Saturday, 16 April 2022

खाद्यान्न निर्यात खोल सकता है तरक्की के नए द्वार



आपदा में भी अवसर तलाशने वाले ही उस पर विजय हासिल कर पाते हैं | ये बात कोरोना काल के बाद के विश्व व्यापार में भारत की बढ़ती मौजूदगी से साबित हो रही है | हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कहा था कि  भारत दुनिया को खाद्यान्न उपलब्ध करवाने में सक्षम है | विशेष रूप से गेंहू के निर्यात पर उन्होंने जोर भी दिया | इस प्रस्ताव के पीछे निश्चित रूप से यूक्रेन संकट ही है | उल्लेखनीय है यूक्रेन और रूस गेंहू के सबसे बड़े निर्यातक हैं किन्तु युद्ध के कारण वे मुश्किल में पड़ गये | रूस पर जहां  अमेरिका सहित तमाम  देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये वहीं यूक्रेन में सब दूर तबाही का आलम है | ऐसे में गेंहू की आपूर्ति खतरे में पड़ने से भारत की तरफ सबकी निगाहें घूमने लगीं | अब तक उसके पड़ोसी देश ही मुख्य रूप से गेंहू के खरीददार थे लेकिन ताजा जानकारी के अनुसार मिस्र ने 10 लाख टन गेंहू भारत से खरीदने का सौदा किया है | चालू वित्त वर्ष में उसे 20 लाख टन की आपूर्ति और किये जाने के प्रयास जारी हैं |  यूक्रेन संकट के शुरू होते ही देश में गेंहू की कीमतों में जो उछाल आया उसकी वजह वैश्विक मांग ही है  | गत वर्ष हुए किसान आन्दोलन के दौरान इस बात का बड़ा प्रचार हुआ था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर होने वाली सरकारी खरीद का आंकड़ा उत्पादन की तुलना में बहुत ही कम होने से किसान को नुकसान उठाना पड़ता है | उस समय भी ये बात सामने आई थी कि खाद्यान्न उत्पादन तो साल दर साल बढ़ता जा रहा है लेकिन उस अनुपात में खपत न होने से किसान और सरकार दोनों के सामने समस्या पैदा होती है | अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में चूंकि हर  चीज के मानक तय रहते हैं इसलिए भी निर्यात करने में तरह – तरह की रुकावटें आती रही हैं | लेकिन कोरोना के बाद निर्यात को लेकर बनाई जा रही नीतियों में वैश्विक मानदंडों पर भी भारतीय खाद्यान्नों के खरे साबित होने पर ध्यान दिया जाने लगा | इसीलिये चीन की  अपेक्षा बीते कुछ समय से भारत से चावल निर्यात में काफी वृद्धि हुई | इसी तरह अफगानिस्तान से सामान्य रिश्ते न होने के बावजूद उसने हमारे गेंहू को पाकिस्तान पर तरजीह दी |  गौरतलब है कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े गेंहू उत्पादक होने के बाद भी बतौर निर्यातक हमारी हिस्सेदारी महज 1 प्रतिशत ही है जो कृषि प्रधान देश होने के नाते शोचनीय है | वाणिज्य मंत्रालय इसीलिये संभावित बाधाओं को दूर करने में जुट गया है और उस आधार पर  ये उम्मीद  बढ़ रही है कि  इस मौसम में भारत से एक करोड़ टन गेंहू विदेश जाएगा | यद्यपि इस कार्य में निजी क्षेत्र की कम्पनियाँ ही मुख्य भूमिका में रहेंगी जिन्होंने गेंहू उत्पादन में अग्रणी राज्यों पंजाब , हरियाणा और म.प्र में खरीदी शुरू भी कर दी है | ये स्थिति निश्चित तौर पर उम्मीदें जगाने वाली है | विशेष रूप से इसलिए क्योंकि किसी अन्य   वस्तु की अपेक्षा भारत में कृषि के बारे  में उपलब्ध  ज्ञान और अनुभव अकल्पनीय प्रगति में सहायक है | खेती के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक के आगमन के बावजूद हमारी  परम्परागत जैविक खेती गुणवत्ता के मापदंड पर वैश्विक अपेक्षाएं पूरी करने में सक्षम है | प्रधानमंत्री द्वारा गेंहू के निर्यात की बात  कहने पर किसान आन्दोलन के समर्थक के तौर पर केंद्र सरकार से रुष्ट चल रहे मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने तंज कसा कि क्या गेंहू प्रधानमंत्री का है ? अन्य कुछ किसान नेता भी गेंहू के निर्यात की संभावनाएं बढ़ती देख खीझ निकालते देखे गये | इसका कारण ये है कि निर्यात के लिए खाद्यान्न की खरीदी निजी कम्पनियाँ ही करेंगीं जिनके विरोध में किसान आन्दोलन के दौरान बहुत कुछ कहा गया | श्री मलिक ने भी अम्बानी और अडानी को श्री मोदी का मित्र बताकर अपनी भड़ास निकाली | लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो वैश्विक बाजारों में भारत के कृषि उत्पादों का जाना दूसरी हरित क्रांति का शुभारम्भ हो सकता है | किसानों की तमाम समस्याओं का हल भी निर्यात में वृद्धि से संभव होगा | सबसे बड़ी बात ये है कि कृषि उत्पादन में प्रति वर्ष रिकॉर्ड बढ़ोतरी होने से सरकारी खरीद और भंडारण बड़ी समस्या बनती जा रही है | किसान आन्दोलन के दौरान कुछ उद्योगपतियों द्वारा हरियाणा एवं पंजाब में बनाई गईं अत्याधुनिक गोदामों में तोड़फोड़ भी की गई | इसका कारण किसान नेताओं द्वारा किया गया ये प्रचार था कि सरकार कृषि उपज मंडियों को खत्म कर किसानों को व्यापारियों और उद्योगपतियों के शिकंजे में फंसाने जा रही है | लेकिन धीरे – धीरे उस प्रचार की हवा निकल गई | अब जबकि देश भर में सरकारी खरीद के साथ ही निजी कम्पनियाँ बड़े पैमाने पर गेंहूं की  खरीद करने में जुटी हुई हैं तब किसानों के लिए कोरोना काल के बाद का समय खुशखबरी लेकर आया है | यूक्रेन संकट जिस तरह से उलझता जा रहा है उसकी वजह से ये सोचना  गलत नहीं होगा कि ये स्थिति आगामी कुछ सालों तक जारी रहेगी | यूक्रेन में जिस पैमाने पर बर्बादी हुई उसे देखते हुए दोबारा खड़े होने में उसे लम्बा समय लगेगा , वहीं रूस और अमेरिकी गुट के देशों की शत्रुता जो रूप ले चुकी है उसे देखते हुए आर्थिक प्रतिबंध शीतयुद्ध की शक्ल अख्तियार करने की तरफ बढ़ रहे हैं | भारत के कृषकों के लिए ये स्वर्णिम अवसर है वैश्विक बाजारों में छा जाने का | यदि हम इन परिस्थितियों का लाभ ले सकें तो किसानों की मेहनत से उत्पन्न होने वाला अनाज वाकई सोना कहलाने लायक हो जाएगा | ये कहना गलत नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का जो दबदबा बढ़ा है उसके पीछे खाद्यान्न आत्मनिर्भरता का बड़ा योगदान है | सैन्य  सामग्री के लिए हम जरूर विदेशों पर निर्भर हैं लेकिन अपनी जरूरत से कहीं अधिक  अनाज भारत में पैदा  होने से अब हमें किसी भी संकट के समय उसकी किल्लत से नहीं  जूझना पड़ता | यूक्रेन संकट ने संभावनाओं के नए दरवाजे खोल दिये हैं | ऐसे में खाद्यान्न निर्यात को लेकर दिखाई दे रहे अवसर यदि  मूर्तरूप लेते हैं तो यह किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के साथ ही राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी सौगात से कम नहीं होगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 15 April 2022

