Monday, 25 April 2022

विश्व युद्ध न सही लेकिन उस जैसे ही हालात बन रहे हैं



2019  के उत्तरार्ध से शुरू हुआ वैश्विक संकट खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा | पहले कोरोना ने पूरी दुनिया को हलाकान किया जिससे  सब कुछ ठहर सा गया | बिना एक भी गोली चले ही करोड़ों लोगों की मौत हो गयी | ज्ञान – विज्ञान और तकनीक सब धरे रह गये | लेकिन मनुष्य की संघर्षशीलता ने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि उसमें अपने अस्तित्व को बचाए रखने की सनातन प्रवृत्ति आज भी कायम है और उसी के बलबूते मानव जाति लगभग 100 साल बाद आई उस विपदा का सामना कर सकी | लेकिन उसके समाप्त होने के बाद राहत की सांस ठीक से ली जाती  इसके पहले ही रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण किए जाने से पूरी दुनिया एक बार फिर संकट से गिर गयी | जिस तरह कोरोना ने चीन से शुरू होकर पूरी  दुनिया को अपने बाहुपाश में जकड़ लिया ठीक वैसी ही स्थिति रूस – यूक्रेन युद्ध से उत्पन्न हो गई | कहने को तो ये दो पड़ोसी देशों के बीच की जंग है | भारत और पाकिस्तान  बीते 75 साल में चार बार युद्ध लड़ चुके हैं | चीन के साथ भी 1962 में बड़ी जंग हुई थी | पश्चिम एशिया में इजरायल के गठन के बाद से न जाने कितने बड़े और छोटे युद्ध हो चुके हैं | ईरान और ईराक लगभग एक दशक तक युद्धरत रहे | सीरिया संकट ने भी दुनिया को काफी प्रभावित किया | अमेरिका  भी वियतनाम और अफगानिस्तान में कई दशक तक लड़ाई में उलझा रहा | रूस भी इस देश में लम्बे समय तक काबिज रहा | इस सबके कारण वैश्विक परिस्थितियां प्रभावित भी हुईं  | साठ के दशक में तो क्यूबा को लेकर अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु युद्ध जैसे हालात बन गये थे | लेकिन इन सबका दुनिया की  अर्थव्यवस्था  पर उतना प्रभाव नहीं पड़ा  जितना कोरोना और उसके बाद  रूस – यूक्रेन जंग का हुआ है | कोरोना के कारण बिना युद्ध के ही पूरी दुनिया को खून के आंसू रोना पड़े | मृत्यु का ऐसा तांडव लगभग एक सदी के बाद देखने मिला | चिकित्सा विज्ञान की  समस्त उपलब्धियां एक अदृश्य वायरस के सामने घुटने टेक गईं | हालाँकि उस स्थिति पर भी आख़िरकार काबू पा लिया गया परंतु उसके कारण पूरी दुनिया बरसों पीछे चली गयी | न केवल अर्थव्यवस्था अपितु मानसिकता को भी कोरोना ने प्रभावित किया |  वह दौर  जो  भयावह अनुभव दे गया उनकी स्मृति मात्र विचलित कर देती है | धीरे – धीरे उस माहौल से विश्व उबरने के स्थिति में आया ही था कि रूस ने यूक्रेन पर सैन्य कार्यवाही करते हुए दूबरे में दो आसाढ़ वाले हालात बना दिए | कहने को तो ये दो पड़ोसी मुल्कों के बीच का विवाद है जिसमें जाहिर तौर पर बतौर  महाशक्ति रूस को जीत हासिल हो जाना चाहिए थी किन्तु दो महीने होने को आ रहे हैं लेकिन उसको अब तक मिली सफलता उसकी अपार सैन्य शक्ति के लिहाज से तो नगण्य ही है | हालांकि उसने यूक्रेन को मलबे के ढेर में बदल दिया है | फिर भी  इक्का – दुक्का इलाके हथियाने के सिवाय अब तक उसके हाथ ऐसा कुछ भी नहीं लगा जिसे उपलब्धि कहा जा सके  | इसका कारण ये रहा कि दो देशों का यह युद्ध अप्रत्यक्ष तौर पर लघु विश्व युद्ध का रूप ले बैठा | यूक्रेन द्वारा अमेरिका के प्रभुत्व वाले नाटो नामक सैन्य संगठन का  सदस्य बनने के फैसले के कारण यह स्थिति निर्मित हुई | इसलिए अमेरिका मैदान में भले न कूदा हो लेकिन उसने रूस की आर्थिक मोर्चेबंदी करने के साथ ही यूक्रेन को जिस तरह से आर्थिक और सैन्य सहायता देने की पहल की और उसकी देखा - सीखी उसके गुटीय साथी देशों ने भी उसको जात – पांत से बाहर करने जैसे नीतिगत निर्णय लेकर घेराबंदी कर डाली | इसका सीधा असर दुनिया के आर्थिक व्यवहार पर पड़ा और न सिर्फ पेट्रोल – डीजल तथा गैस अपितु खाद्यान्न तथा तिलहन की समस्या भी उठ खड़ी हुई | चूंकि युद्ध का अंत होता नजर नहीं आ रहा इसलिए पूरी दुनिया चिंता के साथ ही भयग्रस्त बनी हुई है | रूस के राष्ट्रपति पुतिन भी हिटलर की तरह शेर पर सवार तो गए लेकिन उससे उतरने में उनके भी पसीने छूट रहे हैं | पूरी तरह खंडहर होने के बाद भी यूक्रेन अपने अस्तित्व के लिए आखिरी साँस तक लड़ने का जो जज्बा प्रदर्शित कर रहा है उसे देखते हुए इस संकट के लम्बे खिंचने की आशंका दिन ब दिन प्रबल होती जा रही है | इसके पीछे यूक्रेन की सरकार और जनता की संकल्पशक्ति से ज्यादा अमेरिका और उसके मित्र देशों द्वारा उसे दी जा रही मदद काम कर रही है | इस जंग के लिए रूस पूरी तरह से कठघरे में है लेकिन यूक्रेन के मौजूदा शासक जेलेंस्की भी कम कसूरवार नहीं हैं जो अमेरिका के मौखिक आश्वासन पर रूस जैसी महाशक्ति से ऊंची आवाज में तू – तड़ाक करने की भूल कर बैठे | इस युद्ध का अंतिम नतीजा क्या होगा ये बताने में अच्छे – अच्छे कूटनीतिक विशेषज्ञ असमर्थ हैं | लेकिन इतना जरूर है कि इसकी वजह से चाहे - अनचाहे दुनिया विश्व युद्ध जैसी मुसीबतें झेलने मजबूर हो रही है | मसलन रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के साथ ही विश्व व्यापार का पूरा ढांचा हिल गया है | रूस से कच्चा तेल और अनाज खरीदने वालों पर मुसीबत आ गयी है | इनमें यूरोप के वे देश भी हैं जिन्होंने अमेरिका के दबाव में आकर रूस से रिश्ते तोड़ लिए | इसी तरह रूस इनसे जो कुछ  खरीदता था उसकी आपूर्ति बंद होने से खरीददार और विक्रेता दोनों की व्यवस्था गड़बड़ा गई है | जिन देशों के पास निर्यात लायक वस्तुएं हैं उनके द्वारा आपातकालीन स्थिति के मद्देनजर उसे  रोके जाने से उनके आयातक दिक्कत में आ गये हैं | उदाहरण के तौर पर मलेशिया द्वारा पाम आइल का निर्यात रोके जाने से भारत जैसे देशों में खाद्य तेल का संकट पैदा होने लगा है | सैन्य सामग्री के व्यापार पर भी इस युध्द का असर पड़े बिना नहीं  रहेगा | सबसे बड़ी बात ये होगी कि इस युद्ध में यूक्रेन की हार रूस के राष्ट्रपति पुतिन में जो उन्माद  पैदा करेगी उसका शिकार स्वीडन और फिनलैंड जैसे छोटे पड़ोसी देश हो सकते हैं , जिन्हें पुतिन ने हाल ही में धमकाया भी है | इसके विपरीत यदि रूस लम्बे समय तक युद्ध में फंसा रहा तब  हताशा में उसके हुक्मरान हिटलर की तरह बदहवासी में आत्मघाती कदम उठाकर दुनिया को आग में झोंक सकते हैं | इसके साथ ही चीन में कोरोना की चौथी लहर जिस तरह से आई है उसने एक बार फिर इसके विश्वव्यापी फैलाव की स्थितियां पैदा कर दी हैं |  हालांकि इसकी विकरालता कितनी होगी ये अभी कहना कठिन है लेकिन पिछले अनुभव यदि दोहराए गये तब वह स्थिति बहुत ही दर्दनाक होगी | कुल मिलाकर दुनिया इस समय बहुत ही असमंजस में फंसी है | रूस और यूक्रेन  में युद्ध के समानांतर चीन में कोरोना की  चौथी लहर के पूरे जोर से आ जाने के बाद पूरी दुनिया में दहशत हैं क्योंकि इस बार भी संक्रमण का विस्तार वैश्विक स्तर पर हुआ तब सबसे बड़ा खतरा इस बात को लेकर होगा कि पिछली लहरों के दौरान तो पूरा विश्व कोरोना से लड़ने एकजुट था लेकिन यूक्रेन संकट ने जिस तरह से उसे खेमों में बाँट दिया है उसके कारण उस स्थिति से निपटना आसान नहीं रहेगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 April 2022

