Friday, 8 April 2022

इमरान के पास इतिहास बनाने का मौका था लेकिन वे चूक गए



पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान जिस फजीहत का शिकार हुए उसके लिए वे खुद हे जिम्मेदार हैं | 2018 में उनके सत्ता संभालते  समय भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने औपचारिक बधाई देते हुए समझाइश दी थी कि दोनों देश आपस में लड़ते रहने के बजाय गरीबी के विरुद्ध संघर्ष करें जिससे दोनों तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ सकें | इमरान से ये अपेक्षा वहाँ की जनता को  भी  थी कि वे मुल्क को राजनीतिक अनिश्चितता से निकालकर साफ़ – सुथरा शासन देंगे | लेकिन  नेशनल असेम्बली में पूर्ण बहुमत न होने के कारण उनको सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा का सहारा लेना पड़ा और यही उनके पाँव में बेड़ी साबित हुआ | विदेशों में शिक्षित और आधुनिक जीवनशैली में ढले इमरान से पूरी दुनिया उम्मीद कर रही थी कि वे इस मुल्क में नई हवा का झोका साबित होंगे | उनके शुरुवाती तेवरों से इसकी झलक मिली भी लेकिन धीरे – धीरे वे  फ़ौज और कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसकर भारत विरोध के मकड़जाल में उलझकर रह गये | कश्मीर विवाद  को शांतिवार्ता के जरिये सुलझाने की जगह उन्होंने पुराने हुक्मरानों की तरह ही आतंकवादी ताकतों को प्रश्रय देने की मूर्खता कर डाली | ब्रिटेन में लम्बे समय तक रहने के कारण उनसे ये अपेक्षा थी कि वे पाकिस्तान की विदेश नीति को व्यवहारिक धरातल पर उतारकर वैश्विक  समुदाय में एक जिम्मेदार देश के तौर पर उसे स्थापित करेंगे लेकिन तालिबान को बढ़ावा देकर उन्होंने  साबित कर दिया कि उनमें बदलाव का साहस नहीं है | उनके उस कदम से अमेरिका सहित पश्चिम के वे बड़े देश पाकिस्तान से छिटकने लगे जो लम्बे समय तक उसके पालनहार बने रहे | दुष्परिणाम ये हुआ कि उसको मिलने वाली खैरात बंद हो गई | यहाँ तक कि इस्लाम के नाम पर जिन अरब देशों से उसे बेहिसाब मदद मिलती थी वे भी उसके प्रति उपेक्षा भाव रखने लगे  जिससे पाकिस्तान कंगाली की  स्थिति में आ गया | विदेशी कर्ज न चुका पाने के कारण उसको अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने भी काली सूची में डाल दिया | अतीत में अमेरिका और ब्रिटेन उसे युद्ध सामग्री भी दिया करते थे लेकिन इमरान सरकार के दौर में वह सब भी बंद हो गया | चीन अकेला उसका सहारा बना रहा लेकिन धीरे – धीरे उसे भी ये लगने लगा कि वह  उस पर बोझ बनता जा रहा है | जिन सड़क और बंदरगाह परियोजनाओं में चीन ने पाकिस्तान में भारी पूंजी निवेश किया वे भी अधूरी पडी हुई हैं जिसकी वजह से उसे काफी नुकसान हो रहा है | यही नहीं उसे वहां की जनता का विरोध भी झेलना पड़ रहा है | इन सब कारणों से इमरान घरेलू और विदेशी दोनों मोर्चों पर असफल  होने लगे | अंतर्राष्ट्रीय मंचों में  अनेक अवसरों पर उन्हें अपमानजनक स्थिति से भी गुजरना पड़ा | जिस तालिबान को पाकिस्तान ने हर संभव मदद दी वही उस पर हमला करने आमादा है | जब इमरान पूरी तरह कमजोर हो गये तब विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का दांव चला जिसे शुरू में तो उन्होंने गम्भीरता से नहीं लिया लेकिन जल्द ही  उनको समझ में आ गया कि बाजी हाथ से खिसकती जा रही है और तब उनके द्वारा अपने समर्थकों की भीड़ जमाकर उपद्रव  मचाने जैसा  बचाकानापन दिखाया गया जिसके बाद सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा और आईएसआई प्रमुख ने उनको चेतावनी दे डाली कि उस तरह की हरकत न करें अन्यथा वे हस्तक्षेप के लिए बाध्य हो जायेंगे | अतीत में ऐसे हालातों में सेना सत्ता पर काबिज होती रही है किन्तु बाजवा चूँकि इमरान पर दबाव डालकर अपने  सेवा काल में वृद्धि करवा चुके थे इसलिए उन्हें आशंका थी कि  कनिष्ट सैन्य अधिकारी शायद उनकी बात न मानें | जब सेना ने भी टेका लगाने से इंकार कर दिया तब इमरान ने नेशनल असेम्बली के उप सभापति से तकनीकी आधार पर अविश्वास प्रस्ताव खारिज करवाते हुए संसद भंग करवाकर तीन महीने में नया चुनाव कराने का आदेश राष्ट्रपति से जारी करवा दिया | उन्हें लग रहा था कि ऐसा करने से विपक्ष के हौसले पस्त हो जायेंगे लेकिन हुआ उसका उल्टा | मामला सर्वोच्च न्यायालय गया जिसने गत दिवस संसद को बहाल करते हुए 9 अप्रैल को अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के बाद उसी दिन परिणाम घोषित करने का फैसला सुनाकर इमरान का खेल तो बिगाड़ा ही , लगे  हाथ जनरल बाजवा की भी किरकिरी करवा दी जिनके कारण इमरान सत्ता में बने हुए थे | इस घटनाचक्र की सबसे रोचक बात ये रही कि इमरान ने अमेरिका पर ये आरोप लगाया कि वह उन्हें सत्ता से हटाना चाहता है | एक चिट्ठी भी बतौर प्रमाण उन्होंने  प्रस्तुत की | उनका सोचना था कि उस आधार पर वे जनसहानुभूति अर्जित कर लेंगे किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने उस पर यकीन नहीं किया | उल्लेखनीय है अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज करने के लिए विदेशी षड्यंत्र को ही आधार बनाया गया था | इमरान  यूक्रेन संकट शुरू होते ही रूस जाकर राष्ट्रपति पुतिन को समर्थन दे आये थे | उस कदम का उद्देश्य रूस को भारत का पक्ष लेने से रोकना था | लेकिन वे उसमें विफल रहे  उल्टे अमेरिका की नजरों से पूरी तरह उतर गये | सत्ता हाथ से छिनते देख इमरान ने भारत पर भी निशाने साधे | नवाज शरीफ और नरेंद्र मोदी के छिपकर मिलने जैसा शिगूफा भी छोड़ा किन्तु कुछ काम न आया | और आखिरकार वे अपने ही खोदे गड्ढे में गिरने  के कगार पर पहुँच गये हैं | कल अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की पूरी सम्भावना है | उसके पहले बदहवासी में इमरान कुछ कद उठायें तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि पाकिस्तान की तासीर में षडयंत्र , राजनीतिक प्रतिशोध और लोकतांत्रिक सत्ता पर सेना का प्रभाव समाया हुआ है | दूसरी बात ये भी  गौरतलब है कि जिन तीन विपक्षी गुटों ने अविश्वास प्रस्ताव के जरिये अपनी एकता दिखाई है वे उसके पारित होने पर भी क्या साथ रहेंगे ? यदि इमरान संसद में हारकर या उसके पूर्व ही पद छोड़ देते हैं तब क्या नवाज शरीफ , आसिफ ज़रदारी और मौलाना फजलुर्र्ह्मान मिलकर सत्ता संभालेंगे या पंजाब , सिंध और सीमान्त इलाकों के बीच वर्चस्व की जंग में राजनीतिक अनिश्चितता के कारण नये चुनाव की नौबत आ जायेगी ? बड़ी बात नहीं मौके का लाभ उठाकर सेना कोई  दांव चल दे | जो भी हो लेकिन ये बात साबित हो गई कि पाकिस्तान में लोकतंत्र होते हुए भी कारगर नहीं रहा | अब तक जनता द्वारा चुने हुए सभी गैर फ़ौजी प्रधानमन्त्री चाहे वे ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो रहे हों या  नवाज शरीफ , बेनज़ीर भुट्टो और  इमरान खान , सभी पाकिस्तान को अंदर से खोखला करने में जुटे रहे जिसकी वजह से वहां फ़ौज को सत्ता पर दबाव बनाने का मौका मिलता रहा | साथ ही वे सभी भारत के विरोध को अपनी  सफलता का आधार मानकर कट्टरपंथियों को बढ़ावा देने की गल्ती करते रहे जिसका खामियाजा उन्हें  अलग – अलग तरीके से भुगतना पड़ा | इमरान पाकिस्तान के आधुनिक चेहरे बन सकते थे लेकिन वे भी अपने पूर्ववर्तियों के नक़्शे कदम पर चलते रहे और अंततः उसी अंजाम पर जा पहुंचे | यदि अल्पमत का एहसास होते ही वे पद त्यागकर विपक्ष में आ बैठते तब शायद जनता की सहानुभूति उनके साथ रहती लेकिन आज वे न इधर के रहे न उधर के , वाली स्थिति में पहुंचकर हंसी और निंदा के पात्र बन गये  | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 April 2022