दिग्विजय इस आरोप के प्रमाण दें वरना कांग्रेस को नुकसान होगा



म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की राजनीतिक प्रासंगिकता उनके विवादास्पद बयानों तक ही सीमित रह गई है | अपने राजनीतिक गुरु स्व. अर्जुन सिंह की कृपा से प्रदेश की सत्ता के शिखर तक पहुँचने के बाद यद्यपि उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल से दस साल तक बतौर मुख्यमंत्री बने रहने का कारनामा तो कर दिखाया लेकिन जब गुरु ने कांग्रेस से बगावत  कर तिवारी कांग्रेस बनाई तब दिग्विजय ने उनसे सुरक्षित दूरी बनाए रखी जिसके कारण अर्जुन सिंह सतना से लोकसभा चुनाव तक हार  गये | उनके राजनीतिक शिकारों में सबसे प्रमुख रहे स्व. माधवराव सिंधिया जिन्हें उन्होंने प्रदेश की राजनीति में हावी नहीं होने दिया | बावजूद इसके कि स्व. सिंधिया के गांधी परिवार से करीबी रिश्ते थे | इसी तरह कमलनाथ , जिन्हें वे अपना बड़ा भाई कहते थे ,  उनको भी उन्होंने झटका दिया | हवाला कांड में नाम आने के बाद स्व. पीवी नरसिम्हाराव ने श्री नाथ को लोकसभा चुनाव में छिंदवाड़ा से टिकिट न देकर उनकी पत्नी को लड़ाया , जो जीत भी गईं | दो साल बाद श्री नाथ ने उनसे त्यागपत्र दिलवाकर उपचुनाव लड़ा जिसमें वे भाजपा प्रत्याशी पूर्व मुख्यमंत्री स्व. सुन्दरलाल पटवा से हार गए | राजनीति के जानकार बताते हैं कि कमलनाथ के जीवन की उस इकलौती पराजय के पीछे दिग्विजयी रणनीति थी ताकि छिंदवाड़ा नरेश खुद को  अपराजेय समझना बंद करें | इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त किये हुए श्री सिंह से ये अपेक्षा थी कि म.प्र के माथे पर लगा बीमारू राज्य नामक दाग हटायेंगे किन्तु उनकी रूचि केवल राजनीतिक घात – प्रतिघात तक ही सीमित रही जिसकी वजह से प्रदेश पिछड़ेपन और बदहाली का शिकार होकर रह गया | 2003 में भाजपा ने जब बिजली , पानी और सड़क को चुनावी मुद्दा बनाया तो मतदाताओं पर उसका जबरदस्त असर हुआ और कांग्रेस ऐसी हारी कि  अगले 15 साल तक सत्ता से उसे दूर रहना पड़ा | 2018 में स्व. माधवराव के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया को चेहरा बनाने के कारण म.प्र में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन दिग्विजय ने एक बार फिर सिंधिया परिवार से खुन्नस निकालते हुए कमलनाथ की ताजपोशी करवा दी | उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य गुना की अपनी पुश्तैनी सीट से हार गये तो उसके पीछे भी राजनीतिक विश्लेषक दिग्विजय सिंह की भूमिका मानते हैं | हालांकि वे खुद भी कमलनाथ के बनाये जाल में फंसकर भोपाल में बुरी तरह हारे | लेकिन असली राजनीति तब शुरू हुई जब 2020 में होने वाले राज्यसभा  के चुनाव में श्री सिंधिया ने अपना दावा पेश किया तो एक बार फिर दिग्विजय बाधा बन गये | यद्यपि कांग्रेस दोनों सीटें जीतने की स्थिति में थी किन्तु श्री सिंधिया को डर था कि दिग्विजय भितरघात न करवा दें | और यहीं से उनके मन में कांग्रेस से अलग होने की बात आई जिसे भाजपा ने लपक लिया और नौबत  कमलनाथ की सरकार के पतन के साथ शिवराज सिंह चौहान की वापिसी तक आ पहुँची और ज्योतिरादित्य भाजपा से राज्यसभा में होते हुए मोदी मंत्रीमंडल में शामिल हो गये | इस प्रकार एक बार फिर दिग्विजय के कारण म.प्र में कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गयी | लेकिन उन्हें उसका कोई रंज नहीं है | इसीलिये वे आये दिन इस तरह के बयान दिया करते हैं जिनसे कांग्रेस शोचनीय स्थिति में आ जाती है | खरगौन के दंगे के बाद उनका एक ट्वीट विवादग्रस्त हो गया जिसमें उन्होंने बिहार की एक मस्जिद को खरगौन का बताने की गलती कर डाली | जिस पर उनके विरुद्ध अपराधिक प्रकरण भी दर्ज हो गया है | यद्यपि बाद में उन्होंने उस चित्र को अलग कर दिया | लेकिन उसके बाद भी वे रुके नहीं और नया बयान देते हुए भाजपा को दंगों के लिए जिम्मेदार बतलाकर एक तरफ तो ये स्वीकार किया कि देश में अनेक स्थानों में हुए हालिया दंगों में एक पैटर्न ( समानता ) नजर आता है किन्तु उसके साथ ये भी जोड़ दिया कि कुछ मुस्लिम संगठन हैं जो पूरी तरह भाजपा के साथ मिलकर सियासी खेल खेलते हैं | दरअसल इस बयान के जरिये वे एक तरह से दंगों के लिए जिम्मेदार माने जा रहे मुसलमानों को भाजपा के साथ जुड़ा बताकर भ्रम की स्थिति पैदा करना चाह रहे हैं | दरअसल राजस्थान के करौली में नवरात्रि के शुभारम्भ पर हिन्दू नववर्ष के उपलक्ष्य में निकली शोभा यात्रा पर हुए पथराव और उसके बाद भड़के दंगे के लिये वहां की कांग्रेस सरकार पर लग रहे आरोपों के बचाव में श्री सिंह ने दंगाई मुस्लिम संगठनों की भाजपा के साथ संगामित्ती का नया शिगूफा छोड़ दिया | वैसे असदुद्दीन ओवैसी को लेकर भी ये कहा जाता है कि वे मुस्लिम मतों में बंटवारा करवाकर भाजपा की मदद करते हैं | उ.प्र में बसपा पर भी ये आरोप लग रहे हैं कि वह भाजपा की बी टीम बनकर चुनाव लड़ी | लेकिन मुस्लिम संगठनों द्वारा भाजपा के साथ मिलकर सांप्रदायिक उपद्रव करवाने का यह  आरोप अपनी तरह का पहला है जो दिग्विजय जैसे नेता के दिमाग की उपज ही हो सकता है | सवाल ये है कि 10 साल तक प्रदेश की सत्ता के मुखिया रहे श्री सिंह के पास अपनी इस बात का कोई प्रमाण यदि है तब उसकी जानकारी वे सार्वजनिक क्यों नहीं कर रहे ? चूंकि  अपने संदर्भित बयान में उन्होंने किसी मुस्लिम संगठन का नाम नहीं लिया इसलिए ये संदेह होना गलत नहीं है कि वे एक बार फिर निराधार बात कहकर  असली दोषियों की तरफ से ध्यान हटाना चाह रहे हैं | जहां तक बात प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन पर आरोप लगाने की है तो राजनीतिक दृष्टि से ये  स्वाभाविक है परंतु किसी मुस्लिम संगठन के साथ मिलकर भाजपा द्वारा सांप्रदायिक उपद्रव करवाने जैसे  आरोप को हवा में उड़ा देना उचित नहीं होगा | ये देखते हुए श्री सिंह को अपनी बात के प्रमाण भी जाँच एजेंसियों को देना चाहिए | यदि वे ऐसा नहीं करते तब ये अवधारणा और मजबूत हो जायेगी कि उनमें दायित्वबोध और गंभीरता पूरी तरह लुप्त हो चुकी है | दंगों के जांचकर्ताओं को भी उनसे पूछताछ करनी चाहिए क्योंकि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री होने के अलावा वे संसद के उच्च सदन के भी सदस्य हैं और उस नाते अनेक संसदीय समितियों के सदस्य भी | खरगौन के दंगे को लेकर उनके जितने भी बयान आये , वे विपक्ष से अपेक्षित ही होते हैं लेकिन दिग्विजय द्वारा  मुस्लिम संगठनों का भाजपा के साथ जुड़ाव होने जैसी जो बात कही गई वह बेहद गम्भीर है और उसका खुलासा उनको करना ही होगा | कांग्रेस को भी अपने इस वरिष्ट नेता से उनके बयान का आधार पता करना चाहिए क्योंकि दिग्विजय सिंह द्वारा अतीत में कही गई इसी तरह की बातें पार्टी के लिए मुसीबत बनती रही हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 April 2022

