीय समीकरणों को वोटों की राजनीति की तरफ मोड़कर नए-नए दल बनाते हुए क्षेत्रीय अस्मिता को राष्ट्रीय राजनीति के समानांतर खड़ा कर दिया। चौधरी चरण सिंह के अलावा बीजू पटनायक, अन्ना दोरई, कर्पूरी ठाकुर और बंगाल में वामपंथी दलों ने क्षेत्रीय पहिचान के बलबूते दिल्ली के वर्चस्व को चुनौती देना शुरू किया जो बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण तो बना परंतु उसके कारण राष्ट्रीय राजनीति पर क्षेत्रीय मुद्दे हावी होने लगे। धीरे-धीरे वे क्षेत्रीय दल पहले कुछ नेताओं के गुट और फिर किसी एक परिवार के शिकंजे में आ गये। सबसे अधिक बिखराव हुआ लोहिया जी के अनुयायियों का जो अपने राजनीतिक गुरु के जाति तोड़ो नारे को रद्दी की टोकरी में फेंकते हुए जातियों के समूह एकत्र कर सत्ता की सीढ़ियों पर चढऩे का कारनामा दिखाने लगे। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाले अनेक राजनीतिक नेताओं ने अपनी पार्टियां बनाईं तो नीतिगत मतभेदों के नाम पर लेकिन जल्द ही वे भी पारिवारिक संपत्ति में तब्दील हो गईं। पूरे देश पर नजर डालें तो तमिलनाडु में द्रमुक आन्दोलन की दोनों पार्टियाँ परिवार रूपी कुनबे में बदल गईं। आंध्र में तेलुगुदेशम का भी वही हुआ। वर्तमान में आंध्र और तेलंगाना में जो क्षेत्रीय पार्टियाँ शासन में हैं वे भी पारिवारिक दायरे में सीमित हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना और रांकापा दोनों पर परिवार का कब्ज़ा है। इसी तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी पर परिवार न सही लेकिन एक व्यक्ति का आधिपत्य है। पंजाब में अकाली दल, हरियाणा में इनेलो, बिहार में राजद, उ.प्र में सपा, बसपा और रालोद सभी परिवार के शिकंजे में हैं। कुछ छोटे जाति आधारित दल भी हैं जो पूरी तरह परिवार आधारित हैं। यही वजह है कि जब भी उनकी अंतर्कलह सामने आती है तो उसके पीछे का कारण पारिवारिक विरासत और उत्तराधिकार ही होता है। उ.प्र में सपा के भीतर का झगड़ा बीते पांच साल से लगातार चला आ रहा है। जिसमें पहले अखिलेश का चाचा शिवपाल से विवाद हुआ और हाल ही उनके सौतेले भाई की पत्नी भाजपा में आ गईं। अपना दल नामक छोटे से दल में भी माँ कृष्णा और बेटी अनुप्रिया के बीच मतभेद में पार्टी दो फाड़ हो चुकी है वहीं बिहार में लालू के दोनों बेटे एक दूसरे के विरुद्ध ताल ठोंकते घूम रहे हैं। महाराष्ट्र में शरद पवार की बेटी सुप्रिया और भतीजे अजीत में रस्साकशी चला करती है। द्रमुक में स्टालिन और उनके बड़े भाई अलागिरी की राहें अलग हो चुकी हैं। अब ताजा विवाद सामने आया है तृणमूल कांग्रेस का जो वैसे तो ममता बैनर्जी और उनके राजनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर की बीच बताया जा रहा है परन्तु सच्चाई ये है कि सुश्री बैनर्जी की अपने सांसद भतीजे अभिषेक बैनर्जी से अनबन हो गई है। विवाद नगर निगम के चुनाव हेतु प्रत्याशी चयन से शुरू होकर एक व्यक्ति एक पद की मांग तक आ पहुंचा जिसे अभिषेक द्वारा पार्टी प्रमुख ममता के विरुद्ध मोर्चेबंदी के तौर पर देखा जा रहा है। अपने एकाधिकार को चुनौती की भनक लगते ही सुश्री बैनर्जी ने संगठन को भंग करते हुए एक तदर्थ समिति बना दी जिसमें अभिषेक बतौर महामंत्री न होकर साधारण सदस्य भर हैं। ममता के विरोध में पिछले विधानसभा चुनाव के पूर्व भी खूब आवाजें उठीं और थोक के भाव नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में आ गये। लेकिन उनकी बड़ी जीत के बाद विरोध ठंडा पड़ गया। और तो और मुकुल रॉय जैसे बड़े नाम के अलावा बागी हुए अनेक नेता दीदी शरणं गच्छामि हो गये जिनमें कुछ चुने हुए विधायक-सांसद भी हैं। सुनने में आ रहा है कि नए और पुराने नेताओं के बीच विभाजन रेखा खिंच चुकी है और अभिषेक ने अपनी बुआ के समानांतर गुट बना लिया है। दरअसल ममता के सामने भी वही समस्या है जो स्व. जयललिता और अब मायावती के सामने है। अविवाहित होने से इनकी अपनी सन्तान नहीं है। जयललिता के दौर में उनकी सहेली शशिकला ताकतवर हुई तो मायावती को भी अंतत: अपने भतीजे आनंद को पार्टी में आगे लाना पड़ा। सुश्री बैनर्जी ने अभिषेक के स्थान पर किसी और को मजबूत नहीं बनाया क्योंकि उन्हें किसी पर विश्वास नहीं था। लेकिन अब भतीजा ही उनके लिए खतरा बनने लगा। देर-सवेर यही समस्या उड़ीसा में नवीन पटनायक के सामने भी आयेगी जो कि अविवाहित हैं। ये सब देखकर लगता है अधिकतर क्षेत्रीय दल प्रायवेट लिमिटेड कम्पनी बनकर रह गए हैं। क्षेत्रीय, जातीय और भाषायी भावनाएं उभारकर इन दलों के नेता अपना वर्चस्व बनाये रखते हैं किन्तु राजनीतिक विरासत परिवार से बाहर न जाये इसकी चिंता भी उन्हें दिन रात सताया करती है। जिन मुलायम सिंह यादव के नाम पर सपा और अखिलेश शिखर तक जा पहुंचे वे आज पार्टी और परिवार दोनों में मूकदर्शक बनकर रह गए हैं। जितने भी क्षेत्रीय