बिन मांगे मिली इस सलाह पर ध्यान न दिया तो कर्ज कमर तोड़ देगा


सर्वोच्च न्यायालय का काम वैसे तो कानून की परिधि में रहते हुए उसके समक्ष आने वाले मामलों का निपटारा करना है लेकिन कभी - कभार वह घर के बुजुर्गों की तरह सांकेतिक भाषा में ऐसी सलाह  देता है जो भले ही अप्रासंगिक प्रतीत हो लेकिन उसके भीतर गूढ़ अर्थ छिपा रहता  है | गत दिवस घरेलू हिंसा से सम्बन्धित प्रोटेक्शन अधिकारी पूरे देश में नियुक्त किये जाने की मांग पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने कहा कि वह बिना मांगे सलाह दे रहे हैं कि सरकार को योजनाएं और कानून लाते समय  उनके वित्तीय प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए | अपनी बात स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा के  अधिकार का कानून तो बना दिया गया लेकिन न शिक्षक हैं और न शालाएं | ढांचागत संसाधन भी उपलब्ध नहीं हैं | सस्ते पारिश्रमिक पर शिक्षा मित्र नियुक्त कर दिए  जाते हैं जो बाद में जब समान वेतन की मांग लेकर अदालत आते हैं तब सरकार बजट का रोना रोती है |  उक्त  टिप्पणी ऐसे समय की गई जब श्री लंका में आये वित्तीय संकट के परिप्रेक्ष्य में ये चर्चा पूरे देश में चल पड़ी है कि वोट बैंक की खातिर  राजनीतिक दल जो वायदे कर सत्ता में आते हैं उनको पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधनों का कोई प्रबंध नहीं होने से या तो सरकार कर्ज लेती है या फिर वे वायदे हवा – हवाई होकर रह जाते हैं | सरकार में रहते हुए जनता की नाराजगी से बचने के लिए भी सत्ताधीश नई – नई योजनाओं का ऐलान करने में जुटे रहते हैं जबकि उनके लिए आर्थिक प्रबंध नहीं होने से खजाने पर बोझ बढ़ता जाता है | हाल ही में कुछ  विधानसभा चुनावों के दौरान मुफ्त सुविधाओं के जो आश्वासन बांटे गए उनको लेकर केंद्र सरकार के सचिवों ने प्रधानमंत्री को आगाह किया कि बिना समुचित आर्थिक संसाधनों के जिस तरह से मुफ्त सुविधाएँ और उपहार बाँटे जा रहे हैं उनके चलते भारत में भी श्रीलंका जैसी बदहाली पैदा हो सकती है | उस बैठक के बाद से  आर्थिक विशेषज्ञों के बीच इस विषय पर विमर्श  शुरू होने से विभिन्न राज्यों द्वारा संचालित मुफ्त योजनाओं से  खजाने पर पड़ रहे भार का ब्यौरा आने लगा है | अधिकृत जानकारी के अनुसार उ.प्र ,  बिहार और प. बंगाल सहित देश के मात्र छह राज्यों पर ही 26 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज होने के बाद भी वहां की सरकारें मुफ्त रेवड़ियाँ बांटने मे संकोच नहीं कर रहीं | केंद्र  द्वारा संचालित लोक – लुभावन योजनाओं का आकलन भी करें तो ये सोचकर सिहरन होने लगती है कि भारत भी आर्थिक संकट में फंसने जा रहा है  | जहां तक प्रश्न सस्ते अनाज का है तो उससे किसी को ऐतराज नहीं है |  लेकिन जब कोई चीज मुफ्त दी जाती है तब वह अधिकार का रूप ले लेती है जिसे छीने जाने पर सरकार को अलोकप्रिय होने का भय सताने लगता है और उस कारण वह उसे जारी रखने बाध्य हो जाती है | कोरोना काल में लॉक डाउन के दौरान केंद्र सरकार द्वारा गरीबों को  मुफ्त राशन वितरण की योजना प्रारम्भ की गई थी किन्तु राज्यों के  विधानसभा चुनावों के कारण मुफ्त अनाज बाँटने की समय सीमा बढ़ाने का क्रम जारी है | हाल ही पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा को मिली सफलता में इस योजना का काफी योगदान रहा | चूंकि इस वर्ष के अंत में गुजरात विधानसभा के चुनाव हैं इसलिए  उसे और आगे बढ़ा दिया गया  | जिन पांच राज्यों के चुनाव गत माह संपन्न हुए वहां ये प्रचार भी किया जाता था कि चुनाव बाद मुफ्त राशन बंद हो जायेगा | इस तरह की बातों से भी सत्ता में बैठे लोगों पर दबाव बन जाता है | लेकिन न्यायमूर्ति श्री ललित ने जो सलाह दी है उस पर केंद्र और राज्यों को विचार करते हुए इस बात का अध्ययन करना चाहिये कि पहले सत्ता में आने और फिर उसमें बने रहने के लिए बिना समुचित आर्थिक प्रबंध के नई – नई योजनाओं की घोषणाओं पर अमल कैसे होगा ? पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन  सिंह ने किसी बात पर कह दिया था कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते | उसे लेकर उनकी बहुत आलोचना भी हुई किन्तु बतौर अर्थशास्त्री उनका कहना पूरी तरह सही था | हाल ही में परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने पत्रकारों द्वारा टोल टेक्स में छूट की मांग पर दो टूक कहा कि अच्छी सड़कों  पर चलना है तो टेक्स तो देना ही पड़ेगा | टोल की ज्यादा दरों को लेकर भले ही ऐतराज किया जाए  लेकिन  उनके  द्वारा कही गयी बात के औचित्य से इंकार सच्चाई से मुंह फेरने जैसा होगा | समय आ गया है जब  राजनीतिक दलों को  जिम्मेदार सोच पैदा करनी चाहिए | मुफ्त रेवड़ियों  के बजाय ठोस काम किये जाएं तो उनका भी असर होता है | मसलन उ.प्र में कानून व्यवस्था के मोर्चे पर योगी सरकार के कामकाज को मतदाताओं ने सराहा | मोदी सरकार के सबसे लोकप्रिय मंत्रियों में श्री गड़करी यदि हैं तो इसके पीछे देश में बन रहे राष्ट्रीय राजमार्ग हैं जिनके कारण सड़क परिवहन में सुविधा और सुरक्षा दोनों की वृद्धि हुई है | जबसे टोल टेक्स की फास्ट टैग प्रणाली लागू हुई तबसे वाहन चालकों का समय बचने के साथ ही व्यर्थ के विवाद भी सुनाई देना बंद हो गए | ये देखते हुए बुद्धिमत्ता इसी में है कि  राजनीतिक दल व्यवस्थाजनित सुधारों पर ज्यादा ध्यान दें | दिल्ली में आम आदमी पार्टी सत्ता में आई तो मुफ्त बिजली और पानी के नाम पर थी परन्तु उसकी सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी शालाओं के स्तर को सुधारने जैसे जो काम किये उनकी वजह से उसे दोबारा जीत हासिल करने में ज़रा भी परेशानी नहीं हुई | कोरोना काल में लॉक डाउन के दौरान बेरोजगारी अपने चरम पर  थी  जिससे  करोड़ों श्रमिकों के सामने दो वक्त की रोटी की समस्या पैदा हो गई | उन हालातों में मुफ्त राशन समय की मांग थी | लेकिन जब हालात सामान्य हो चले हैं और आर्थिक गतिविधियां रफ्तार पकड चुकी हैं तब मानव संसाधन का अधिकतम उपयोग करने के लिए निठल्ले बैठे लोगों को कुछ न कुछ काम करने हेतु बाध्य किया जाना चाहिए | देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का बड़ा योगदान है | इस क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं होने के बाद भी खेती करने वाले रोना रोते हैं कि मुफ्त राशन योजना के कारण उनको मजदूर नहीं मिलते | न्यायमूर्ति श्री ललित ने भले ही शिक्षा के अधिकार को मुद्दा बनाकर सरकार को आगाह किया किन्तु उनकी बात सभी लोक - लुभावन योजनाओं और कार्यक्रमों पर लागू होती है | बिना पैसे के राजशाही अंदाज में खैरात बांटने वाले राजनेता जनता का भला करने के नाम पर जिस तरह देश को खोखला कर रहे हैं उस पर रोक न लगी तो फिर श्रीलंका जैसे हालात बनने से कोई नहीं रोक सकता | 