छत पर पत्थर रखना किस धर्म का हिस्सा और पलायन एक ही पक्ष का क्यों



दंगे किसी भी समझदार व्यक्ति को शायद ही अच्छे लगते होंगे क्योंकि इसके पीछे जो लोग होते हैं उनको  तो कोई नुकसान नहीं पहुँचता लेकिन निरपराध लोगों को जान - माल की क्षति उठानी पड़ती है | इन्हें अंजाम देने वाले बेशक उपद्रवी और संकुचित मानसिकता के होते हैं जो कहलाते तो धर्मान्ध हैं लेकिन उन्हें न अपने मज़हब की समझ होती है और न दूसरे किसी की | दंगों की आग में रोटी सेंकने वालों का भी एक विशेष वर्ग है जिसे नेता नाम से जाना जाता है | हर दंगे के पीछे कुछ न कुछ कारण तो होता ही है | कभी कोई पुराना विवाद तो कभी तात्कालिक घटना वजह बन जाती है | राजनीतिक और निजी विवाद भी उनकी पृष्ठभूमि में होते हैं | दो धर्मों के अनुयायियों के बीच होने  वाले सांप्रदायिक दंगे के अलावा भी फसाद होते रहते हैं | हरियाणा में जाट  राजस्थान में  मीणा , गुजरात  और महाराष्ट्र में क्रमशः पटेल तथा मराठा आरक्षण के नाम पर हुए उपद्रवों ने  भी दंगों  का रूप ले लिया था  | दक्षिण  के अनेक राज्यों में भी क्षेत्रीय मुद्दों पर  दंगे की स्थिति बनती रही है | लेकिन भारत में हिन्दू – मुस्लिम दंगे शायद सबसे पुराने हैं जिनकी शुरुवात अंग्रेजों ने अपने स्वार्थवश  करवाई और उन्हीं के कारण धर्म के नाम पर देश को विभाजित किया गया  | उस समय देश का नेतृत्व कर रहे नेताओं को ये गलतफहमी थी कि पाकिस्तान बनने के बाद विवाद खत्म हो जायेगा | लेकिन ज़मीन का बंटवारा  होने के बावजूद जनसंख्या का हस्तांतरण धर्म के आधार पर पूरी तरह नहीं होने की वजह से ज़हर के बीज धरती के भीतर दबे रह गये जो थोड़ी सी भी नमी पाते ही अंकुरित होने लगते हैं जिससे  कभी किसी कारणवश और कभी अकारण ही दंगों की आग सुलग उठती है | 1947  में आजादी की तारीख तय होते ही जिस बड़े पैमाने पर दंगे हुए वे इस बात का संकेत थे कि बंटवारा भले ही किसी समस्या के हल के तौर पर स्वीकार किया गया लेकिन वह अपने पीछे अनेक समस्याओं को छोड़ गया | कश्मीर को कबायली हमले के बाद भारत में  विलय के समय विशेष दर्जा देने जैसा फैसला  कालान्तर में कितनी  बड़ी मुसीबत बना , ये किसी से छिपा नहीं है | उस प्रावधान के कारण भले ही भारत के अन्य राज्यों के मुसलमान वहां जाकर बसने के अधिकार से वंचित रहे लेकिन कश्मीर में जिस अलगाववाद की भावना शेख अब्दुल्ला द्वारा रोपित की गई उसने शेष भारत के मुस्लिम समुदाय को भी कुछ हद तक तो आकर्षित किया ही | गलतियां और भी होती रहीं | विशेष रूप से वोटों    की खातिर किये जाते रहे तुष्टीकरण ने मुस्लिमों को समाज  की मुख्यधारा से दूर करने का जो अक्षम्य अपराध किया उसकी सजा आज देश भोग रहा है | दंगे होते हैं और कुछ दिन बाद सब भुला दिया जाता है लेकिन उनके कारणों और उनके लिए जिम्मेदार ताकतों की अनदेखी किये जाने से उनकी पुनरावृत्ति रोकना संभव नहीं होता | धर्म निरपेक्षता की आड़ में जिस अल्पसंख्यकवाद को  बढ़ावा दिया गया उसने समन्वय के स्थान पर संघर्ष की बुनियाद रखी | ये बात बिना किसी संकोच के कही जा सकती है कि राजनीतिक संरक्षण न हो तो दंगे करने का दुस्साहस कोई नहीं कर सकता | दुर्भाग्य से देश का मुस्लिम समुदाय राजनेताओं के बहकावे में आकर विकास की दौड़ में पीछे रह गया और उससे उत्पन्न कुंठा उसमें  अलगाववाद की  भावना को भडकाने का काम करती रहती है | उसके अलावा वे मुल्ला - मौलवी भी अपनी कौम की सत्यानाशी के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं जिन्होंने आधुनिक शिक्षा के बजाय युवा पीढ़ी को भी कालातीत हो चुकी रूढ़ियों में जकड़े रहने के लिए प्रेरित किया | मजहबी शिक्षा का अपना महत्व  है लेकिन उसके साथ ही प्रगतिशील सोच भी समय की मांग है जिसके अभाव में मुस्लिम समाज में धर्मान्धता का बोलबाला है | दंगों के समय दोनों पक्षों से आरोप – प्रत्यारोप का चिर परिचित दौर चला करता है किन्तु विचारणीय प्रश्न ये है कि छतों पर पत्थर जमा करना किस धर्म का हिस्सा है ? इससे  संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं आक्रामकता को स्वभावगत बनाने का षडयंत्र भी रचा जा रहा है | दूसरी बात ये भी देखने में आ रही है कि  कश्मीर , कैराना  करौली अथवा खरगौन जहां कहीं भी दंगे हुए वहां एक समुदाय विशेष को ही पलायन करना पडा है | कभी – कभी तो ये लगता है कि जिस तरह कश्मीर घाटी से पंडितों को योजनाबद्ध तरीके से खदेड़कर भगाया गया वही शैली अन्य दंगाग्रस्त  स्थानों में भी देखने मिली | ये स्थिति वाकई शोचनीय है कि अतीत में हुए दंगों के बाद उन बस्तियों से मकान बेचने या पलायन करने  जैसी बात नहीं सुनाई दी जहां हिन्दू – मुसलमान अगल - बगल  रहते थे |  लेकिन बीते कुछ दिनों में जो दंगे हुए उन सभी में हिन्दुओं के जुलूसों पर छतों से पथराव किये जाने की एक जैसी शैली देखने मिली  | मकान बेचकर उस बस्ती से पलायन करने का तौर - तरीका भी कश्मीर घाटी से पंडितों के निकल भागने जैसा ही  है | ये चलन निश्चित तौर पर खतरनाक संकेत है | शांतिपूर्ण जीवन जीने वाले अपने घरों में पत्थर और घातक हथियार भला क्यों रखेंगे ये बड़ा सवाल है | दंगों के बाद उपद्रवी तत्वों के घर और दुकानें जमींदोज करने की  कार्रवाई  पर ये आरोप भी लग रहे हैं कि उसमें पक्षपात हो रहा है |  ऐसा लगता है समुदाय विशेष के लोगों को छतों पर पत्थर जमा करने की प्रेरणा आतंकवाद के दिनों में कश्मीर घाटी में  सुरक्षा बलों पर की जाने वाली पत्थरबाजी से मिली होगी | लेकिन इसे रोकने के लिए शायद ही कोई धर्मगुरु या राजनीतिक नेता सामने आया हो | करौली और खरगौन के दंगों में छतों से चले पत्थर और हिन्दुओं का साझा बस्तियों से पलायन अपने आप में काफी कुछ कह जाता है | जो मौलवी और दिग्विजय सिंह जैसे नेता शासन और प्रशासन पर दोषारोपण कर रहे हैं उन्हें इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए कि दंगों के सम्बन्ध में पत्थर और पलायन का संयोग स्थायी रूप कैसे लेता जा रहा है ? सवाल और भी हैं जिनका जवाब तलाशे बिना दंगों की पुनरावृत्ति रोकी नहीं जा सकेगी क्योंकि दंगों के बहाने देश को भीतर से कमजोर करने की कोशिश किसी बड़ी योजना का हिस्सा है | दिल्ली में हुए दंगों के समय भी छतों से पत्थर फेंके जाने की शिकायतें सामने आई थीं | लेकिन करौली और खरगौन के दंगों के बाद बहुत कुछ साफ हो गया है | शासन और प्रशासन को इस नई शैली की तरफ ध्यान देना चाहिए जिससे शरारती मानसिकता को और प्रसारित होने से रोका जा सके | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 13 April 2022

