Tuesday, 3 May 2022

और भी दर हैं ज़माने में सियासत के सिवा ....



एक जमाना था जब बाहुबली या रंगदार किस्म के लोग नेताओं की चुनाव में मदद करने के एवज में उनसे संरक्षण प्राप्त किया करते थे | कालान्तर में उन्हें लगा कि वे जब उनको जितवा सकते हैं तब खुद ही क्यों न विधायक - सांसद बन जाएँ | और उसके बाद भारतीय राजनीति की  चाल , चरित्र और चेहरा न सिर्फ बदला अपितु विकृत होता गया | दरअसल हमारा समाज इतना ज्यादा राजनीतिमय होकर रह गया है कि हर तबके के भीतर उसमें घुसने की ललक दिखाई देने लगी है | प्रशासनिक अधिकारी सेवा निवृत्त होते ही सियासत में ठिकाना तलाशने लगे हैं | उद्योगपति , कलाकार , सामाजिक कार्यकर्ता , लेखक , पत्रकार . अधिवक्ता और अभिनेता सभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर राजनीति के मैदान में उतरने की लालसा पाल बैठे हैं | दरअसल समूची व्यवस्था पर राजनेता जिस प्रकार कुंडली मारकर बैठ गए हैं उससे ये अवधारणा मजबूत होती जा रही है कि राजनीति में आने से आपके हाथ में निर्णय क्षमता आ जाती है | वरना बतौर साधारण कानून पसंद नागरिक  आप मक्खी – मच्छर से ज्यादा कुछ भी नहीं | इसीलिये सार्वजानिक जीवन में कुछ अपवाद छोड़कर हर किसी की अंतिम मंजिल राजनीति बन जाती है | 1974 का छात्र आन्दोलन जिन समस्याओं को लेकर शुरू हुआ वे आज भी यथावत हैं जबकि उसी आन्दोलन से निकले अनेक युवा नेताओं ने सत्ता में आकर  अपनी भावी पीढ़ियों तक का उद्धार कर लिया | गुजरात में हार्दिक पटेल पाटीदार समाज के लिए बड़ा आन्दोलन खड़ा करने के बाद आखिरकार राजनीति के जंजाल में आकर उलझ गए | आम आदमी पार्टी के रूप में दिल्ली में जो दल सत्ता में आया वह भी अन्ना हजारे के उस आन्दोलन की कोख से  निकला जो बड़े सामाजिक बदलाव के लिए किया गया था | आज अन्ना तो अपने गाँव में बुढ़ापा काट  रहे हैं वहीं  उनके नाम के सहारे सत्ता में आये अरविन्द केजरीवाल को इतनी भी फुर्सत नहीं कि कभी जाकर उनके हालचाल पूछ आयें | कहने का आशय ये है कि राजनीति ने हमारी सोच को इस हद तक जकड़ लिया है कि योग्य से योग्य व्यक्ति तक को  लगने लगा है कि उसकी काबिलियत तब तक बेकार है जब तक उसके पास राजनीति नामक ब्रह्मास्त्र न हो | हालाँकि ये भी उतना ही सही है कि उसमें अच्छे लोगों का आना ही नहीं अपितु बने रहना बेहद जरूरी है | लेकिन कटु सत्य ये है कि जिस तरह खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है उसी तरह खराब लोगों की वजह से अच्छे लोग राजनीति में घुटन महसूस करने लगते हैं | लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि समाज ने राजनीति को ही अपना भाग्य विधाता मान लिया है | यही वजह है कि दूसरों के लिए चुनावी रणनीति बनाने के लिए प्रसिद्ध हुए प्रशांत किशोर ने भी अंततः राजनीतिक दल बनाने का निर्णय कर डाला | कुछ दिन पहले तक उनके कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा जोरों पर थी लेकिन अब अपने गृह राज्य से वे नई पार्टी की शुरुवात करते हुए जल्द ही लोगों के बीच जाकर आगे की रूपरेखा तय करेंगे | वे बिहार तक ही सीमित रहेंगे या राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराएँगे ये तो आने वाला समय ही बताएगा  | वैसे जहां तक बात आम आदमी पार्टी की है तो वह दिल्ली जैसे महानगर से ऊपर उठी और उसके चुनावी मुद्दे भी नगरीय स्तर के ही थे | आज भी उसका चिंतन मुफ्त बिजली – पानी जैसे मुद्दों में ही उलझा हुआ है |  पंजाब में मिली सफलता के पीछे भी मुफ्त संस्कृति का ही योगदान है | ऐसे में प्रशांत किस बात को लेकर जनता के बीच जायेंगे ये बड़ा सवाल है क्योंकि  दूसरों को चुनाव जीतने के गुर सिखाना अलग बात है और खुद मैदान फतह करना अलग | श्री किशोर के मन में ये पीड़ा हो सकती है कि उनका सहारा लेकर सत्ता तक पहुँचे नेता भी  उन्हीं  घिसे - पिटे तरीकों से काम कर रहे हैं जिनके विरुद्ध उन्हें जनादेश प्राप्त हुआ | लेकिन इसमें उनका दोष भी कम नहीं हैं क्योंकि वे राजनीतिक नेताओं को सत्ता में आने के तौर - तरीके तो सिखाते रहे लेकिन आदर्शवादी शासन व्यवस्था कायम करने के बारे में कोई सीख  किसी को दी हो ये शायद ही किसी ने सुना होगा | वरना वे बिहार में नीतिश के साथ लालू के गठबंधन को विजयी बनाने में सहायक न बनते | यही बात प. बंगाल के बारे में कही जा सकती है | और फिर ममता को प्रधानमंत्री बनवाने की मुहिम को बीच में छोड़कर वे कांग्रेस के पुनरुद्धार में क्यों लग गये इसका भी संतोषजनक जवाब उनके पास नहीं होगा | 2014 में नरेंद्र मोदी की चुनावी रणनीति बनाने के बाद से वे प्रकाश में आये और फिर  अनेक पार्टियों ने उनकी  सेवाएं लीं | उन सभी के साथ उन्होंने जुड़ने का प्रयास भी किया परन्तु ज्यादा देर तक  टिके नहीं और अंततः अपनी पार्टी बनाकर उन  महत्वाकांक्षाओं को जमीन पर उतारने का मन बना बैठे जिससे वे अब तक इंकार किया करते थे | लेकिन उन जैसे तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति को ये बात क्यों नहीं समझ में आ रही  कि जिस तरह उन्होंने कहा था कि कांग्रेस को नए नेता की नहीं अपितु बड़े बदलाव की जरूरत है , उसी तरह देश को नए राजनीतिक दल की बजाय एक बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है , जो राजसत्ता पर अंकुश का काम कर सके |  आजादी के बाद महात्मा गांधी भी इसी भूमिका में आना चाहते थे किन्तु जल्दी ही उनका अवसान हो गया | लम्बे अन्तराल के बाद जयप्रकाश नारायण सम्पूर्ण क्रांति के नारे के साथ मैदान  में उतरे परन्तु उनकी मुहिम भी सत्ता परिवर्तन के साथ दम तोड़ बैठी और ऐसा ही कुछ हुआ अन्ना हजारे के आन्दोलन के साथ जिसके कन्धों पर चढ़कर केजरीवाल एंड कम्पनी ने सत्ता हथिया ली लेकिन उनको दूर धकेल दिया | मौजूदा व्यवस्था के प्रति प्रशांत की निराशा समझ में आती है किन्तु वे अपनी प्रतिभा और क्षमता का उपयोग राजनीति के दलदल में उतरकर करेंगे तो उसमें फंसकर रह जायेंगे | बेहतर