समान नागरिक संहिता : मौका भी है और जरूरत भी



नवरात्रि के दौरान दिल्ली स्थित जेएनयू  छात्रावास के भोजनालय में मांसाहारी भोजन पकाने पर हुए विवाद के संदर्भ में असदुद्दीन ओवैसी ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा कि देश आस्था से नहीं  संविधान से चलना चाहिए | लेकिन जब उनके धर्म से जुड़ी आस्था का सवाल उठता है तब वे या उन जैसे अन्य मुस्लिम नेता इस्लामिक मान्यताओं के पालन पर जोर देने लगते हैं | दरअसल धर्म के नाम पर देश का बंटवारा होने के बाद पाकिस्तान तो  इस्लामिक देश बन गया किन्तु भारत ने धर्म निरपेक्षता को अपनाया | लेकिन  मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर एक विसंगति पैदा कर दी गई जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों के सामाजिक रीति – रिवाजों को संरक्षण देना था किन्तु  इसका दुष्परिणाम अलगाववाद की भावना को पुनर्जीवित करने के तौर पर सामने आने लगा | ये ठीक वैसे ही है जैसे  जम्मू – कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत दिए गये विशेष दर्जे के कारण कश्मीर घाटी में अलगाववादी भावनाएं मजबूत हुईं | मुस्लिम पर्सनल लॉ की देखा - सीखी वृहत्तर हिन्दू समाज के अन्य घटकों में भी अल्पसंख्यक बनने की ललक जागी परन्तु  उनका अपना पर्सनल लॉ नहीं है | इसी तरह ईसाई भी अल्पसंख्यक माने जाते हैं | कहने को तो पारसी समुदाय भी धार्मिक अल्पसंख्यक है लेकिन उसकी तरफ से शायद ही  ऐसी आवाज सुनाई देती हो जिससे वह मुख्य धारा से अलग प्रतीत हो |  सिख , जैन और बौद्ध अपने को कितना भी अलग मानें परंतु देश  की मुख्य सामाजिक धारा में वे पूरी तरह  घुले - मिले हैं | लेकिन अलग पर्सनल लॉ  होने के कारण मुस्लिम  समुदाय मुख्य धारा से दूर  होता गया और इसी  वजह से सांप्रदायिक विवाद पैदा होते  हैं | शरीयत के नाम पर खुद को विशेष  साबित करने के फेर में मुस्लिम समाज आजादी के 75 साल भी अलग - थलग नजर आता है | जब भी वह किसी परेशानी में होता है तब संविधान की दुहाई देने लगता है परन्तु सामान्य स्थितियों में उसे शरीयत और पर्सनल लॉ याद आने लगते हैं | इस विसंगति को दूर करने के लिए लम्बे समय से ये बात उठती रही है कि दंड विधान संहिता की तरह से ही नागरिक संहिता में भी एकरूपता होनी चाहिए | उल्लेखनीय है कि पर्सनल लॉ को बनाए रखने के पक्षधर मुस्लिम नेता भूलकर भी इस्लामिक दंड विधान को लागू करने की बात नहीं कहते | उनके अपने पर्सनल लॉ का ही परिणाम अल्पसंख्यकवाद के  रूप में सामने आया जिसे वोट बैंक की  राजनीति ने और हवा दी | सामाजिक ताने बाने के लिए ये प्रवृत्ति कितनी नुकसानदेह हुई ये किसी से छिपा नहीं है | और इसीलिये ये मांग लम्बे समय से उठ रही है कि सामान  दंड  विधान संहिता की  तरह समान नागरिक संहिता भी होनी चाहिए | सर्वोच्च न्यायालय भी इस बारे में सांकेतिक सलाह अनेक अवसरों पर दे चुका है | निजी बातचीत में तमाम राजनीतिक नेता इसका समर्थन करते हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से ऐसा कहने का साहस उनमें नजर नहीं आता | जिसका एकमात्र कारण वोट बैंक की राजनीति है | गत दिवस केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भोपाल में राम मंदिर और धारा 370 के बाद समान नागरिक संहिता की बारी कहकर राजनीतिक जमात को  नई बहस का अवसर दे दिया है | भोपाल में भाजपा की बैठक में उन्होंने इस बारे में कहा कि उत्तराखंड में इसे प्रायोगिक तौर पर लागू किये जाने के बाद मसौदा तैयार है | राजनीतिक विश्लेषक भी ये स्वीकार करते हैं कि कोरोना न आता तो अब तक ये कानून पारित हो चुका होता | उ.प्र और उत्तराखंड में मिली चुनावी सफलता ने भाजपा के मन से मुस्लिम मतों की  नाराजगी का खौफ भी खत्म कर दिया है | ऐसे में ये उपयुक्त  समय है जब केंद्र सरकार इस दिशा में आगे बढ़े | राज्यसभा में भी भाजपा की सदस्य संख्या में काफी इजाफा हुआ है और फिर इस विषय पर उसे शिवसेना का भी  समर्थन मिलना तकरीबन तय है | भाजपा राजनीतिक दृष्टि से भी इस दिशा में शीघ्रता करना चाहेगी क्योंकि उसे निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में जहाँ हिमाचल ,  गुजरात और म.