सबका विश्वास जीतने राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री का एक संबोधन महंगाई पर भी अपेक्षित है



बीते कुछ महीनों में जीएसटी वसूली के आंकड़े उत्साहित करने वाले रहे हैं | 31 मार्च को समांप्त हुए वित्तीय वर्ष में प्रत्यक्ष कर से हुई आय भी उम्मीद से बेहतर हुई | इन सबसे ये विश्वास प्रबल हुआ कि अर्थव्यवस्था कोरोना के चंगुल से बाहर आ चुकी है | बीते कारोबारी साल में विकास दर भी वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए बहुत ही उत्साहवर्धक रही | कोरोना के दौरान सरकार का पूरा ध्यान महामारी से जूझने में लगा रहा जिससे विकास कार्य अवरुद्ध होने लगे थे किन्तु जैसे ही स्थितियां सामान्य हुईं , लंबित प्रकल्पों में गति आने लगी | सरकारी खर्च बढ़ने का अनुकूल असर बाजार पर भी पड़ा | मांग बढ़ने से जहाँ उत्पादन इकाइयों को भी राहत मिली वहीं  उपभोक्ता वर्ग  लगभग दो साल की सुस्ती के बाद उत्साह से भरा हुआ नजर आने लगा | कार और दोपहिया वाहनों की बिक्री में आया उछाल इसका प्रमाण है | जैसी खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक जमीन  – जायजाद के व्यवसाय में बीते  कुछ समय से चली आ रही सुस्ती तकरीबन दूर हो चुकी है जिसके परिणामस्वरूप बिल्डरों ने भी जोर शोर से अपना रुका पड़ा कारोबार शुरू कर दिया है | सबसे सुखद बात ये है कि कोरोना काल में बेरोजगारी का जो संकट आया था वह तेजी से दूर होने लगा है | निर्माण क्षेत्र के साथ ही उत्पादन इकाइयों के गतिशील होने से श्रमिक वर्ग को जहां राहत मिली वहीं सरकारी और निजी क्षेत्र में भी नई नौकरियाँ लगातार निकलने से शिक्षित युवाओं के मन में व्याप्त निराशा कुछ तो कम हुई है | कोरोना के दौरान टीकाकरण जिस सफलता के साथ किया गया उससे आम जनता में सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है | 80 करोड़ लोगों को निःशुल्क अनाज देने की योजना जिस सफलता के साथ संचालित हो रही है उसकी चर्चा पूरी दुनिया में है | इसके जरिये  दुनिया में ये सन्देश गया कि भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर होने के साथ ही आत्मविश्वास से भी भरपूर है | इसका ताजा प्रमाण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा  अमेरिका के   राष्ट्रपति जो. बाईडेन को  आभासी माध्यम पर हुई बातचीत के दौरान दिया गया यह प्रस्ताव है कि विश्व व्यापार संगठन अनुमति दे तो भारत दुनिया को खाद्यान्न की आपूर्ति करने तैयार है | उल्लेखनीय है यूक्रेन संकट के कारण विश्व भर में खाद्यान्न की किल्लत हो गई है | भारत का निर्यात हाल के महीनों में तेजी से बढ़ने से  शेयर बाजार भी यूक्रेन संकट से लगे झटके से उबरता दिख रहा है | हमारे  आईटी सेक्टर का जादू तो पूरी दुनिया के सिर पर चढ़कर बोल ही रहा है लेकिन अब दवाइयों के निर्यात में भी भारत काफी तेजी से आगे आया है | कोरोना का टीका जिस रिकॉर्ड समय में हमारे यहाँ तैयार हुआ उसने भारत की प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि की | ये भी गौरतलब है कि दवाइयां बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल का उत्पादन देश में ही करने की दिशा में जो प्रयास हो रहे हैं उनका अच्छा परिणाम देखने आया है | जेनेरिक दवाइयों की दुकानें तेजी से खुलने से भी आम उपभोक्ता को बहुत राहत है | कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था पर लगा कोरोना रूपी ग्रहण छंट चुका है और उसी  वजह से आगामी सालों में आर्थिक प्रगति के अनुमान  सुखद भविष्य का संकेत दे रहे हैं | लेकिन तमाम  खुशनुमा एहसासों के बावजूद महंगाई जिस तरह से बढ़ रही है उसने आम जनता को हलाकान कर रखा है | पांच राज्यों के हालिया चुनावों में भी ये  मुद्दा काफी गरमाया किन्तु प्रधानमंत्री के प्रति जनता के मन में जो विश्वास बना हुआ है उसकी वजह से भाजपा ने मैदान मार लिया | लेकिन  दीपावली से पेट्रोल – डीजल की जो कीमतें स्थिर रखी गईं थीं , होली आते ही उनमें जिस तरह का उछाल लगातार आ रहा है उसकी वजह से परिवहन खर्च बढ़ने का असर सभी चीजों के दामों पर हो रहा है | रही – सही कसर पूरी कर दी रूस और यूक्रेन   के बीच चल रही लड़ाई ने | महंगाई के जो ताजा आंकड़े आये हैं उनकी मार सबसे ज्यादा निम्न और गैर सरकारी नौकरी वाले मध्यम वर्ग पर पड़ रही है | इस तबके का घरेलू बजट जिस तरह गड़बड़ाया वह चिंता का विषय है क्योंकि बीते दो साल में जो बचत थी वह भी खत्म हो चुकी है | कोरोना काल में शिक्षण संस्थाएं बंद रहने से अभिभावकों पर फ़ीस का भार तो था लेकिन बच्चों को विद्यालय या महाविद्यालय भेजने में होने वाले खर्च की जो बचत थी वह भी अब नहीं रही | संक्षेप में कहें तो कोरोना के बाद महंगाई दोहरी मुसीबत के तौर पर आ खड़ी हुई | यूक्रेन संकट की वजह से खाद्य तेलों के अलावा आयात होने वाली अन्य चीजों के दाम तो बढ़े ही किन्तु देश के भीतर  भरपूर मात्रा में  उत्पन्न होने वाली रोजमर्रे की चीजें जिस तेजी से महंगी होती जा रही हैं उससे अर्थव्यवस्था संबंधी उत्साहजनक दावों को लेकर विरोधभास की स्थिति पैदा हो रही है | हालांकि  महंगाई का कोई एक विशेष कारण तय कर पाना संभव नहीं है क्योंकि अर्थव्यवस्था किसी एक चीज से ही प्रभावित नहीं होती | ये संतोष का विषय है कि कोरोना जैसी विषम परिस्थिति के बावजूद देश की जनता का प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता पर विश्वास कायम है | लेकिन भारत के पड़ोस में श्रीलंका , नेपाल और पाकिस्तान का आर्थिक ढांचा जिस तरह से चरमरा गया है उसे लेकर हमारे यहाँ भी आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं | सरकार के सचिव तक श्री मोदी को समझाइश दे चुके हैं कि बिना ठोस आर्थिक प्रबंधन के किये जाने वाले चुनावी वायदों से हमारे देश में भी उक्त पड़ोसियों जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं | प्रधानमंत्री की कार्यशैली दूरगामी सोच पर आधारित होने से ये विश्वास करना गलत नहीं है वे आर्थिक क्षेत्र को लेकर गम्भीर होंगे | लेकिन जिस तरह उन्होंने कोरोना के हमले से बचाव हेतु लॉक डाउन लगाते समय और बाद में अनेक बार राष्ट्र के नाम सन्देश के जरिये देशवासियों को  ये भरोसा दिलाया कि संकट की उस घड़ी में सरकार उनके साथ खडी है , वैसी ही जरूरत आज महंगाई के विषय को लेकर है | मूल्य वृद्धि  के वाजिब कारण और मजबूरियों पर यदि वे  जनता के सामने अपनी बात रखेंगे तो उससे आशंका और कुशंका के साथ ही भ्रम की स्थिति का निराकरण तो होगा ही लेकिन उससे भी बढ़कर जनता की ये शिकायत भी दूर हो सकेगी कि सरकार वोट लेने के बाद उसे उसके हाल पर छोड़ देती है | यदि श्री मोदी अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति और भावी संभावनाओं से देश को अवगत करायें तो वातावरण में व्याप्त भय दूर किया जा सकेगा | उनसे ये अपेक्षा भी है कि  मूल्य वृद्धि से त्रस्त समाज के उस वर्ग को राहत देने की दिशा में भी कुछ करें जो सरकार द्वारा चलाई जा रही जनकल्याण योजनाओं से वंचित रहने से लाभार्थी की श्रेणी में शामिल नहीं है | यदि वे ऐसा करें तब सबका साथ , सबका विकास और सबका विश्वास का नारा अपनी सार्थकता साबित कर सकेगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 12 April 2022