दलों के नामों का यहाँ उल्लेख किया गया वे सब कमोबेश इसी हालात में हैं या निकट भविष्य में उनकी पारिवारिक कलह भी सार्वजनिक हुए बिना नहीं रहेगी। चूंकि इनका मकसद निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति और सता के सहारे अकूत दौलत कमाना होता है, लिहाजा कालान्तर में इनके भीतर वही सब होता है जो किसी राज परिवार की सम्पत्ति के बंटवारे के समय देखने मिलता है। इसे भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना ही कहा जाएगा कि उसमें सेवा, सिद्धांत और समर्पण की बजाय स्वार्थ सिद्धि और धनलिप्सा जैसी प्रवृत्तियों का जबरिया कब्ज़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस यदि आने वाले समय में विभाजन के रास्ते पर बढ़ जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि संघर्ष के दिनों के अपने साथियों को नजरअंदाज कर जब भाई, बेटे-बेटी, भतीजे आदि को पार्टी की राजनीतिक पूंजी सौंपी जाती है तब उन साथियों के मन को चोट पहुचंती है। ममता बैनर्जी के साथ शुरु से रहे नेताओं को पीछे धकेलकर जब उन्होंने भतीजे अभिषेक को अपना उत्तराधिकारी बनाने की रूपरेखा तैयार की तभी से तृणमूल के भीतर टूटन का बीजारोपण हो चुका था।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 February 2022

मुस्लिम लड़कियां पर्दा पसंद करती हैं तो करें बशर्ते कानून और सुरक्षा को खतरा न हो

 

इस समय देश भर में मुस्लिम महिलाओं द्वारा हिजाब का इतेमाल किये जाने पर विवाद मचा है | कर्नाटक के एक शैक्षणिक संस्थान से उठा ये मुद्दा  सियासत से होते हुए अदालत तक आ पहुंचा और अब इसे लेकर धार्मिक सवाल – जवाब भी चल पड़े हैं | मुस्लिम समाज कुछ अपवाद छोड़कर इस मामले में  पूरी तरह से एकजुट है | जो लड़कियां आधुनिक परिधानों की और आकर्षित हो चली थीं वे भी अचानक हिजाब पहिनकर निकलने लगीं और समाचार माध्यमों के समक्ष खुलकर  स्वीकार कर रही हैं कि महिलाओं का पर्दानशीन होना इस्लाम की परम्परा है जिसे रोकने की  कोशिश धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है | ये तर्क भी दिए जा रहे हैं कि जब हिन्दू महिलाओं को सिर ढंकने और माथे पर बिंदी लगाने की  छूट और सिखों को पगड़ी धारण  करने की आजादी है तब मुस्लिम लड़की शाला या महाविद्यालय में सिर या चेहरा ढंककर जाए तो उस पर ऐतराज करना गलत है । धर्मनिरपेक्ष देश होने से भारत में धार्मिक स्वतंत्रता संविधान प्रदत्त अधिकार है | हालाँकि प्रत्येक धर्म में कुछ न कुछ ऐसा है जिसे समय के साथ बदलने की जरूरत महसूस की जाती है किन्तु धार्मिक बेड़ियाँ की जकड़न इतनी मजबूत होती हैं कि हर किसी में उनको तोड़ने की कुव्वत नहीं होती | समय – समय पर हर धर्म में सुधारवादी आन्दोलन भी  हुए  | वोहरा मुस्लिम समाज में असगर अली इंजीनियर ने काफी लड़ाई लड़ी जिसके कारण वे समाज से तिरस्कृत भी किये गये | तीन तलाक और गुजारा भत्ते को लेकर मुस्लिम महिलाओं ने ही लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी | ये बात हिन्दू समाज के साथ जैन और सिखों में भी देखने मिलती है | सामाजिक कुरीतियों के साथ ही कालातीत हो चुकी परम्पराओं को खत्म करने या उनमें समयानुकूल बदलाव करने के प्रक्रिया भी चलती रहती है | दुनिया के अनेक इस्लामी देशों में भी पुराने रीति रिवाजों में सुधारवादी परिवर्तन किये जा चुके हैं , जिनमें तीन तलाक और पर्दे से आजादी जैसी बातें भी शामिल हैं | इस्लाम के सबसे कट्टर माने जाने वाली शाखा   वहाबी समुदाय के प्रवर्तक सऊदी अरब तक में  महिलाओं को कार चलाने , अकेले विदेश यात्रा पर जाने और माता – पिता की अनुमति के बिना विवाह करने जैसी छूट हाल ही में दी गई है | यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी तीन तलाक की प्रथा खत्म की जा चुकी है और जो वीडियो वहां के दिखाई देते हैं उनसे ये नहीं लगता कि उस इस्लामिक देश में लड़कियों और महिलाओं के लिए पर्दा करने की अनिवार्यता है | लेकिन कुछ ऐसे इस्लामिक देश अभी भी हैं जिनमें महिलाओं को उन सभी पाबंदियों का पालन करना पड़ता है जो शरीया में उल्लिखित हैं | भारत में इस्लाम के मानने वालों में परम्परा और आधुनिकता का समावेश शुरु से रहा है | पचास और साठ के दशक में भी जब मुस्लिम लड़कियों के लिए अकेले घर से निकलना भी कठिन होता था तब फिल्मों में तमाम मुस्लिम  अभिनेत्री आईं और मशहूर हुईं | सुरैया , नर्गिस , मीनाकुमारी मधुबाला और वहीदा रहमान जैसे नाम आज भी लोगों के दिलों दिमाग पर हैं | लेकिन शायद ही किसी मुल्ला – मौलवी ने उस पर ऐतराज जताया हो | प्रणय दृश्यों के अलावा बिकिनी जैसी पोशाक भी अनेक मुस्लिम अभिनेत्रियों ने फिल्मों में पहनीं और आजकल तो खुलकर चुम्बन दृश्य भी दे रही हैं | लेकिन किसी मुस्लिम महिला संगठन या मौलवी ने उनके खिलाफ आवाज नहीं उठाई | इसकी