प्र में अपनी सरकारें बचानी हैं वहीं राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पिछली  पराजय से उबरकर सत्ता हासिल करना है | 2024 के लोकसभा चुनाव में वह मतदाताओं के सामने ये कहते हुए जाना चाह रही है कि उसने जो कहा वह करके भी दिखा दिया | मसलन राम मंदिर , धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे अपने वायदे पूरे कर दिये | श्री शाह ने जो संकेत दिया उसे केंद्र  सरकार के बढ़े  हुए आत्मविश्वास का प्रमाण भी कह सकते हैं क्योंकि मौजूदा समय में कांग्रेस सहित शेष विपक्ष पूरी तरह बिखरा है | गत वर्ष प. बंगाल में ममता बैनर्जी को जो बड़ी सफलता मिली  उसके बाद विपक्ष का हौसला काफी बुलंद था क्योंकि इस राज्य में भाजपा बड़ी चुनौती बनकर उभरी थी | केरल में वह पैर ज़मा रही है जबकि  तमिलनाडु में आज भी पहिचान का संकट उसके सामने है | असम में जरूर उसने खुद को मजबूत कर लिया  हैं | लेकिन प. बंगाल में पूरा जोर लगाने के बावजूद भाजपा सत्ता से काफी पीछे रही | उसके बाद निश्चित तौर पर उसका मनोबल गिरा। लेकिन उ.प्र और उत्तराखंड के साथ ही मणिपुर और गोवा जीतने के बाद मोदी – शाह की जोड़ी राजनीतिक परिदृश्य पर एक ताकतवर समीकरण के तौर पर उभरी है | और इसीलिए हिमाचल और गुजरात के अलावा म.प्र .राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है | श्री शाह द्वारा भोपाल में समान नागरिक संहिता को लेकर दिया गया संकेत उस दृष्टि से काफी मायने रखता है | भाजपा को ये लगने लगा है इस विधेयक को लाने  का ये सबसे बेहतर समय है क्योंकि मुख्य धारा की सभी पार्टियों के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण के साथ ही हिन्दू मतों को रिझाना भी जरूरी हो गया है | तभी राहुल गांधी जनेऊधारी बनकर अयोध्या के महंतों की सेवा में जाते हैं , अखिलेश यादव चाहे  - अनचाहे परशुराम मंदिर का उदघाटन करते हैं , बसपा ब्राह्मण सम्मलेन आयोजित करने मजबूर है , अरविन्द केजरीवाल हनुमान चालीसा सुना रहे हैं और ममता बैनर्जी मंच से काली पाठ कर रही हैं | लेकिन मुस्लिम मतों के लिए इनका झुकाव  बहुसंख्यक ध्रुवीकरण का कारण बन गया | भाजपा भी इस सूत्र को समझकर बिना  झिझके अपनी आधारभूत नीतियों को अमली जमा पहिनाने में जुट गई है | आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में संयोगवश राजनीतिक परिस्थितियां उसके सर्वथा अनुकूल हैं और नरेंद्र मोदी का कद जिस ऊंचाई को छू रहा है उसके कारण वह बड़े फैसले करने में सक्षम है | शायद यही सोचकर श्री शाह ने गत दिवस भोपाल में  में समान नागरिक संहिता लागू करने का इरादा जताया | संसद के  दोनों सदनों में बहुमत के चलते इसे पारित करवाने में ज्यादा परेशानी भी  नहीं होगी | जहां तक बात विपक्ष की है तो उसके लिए समान नागरिक संहिता न उगलते बने  और न निगलते वाली स्थिति उत्पन्न करने वाली है |  उसका विरोध उसे बहुत महंगा पड़ेगा वहीं समर्थन करने पर भी उसके हाथ कुछ नहीं लगने वाला | अमित शाह चूंकि प्रधानमंत्री के सबसे करीबी हैं और अध्यक्ष न होते हुए भी पार्टी पर उनका वर्चस्व बना हुआ है इसलिए ये माना  जा सकता है कि केंद्र सरकार ने इस बारे में तैयारी शुरू कर दी है | करौली , खरगौन और दिल्ली में  जहांगीरपुरी के दंगों के बाद इसकी जरूरत तेजी से महसूस की जाने लगी है | उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता  का निर्णय प्रायोगिक तौर करने के बाद भाजपा उसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने जा रही है तो इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं है | आख़िरकार ये उसके मूल उद्देश्यों में शुरू से शामिल रहा है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 April 2022