दंगाइयों के घरोदों पर बुलडोजर चलाने से जरूरी है उनके इरादों को कुचलना



राम नवमी के अवसर पर निकाली जाने वाली शोभायात्रा कोई नई बात नहीं है | लेकिन इस वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों से उन पर पथराव और उसके बाद सांप्रदायिक दंगे होने की जो खबरें आईं वे चिंता में डालने वाली हैं | आतंकवाद के चरमोत्कर्ष के दिनों में कश्मीर घाटी में हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता मरहूम सैयद अली शाह गिलानी ने वहां के बेरोजगार नौजवानों को पैसों का लालच देकर सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने के लिए उकसाया | बाद में ये काफी आम हो गया और एक समय तो ऐसा आ गया जब लड़कियां तक पत्थरबाज बन गईं | राजधानी दिल्ली में दो वर्ष पूर्व हुए सांप्रदायिक  दंगों में भी दंगाइयों के घरों की छतों से पथराव की घटनाएँ हुईं | तलाशी लिए जाने पर पत्थरों के साथ ही हथियार भी बरामद हुए | नवरात्रि के पहले दिन हिन्दू नववर्ष के उपलक्ष्य में  राजस्थान के करौली में निकाली गई परम्परागत शोभा यात्रा पर एक क्षेत्र विशेष में छतों से पथराव होने के बाद बाकायदा लाठियों  और तलवारों से हमला किया गया और उसके बाद वही सब हुआ जो सांप्रदायिक दंगों  के दौरान देखने मिलता है | उस उपद्रव की आग अभी भी ठंडी नहीं हुई  है | दूसरी ओर देश के कुछ  शहरों से जो चित्र देखने आये उनमें हिन्दुओं के  धार्मिक जुलूसों पर मुस्लिम समुदाय के लोग पुष्पवर्षा करते भी दिखे | इस पर कहा गया कि बदलती हुई राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह समाज भी कट्टरता छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने आगे आने लगा है  | हालाँकि उ.प्र के हालिया चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं के थोक के भाव भाजपा के विरोध में लामबंद होने की बात भी  किसी से छिपी नहीं है | मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर में जिस मठ के महंत हैं उसके परिसर में एक मुस्लिम युवक द्वारा हथियार लेकर उत्पात मचाने के बाद ये माना जाने लगा कि ये चुनावी हार से उपजी हताशा का प्रगटीकरण था | बाद में पता चला कि वह युवक जाकिर नाइक का अनुयायी है जो मुस्लिम समाज के बीच भड़काऊ भाषण देने के लिए कुख्यात थे और गिरफ्तारी से बचने के लिए मलेशिया में शरण लिए बैठे हैं | करौली के दंगे में एक बात  साफ़ हो गई कि हिन्दुओं के जुलूस पर किया गया हमला पूर्व नियोजित था | फिर भी उसे स्थानीय घटना मान लिया गया | लेकिन म.प्र में खरगौन के साथ गुजरात , बिहार और अन्य कुछ राज्यों में अनेक स्थानों पर राम नवमी की  शोभा यात्रा पर जिस तरह पथराव किये जाने के साथ ही धारदार  हथियारों से हमले किये गये वे इस संदेह की पुष्टि करते हैं कि इन वारदातों के पीछे कोई न कोई संगठित सोच काम कर रही है | वरना इन सबका स्वरूप एक समान न होता | जुलूस मार्ग पर स्थित घरों की छतों पर पत्थर जमा करने वालों का मकसद अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है | उ.प्र में सीएए विरोधी दंगाइयों द्वारा सार्वजनिक संपत्ति को  पहुंचाई गयी क्षति की वसूली उनसे की गयी थी |  उसके बाद  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपराधी तत्वों के निर्माणों पर बुलडोजर चलाने का निर्णय किया जो विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बन गया | देखासीखी अन्य  राज्यों ने भी उस तरीके को अपनाया जिनमें म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अग्रणी हैं | म.प्र में इन दिनों अपराधी सरगानाओं  के अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाये जाने का अभियान चल रहा है | खरगौन में राम नवमी जुलूस पर पथराव के बाद जो  सांप्रदायिक दंगा हुआ उसके आरोपियों की पहिचान करते हुए उनके घरों और दुकानों को ज़मींदोज किया जा रहा है  | ऐसी  कार्रवाई का उद्देश्य दंगा करने वालों को सबक सिखाना होता है | इसका असर भी हुआ  जिसके प्रमाण देश के अनेक हिस्सों में हिन्दुओं के जुलूसों का मुस्लिम समुदाय द्वारा स्वागत किये जाने से मिले हैं  | ये भी सुनने में आने लगा है कि उ.प्र के चुनाव के बाद वहां  के मुस्लिम समाज में इस बात को लेकर मंथन चल पडा है कि कुछ  राजनीतिक दलों के बहकावे पर भाजपा का अँधा विरोध करने से उन्हें हासिल तो कुछ हुआ नहीं , उल्टे हिन्दू समाज  का ध्रुवीकरण हो गया | राष्ट्रीय स्तर पर भी इस तरह की सोच  एक तबका रखने लगा है लेकिन धार्मिक दबाव के आगे उसकी आवाज दबी रह जाती है | ऐसे में जरूरत इस बात की है कि बुलडोजर दंगाइयों के घरोंदों पर ही नहीं अपितु उन इरादों पर चलाये जाएँ जो आज भी मुस्लिम लीग की उस विचारधारा से प्रेरित और प्रभावित हैं जिसने धर्म के नाम पर देश का बंटवारा करवाया था | दुर्भाग्य से आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनका शरीर भले भारत में हो लेकिन मन पाकिस्तान में ही रहता है जिसके  कारण विभाजन के बाद की उनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी तक  मुख्यधारा से दूर है | धर्म निरपेक्षता के नाम पर चली वोट बैंक की राजनीति ने जिस तुष्टीकरण का सहारा लिया वह  कालान्तर में नासूर बनता गया | आधुनिक शिक्षा की जगह  धार्मिक कट्टरता का पाठ पढ़ाए जाने की वजह से बजाय आगे बढ़ने के मुस्लिम समाज आज भी सदियों पुरानी बेड़ियों में जकड़ा हुआ है | बीते कुछ सालों में देश का  परिदृश्य काफी बदला है जिससे खीझकर कुछ  लोगों द्वारा आक्रामक अंदाज में अपनी ताकत दिखाने का सुनियोजित प्रयास किया  रहा है |  कुछ चुनिन्दा शिक्षण संस्थानों में समय – समय पर होने वाले उपद्रव इसकी बानगी हैं  | धार्मिक रीति – रिवाजों के नाम पर दंगा  करने की कोशिशें भी किसी से छिपी नहीं हैं | संविधान के नाम पर देश चलाने की बात करने वाले मौका मिलते ही धार्मिक ग्रन्थ लेकर बैठ जाते हैं | दुःख तो इस बात  का है कि  विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ इस खतरनाक खेल को प्रोत्साहन देती हैं | इससे  लगता है जैसे आतंकवाद किसी रणनीति के अंतर्गत नये रूप में सीमावर्ती राज्यों से निकलकर देश के अंदरूनी हिस्सों में फ़ैल रहा है | दिल्ली के शाहीन बाग में चले धरने को जिस तरह से राजनीतिक समर्थन मिला उससे अलगाववादी  शक्तियों का हौसला बुलंद हो गया | कोरोना न आया होता तो बड़ी बात नहीं देश भर में आतंकवादी हिंसा का दौर दिखाई देता | राम नवमी की शोभायात्राओं पर हुए ताजा  हमले स्थानीय विवाद मानकर  उपेक्षित  नहीं किये जाने चाहिए | कश्मीर घाटी में अपनी जड़ें कमजोर होने के बाद  देश विरोधी ताकतें अपने कार्यक्षेत्र का जो विस्तार कर रही हैं ये उपद्रव उसी के प्रमाण हैं | इसीलिये केवल इनके मकान और दूकानें तोड़ने से बात नहीं बनने वाला, सांप का फन कुचलना भी जरूरी है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 11 April 2022