-रवीन्द्र वाजपेयी




Wednesday, 6 April 2022

भाजपा : जिसकी शक्ति बढ़ती है उसी के शत्रु भी बढ़ते हैं



 आजादी के बाद की  भारतीय राजनीति  के इतिहास पर यूं तो  सैकड़ों अध्याय लिखे जा सकते हैं किन्तु बीते 75 वर्ष के कालखंड पर दृष्टिपात करने पर  ये कहना गलत न होगा कि 1947 से 1977 तक का दौर  कांग्रेस के नाम लिखा जाएगा | 1975 में इंदिरा जी द्वारा लगाये गये आपातकाल के गर्भ से जन्मी जनता पार्टी नामक प्रयोग भले ही अल्पजीवी रहा लेकिन उसके कारण 1977 में  पहली बार केन्द्रीय सत्ता में परिवर्तन संभव हो सका | महज 27 महीने चली वह सरकार मुख्य रूप से कांग्रेस के इंदिरा विरोधी नेताओं के अलावा समाजवादियों और जनसंघ के विलय से बनी थी किन्तु रूस के इशारे पर मधु लिमये जैसे  नेताओं ने जनसंघ और रास्वसंघ के रिश्तों को आधार बनाकर दोहरी सदस्यता रूपी विवाद पैदा कर जनता पार्टी के बिखराव की स्थिति पैदा कर दी | जिसके बाद 6 अप्रैल 1980 को जनसंघ के नए अवतार के तौर पर भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ जिसके चेहरे बने अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी  | यद्यपि जनता पार्टी भी बनी रही लेकिन टूटन जारी रहने से वह कमजोर होती गई | 1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता में आये तो लगा कि कांग्रेस के एकाधिकार वाला दौर फिर लौट आया है परन्तु  महज पांच साल बाद मतदाताओं ने राजीव को नकार दिया | उससे ये लगा कि भले ही 1977 में बनी जनता सरकार ज्यादा नहीं चली किन्तु मतदाताओं के मन में ये विश्वास बैठ गया कि केन्द्रीय सत्ता में बदलाव संभव है | 1989 में आई विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार जनता दल नामक एक नये नवेले राजनीतिक कुनबे की अगुआई में बनी जिसमें  राजीव से नाराज होकर बाहर आये कुछ कांग्रेसियों के अलावा बिखरे हुए पुराने समाजवादियों का जमावड़ा था | भाजपा और वामपंथियों के बाहरी समर्थन पर टिकी  वह सरकार महज 11 महीनों में चलती बनी और इस बार भी कारण भाजपा नामक जनसंघ का नया संस्करण ही था   जिसने लालकृष्ण आडवाणी की  राम रथ यात्रा को बिहार में रोके जाने के बहाने उस सरकार से समर्थन वापिस ले लिया | लेकिन 1989 में भाजपा ने हिन्दुत्व को अपनाकर जिस तरह से अपने जनाधार में वृद्धि की वह भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव का आधार बना |  उसके बाद की एक चौथाई सदी में  नए – नए प्रयोगों के साथ गठबंधन की राजनीति को राष्ट्रीय स्वीकृति मिलती गई | कांग्रेस और भाजपा दोनों ने इस दौरान बेमेल गठबंधन के जरिये देश की सत्ता हासिल की लेकिन कांग्रेस जहां लगातार कमजोर होती गई , वहीं भाजपा ने उसके विकल्प के तौर पर अपने पैर तेजी से फैलाते हुए व्यवहारिक राजनीति को अपनाया |  हिंदुत्व के अलावा मंडल नामक सोशल इन्जीनियरिंग के फार्मूले को सफलतापूर्वक आजमाते हुए उसने उन अवधारणाओं को तोड़ दिया कि वह शहरों तक सिमटी हुई उच्च जातियों की पार्टी है | इसमें दो मत नहीं हैं कि भाजपा के उत्थान में अटल और आडवाणी की जोड़ी का योगदान भुलाया नहीं जा सकता | रास्वसंघ की विचारधारा से प्रेरित जनसंघ का जब भाजपा के रूप में पुनर्जन्म हुआ तब तक वह अपनी सीमित उपलब्धियों से संतुष्ट रहने वाली पार्टी की बजाय सत्ता हासिल करने की महत्वाकांक्षा से भर उठी थी | और इसीलिये उसने अपने वैचारिक पक्ष को लेकर आक्रामक रुख दिखाया | दीनदयाल उपाध्याय को अपना आदर्श मानने के बावजूद भाजपा ने सत्ता के राजमार्ग पर चलने के लिए उन सभी तौर – तरीकों का निःसंकोच इस्तेमाल किया जो भारतीय राजनीति के लिए चिर – परिचित हो चले थे | हिंदुत्व  और राष्ट्रवाद जैसे नारों के जरिये भारतीय जनमानस में उसने ये विश्वास पैदा कर दिया कि वह व्यक्ति और परिवार आधारित राजनीतिक दलों से अलग ऐसी पार्टी है जो  साफ़ – सुथरी सरकार के साथ ही देश को विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाते हुए उसकी सुरक्षा का भी समुचित प्रबन्ध करेगी |  1989 के  बाद के कालखंड में भारतीय मतदाताओं ने अनेक राजनीतिक प्रयोग देखे जिनमें डा.मनमोहन सिंह की दस साल चली सरकार भी थी | लेकिन इस दौरान जनता को ये लगने लगा कि केंद्र में ऐसा मजबूत नेता चाहिए जो दबाव और निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर काम कर सके और तब सामने आये नरेंद्र मोदी जो गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए विकास पुरुष के साथ ही हिंदुत्व के प्रखर प्रवक्ता के रूप में भी राष्ट्रीय क्षितिज पर छा गये |  2014 के चुनाव में भाजपा ने उनको प्रधानंमत्री पद का प्रत्याशी बनाया तो उस निर्णय को जनता का आशातीत समर्थन मिला और उसे अपने दम पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ | यही नहीं तो पांच साल तक सरकार चलाने के बाद 2019 में वह  पहले से ज्यादा बहुमत के साथ लौटी |  श्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही पार्टी में अटल – आडवाणी की जोड़ी की तर्ज पर मोदी और अमित शाह उभरे जिन्होंने जल्द ही सत्ता और संगठन दोनों पर अपनी पकड़ बना ली | इसे लेकर उँगलियाँ भी उठने लगीं लेकिन जल्द ही ये साबित हो गया कि वे भाजपा को सही मायनों में राष्ट्रीय पार्टी बनाने में कामयाब रहे हैं | जिस कुशलता से इन्होंने उ.प्र में पार्टी को अजेय बना दिया उसी तरह  पूर्वोत्तर में उसका अकल्पनीय विस्तार किया | प. बंगाल में आज भाजपा  मुख्य विपक्षी दल है | देश के बड़े भूभाग पर उसका शासन है | लेकिन ये फैलाव केवल सत्ता हासिल करने तक ही सीमित नहीं रहा , अपितु मोदी – शाह की जुगलबंदी ने भाजपा के मौलिक सिद्धांतों को अमली रूप देने का जो कारनामा कर दिखाया उसकी वजह से ही वह आज एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है | जम्मू – कश्मीर से धारा 370 हटाने के साथ ही अयोध्या में राम मंदिर को लेकर चल रहे विवाद के  शान्तिपूर्वक हल हो जाने के अलावा तीन तलाक जैसे मामलों का निपटारा करने से  केंद्र सरकार के प्रति ये विश्वास  दृढ़ हुआ है कि वह ठोस काम करने में सक्षम है | इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि भाजपा ने देश की राजनीति को पूरी तरह बदलकर रख दिया है | सत्ता के प्रति उसकी भूख यद्यपि उसके प्रशंसकों को कचोटती है लेकिन मोदी – शाह के दौर की भाजपा ये जान  चुकी  है कि सत्ता वह साधन है जिसके जरिये वैचारिक पक्ष को बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता है | दूसरी बात उसको ये भी समझ में आ गयी है कि सीमित दायरे में रहकर राष्ट्रीय पार्टी नहीं बना जा सकता | वामपंथियों और समाजवादियों के हश्र से सीख लेकर उसने खुद को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर पेश करते हुए जब श्री मोदी के माध्यम से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बुलंद किया तो उसका जनता पर जबर्दस्त मनोवैज्ञानिक असर हुआ | निजी तौर पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोपों से मुक्त रहने के कारण प्रधानमंत्री के प्रति जो विश्वास बना हुआ है उसकी वजह से भी भाजपा को मजबूती मिली है | उ.प्र में योगी  आदित्यनाथ  सरकार की वापिसी ने  मोदी – योगी नामक जिस नये समीकरण को जन्म दिया वह भविष्य का संकेत हैं | जिसमें स्वच्छ छवि वाला मजबूत नेता , प्रभावी प्रशासन , नीतिगत स्पष्टता और वैचारिक प्रतिबद्धता राजनीति के आधार होंगे | भाजपा आज अपना स्थापना दिवस मना रही है | उसके कांग्रेसीकरण होने की चर्चा आम है | दूसरी पार्टियों से आये नेताओं के लिए दरवाजे खुले रखने की नीति के चलते उसके अपने कैडर में नाराजगी भी  है | अनेक राज्यों में सरकारें होने के बावजूद पार्टी में प्रादेशिक नेताओं की वजनदारी कम हुई है जिसकी वजह से उसकी प्रधानमंत्री पर निर्भरता बढ़ती जा रही है | चुनाव जीतने वाली मशीन बनने जैसे कटाक्ष भी उस पर होते हैं | ये भी कहा जाता है कि अब वह पार्टी विथ डिफ़रेंस नहीं रही | लेकिन इस सबके बावजूद देश में जितने भी राजनीतिक दल हैं उनकी तुलना में वैचारिक स्पष्टता के साथ ही राष्ट्रवाद  का भाव  उसकी सफलता का मूल कारण है | हालांकि रास्वसंघ के समर्थन और मार्गदर्शन के बिना ये सम्भव नहीं था | राजनीतिक तौर पर बेहद मजबूत हो जाने के बाद भी भाजपा के विरोधी कम नहीं हैं जिसका प्रमाण 2024 के महा - मुकाबले के लिए विपक्षी गठबंधन बनाए जाने की कवायद है | लेकिन इस बारे में ये कथन उल्लेखनीय है कि जिसकी शक्ति बढ़ती है उसी के शत्रु भी बढ़ते हैं |  