वजह यही लगती है कि मन ही मन धर्म के ठेकेदार भी ये समझ चुके हैं कि एक हद के बाद  वे लोगों को अपने शिकंजे में नहीं कस पाएंगे | हिजाब को लेकर चल रहे विवाद के भीतर जाएँ तो यदि मुस्लिम धर्मगुरु सभी मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं पर सार्वजानिक स्थलों पर हिजाब पहिनने की  अनिवार्यता थोपना चाहें तब उनको एहसास हो जायेगा कि उसे लेकर उनके मन में कितनी आस्था है | जहाँ तक बात मुस्लिम लड़कियों के पर्दा प्रेम की है तो हो सकता है वह किसी संगठन के प्रभाव में आकर उपजा हो | लेकिन  कर्नाटक की  घटना के बाद  बाद देश भर  में जो हिजाब की हवा बनी वह स्वप्रेरित हो तो इसे मुस्लिम लड़कियों की निजी इच्छा मान लेना ही उचित होगा | यदि उनके मन में समय के साथ चलते हुए आगे बढ़ने की इच्छा नहीं है तो  उनको उसके  लिए बाध्य करना निःसंदेह गलत है | लेकिन हिजाब के  इस्तेमाल से यदि कानून व्यवस्था अथवा अन्य समस्या उत्पन्न हो तब जरूर आपत्ति वाजिब होगी | रही बात राजनीति की तो मुस्लिम नेताओं का ये कहना गले नहीं उतरता कि ये विवाद पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव के कारण पैदा किया गया | सही बात तो ये है कि कर्नाटक के जिस शिक्षण संस्थान से ये मसला शुरू हुआ उसमें कुछ  मुस्लिम छात्राएं अचानक संस्थान  के नियमों को तोड़ते हुए कक्षा में हिजाब पहिनकर आने लगीं जिन्हें रोके जाने पर उन्होंने जिद पकड़ ली |  लेकिन अचानक उनके मन में हिजाब के प्रति आग्रह  कैसे पैदा हो गया ये भी उनको स्पष्ट करना चाहिए था | वैसे  इस्लाम में हिजाब पहिनना अनिवार्य होता तब उपराष्ट्रपति रहे हामिद अन्सारी की पत्नी और नजमा हेपतुल्ला जैसी वरिष्ठ नेत्री खुले सिर नहीं रह पातीं और न ही सानिया मिर्जा टेनिस कोर्ट पर अपना जोहर दिखातीं | अच्छा हो इस मामले को मुस्लिम महिलाओं पर ही छोड़ दिया जाए | हाँ , इतना अवश्य है कि उनका ये अधिकार कानून और सुरक्षा के मद्देनजर असीमित नहीं हो सकता | भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन कानून की सर्वोच्चता का पालन सभी के लिए अनिवार्य हैं | धर्म से जुडी अनेक हस्तियों को जेल भेजे जाने से इसकी पुष्टि होती रही है | मुस्लिम समाज के भीतर जो सुधारवादी महिला  संगठन हैं उनकी खामोशी इस विवाद में जरूर चौंकाने वाली है और  जो मुस्लिम धर्मगुरु हिजाब विवाद के पीछे सियासत देख रहे हैं उन्हें सबसे पहले कर्नाटक की उन छात्राओं की निंदा करनी चाहिए जिन्होंने जान बूझकर ये आग लगाई | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 11 February 2022

किसान आन्दोलन की तपिश के बावजूद मतदान का प्रतिशत गिरना चौंकाने वाला है



 उ.प्र विधानसभा चुनाव के पहले चरण में गत दिवस जिन 58 सीटों पर मतदान हुआ वे उस पश्चिमी इलाके की हैं जिनमें किसान आन्दोलन की तपिश सबसे ज्यादा थी | 2017 में इन सीटों पर  औसतन 64 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था | ये देखते हुए अनुमान था कि इस बार मतदान का आंकड़ा और ऊपर जायेगा  | 2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद उत्पन्न हालातों में यहाँ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी जमकर हुआ जिसका असर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के अलावा 2017 के विधानसभा चुनाव में देखने मिला | हालाँकि राम मंदिर आन्दोलन  के बाद से ही उ.प्र का  पश्चिमी क्षेत्र भाजपा का प्रभावक्षेत्र रहा है | लेकिन बीते वर्ष हुए किसान आन्दोलन ने यहाँ की हवा को भाजपा के विरोध में मोड़ दिया | मुस्लिम तो खैर उसके परम्परागत विरोधी रहे हैं किन्तु जाट समुदाय बीते पांच - सात सालों से जिस मुस्तैदी से उसके साथ आया उसने इस अंचल में चौधरी चरण सिंह के परिवार की चौधराहट को चौपट कर दिया | यदि किसान आन्दोलन न हुआ होता तब शायद इस बार भी कमोबेश वही स्थिति रहती लेकिन उसने हालात काफी हद तक बदल दिए | राकेश टिकैत की अगुआई में हुआ आन्दोलन कहने को तो गैर राजनीतिक था लेकिन धीरे – धीरे उसने भाजपा विरोधी रूप ले लिया जिसका लाभ उठाते हुए रालोद नेता और चौधरी साहेब के पौत्र जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन करते हुए भाजपा के लिए कठिन परिस्थितियां बना दीं | जयंत और अखिलेश यादव की जुगलबंदी के परिणामस्वरूप चौधरी साहेब के ज़माने का जाट और मुस्लिम गठजोड़ एक बार फिर जमीन पर आता दिखने लगा | भाजपा के लिए ये बदलाव वाकई परेशानी पैदा करने वाला था | यद्यपि केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2017 की तरह से ही जाट समुदाय की मिजाजपुर्सी करने का भरपूर  प्रयास किया लेकिन वह कितना सफल हुआ ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता | कुल मिलाकर ये लगने लगा कि पश्चिमी उ.