क्षेत्रीय आर्थिक जोन का सुअवसर : चीन की साख घटने का लाभ उठाये भारत



ये संयोग ही है कि भारत के तीन पड़ोसी देश इन दिनों आर्थिक संकट के शिकार हैं | पाकिस्तान में तो सत्ता संघर्ष के कारण फ़िलहाल आर्थिक बदहाली की चर्चा पर विराम लगा हुआ है लेकिन श्रीलंका के दिवालिया होने के बाद नेपाल भी उसी राह पर बढ़ रहा है | श्रीलंका  में राजनीतिक संकट भी उठ खड़ा हुआ है | जनता सत्ताधारियों  को हटाने सड़कों पर उतर रही है | कर्ज के बोझ से  अर्थव्यवस्था के कंधे झुक गए हैं | केन्द्रीय बैंक के मुखिया ने सरकार से कह दिया है कि  उसके काम में दखल देना बंद कर दें | विदेशी मुद्रा का संकट दूर  करने के लिए श्रीलंका सरकार अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज लेने की कोशिश कर रही है | लेकिन इस खस्ता हालत में नया कर्ज किस आधार पर मिलेगा ये देखने वाली बात होगी | दूसरी तरफ नेपाल सरकार ने अपने केन्द्रीय बैंक के गवर्नर को बर्खास्त कर दिया क्योंकि उन्होंने निर्यात और पर्यटन में कमी के कारण विदेशी मुद्रा के भण्डार में कमी के चलते विलासिता और गैर जरूरी चीजों के आयात पर रोक लगा दी | यद्यपि  नेपाल के हालात भले ही श्री लंका जैसे बदतर नहीं हुए हों किन्तु प्रभावी कदम न उठाये गये तो स्थिति और बिगड़ते देर  नहीं लगेगी | हमारे  लिये दोनों देश चिंता का विषय हैं क्योंकि इनके संकट से शरणार्थी समस्या का खतरा है  | श्रीलंका से तो लोगों का तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में आना चल ही रहा है जिनके लिए शरणार्थी शिविर भी बनाये गये हैं | नेपाल से भी भारत आना और आसान है | वैसे भी वीजा जरूरी न होने से बहुत बड़ी  संख्या में नेपाली भारत में स्थायी तौर पर बसे हुए हैं | यदि उसके हालात भी श्रीलंका जैसे हुए तब बतौर शरणार्थी ये संख्या और बढ़ जायेगी जिसका बोझ हमारे कन्धों पर आयेगा | नेपाल के तराई इलाकों में रहने वाले मधेसी तो पूर्वी उ.प्र और बिहार से पुश्तैनी तौर पर जुड़े हुए हैं | इसलिए उनका भारत आकर डेरा जमाना संभावित है | ऐसे में जब कोरोना काल से उबर रही भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी यूक्रेन संकट का असर पड़ रहा है तब श्रीलंका और नेपाल में गंभीर आर्थिक संकट हमारे लिए दोहरी मुसीबत बन सकता है | शरणार्थी समस्या के अलावा भारत की ये कूटनीतिक मजबूरी है कि वह चीन को इन देशों में अपना प्रभाव पूरी तरह से कायम करने से रोके | उल्लेखनीय है चीनी कर्ज से बुरी तरह दबे श्रीलंका को  भारत ने हाल ही में जो  सहायता दी उससे वहां की सरकार और जनता दोनों में हमारे प्रति जैसा सद्भाव देखने मिल रहा है उसे आगे भी जारी रखने के लिए आवश्यक होगा कि हम  श्रीलंका में अपनी उपस्थिति को और वजनदार  बनायें | इसके लिये ये जरूरी है कि नेकी कर दरिया में डाल वाली  नीति से ऊपर उठकर विशुद्ध व्यवहारिकता को अपनाते हुए श्रीलंका को एहसास कराया जाए कि उसे हमारे प्रति रवैया बदलना होगा | ऐसा करना कठिन भी नहीं हैं क्योंकि भौगोलिक दृष्टि से  बेहद करीब  होने से दोनों देश आपसी रिश्तों में मिठासयुक्त स्थायित्व पैदा कर सकते हैं | मौजूदा सरकार के पूर्व वहां  के शासक भारत समर्थक थे जिन्हें जिताने  मोदी सरकार ने  जबर्दस्त कूटनीतिक  बिसात बिछाई थी | लेकिन वह सरकार ज्यादा नहीं चली  और राजपक्षे परिवार पूरी तरह सत्ता पर कुंडली जमाकर बैठ गया | यद्यपि लिट्टे का खात्मा  कर देश को गृहयुद्ध से बाहर निकालने में महिन्द्रा राजपक्षे ने बहुत ही साहस का परिचय दिया था परन्तु इस कार्यकाल में उनकी सरकार पूरी तरह चीन के शिकंजे में फंस गई | जो विदेशी कर्ज लिया गया उसे ईमानदारी से विकास हेतु व्यय किया जाता तो ये नौबत न आती | यही वजह है कि जनता राजपक्षे परिवार के विरुद्ध उठ खडी हुई है | भारत को इस स्थिति का लाभ उठाकर वहां अपनी समर्थक सत्ता वापिस लाने के लिए कूटनीतिक गोटियां  बिछानी चाहिए ताकि  चीन इस संकट की आड़ में श्रीलंका को अपना उपनिवेश बनाने की योजना में सफल न हो सके | ऐसी ही रचना नेपाल को लेकर भी जरूरी है क्योंकि चीन के दबाव में वहां की मौजूदा सरकार ने सीमा विवाद पर भारत के साथ सैन्य टकराव जैसा दुस्साहस किया था | वह भी तब जब लद्दाख के गलवान सेक्टर में भारत और चीन के बीच युद्ध की स्थिति बनी हुई  थी | इन सब बातों को ध्यान में रखकर  भारत के लिए जरूरी  है कि नेपाल , श्रीलंका , बांग्ला देश , म्यांमार , मालदीव , मॉरीशस के साथ एक व्यापारिक जोन बनाये | इसके चलते ये सभी देश बड़ी ताकतों के शिकंजे से आज़ाद हो सकेंगे | भारत को इन्हें ये एहसास दिलाना होगा कि वह इनके लिए उसी तरह आर्थिक संरक्षक बन सकता है जिसका एहसास चीन कराता है | ये देश यदि भारत के साथ एक क्षेत्रीय  अर्थव्यवस्था कायम करते हैं तब उसके लाभ देखकर पाकिस्तान भी देर - सवेर उसमें शामिल होना चाहेगा | इस काम में चीन जरूर अड़ंगे लगाएगा लेकिन जैसा  संकट श्रीलंका , नेपाल और पाकिस्तान झेल रहे हैं उसे देखते हुए उनको ये लगने लगा है कि भारत के साथ जुड़ना उनके लिये हर दृष्टि से लाभदायक रहेगा | बीते कुछ सालों  से ये दावा अक्सर सुनाई देता है कि भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था होने के साथ ही सैन्य शक्ति भी बन गया है | चीन के साथ  टकराव का जवाब उसने जिस कड़ाई के साथ दिया उसके कारण  भारत का मान बढ़ा है | यूक्रेन संकट के दौरान अमेरिका और यहाँ तक कि चीन की नीति  जिस तरह गैर भरोसेमंद रही उससे उनकी विश्वसनीयता में कमी आई जबकि भारत ने अपना रुख पहले दिन से बहुत ही  संतुलित रखते हुए किसी  दबाव में आने से परहेज किया | इससे कूटनीतिक क्षेत्र में हमारी साख और धाक दोनों बढ़ीं जिसकी पाकिस्तान के निवर्तमान प्रधानमन्त्री इमरान खान तक ने खुलकर तारीफ़ की | भारतीय विदेश नीति में हाल के वर्षों में जो परिपक्वता और आत्मविश्वास देखने मिला उसके बाद ये सोचना गलत न होगा कि हम क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करते हुए अपने पड़ोसी देशों में चीन का विकल्प बनें | कोरोना संकट के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में जो बड़े बदलाव हो रहे हैं उनके कारण भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है | लेकिन हमें अपने इर्द - गिर्द अपना आभामंडल और चमकदार बनाना होगा | कोरोना के कारण विश्वसनीयता खोने से चीन को आर्थिक दृष्टि से काफी नुकसान हुआ है | कोरोना की नई लहर आने से वहाँ अंदरूनी हालात और खराब हो रहे हैं | शंघाई जैसे व्यावसायिक महानगर में लॉक डाउन है और खाने के पैकेट लूटे जाने की स्थिति है | भारत के लिए यह स्वर्णिम अवसर है जिसका लाभ उसे लेना चाहिए |

- रवीन्द्र वाजपेयी

 