अतिक्रमण और अवैध निर्माण किसी का भी हो टूटना चाहिए



 दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में हुए सांप्रदायिक उपद्रव के बाद नगर निगम द्वारा अतिक्रमण तोड़े जाने की कार्रवाई के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय ने परसों लगाये स्थगन को जारी रखा किन्तु एक अन्य याचिका के जरिये अन्य राज्यों में चलाये जा रहे बुलडोजरों को रोकने से इंकार कर दिया | दिल्ली के मामले में पेश की गई याचिका में जहां बिना पूर्व सूचना दिए अतिक्रमण तोड़ने की शिकायत है वहीं अन्य याचिका में सम्प्रदाय विशेष के अतिक्रमण तोड़ने का मुद्दा उठाया गया है | उ.प्र में योगी सरकार ने अपराधियों के अवैध निर्माण तोड़ने के लिए बुलडोजरों का जिस तरह इस्तेमाल किया वह हालिया विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बना जिसने योगी सरकार की वापिसी में बड़ा योगदान दिया | उसके बाद म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी बुलडोजर का सहारा लेकर प्रदेश भर में अतिक्रमण और अवैध निर्माण तोड़ने का सिलसिला शुरू किया | खरगौन में हुए  दंगों के बाद उपद्रवी तत्वों के ठिकानों पर बुलडोजर चलाने की कार्रवाई पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई | लेकिन योगी की तरह शिवराज सरकार पर भी ये आरोप लगने लगे कि वह भी धार्मिक आधार पर भेदभाव कर रही है | इसे लेकर एक मुस्लिम  संगठन सर्वोच्च न्यायालय जा पहुंचा | इसी बीच दिल्ली की  जहांगीरपुरी बस्ती में दंगा हो गया और जब नगर निगम ने वहां बुलडोजर चलाया तो सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी | हालाँकि इस पर भी विवाद है कि न्यायालयीन आदेश के बावजूद बुलडोजर चलते रहे और ये भी कि मस्जिद का अतिक्रमण तो तोड़ दिया गया लेकिन ज्योंही बुलडोजर बीच रास्ते में बने मंदिर तक पहुंचा अदालती आदेश के नाम पर कार्रवाई रोक दी गई | सर्वोच्च न्यायालय ने समूचे घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए फ़िलहाल कार्रवाई रोकने का आदेश जारी रखा लेकिन अन्य राज्यों में अवैध निर्माणों को हटाने के लिए चल रहे बुलडोजरों को रोकने से साफ इंकार कर दिया | यद्यपि एक से मामले में दो व्यवस्थाएं देकर सर्वोच्च न्यायालय ने नई बहस को जन्म दे दिया परन्तु इस बहाने अतिक्रमण का राष्ट्रीय मुद्दा बन जाना अच्छी बात है | विचाराधीन याचिकाओं में मुख्य मुद्दा ये है कि बिना पूर्व सूचना दिए तोड़फोड़ की जा रही है और दूसरा ये कि मुसलमानों को ही चुन – चुनकर निशाना बनाया जा रहा है | अदालत इस बारे में जो अंतिम फैसला देगी वह राष्ट्रीय स्तर पर बंधनकारी होगा परन्तु  जहाँ तक बात अतिक्रमण अथवा अवैध निर्माण तोड़े जाने की है तो ये कहना पूरी तरह सही है कि ये राष्ट्रीय बीमारी बन गई है | घनी बस्तियों में झुग्गी बनाकर रहने वाले गरीब ही नहीं अपितु कालोनियों में रहने वाला  संपन्न वर्ग तक अतिक्रमण और अवैध निर्माण करने में शान समझता है | ये बात भी स्वीकार करनी होगी कि इस प्रवृत्ति को विकसित  करने में सरकारी अमला भी सहायक होता है | सरकारी जमीनों पर होने वाले अतिक्रमण और  अवैध निर्माण बिना सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की जानकारी के  असंभव है | इसकी आड़ में जमकर भ्रष्टाचार भी होता है | ऐसे में प्रश्न ये है कि अतिक्रमण हटाये जाने पर राजनीति करना कहाँ तक जायज है ? दिल्ली में हुई कार्रवाई रोकने के लिए अदालत में खड़े वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी ये तो स्वीकार किया ही कि अतिकमण राष्ट्रीय समस्या बन गया है | अब चूंकि मामला सर्वोच्च न्यायालय में है इसलिए उसके कानूनी पक्ष  पर टिप्पणी करना तो ठीक नहीं रहेगा , लेकिन चाहे  दुकान हो या मकान , यदि उसमें अतिक्रमण है तो उसे तोड़ा जाना निहायत जरूरी है | इस बारे में समाचार माध्यमों को भी संयम और समझदारी दिखानी चाहिए | मसलन सभी टीवी चैनल वाले अपने कैमरे लेकर जहांगीरपुरी जा पहुंचे और लोगों के साक्षात्कार दिखाकर उनके प्रति सहानुभूति उत्पन्न करने में जुटे हुए हैं | एक रिपोर्टर को ये कहते भी सुना गया कि अतिक्रमण तो दिल्ली के अन्य इलाकों में भी हैं तब केवल जहांगीरपुरी में ही बुलडोजर क्यों चले ? सवाल जायज है और विचारणीय भी क्योंकि न सिर्फ घनी बस्तियों अपितु मुख्य बाजारों के साथ ही विकसित आवासीय कालोनियों तक में अवैध निर्माण की भरमार है | जब कोई वारदात हो जाती है तब प्रशासन कुम्भकर्णी नींद से जागकर तोड़फोड़ करता है | रही बात पक्षपात की तो यदि अतिक्रमण या अवैध निर्माण टूट रहा है तब उसे धार्मिक दृष्टिकोण से देखना एक तरह से उसे समर्थन देना है | म.प्र के खरगौन में दंगों के बाद चले बुलडोजर ने हिन्दुओं और मुसलमानों के मकान गिराने में शायद ही पक्षपात किया हो | यहाँ तक कि प्रधानमन्त्री आवास योजना के अंन्तर्गत बना मकान भी गिरफ्त में आ गया | बेहतर हो राजनीतिक दल और  कथित मानवाधिकारवादी अपनी सोच को व्यापक रूप देते  हुए अतिक्रमण और अवैध निर्माण को अपराधिक प्रवृत्ति मानकर उसके विरुद्ध होने वाली कार्रवाई का समर्थन करें | जिस तरह रेल में बेटिकिट यात्रा कर रहे यात्री को पकड़े जाने पर उसका ये कहकर बचने का प्रयास बेमानी है कि ट्रेन में और भी बेटिकिट हैं , तब उसे ही क्यों पकड़ा जा रहा है ? ये सच है कि सामान्य  परिस्थितियों में शासन और प्रशासन अतिक्रमण और अवैध निर्माण तोड़ने की तरफ ध्यान नहीं  देते | लेकिन  जब भी ये मुहिम चलाई जावे उसका समर्थन करना चाहिए , ताकि दूसरों में ऐसा करने का साहस पैदा न हो | खरगौन और जहांगीरपुरी में  जिन निर्माणों पर बुलडोजर चलाये गये यदि वे अतिक्रमण और अवैध की श्रेणी में आते हैं तब  उनके मालिक किस मुंह से विरोध कर रहे हैं ? रही बात पूर्व सूचना की तो दुकानों के सामने रखा सामान और टीन शेड हटाने के लिए उसकी आवश्यकता ही नहीं होती | आज जो लोग मुसलमानों के समर्थन में घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं उन्होंने कभी जहांगीरपुरी या उस जैसी किसी दूसरी बस्ती में जाकर देखा कि वे किस हालत में रहते हैं ? दिल्ली में हुए दंगे के बाद संचार माध्यमों के जरिये प्रभावित बस्ती के जो चित्र देखने मिल रहे हैं उनमें सड़कों पर कबाड़ के ढेर लगे हुए हैं क्योंकि पूरे इलाके में बहुत से कबाड़ी रहते हैं | जितनी भी दुकानें हैं सभी ने सडक पर कुछ न कुछ जगह घेर रखी थी | यहाँ तक कि जिस मस्जिद के सामने फसाद की शुरुवात हुई उसका भी बाहरी हिस्सा अवैध रूप से बनाया गया था वहीं  मन्दिर भी बीच सड़क पर है | खरगौन की जिस मुस्लिम बस्ती में बुलडोजर चले उसकी हालत भी ऐसी ही है | देश भर में जहां भी इस तरह की घनी बस्तियां हैं उन सभी में इसी तरह की दुर्दशा देखी जा सकती है | प्रधानमन्त्री आवास योजना के अंतर्गत यहाँ के लोगों का पुनर्वास कर उनका जीवन स्तर सुधारने का प्रयास भी चल रहा है | लेकिन राजनेताओं को अतिक्रमण और अवैध निर्माण करने वालों को समर्थन और संरक्षण देना बंद करना होगा | अन्यथा ये समस्या कभी हल नहीं होगी | अतिक्रमण और अवैध निर्माण को भी मजहब से जोड़ना इन बुराइयों को बढ़ावा देना ही है | गलत काम गलत ही होता है , चाहे हिन्दू करे या मुसलमान |

- रवीन्द्र वाजपेयी


 