प्र भाजपा के हाथ से निकलने जा रहा है | किसान समुदाय की नाराजगी जिस तरह मुखर होकर बाहर आ रही थी उससे  लगा कि इस बार मतदान में लहर दिखाई देगी क्योंकि  अमूमन ऐसे हालातों में भारी मतदान होता है | बीते दो लोकसभा चुनावों में इसका प्रत्यक्ष अनुभव हुआ भी | लेकिन गत दिवस हुए मतदान के आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया क्योंकि मत प्रतिशत 2017 की अपेक्षा लगभग 3 फीसदी कम हो गया | मोटे तौर पर इसका संकेत माना जाता है कि ये यथास्थिति बनाये रखने वाला मतदान है | लेकिन कुछ लोग ये भी मानते हैं कि सत्ता समर्थक मतदाताओं की उदासीनता कम मतदान की शक्ल में सामने आई | सच क्या है ये तो आगामी 10 मार्च को आने वाले परिणाम से पता चलेगा किन्तु किसान आन्दोलन की वजह से पश्चिमी उ.प्र में जिस प्रकार की गर्मागर्मी बन गई थी उसके बाद हर कोई ये उम्मीद लगाये बैठा था कि इस बार भारी मतदान होगा | चूँकि विपक्ष के पास इस बार प्रदेश सरकार के विरुद्ध जनभावनाओं को उभारने का भरपूर मसाला था इसलिए उसका उत्साहित होना स्वाभाविक था | वहीं दूसरी और सत्ता पक्ष भी अपनी उपजाऊ राजनीतिक जमीन पर किसी और का कब्जा नहीं होने देना चाहता , इसलिए उसने भी पूरा जोर लगाया अपना जनाधार बचाने के लिए | ऐसे में मतदान पिछले चुनाव से ज्यादा होना अपेक्षित था किन्तु वह घट गया | सबसे चौंकाने वाली बात रही गाज़ियाबाद और नोएडा जैसे दिल्ली से सटे क्षेत्रों में बेहद कम मतदान | यहाँ किसान आन्दोलन का असर तो नहीं था किन्तु उच्च मध्यम वर्ग के मतदाताओं से ये अपेक्षा रहती है कि वे हालातों पर नजर रखते हुए ज्यादा से ज्यादा मतदान करेंगे | इसी तरह किसान आन्दोलन से सीधे जुड़े निर्वाचन क्षेत्रों में भी मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि न होना इस बात का संकेत है कि राजनीतिक दल प्रचार के दौरान जो उत्साहजनक माहौल बनाते हैं वह मतदान के दिन ठंडा पड़ जाता है | यदि ऐसा न होता तब कल के मतदान का प्रतिशत कम से कम 70 तो होना ही था | हमारे देश में विपक्ष द्वारा सरकार पर ये तंज कसा जाता है कि उसे  मात्र 30 – 32 फीसदी लोगों का समर्थन प्राप्त है | लेकिन जब मतदान ही 60 – 62 फीसदी होगा तो  30 – 32  फीसदी मत हासिल करने वाला दल ही सरकार बनाने की हैसियत हासिल कर लेगा | उस दृष्टि से पश्चिमी उ.प्र की 58 सीटों के लिए गत दिवस हुआ मतदान निराश करने वाला है | पिछले विधानसभा चुनाव में भी सत्ता परिवर्तन बड़ा मुद्दा था तब पूर्वापेक्षा मतदान का प्रतिशत भी बढ़ा | लेकिन इस बार तो इस इलाके में प्रदेश सरकार का विरोध जिस तरह से होता दिखा उसके कारण ये उम्मीद थी कि कम से कम 70 फीसदी मतदान तो होगा ही | लेकिन 2017 की अपेक्षा उसमें दो से तीन प्रतिशत की कमी आना शोचनीय है | एग्जिट पोल के नतीजे चूँकि अभी गोपनीय ही रहेंगे इसलिए अनुमानों का खेल चलता रहेगा लेकिन कम मतदान से जो सबसे बड़ी बात निकलकर आई वह ये कि सत्ता के विरोधी और समर्थक दोनों ही मतदाताओं में अपेक्षित उत्साह भरने में विफल रहे | यदि  मतदान योगी सरकार के विरोध में गया तब ये भाजपा की असफलता है जो अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को मतदान केन्द्रों तक लाने  में नाकामयाब रही | और यदि चुनाव परिणाम सत्तारूढ़ दल के पक्ष में रहे तब ये साबित हो जायेगा कि विपक्ष अपनी बात को जनता के गले नहीं उतार सका | लेकिन किसी की जीत और किसी की हार उतना बड़ा मुद्दा नहीं  जितना ये कि आजादी का  अमृत महोत्सव भी लोकतंत्र के प्रति अपेक्षित  उत्साह पैदा नहीं कर पाया  | 100 फीसदी न सही किन्तु कम से कम 75 – 80 प्रतिशत मतदान होने पर ये एहसास होता है कि जनता में अपने अधिकार का उपयोग करने के प्रति रूचि  है | ये वाकई एक गम्भीर मुद्दा है राजनीतिक दलों के लिए चिन्तन का | उनके धुआंधार प्रचार के बावजूद भी यदि मतदाताओं का 40 और कहीं – कहीं तो 50 फीसदी हिस्सा मतदान करने ही नहीं गया तो इसका सीधा – सीधा अर्थ उनकी निराशा ही है | अन्यथा किसी भी जीवंत समाज में लोग अपनी राय व्यक्त करने के प्रति सदैव तत्पर रहते हैं | चुनाव आयोग ने इस बार ओमिक्रोन के कारण उ.प्र में बड़ी रैलियों और सभाओं पर रोक लगा दी थी जिसके कारण आभासी माध्यम से प्रचार किया गया | इसी तरह अब उसे मतदान का प्रतिशत बढाने के नये – नए और आसान तरीके खोजना चाहिये क्योंकि  ये देखने में आता है कि पढ़े – लिखे और अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग में मतदान को लेकर स्वभावगत उदासीनता बनी हुई है | लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया से दूर रहने वाले अधिकारों के बारे में चिल्लाने का नैतिक अधिकार भी खो बैठते हैं  | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 10 February 2022

या तो देश को धर्मनिरपेक्ष कहना बंद करो या सबके लिए एक जैसा कानून बनाओ