Saturday, 9 April 2022

हिन्दी का विरोध केवल राजनीतिक स्वार्थवश किया जाता है




 आजादी के 75 वर्ष पूरे करने जा रहे देश में यदि बतौर राजभाषा हिन्दी में ज्यादा से ज्यादा सरकारी कामकाज करने की बात किये जाने को हिन्दी साम्राज्यवाद निरूपित करते हुए देश की अखंडता के लिए खतरा बताया जाने लगे तो ऐसा लगता है कि सैकड़ों सालों तक गुलाम रहने के बावजूद हमने कोई सबक नहीं सीखा | संसद की राजभाषा समिति की बैठक की अध्यक्षता करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फैसला किया है कि सरकार चलाने का माध्यम  राजभाषा है | समय आ गया है जब  राजभाषा को देश की एकता का अहम हिस्सा बनाया जाए | ये भी कहा गया कि हिन्दी को अंग्रेजी के विकल्प के रूप  में स्वीकार किया जाना चाहिए , न कि स्थानीय भाषाओँ के विकल्प के रूप में | बैठक के बाद विपक्ष के अनेक नेताओं के बयान  हिन्दी के विरोध में आने शुरू हो गए | तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने   हिन्दी पर जोर को अखंडता और बहुलतावाद के विरुद्ध बताकर चेतावनी दे डाली कि यह देश की अखंडता को बर्बाद कर देगा | कांग्रेस नेता सिद्धारमैया , जयराम रमेश और अभिषेक मनु सिंघवी के अलावा तृणमूल नेता सौगत राय ने भी गृहमंत्री के कथन के विरुद्ध तीखी टिप्पणियाँ कर डालीं | चौंकाने वाली बात ये है कि जिस बात पर धजी का सांप बनाया  जा रहा है उसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि   हिन्दी , अंग्रेजी के विकल्प के तौर पर होगी न कि किसी स्थानीय भाषा के | ऐसे में हिन्दी साम्राज्यवाद जैसे शब्दों के साथ उसको  राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरा बताना बहुत ही घटिया  मानसिकता का प्रमाण है | स्टालिन की प्रतिक्रिया समझ में आती है क्योंकि उनकी पार्टी शुरू से ही हिन्दी विरोध की आग पर  रोटियां सेंकती आई  है | तृणमूल भी चूंकि क्षेत्रीयतावाद की सियासत करती है इसलिए उसके सांसद द्वारा  हिन्दी के  विरोध  पर अचरज नहीं हुआ | लेकिन कांग्रेस तो राष्ट्रीय पार्टी है जिसके शासनकाल में ही   हिन्दी को राजभाषा का दर्जा देकर संपर्क माध्यम के रूप में मान्यता दी गई थी | आजादी की लड़ाई लड़ते समय ही महात्मा गांधी को भाषायी विवाद का अंदेशा हो गया था और इसीलिये उन्होंने तमिलनाडु के वरिष्ट नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को   नागरी प्रचारिणी सभा का अध्यक्ष बनाकर दक्षिण में हिंदी के प्रचार – प्रसार का काम सौंपा |  बाद में जब तमिलनाडु में द्रविण पार्टियों का प्रभुत्व  कायम हुआ तब  हिन्दी  विरोध  दबाव बनाने का जरिया बन गया | रोचक तथ्य ये है कि तमिलनाडु में  हिन्दी फ़िल्में बनाने वाले अनेक निर्माता निर्देशक हुए  | जेमिनी , प्रसाद प्रोडक्शन , राजश्री पिक्चर्स , एवीएम जैसे बड़े बैनरों द्वारा बनाई गई   हिन्दी   फिल्मों ने जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की और वे  जितनी    हिन्दी  भाषी क्षेत्रों में चलीं उतनी ही दक्षिणी राज्यों में भी | तमिलनाडु के अनेक अभिनेता और अभिनेत्रियां हिंदी फिल्मों में आकर सुपर स्टार बन बैठे | कमल हासन , रजनीकांत , हेमा मालिनी , रेखा , श्रीदेवी जैसे अनेक नाम हैं जिनके बिना हिंदी फिल्मों का जिक्र अधूरा रहेगा | तमिलनाडु के लाखों लोग उत्तर भारत में नौकरी के सिलसिले में आये जिन्होंने हिंदी सीखकर  काम करने पर कभी ऐतराज नहीं किया | दरअसल स्टालिन द्वारा  हिंदी के उपयोग को साम्राज्यवाद कहकर  देश की अखंडता के लिए खतरा बताना बहुत ही संकुचित सोच है | और सही मायनों में ऐसा  कहने वाले ही राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा पैदा करते हैं | संसद में कांग्रेस पक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडगे , जयराम रमेश , शशि थरूर और  मणिशंकर अय्यर सरलता के साथ हिंदी में बोलते सुने जाते रहे हैं | और जो सांसद हिन्दी नहीं जानते उनमें से अधिकतर अपनी क्षेत्रीय भाषा का उपयोग करते हैं | जहाँ तक बात