Thursday, 21 April 2022

यूक्रेन संकट भारतीय किसानों के लिए वरदान बना



आज की दुनिया एक दूसरे से कितनी निकटता से जुड़ गई है इसका ताजा उदाहरण है यूक्रेन संकट | दो देशों के बीच यद्ध का ये पहला मौका नहीं है | अमेरिका भी वियतनाम और  अफगानिस्तान में एक दशक से भी ज्यादा लड़ता रहा । ईरान और ईराक के बीच बरसों जंग चली  | हाल के वर्षों में  सीरिया भी युद्ध की विभीषिका में लम्बे समय तक फंसा रहा | लेकिन यूक्रेन पर रूस के आक्रमण ने जिस तेजी से विश्व के शक्ति और आर्थिक संतुलन को बदला वह चौंकाने वाला है | इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भारत में देखने मिल रहा है जिसकी अर्थव्यवस्था को इस संकट ने नए अवसर दे दिए हैं | बीते साल भारत में किसान आन्दोलन सबसे बड़ी खबर हुआ करती थी | पूरे देश में किसानों की  मांगों के  पक्ष – विपक्ष में लम्बी बहस चलती रही  | टीवी चैनलों के लिए वह आंदोलन टीआरपी बटोरने का जरिया बन गया | राकेश टिकैत खबरों में छाये  रहने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों में शुमार हो गये | दबाव इतना ज्यादा बना कि आखिरकार प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को उन कृषि कानूनों को वापिस लेना पड़ गया जो उनके लिये नाक का सवाल बन गये थे | उस निर्णय को किसान आन्दोलन की जीत माना गया | लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एमएसपी ) का मसला अभी तक उलझा हुआ है और किसान संगठन धमकी दे चुके हैं कि वायदे के अनुसार केंद्र सरकार ने जल्द इस बारे में नीतिगत निर्णय नहीं लिया तो  दोबारा आन्दोलन किया जावेगा | वर्तमान में रबी फसल की सरकारी खरीद देश भर में चल रही है | अब तक होता ये था कि किसान शिकायत करते थे कि अनाज खरीदने की सरकारी प्रक्रिया में विलम्ब होता है | लेकिन इस साल उल्टा हो रहा है | गेंहू की पैदावार वाले बड़े राज्य पंजाब , हरियाणा और म.प्र में सरकारी खरीद अपने लक्ष्य से तकरीबन 40 फ़ीसदी पीछे चल रही है | जो किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज बेचने के लिए लालायित रहता था , उसकी पैदावार खरीदने के लिए निजी व्यापारी और कम्पनियां खेतों पर ही आकर सरकारी खरीद  से ज्यादा दाम दे रही हैं | किसान के लिए तो ये मानो मुंह मांगी मुराद है | उसने सपने में नहीं सोचा था कि उसे मंडी में जाए बिना घर बैठे इतना ज्यादा दाम  मिल जाएगा | किसान आन्दोलन के दौरान सरकार पर सबसे बड़ा आरोप ये लगाया जाता था कि वह किसानों को व्यापारियों के चंगुल में फंसना चाह रही थी | अडानी समूह द्वारा पंजाब और हरियाणा में बनाये जा रहे अत्याधुनिक गोदामों का भी किसान संगठन विरोध कर रहे थे | कृषि कानूनों के अंतर्गत कृषि उपज मंडी की अनिवार्यता खत्म करते हुए किसान को खुले बाजार में बेचने की जो छूट दी गई थी उसे लेकर ये प्रचारित किया गया कि मंडियां बंद करने के इरादे से वैसा किया जा रहा है | आन्दोलन खत्म होने के बाद देश में कुछ राज्यों के जो चुनाव हुए उनमें किसान आन्दोलन को मुद्दा बनाने की कोशिश भी हुई लेकिन भाजपा को मिली सफलता ने साबित कर दिया कि दिल्ली में एक साल तक चले धरने  को विपक्षी राजनीतिक नेताओं का समर्थन भले मिलता रहा लेकिन जनता ने उसके प्रति रूचि नहीं दिखाई | संयोगवश यूक्रेन संकट के कारण वैश्विक हालात जिस तेजी से बदले उसने भारत के किसानों की किस्मत का दरवाजा भी खोल दिया | उसकी उपज खेत में ही न्यूनतम समर्थन मूल्य से कहीं अधिक पर खरीदने वाले आ रहे हैं | इसका परिणाम सरकारी खरीद पर पड़ रहा है | सरकार द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ – साथ किसी भी आपात स्थिति के लिए किये जाने वाले भण्डारण के लिए ही प्रतिवर्ष बड़े पैमाने पर किसानों से खरीदी की जाती है | किसान संगठन इस बात का दबाव बनाते आये हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी स्वरूप देकर उससे कम पर खरीदने वाले को दण्डित किये जाने का प्रावधान हो | लेकिन ऐसा हो पाता उसके पहले ही बाजार की जिन ताकतों के विरुद्ध किसान नेता आवाज उठाया करते थे वे ही किसानों की झोली भरने आ रही हैं और किसान भी उम्मीद से ज्यादा दाम मिलने पर खुशी – खुशी उन्हें अपनी उपज बेच रहे हैं | हालांकि यह स्थिति स्थायी रहेगी ये कहना जल्दबाजी होगी  क्योंकि यह यूक्रेन संकट का प्रतिफल  है | लेकिन इतना जरूर  कि कम से कम एक वर्ष तो इसका असर रहेगा और तब तक यदि भारत के गेंहू की गुणवत्ता वैश्विक स्तर पर मान्य हो गई तब ये उम्मीद की जा सकेगी कि हमारे कृषि उत्पादों के लिए दुनिया के बाजार स्थायी तौर पर खुल गए हैं | और  ऐसा हो सका तब किसानों के लिए खुशहाली के दरवाजे खुलने में देर नहीं लगेगी | बीते वित्तीय वर्ष में भारत से  चावल का रिकॉर्ड निर्यात होने के बाद हमारे गेंहू की वैश्विक मांग वाकई उत्साह बढ़ाने वाली है | सरकारी खरीद के लालच में ज्यादा उत्पादन करने की वजह से ही किसान परेशानी में पड़ता रहा है | सरकार भी एक सीमा तक ही खरीद पाती है क्योंकि उसकी भण्डारण क्षमता सीमित है | हर साल लाखों टन अनाज इसी कारण सड़ जाता है जिसे औने – पौने दाम पर शराब बनाने वाले खरीदते हैं | सरकारी खरीद में होने वाला भ्रष्टाचार भी नासूर बन गया है | ऐसे में किसान को खुले बाजार में अच्छा मूल्य मिलने लगे तो बहुत सारी समस्याएँ खत्म हो जायेंगी | वैसे भी जिस काम में सरकारी दखल होता है वहां भ्रष्टाचार भी खरपतवार की तरह उग आता है | अनाज की सरकारी खरीद और सार्वजानिक वितरण प्रणाली में होने वाला भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है | हालाँकि मौजूदा हालात में राकेश टिकैत और उन जैसे अन्य किसान नेता मन ही मन कुढ़ रहे होंगे क्योंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य का उनका मुद्दा फिलहाल तो ठंडा पड़ता दिखाई दे रहा है | जिन व्यापारियों और निजी कंपनियों को साल भर जमकर गलियां दी गईं वे ही आज खेतों से सीधे अनाज खरीदकर उम्मीद से ज्यादा दाम दे रहे हैं | देखना ये है कि 'आन्दोलन होगा' की धमकी देने वाले किसान नेता इस स्थिति में क्या कदम उठाते हैं ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 April 2022