कर्नाटक के एक शिक्षण संस्थान में कुछ मुस्लिम छात्राओं द्वारा हिजाब पहनकर आने पर मचा विवाद उस राज्य की सीमाओं से बाहर आकर देशव्यापी राजनीतिक विषय बन गया है। इस मामले में अदालती आदेश आना है इसलिए इसके कानूनी पक्ष पर तो कुछ कहना उचित न होगा किन्तु जिस तरह की टिप्पणियाँ पक्ष और विपक्ष से आ रही हैं उन्हें देखते हुए ये कहना गलत न होगा कि विवाद के पीछे कोई न कोई सोची-समझी योजना रही। उक्त मामले में आज वहाँ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित दो अन्य की पीठ विचार कर रही है जिसमें एक मुस्लिम महिला भी हैं। मामला केवल इतना था कि एक शिक्षण संस्थान की कक्षा  में कुछ मुस्लिम छात्राएं अचानक हिजाब पहिनकर आने लगीं। जबकि संस्थान में प्रवेश के आवेदन में ये स्पष्ट था कि परिसर के भीतर भले ही हिजाब का इस्तेमाल किया जावे किन्तु कक्षा के भीतर उसकी अनुमति नहीं थी। अचानक कुछ छात्राओं द्वारा उक्त अनुमति का उल्लंघन किये जाने पर आपत्ति व्यक्त की गई। प्रबन्धन ने भी विरोध किया और उसके बाद दूसरे समुदाय की जवाबी प्रतिक्रिया भगवा के रूप में देखने मिली और फिर बात उससे भी बढ़ते हुए दलितों का प्रतीक बने नीले रंग तक आ पहुँची। इसके बाद जैसा कि होता है अन्य स्थानों पर भी हिजाब, दुपट्टा और साफे की शक्ल में शक्ति प्रदर्शन होने लगा तथा मामला खुलकर हिन्दू-मुस्लिम बन गया। आम  तौर पर सरकारें ऐसी आग से अपने हाथ बचाना चाहती हैं इसीलिये बात उच्च न्यायालय तक पहुंच गयी। जिस नियम और  व्यवस्था का अब तक किसी मुस्लिम छात्रा ने विरोध नहीं किया वही उनको धर्म विरोधी लगने लगी  और फिर पूरे देश में हिजाब मानो मुस्लिम अस्मिता और पहिचान से जुड़ा मुद्दा बन गया। कहीं मुस्लिम लड़कियां हिजाब पहिनकर खेल के मैदान में उतरने लगीं तो कहीं  मोटर साइकिल चलाती नजर आने लगीं। खुद को आधुनिक और प्रगतिशील मानने वाली और मुस्लिम महिलाओं को कठमुल्लेपन से आजाद करवाने के लिए संघर्षरत कुछ देवियाँ भी अचानक हिजाब को मौलिक अधिकार मानकर कर्नाटक की हिजाबधारी मुस्लिम छात्राओँ के समर्थन में कूद पड़ीं। बात मंगलसूत्र, दाढ़ी, टोपी और मंगलसूत्र तक आ पहुंची। उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय मुद्दा केवल ड्रेस कोड अर्थात गणवेश का है। कोई संस्थान क्या किसी परिधान को धारण करने या न करने की अनिवार्यता थोप सकता है इस पर न्यायालयीन व्यवस्था का सभी को इंतजार है। लेकिन इसी बीच कांग्रेस महामंत्री प्रियंका वाड्रा ने ये कहकर विवाद में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हुए ट्वीट किया कि बिकिनी, घूँघट या हिजाब क्या पहिनना है ये महिलाओं का संविधान प्रदत्त अधिकार है। उनका ये बयान अप्रत्यक्ष रूप से कर्नाटक की उन छात्राओं के समर्थन में माना गया जिन्होंने शिक्षण संस्थान के नियमों को धता बताते हुए कक्षा में अचानक हिजाब पहिनकर जाना शुरू किया, जबकि पहले वे ऐसा नहीं करती थीं। बात आगे बढऩे पर ये साफ़ हुआ कि किसी मुस्लिम संगठन के उकसावे पर उन्होंने वैसा किया। किसी संस्थान द्वारा ड्रेस कोड लागू करना अनोखी बात नहीं है। अनेक महिलाएं पुलिस में भर्ती होती हैं तब उनको वर्दी धारण करनी होती है। यात्री हवाई जहाज में परिचारिका (होस्टेस) की वेशभूषा विमान कम्पनी तय करती है जिसका पालन मुस्लिम परिचारिकाएँ भी करती हैं। ये देखते हुए लगता है कि कर्नाटक के शिक्षण संस्थान में हिजाब का उपयोग विवाद पैदा करने के मकसद से ही किया गया था। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि मुस्लिम समाज में आज भी महिलाओं पर तरह-तरह की बंदिशें हैं। जिनके कारण कश्मीर की एक लड़की अचानक फि़ल्मी दुनिया को अलविदा कहते हुए कश्मीर लौट जाती है क्योंकि वैसा न करने पर वहां उसका और उसके परिवार का रहना दूभर हो जाता। तीन तलाक संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मुस्लिम महिला की याचिका पर ही आया था जिसका आम तौर पर मुस्लिम महिलाओं ने स्वागत किया लेकिन कुछ समय बाद उनकी बोलती बंद कर दी  गई। श्रीमती वाड्रा एक अत्याधुनिक पारिवारिक पृष्ठभूमि से आती हैं। उनकी माँ इटली की हैं और पिताजी तथा भाई विदेश में शिक्षित हुए। दादी ने एक पारसी से विवाह किया था। इस आधार पर उन्होंने हिजाब सम्बन्धी बयान पर जो कहा उसमें अनपेक्षित कुछ भी नहीं है। लेकिन क्या उनमें इतना साहस है कि वे मुस्लिम समाज में प्रचलित हलाला जैसी प्रथा के विरुद्ध भी  मुस्लिम महिलाओं को इस बात के लिए प्रेरित करें कि वे लड़की हैं इसलिए इसके विरुद्ध लड़ भी सकती हैं। जहाँ तक बात गणवेश या ड्रेस कोड की है तो वह केवल कर्नाटक के उस शिक्षण संस्थान में ही नहीं अपितु देश भर के हजारों संस्थानों में लागू है। अदालतों में अधिवक्ताओं की वेशभूषा में एकरूपता है। दरअसल आजादी के बाद देश में हिन्दू समाज की परम्पराओं को बदलने के लिए संसद में कानून लाया गया तब राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद उससे असहमत थे किन्तु प्रगतिशीलता के हामी प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने उनके ऐतराज को तो नजरंदाज कर दिया और अपनी आधुनिक सोच के बाद भी वे मुस्लिम समुदाय में व्याप्त रूढ़ियों और कुरीतियों को छूने का साहस न कर सके। जबकि उनको इस बात का अनुभव था कि उसके कारण उस समुदाय के मन में मुख्य धारा से अलग रहने की वही भावना बनी रहेगी जिसके चलते  देश के दो टुकड़े हुए। यदि आजाद होने के बाद ही सभी धर्मावलम्बियों के लिए एक समान नागरिक संहिता बना दी जाती तब शायद इस तरह के बखेड़े खड़े नहीं होते। उल्लेखनीय है धार्मिक स्थलों में जाने के भी कुछ नियम होते हैं जिसके अंतर्गत मस्जिदों और गुरुद्वारों में पुरुषों को भी सिर पर पगड़ी और टोपी न सही तो रूमाल रखना जरूरी है। वहां जाने वाले गैर मुस्लिम और सिख भी उसका पालन करते हैं। इसी तरह अनेक ज्योतिर्लिंगों में हिन्दू भारतीय परिधान पहिनने की अनिवार्यताहै। इसी तरह जैन मुनि दिगम्बर अवस्था में सार्वजनिक रूप से विचरण करते हैं लेकिन जैन होने के आधार पर अन्य कोई निर्वस्त्र रहने की जिद करे तो उसी धर्म के लोग उसे रोकेंगे। सही बात तो ये है कि धर्म अपने आप में अनुशासन है। ऐसे में विवाद चाहे कर्नाटक का हो या दूसरी किसी जगह का, उसके पीछे के भाव और ताकतों की पहिचान होना जरूरी है। हिजाब संबंधी विवाद इस्लाम के नियमों और परम्पराओं की रक्षा से सर्वथा परे शाहीन बाग़ जैसी किसी साजिश का पूर्वाभ्यास है। केवल वोटों की राजनीति की खातिर आँख मूंदकर उसका समर्थन कर देना अपरिपक्वता की निशानी है। श्रीमती वाड्रा के बयान से प्रेरित होकर कोई महिला सांसद यदि बिकिनी पहिनकर सदन में जा पहुंचे तब क्या वे उसके परिधान संबंधी अधिकार का भी समर्थन करेंगी? उन्हें और उन जैसे बाकी लोगों को ये बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि या तो देश को धर्मं निरपेक्ष कहना बंद करें या फिर सभी धर्मों के लिये एक जैसी सामाजिक व्यवस्था वाला क़ानून लागू किया जावे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 February 2022

घोषणापत्र : ये भी बताया जाए कि वायदे पूरे करने पैसे कहाँ से आयेंगे ?




उ.प्र में पहले चरण का प्रचार बंद होने के कुछ घंटों पहले ही  भाजपा और सपा के घोषणापत्र पेश किये गये | भाजपा ने वृद्ध महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा , होली – दीपावली पर दो मुफ्त गैस सिलेंडर , सिंचाई के लिए निःशुल्क बिजली , छात्रों के लिए स्कूटी जैसे वायदे उछाले तो सपा ने हर माह दो पहिया वालों को एक और ऑटो चालकों को तीन लिटर पेट्रोल – सीएनजी , लड़कियों को मुफ्त शिक्षा , लैपटॉप , 300 यूनिट मुफ्त बिजली और एक करोड़ नौकरियों का आश्वासन दे डाला | दोनों के घोषणापत्र में गन्ना किसानों के भुगतान दो सप्ताह में किये जाने की बात भी है  | और भी ऐसे आश्वासन हैं जो देखने में बेहद आकर्षक लगते हैं | जिन क्षेत्रों में कल मतदान होना है वहाँ के मतदाताओं को ये वायदे किस तरह मलूम होंगे ये सोचने वाली बात है क्योंकि संचार क्रांति के इस युग में भी समाज का एक हिस्सा है जिनके  मन में ये बात गहराई तक बैठ चुकी है कि सरकार किसी की भी बने उनकी जिन्दगी में कोई बदलाव नहीं आने वाला |   सपा और भाजपा बीते दस साल में  बारी – बारी उ.प्र की सरकार चला चुके हैं | ऐसे में उनकी ये जवाबदेही भी बनती है कि पिछले घोषणापत्र के वायदों को पूरा किये जाने के प्रमाण पेश करते हुए अगला जनादेश  मांगे | मसलन उ.प्र में गन्ना  किसानों को चीनी मिलों द्वारा किये जाने वाले भुगतान में कभी - कभी एक साल तक लग जाता है |  अखिलेश यादव और योगी आदित्य नाथ दोनों ने पूरे पांच साल तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई किन्तु गन्ना किसानों की समस्या नहीं सुलझी तब किस मुंह से वे दोनों ये आश्वासन दे रहे हैं कि दोबारा सत्ता मिलते ही वे दो हफ्ते में भुगतान का इंतजाम करवा देंगे | इसी तरह से सपा ने एक करोड़ रोजगार देने का जो वायदा किया है वह भी आसमानी पुलाव पकाने जैसा है | अखिलेश से ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि 2012 से 17 के शासनकाल में उनकी सरकार ने उ.प्र में कितनी नौकरियां दीं और निजी क्षेत्र में कितने रोजगार उत्पन्न किये ? जहाँ तक बात मुफ्त सिलेंडर ,स्कूटी , लैपटॉप , पेट्रोल – सीएनजी और बिजली , खाद जैसे वायदों की है तो ये खुले आम घूस नहीं तो और क्या है ?  बेहतर हो घोषणापत्र चुनाव के ऐलान के साथ ही  पेश किये जाएं जिनसे इनका अध्ययन करने के साथ ही मतदाता उनको पूरा करने के बारे में अपनी शंकाएं और सवाल राजनीतिक दलों के सामने रख सके | लेकिन जानबूझकर वह ऐसे समय पेश किया जाता है जब  चुनाव दूसरे मुद्दों में उलझ चुका होता है | उदाहरण के लिये उ.प्र का पूरा चुनाव यादव, जाट, मुस्लिम , अगड़े - पिछड़े और दलितों के बीच सिमटकर रह गया है | महंगाई और बेरोजगारी बड़े मुद्दे हैं लेकिन किसी भी दल के पास इनको हल करने का जादुई चिराग नहीं है | उ.प्र के लाखों लोग दूसरे राज्यों में जाकर काम करते हैं | मुम्बई में तो उ.प्र के लाखों लोग दूसरी और तीसरी पीढी से रह रहे हैं | आज भी वहां से पलायन जारी है | कोरोना की पहली लहर में मुम्बई सहित अनेक महानगरों से जो लाखों श्रमिक बेहद मुश्किल हालातों में घर लौटे उनमें सर्वाधिक उ.प्र के ही थे | उनमें से बहुतों ने कहा कि दोबारा नहीं लौटेंगे किन्तु कुछ समय बाद वे फिर महानगरों की तरफ चल पड़े |   ये देखते हुए नई नौकरियों का वायदा करने वालों को ये बताना चाहिए कि ये नौकरियां किस खदान से निकाली जायेंगी ? लड़कियों और छात्रों को स्कूटी देने जैसे वायदे अपनी जगह ठीक हैं लेकिन त्यौहारों पर गैस सिलेंडर और हर माह मुफ्त पेट्रोल  जनता को बहलाने की चाल है | यदि भाजपा और सपा वाकई लोगों को रसोई गैस और पेट्रोल जैसी चीज मुफ्त देकर  मदद करना चाह रही हैं तो वे पेट्रोल , डीजल और गैस को अपने राज्य में सस्ता करने की घोषणा कर देतीं ताकि समाज के हर वर्ग को उसका लाभ मिले | लेकिन राजनीतिक दलों का लक्ष्य ऐसे वायदे करना मात्र है जिससे कि मतदाताओं को भ्रमित करते हुए समर्थन हासिल कर लिया जाए क्योंकि चुनाव  के बाद जनता के पास घोषणापत्र को लागू करवाने का कोई जरिया नहीं होता | ये देखते हुए बेहतर तो यही होता है कि घोषणापत्र ऐसा हो जिससे पूरे समाज को स्थायी लाभ हो और जिसका अमल सम्भव हो सके | यदि भाजपा और सपा उ.प्र में महंगाई कम करने का ठोस उपाय सुझाते हुए पेट्रोल , डीजल , रसोई गैस , बिजली के साथ ही रोजमर्रे की अन्य चीजों पर लगने वाले कर कम करने का वायदा करते तो वह सभी  को राहत देने वाला होता | महीने में एक लीटर पेट्रोल मुफ्त देने जैसा वायदा रोते हुए बच्चे को एक बिस्किट देकर बहलाने जैसा ही है |  इसी तरह पूरे साल महंगी रसोई गैस करने के बाद दो सिलेंडर मुफ्त देना भी चालाकी है | इस बारे में  ध्यान देने योग्य है कि मोदी सरकार ने रसोई गैस के जो कनेक्शन मुफ्त दिये उनकी भरपाई सिलेंडर के दाम बढ़ाकर कर ली गई | नतीजा ये हुआ कि अधिकतर लाभार्थी  नया सिलेंडर लेने में असमर्थ हो गये | इसी तरह की स्थिति मुफ्त बिजली की है | गरीबों और किसानों को सस्ती या मुफ्त बिजली देने का भार बाकी उपभोक्ताओं पर महंगी बिजली के तौर पर पड़ता है | इस तरह वोटों की मंडी के अर्थशास्त्र ने सरकारों पर कर्ज का ऐसा बोझ लाद दिया है जिसे चुकाने का भार  भावी पीढ़ियों पर होगा | ऐसे में जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल मतदान के काफी पहले घोषणापत्र पेश करें ताकि उसके बारे में उनसे सवाल पूछे जा सकें | सपा और भाजपा दोनों चूंकि उ.प्र की सत्ता में रह चुकी हैं इसलिए उनके पास जनता को ये बताने का भरपूर अवसर था कि उन्होंने ऐसा क्या किया जिसके आधार पर उनको दोबारा सत्ता सौंप दी जावे | इसी के  साथ ही वे दोनों ये भी बता सकते थे कि ऐसा कौन सा जनहितैषी कार्य उन्होंने किया जो दूसरी सरकार नहीं कर पाई | अखिलेश और योगी यदि नये  वायदे करने के बजाय अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को मुद्दा बनाते तब चुनाव वास्तविक मुद्दों पर केन्द्रित होता और मतदाताओं को उनके पिछले प्रदर्शन के आधार पर  पुनः अवसर देने न देने का विकल्प रहता | गन्ना किसानों को चीनी मिलों द्वारा समय पर भुगतान नहीं किये जाने की शिकायत पूरे प्रदेश में आम है | सपा और भाजपा दोनों ने अपने घोषणापत्र में 14 दिन के भीतर भुगतान करवाने का वायदा किया है | लेकिन  अखिलेश और योगी दोनों को इस बात का स्पष्टीकरण देना चाहिए था कि वे पांच साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद जब ये नहीं कर सके तब  दोबारा सत्ता में आकर  वे इस वायदे को पूरा करेंगे इसकी क्या गारंटी है ? वैसे भी घोषणापत्र कोई कानूनी दस्तावेज तो होता नहीं जिसका पालन नहीं किये जाने पर धोखाधड़ी का मामला दर्ज हो सके | सबसे बड़ा सवाल ये है कि जो राज्य अरबों – खरबों के कर्ज में डूबे हों वहां के राजनीतिक दल चुनाव में मुफ्त उपहार बाँटने का वायदा किस अधिकार से कर सकते हैं ? बेहतर हो उन पर ये बताने की भी कानूनी जिम्मेदारी डाली जाए कि वे घोषणापत्र के वायदों को पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन कहां से जुटाएंगे और उनका जनता पर कितना बोझ पड़ेगा ?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 February 2022

राजनीति के मैदान में अपराधियों के डेरे : राम रहीम के बाहर आने से उठे सवाल



भारतीय प्रजातंत्र वाकई बहुरंगी है | इसीलिए केवल राजनीतिक दल और नेता ही नहीं वरन साधु – संत और मठाधीश भी चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं | गुजरात में सोमनाथ का मंदिर नेताओं के लिए पूजनीय बन जाता है वहीं कर्नाटक में मठ , मतदाताओं को नियंत्रित और निर्देशित करते हैं | उ.प्र में अयोध्या , मथुरा और काशी के बिना चुनावी वैतरणी पार नहीं होती | म.प्र में उज्जैन के महाकालेश्वर , दतिया की पीताम्बरा पीठ और नर्मदा का पूजन - अर्चन राजनेताओं की जरूरत बन गया है | देश के अन्य हिस्सों में भी धार्मिक स्थल और उनमें बैठे महंत चुनावी मौसम में महत्वपूर्ण हो जाते हैं | इसी तरह पंजाब और हरियाणा में कुछ डेरे और आश्रम हैं जिनके प्रमुख हजारों - लाखों श्रद्धालुओं को प्रभावित करते हैं | वैसे तो ये धर्म के साथ ही समाजसेवा के क्षेत्र में काम करते हैं लेकिन बीते कुछ सालों में इनके प्रमुख अपनी अपराधिक और आपत्तिजनक गतिविधियों के कारण विख्यात कम कुख्यात ज्यादा हो चले हैं | इन्हीं में से एक है डेरा सच्चा सौदा जिसका पंजाब के मालवा अंचल में जबरदस्त प्रभाव बताया जाता है | इसके बहुचर्चित प्रमुख बाबा राम रहीम दुष्कर्म और ह्त्या के अपराध के लिए 20 साल की सजा काट रहे हैं | उनकी रंगीनियों के किस्से काफी पहले से चर्चा में आ चुके थे | हत्या और दुष्कर्म में जेल की हवा खा रहे राम रहीम को गत दिवस हरियाणा सरकार ने 21 दिन का फरलो ( अवकाश ) दे दिया | जेल में बंद कैदियों को समय – समय पर पारिवारिक कार्य अथवा इलाज आदि के लिए सीमित समय के लिए जेल से छुट्टी दी जाती है | राम रहीम को भी उसी के अंतर्गत यह अवकाश दिया गया | लेकिन इसमें एक पेंच ये फंस गया कि कुछ समय पूर्व जब उन्होंने अपनी माँ की चिकित्सा के लिए जेल से बाहर आने की अनुमति माँगी तब मात्र एक दिन के .लिए वह दी गई जबकि इस बार परिवार से मिलने के नाम पर 21 दिन के लिए उन्हें जेल से बाहर आने दे दिया गया | इस पर विवाद खड़े किये जा रहे हैं क्योंकि राम रहीम के बाह्रर आने के समय पंजाब में विधानसभा चुनाव पूरे जोर पर है | जैसी की खबरें आ रही हैं उनके अनुसार बाबा के लाखों अनुयायी उनके फतवे का इंतजार कर रहे हैं | राम रहीम की बीते दो चुनावों में भी सक्रिय भूमिका थी | कहा जाता है 117 में से तकरीबन 50 सीटों पर उनके अनुयायी बड़ी संख्या में हैं | बाबा किसका समर्थन करेंगे ये स्पष्ट नहीं है | वैसे भी पंजाब के चुनाव इस बार सही मायनों में बहुकोणीय हो गए हैं | ऐसे में किसी भी क्षेत्र में कुछ हजार मत भी थोक में किसी एक प्रत्याशी को मिल जाएँ तो उसका बेड़ा पार हो जाएगा | सवाल ये है कि राम रहीम को जेल से बाहर आने की अनुमति ऐसे समय दी गई जबकि चुनाव आयोग के निर्देशन पर स्थानीय प्रशासन अपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों पर कड़ी नजर रखता है | बाबा तो हत्या और दुष्कर्म जैसे अपराध की सजा भुगत रहा है | राजनीति का अपराधीकरण रोकने के प्रति तो चिंताएं बहुत व्यक्त की जाती हैं लेकिन चुनाव में अपराधी प्रकरणों के आरोपियों की उम्मीदवारी इस आधार पर उचित ठहराई जाती है कि जब तक अदालत दंड न दे तब तक किसी को दोषी नहीं माना जा सकता | लेकिन जहाँ तक राम रहीम को चुनाव के समय जेल से बाहर आने की सुविधा दिये जाने का सवाल है तो वे तो गंभीर अपराधों के लिए 20 साल का कारावास भुगत रहे हैं | ऐसे में उनका अतीत देखते हुए चुनाव के कुछ समय पूर्व उनका जेल से बाहर आना चुनाव को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा | वे किसके पक्ष में हैं ये तो वे ही जानें , लेकिन हरियाणा सरकार का ये तर्क बेमानी है कि इसे चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि कैदियों को मिलने वाली अवकाश सुविधा उनका अधिकार है | राम रहीम कोई साधारण अपराधी न होकर एक शातिर व्यक्ति है जिसने साधु का मुखौटा धारण कर शैतानी हरकतें कीं | उन जैसे और भी अनेक बाबा इसी तरह के आरोपों के चलते जेलों में बंद हैं | सवाल ये भी है कि राजनीतिक दलों और नेताओं को क्या अपने संगठन और जनाधार पर भरोसा नहीं रहा जो वे राम रहीम जैसे लोगों के मोहताज बनकर रह गये हैं | राम रहीम के अनुयायियों की उनके प्रति आस्था का जो भी कारण हो लेकिन एक जघन्य अपराधी हमारे लोकतंत्र को नियंत्रित करे ये बात अपमानजनक है | दुर्भाग्य से राजनीति करने वालों की विश्वसनीयता इस हद तक घट गयी है कि उनको चुनाव जीतने के लिए भी राम रहीम जैसे घटिया इंसान का सहारा लेना पड़ता है जो साधु की शक्ल में शैतानी सोच रखते हैं | राजनीति के अपराधीकरण को रोकने पर प्रवचन देने वाले जिस तरह इन राम रहीम जैसों के सामने घुटना टेक होत्ते हैं ये देखकर दुःख भी होता है और गुस्सा भी आता है | चिंता का विषय ये है कि राजनीति में अपराधियों के डेरे घटने की बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं |


- रवीन्द्र वाजपेयी