अंग्रेजी की है तो अनेक       हिन्दी भाषी नेता भी संसद में उसका उपयोग करते हैं | लेकिन कोई उनका विरोध नहीं करता | संसद के दोनों सदनों में गैर  हिन्दी   भाषी अध्यक्ष , उपाध्यक्ष भी हुए हैं |  उन्हें सदन चलाने में कोई दिक्कत नहीं हुई और न ही हिन्दी   नहीं जानने पर उनका विरोध हुआ | इस सबसे लगता है कि कतिपय राजनीतिक दलों द्वारा सरकारी कामकाज में हिन्दी के उपयोग का  विरोध  इस बात का संकेत है कि वे निहित स्वार्थों के लिए राष्ट्र हित की अनदेखी कर रहे हैं | भारत बहुभाषी देश होने के बावजूद अनंत काल से सांस्कृतिक और भावनात्मक दृष्टि से एकता के सूत्र में बंधा रहा है | सैकड़ों  वर्षों की पराधीनता भी इसे नहीं तोड़ सकी किन्तु स्वाधीनता के बाद राजनीतिक स्वार्थों के कारण भाषायी विवाद खड़े किये जाने लगे | भाषावार प्रान्तों की रचना ने भी आग में घी का काम किया | शिवसेना जैसी पार्टियों ने महाराष्ट्र में मराठी का विवाद खड़ा कर अपना उल्लू सीधा करने का दांव चला जबकि महाराष्ट्र  में  भाषा की कोई समस्या कभी नहीं रही |   हिन्दी     फिल्म उद्योग का मुख्यालय मुम्बई में होना ही अपने आप बहुत कुछ कह जाता है | कुल मिलाकर संसदीय समिति में गृहमंत्री श्री शाह द्वारा राजभाषा     हिन्दी को लेकर जो कहा गया उसे लेकर देश के टूटने की बात करने वाले नेतागण ये भूल गये कि उन्होंने साफ़ – साफ़ कहा था कि सरकारी कामकाज में हिन्दी अंग्रेजी का विकल्प होगी न कि स्थानीय भाषाओं की | ऐसे में महज राजनीतिक स्वार्थवश   हिन्दी  का विरोध बेहद गैर जिम्मेदाराना है | स्टालिन जैसे नेताओं को ये बात समझना चाहिये कि हिन्दी से चिढ़ के कारण ही उनके राज्य के नेता राष्ट्रीय राजनीति में कामयाब नहीं हो सके | यहाँ उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु के दिग्गज कांग्रेस नेता कामराज प्रधानमंत्री महज इसलिए नहीं बन सके क्योंकि वे हिन्दी नहीं जानते थे | दक्षिण से दो प्रधानमंत्री क्रमशः पीवी नरसिम्हाराव और एचडी देवेगौड़ा हुए | उनमें श्री राव अनेक भाषाओँ के साथ ही हिन्दी में भी पारंगत होने से राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाने में सफल हुए लेकिन देवेगौडा अपनी कमजोर हिन्दी के चलते क्षेत्रीय छवि से बाहर नहीं निकल सके | हिन्दी विरोधी नेताओं को ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि वे अपने राज्य की जनता को हिन्दी न सिखाकर कूप मंडूक बना रहे हैं | उसको  राष्ट्रभाषा कहे जाने पर छाती पीटने वालों को इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि अंग्रेजों को भारत से भगाने के बावजूद हम उनकी भाषा को क्यों ढो रहे हैं जो सामाजिक स्तर पर ऊंच - नीच की भावना फ़ैलाने का सबसे बड़ा आधार है | देश में  एक  राष्ट्रगान , राष्ट्रध्वज, राष्ट्रीय मुद्रा , संविधान  , संसद , सर्वोच्च न्यायालय  , प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति  हैं , जिनको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद नहीं है | देश के अधिकतर प्रधानमंत्री उत्तर भारत से ही बने | मौजूदा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी एक ही राज्य से हैं | किसी ने आज तक इस पर सवाल नहीं उठाये | लेकिन 75 साल बाद भी हमारी एक राष्ट्रभाषा नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता में बैठने वाले संवेदनशील विषयों पर फैसला करने में कितने नाकामयाब रहे हैं | अंग्रेजी एक भाषा के रूप में बेहद उपयोगी है लेकिन तकनीकी और उच्च शिक्षा के लिए भारतीय भाषाओं की उपेक्षा का कितना नुकसान देश को हुआ ये बताने की जरूरत नहीं है | हिन्दी को राष्ट्रभाषा की बजाय राजभाषा बनाने की जो भूल अतीत में हुई उसी का खामियाजा आज देश भोग रहा  है | काश , पंडित नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में संसद के केन्द्रीय कक्ष में अपना  ऐतिहासिक भाषण  बजाय अंग्रेजी के हिन्दी में दिया होता तब शायद ऐसे विवाद जन्म ही न लेते  | 

- रवीन्द्र वाजपेयी