हो अपने अध्ययन और अनुभव के आधार पर वे  एक गैर   राजनीतिक मंच तैयार करें जो सत्ता पर दबाव बनाने में सक्षम हो | समाज में आज भी ऐसा एक तबका है जो पद , प्रतिष्ठा और पैसे की भूख  से निर्लिप्त रहकर देश की भलाई के लिए कुछ करना चाहता है लेकिन उचित  मंच न मिलने से वह बुद्धिविलास तक सीमित है | प्रशांत को चाहिए ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ें जो सत्ता के आकर्षण से मुक्त हैं  | यदि वे ऐसा करते हैं तब उनकी आवाज देश भर में फैलते देर नहीं  लगेगी | उनको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि नई पार्टी बनाने के बाद सामाजिक परिवर्तन  के लिए उनको चुनाव लड़ना ही नहीं अपितु जीतना भी पड़ेगा और उसके लिए किये जाने वाले धतकरमों से वे बखूबी परिचित हैं |  इसलिए बेहतर तो यही होगा वे एक सामाजिक आन्दोलन का सूत्रपात करें जिसकी वर्तमान हालात में सख्त जरूरत है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 2 May 2022

जीएसटी से रिकॉर्ड कमाई का लाभ जनता को भी मिलना चाहिए



कोरोना के कहर से उबर रही अर्थव्यवस्था के लिए नए वित्तीय वर्ष का पहला महीना खुशनुमा हवा का झोका लेकर आया | गत दिवस अप्रैल महीने में हुए जीएसटी संग्रह के जो आंकड़े आये उनसे सरकार बेहद खुश होगी | 1.67 लाख करोड़ की मासिक जीएसटी आमदनी अब तक की सर्वोच्च है | जबसे ये कर प्रणाली लागू हुई है तबसे लेकर मार्च 2022 तक किसी भी महीने में जीएसटी की वसूली 1.5 लाख करोड़ से अधिक नहीं हुई | कोरोना के दो साल तो अर्थव्यवस्था के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं थे  | लेकिन उसके बाद आर्थिक जगत में हलचल बढ़ी और कुछ क्षेत्रों को छोड़कर बाकी पुरानी रंगत पर लौट आये | हमारे देश की अर्थव्यवस्था में खेती और शादियों का बड़ा ही अनूठा गठजोड़ है | कोरोना काल में लॉक डाउन तथा अतिथियों की संख्या सीमित किये जाने से शादियों में परम्परागत रौनक दिखाई नहीं दी जिसका सीधा असर खाने – पीने की चीजों के साथ ही आभूषण , कपड़ा और परिवहन व्यवसाय पर पड़ा | यद्यपि कृषि क्षेत्र ने उत्पादन के रिकॉर्ड तोड़ दिए लेकिन बाजार बंद रहने से कृषक  समुदाय जिस उत्साह के साथ खर्च करता है , उस पर भी रोक सी लग गयी | निजी क्षेत्रों में कार्यरत लाखों कर्मचारी बेरोजगार हो गए , मजदूर वर्ग के सामने तो पेट भरने तक का संकट आ खड़ा हुआ |  स्वरोजगार पर आधारित पेशेवर वर्ग भी उस दौरान तकलीफ  सहने बाध्य हुआ | व्यापारी और उद्योगपति को तो दोहरी मार पड़ी | रोज कमाने वाला उद्यमी  हाथ पर हाथ धरे बैठने मजबूर हो गया | ऐसे में जीएसटी के रूप में आने वाला कर घटता गया | लेकिन ज्योंही कोरोना का प्रकोप कम हुआ त्योंही भारतीय अर्थव्यवस्था जिस तेज गति से आगे बढ़ी वह वाकई उत्साहवर्धक है | बीते साल के उत्तरार्ध से हर महीने जीएसटी की आय में हुई उत्तरोत्तर वृद्धि से इस बात की पुष्टि होने लगी कि उद्योग , व्यापार और उपभोक्ता के बीच का आर्थिक व्यवहार अपने मूल स्वरूप में आ चुका है | कार और दोपहिया वाहनों की अचानक बढ़ी मांग का कारण भी यही समझ में आया कि महामारी के दौरान लंबित पड़ी मांग बाजार खुलते ही सामने आई | ऐसा ही कुछ पर्यटन के क्षेत्र में महसूस किया गया | कश्मीर घाटी में बीते कुछ महीनों में सैलानियों की संख्या ने घाटी की अर्थव्यवस्था को मानो प्राणवायु प्रदान कर दी | विवाह समारोह में अतिथियों की संख्या पर लगी पाबंदी हट  जाने से भी इस व्यवसाय से जुड़े कारोबारियों के चेहरे पर चमक लौटी | गत वर्ष दीपावली पर उपभोक्ताओं के उत्साह ने भी आर्थिक जगत की  खुशियां बढ़ाईं | लेकिन इस सबके साथ ही महंगाई भी जिस तेजी से बढ़ी वह ऐसा  नकारात्मक पक्ष है जो आम उपभोक्ता की खुशियों को कम करने का काम कर रहा है | ये अच्छी बात है कि जनता ने बीते दो वर्ष के दौरान आई असाधारण परिस्थितियों के दौरान पूरी तरह धैर्य और अनुशासन का परिचय दिया | इसके साथ ही ये भी कहना होगा कि सरकार ने भी उस अभूतपूर्व संकट के दौरान अपने कर्तव्य का पालन बखूबी करते हुए लोगों का मनोबल बनाये रखा , वरना अराजकता फैलते देर न लगती | बहरहाल अब जब सरकार के पास बीते वित्तीय वर्ष में करों से अनुमानित आय का आंकड़ा अपेक्षा से अधिक होने की वजह से सुविधाजनक स्थिति बन गई तब ये जनापेक्षा भी है और सरकार का नैतिक दायित्व भी कि  महंगाई से हलाकान हुई जा रही जनता की तकलीफों पर राहत की बरसात की जाए | प्रधानमंत्री ने बीते सप्ताह राज्यों से पेट्रोल – डीजल पर करों में कमी करने की गुजारिश की थी | उस पर महाराष्ट्र और प.बंगाल से तो काफी तीखी प्रतिक्रिया आई किन्तु अब तक भाजपा शासित किसी राज्य ने भी प्रधानमंत्री की बात का मान रखते हुए  करों में कटौती करने की सौजन्यता प्रदर्शित नहीं की | लेकिन मौजूदा सन्दर्भ में बात  केवल पेट्रोल – डीजल तक ही सीमित नहीं रही क्योंकि आम जनता के दैनिक उपयोग में आने वाली तकरीबन हर चीज के दाम बेतहाशा बढ़े हैं | ये देखते हुए ये आवश्यक प्रतीत होता है कि आसमान छू रही महंगाई से जन साधारण को राहत दिलवाने कुछ न कुछ किया जाना चाहिये | आर्थिक मामलों के जानकार इस तथ्य से भली- भाँति  परिचित होंगे कि जीएसटी की रिकॉर्ड तोड़ वसूली दरअसल महंगाई की वजह से संभव हो सकी क्योंकि यह कर प्रणाली  मूल्यों की घट -  बढ़ पर आधारित है | प्रधानमंत्री ने राज्यों से पेट्रोल  – डीजल पर कर घटाने  का जो आग्रह किया वह सर्वथा उचित है लेकिन दैनिक उपयोग की तमाम अन्य चीजें भी हैं जिन पर करों में  कटौती करते हुए केंद्र सरकार राज्यों पर नैतिक दबाव बना सकती है | इस बारे में एक बात समझ लेनी चाहिए कि किसी  भी अर्थव्यवस्था की मजबूती तभी तक कायम रहती है जब तक बाजार में मांग रहे | उस दृष्टि से यदि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की , उसे ये देखना चाहिए कि बाजार में गतिशीलता बनाये रखने के लिए आम उपभोक्ता की ज़िन्दगी तनावरहित और सरल हो | वर्तमान स्थितियों में ये आवश्यक लगता है कि लोगों  की क्रय शक्ति किसी भी स्थिति में कम न होने दी जाये और उसके लिए सरकार को महंगाई से निजात दिलवाने के लिए जो कुछ भी जरूरी हो करना चाहिए | भले ही  ऐसा करने से जीएसटी की वसूली पर असर पड़े परन्तु उपभोक्ता की बचत अंततः घूम - फिरकर बाजार में ही आयेगी जिससे करों की आय में फर्क शायद ही पड़े | ये सही समय है जब सरकार जनता के मन में इस विश्वास को मजबूत  करे कि वह सबका साथ और सबका विकास के अपने वायदे को भूली नहीं है  | भले ही गरीब वर्ग को मुफ्त खाद्यान्न देकर वह अपने  कर्तव्य का निर्वहन कर रही है किन्तु समाज के दूसरे वर्गों की भी कुछ अपेक्षाएं हैं जिनके बारे में उसे संजीदगी के साथ विचार करना चाहिए | सर्वाधिक ध्यान देने योग्य बात ये है कि भारत का मध्यम वर्ग ही अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और जीएसटी की बढ़ती आय का बड़ा श्रेय उसी के खाते में जाता है | उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही सरकार की तरफ से ऐसा कुछ किया जावेगा जिससे आम जनता को भीषण गर्मी में भी ठंडक का एहसास हो सके |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 30 April 2022

खालिस्तानी आतंक के बीजों का अंकुरित होना शुभ संकेत नहीं



 वैसे तो हमारे देश में इस तरह की घटनाएँ आम हैं | लेकिन पंजाब के पटियाला नगर में गत दिवस शिवसेना द्वारा निकाले खालिस्तान विरोधी जुलूस पर खालिस्तान समर्थक सिखों के गुट द्वारा किये गये हमले के कारण उत्पन्न तनाव खतरनाक संकेत है | किसान आन्दोलन में भी खालिस्तानी समर्थकों  की मौजूदगी का मुद्दा उठा था  | गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर हुए उत्पात में भी खालिस्तानी तत्वों को खुला हाथ था  | उसके बाद  आन्दोलन खत्म होते – होते तक दिल्ली और पंजाब में अनेक घटनाएँ ऐसी हुईं जिनसे खालिस्तान आन्दोलन के पुनर्जीवित होने की पुष्टि हो गई | उस आन्दोलन के समर्थन में कैनेडा और ब्रिटेन में कार्यरत  खालिस्तान समर्थक संगठनों  ने जिस तरह से धरना – प्रदर्शन करने के साथ ही आर्थिक सहायता भेजी उसे लेकर भी काफी टीका – टिप्पणी हुई | पंजाब में भी निहंगों ने अनेक हिंसक वारदातों को अंजाम देकर आतंक फ़ैलाने का कार्य किया | चूंकि राज्य विधानसभा का चुनाव नजदीक था इसलिए ये माना जाता रहा कि वह सब  चुनावी राजनीति का हिस्सा था | चुनाव के दौरान भी ये बात सामने आई कि खालिस्तान समर्थक तत्व भले ही खुलकर सामने न आ रहे हों लेकिन वे  अपने लिए उपयुक्त राजनीतिक दल और उम्मीदवार को समर्थन दे रहे थे | आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल पर तो उन्हीं के पूर्व साथी  डा . कुमार विश्वास ने गंभीर आरोप लगाये | चुनाव में आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और भगवंत सिंह मान मुख्यमंत्री बनाये गए | पंजाब जबसे नया राज्य बना तबसे वहां या तो कांग्रेस सत्ता में रही या अकाली दल और भाजपा की मिली जुली सरकार बनी | इस प्रकार कभी पूरी तरह तो कभी  आंशिक तौर पर राष्ट्रीय पार्टी सत्ता  में रही | लेकिन हालिया सत्ता परिवर्तन में एक ऐसी पार्टी के हाथ सत्ता चली गयी है जिसकी राजनीतिक विचारधारा बहुत स्पष्ट नहीं है और जिसका उदय जनांदोलन के परिणामस्वरूप होने से उसके जनाधार में क्षणिक लाभ की आकांक्षा रखने वाले ही ज्यादा हैं | दिल्ली में मुफ्त बिजली और पानी के नाम पर चुनाव जीतने वाले फॉर्मूले को ही पार्टी ने पंजाब में अपनाया और मतदाताओं ने उसी आधार पर उसे सत्ता सौंप दी | लेकिन इस सीमावर्ती राज्य की सरकार को केवल बिजली , पानी  और सड़क का ही नहीं अपितु सीमा पार से आने वाले खतरों का भी ध्यान रखना पड़ता है | और उस लिहाज से  आम आदमी पार्टी की क्षमता और योग्यता का परीक्षण अभी बाकी है |  इसीलिये  गत दिवस पटियाला में शिवसेना द्वारा खालिस्तान विरोधी जो जुलूस निकाला गया उस पर सिखों के एक संगठन द्वारा किया गया हमला राज्य सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है | खबर है शिवसेना के स्थानीय नेता हरीश सिंगला को पार्टी ने निकाल बाहर किया जो उस जुलूस का आयोजक था | उनको  गिरफ्तार भी कर लिया गया | देखते – देखते बात हिन्दू – सिख विवाद का रूप ले बैठी | हिन्दू संगठनों द्वारा पंजाब बंद का आह्वान किये जाने की जानकारी भी आई है |  यदि उक्त जुलूस निकालने के लिए प्रशासन से अनुमति ली गई तब आयोजक की गिरफ्तारी का कोई औचित्य नहीं था और अनुमति नहीं थी तब जुलूस को निकलने से पहले ही रोकना प्रशासन और पुलिस का दायित्व था | लेकिन खालिस्तान समर्थक जुलूस तो देश विरोधी कृत्य कहलायेगा और इसलिए उसके आयोजकों  के विरुद्ध तो कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए | रही बात शिवसेना नेता को पार्टी से निकाले जाने की तो इससे सभी  को आश्चर्य हुआ | अपेक्षित तो यही था कि सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे खालिस्तान विरोधी जुलूस के आयोजक अपने नेता को बधाई देकर  पंजाब में भारत विरोधी ताकतों का हौसला कमजोर करते | लेकिन उन्होंने जो फैसला लिया वह उनके समर्थकों को ही रास नहीं आ रहा  | शायद महाराष्ट्र की सत्ता में कांग्रेस और रांकापा की संगत ने श्री ठाकरे के हाथ -पैर बाँध दिए हैं  | बहरहाल आम आदमी पार्टी की राज्य सरकार के लिए भी ये कठिन परीक्षा की घड़ी है | खालिस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाने वालों का विरोध करने निकले लोग भारत की एकता और अखंडता के लिए कितने खतरनाक होंगे ये बताने की जरूरत नहीं है | स्मरणीय है  पंजाब में खालिस्तान के नाम पर नब्बे के दशक में उपजा आतंकवाद कालान्तर में बेअसर हो गया था | उसके बाद वहां बारी – बारी से  कांग्रेस और  अकाली – भाजपा गठबंधन की सरकार बनती रही | उस दौरान कुछ अपवाद छोड़कर खालिस्तान के पक्ष में खुलकर बोलने की हिम्मत किसी की नहीं हुई | प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व  