गुलामी रोकने की शुरुआत मंत्रियों के बंगलों से हो



म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों नए अवतार में दिखाई दे रहे हैं | मंत्रियों को सलामी देने वाली अंग्रेजी राज की प्रथा को खत्म करने के बाद उन्होंने पुलिस अधिकारियों के घर पर बेगारी कर रहे पुलिस कर्मियों को हटाकर थानों में तैनात किये जाने का फैसला गत दिवस किया | प्राप्त जानकारी के अनुसार लगभग तीन हजार पुलिस वाले आला अधिकारियों के बंगलों पर चौकीदारी या घरेलू काम के लिए लगाये गये हैं | शासकीय नियमों के अनुसार अधिकारियों को अर्दली की सुविधा मिली हुई है | लेकिन अनधिकृत तौर पर उनके बंगलों में नौकर और चौकीदार के तौर पर चपरासियों और सिपाहियों की तैनाती खुले आम देखी जा सकती है | मुख्यमंत्री ने ये भी स्वीकार किया कि थानों में पुलिस बल की कमी है ऐसे में अधिकारियों के घरों पर काम कर रहे पुलिस वालों को हटाना जरूरी है | लेकिन पुलिस अधिकारी ही नहीं वरन अन्य शासकीय विभागों के अधिकारियों ने भी नियम विरुद्ध अपने घरों में कर्मचारी लगा रखे हैं | दैनिक वेतन भोगी चतुर्थ वर्ग के कर्मचारी के लिए तो ऐसी बेगारी करना मजबूरी हो जाती है | ये कहना भी गलत न होगा कि  सरकारी अफसरी के सबसे बड़े आकर्षण में घूस के बाद चपरासी जैसी सुविधा भी है | दरअसल हमारे देश में शासकीय सेवा के अधिकतर नियम आज भी ब्रिटिश सत्ता के ज़माने के हैं | ये कहना भी गलत न होगा कि सरकारी अधिकारी के दिमाग में अंग्रेजी दौर की अकड़ विद्यमान है | इसका असर प्रशासन में भी नजर आता है | लोकतान्त्रिक प्रणाली के बावजूद लोक सेवक कहलाने वाला अधिकारी वर्ग आज भी श्रेष्ठता के भाव से भरा हुआ है | ऐसे में शिवराज सिंह  का उक्त फैसला वाकई स्वागतयोग्य है | लेकिन बेहतर होता इसकी शुरुवात वे मंत्रियों के बंगलों से करते जिनको खुश करने के लिए उनके मातहत अधिकारी कर्मचारियों को उनके बंगलों में सेवा हेतु भेज देते हैं | शायद ही कोई मंत्री होगा जिसके शासकीय निवास पर सरकारी कर्मचारी न तैनात हों | हालांकि एक हद तक ये जरूरी भी है लेकिन सेवा शर्तों के बाहर जाकर सरकारी कर्मचारियों से बेगारी करवाना किसी भी  दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता | हाल  ही में आम आदमी पार्टी की  सरकार ने पंजाब में भी पुलिस को वीआईपी सुरक्षा से हटाकर थानों में पदस्थ करने का निर्णय किया ताकि आम  जनता की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके | म.प्र के मुख्यमंत्री स्वयं तो सादगी पसंद और जमीन से जुड़े नेता हैं लेकिन उनकी सरकार के  अधिकतर मंत्रियों के रहन सहन में राजसी ठाट – बाट नजर आता है |  उनके बंगलों पर बेगारी करने वाले कर्मचारियों की फ़ौज किसी से छिपी नहीं है | जिस तरह अधिकारियों के घरों पर तैनात पुलिस वालों की वजह से थानों में पुलिस बल की कमी अनुभव की जाती है उसी तरह मंत्रियों और अन्य विभागीय  अधिकारियों के बंगलों की स्थिति भी है | इसके अलावा सरकारी वाहनों का दुरूपयोग भी सरकारी खजाने पर बड़ा बोझ है | हर बंगले पर एक से ज्यादा वाहन मय ड्रायवर के खड़े नजर आते हैं | यदि मंत्री के पास एक से ज्यादा विभाग हैं तब वह उन सबके वाहनों का उपयोग करता है | अधिकारी तो अंग्रेजी राज वाली मानसिकता से बाहर आने को तैयार ही नहीं हैं | ऐसे में श्री चौहान का फैसला कितना कारगर हो पायेगा ये बड़ा सवाल है | भोपाल में तो सत्ता की मौजूदगी हर जगह दिख जाती है लेकिन जिला स्तर पर भी नेताओं और अफसरों का गठजोड़ सामंतशाही का नजारा पेश करने में पीछे नहीं रहता | कलेक्टर तो खैर बड़ी बात है किन्तु पटवारी तक इस तरह पेश आता है मानों वह मालिक हो और आम जनता उसकी गुलाम | मुख्यमंत्री ने पहले सलामी और अब गुलामी बंद करने का जो साहस दिखाया वह निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है लेकिन उनका ये निर्णय पूरी तरह लागू हो ये भी उन्हें देखना होगा क्योंकि सचिवालय में लिए गये अच्छे फैसले भी निचले स्तर तक आते – आते अपना असर खोने लगते हैं | सरकारी अधिकारी चाहे वह पुलिस का हो या अन्य किसी विभाग का , इतनी आसानी से मुफ्त में उपलब्ध  सुख और सुविधाओं को छोड़ देगा , ये विश्वास कर पाना कठिन है | बेहतर हो मंत्रियों के बंगलों से इसकी शुरुवात की जावे ताकि अधिकारियों पर भी दबाव बने , वरना कागजों में तो अधिकारियों के बंगलों पर चल रही बेगारी खत्म दिखाई देगी लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत रहेगी | रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर राज्य भारी कर्ज में डूबे हैं | मुफ्त की सुविधाएँ बांटकर खजाने को जिस बेरहमी के साथ खाली किया गया उसकी वजह से उनकी अर्थव्यस्था खतरे के निशान को छूने लगी है | ऐसे में सरकारी खर्च कम करने की जरूरत है और उसके लिए मंत्रियों के बंगलों की साज - सज्जा पर होने वाले खर्च को रोकने के साथ ही उनमें तैनात कर्मचारियों में कमी भी जरूरी है | सही  बात ये है कि जनता के धन पर राजसी वैभव भोगने में नेता और नौकरशाह दोनों एकजुट हैं | नेताओं के लिए नियम विरुद्ध सुख – सुविधाओं का इंतजाम कर उसकी आड़ में नौकरशाह अपनी शानो – शौकत का भी जुगाड़ कर लेते हैं | ऐसे में श्री चौहान ने सलामी और गुलामी के विरुद्ध जो कदम उठाये हैं वे तभी कारगर हो सकेंगे जब सत्ता में बैठे नेताओं की ठसक में कमी लाई जाए | मंत्रियों और अधिकारियों को सुरक्षा और सुविधा उनके पद की जिम्मेदारियों के लिहाज से मिलनी ही चाहिए लेकिन ये ध्यान रखा जाना भी जरूरी है कि इनका दुरूपयोग न हो और इनकी वजह से अनावश्यक खर्च भी न बढ़े | शिवराज सिंह निश्चित रूप से आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए मोर्चेबंदी में जुटे हुए हैं और उसके लिए वे आये दिन ऐसे निर्णय ले रहे हैं जिनसे उनकी सरकार की छवि जनमानस में उज्ज्वल हो | जनहित की योजनाओं के लिए तो उनकी सरकार काफी लोकप्रिय है लेकिन प्रशासनिक अराजकता वह धब्बा है जो मिटाए नहीं मिट रहा | ऐसे में मुख्यमंत्री ने पुलिस अधिकारियों के बंगलों में चल रही गुलामी या बेगारी को खत्म करने का जो फरमान निकाला वह सही कदम तो है लेकिन उससे किसी चमत्कार की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी | जब तक शासन और प्रशासन दोनों में बैठे महानुभाव सादगी और सरलता को नहीं अपनाते तब तक वह सुधार संभव नहीं जो वे चाहते हैं | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 19 April 2022

दंगाइयों को भी आतंकवादी मानकर कार्रवाई की जाए



दिल्ली के जहांगीराबाद इलाके में हनुमान जयन्ती के  जुलूस पर  पथराव और दंगा करने वाले लोगों की पुलिस धरपकड़ कर रही है | दोनों पक्षों के जिम्मेदार लोगों पर  मामले कायम हो रहे हैं |  मस्जिद पर हिन्दू झन्डा लगाये जाने की शिकायत गलत पाए जाने के बाद ये भी स्पष्ट हो गया है कि जुलूस पर पथराव सुनियोजित था | गोली चलाने वाले युनुस नामक कबाड़ी को पकड़ने गये पुलिस बल पर गत दिवस जिस तरह से पथराव हुआ वह अपने आप में काफी कुछ कह जाता है | आरोप है कि सोनू शेख नाम से लोकप्रिय 28 वर्षीय युनुस प. बंगाल का रहने वाला है और बतौर कबाड़ी उसने काफी पैसा कमाया | उस घनी बस्ती में रहने वाले लोगों को पत्थर  और कांच की बोतलें उसी ने उपलब्ध कराई थीं | पुलिस सूत्रों के अनुसार हनुमान जयन्ती की शोभायात्रा बिना अनुमति निकाली गई थी जिसके लिए आयोजकों पर भी कानूनी कार्रवाई की जा रही है | लेकिन सतही तौर पर जो तथ्य सामने आये हैं उनके अनुसार मस्जिद के पास जुलूस पहुंचने पर दोनों पक्षों के बीच मामूली बहस होने लगी जिसे दंगा भड़कने का कारण नहीं माना जा सकता किन्तु उसी दौरान पत्थर और कांच की बोतलों के साथ ही हथियारों के साथ भीड़ ने आकर हमला किया | कुल मिलाकर करौली , खरगौन और जहांगीराबाद के दंगे किसी धारावाहिक की कड़ी प्रतीत होते हैं क्योंकि उनकी पटकथा एक समान है | केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह  ने दिल्ली पुलिस को दंगा करने वालों के विरुद्ध ऐसी कार्रवाई करने कहा है जो मिसाल बन जाए | उधर उ.प्र सरकार ने बिना पूर्व अनुमति के किसी भी प्रकार के जुलूस या शोभायात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया है | जहांगीराबाद के दंगे के बाद वहां रह रहे हिन्दुओं ने अपनी शिकायत में बंगाली मुसलमान शब्द का इस्तेमाल किया जिससे दिल्ली में आकर बस गये बांग्ला देशी मुसलमानों पर एक बार फिर ध्यान चला गया | देश के अन्य स्थानों से भी बांग्ला देशियों  के साथ म्यांमार से खदेड़े गये रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा समय – समय पर किये जने वाले उत्पात की शिकायतें आया करती हैं | नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में पूरे देश में जिस तरह का योजनाबद्ध उत्पात हुआ उसके पीछे भी इनकी बड़ी भूमिका बताई जाती है क्योंकि उन कानूनों में इनको अपने लिए खतरे की घंटी सुनाई दे रही थी | इस बारे में देखने वाली बात ये है कि 1971 में बतौर शरणार्थी भारत आये करोड़ों बांग्ला देशी शरणार्थियों को वापिस भेजने की ठोस नीति और  कार्ययोजना न बनाये जाने के कारण वे पूरे देश में फ़ैल गये | बांगला देश बनने के महज चार साल के भीतर ही शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या होने के बाद वहां आई सत्ता ने भारत विरोधी रवैया अपना   लिया जिसकी वजह से पहले से आये शरणार्थी तो लौटे नहीं ऊपर से नए  आने का सिलसिला जारी रहा जिसकी वजह से प. बंगाल , असम और त्रिपुरा जैसे  सीमावर्ती राज्यों की जनसंख्या का संतुलन बिगड़ता गया | आज देश के सभी महानगरों में लाखों की संख्या बांग्ला देशी नागरिकों की है जो अपनी पहिचान को छिपाकर रखते हैं | इसी तरह रोहिंग्या मुस्लिम भी फैलते चले  जा रहे हैं | दुर्भाग्य से वोट बैंक की राजनीति इनको निकाल बाहर करने में बाधक बन जाती है | हाल के वर्षों में सांप्रदायिक झगड़े होने पर जिस तरह की आक्रामकता मुस्लिम समुदाय के बीच दिखाई देने लगी है उसके पीछे अवैध रूप से देश में रहने वाले ये विदेशी मुसलमान भी हैं जिनको स्थानीय संरक्षण प्राप्त हो जाता है | सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण इन्हें  राशन कार्ड सहित अन्य पहिचान पत्र उपलब्ध हो जाने से  शासकीय योजनाओं का लाभ भी मिल जाता  है | ये देखते हुए नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लागू किये जाने की सख्त जरूरत है | भारत को शरणार्थियों का स्थायी आश्रय स्थल बनाने के षडयंत्र को यदि विफल नहीं किया गया तो  सांप्रदायिक उपद्रव की आड़ में आतंकवादी गतिविधियाँ बढ़ती जायेंगी| इस बारे में याद रखना होगा कि भले ही बांग्ला देश की शेख हसीना सरकार भारत के प्रति दोस्ताना रुख रखती हो लेकिन उनके देश में अनेक भारत  विरोधी आतंकवादी संगठन काम कर रहे हैं | हिन्दू मंदिरों पर होने वाले हमले इसका प्रमाण हैं | दूसरी बात ये है कि कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों पर नियन्त्रण हो जाने से अब आतंकवाद का विकेंद्रीकरण पूरे देश में होने की  आशंका बढ़ रही है | हालिया दंगे इस बात की पुष्टि करते हैं कि कोई न कोई संगठन इनके पीछे है | इनके अलावा देश के दूसरे हिस्सों में हिजाब जैसे विवाद भी सोची – समझी रणनीति का हिस्सा हैं | कुल मिलाकर बात ये है कि अलगाववाद का अभियान  सीमावर्ती राज्यों से निकलकर देश के भीतरी हिस्सों में फ़ैल चुका है | पत्थरबाजी रूपी जो नया हाथियार इन दंगों के दौरान देखने मिला वह अचानक जन्मा हो ऐसा नहीं है | दिल्ली में दो वर्ष पहले हुए दंगे में भी इसका उपयोग जमकर किया गया था | शाहीन बाग़ के आन्दोलन को विपक्षी दलों ने समर्थन देकर मुस्लिम चरमपंथ को प्रोत्साहित करने की जो गलती की उसके कारण उसका हौसला बुलंद हुआ | जिसका प्रमाण इन सभी वारदातों में पुलिस वालों पर हुए जानलेवा हमले हैं | खरगौन में तो पुलिस अधीक्षक  को ही गोली मारी गयी | ऐसे में दंगा करने वालों पर  बिना किसी दबाव के कठोर कार्रवाई करना जरूरी है  | इसके लिए बेहतर यही  होगा कि उन्हें  आतंकवादी माना जावे जिससे वे मामूली दंड पाकर बच न सकें  | दंगाइयों के घरों को ढहाए जाने के विरुद्ध तो  मुस्लिम संगठन सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक जा पहुंचे हैं लेकिन उनमें से किसी ने भी ये मांग नहीं की कि पुलिस  पर हमला करने वालों को कड़ी सजा दी  जावे | जहांगीराबाद के दंगे में गोली चलाने वाले सोनू शेख ने अपना जुर्म कबूल भी कर लिया लिया है लेकिन मुस्लिम समाज की तरफ से उसके विरोध में एक भी  बयान नहीं आया |  उल्टे  उसे गिरफ्तार करने गये पुलिस कर्मियों पर अगल - बगल में रहने वाले मुस्लिमों ने पथराव किया जिससे साबित हो गया  कि वे सब दंगे में शरीक थे | दंगाइयों के घर तोड़े जाने के विरोध में मानवाधिकार का मसला उठाये जाने के साथ ही मुसलमानों के साथ पक्षपात किये जाने की  बातें की जा रही हैं | कश्मीर घाटी के पत्थरबाजों के विरुद्ध पैलेट गन का इस्तेमाल किये जाने पर भी इसी तरह की चिल्ल - पुकार मची थी | इसलिए जिस तरह आतंकवादियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाती है वैसी ही दंगाइयों पर नहीं होती तो पत्थरबाजी होती रहेगी | जड़ों को खोदने के बाद भी मठा डालने की चाणक्य नीति को लागू किया जाना समय की मांग है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 18 April 2022

प्रशांत के आने से और भी अशान्त हो सकती है कांग्रेस



कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में परिवर्तन की मांग को लेकर कुछ असंतुष्ट नेता सामने आये थे | जी 23 नामक एक समूह भी बना जिसकी अनेक बैठकें हो चुकी हैं | हाल ही में इसके नेता गुलाम नबी आजाद की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी से हुई मुलाकात के बाद ये कयास लगे थे कि उनको राज्यसभा भेजकर असंतुष्टों की मुहिम ठंडी कर दी जायेगी | इसके बाद श्री आजाद को लेकर जी 23 में मतभेद उभरने की बात भी सुनने मिली | दरअसल इस समूह के अधिकतर सदस्य राज्यसभा के जरिये ही राजनीति करते आये हैं | उनको लग रहा है कि राज्यसभा से बाहर रहने पर उनकी वजनदारी खत्म हो जायेगी | लेकिन  राज्यों में  तेजी से सिमटने के कारण कांग्रेस के पास राज्यसभा में भेजने लायक विधायकों का संख्याबल भी नहीं है | यद्यपि केन्द्रीय नेतृत्व  को लेकर चली  आ रही अनिश्चितता से पार्टी के साधारण कार्यकर्ता भी चिंतित हैं | 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी द्वारा अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिए जाने के बाद से उनकी माताजी कार्यकारी  अध्यक्ष बनी हुई हैं | यद्यपि महत्वपूर्ण फैसलों में अभी भी राहुल का दखल रहता है | लेकिन  ये कहना गलत न होगा कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर कायम  असमंजस का असर  उसके आभामंडल में निरंतर कमी आने के तौर पर दिखाई दे रहा है | प. बंगाल के बाद उ.प्र के विधानसभा चुनाव में जो दुर्गति हुई उससे उसके अस्तित्व पर ही सवाल उठ खड़े हुए हैं | ममता बैनर्जी ने तो उसे तृणमूल में विलीन करने जैसी बात तक कह डाली | इस सबके बावजूद शीर्ष स्तर पर संगठनात्मक ढांचे के विधिवत गठन की बजाय अभी भी गांधी परिवार येन केन प्रकारेण पार्टी को अपने शिकंजे में रखना चाह रहा है | इसका ताजा प्रमाण है चुनाव प्रबन्धन विशेषज्ञ प्रशांत किशोर के कांग्रेस में आने की खबरें | गत सप्ताह उन्होंने गांधी परिवार के समक्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की रणनीतिक कार्ययोजना प्रस्तुत करते हुए सुझाव दिया कि पार्टी   तकरीबन 370 सीटों पर चुनाव मैदान में उतरे जहाँ वह मुकाबला करने में सक्षम है और बाकी सीटें क्षेत्रीय दलों के लिए छोड़कर अपनी शक्ति के अपव्यय से बचे | उन्होंने और भी कुछ  सुझाव पार्टी नेतृत्व को दिए | हालाँकि उनके कांग्रेस में आने की अटकलें लम्बे समय से लगाई जा रहे हैं | 2017 के विधानसभा चुनाव में पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और उ.प्र में राहुल गांधी ने उनकी पेशेवर सेवाएँ ली थीं | पंजाब में तो कांग्रेस जीती लेकिन उ.प्र में उसका सफाया हो गया | उसके बाद प्रशांत अलग – अलग राज्यों में विभिन्न पार्टियों के लिए चुनावी रणनीति बनाते रहे | गत वर्ष हुए प. बंगाल चुनाव के चुनाव में ममता बैनर्जी की धमाकेदार जीत में बतौर रणनीतिकार उनकी शोहरत बुलंदी पर जा पहुँची | उसके पहले वे बिहार में नीतीश कुमार के साथ जनता दल ( यू ) में रह चुके थे | ममता को राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी का विकल्प बनाने के लिए आगे लाने के पीछे उन्हीं का दिमाग था | उसी सिलसिले में वे शरद पवार सहित अन्य विपक्षी  नेतओं से भी मिले | तृणमूल को गोवा विधानसभा चुनाव में उतारने में भी वही सोच रही |   लेकिन इसी बीच उनके ममता से रिश्ते खराब होने के खबरें भीं आने लगीं | इन सबसे लगता है प्रशांत की ज्यादा देर तक किसी से जमती नहीं है | इसकी  वजह संभवतः उनका गैर राजनीतिक होना है , वरना 2014 में श्री मोदी के चुनाव अभियान की रणनीति बनाने के बाद उनके भाजपा से मतभेद न हुए होते | यद्यपि कांग्रेस में उनके प्रवेश की अब तक पुष्टि नहीं हुई लेकिन इसकी चर्चा मात्र से काफी हलचल मच गई है | कहा जाने लगा है कि श्री किशोर ने गांधी परिवार से अपनी ये  शर्त मनवा ली है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में आमूल बदलाव करेंगे | कांग्रेस पर नजर रखने वाले विश्लेषकों  के अनुसार प्रशांत को लाने का उद्देश्य पार्टी पर गांधी परिवार के आधिपत्य को बनाये रखना है  | ये बात बिलकुल सही है कि कांग्रेस के प्रथम परिवार का दरबारी बनने वाली प्रवृत्ति खत्म होती जा रही है | नई पीढ़ी के नेता  समझ गये हैं कि परिवार का करिश्मा खत्म हो चुका है | श्रीमती गांधी अस्वस्थता की वजह से न ज्यादा समय दे पाती हैं और न ही  परिश्रम करना उनके लिए संभव रहा | उत्तराधिकारी के तौर पर उनहोंने बेटे राहुल को पार्टी की कमान सौंपी परंतु वे बुरी तरह विफल रहे | उनके बाद प्रियंका वाड्रा ने परिवार के प्रतिनिधि के रूप में उ.प्र की बागडोर संभाली लेकिन वे भी असफल साबित हुईं | ऐसा लगता है श्रीमती गांधी अपनी संतानों की क्षमता को भांप गई  हैं और दूसरी तरफ परिवार के वफादार नेता या तो बढ़ती आयु या फिर असंतुष्ट होकर किनारा करते जा रहे हैं | राहुल के आगे आने पर युवा नेताओं की जो टोली नजर आने लगी थी वह भी बिखर चुकी है | प्रियंका अपने भाई की तुलना में तेज – तर्रार तो हैं लेकिन  राजनीति की ज़मीनी सच्चाइयों से अनभिज्ञ होने की वजह से वे भी नाकामयाब साबित हुईं | इसका सबसे बड़ा खामियाजा ये हो रहा है कि कांग्रेस से जाने वालों की तो कतार लगी हुई है परन्तु उसमें आने वाले नजर नहीं आ रहे | राहुल के करीबी कुछ युवा नेता भाजपा में जा चुके हैं और बाकी के भी सुरक्षित भविष्य के लिए विकल्प तलाश रहे हैं | ऐसे में प्रशांत यदि पार्टी में आते हैं और गांधी परिवार उनको बड़े बदलाव की छूट देता है तब जी 23 की तरह असंतुष्टों के नए समूह सामने आ सकते हैं | सही बात ये है कि कांग्रेस इस समय वैचारिक दृष्टि से शून्य हो चुकी है | गांधी परिवार पर सब कुछ छोड़ देने की गलती से हुआ नुक्सान  इतना बड़ा हो चुका है कि उसकी भरपाई कृत्रिम तरीके से नहीं  की जा सकती | सबसे बड़ी बात ये है कि श्री किशोर की अपनी कोई विचारधारा तो है नहीं | भाजपा , जनता दल  ( यू ) , तृणमूल , द्रमुक आदि के लिए वे चुनावी प्रबंधन कर चुके हैं | नीतिश कुमार ने तो उनको अपनी पार्टी में पद भी दिया | लेकिन वहां भी वे टिके नहीं और ममता के साथ जुड़ गए | कहते हैं प. बंगाल के स्थानीय निकाय चुनावों हेतु प्रत्याशी चयन में उनके साथ टकराव के बाद प्रशांत नई नाव में सवार होना चाहते हैं और कांग्रेस ही अब ऐसी पार्टी है जिसमें  उनको जगह दिख रही है | हालाँकि बतौर चुनाव रणनीतिकार तो वे ठीक हैं लेकिन पार्टी संगठन में उठापटक करने पर उनका विरोध होना स्वाभाविक है | ऐसे में बड़ी बात नहीं प्रशांत के आने से कांग्रेस और अशान्त हो जाए क्योंकि जब गांधी परिवार के एकाधिकार को चुनौती मिल रही हो तब नए – नए पेशेवर को कितना बर्दाश्त किया जावेगा ये सोचने वाली बात है |  

- रवीन्द्र वाजपेयी