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 5 April 2022

पड़ोस का संकट हमारी परेशानी : शरणार्थियों का घर बन रहा भारत



जैसी कि आशंका थी  , श्रीलंका में आर्थिक बदहाली का असर भारत पर भी पड़ने लगा है | तमिलनाडु के समुद्री तट पर  सपरिवार आ रहे श्रीलंकाई मछुआरे भटकते हुए यहाँ तक नहीं पहुंचे | अपितु समुद्री लहरों से जूझते हुए परिवार सहित  शरण लेने आये हैं | उन्हें घुसपैठिया मानकर पहले तो गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन तमिलनाडु की द्रमुक सरकार के दखल के बाद जमानत देकर शरणार्थी शिविर में पनाह दी गई | कुछ दशक पूर्व जब श्रीलंका पृथक तमिल राष्ट्र के लिए लिट्टे नामक उग्रवादी संगठन द्वारा किये जा रहे गृहयुद्ध से जूझ रहा था , तब भी बहुत बड़ी संख्या में वहां से तमिल शरणार्थी भारत आये थे | उनमें से अधिकतर स्थितियां समान्य होने पर वापिस भी चले गये लेकिन कुछ यहीं रह गये | बीते कुछ दिनों में जो शरणार्थी तमिलनाडु  आये उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अतीत में भी यहाँ शरणार्थी के तौर पर रह चुके थे | भाषा और सांस्कृतिक समानता के कारण तमिलनाडु और श्रीलंका के तमिलभाषियों के बीच भावनात्मक रिश्ता है जो विवाह सम्बन्धों का रूप भी ले लेता है | श्रीलंका में पृथक तमिल राष्ट्र के लिए हुए हिंसक आन्दोलन को इसीलिये तमिलनाडु की द्रविण पार्टियों का खुला समर्थन था | बावजूद इसके दोनों देशों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे कभी नहीं रहे | श्रीलंका में बौद्ध धर्मावलम्बी सिंहलियों का बाहुल्य है जो ये तो मानते हैं कि उनकी सांस्कृतिक जड़ें भारत में ही हैं लेकिन इक्का दुक्का को छोड़कर इस देश की सरकारों में भारत के प्रति द्वेषभाव ही देखा जाता गया | हालाँकि जब – जब भी  वहां  संकट  आया तब – तब भारत ने सबसे पहले  मदद की | लिट्टे के आतंक के दौरान भारतीय सेना श्रीलंका की अखंडता की रक्षा हेतु  भेजी गई जिसकी कीमत राजीव गांधी को अपनी हत्या  के रूप में चुकानी पड़ी | इतिहास गवाह है कि अपनी   आजादी के बाद से ये टापू  नुमा देश भारत के प्रति सदैव सशंकित बना रहा | ये जानते हुए भी कि लिट्टे को चीन से अस्त्र – शस्त्र और  आर्थिक सहायता मिलती रही , उसके खात्मे के बाद श्रीलंका के सत्ताधीश उसी चीन की गोद में जा बैठे  जिसने उसे कर्जदार बनाते हुए कंगाली की स्थिति में पहुंचा दिया |  जब वहां हालात बेकाबू होने लगे तब चीन दूर से बैठा तमाशा देख रहा है और श्रीलंका के सत्ताधीश तथा विपक्षी नेता भारत से मदद की गुहार कर रहे हैं | भारत ने  संकट में फंसे पड़ोसी को आर्थिक सहायता के साथ ही जरूरी साजो – सामान देकर अपना कर्तव्य निभाया है लेकिन इसके  बाद भी श्रीलंका हमारे प्रति प्रेम भाव रखेगा ये सोचना गलत होगा | इस बारे में  विचारणीय  बात ये है कि हमारे लगभग सभी पड़ोसी मुसीबत के समय तो हमसे बड़प्पन की उम्मीद रखते हैं परन्तु काम निकलते ही मुंह फेर लेते हैं | दरअसल भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या बनते हैं  इन देशों से आने वाले शरणार्थी , जो  वापिस जाने का नाम ही नहीं लेते | चीन द्वारा तिब्बत पर कब्ज़ा करने के बाद आये लाखों  शरणार्थी भारत के स्थायी वासी होकर रह गये और  दलाई लामा की निर्वासित सरकार का मुख्यालय धर्मशाला में बन गया | उसके बाद पाकिस्तान से सताये गए हिन्दू और सिख भारत में शरण लेकर यहाँ के नागरिक बनते गये | अफगानिस्तान से तो ये सिलसिला आज तक जारी है | बांग्ला देश से आये करोड़ों शरणार्थी केवल असम ,त्रिपुरा  और प. बंगाल तक ही सीमित न रहकर पूरे देश में फ़ैल गये जिन्हें वोट बैंक की राजनीति ने  स्थायी नागरिक बना दिया | म्यांमार से खदेड़े गए रोहिंग्या मुसलमान अपने मूल स्थान बांग्ला देश के बजाय भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के अलावा जम्मू कश्मीर तक बस गये | भारत सरकार द्वारा इन्हें वापिस भेजने के प्रयास किये जाने पर विपक्षी दलों के अलावा मानवाधिकार की दुकान चलाने वालों ने चिल्लाना शुरू कर दिया | रोहिंग्या मुसलमान आये तो शरणार्थी बनकर लेकिन जल्द ही इनके भारत विरोधी इरादे जाहिर हो गये | नेपाल के लाखों नागरिक भारत में स्थायी रूप से रहते ही हैं | श्रीलंका में  आये इस संकट के कारण शरणार्थियों की जो नई खेप तमिलनाडु आ रही है उसे वहां की सरकार हाथों  - हाथ ले रही है | ये संख्या कहाँ तक जायेगी कहना कठिन है और ये भी तय है कि इनमें से बहुत से वापिस लौटने वाले नहीं हैं | वैसे शरणार्थी समस्या वैश्विक स्तर पर सदैव विद्यमान रही है | मानवीय आधार पर उनके दर्द को महसूस करते हुए अनेक देश उन्हें पनाह  देते हैं |  सीरिया संकट के दौरान  लाखों शरणार्थी यूरोप और  कैनेडा तक जा पहुंचे | लेकिन जिन देशों ने तरस खाकर उनके रहने – खाने का इन्तजाम किया , वे ही  अब उनके आतंक से त्रस्त हैं | फ्रांस और जर्मनी के अलावा अन्य देशों में हुई हिंसक वारदातों के  पीछे ये शरणार्थी ही थे  | भारत के पूर्वोत्तर राज्य विशेष रूप से असम , त्रिपुरा और प. बंगाल में तो बांग्लादेशी अब राजनीतिक संतुलन बनाने – बिगाड़ने लगे हैं | बिहार के कुछ इलाके भी इनके कारण ऐसे हो गये हैं जहां से गैर मुस्लिम चुनाव जीत ही नहीं सकता | रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों द्वारा अनेक स्थानों पर फैलाया गया आतंक  आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है | कुल मिलाकर देखें तो भारत की भौगोलिक स्थिति के कारण पड़ोसी देशों में होने वाली किसी भी प्रकार की गड़बड़ हमारे लिए शरणार्थी समस्या लेकर आती है | नेपाल और चीन की सीमा भी सटी हुई है लेकिन मजाल है कि एक भी नेपाली भागकर चीन चला जाये | जिन देशों की चीन खुलकर मदद करता है उनके एक भी नागरिक को अपने यहाँ बसाने के अनुमति वह नहीं देता | अफगानिस्तान में तालिबानी राज आते ही वहां से निकले हिन्दू और सिखों के लिए पाकिस्तान में कोई जगह नहीं थी , लिहाजा वे भारत आ गये | पाकिस्तान में सताए जाने वाले गैर मुस्लिम भी भारत में ही ठिकाना पाते हैं | बांग्ला देश , म्यांमार आदि से अवैध रूप से घुसपैठ लगातार  होती ही रहती है | लेकिन भारत से कितने मुस्लिम हाल के वर्षों में पाकिस्तान की शरण में गये , ये बड़ा सवाल है | इसी तरह प. बंगाल , असम और त्रिपुरा में रहने वाला शायद ही कोई मुस्लिम बांग्ला देश गया हो | यही हाल तमिलनाडु का है जहां से विवाहोपरांत कुछ लड़कियां भले ही श्रीलंका चली जाती हों अन्यथा दक्षिण भारत के राज्यों से कोई श्रीलंका जाकर नहीं बसता | इस प्रकार देखें तो हमारे देश में करोड़ों नागरिक ऐसे हैं जो शरणार्थी बनकर आये किन्तु वापिस नहीं गये | मानवीयता के लिहाज से शरण देना बहुत ही नेक काम है लेकिन ये शरणार्थी कालान्तर में बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों की तरह आर्थिक बोझ के साथ आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन जाते हैं | श्रीलंका के वर्तमान संकट में भारत का सहयोगात्मक रवैया हर दृष्टि से उचित है किन्तु तमिलनाडु में आ  रही शरणार्थियों की भीड़ यहीं की होकर न रह जाये , ये सतर्कता रखनी होगी क्योंकि स्टालिन सरकार का रवैया इस बारे में बेहद गैर जिम्मेदाराना लगता है जो उनकी पैतृक परम्परा है | गौरतलब है शरणार्थियों के मामले में भारत के साथ  सदैव हवन करते हाथ जलने वाली कहावत चरितार्थ होती रही है | इस बारे में ये बात बेहद महत्वपूर्ण है कि कश्मीर से निकाले गये हिन्दू पंडितों को तीन दशक बाद भी वहां लौटकर बसने का अवसर नहीं मिला लेकिन म्यांमार से आये उन रोहिंग्या मुस्लिमों को उमर अब्दुल्ला की  सरकार ने वहां रहने की इजाजत दे दी जिनकी भारत विरोधी सोच जग जाहिर है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 April 2022

सामयिक चेतावनी : वरना हमारे हालात भी श्रीलंका जैसे हो जायेंगे


ऐसी खबरें अक्सर भीड़ में खो जाया करती हैं जबकि इनका सम्बन्ध वर्तमान के साथ ही भविष्य से भी होता है | इसी तरह की एक खबर सुर्ख़ियों से दूर रही जो कि मौजूदा हालात में बेहद विचारणीय है | प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के सचिवों की बैठक ली , जो चार घंटे चली | इसमें नए वित्त वर्ष की दृष्टि से विभिन्न विभागों के कामकाज की समीक्षा भी की गई | बैठक में अनेक अधिकारियों ने विभिन्न राज्यों में जारी  लोक - लुभावन योजनाओं के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी कि उनकी वित्तीय स्थिति उन घोषणाओं का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है और इस सिलसिले को नहीं रोका जाता तब आने वाले समय में हमारे देश में भी श्रीलंका जैसा आर्थिक संकट उत्पन्न होने का खतरा है | अनेक सचिवों ने हाल ही में संपन्न कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए किये गये वायदों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव जीतने के लिए मुफ्त उपहारों के ऐलान इन  राज्यों की  वित्तीय स्थिति को देखते हुए  आने वाले समय में ऐसा बोझ  होंगे  जिन्हें  उठाने में सरकारों के कंधे झुक जायेंगे | हालाँकि ये पहला अवसर नहीं है जब इस तरह की चिंता जताई गई हो | वित्तीय विशेषज्ञ समय – समय पर  इस बारे में आगाह करते रहे हैं | लेकिन हमारे देश में चुनाव भी  पूरी तरह बाजारवादी व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं जिनमें मतदाता को उपभोक्ता और चुनाव को डिस्काउंट सेल का रूप दिया जाने लगा है | इस तरीके से  पार्टियां चुनाव जीतने में तो कामयाब हो जाती हैं लेकिन वायदों को पूरा करने के लिए उन्हें जो कर्ज लेना पड़ता है उसकी अदायगी के लिए जनता पर भारी करारोपण किया जाता है | इसका सबसे ज्वलन्त उदाहरण है पेट्रोल और डीजल |  अधिकृत जानकारी के अनुसार देश के विभिन्न राज्यों में इन पर न्यूनतम 45 और अधिकतम 52 फीसदी तक कर लगाया जा रहा है | जबकि जीएसटी में विलासिता की वस्तुओं पर भी अधिकतम 28 फीसदी का प्रावधान है | इसीलिये कोई भी राज्य पेट्रोल – डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाने के लिए राजी नहीं होता | केन्द्रीय सचिवों द्वारा प्रधानमंत्री को जो सलाह दी गई  उससे वे कितने सहमत होते हैं ये तो आने वाला समय ही बताएगा क्योंकि वे स्वयं भी अपनी पार्टी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं और केंद्र की सत्ता में आने के बाद उन्होंने भी अनेक ऐसी योजनाएं शुरू कीं जिनकी वजह से भाजपा को जबरदस्त चुनावी फायदा होता है | उ.प्र के हालिया चुनाव में मुफ्त राशन और आवास बड़ा मुद्दा बना रहा क्योंकि कोरोना काल में उत्पन्न विषम परिस्थितियों में जिन करोड़ों लोगों के सामने रोजी – रोटी का संकट आ खड़ा हुआ , उनके भोजन का प्रबंध हो जाने से देश अराजकता से बच गया | जहां तक आवास का प्रश्न है तो वह बेघरबार लोगों की बदहाली दूर कर जीवन स्तर को उठाने के लिए मूलभूत आवश्यकता है | गरीबों को पाँच लाख तक के मुफ्त इलाज जैसी सुविधा भी औचित्यपूर्ण है किन्तु इसके अलावा ऐसी अनेक योजनाएँ हैं जिनसे लोगों का फायदा कम और राजनीतिक दलों का ज्यादा हो रहा है | लेकिन मुफ्त और सस्ती बिजली को लेकर होने वाले चुनावी वायदे सता में आने के बाद गले की फांस बन जाते हैं | केन्द्रीय सचिवों को इस बात के लिए बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने  प्रधानमंत्री के समक्ष इस तरह की बातें कहने का साहस दिखाया वरना आम तौर पर नौकरशाही का रवैया यस सर कहने का होता है | ये चेतावनी ऐसे समय दी गई जब हमारे पड़ोसी देश श्री लंका में आर्थिक आपात्काल की स्थिति बन चुकी है |  विदेशी कर्ज लेकर उसे  अनुत्पादक योजनाओं में खर्च करने के कारण ही इस तरह की स्थितियां बनती हैं | सौभाग्य से अभी भारत में श्रीलंका जैसी नौबत नहीं आई है लेकिन आर्थिक प्रबंधन पर राजनीति का अतिक्रमण इसी तरह बढ़ता रहा तो देर - सवेर वैसा होना असम्भव भी नहीं होगा | ये देखते हुए देश के वरिष्ट नौकरशाहों द्वारा प्रधानमंत्री को जिस तरह से आगाह किया गया उस पर गम्भीरता के साथ चिंतन किया जाना चाहिए | यद्यपि श्री मोदी इस बारे में बेहद सचेत और व्यवहारिक हैं जिसके लिये उनकी सरकार को आलोचना भी झेलनी पड़ती है । दरअसल किसी भी सरकार को ये  देखना चाहिए कि उनकी आर्थिक नीतियों का दीर्घकालीन असर क्या होगा क्योंकि  उसके द्वारा लिये गए कर्ज की अदायगी अगली सरकार को करनी ही पड़ती है  | समय आ गया है जब पड़ोसी के घर में लगी आग से सतर्क होकर हम अपने घर को उस तरह की आपदा से बचाए रखने का ठोस इंतज़ाम करें | आज देश जिस स्थिति में है वह सतही तौर पर तो संतोषजनक प्रतीत होती है लेकिन विदेशी कर्ज का बोझ चिंतित करने के लिए पर्याप्त है | कोरोना के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस तरह से वापसी की वह निश्चित तौर पर उत्साहवर्धक है | नीति आयोग ने भी विकास दर को लेकर राहत का संकेत दिया | वहीं निर्यात में वृद्धि के साथ ही घरेलू मांग और उत्पादन में समुचित वृद्धि से निराशा के काले बादल छंटने में देर नहीं लगेगी | लेकिन भारत में संघीय व्यवस्था होने से राज्यों को अपने आर्थिक नियोजन में काफी हद तक  स्वायत्तता प्राप्त है | इसी के चलते मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए ऐसी योजनाओं का संचालन किया जाता है जिनकी वजह से खजाना खाली होने पर अनाप – शनाप कर लगाकर जनता का शोषण किया जाता  है | इन्हीं सबका परिणाम है कि सरकार को निजीकरण और विनिवेश जैसे कदम उठाने मजबूर होना पड़ रहा है | इस बारे में ये भी ध्यान रखने वाली बात है कि विदेशी पूंजी पर एक हद से ज्यादा   निर्भरता कर्ज के बोझ को असहनीय बना देती है जिसका ताजा उदाहरण श्रीलंका है | विश्व व्यापार संगठन बनने के बाद से समूची दुनिया को जिस तरह बाजार में बदलने की कवायद चली है उसके कारण अनेक विकासशील देशों की आर्थिक स्वतंत्रता खतरे में आ गई है |  ऐसे में भारत को बेहद सावधानी बरतनी होगी क्योंकि हमारे देश की राजनीति भी आर्थिक वास्तविकताओं से दूर वोट बटोरने पर जिस तरह केन्द्रित हो गयी है वह कालान्तर में मुसीबत का कारण बन सकती है |


-रवीन्द्र वाजपेयी

 

Saturday, 2 April 2022

सरकार की बढ़ रही कमाई जनता को मिल रही महंगाई



वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर जीएसटी संग्रह का जो मासिक आँकड़ा आया वह अब तक का उच्चतम है | मार्च में 1.42 लाख करोड़ रु. की राशि इस मद में आने का साफ़ संकेत है कि अर्थव्यवस्था तेज रफ़्तार में दौड़ने लगी है | पेट्रोल , डीजल के अलावा बिजली की खपत में वृद्धि से भी ये माना जा रहा है कि उपभोक्ता वर्ग की मांग पुरानी रंगत पर लौट आई है | ऑटोमोबाइल उद्योग विशेष रूप से कारों की बिक्री में बीते कारोबारी साल जिस तरह की वृद्धि हुई उसने निराशा दूर कर दी है वहीं मकानों की खरीदी में भी आशाजनक उछाल आया है | आयकर की वसूली भी लक्ष्य पार कर गई | सबसे सुखद बात ये है कि देश का निर्यात लगातार बढ़ता जा रहा है | कृषि क्षेत्र ने तो कोरोना काल में भी रिकॉर्ड उत्पादन करते हुए अपना जबरदस्त योगदान दिया | इन सब आधारों पर ये कहा जा सकता है कि कोरोना की काली छाया अब छंट चुकी है और भारतीय अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन आ गए हैं | वैश्विक परिस्थितियाँ भी इसमें अच्छा खासा योगदान दे रही हैं | कोरोना काल में जब  तमाम विकसित देश आर्थिक सम्पन्नता के बावजूद असहाय नजर आ रहे थे तब भारत अपनी 135 करोड़ आबादी के लिये दोनों समय भोजन का इंतजाम करने में सफल रहा | औसत दर्जे की चिकित्सा सुविधाओं के बावजूद मृत्युदर में आनुपातिक कमी के साथ रिकॉर्ड समय में कोरोना के टीके तैयार कर पूरी दुनिया में अपनी धाक और साख में आशातीत वृद्धि करने के साथ  उसने ये साबित कर दिया कि हम एक जिम्मेदार देश हैं जो मानवता पर आये भीषण संकट के समय पूरी दुनिया की मदद करने के लिए सामने आये | यही वजह रही कि चीन ने जहां विश्वसनीयता गंवाई वहीं  भारत के प्रति दुनिया का नजरिया सकारात्मक होता गया | जिसका प्रमाण ये है कि जब  समूचा विश्व लॉक डाउन के चपेट में सुस्त पड़ा था तब विदेशी निवेशक भारत के पूंजी बाजार में पैसा लगाने आगे आ रहे थे | यूक्रेन संकट के बाद हमारे देश से गेंहू का निर्यात बढ़ने के कारण किसानों को भी अप्रत्याशित लाभ हो रहा है | लेकिन उसके पहले  ही हमने चावल निर्यात में चीन को पीछे छोड़ने का कारनामा कर दिखाया | देश में राजमार्ग , फ्लायओवर  पुल , हवाई अड्डे , रेलवे स्टेशन आदि का काम जिस तेजी से चल रहा है उसकी वजह से भी अर्थव्यवस्था को पंख लग गये हैं | इसका सबसे बड़ा लाभ ये हुआ कि   परिवहन की नई संस्कृति ने जन्म लिया जिसका प्रमाण टोल टेक्स से  दैनिक वसूली में निरंतर हो रही वृद्धि है | बीते साल भारत ने घरेलू उड्डयन क्षेत्र में जो तरक्की की वह एक क्रन्तिकारी कदम साबित हुआ है | हवाई यात्रियों की संख्या में लगातार वृद्धि बदलते भारत का प्रमाणपत्र है | देश में यातायात का सबसे प्रमुख और सुलभ साधन रेल है | कोरोना काल में जब सब कुछ ठहरा हुआ था तब भारतीय रेल ने अपनी अधोसंरचना में अकल्पनीय सुधार करते हुए नई रेल लाइनें बिछाने के साथ ही पुराने पुलों के सुधार का काम भी सफलतापूर्वक कर डाला | विद्युतीकरण के तमाम लंबित प्रकल्प इस अवधि में पूरे किये जाने से रेल परिवहन में समयानुकूल सुधार संभव हो सका है | रेलवे स्टेशनों का उन्नयन करते हुए उनमें जनसुविधाओं का विकास भी उल्लेखनीय है | इन सबकी वजह से आम भारतीय का हौसला बुलंद हुआ और कोरोना की काली छाया हटते ही हर क्षेत्र में तेज गति से काम शुरू हो गया | आईटी सेक्टर में हमारी वैश्विक उपस्थिति पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गई है | रोजगार में आई गिरावट के कारण देश भर में जबरदस्त गुस्सा व्याप्त था लेकिन अर्थव्यवस्था के रफ़्तार पकड़ते ही इस क्षेत्र में भी सुधार परिलक्षित होने लगा है | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कोरोना काल के पहले जो हालात थे उनसे बेहतर स्तर पर हाल ही में विदा हुए  वित्तीय वर्ष में देश आ पहुंचा है |  लेकिन इसके साथ ही महंगाई आर्थिक विकास का वह नकारात्मक पक्ष है जिसकी वजह से आम जनता परेशान है | कोरोना काल में केंद्र सरकार ने जिस तरह गरीबों के लिए निःशुल्क अनाज की व्यवस्था की वह बेहद कारगर रही और उसकी वजह से देश अराजकता की चपेट में आने से बच गया , वरना जो स्थिति आज श्रीलंका में है वैसी ही हमारे देश में भी बन सकती थी |  बीते दो साल में  अकल्पनीय परेशानियों के बावजूद देश की जनता सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही | सरकार ने भी जितना बन सका किया लेकिन कोरोना का प्रकोप कम होने के बाद आम जनता के दैनिक उपयोग में आने वाली चीजों के दाम जिस तरह बढ़ते जा रहे हैं उससे  घरेलू बजट गड़बड़ा गया है | पेट्रोल – डीजल और रसोई गैस के दाम लगभग छह माह तक स्थिर रखे जाने के बाद  रोजाना बढ़ने लगे हैं | यूक्रेन संकट  की वजह से मची वैश्विक उथल पुथल की वजह से आर्थिक क्षेत्र में जबरदस्त अनिश्चितता है | बीते एक माह में ही  महंगाई ने जिस प्रकार से छलांग लगाई वह अप्रत्याशित भले न हो लेकिन असुविधाजनक तो है ही | ऐसे में केंद्र सरकार को ये देखना चाहिए कि वह मूल्य वृद्धि से परेशान समाज के उस वर्ग की दिक्कतों को दूर करने के लिए क्या करे जो ईमानदारी से कर चुकाने के बावजूद भी सरकारी योजनाओं का लाभार्थी नहीं है | हाल ही में सरकार ने अपने कर्मचारियों का महंगाई भत्ता जिस तरह बढ़ा दिया उसी तरह शेष  जनता को राहत देने के बारे में उसे गम्भीरता से सोचना चाहिए | इस बारे में उल्लेखनीय  ये है कि हमारे देश के लोगों में जबरदस्त सहनशक्ति है | दूसरी बात ये है कि मौजूदा समय में कांग्रेस के बहुत कमजोर होने से राष्ट्रीय स्तर पर सरकार का विरोध नजर नहीं आता | जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकारें हैं वे भी महंगाई के मुद्दे पर केंद्र को घेरने का साहस इसलिए नहीं दिखा पा रहीं  क्योंकि पेट्रोल – डीजल पर भारी – भरकम टैक्स लगाकर वे भी आम उपभोक्ता पर बोझ बढ़ाने से बाज नहीं आतीं | पेट्रोल –डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाने के लिए इसीलिये कोई भी राज्य तैयार नहीं है | हाल  ही में संपन्न पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा को जो सफलता मिली वह मतदाताओं की उदारता और व्यापक दृष्टिकोण का परिचायक है | लेकिन इसे स्थायी समर्थन नहीं माना जा सकता | अतीत में भी ऐसा देखा गया है जब मतदाताओं की राय कुछ महीनों बाद हुए चुनावों में पूरी तरह बदल गयी |  ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार को चाहिए कि वह गैर लाभार्थी वर्ग के लोगों  को भी राहत देने के प्रयास करे जिसकी बचत बीते दो वर्ष में कोरोना की भेंट चढ़ गयी | जब तक सरकार के अपने खजाने में आवक कम थी तब तक तो किसी भी प्रकार की अपेक्षा करना गैरवाजिब था लेकिन जब जीएसटी संग्रह सर्वकालिक ऊंचाई को छूने लगा है और आर्थिक मोर्चे से लगातार सुखद समाचार आ रहे हों तब महंगाई से हलाकान जनता के चेहरों पर मुस्कान लौटाने का प्रयास भी ईमानदारी से होना चाहिए | इस बारे में ये बात केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को ध्यान रखनी होगी कि उनकी जिम्मेदारी केवल उनके कर्मचारी ही नहीं बल्कि पूरी जनता है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 April 2022

पाकिस्तान और नेपाल के बाद चीन ने श्रीलंका को भी कर्ज की आग में झोंका



भारत के दक्षिण में हिंद महासागर  स्थित टापूनुमा देश श्रीलंका इन दिनों आर्थिक बदहाली का शिकार है | विदेशी मुद्रा भण्डार तेजी से घटते जाने से जरूरी चीजें खरीदने के लिए उसके पास पैसा नहीं है | चाय 100 रु. प्रति कप और पेट्रोल 300  रु. लिटर पर बिक रहा है | कागज की कमी के चलते परीक्षाएं तक रद्द करनी पड़ी हैं | चाय और मसालों के निर्यात के अलावा ये देश जरूरत की अधिकतर चीजें आयात करता  है | बौद्ध बहुल होने से इसे जापान , दक्षिण कोरिया जैसे देश काफी मदद देते रहे | संरासंघ से जुड़े अनेक संगठनों से मिलने वाला अनुदान भी इसकी आय का स्रोत  है | लम्बे समय तक तमिल उग्रवादियों द्वारा उत्पन्न गृहयुद्ध की स्थिति से उबरने के बाद वहां पुनर्निर्माण की प्रक्रिया तेजी से शुरू हुई | प्राकृतिक सौंदर्य के आकर्षण में पर्यटन भी तेजी से बढ़ा जिसके कारण अर्थव्यवस्था में सुधार देखा जाने लगा | लेकिन भारत से ईर्ष्या के चलते उसके अधिकतर  शासक चाहे – अनचाहे चीन के शिकंजे में फंसते चले गए | जिसने उसे भारी – भरकम कर्ज देकर विकास कार्यों के ठेके भी ले लिए |  इसके पीछे उसकी रणनीति दरअसल भारत की समुद्री सीमा पर आकर बैठने की थी | हम्बनटोटा बन्दरगाह लम्बे समय के लिए लीज पर लेने के बाद राजधानी कोलम्बो में बन रही पोर्ट सिटी का ठेका भी उसने राजपक्षे सरकार से हासिल कर लिया | इन दोनों प्रकल्पों के लिए भारत ने भी अपने प्रयास किये थे लेकिन श्रीलंका सरकार ने चीन को प्राथमिकता दी | गाल से कोलम्बो तक का राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने के अलावा भी चीन ने  अधिकतर विकास कार्य कर्ज देकर किये | शुरुवात में तो श्रीलंका की सरकार और जनता दोनों इस सबसे बहुत खुश हुए लेकिन जल्द ही चीन पेशेवर साहूकार की तरह पेश आने लगा | आय से ज्यादा कर्ज लेने के कारण देश का आर्थिक संतुलन गड़बड़ा गया | वहीं  दूबरे में दो आसाढ़ वाली स्थिति लेकर आ गया कोरोना | इसके कारण श्रीलंका के पर्यटन उद्योग की कमर टूट गयी जो अर्थव्यवस्था में 10 फीसदी  योगदान के साथ  विदेशी मुद्रा का सबसे आसान और प्रमुख स्रोत था | विदेशी पर्यटकों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही थी उसे देखते हुए कहा जाने लगा था कि आने वाले एक  दशक में यह देश थाईलैंड , मलेशिया और कुछ हद तक सिंगापुर को टक्कर देने लगेगा | भारत से  ही बड़ी संख्या में सैलानी वहां जाने लगे थे क्योंकि श्रीलंका घूमने में आने वाला खर्च अंडमान निकोबार से ज्यादा नहीं था | दक्षिण भारत के लोगों के लिए तो वैसे भी वह उनके किसी राज्य जैसा ही है | लेकिन भारत की कूटनीतिक कमजोरी के कारण इस देश में हमारे प्रति शंका का भाव दूर नहीं किया जा सका | तमिल राष्ट्र की जो मांग उठी और लिट्टे जैसे संगठन को तमिलनाडु की द्रमुक जैसी पार्टी ने   अघोषित समर्थन दिया उससे सिंहली मूल के बहुसंख्यक राजनेताओं के मन में ये बात घर कर गई कि लिट्टे के तमिल इलम नामक सशस्त्र संघर्ष के पीछे भारत की वही रणनीति है जो उसने पाकिस्तान को तोड़कर बांग्ला देश बनवाने के लिए अपनाई थी | स्व. राजीव गांधी की सरकार ने उस दौर में जिस तरह की  कूटनीति का परिचय दिया उसका दुखद परिणाम उनकी निर्मम  हत्या  के तौर पर सामने आया | सही मायनों में उनकी सरकार लिट्टे को लेकर बहुत ही भ्रमित रही | चीन ने उस स्थिति का लाभ लेकर लिट्टे को गोद में लेते हुए उसे धन और हथियार दोनों उपलब्ध कराए | हालांकि इसमें दो राय नहीं है कि राजपक्षे सरकार ने लिट्टे के खात्मे के लिए अभूतपूर्व दृढ़ता दिखाई | उन पर नरसंहार के आरोप भी लगे लेकिन विश्व जनमत की उपेक्षा करते हुए उन्होंने  राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी | लेकिन श्रीलंका के मन में भारत को लेकर असुरक्षा का भाव यथावत रहा जिसके चलते वह चीन के मोहपाश में फंसता गया | चीन द्वारा उसकी मदद करने का उद्देश्य  हिन्द महासागर में अपनी उपस्थिति को प्रभावशाली बनाये रखने के अलावा भारत की दक्षिणी सीमा के करीब आकर बैठना था जिसमें वह सफल हो गया | उसने श्रीलंका को भारत के विरुद्ध भरने में इस हद तक कामयाबी हासिल कर ली कि वह छोटी – छोटी बातों के लिए चीन की तरफ ताकने लगा | बीते कुछ समय से वहां राजपक्षे बंधुओं का एकछत्र राज है | उनके पहले की सरकार से भारत के सम्बन्ध सुधर रहे थे किन्तु चीन ने राजनीतिक अस्थिरता फैलाकर राजपक्षे की वापिसी करवा दी | ऐसा ही खेल वह नेपाल में सफलतापूर्वक रच चुका था | उस पहाड़ी देश के साथ भी भारत के संबंध शुरुवात से ही खराब रहे | वहां के हिन्दू राजवंश के विरुद्ध लड़ने वाले माओवादियों को भारत में शरण दी जाती थी | लेकिन  सत्ता में आने के बाद वे भी  भारत के साथ ऐलानिया दुश्मनी पर उतर आये | दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र होने के बाद भी नेपाल भारत के विरुद्ध क्यों गया ये यक्ष प्रश्न है जबकि आज भी लाखों नेपाली भारत में रोजी – रोटी कमा रहे हैं और फौज में भी उनकी भर्ती की जाती है | नेपाल की आर्थिक स्थिति भी बहुत ही डांवाडोल है | वहीं  देखते - देखते पाकिस्तान भी चीन के प्रभाव में रहते  – रहते दिवालिया होने के कगार पर आ गया | इस तरह गौर करने वाली बात ये है कि भारतीय उपमहाद्वीप के जो तीन देश चीन के हाथ में खेलने लगे वे सब आर्थिक तौर पर कंगाली की स्थिति में आ गये | बांग्ला देश उसके चंगुल में फंसने से बचे रहने के कारण  आर्थिक विकास के मार्ग पर तेजी से बढ़ रहा है | भारत के लिए श्रीलंका के मौजूदा हालात चिंता बढ़ाने वाले हैं क्योंकि पाकिस्तान और नेपाल को तो चीन ने हमारे विरुद्ध खड़ा कर ही दिया है और अब श्रीलंका भी  एक तरह से उसका कूटनीतिक  उपनिवेश बनने जा रहा है |    हालाँकि भारत पूरी तरह से इस कोशिश में है कि उसे आर्थिक संकट से उबार लिया  जाए | लेकिन जिस देश के पास ब्याज चुकाने तक के पैसे न हों उसका दोबारा खड़ा हो पाना आसान नहीं  है | देखने वाली बात ये होगी  कि भारत द्वारा दी जा रही मदद के बावजूद राजपक्षे सरकार चीन के चक्रव्यूह से निकल पाती है या नहीं ? अन्यथा हवन करते में हाथ जलने वाली कहावत चरितार्थ साबित होने का खतरा वैसा ही है जैसा राजीव सरकार के समय अनुभव हुआ | श्रीलंका में हालात जल्द न सुधरे तब भारत को शरणार्थी समस्या का सामना भी करना पड़ सकता है | कुल मिलाकर इस समुद्री पड़ोसी का आर्थिक संकट हमारे लिए भी नई मुसीबतें लेकर आ सकता है | चूंकि चीन वहां  कुंडली मारकर बैठा हुआ है इसलिए खतरा और भी अधिक है  | 

- रवीन्द्र वाजपेयी