वाला अकाली दल आनन्दपुर साहेब प्रस्ताव के पक्ष में रहने के बाद भी खालिस्तान की मांग  के समर्थन से बचता रहा | लेकिन किसान आन्दोलन के दौरान खालिस्तान समर्थक जिस तरह से सामने आये और किसान नेताओं ने तात्कालिक लाभ हेतु उनकी अनदेखी की उसी का दुष्परिणाम पंजाब में अब देखने मिल रहा है | हालाँकि विधानसभा चुनाव में खालिस्तान मुद्दा नहीं था किन्तु उसके समर्थक एक संगठन द्वारा आम आदमी पार्टी को समर्थन दिए जाने की खबरें जरूर आईं | हालाँकि  पार्टी ने  तत्काल उससे दूरी बना ली किन्त्तु ये कहना गलत नहीं होगा कि मान सरकार बनने के बाद से खालिस्तान समर्थकों का हौसला बुलंद हुआ है | अन्यथा देश के टुकड़े करने वाली मांग के विरोध में निकाले गए जुलूस पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी ? इस घटना के बाद मुख्यमंत्री ने दोनों पक्षों से शांति अपील की किन्तु उक्त विवाद को हिन्दू विरुद्ध सिख की बजाय खालिस्तान विरोधी और समर्थकों के बीच का विवाद कहना ज्यादा उचित रहेगा | पंजाब के आम सिख को खालिस्तान से कुछ लेना देना नहीं है | देश की एकता और अखंडता की रक्षा  के लिए इस समुदाय ने जो योगदान दिया उसी का नतीजा रहा कि लम्बे समय तक आतंक के साये में रहने के बाद भी पंजाब को भारत से अलग करने का खालिस्तानी षडयंत्र विफल साबित हुआ | ऐसा लगता है किसान आन्दोलन की आड़ लेकर देश विरोधी ताकतें एक बार फिर सिर उठाने  पर आमादा हैं | पंजाब सरकार को उनकी जड़ों को उखाड फेंकने का साहस दिखाना होगा | सिख धर्म और देशभक्ति एक दूसरे के पर्याय रहे हैं और हिन्दू – सिख एकता पंजाब की मिट्टी की पैदायश है | ऐसे में देश के किसी हिस्से में पनपने वाली अलगाववादी भावना को पूरी तरह कुचला जाना जरूरी है | कश्मीर घाटी में पाँव उखड़ने के बाद पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवाद अब पंजाब में अपने लिए गुंजाईश तलाश रहा है | खालिस्तानी  उग्रवादी भी सीमा पार से प्रशिक्षित होकर आते रहे हैं | गत दिवस पटियाला में जो कुछ हुआ उसे बानगी मानकर खालिस्तान समर्थकों की कमर तोड़ना बहुत जरूरी है | शिवसेना ने जो किया उसके पीछे उसके स्थानीय नेता की राजनीतिक सोच हो सकती है लेकिन खालिस्तान मुर्दाबाद कहने वालों का विरोध करने वाले तो देश विरोधी ही कहे जा सकते हैं | इसलिए उनके विरुद्ध वही कार्रवाई होनी चाहिए जो देश के दुश्मनों पर की जाती है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 April 2022

भौतिक सुविधाओं को कम न किया तो तापमान का अर्धशतक दूर नहीं



 गर्मियों के मौसम में गर्मी पड़ना नई बात तो हैं नहीं | लेकिन साल दर साल बढ़ता जा रहा तापमान जरूर चिंता और उससे भी ज्यादा चिंतन का विषय है | बीते दो – तीन दिनों से देश भर में ग्रीष्म लहर चल रही है | दर्जनों शहरों में तापमान 45 डिग्री से. तक जा पहुंचा है और  कहीं – कहीं तो उससे भी ऊपर | मौसम विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि गर्मी का प्रकोप और तेज होगा  | ज्यादातर राज्यों में चिर - परिचित जलसंकट की स्थिति भी बनी हुई है | अंतर्राष्ट्रीय हालातों ने कोयले की किल्लत पैदा कर दी  जिससे बिजली उत्पादन घट जाने से हो रही कटौती से लोग हलाकान  हैं |  इस साल मार्च के महीने से ही तापमान बढ़ने लगा जिसकी वजह से गर्मियों में आने वाली सब्जियों और फलों की पैदावार पर भी विपरीत असर पड़ा | सही बात ये  है कि इस साल गर्मियाँ समय से पहले आ धमकने के साथ ही कुछ ज्यादा ही रौद्र रूप दिखा रही है | यद्यपि इसमें अनोखा कुछ नहीं है क्योंकि तापमान में वृद्धि का सिलसिला साल दर साल इसी तरह चला आ रहा है | दुनिया भर में इसे लेकर चिंता व्याप्त  है | पृथ्वी को गर्म होने से बचाने के लिए तरह – तरह के उपाय भी हो रहे हैं | कोयले के साथ ही पेट्रोल – डीजल के उपयोग को कम करने की दिशा में जोरदार प्रयास भी जारी  हैं | लेकिन मैदानी इलाकों में पड़ने वाली गर्मी तो फिर भी समझ में आती हैं परन्तु अब तो पहाड़ी स्थलों पर भी पंखे और कूलर नजर आने लगे हैं | शिमला में जल संकट की स्थिति किसी से छिपी नहीं है | हिमनद ( ग्लेशियर )   पिघलने की वजह से पहाड़ों से निकलने वाली सदा नीरा नदियों के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं | छोटी नदियों में तो ग्रीष्म ऋतु के दौरान कीचड़ तक नहीं रहता | भूजल स्तर गिरते जाने से मानव निर्मित तालाबों और कुओं आदि में भी जल की उपलब्धता घटते - घटते उनके सूखने तक की नौबत आने लगी | संक्षेप में कहें तो स्थिति भयावह है | भारत में ऋतुओं का जो संतुलित रूप था उसकी वजह से हर मौसम का अपना आनंद था | लेकिन प्रकृति पर किये गये अत्याचारों ने उस चक्र की गति को बिगाड़ दिया | जिसका दुष्परिणाम कहीं सूखा तो कहीं  अति वृष्टि के रूप में सामने आने लगा है | इस साल अप्रैल खत्म होते तक गर्मी ने विकराल रूप धारण कर लिया है | बिजली और पानी दोनों की किल्लत के साथ ही आसमान से बरसने वाली आग लोगों के तन और मन दोनों को झुलसाती रहेगी | हर साल इस तरह के हालात पैदा होने पर हम सब प्रकृति और पर्यावरण के साथ हुए खिलवाड़ की चर्चा करते हुए ये स्वीकार करने की ईमानदारी तो  दिखाते हैं कि इस सबके लिए हमारे अपने कर्म ही जिम्मेदार हैं | लेकिन गर्मियां बीतते ही ये चिंता और चिन्तन अदालत की पेशियों की तरह आगे बढ़ जायेंगे | कहने को पूरी दुनिया पृथ्वी को बचाने के लिए प्रयासरत है | कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए समझौते और संधियाँ हो रही हैं | ऊर्जा के ऐसे वैकल्पिक स्रोत तलाशे जा रहे हैं  जिनसे तापमान को बढ़ने से रोका जा सके | वृक्षारोपण के सरकारी और गैर सरकारी अभियान भी निरंतर चलते रहते हैं | जल संरक्षण और संवर्धन के लिए भी हरसंभव कोशिश हो रही हैं | नदियों के साथ ही तालाबों आदि के जीर्णोद्धार की पहल भी सुनाई और दिखाई देती है | इस सबसे लगता है कि प्रकृति और पर्यावरण को उसका मूल स्वरूप देने के लिए मानव जाति संकल्पित हो उठी  है परन्तु  निष्पक्ष आकलन करें तो एक कदम आगे दो कदम पीछे की स्थिति  बनी हुई है | ऐसे में सवाल ये है कि हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए स्वच्छ हवा और पानी का प्रबंध कैसे करें ? इसका उत्तर भी बीते दो सालों में हमें मिला जब कोरोना के कारण लगे लॉक डाउन के दौरान  अचानक ऐसा लगा कि प्रकृति अपने नैसर्गिक स्वरूप में लौट आई है | नदियों के स्वच्छ होने , जलचरों और नभचरों की आनंदित करने वाली गतिविधियाँ , वायु प्रदूषण में आश्चर्यजनक कमी , आसमान साफ़ होने से दूरस्थ पर्वतों की  चोटियों के दर्शन जैसे अकल्पनीय अनुभवों के साथ ही गर्मियों के दौरान तापमान में उल्लेखनीय कमी आने के सुखद आश्चर्य के साथ हुआ साक्षात्कार ,  स्थितियाँ सामान्य  होते ही सुंदर  सपने की तरह विलुप्त हो गया | हम सभी उस दौर को याद करते हुए बेहिचक स्वीकार करते हैं कि यदि वैसा किया जावे तो पर्यावरण को बचाया जा सकता है | लेकिन व्यवहारिक तौर पर  आगे – पीछे होने लगते हैं | इस बारे में सोचने वाली बात ये है कि क्या हम अपनी सुविधाओं को कुछ समय के लिए उसी तरह नहीं त्याग सकते जैसे कभी – कभार उपवास  करते हैं | दिल्ली में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए ऑड – ईवन का तरीका लागू किया गया किन्तु वह भी जन सहयोग के अभाव  में फुस्स हो गया | प्रति वर्ष सरकार करोड़ों वृक्ष लगाने का दावा करती है | समाजसेवी संस्थाएं भी इस अभियान में सहयोग करती हैं लेकिन शहरों की तो छोडिये अब तो ग्रामीण इलाकों तक में हरियाली लुप्त होती जा रही है | बढ़ती आबादी और प्रदूषण में निरंतर वृद्धि के अनुपात में जरूरी  वृक्ष  नहीं लगाये जाने से ही तापमान बढ़ने की नौबत आ रही है | हालांकि जो नुकसान हो चुका उसकी भरपाई आसान नहीं है किन्तु ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ खत्म हो गया हो | यदि आज भी हम अपनी जीवन शैली में थोड़ा सा बदलाव करते हुए भौतिक  सुविधाओं को कुछ समय के लिए ही  सही त्यागने की मानसिकता विकसित कर लें तो जो शेष है कम से कम वह तो नष्ट होने से बचेगा और तब हमें भावी  सुधार के अवसर आसानी से मिल सकेंगे | नदियों में प्रवाहित की जाने वाली पूजन सामग्री ही बंद कर दी जाये तो उसके चमत्कारिक परिणाम आ सकते हैं | चौबीसों घंटे वातानुकूलित वातावरण में रहने वाले यदि कुछ कुछ घंटे सामान्य माहौल में रहने का अभ्यास करें तो आसपास का तापमान कम किया जा सकेगा | सप्ताह में एक दिन पेट्रोल –  डीजल चलित वाहन  का उपयोग न करने की प्रतिबद्धता भी पर्यावरण के लिए राहत होगी | छोटी – छोटी बातों से भी बड़े सुधार हो सकते हैं ये महात्मा गांधी जैसे लोगों ने साबित कर दिखाया है |  लालबहादुर शास्त्री ने विजय व्रत का आह्वान करते समय यही मन्त्र दिया था कि यदि आप एक समय का भोजन त्यागते हैं तो वह किसी भूखे का पेट भरने के काम आ सकेगा | भारतीय जीवन पद्धति में आत्म नियंत्रण के साथ ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहने का जो संस्कार निहित है , उसका पालन यदि पूरी ईमानदारी से करें तो चिंता कम की जा सकती है | पूर्वजों ने हमारे  लिए साफ़ हवा और शुद्ध जल का प्रबंध किया था | उसके पहले कि कुछ न कर पाने की स्थिति बन जाये , हमें अगली पीढी के  लिए अपने दायित्व का निर्वहन करने की दिशा में कदम आगे बढ़ाने होंगे क्योंकि  तापमान का आंकड़ा अर्धशतक बनाने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 April 2022

चौथी लहर की अनदेखी घातक होगी : बच्चों को संक्रमण से बचाना बड़ी चुनौती



कोरोना की चौथी लहर के संकेत आने लगे हैं | अनेक राज्यों ने मास्क न पहिनने पर अर्थदंड लगाना शुरू कर दिया है | चीन में तो कोरोना ने बुरी हालत कर रखी है | शंघाई में लाखों लोग घरों में बंद हैं | जरूरी चीजों के लिए मारामारी की भी खबर है | समाचार माध्यमों पर सरकारी नियन्त्रण होने से चूंकि सच्चाई दुनिया से छिपाई जाती है इसलिए वहां की अंदरूनी खबरें दबी रहती हैं | लेकिन ये बात बाहर आ चुकी है कि चीन कोरोना को जन्म देने के बाद उस पर नियंत्रण स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा है | उसकी बनाई वैक्सीन भी कारगर साबित नहीं हो सकी | इसीलिये उसकी वैश्विक स्तर पर कोई मांग नहीं हुई | कोरोना के बाद उसकी विश्वसनीयता पर भी प्रभाव पड़ा जिससे  कारोबारी सम्बन्ध रखने वाले देश उससे छिटके हैं | मौजूदा वर्ष में विकास दर को लेकर जो अनुमान लगाये जा रहे हैं उनके अनुसार चीन , भारत से पीछे रहेगा  | कोरोना की चौथी लहर उसे और पीछे धकेल  सकती है | वहीं भारत ने दूसरी लहर में जो देखा और भोगा उसके बाद हालात से लड़ने की समुचित रणनीति बनी जिसका लाभ ये हुआ कि 135 करोड़ लोगों में से अधिकतर का टीकाकरण बहुत ही सफलतापूर्वक किया जा सका | यही नहीं तो भारत में बनी कोरोना वैक्सीन पूरी दुनिया में उपयोग की गई | ऑक्सीजन की कमी को दूर करने के  प्रयासों का भी सकारात्मक असर देखने मिला | इसीलिये ओमिक्रोन के रूप में आई तीसरी लहर का प्रभाव ज्यादा नहीं हुआ | देश में आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं में भी काफी वृद्धि हुई है | सबसे बड़ी बात ये हुई कि दवा उत्पादन में भारत ने आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से कदम बढ़ाये जिसके परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में दवाओं का निर्यात होने लगा | इसकी मुख्य वजह कच्चे माल को तैयार करने में हासिल सफलता रही | यूक्रेन संकट के बाद से तो भारत के दवा उद्योग को दुनिया भर से आपूर्ति आदेश प्राप्त हो रहे हैं | कुल मिलाकर देखें तो स्थिति में 2020 की अपेक्षा काफी सुधार हुआ है | यही  वजह रही कि ओमिक्रोन कब आया और कब चला गया ये पता ही नहीं चला | जिससे न सिर्फ आर्थिक अपितु सामाजिक गतिविधियाँ भी सामान्य होने लगीं | शादी एवं अन्य आयोजनों पर लगी बंदिशें हट जाने से भी आर्थिक जगत गतिशील हुआ | कुल मिलाकर ये लगने लगा था कि कोरोना के रूप में आया अभूतपूर्व संकट वापिस लौट चुका है | लेकिन यूक्रेन पर रूस के  हमले ने नई समस्या पैदा कर दी जिसके कारण दुनिया भर की आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो रही है | भारत की भूमिका इस संकट में और महत्वपूर्ण होने के संकेत मिले हैं | हमारा निर्यात तो बढ़ा ही है किन्तु इसके साथ ही कूटनीतिक जगत में भी भारत का मान  – सम्मान बढ़ा है | यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद भारत द्वारा राजनयिक स्तर पर जिस तटस्थता का परिचय दिया उसके बाद अमेरिका और  उसके समर्थकों ने काफी दबाव बनाने की कोशिश की किन्तु वे हमको डिगा नहीं सके | आज के हालात में भारत ही उन चुनिन्दा देशों में है जिसका कमोबेश पूरी दुनिया के साथ संवाद कायम है | यूक्रेन संकट का समाधान तलाशने में भी हमारी  भूमिका पर दुनिया की  नजर है | लेकिन इस सबके बीच कोरोना की चौथी लहर की आमद ने चिंता की लकीरें खींच दी हैं | बीते एक – दो सप्ताह के भीतर ही संक्रमण की गति में जिस तरह से वृद्धि देखने मिल रही है उसके मद्देनजर सावधानी न बरती गयी तब ज्यादा से ज्यादा लोगों के इसकी गिरफ्त में आने की सम्भावना रहेगी | यद्यपि कोरोना के दोनों टीके लग जाने के बाद ये माना  जाने लगा था कि सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता ( हर्ड इम्युनिटी ) विकसित हो जाने की वजह से भारत अगले हमले से सुरक्षित रहेगा लेकिन ताजा अध्ययनों में ये बात साफ़ हुई है कि टीकों का असर काफी घटा है जिसके कारण संक्रमण का खतरा बढ़ा है | इसलिए ये आवश्यक हो गया है कि चौथी लहर को भयावह न होने दिया जावे जिसके लिये कोरोना से बचाव संबंधी सभी सावधानियों का ध्यान रखना जरूरी है  , मसलन मास्क का उपयोग , हाथ धोते रहना और भीड़भाड़ से जितना हो सके दूरी बनाये रखना |  बुजुर्गों को बूस्टर डोज लगाये जाने के साथ ही बच्चों का टीकाकरण भी किया जा रहा है | अस्पतालों में बिस्तरों और ऑक्सीजन की उपलब्धता भी पर्याप्त है | इसके बावजूद कोरोना के नये  हमले से बचाव हेतु पूरी सतर्कता आवश्यक है क्योंकि इसका सीधा – सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा जो बमुश्किल पटरी पर लौटी है | कोरोना के पहले हमले के समय हम अनजान थे वहीं जब दूसरी लहर आई तब असावधानी  मुसीबत बन गई | तीसरी लहर आने तक देश के  साधारण नागरिक तक के  बचाव के प्रति जानकार होने की वजह से ओमिक्रोन ज्याद कुछ न कर सका और अर्थव्यस्था सुचारू रूप से चलती रही |  जनहानि भी न के बराबर  रही |  चौथी लहर का  चिंताजनक पहलू  ये है कि वह  बच्चों को भी चपेट में ले रही  है | सबसे बड़ी बात ये है कि वर्तमान में शालाएं खुली हुई हैं | कानपुर आईआईटी के शोधकर्ताओं  के अनुसार चौथी लहर आगामी अक्टूबर तक जारी रह सकती है | इसलिए जिन्हें दो टीके लग चुके हैं उन्हें भी लापरवाही से बचना चाहिए | साथ ही अभिभावकों और शाला संचालकों का दायित्व है कि वे बच्चों का टीकाकरण अवश्य करवा दें | हर्ष का विषय है कि हमारे कोरोना प्रबंधन की पूरी दुनिया में तारीफ हुई है | 135 करोड़ की बड़ी आबादी वाले देश में  टीकाकरण अभियान निश्चित रूप से बेहद कठिन था | लेकिन उसका संचालन जिस कुशलता और सफलता के साथ हुआ उसकी पूरी दुनिया कायल है | बावजूद इसके चौथी लहर ने जो कोहराम चीन में मचा रखा है उसे देखते हुए भारत को अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है | बुद्धिमान व्यक्ति और देश वही होता है जो अतीत में  हुई गलतियोँ से सीखकर भविष्य को सुरक्षित बनाये | लेकिन इसके लिए जनता को भी सहयोग देना पड़ेगा | इस बारे में ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि भारत अब वैश्विक शक्ति बन चुका है | इस वजह से न सिर्फ पड़ोसी अपितु दूर - दराज के देश तक हमारी तरफ उम्मीद भरी निगाह से देखने लगे हैं | इसीलिये हमें चौथी लहर के प्रभाव को रोकने के लिए पूरी तैयारी रखनी होगी |  पिछली गलतियों  से सीखते हुए कोरोना से बचाव के सभी तौर – तरीकों का पालन करना समय की मांग है | बच्चों को संक्रमण से बचाना भी किसी चुनौती से कम नहीं है | उम्मीद की जा सकती  है कि छोटी – छोटी सावधानियां रखते हुए हम इस बड़े संकट पर विजय प्राप्त करने में एक बार फिर सफल होंगे |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 April 2022

प्रशांत समझ गए कि कांग्रेस में घर की मुर्गी दाल बराबर हो जाएंगे



चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस में आने से मना कर दिया हैं | एक ट्वीट के जरिये उन्होंने ये तंज भी कसा कि कांग्रेस को उनकी नहीं सक्षम नेतृत्व और संगठन में सुधारात्मक बदलाव की जरूरत है | उनके द्वारा सौंपे  गये 600 पृष्ठीय सुझावों पर गांधी परिवार और उसके बेहद करीबी कुछ नेताओं ने भले ही अपनी  सहमति दी हो लेकिन जैसा कि सुनाई दे रहा है अधिकतर वरिष्ट नेता ही नहीं अपितु राज्य और जिला स्तर पर भी उनके विरोध में आवाजें उठ रही थीं | श्री किशोर चाहते थे कि वे जो कुछ भी करें उसकी जानकारी सीधे सोनिया गांधी को दें | इसके अतिरिक्त संगठन में बदलाव के साथ ही प्रत्याशी चयन  में भी वे पूरी छूट  चाहते थे | जैसी चर्चा है उसके अनुसार प्रशांत की बातें सोनिया जी और उनके बेटे – बेटी को तो रास आईं लेकिन  अधिकतर नेता इससे असहमत थे | निचले स्तर तक पार्टी के संगठन में बदलाव के  सुझाव से आम कार्यकर्ता में ये भय समा गया कि उनका पद न छिन जाए | पार्टी का एक वर्ग इस बात से भी आशंकित था कि चुनावी टिकिट बांटने में भी प्रशांत की चली तब उनके हाथ खाली रह सकते हैं | कांग्रेस हाईकमान के ज्यादातर सदस्य इस बात से भी नाराज थे कि गठबंधन जैसे मामलों में श्री किशोर की सलाह मानी  जाए | कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है कि वे  कांग्रेस को बेसहारा मानते हुए उसके सर्वेसर्वा बनना चाह रहे थे | लेकिन  गांधी परिवार की रजामंदी के बाद भी वे सफल नहीं हुए क्योंकि अन्य छत्रपों द्वारा उनकी राह में रोड़े अटकाए जाने लगे | इस सबसे प्रशांत को ये समझ में आ गया कि बतौर पेशेवर उनकी पूछ – परख और सम्मान बना रहेगा किंतु कांग्रेस के सदस्य बन जाने के बाद उनकी दशा घर की मुर्गी दाल बराबर जैसी होकर रह जायेगी | वैसे भी उनमें समायोजन की क्षमता बहुत कम है | नरेंद्र मोदी , नीतीश कुमार , राहुल गांधी और ममता बैनर्जी में से किसी के साथ उनकी पटरी नहीं बैठी तो इसका कारण महत्वाकांक्षी स्वभाव के साथ ही उनका ये अहंकार है कि उनके बलबूते ही चुनाव जीते जाते हैं | और इसलिए पार्टी पर हावी होना उनका अधिकार है | उन्हें लगा था कि चूंकि श्रीमती गांधी अस्वस्थतावश पहले जैसी सक्रिय नहीं रहीं वहीं राहुल और प्रियंका की  अपरिपक्वता और अनुभवहीनता सामने आ चुकी है , इसलिए  वे आसानी से देश  की सबसे पुरानी पार्टी पर कुंडली जमाकर बैठे रहेंगे और उसके हताश – निराश नेता उनके  आभामंडल से प्रभावित होकर उनके इर्द गिर्द मंडराएंगे | लेकिन चुनावी रणनीति के मामले में बेहद कामयाब कहे जाने वाले श्री किशोर ये भूल गए कि चुनाव जीतना और पार्टी चलाना दो अलग विधाएँ हैं |  बीते  कुछ दिनों में उन्होंने कांग्रेस के भीतर ये अवधारणा बिठाने का प्रयास किया   कि उनके पास  कोई राम बाण औषधि है जिसकी वजह से पार्टी बिस्तर पर पड़े रहने की स्थिति से उठकर सीधे युद्ध के मैदान में जाकर  जीत हासिल कर लेगी | लेकिन जल्द ही  उनको ये समझ में आ गया कि सदस्य बनने के बाद उन्हें पार्टी के अनुशासन में रहना होगा जिससे स्वतंत्रता खोने के साथ ही  उनके दामन पर राजनीतिक दल का ठप्पा लग जायेगा | उन्हें इस बात का भय भी सताने लगा कि यदि वे कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं दिलवा सके तब कांग्रेसजन के साथ ही  अन्य पार्टियों द्वारा भी उनका मजाक उड़ाया जावेगा | दरअसल प्रशांत और कांग्रेस दोनों एक दूसरे का उपयोग करना चाह रहे थे | लेकिन उनको जब ये लगा कि वह  इतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे तब नजदीकियां अचानक दूरियों  में बदल गईं | कांग्रेस भले ही आज दुरावस्था में हो लेकिन उसका फैलाव पूरे देश में किसी न किसी रूप में है | भले ही वह किसी एक परिवार या नेता को अपना रहनुमा मान ले लेकिन किसी पेशेवर को सर्वेसर्वा मानने की मानसिकता उसके भीतर जन्म नहीं ले सकी | बतौर रणनीतिकार वे श्रीमती गांधी और बाकी के नेताओं को 2024 के आम चुनाव हेतु अपने सुझावों पर अमल करने की सलाह देते तब शायद वे स्वीकार्य हो जाते किन्तु जब पार्टीजनों को लगा कि वे मुखिया बनकर सब कुछ अपने मुताबिक़ चलना चाहते हैं तब विरोध में आवाजें उठने लगीं | असलियत जो भी हो लेकिन प्रशांत का कांग्रेस में आना तो टल गया | अब सवाल ये बच रहता है कि क्या पार्टी उनके सुझाव मानेगी या अपने चिर परिचित घरेलू नुस्खों को  आजमाने का रास्ता चुनेगी | हालांकि समूचे प्रसंग में पार्टी की  नेतृत्व  शून्यता एक बार फिर उजागर हो गई | गांधी  परिवार स्वयं चूंकि प्रशांत को भाव दे रहा था इसलिए प्रारंभ में तो पार्टी जन शांत रहे लेकिन  ज्योंही उनको लगा कि एक पेशेवर आकर उनको हांकेगा त्योंही उनके तेवर उग्र होने लगे | जिसका एहसास होते ही श्री किशोर  ये समझ गये कि इस  मरीज की हालत सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है |  उनके द्वारा 600 पृष्ठों की जो रिपोर्ट वरिष्ट नेताओं को सौंपी गई उस बारे में भी सुनने में आया कि उसके पन्ने पलटने तक की तकलीफ किसी ने नहीं उठाई | इस प्रकार कांग्रेस के पुनरुत्थान का जो प्रयास चर्चा में आया था वह बेमौत मर गया | हालाँकि प्रशांत भी बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का जो दुस्साहस करने जा रहे थे वह अंततः उनके गले का फंदा बनने जा रहा था | जैसे ही उन्हें इसका आभास हुआ  वे अपनी दूकान समेटकर चलते बने | सवाल ये है कि क्या कांग्रेस उनकी रिपोर्ट के आधार पर अपने घर को व्यवस्थित करेगी अथवा पूर्ववत  बनी रहेगी ? जहां तक बात प्रशांत की है तो वे एक सिद्धहस्त व्यवसायी हैं जिनके हर कदम में केवल और केवल उनका स्वार्थ होता है | आज एक पार्टी को छोड़ कल वे दूसरी को जिताने  में लग जाएंगे  | ऐसे में उन पर पूरी तरह भरोसा करना भी आसान नहीं होता | चुनावी रणनीति बनाने  से हटकर जबसे  खुद राजनीति करने लगे तभी से वे शंकास्पद हो गये  | कांग्रेस में एक वर्ग ऐसा भी है जिसे लग रहा था कि वे किसी राजनीतिक दल द्वारा कांग्रेस में सेंध लगाने भेजे गये थे | आज की राजनीति में इस तरह के तरीके  अस्वाभाविक  भी नहीं हैं | वैसे भी उनका अपना कोई सिद्धांत या विचारधारा तो है नहीं  जिसकी वजह से वे एक खूंटे से बंधकर रहें | परस्पर विरोधी विचारधारा के दलों और नेताओं के लिये काम करने में उन्हें न कोई शर्म है न ही संकोच | ऐसे में कांग्रेस के साथ उनकी पटरी न बैठना स्वाभाविक ही था | कुछ हद तक ये कांग्रेस के हित में भी है क्योंकि प्रशांत की हेड मास्टरी से अनेक नेताओं के पार्टी छोड़ने की आशंका थी | हालांकि इससे श्री किशोर की स्थिति भी कम हास्यास्पद नहीं हुई जो कि दूसरे की दूकान पर अपनी नाम पट्टिका लगाने की सोचने लगे थे | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 26 April 2022

नेता , नौकरशाह और भूमाफिया की मिलीभगत से बनती हैं अवैध कालोनी



सर्वोच्च न्यायालय का ये कहना बहुतों को नागवार गुजरा होगा कि  अवैध कालोनियां शहरी विकास  के लिए खतरा हैं | सरकारी के साथ ही निजी जमीनों पर नियम विरुद्ध बसाई गईं कालोनियां निश्चित रूप से किसी भी शहर की शक्ल बिगाड़ देती हैं | वैसे तो न्यायालय के सामने तेलंगाना , आंध्र  और तमिलनाडु संबंधी  याचिका विचारार्थ आई थी परन्तु उसने कहा कि ये समस्या राष्ट्रव्यापी है इसलिए इस पर समग्रता से विचार होना चाहिए | उसका ऐसा सोचना सही भी है क्योंकि विभिन्न राज्यों ने अवैध कालोनियों को वैध करने संबंधी अलग – अलग नीतियाँ और नियम बना रखे हैं | चुनाव पास आते ही सरकार में बैठे लोग अवैध कलोनियों को वैध करने का फैसला कर लेते हैं | कुछ राशि बतौर जुर्माने के वसूलकर अवैध को वैधता का प्रमाणपत्र दे दिया जाता है | ये सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है | ज्यों – ज्यों शहर बड़े होते जा रहे हैं त्यों – त्यों अवैध कालोनियां और झुग्गी – झोपड़ी भी बढ़तीं जा रही हैं | शहर के बाहर बसाई जाने वाली कालोनियां धीरे – धीरे उसके भीतर आ जाने के कारण औरों के लिए मुश्किलें पैदा करने वाली बन जाती हैं | भले ही सरकार वोटों के लालच में इनको कानूनी जामा पहिना दे लेकिन बेतरतीब ढंग से विकसित होने के कारण ये समस्याग्रस्त बनी रहती हैं | यही हाल झुग्गियों का भी है | सही बात तो ये है कि चाहे अवैध कालोनी हो या फिर झुग्गी – झोपड़ी वाली बस्तियां , इन्हें बसाने में जिस – जिसकी भूमिका हो उन्हें दण्डित किये बिना इस समस्या का हल संभव नहीं  होगा | सर्वोच्च न्यायालय की संदर्भित चिंता  बौद्धिक स्तर पर भले ही दो – चार दिन विमर्श में रहे लेकिन जब तक राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव सहित  नेता और नौकरशाहों का भूमाफिया से अघोषित गठबंधन चलेगा तब तक इस समस्या का हल नामुमकिन है | किसी भी शहर में बनने वाली अवैध कालोनी रातों – रात तो खड़ी नहीं  हो जाती | इसी तरह झुग्गियां भी धीरे – धीरे विकसित होती हैं | उनके अस्तित्व में आते समय उन पर जिस सरकारी विभाग को नजर रखना चाहिए वह उस अवैध कृत्य को नजरंदाज कर देता है जिसके पीछे मुख्य वजह पैसे के लेनदेन के अलावा सत्ताधीशों का दबाव होता है | यही वजह है  कि जब अवैध निर्माण तोड़ने की बात आती है तब नेतागिरी आड़े आ जाती है | चुनाव नजदीक आते ही अवैध को वैध करने का गोरखधंधा भी शुरू हो जाता है | झुग्गियों में रहने वालों को एक जगह से हटाकर  दूसरी जगह बसाये जाने के कारण भी अतिक्रमण की प्रवृत्ति को बढावा मिलता है | ये समस्या पहले महानगरों में ज्यादा  दिखाई पड़ती थी  किन्तु अब तो छोटे शहरों से होते – होते कस्बों तक में इसकी मौजूदगी देखी जा सकती है | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे व्यापक  परिप्रेक्ष्य में देखने के बाद हो सकता है इसे लेकर कोई राष्ट्रीय नीति बन जाये | दरअसल अवैध कालोनियां और झुग्गियों के पीछे भी सोची – समझी रणनीति होती है | इनको बनाते समय ही ये विश्वास होता है कि अवैध को अंततः वैध कर दिया जावेगा और कब्जे के बदले दूसरी जगह का कब्ज़ा मिलेगा | लेकिन जब किसी भी प्रकार का अवैध निर्माण या कब्जा होता है तभी उसे रोकने के लिए प्रशासन आगे  आये और नेतागण बाधा न बनें  तभी समस्या का हल संभव है | जब तक अतिक्रमण और अवैध निर्माण होते देखने वाले सरकारी अमले की जिम्मेदारी तय नहीं की जाती तब तक ये सिलसिला अनवरत जारी रहेगा | लेकिन नौकरशाही को कठघरे में खड़ा  करने से पहले राजनेताओं को अपना दामन साफ़ करना होगा जो भूमाफिया से मिलने वाली आर्थिक मदद के बोझ तले नियम विरुद्ध  निर्माण को संरक्षण देने में तनिक भी नहीं  झिझकते |  चुनाव के पहले अवैध कालोनियों को वैध बनाने के पीछे नोट और वोट दोनों की भूमिका होती है | ऐसा ही झुग्गियों को हटाकर दूसरी जगह  बसाने के मामले में भी  है | गरीबों को आवास देने की नीति गलत नहीं है लेकिन अतिक्रमण को प्रोत्साहित करने वाली राजनीति पर विराम लगना जरूरी है | इस आधार पर सर्वोच्च न्यायलय की चिंता पूरी तरह जायज है क्योंकि अवैध कालोनी और झुग्गियां शहरी विकास की राह में रोड़ा बनती हैं | नियम विरुद्ध कालोनी बनाने वाले सस्त्ते भूखंड बेच देते हैं लेकिन सड़क , नाली , उद्यान आदि का ध्यान नहीं  रखे जाने के कारण भविष्य में रहवासियों को खून के आंसू रोने पड़ते हैं | सवाल ये भी है कि अवैध कालोनी को बिजली और स्थानीय निकाय से जल की  आपूर्ति कैसे होती है ? अनेक झुग्गी बस्तियों में पक्की सड़कें , सरकारी नल और बिजली के खम्बे जन प्रतिनिधि वोटों की लालच में लगवाते हैं | कुल मिलाकर समूचा  खेल एक  गिरोहबंदी का परिणाम है | यदि नेता , नौकरशाह और भू माफिया के बीच संगामित्ती न हो तब अवैध कालोनी या झुग्गी बनना सम्भव ही नहीं है | जनहित में इनके प्रति सहानुभूति दर्शाने के कारण लोगों की मानसिकता ये हो चुकी है कि आज जो अवैध है उसे  कल वैध हो ही जाना है | झुग्गियों के तौर पर बस्ती बस जाने के बाद चूंकि वहां सैकड़ों मतदाता रहते हैं इसलिए कोई नेता उन्हें हटाने का साहस नहीं दिखाता | उल्टे जब अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई होती है  तब नेतागण ही सामने आकर उसे रुकवाते हैं | इस बारे में ईमानदारी से पड़ताल करवाई जावे तो ये बात उजागर हुए बिना नहीं रहेगी कि उन सबके पीछे नेता , नौकरशाह और भू माफिया की मिली भगत थी | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस समस्या का राष्ट्रीय  संदर्भ में संज्ञान लिए जाने के बाद ये प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठता है कि अवैध निर्माण या कब्जे को वैधता प्रदान कर गलत कार्य को प्रोत्साहित करना कहाँ तक  उचित है ? यदि अवैध कलोनियों को वैध करना ही है तो उसकी एक अंतिम तारीख तय कर दी जावे और उसके बाद बनने वाली अवैध कालोनी को किसी भी  तरह की रियायत न मिले |  इसी प्रकार झुग्गी बस्तियों में रहने वालों के पुनर्वास के लिए भी  ठोस नीति के अंतर्गत कड़े प्रावधान जब तक नहीं किये जाते तब तक ये समस्या  बनी रहेगी | मोदी सरकार स्मार्ट सिटी परियोजना के साथ ही स्वच्छता अभियान पर अरबों रूपये खर्च कर रही है , लेकिन अवैध कालोनियों और झुग्गी बस्तियों को अभय दान देने की नीति नहीं बदली जाती तब हालात और भी बदतर होना सुनिश्चित है | जो अवैध है उसे निहित स्वार्थवश  वैध बनाने की सोच ही मौजूदा समस्या के मूल में है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी