Wednesday, 11 May 2022

बिना ओबीसी आरक्षण के चुनाव : भाजपा – कांग्रेस की अग्नि परीक्षा



आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने म.प्र में बिना ओबीसी आरक्षण के ही नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव करवाने का आदेश दे दिया | प्रदेश सरकार द्वारा इस वर्ग को 35 फीसदी आरक्षण दिए जाने की मांग उसने ये कहते हुए अस्वीकार कर दी कि वह आवश्यक विवरण उपलब्ध नहीं  करा सकी किन्तु उसके अभाव में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को टालते रहना गलत होगा | राज्य चुनाव आयोग ने भी न्यायालय के निर्देशानुसार चुनाव हेतु अपनी स्वीकृति दे दी | लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ओबीसी आरक्षण के साथ ही चुनाव करवाने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए ये घोषणा भी कर डाली कि  सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार  याचिका लगाई जावेगी | वहीं अनेक विधि  विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अब  पुनर्विचार याचिका की कोई गुंजाईश ही नहीं है | कांग्रेस और भाजपा के बीच एक – दूसरे को ओबीसी विरोधी साबित करने के लिए आरोप – प्रत्यारोप का दौर भी चल पड़ा है | यदि सर्वोच्च न्यायालय ने पुनर्विचार याचिका स्वीकार नहीं की तब ओबीसी आरक्षण के बिना चुनाव करवाने की बाध्यता होगी | और उस स्थिति में जैसा कहा जा रहा है कि राजनीतिक दल ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवारी ओबीसी वर्ग के लोगों को देकर उनकी नाराजगी से बचना चाहेंगे | जो कुछ भी होना है वह आने वाले कुछ दिनों में ही स्पष्ट हो जायेगा किन्तु सर्वोच्च न्यायालय का रुख देखने से लगता है कि वह अपने  आदेश पर ही कायम रहेगा | ऐसे में ये मानकर चला जा सकता है कि चुनाव जल्द होंगे | चूँकि मानसून सिर पर है इसलिए  चुनाव आयोग के सामने  भी बड़ी दिक्कतें आयेंगीं | विशेष रूप से पंचायत चुनावों में बरसात  बाधा बन सकती है | जहाँ तक बात म.प्र सरकार की है तो भाजपा के लिए भी ये बड़ी चुनौती है | यद्यपि अपने मजबूत संगठन के बलबूते वह कांग्रेस पर भारी नजर आती है लेकिन ये चुनाव स्थानीय मुद्दों पर केन्द्रित होने से पूरे प्रदेश में एक जैसे समीकरण होना जरूरी नहीं रहता | यद्यपि ओबीसी वर्ग में  भाजपा का जनाधार काफी मजबूत है | स्वयं मुख्यमंत्री उसका प्रतिनिधित्व करते हैं और आम जनता के साथ उनका सम्पर्क भी बेहद जीवंत है | लेकिन कांग्रेस द्वारा भाजपा पर ओबीसी विरोधी होने का जो आरोप लगाया जा रहा है उसकी काट निकालना उसके लिए आसान नहीं होगा | और फिर ओबीसी के तुष्टीकरण के लिए उन्हें ज्यादा टिकिटें देने  के अलावा सामान्य वर्ग के प्रभुत्व वाली सीटों से उतारे जाने पर उच्च जातियों के नाराज होने का नुकसान भी संभावित है  | यद्यपि ये समस्या कांग्रेस  के सामने भी रहेगी |  2023 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा के  लिए स्थानीय निकायों और पंचायत चुनाव जीतना  जरूरी होगा क्योंकि इनके नतीजों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव विधानसभा चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा | कांग्रेस के लिए भी ये  जीवन – मरण का सवाल होंगे | यदि वह इनमें सफलता हासिल कर सकी तो उसके लिए 2023 का मुकाबला जीतना आसान हो जायेगा , अन्यथा उसका मनोबल टूटे बिना नहीं रहेगा | इसी तरह भाजपा के लिए भी ये चुनाव इस पार या उस पार वाले होंगे | 2018 के विधानसभा चुनाव की कडवी यादें वह शायद ही भूली होगी | मुख्यमंत्री भी इस बात को समझते हैं कि ये चुनाव  उनके राजनीतिक भविष्य का निर्धारण करने वाले होंगे | मार्च 2020 में सत्ता हासिल होने के बाद चूंकि कोरोना लग गया , उस कारण सरकार को कार्य करने का समुचित अवसर नहीं मिला | इस वजह से आधे – अधूरे पड़े काम भाजपा के लिए मुसीबत बन सकते हैं | उस  काल में सांसद – विधायक भी ज्यादा कुछ न कर सके | कमलनाथ सरकार ने आते ही चूंकि स्थानीय निकाय भंग कर दिए थे इसलिए उनमें नौकरशाही हावी है | जिसके भ्रष्टाचार का खामियाजा  भाजपा के खाते आ सकता है | लेकिन इससे भी बड़ी समस्या जो भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने आने वाली है वह है एक अनार सौ बीमार वाली | यदि चुनाव हुए तो बरसों से टिकिट की आस  लगाये कार्यकर्ताओं की उम्मीदें सातवें आसमान पर होंगीं | ऐसे में जो उससे वंचित रह जायेंगे उनकी नाराजगी दोनों बड़ी पार्टियों को इस चुनाव के बाद विधानसभा के मुकाबले में भी काफ़ी महंगी साबित होगी |  जहाँ तक प्रश्न ओबीसी आरक्षण का है तो ये मुद्दा कानून से ज्यादा राजनीतिक बन गया है | भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने को ओबीसी का हितचिन्तक  साबित करने में जुटी हैं  | भाजपा के पास कहने को ये है कि उसने उमाश्री भारती , बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के रूप में लगातर तीन ओबीसी मुख्यमंत्री दिए जबकि कांग्रेस  के पास प्रदेश स्तर पर पिछड़ी जाति का कद्दावर नेता नहीं है | अरुण यादव को जिस तरह पीछे धकेला गया उसकी वजह से पार्टी  कमजोर हुई है | सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस  ओबीसी आरक्षण के बिना ही चुनाव करवाने का जो आदेश दिया उसके परिप्रेक्ष्य में भाजपा और कांग्रेस दोनों को अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा | आरक्षण का प्रावधान हुए बिना भी वे इस वर्ग को कितना अवसर देंगीं यह  इन चुनावों से स्पष्ट हो जाएगा | यदि उन्हें समुचित प्रतिनिधित्व बिना  आरक्षण के ही मिल सके तब हो सकता है भविष्य में इसे लेकर बनाया जाने वाला दबाव कुछ कम हो | वैसे भी राजनीतिक दलों को अपने स्तर पर इस तरह की रचना  करनी चाहिये जिससे समाज के सभी वर्गों के साथ न्याय हो सके और विकास की मुख्यधारा से कोई भी इसलिए वंचित न रहे क्योंकि वह दलित अथवा पिछड़ी जाति में जन्मा है | इसी के साथ ये भी जरूरी है कि आरक्षित वर्ग के जो राजनीतिक नेता स्थापित हो चुके हैं वे  अपने परिवार के दायरे से निकलकर समूचे  समाज के वंचित वर्ग के उत्थान को प्राथमिकता दें  जो कि आरक्षण का मूल उद्देश्य है |  

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 10 May 2022

कमजोर नेतृत्व खालिस्तानी आतंक की वापसी की वजह बन रहा



ऐसा लगता है पंजाब को जलाने की बड़ी साजिश रची जा रही है | पटियाला में खालिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने वाली रैली पर सिख संगठन द्वारा किये हमले के बाद काली मंदिर में जिस तरह से निहंगों द्वारा आतंक फैलाया गया वह सामान्य बात नहीं थी | पंजाब के किसी हिन्दू धार्मिक स्थल में घुसकर सिखों द्वारा तलवारें लहराने का यह संभवतः पहला अवसर था | अन्यथा गुरुद्वारों में जहाँ हिन्दू श्रद्धालु बड़ी संख्या में देखे जाते हैं वहीं मंदिरों में सिखों की आवाजाही भी बहुत ही सामान्य बात है | वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा में भी सिखों की अच्छी खासी संख्या होती है | नब्बे के दशक में जब खालिस्तानी आतंक पंजाब में छाया था तब भी हिन्दू – सिख भाईचारा यथावत रहा | लेकिन ऐसा लगता है किसान आन्दोलन की नमी से पनपे खालिस्तानी बीज पंजाब की धरती पर अंकुरित होने लगे हैं | निहंगों द्वारा की गई कुछ हिंसक वारदातों के बाद ये महसूस किया जाने लगा है कि देश विरोधी शक्तियां इस सीमावर्ती राज्य में पाँव फ़ैलाने के लिये प्रयासरत हैं | बीते कुछ दिनों के भीतर ही जो संदिग्ध पकड़े  गये उनके पास से विस्फोटक पदार्थ भी मिले | गत दिवस चंडीगढ़ के निकट पंजाब के मोहाली में स्थित इंटेलिजेंस विंग के मुख्यालय पर रॉकेट से हुए हमले से उन तमाम आशंकाओं की पुष्टि हो गई जिनके अनुसार पंजाब में आतंकवाद नए सिरे से सिर उठाने की फ़िराक में हैं |  हालाँकि रात का समय होने से नुकसान ज्यादा नहीं हुआ अन्यथा दिन के समय जनहानि भी हो सकती थी | बताया जा रहा है कि रॉकेट तकरीबन 80 फीट दूर से फेंका गया |  इस सन्दर्भ में सबसे अधिक चिंता का विषय ये है कि आखिरकार ऐसा क्या और कैसे हो गया कि दशकों से ठंडा पड़ा खालिस्तानी आन्दोलन अचानक गर्म हो उठा | स्मरणीय है जब कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब के किसान जिनमें ज्यादातर सिख थे,दिल्ली आये तब मददगार के तौर पर गुरुद्वारों ने भी धरनास्थल पर लंगर के जरिये सेवा कार्य शुरू किये | शुरुवात में तो वह सामान्य लगा लेकिन जल्द ही वहां  भिंडरावाले के चित्र वाली टी शर्ट और खालिस्तानी झन्डे नजर आने लगे | निहंगों ने भी किसानों के तम्बुओं के साथ अपना डेरा जमा लिया जबकि उन्हें खेती – किसानी से कुछ भी लेना देना नहीं था | सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि किसान आन्दोलन के समर्थन में कैनेडा और ब्रिटेन में भारतीय दूतावास के समक्ष वहां रहने वाले सिख संगठनों द्वारा प्रदर्शन किये गए जिनमें खालिस्तानी नारे भी लगे | वह  आन्दोलन तो जैसे – तैसे खत्म हो गया और कृषि कानून भी वापिस हो गये परन्तु  जिस कांग्रेस सरकार ने आन्दोलन को पंजाब से दिल्ली भेजकर अपना सिरदर्द घटाया था , जनता ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया | लेकिन विकल्प के तौर पर आई आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से जिस तरह खालिस्तान समर्थक सिख संगठन खुले आम उपद्रव मचाने का दुस्साहस कर रहे हैं वह आने वाले बड़े खतरे का संकेत है | आम आदमी पार्टी के खालिस्तानी नेताओं से सम्बन्धों को लेकर अरविन्द केजरीवाल के पुराने साथी डा.कुमार विश्वास ने जो आरोप विधानसभा चुनाव के पूर्व लगाए और फिर हालिया घटनाओं पर प्रतिक्रिया के दौरान उसकी सांकेतिक पुष्टि की वह निश्चित रूप से विवादित मसला है | परन्तु इतना जरूर  कहा जा सकता है कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की  प्रशासनिक क्षमता पर अभी से सवाल उठने शुरू हो गये हैं | इस बारे में ये भी विचारणीय है कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कुर्सी छोड़ने के पूर्व अनेक मर्तबा केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से अकेले में बात करते हुए सुरक्षा संबंधी कुछ जानकारियाँ दी थीं | निश्चित तौर पर उनके संज्ञान में कुछ न कुछ ऐसा आया होगा जिसे केंद्र सरकार की जानकारी में लाने की जरूरत उन्होंने महसूस की  |  उस समय पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तान के निवर्तमान प्रधान मंत्री इमरान खान से याराने की भी राजनीतिक जगत में खूब चर्चा थी | ये भी सुनने में आता रहा कि कैप्टन ने सिद्धू और इमरान के बीच नजदीकी को लेकर भी कुछ जानकारी श्री शाह  को दी थी | हालांकि ऐसी बातों का खुलासा नहीं हो पाता किन्तु बीते एक दो साल के भीतर पंजाब के राजनीतिक  घटनाक्रम पर निगाह डालने से  ये बात सामने आती है कि स्पष्ट बहुमत वाली सरकार और कैप्टन जैसे अनुभवी मुख्यमंत्री  के बावजूद पकिस्तान की सीमा से सटे इस राज्य में कांग्रेस  की अंतर्कलह और पार्टी हाईकमान के ऊलजलूल निर्णयों ने वहां राष्ट्रीय पार्टियों की कब्र खोदने का गुनाह कर डाला | परिणामस्वरूप मिट्टी के नीचे दबे राष्ट्रविरोधी बीज सतह से ऊपर आने लगे हैं | गत दिवस नवजोत और भगवंत के बीच मुलाकात की खबर के बाद मोहाली में ख़ुफ़िया विंग के मुख्यालय पर राकेट से ग्रेनेड फेंके जाने की घटना हो गयी | हालांकि उस  मुलाकात से इसके तार जोड़ना उचित नहीं है लेकिन एक बात जरूर सामने आने लगी है कि पंजाब में जिस नई राजनीति का उदय हुआ उसके पास अनुभवी नेतृत्व का अभाव होने से राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे की अनदेखी करने का खतरा उत्पन्न हो गया है | आम आदमी पार्टी की सरकार ने स्वच्छ प्रशासन का जो संकेत दिया वह बेशक उत्साहवर्धक है लेकिन खालिस्तानी ताकतों पर लगाम न कसी गई तो पंजाब में आतंकवाद की लपटें तेज होने का खतरा बढ़ जाएगा | ऐसा लगता है श्री  मान के पास स्वतंत्र सोच का अभाव है और उनके मार्गदर्शक श्री केजरीवाल आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से राष्ट्रीय विकल्प बनने के लिए हाथ - पाँव मारने में व्यस्त हैं | ऐसे में देश विरोधी ताकतों को अपना जाल फ़ैलाने का अवसर मिलने की सम्भावना बढ़ रही है |   

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 May 2022

विश्व युद्ध रोकने में भारत सक्षम : कूटनीतिक मजबूती का प्रभाव



 रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को ढाई महीने हो चुके हैं | इसमें दो मत नहीं हैं कि रूसी आक्रमण से यूक्रेन में हर  तरफ तबाही का मंजर है | सभी बड़े शहर मलबे के ढेर बन चुके हैं | रूस  अपार सैन्य शक्ति का उपयोग करते हुए अपने इस पड़ोसी से घुटने टिकवाने की हरसंभव कोशिश कर रहा है | लेकिन अब तक वह ऐसा कुछ भी हासिल नहीं कर सका जिसे विजय कहा जा सके | वैसे  तो ये लड़ाई बेमेल है किन्तु यूक्रेन की सेना और जनता जिस साहस का परिचय दे रही है वह इस जंग का सबसे उल्लेखनीय पहलू है | हालाँकि इसके पीछे अमेरिका और उसके समर्थक देशों द्वारा दी जा रही आर्थिक और सैन्य सहायता का योगदान है | लगभग रोज बर्बादी की तरफ बढ़ रहे देश का हौसला टूटने का नाम नहीं ले रहा जिसके कारण रूस के राष्ट्रपति पुतिन की बौखलाहट बढ़ती जा रही है | यूक्रेन के विरुद्ध उनकी आक्रामकता ने पूर्वी यूरोप के देश हंगरी , रोमानिया आदि को तो भयभीत किया ही लेकिन स्केंडनेवियन देश फिनलैंड और स्वीडन को हाल ही में पुतिन ने जिस तरह धमकाया उसके बाद से ये लगने लगा है कि रूस   अब अन्य यूरोपीय देशों को भी  शिकार बनाना चाहता है | दरअसल पुतिन के गुस्से का कारण ये है कि तमाम यूरोपीय देश यूक्रेन के समर्थन में खुलकर सामने आ गये और अमेरिका के दबाव में उन सभी ने रूस पर बेहद कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं | इसकी वजह से उसका आयात और निर्यात दोनों बुरी तरह प्रभावित हुए हैं | आर्थिक मामलों के जानकारों का आकलन ये है कि इस युद्ध में जहां यूक्रेन में  विध्वंस का आलम है वहीं रूस में  आर्थिक अराजकता फ़ैल गई है | जरूरी चीजों का आयात रुकने से जहां जनता परेशान हो रही है वहीं निर्यात पर रोक लग जाने से उद्योगपति भारी नुकसान उठाने मजबूर हैं | यद्यपि प. यूरोप के अनेक देश रूस से व्यापार करने के इच्छुक हैं क्योंकि कच्चे तेल और गैस के लिए वही उनका सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता था लेकिन अमेरिकी दबाव  के कारण वे आगे नहीं बढ़ पा रहे | इस लड़ाई से दुनिया शीतयुद्ध के पुराने दौर में तो वापिस लौट ही चुकी है लेकिन यदि जल्द शांति स्थापित न हुई तो बात विश्व युद्ध की तरफ बढ़ सकती है | भले ही वह द्वितीय विश्वयुद्ध जैसा  मैदानी न हो जिसमें थल सेना का काफी उपयोग हुआ था लेकिन तकनीक के इस दौर में युद्ध की भयावहता और दुष्प्रभाव पहले से कई गुना ज्यादा बढ़ गए हैं | मसलन रूस ढाई महीनों  में भले ही यूक्रेन को फतह न कर सका हो किन्तु उसने इस देश को बिना जीते ही जिस तरह तबाह किया उससे ये अंदाज लगाया जा सकता है कि युद्ध का विस्तार और भी देशों में हुआ तब दूसरे महा युद्ध के बाद न सिर्फ यूरोप वरन समूचे विश्व में जो आर्थिक विकास हुआ उस पर पानी  फिर जायेगा | दुर्भाग्य ये है कि कि जिस रूस ने हिटलर की विस्तारवादी सोच के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई जीती वही आज उसी तरह की नीतियों के साथ अपने पड़ोसियों को आतंकित करने पर आमादा है | हालाँकि इसके लिए अमेरिका भी कम कसूरवार नहीं है क्योंकि नाटो नामक सैन्य संधि का विस्तार रूस की सीमाओं तक करने के पीछे उसका इरादा इस विश्व शक्ति की घेराबंदी करना था | हालाँकि सोवियत संघ  के विघटन की टीस रूस के ह्रदय में बनी रहने से ही उसने अपने पुराने साथी देशों पर तरह – तरह के दबाव बना रखे हैं | विशेष रूप से पुतिन के सत्ता में आने के बाद से रूस की नीति सोवियत संघ के पुराने घटकों को अपना आर्थिक उपनिवेश बनाने की रही | यूक्रेन उसकी निगाह में ज्यादा ही खटकता रहा क्योंकि एक तो वह बड़ा देश है और दूसरा सैन्य तथा आर्थिक दृष्टि से  काफी विकसित भी था | पूर्वी और प. यूरोप के साथ भौगोलिक निकटता की वजह से उसकी अंतरर्राष्ट्रीय स्थिति भी बेहद मजबूत बनती गयी | रूस को ये बर्दाश्त नहीं हो रहा था और इसीलिए उसने क्रीमिया नामक यूक्रेनी बंदरगाह पर बलात कब्ज़ा कर लिया | उसके बाद से पुतिन के हौसले और बुलंद हुए जिनकी भनक लगते ही यूक्रेन ने नाटो की सदस्यता ग्रहण कर अमेरिकी सैन्य सुरक्षा का इंतजाम करना चाहा और वहीं से इस युद्ध के बीज अंकुरित होने लगे | अब तक जो हुआ उसमें संरासंघ की लाचारी खुलकर सामने आ चुकी है | रूस के वीटो की वजह से सुरक्षा परिषद उसकी निंदा करने तक में असमर्थ रही है |  चीन और भारत के तटस्थ हो जाने से भले ही रूस को सीधी सहायता न मिली हो लेकिन अमेरिकी पक्ष अपने दबदबे को पूरी तरह कायम नहीं कर सका | हालाँकि राष्ट्रपति बाइडेन सहित ब्रिटेन और अन्य अमेरिकी देशों के राष्ट्रप्रमुखों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके साथ आने का अनुरोध भी किया और दबाव भी बनाया लेकिन भारत ने अपने रुख में बदलाव नहीं किया | उसने साफ़ कर दिया कि वह यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थन नहीं करता किन्तु निंदा भी नहीं करेगा | यद्यपि संरासंघ में भारत ने लड़ाई रोके जाने की वकालत भी की | गत सप्ताह अपने यूरोपीय दौरे में श्री मोदी ने साफ़ – साफ़ कहा कि इस युद्ध में किसी की जीत नहीं होगी इसलिए इसे रोकना दुनिया के हित में होगा | उसके बाद ही संरासंघ में रूस ने भी शांति स्थापना के लिए विश्व जनमत के साथ चलने की बात कहकर अपने रुख में नरमी का संकेत तो दिया | लेकिन बीते दो दिनों में नागरिक ठिकानों पर उसके हमले जिस तरह हुए उनके बाद  इस जंग के रुकने की ऊमीदें टूट रही हैं | धीरे – धीरे ये भी स्पष्ट होता जा रहा है कि पुतिन को उन्मादी साबित करने वाला अमेरिका भी इस युद्ध को जारी रखे जाने का हिमायती है | लेकिन वह मैदान में आने की बजाय यूक्रेन को मोहरा बनाये हुए है जिसके राष्ट्रपति जेलेंस्की  अमेरिकी जाल में फंसकर बड़े पहलवान से जबरन लड़ने की मूर्खता कर बैठे | आज यूक्रेन जिस  स्थिति में पहुंच गया है वहां से न पीछे लौटना संभव है और न ही आगे बढ़ने का सामर्थ्य उसके पास है | लेकिन दुनिया के हित में अब इस जंग को रोका जाना जरूरी हो गया है क्योंकि इससे कोरोना के बाद संभलती जा रही वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी है |   अमेरिका सहित लगभग सभी देशों में महंगाई  चरम पर है | आयात करने वाले देशों की कमर टूट रही है वहीं निर्यात पर टिके देश भी तरह – तरह की परेशानी  से जूझ रहे हैं | भले ही  कहने को अब तक विश्वयुद्ध की नौबत नहीं आई लेकिन धीरे – धीरे दुनिया उस ओर बढ़ती लग रही है क्योंकि रूस और अमेरिका के सत्ताप्रमुख  अपने – अपने  वर्चस्व की  खातिर ऐसे हालात  पैदा करने पर आमादा हैं जिनमें युद्ध की लपटें पूरी दुनिया को अपनी लपेट में लिए बिना  नहीं रहेंगी | भारत की भूमिका ऐसे में बहुत ही महत्वपूर्ण हो गयी है क्योंकि श्री मोदी ही उन चंद विश्व नेताओं में हैं जो पुतिन , बाइडेन , जॉन्सन , मेक्रों और जिनपिंग से बात कर सकते हैं | चीन भी हालाँकि इस लड़ाई में तटस्थ है लेकिन उसकी विश्वसनीयता निरंतर कम होने से भारत काफी मजबूत स्थिति  में है | श्री मोदी की ताजा यूरोप यात्रा की सफलता ने कूटनीतिक जगत में भारत की प्रतिष्ठा में जो वृद्धि की है उसकी वजह से इस युद्ध को विश्व युद्ध में परिवर्तित होने से रोकने के लिए दुनिया श्री मोदी से उम्मीदें लगा रही है  | विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा किये गए विदेशी दौरों के दौरान भारत के पक्ष को जिस दबंगी के साथ प्रस्तुत किया गया उसकी भी सर्वत्र चर्चा है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 May 2022

कान फोडू शोर पर रोक लगाना हर दृष्टि से सही निर्णय



उ.प्र के बदायूं जिले की एक मस्जिद पर ध्वनि विस्तारक लगाकर अजान की अनुमति न देने के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका को रद्द करते हुए राज्य के उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ध्वनि  विस्तारक के जरिए अजान देना मौलिक अधिकार नहीं है | उल्लेखनीय है उ.प्र सरकार ने मंदिरों और मस्जिदों में लगे हजारों लाउड स्पीकर हटवा दिए हैं | मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिस गोरखनाथ पीठ के प्रमुख हैं उसके परिसर में लगे ध्वनि विस्तारकों की आवाज परिसर के बाहर न आने पाए इसकी पुख्ता व्यवस्था भी कर दी गयी है | काफी समय से ये मसला अदालतों के सामने विचाराधीन रहा है | महाराष्ट्र में तो इसे लेकर राजनीतिक विवाद भी छिड़ गया है | विभिन्न अदालतों ने ध्वनि प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करते हुए समय – समय पर आदेश पारित किये लेकिन कहीं धार्मिक भावनाएं हावी हो गईं तो कहीं प्रशासनिक उदासीनता उन आदेशों को लागू करने में बाधक बन गई | लेकिन बीते कुछ समय से ये मसला काफी चर्चा में है | महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री के चचेरे भाई राज ठाकरे ने ध्वनि विस्तारक न हटाये जाने पर अजान के समय ही मस्जिद के सामने हनुमान चालीसा का पाठ करने की जिद ठान ली है | देश के दूसरे हिस्सों में भी ध्वनि विस्तारकों से होने वाले शोर के विरुद्ध जनभावनाएं मुखरित हो रही हैं | दुर्भाग्य से ये मुद्दा धार्मिक बना दिया गया है जबकि  इसका सीधा सम्बन्ध जनता को  होने वाली परेशानी से है | केवल मस्जिदों में लगे ध्वनि विस्तारक ही शोर मचाते हों ऐसा नहीं है | अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर भी ये शिकायत है  | यही नहीं तो सड़कों पर निकलने वाले राजनीतिक और धार्मिक जुलूस भी लोगों के कान फोड़ने में सहायक बनते हैं | बारातों में बजाये जाने वाले डीजे तो कर्कशता के प्रतीक बन गये हैं | इसके अलावा किसी महापुरुष की जयन्ती पर भी ध्वनि विस्तारकों के जरिये शोर होने की शिकायतें आम हैं | घरों में होने वाले धार्मिक आयोजनों में भी ध्वनि  विस्तारक लगाकर अगल - बगल के घरों में रहने वालों के लिए परेशानी पैदा की जाती है | अखंड रामायण का आयोजन तो पूरे 24 घंटे मोहल्ले भर को सोने नहीं देता | कहने का आशय ये है कि ध्वनि विस्तारक एक संस्कृति के तौर पर हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गया है | कुछ विशिष्ट अवसरों या आयोजनों में तो इसका उपयोग उचित  कहा जा सकता है परन्तु बिना वजह महज शोर मचाने के लिए ऐसा करना बेहूदगी होती है , जिसका प्रदर्शन हमारे देश में निर्लज्जता के साथ किया जाता है | उच्च न्यायालय का संदर्भित फैसला न सिर्फ मस्जिदों अपितु अन्य धार्मिक स्थलों पर भी लागू होगा | इसलिए इसमें किसी भेदभाव की बात भी नहीं है | ध्वनि प्रदूषण को लेकर पूरी दुनिया में नियम हैं | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी सार्वजनिक उपयोग के दौरान ध्वनि विस्तारक की आवाज अधिकतम कितनी होगी इसकी सीमा तय की जा चुकी  है | लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि उसके फैसले का खुले आम उल्लंघन होता रहा है | धार्मिक और राजनीतिक आयोजनों में तो ध्वनि विस्तारक  प्रतिष्ठा का विषय बन गया है | वो तो भला हो टी.एन.शेषन का जिन्होंने चुनावों के दौरान ध्वनि विस्तारकों के उपयोग पर नियन्त्रण लगा दिया वरना लोगों का रहना - सोना मुश्किल होता था | नेताओं की सभाएं देर  रात तक चलने से भी शोर – शराबा जारी रहता था | ताजा फैसले में अजान हेतु ध्वनि विस्तारक के उपयोग को मौलिक अधिकार नहीं मानने की जो बात कही गयी है उसे धार्मिक नजरिये से न देखते हुए सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर लेना चाहिए क्योंकि धार्मिक स्वतंत्रता का पालन करने का ये अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि उससे बाकी लोगों को तकलीफ पहुंचे | न सिर्फ मुस्लिम समाज वरन देश में रहने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए जरूरी है कि वह धर्म की आड़ में मनमानी करने की जिद छोड़कर समय के साथ सुधार करने की मानसिकता  पैदा करे | चूंकि उक्त फैसला  सभी धार्मिक स्थलों पर समान रूप से लागू होगा इसलिए मुस्लिम मौलवियों सहित समाज के जिम्मेदार लोगों को संकीर्ण दृष्टिकोण त्यागकर स्वेच्छा से मुख्यधारा में शमिल होने की बुद्धिमत्ता दिखानी चाहिए | उनको ये बात भी समझनी होगी कि अपनी विशिष्ट स्थिति को बनाये रखने की उनकी जिद ही उनके लिए नुकसानदेह साबित हो रही है | आजादी के 75 साल बाद देश जिस दिशा में बढ़ रहा  है उसमें धार्मिक स्वतंत्रता के लिए तो स्थान है लेकिन स्वछंदता के लिये नहीं | मुस्लिम समाज को यह वास्तविकता भी समझ लेना चाहिए कि  तुष्टीकरण कर चुनाव जीतने वाला फार्मूला अब कारगर नहीं रहा और इसलिए अब किसी के लिए भी सौदेबाजी की स्थिति नहीं रह गई है  | लिहाजा सभी को  देश के कानून के मुताबिक चलने की आदत डाल लेनी चाहिए | तीन तलाक पर रोक के बाद  समान नागरिक संहिता  आने की चर्चा तुष्टीकरण की अंतिम यात्रा की शुरुवात का संकेत हैं | ऐसे में उ.प्र के उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया उक्त निर्णय पूरी तरह निष्पक्ष है और उसे उसके सही परिप्रेक्ष्य में स्वीकार किया जाना चाहिए |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 May 2022

आरक्षण : मर्ज बढ़ता गया ज्यों – ज्यों दवा दी



म.प्र में पंचायत एवं नगरीय चुनाव में ओबीसी  ( अन्य पिछड़ा वर्ग ) के आरक्षण की सीमा कितनी रखी जावे इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई गत दिवस रोचक मोड़ पर जा पहुंची जब न्यायालय ने राज्य सरकार को हड़काते हुए कहा कि वह ओबीसी की संख्या संबंधी आंकड़े आज उसके समक्ष पेश करे अन्यथा वह बिना आरक्षण के चुनाव करवाने का आदेश पारित कर देगा | इसके बाद सरकार हरकत में आई और पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग सहित मतदाता सूचियां अदालत में पेश करने की तैयारी कर ली गई | ओबीसी को 35 फीसदी आरक्षण की सिफारिश के साथ जरूरी दस्तावेज आज अदालत में पेश होंगे | समूचे विवाद के पीछे ओबीसी की जनसँख्या के अनुपात में आरक्षण दिये जाने की मांग है | इसमें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अतीत में दी गई वह व्यवस्था बाधा बन रही है जिसके अनुसार आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता | ऐसे में यदि 35 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना है तब संविधान में संशोधन करना होगा जो संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है | सर्वोच्च न्यायालय इस ,मामले में क्या फैसला देगा ये आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जायेगा | यदि वह राज्य सरकार द्वारा पेश किये गए दस्तावेजों से संतुष्ट न हुआ तब हो सकता है वह बिना आरक्षण के निर्वाचन करवाने का आदेश दे जैसा कि महाराष्ट्र को लेकर वह कर चुका है | जाहिर है उस पर भी राजनीति होगी क्योंकि तब विपक्ष सरकार पर आरोप लगाएगा कि उसने ओबीसी को उसका हक दिलवाने में लापरवाही की | और यदि सर्वोच्च न्यायालय ने 35 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी हेतु निर्देशित कर दिया तब पूरा मामला संविधान संशोधन पर जाकर टिक जावेगा | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आरक्षण नामक व्यवस्था  राजनीति के जाल में फंसकर रह गई है | राजनीतिक दलों के मन में यदि आर्थिक , सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े रह गये वर्गों के उन्नयन के प्रति ईमानदारी होती तो कोई कारण नहीं है जो आजादी के 75 साल बाद भी पिछड़ेपन का रोना रोया जाता | जाति को अलग रखकर  देखें तो ये लगेगा कि सामाजिक के साथ ही  आर्थिक और शैक्षणिक  पिछड़ापन एक बड़े वर्ग के साथ जुड़ा हुआ है | सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो लेकिन उसका पूरा ध्यान वोटों पर लगा रहता है | वरना आरक्षित वर्ग के नेताओं की स्थिति में हुए सुधार से उनके सजातीय वंचित न रहते | ये देखते हुए लगता है कि आरक्षण अपने असली उद्देश्य से भटक चुका है | निश्चित तौर पर आजादी के समय अजा , अजजा को आरक्षण रूपी बैसाखी की जरूरत थी |  इस वर्ग को मुख्यधारा में लाना समाज का मानवीय दायित्व था | कालान्तर में ओबीसी को भी आरक्षण का लाभ जब दिया गया तब कुल आरक्षण के प्रतिशत का विवाद उठा | जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकतम सीमा तो तय कर दी लेकिन हर चुनाव के पहले नई – नई जातियां आरक्षण की सूची में शामिल हो जाती हैं | अब तो बात अति पिछड़े और अति दलित तक जा पहुँची है | इसका आशय ये भी है कि बीते 75 साल में आरक्षित वर्ग का सम्पूर्ण उत्थान तो हुआ नहीं उलटे उसके कुछ हिस्से और भी बुरी हालत में पहुँच गये जो आरक्षण नामक व्यवस्था की सार्थकता पर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है | दरअसल जिन लोगों ने आरक्षण के नाम पर अपनी नेतागिरी चमकाई वे ही इस वर्ग के सबसे बड़े शत्रु साबित हुए | कभी – कभी तो लगता है अजा , अजजा और ओबीसी समुदाय की बदहाली के लिए उसके रहनुमा कहलाने वाले ही जिम्मेदार हैं | वरना बीते 75 साल में सामाजिक और आर्थिक विषमता पूरी तरह खत्म की जा सकती थी | म.प्र के स्थानीय निकाय एवं पंचायत चुनाव में ओबसी आरक्षण बढाने मात्र से यदि इस वर्ग का कल्याण होता हो तो संविधान में संशोधन करना भी उचित रहेगा लेकिन ये बात पूरी तरह सही है कि जातिगत आरक्षण अपने असली उद्देश्य में कामयाब नहीं हो सका | आज जब भारत दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का सामर्थ्य हासिल कर रहा है तब इस तरह के विवाद हमारी प्रगति में रोड़ा बनते हैं | सर्वोच्च न्यायालय ने यदि बिना आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये चुनाव   करवाने का आदेश दिया तब उसे लेकर भी राजनीतिक रस्साकशी चलेगी | लेकिन इस सबसे ओबीसी का पिछड़ापन दूर होगा , इसकी सम्भावना नहीं लगती | कभी – कभी तो ऐसा लगता है मानों आरक्षण के नाम पर समाज को बांटने की मुहिम एक षडयंत्र है जिसका उद्देश्य जातिगत भेदभाव को मजबूत करते हुए सामाजिक सद्भाव को क्षति पहुँचाना है | आजादी के अमृत महोत्सव में बीते 75 साल के दौरान क्या खोया , क्या पाया का आकलन हो रहा है | लेकिन आरक्षण की समीक्षा करने के नाम पर ही बवाल होने लगता है | आरक्षण बेशक एक दवाई थी सदियों पुरानी सामजिक बुराई के इलाज की किन्तु ऐसा लगता है कि समय के साथ मर्ज बढ़ता गया ज्यों – ज्यों दवा दी वाली कहावत साबित हो रही है | यदि इसका लाभ हुआ होता तब आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने की बजाय घटाने की बात सोची जाती | लाख टके का सवाल ये है कि दलित और पिछड़े आखिर हैं ही क्यों ?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 May 2022

संस्कृत को प्रोत्साहन देना बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय



बीते कुछ समय से देश में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के मसले पर विवाद की स्थिति बनी हुई है | दक्षिण के राज्यों के अलावा प. बंगाल से भी हिन्दी के विरोध में आवाजें उठी हैं | क्षेत्रीय भाषाओं के पैरोकार भी इस मामले में मुखर हो उठे हैं | लेकिन इस सबके बीच म.प्र की शिवराज सरकार ने संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए उसका अध्ययन करने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति देने की घोषणा कर डाली | अक्षय तृतीया के दिन मुख्यमंत्री ने परशुराम चरित्र को पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने का ऐलान किया था | राजनीतिक चश्मे से देखें तो श्री चौहान का उक्त फैसला आगामी विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं को खुश करने का दांव है | उल्लेखनीय है 2018 के चुनाव में कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता जैसे उनके बयान ने सवर्ण मतदाताओं को नाराज कर दिया था |  मुख्यमंत्री स्वयं अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं और गाहे – बगाहे प्रदेश में 62 फीसदी ओबीसी जनसंख्या का आंकड़ा उनके द्वारा बताया जाता है | भाजपा के भीतर भी परम्परागत सवर्ण  समर्थक वर्ग इस बात से आहत अनुभव करने लगा है कि उसकी मेहनत से उठी पार्टी ओबीसी , अजा / अजजा को ज्यादा महत्व देने लगी है | सत्ता में बने रहने के लिए लिए सामाजिक न्याय वाली राजनीति का सफल प्रयोग उ.प्र में करने के बाद भाजपा का हौसला काफ़ी बुलंद है | अधिकतर ओबीसी और अजा / अजजा उसके साथ आ जाने से ही वह देश और अनेक प्रदेशों की सत्ता पर काबिज हो सकी | हालांकि  स्थायी रूप से उससे जुड़े रहे सवर्ण मतदाता भले ही उसके साथ बने हुए हैं लेकिन उनके मन में अपनी उपेक्षा के कारण नाराजगी तो है | शिवराज सिंह चूँकि अतीत में इसका नुकसान उठा चुके हैं इसलिए आगामी चुनाव में किसी भी तरह का जोखिम उठाने से बचते हुए वे ब्राह्मणों को रिझाने में जुट गए हैं | भोपाल में परशुराम की  विशालकाय प्रातिमा के अनावरण के दौरान ही उनके चरित्र को पाठ्यकम का हिस्सा बनाने के बाद संस्कृत पढने के इच्छुक छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करने के साथ ही उसके शिक्षकों की भर्ती जैसे फैसले भी लिए गए | वोट बैंक की राजनीति से अलग हटकर देखने पर राज्य सरकार के इस निर्णय में सार्थकता प्रतीत होती है | संस्कृत को देव भाषा मानते हुए अधिकतर भारतीय भाषाओँ की जननी कहा जाता है | हमारे देश का ज्यादातर पौराणिक साहित्य मूल रूप से संस्कृत में होने से यह धार्मिक कर्मकांड की भी भाषा है | इससे भी बढ़कर अब ये साबित होता जा रहा है कि कम्प्यूटर की भाषा के तौर पर संस्कृत बेहद उपयोगी है | ऐसे में यदि उसके अध्ययन हेतु छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है और उसे पढ़ाने के लिए शिक्षक नियुक्त होते हैं तब इस प्राचीन भाषा को उपेक्षा की खाई से निकालकर पुनः प्रतिष्ठित किया जा सकता है | कुछ दशक पूर्व तक विद्यालयीन पाठ्यक्रम में संस्कृत में उत्तीर्ण होना अनिवार्य था | लेकिन कालान्तर में उसे गैर जरूरी बना दिया गया | अंकसूची के  कुल अंकों में संस्कृत के अंक नहीं जोड़े जाने से उसके अध्ययन के प्रति रूचि में कमी आई | ये कहना भी गलत न होगा कि उसे दोयम दर्जे की भाषा समझा जाने लगा | म.प्र सरकार के इस निर्णय पर भी नाक सिकोड़ने वाले निकल आयें तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए |  लेकिन वर्तमान  हालातों पर दृष्टिपात करने पर  महसूस किया जा सकता है कि संस्कृत के जानकारों को देश के साथ विदेशों में भी उसी तरह सम्मान सहित रोजगार हासिल हो सकता है जैसा बीते कुछ सालों से योग का शिक्षण लेकर निकले छात्रों को हुआ  है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब योग को  वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का बीड़ा उठाया और उसके बाद विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में योग के पाठ्यक्रम प्रारम्भ करवाए तब शुरुवात में वह निर्णय  उपहास का पात्र बना | लेकिन बीते कुछ  सालों के भीतर हजारों योग प्रशिक्षक विदेशों में जाकर अच्छा ख़ासा कमा रहे हैं | इसी तरह भारत में योग की विधिवत शिक्षा प्राप्त किये युवा नौकरी अथवा निजी प्रशिक्षक के तौर पर आजीविका चलाने में सक्षम हुए हैं | उल्लेखनीय है कि संस्कृत की उपेक्षा के कारण  अच्छे कर्मकांडी पुरोहितों का अभाव नजर आने लगा है | इस दृष्टि से म.प्र  सरकार ने भाषा के  तौर पर संस्कृत को प्रोत्साहित करने को जो फैसला किया वह हर दृष्टि से समयोचित है | इसे केवल सनातन धर्म से जोड़कर देखना मूर्खता होगी क्योंकि भारतीय आध्यात्म , दर्शन और ज्ञान कोष  के अध्ययन के लिए इस भाषा का ज्ञान किसी के लिए भी उपयोगी हो सकता है | यूँ भी भाषा की जानकारी व्यक्तित्व की चमक में वृद्धि करती है | मसलन स्व. हरिवश राय बच्चन हिंदी भाषी होने के बाद भी अंग्रेजी के प्राध्यापक थे किन्तु उनकी प्रतिष्ठा हिंदी  कवि के तौर पर थी | इसी प्रकार स्व. रघुपति सहाय जो  फिराक गोरखपुरी के नाम से लोकप्रिय हुए , हिन्दी भाषी होने के बाद भी अंग्रेजी के प्राध्यापक हुए किन्तु उनकी समूची साहित्य साधना उर्दू में थी | उक्त दोनों विभूतियों ने साबित कर दिया कि भाषा का ज्ञान आपको कितनी ऊंचाइयों तक पहुँचा सकता है | इसलिए शिवराज सरकार ने  संस्कृत  के शिक्षण के लिए जो कदम उठाया वह स्वागतयोग्य है | पाठ्यक्रम से उपेक्षित होती जा रही यह प्राचीन भाषा अपने व्याकरण और वैज्ञानिकता के लिए किसी प्रशंसा या प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं रही | जर्मनी में तो अनेक दशकों से संस्कृत के साथ ही प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन होता आ रहा है | म.प्र की तरह अन्य राज्य भी यदि संस्कृत को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसे ही कदम  उठायें तो बड़ी बात नहीं कि आने वाले कुछ सालों के बाद विश्व संस्कृत दिवस का आयोजन भी होने लगेगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 May 2022

दंगे : समान नागरिक संहिता के विरोध में अग्रिम दबाव बनाने की कोशिश



राजस्थान के करौली में हुए दंगे की तपिश कम भी नहीं हुई थी कि गत दिवस जोधपुर में सांप्रदायिक फसाद हो गया | अक्षय तृतीया और परशुराम जयन्ती के साथ ईद का संयोग होने से पूरे देश में प्रशासन काफी सतर्क था | उ.प्र में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने तो किसी भी प्रकार के धार्मिक जुलूस की अनुमति नहीं दी | म.प्र के खरगौन में भी हाल ही में हुए दंगे की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया | अक्षय तृतीया पर हिन्दू समाज में बड़ी संख्या में विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों के साथ ही  परशुराम जयंती के कारण अनेक स्थानों पर जुलूस निकालने की परम्परा भी है | दूसरी तरफ ईद पर मुस्लिम समुदाय के लोग भी नमाज हेतु ईदगाह जाते हैं | ऐसे में अपेक्षित तो यही था कि दोनों धर्मावलम्बी शान्ति और सद्भाव  के साथ अपने – अपने त्यौहार मनाते किन्तु जोधपुर में जो कुछ हुआ उससे स्पष्ट हो गया कि दंगों की ये श्रृंखला किसी योजना का हिस्सा है | उसके चित्र संचार माध्यमों पर प्रसारित होने के बाद दोषियों की पहिचान आसानी से की जा सकती है | दंगाइयों ने पुलिस वालों पर जिस तरह से घातक हमले किये उनसे उनकी प्रवृत्ति समझ में आ गयी | जो कारण बताया गया है वह इतना बड़ा नहीं था कि दंगे का रूप ले ले | ये कहना भी गलत न होगा कि हमारे देश में धारा 144 पूरी तरह से मजाक बनकर रह गई है | सामान्य परिस्थितियों तक में पुलिस बल का भय लगातार घटता जा रहा है | वरना निषेधाज्ञा लागू होने के बाद भी लोग हुजूम बनाकर सड़कों पर उत्पात मचाने की जुर्रत नहीं करते | जहाँ – जहाँ भी हाल ही में दंगे हुए उनका किसी त्यौहार के दिन ही होना इस बात का संकेत है कि जान बूझकर ऐसा किया गया जिससे समाज में तनाव बढ़े और शांति व्यवस्था के लिये खतरा पैदा हो | सतही तौर पर तो हर कोई ये कहते हुए दिखता है कि दोनों सम्प्रदायों के लोगों को मिल - जुलकर रहना चाहिए | गंगा – जमुनी संस्कृति की भी खूब  दुहाई दी जाती है , लेकिन वास्तविकता के धरातल पर देखें तो तस्वीर कुछ और ही है | जोधपुर में दंगे का जो कारण बताया गया ,  ठीक वैसा ही करौली , खरगौन और दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में देखने मिला था |  इसका मतलब यही है कि दंगा करवाने वालों के बीच जीवंत संपर्क और सामजंस्य  है | पुलिस और सुरक्षा बल किसी भी वारदात को अंजाम देने वालों की पृष्ठभूमि , संपर्क और तौर – तरीकों का अध्ययन करते हैं | उस आधार पर ये कहना गलत न होगा कि बीते एक माह के दौरान जितने भी सांप्रदायिक उपद्रव हुए उन सबके लिए बनाया गया बहाना लगभग एक समान ही है | पत्थर फेंकने की शैली एक जैसी होने से  भी लगता है जैसे उसके लिए बाकायदा प्रशिक्षण दिया गया हो | कुल मिलाकर बात राजनीतिक संरक्षण की आ जाती है | जिस राज्य की सरकार तुष्टीकरण से ऊपर उठकर दंगाइयों में भेद नहीं करती वहां स्थितियां नियन्त्रण में रहती हैं परन्तु  जहाँ राजनीति हावी रहती है वहां असली अपराधी बच जाते हैं | म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ट नेता जब ये कहते हैं कि गरीब मुस्लिम युवकों से भाजपा पत्थर फिकवाती है तो आश्चर्य के साथ दुःख होता है | करौली , खरगौन और जहांगीरपुरी में किसके जुलूस पर हमला हुआ और किसने किया ये किसी से छिपा नहीं है | लेकिन देश का एक वर्ग सत्य से नजरें चुराने की आदत से बाज नहीं आ रहा जिससे उपद्रवी तत्वों का हौसला बुलंद हो रहा है | करौली के बाद राजस्थान  के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहनगर में गत दिवस हुआ सांप्रदायिक दंगा केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि उसके लिए प्रदेश सरकार में बैठे नेतागण भी जिम्मेदार हैं जो करौली दंगे के दोषियों को  दंडित करवाने की बजाय राजनीतिक नफे – नुकसान का आकलन करते रहे  | जिस तरह खरगौन और जहांगीरपुरी में दंगा करवाने वालों पर प्रहार किया गया , वैसा ही करौली में किया जाता तब जोधपुर को जलाने का दुस्साहस न हुआ होता |  वैसे ये कहना गलत नहीं होगा कि उपद्रवी मानसिकता के लोग भी सभी धर्मों में होते हैं | लेकिन शासन में जमे नेताओं द्वारा दोषियों को बख्शने की हिदायत दिये जाने से इस मानसिकता को बढ़ावा मिलता है |  करौली दंगे के दोषियों को बचाने की गहलोत सरकार की गलती का खामियाजा जोधपुर ने भोगा | बीते कुछ समय से देश में एक सोची – समझी साजिश के अंतर्गत मुस्लिम समाज को मौजूदा व्यवस्था के विरुद्ध भड़काने का काम राजनीतिक नेताओं के अलावा मजहबी लोग कर रहे हैं | मुसलमानों के मन में बेवजह डर भी पैदा किया जा रहा है | सामाजिक सुधारों को धर्म विरोधी बताकर साम्प्रदायिक उन्माद की जमीन तैयार की जा रही है | भ्रम फ़ैलाने वाले ये कहने तक से बाज नहीं आ रहे कि जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाया जाना मुस्लिम विरोधी फैसला था | तीन तलाक पर रोक का हालाँकि मुस्लिम महिलाओं ने स्वागत किया लेकिन उसे लेकर भी तरह – तरह के बातें कही जाती रहीं | कुछ दिनों से समान नागरिक संहिता  लागू किये जाने की चर्चा चल रही  है |  ऐसा लगता है दंगों की ये श्रृंखला उसके विरोध में अग्रिम दबाव बनाने के लिये रची गई है | ऐसे में ये कहना गलत नहीं है कि देश को आंतरिक तौर पर कमजोर करने की कोशिश इनके जरिये की जा रही है | राजनीतिक जमात  से यही अपेक्षा है कि अगर वह दंगों को रोकने में मददगार नहीं हो सकती तो कम से कम उन्हें भड़काने का पाप तो न करे क्योंकि इनकी आग ये नहीं  देखती कि जलने वाले का धर्म क्या है ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी