Thursday, 14 July 2022

शेरों का मुंह बंद कराने का असफल प्रयास : छेड़छाड़ तो पहले की गई थी



शेरों का मुंह बंद कराने का असफल प्रयास :  छेड़छाड़ तो पहले की गई थी

हालाँकि राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों को लेकर बरती जाने वाली सतर्कता स्वागतयोग्य है लेकिन बीते दिनों नये  संसद भवन में लगाये गए चार शेरों वाले राष्ट्रीय चिन्ह का अनावरण प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया तो विपक्ष सहित असहिष्णुता के झंडाबरदारों की  छाती पर सांप लोटने लगा | पहले – पहल तो इस बात पर उंगलियां उठाई गईं कि उस चिन्ह का अनावरण प्रधानमन्त्री से क्यों करवाया गया ? लेकिन जब इस मुद्दे पर किसी ने  ध्यान नहीं दिया तब इस बात को लेकर हाय - तौबा मचाया जाने लगा कि वाराणसी के निकट  सारनाथ में जिस अशोक स्तम्भ की अनुकृति को आजादी के बाद राष्ट्रीय चिन्ह बनाया गया उसमें बने शेर शांत और सौम्य हैं जबकि नई संसद में लगाये जा रहे  प्रतीक चिन्ह वाले शेरों का मुंह खुला हुआ है जिससे भय की अनुभूति होती है | इस आधार पर  हर किसी को ये ऐतराज सही लगा क्योंकि बीते सात दशक से भी ज्यादा से जो प्रतीक चिन्ह प्रचलित  है उसमें प्रदर्शित शेर अपना मुंह बंद किये हुए हैं | ये आरोप भी लगाया गया कि मौजूदा सरकार ने हिंसा की पक्षधर होने से क्रोधित शेरों वाले प्रतीक चिन्ह को नये संसद भवन में लगाने का फैसला किया | ये भी कहा गया कि जिस अशोक स्तम्भ से हमारा प्रतीक चिन्ह लिया गया है यह उसका और शांति – अहिंसा के प्रवर्तक बौद्ध धर्म का अपमान है | इस बारे में दो राय नहीं हो सकतीं कि राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह और राष्ट्रध्वज के मौलिक स्वरूप से छेड़छाड़ का अधिकार किसी को नहीं है | राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री  बदलने की तरह ही परस्पर विरोधी विचारधारा वाले दल और गठबंधन सत्ता में आते – जाते रहते हैं | केंद्र और राज्यों में अलग – अलग दलों की सत्ता भी होती है | लेकिन देश की पहिचान कहे जाने वाले राष्ट्रीय चिन्ह अपरिवर्तित रहते हैं | एक देश के तौर पर हमारी एकता और अखंडता की अभिव्यक्ति के साथ ही कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है जैसे नारे की सार्थकता इन चिन्हों से ही प्रमाणित होती है | इन्हें विकृत करने का इरादा किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता और इसीलिये जब  नये संसद भवन पर लगाये जा रहे राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह के बारे में  आरोप लगा कि  मूल  छवि को बदल दिया गया तब हर किसी का ध्यान उस तरफ गया | सोशल मीडिया के जरिये  केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर  हमले होने लगे | फासीवादी मानसिकता जैसे घिसे – पिटे आरोप भी हवा में उछाले गए | लेकिन झूठ की हवा उस समय निकल  गई जब  शिल्पकार लक्ष्मण व्यास इस दावे के साथ सामने आये कि सारनाथ में रखी मूल आकृति वाले शेरों का मुंह भी खुला हुआ है और जिस प्रतीक चिन्ह का अनावरण श्री मोदी द्वारा किया गया वह उसकी हूबहू नक़ल है | नए संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष के ऊपर लगने वाले इस प्रतीक चिन्ह की प्रामाणिकता सामने आने के बाद विरोध के स्वर तो शांत हो गये लेकिन इस प्रकरण से एक बार फिर उन लोगों की कुंठा सामने आ  गई जो 2014 के बाद से चैन की नींद नहीं सो पा रहे | दरअसल  जिस सत्ता के बलबूते वे देश में राष्ट्रवादी शक्तियों के विरुद्ध अभियान चलाया करते थे वह हाथ से चली जाने के बाद उनकी असलियत सामने आने लगी है | वामपंथी विचारधारा के लोगों ने कांग्रेस में घुसपैठ कर सत्ता का खूब दोहन किया और साहित्य , कला संस्कृति जैसे क्षेत्रों में शहरी नक्सलवाद की जड़ें मजबूत कीं | मोदी सरकार ने चूंकि  इनकी गतिविधियों पर नकेल कसते हुए  देश – विदेश से मिलने वाली खैरात पर रोक लगाई तो ये तत्व बौखलाकर असहिष्णुता जैसे मुद्दे उछालकर अशांति और अस्थिरता पैदा करने का षडयंत्र रचने  लगे | लेकिन 2019 में भी इनके मंसूबों पर जनता ने पानी फेर दिया | जातिवाद , परिवारवाद और तुष्टीकरण के जरिये  अपनी राजनीति चलाने वाले जिस तरह मतदाताओं द्वारा तिरस्कृत किये जा रहे हैं उससे उनमें घबराहट भी है और बौखलाहट भी | इसी कारण आये दिन कुछ न कुछ ऐसा मुद्दा उछाला जाता है जिससे देश में तनाव बढ़े | राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह के बारे में वास्तविकता सामने आने के बाद  सवाल ये उठता है कि जब सारनाथ में रखे अशोक स्तम्भ वाले शेरों के मुंह खुले हुए हैं तब बंद मुंह वाले प्रतीक चिन्ह को स्वीकार करने वालों द्वारा मौलिकता का उल्लंघन किये जाने पर  आज तक किसी का  ध्यान क्यों नहीं गया ?  अब जबकि सही स्थिति का पता चल गया है तब क्या राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह की प्रचलित आकृति को भी मूल आकृति के अनुरूप ढाला जायेगा क्योंकि उसमें एकरूपता होना जरूरी है | लेकिन उसके पहले जिन्होंने ये विवाद खड़ा किया उन्हें अपने किये पर माफी मांगना चाहिए | इसी के साथ केंद्र सरकार को इस बारे में मानसून सत्र में संसद की स्वीकृति भी ले लेनी चाहिये जिससे भविष्य में राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह को लेकर इस तरह के गैर जिम्मेदार विरोध की गुंजाईश न रहे | दरअसल नई संसद बनाने का फैसला भी विघ्नसंतोषियों को हजम नहीं हो रहा जबकि ये बात सामने आ चुकी है कि न सिर्फ वर्तमान संसद भवन अपितु साउथ  और नॉर्थ ब्लॉक नामक केन्द्रीय सचिवालय में स्थान का अभाव होने से अनेक मंत्रालय दूर - दूर स्थित हैं | नई संसद  प्रधानमंत्री की दूरगामी सोच का प्रमाण है जिसे रिकॉर्ड समय में तैयार किया जा रहा है | इसके बन जाने के बाद केंद्र सरकार का समूचा सचिवालय एक ही स्थान पर आ जायेगा जिससे मंत्रियों और सांसदों  के साथ ही उनमें  जाने वाले आम लोगों  को भी बेवजह भागदौड़ और परेशानी से मुक्ति मिलेगी | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 13 July 2022

उद्धव की स्थिति बिना दांत और नाखून वाले शेर जैसी हो गई है



 
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपने राजनीतिक जीवन में इतने निरीह और लाचार इसके पहले कभी नजर नहीं आये | यद्यपि उनके  स्वर्गीय पिता बाल ठाकरे जैसा कड़क अंदाज उनका नहीं रहा लेकिन शिवसेना की पहिचान बने उग्र हिन्दुत्व का झंडा जरूर उन्होंने उठाये रखा |  2019 के विधानसभा चुनाव के बाद विघ्नसंतोषी सलाहकारों के चंगुल में फंसकर उद्धव ने सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौता करने की गलती की और राकांपा तथा कांग्रेस  के साथ मिलकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन बैठे | वैसे कहा तो ये जाता है कि वे स्वयं सत्ता में आने के बजाय अपने बेटे आदित्य को मुख्यमंत्री बनाना चाह रहे थे लेकिन  शरद पवार तथा सोनिया गांधी ने उससे इंकार कर दिया | और तब उद्धव को सरकार की कमान संभालनी पड़ी | लेकिन  दूसरी कहानी ये भी है कि उस बेमेल गठबंधन के असली शिल्पकार शिवसेना के मुंहफट प्रवक्ता संजय राउत थे जिन्होंने चुनाव के दौरान ही श्री ठाकरे के मन में मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा के समक्ष अड़ जाने की बात बिठा दी थी | परिणाम आने के पहले ही श्री राउत का ये कहना उन इरादों का संकेत देने लगा था कि शिवसेना के पास दूसरे विकल्प भी हैं | उसके बाद का घटनाक्रम सब जानते हैं | लगभग ढाई साल तक अपनी घोर वैचारिक विरोधी राकांपा और कांग्रेस के साथ सरकार चलाने के दौरान उद्धव को तो शिवसेना की आधारभूत पहिचान से समझौता करना पड़ा  लेकिन  उस गठबंधन के बाकी घटक  अपनी नीतियों पर अडिग बने रहे  | एकनाथ शिंदे ने भी अपनी बगावत के कारणों में इस बात का उल्लेख किया है कि उद्धव को मुख्यमंत्री बनाकर राकांपा और कांग्रेस अपना जनाधार मजबूत करते रहे  लेकिन शिवसेना की पकड़ कमजोर होती गई |  कहने वाले तो यहाँ तक कहते थे कि उद्धव तो नाम के मुख्यमंत्री थे और सत्ता का असली नियंत्रण राकांपा प्रमुख शरद पवार के हाथ में रहा  | आख़िरकार अपने अंतर्विरोधों के कारण वह सरकार चलती बनी | लेकिन उसके साथ ही शिवसेना में जो विभाजन हुआ उसने ठाकरे परिवार की ठसक और धमक दोनों खत्म कर दीं  | जो उद्धव और उनके बेटे आदित्य खुद को शिवसेना को अपनी निजी जागीर  समझते थे उनके हाथ से पहले तो सत्ता गयी और उसके बाद  पार्टी पर बना हुआ एकाधिकार भी खतरे में पड़ने लगा | 39 विधायकों के पाला बदलने के बाद उद्धव के साथ रहे विधायकों की सदस्यता पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं | ये आशंका भी है कि उनमें से भी कुछ शिंदे गुट के साथ जा सकते हैं | दूसरी तरफ पार्टी के अनेक सांसद पहले से ही श्री शिंदे के पाले में आ गये थे | उद्धव के साथ बचे सांसदों ने भी जब सार्वजनिक तौर पर एनडीए की राष्ट्रपति प्रत्याशी  द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने की इच्छा जताई तब उद्धव के कान खड़े हुए और उन्होंने उनकी बैठक बुलाई जिसमें लगभग सभी ने श्रीमती मुर्मू के समर्थन पर जोर दिया जिसके बाद उद्धव ने भी तत्संबंधी घोषणा कर डाली | कहा जा रहा है कि श्री राउत ने आख़िरी समय तक विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के समर्थन के लिए सांसदों को मनाने का प्रयास किया लेकिन  श्री ठाकरे ने सांसदों के दबाव के समक्ष झुकने की  अक्लमंदी दिखाई | हालांकि उन्होंने और श्री राउत दोनों ने दबाव में आकर यह निर्णय लेने से इंकार किया है किन्तु वे कहें कुछ भी लेकिन श्री शिंदे के दांव से चारों खाने चित्त होने के बाद उद्धव अपनी मर्जी थोपने की हैसियत में नहीं रह गये थे | उनको ये भय सता रहा था कि सांसदों की बात  न मानी गई तो कंगाली में आटा गीला वाली कहावत चरितार्थ होते देर न लगेगी | और इसीलिए उन्होंने बची – खुची पूंजी सहेजकर रखने का फैसला लिया | हालाँकि राकांपा ने ये कहकर इस फैसले का बचाव किया कि एनडीए में रहते हुए भी शिवसेना ने प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन किया था लेकिन कांग्रेस को  ये  अच्छा नहीं लगा | दरअसल श्री ठाकरे ये समझ गए हैं कि सरकार चली जाने के बाद यदि पार्टी पर भी  आधिपत्य खत्म हो गया तो  राजनीति के मैदान में वे अकेले और असहाय खड़े रहने बाध्य होंगे | हालांकि श्रीमती मुर्मू का समर्थन करने के बावजूद श्री राउत ये कहने से नहीं चूके कि इसे भाजपा का समर्थन न माना जाए परन्तु इस कदम को भाजपा से दोबारा जुड़ने की प्रक्रिया की शुरुवात माना जा सकता है | महाराष्ट्र की राजनीति के जानकार ये भी कह रहे हैं कि अब तक उनके साथ बने हुए शिवसेना के नेताओं ने उद्धव को ये समझाइश दी है कि वे पार्टी में शरद पवार के एजेंट बन बैठे संजय राउत से पिंड छुडाते हुए भाजपा के साथ दोबारा जुड़ने की संभावना तलाशें | सांसदों की सलाह या दबाव को मानते हुए उद्धव द्वारा श्रीमती मुर्मू के पक्ष में आ जाने का निर्णय उसी दिशा में बढ़ने की शुरुवात हो सकती है | ये भी सुनने में आया है कि श्री ठाकरे की पूर्व मुख्यमंत्री और श्री  शिंदे को भाजपा के साथ जोड़ने के लिए जिम्मेदार देवेन्द्र फड़नवीस से भले ही न पटती हो लेकिन केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के साथ उनके रिश्ते बेहद सौहार्द्रपूर्ण हैं जो  इस मामले में वही भूमिका निभा सकते हैं जो बालासाहेब ठाकरे के ज़माने में शिवसेना – भाजपा गठबंधन को आकार देने में प्रमोद महाजन ने निभाई थी | हालाँकि इस बारे में पक्के तौर पर कुछ भी कह पाना कठिन है लेकिन उद्धव द्वारा राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा द्वारा उतारी गईं प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करना इतना तो दर्शाता ही है कि उनकी अकड़ खत्म हो चुकी है और उन्हें   ये भी समझ में आने  लगा है कि शरद पवार और कांग्रेस से पिंड छुडाकर हिंदुत्व के रास्ते पर चलकर ही वे अपना राजनीतिक अस्तित्व बचा सकेंगे वरना संगठन भी उनके हाथ से  जाना तय है | सही कहें तो भाजपा भी मन ही मन यही चाह रही होगी क्योंकि अब उद्धव की स्थिति बिना दांत और नाखून वाले शेर जैसी हो गयी है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 July 2022

राहुल खुद भी तो बताएं चीनी दूत और मंत्रियों से उनकी क्या बातें हुईं



विपक्ष का काम है सरकार पर नजर रखना और जनहित तथा देशहित की  उपेक्षा होने पर सवाल पूछना | हालांकि कुछ विषयों के गोपनीय होने से उनकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती | केवल मंत्री ही नहीं अपितु सांसद  भी  ऐसी  जानकारी को  उजागार न करने की शपथ लेते हैं | संसद की  विभिन्न सलाहकार समितियीं के सामने भी कई ऐसी रिपोर्ट आती हैं जिनमें गोपनीयता बनाये रखना जरूरी होता है | इनमें ज्यादातर विदेश नीति और सुरक्षा संबंधी मामले होते हैं | अनेक ऐसे विषय भी होते हैं जिनकी जानकारी सरकार विपक्ष के नेता को दे देती है | सर्वदलीय बैठक बुलाने की परम्परा भी  प्रजातंत्र में प्रचलित है | भारत ने आजादी के बाद से अनेक युद्ध लड़े | इनमें 1962 में चीन से हम बुरी तरह हारे और हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि पर उसने कब्जा कर लिया | आगामी अक्टूबर में उस युद्ध को 60 साल हो जायेंगे | उसके बाद यद्यपि चीन के साथ युद्ध तो नहीं हुआ लेकिन अपनी  विस्तारवादी नीति के चलते वह सीमा पर तनाव बनाये रखता है | इसके अलावा उसने जबरदस्त सैन्य ढांचा तैयार कर लिया है | जवाब में भारत ने भी  लद्दाख से लेकर सिक्किम तक  सड़क – पुल  , हवाई पट्टी के साथ ही आधुनिक युद्ध सामग्री आदि का पर्याप्त इंतजाम कर लिया है | यही वजह है कि चीन 1962 जैसा हमला करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा | वैसे तो उसकी तरफ से घुसपैठ की कोशिश चलती रहती है जिसे हमारी सेना उसे सफल नहीं होने देती | वर्ष  2017 के दौरान भूटान के पठारी क्षेत्र  डोकलाम में हुए संघर्ष और 2020 के जून में लद्दाख की गलवान घाटी में हुई झड़प ही चर्चा में रही | डोकलाम का मामला  तो धक्का – मुक्की तक ही सीमित था किन्तु गलवान में विवाद ज्यादा बढ़ गया | एक स्थान पर चीन के कब्जे को रोकने गई टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे कर्नल की चीनी सैनिकों से  झड़प में हुई मौत के बाद गुस्साए भारतीय सैनिकों ने भी  जमकर धुनाई की जिसमें चीन के दर्जनों सैनिक मारे गये |  उसके बाद से दोनों देशों के बीच दर्जन भर से ज्यादा सैन्य स्तर की बातचीत हो चुकी हैं  | चूंकि सीमा का निर्धारण आज तक नहीं हुआ  इसलिए दोनों  एक दूसरे पर आरोप लगाया करते हैं | चीन लद्दाख के साथ ही अरुणाचल प्रदेश को भी अपना मानता है | यही नहीं तो भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के इस प्रदेश के दौरे तक पर आपत्ति जताता है |  हाल ही में दोनों देशों के विदेश मंत्री भी मिले  और सीमा विवाद हल करने पर चर्चा की | गलवान संघर्ष के बाद शुरू हुई सैन्य वार्ताओं का दौर भी जारी है | हालाँकि उसके बाद से कोई भी बड़ी घटना सुनने नहीं मिली सिवाय इसके कि कभी वायु तो कभी जमीन पर सीमा का उल्लंघन हुआ जिसे हमारी सेना ने विफल कर दिया | लेकिन  कांग्रेस नेता राहुल गांधी समय – समय पर प्रधानमंत्री पर सीधा हमला करते हुए  तथ्य छिपाने और चीन से डरने जैसे आरोप लगाया करते हैं | उनका कहना है कि चीन ने पूर्वी लद्दाख में हमारी काफी जमीन हाल ही के कुछ सालों में कब्जाई है लेकिन उसकी सरकार से इस बारे में बात करने का साहस उनमें नहीं  है | जबकि इस बारे में सेनाध्यक्ष तक सफाई दे चुके हैं | बेहतर होता वे इस बाबत प्रधानमंत्री और रक्षा  मंत्री से व्यक्तिगत मिलकर स्थिति का पता लगाते | चूंकि मामला सुरक्षा से जुड़ा है इसलिए हो सकता है उनके आरोप का जवाब सार्वजनिक तौर पर दिए जाने लायक न हो | और फिर इस बारे में श्री गांधी पर भी तो ये आरोप लगते रहे हैं कि जब डोकलाम में  विवाद चल्र रहा था उसी समय वे दिल्ली स्थित चीन के दूतावास जाकर  राजदूत से मिले | लेकिन आज तक उन्होंने इस बारे में सरकार या संसद को कुछ नहीं बताया | 2019 में  वे  चीन के रास्ते मानसरोवर भी गये थे और वापसी में उन्होंने चीनी नेताओं से बातचीत की | कुछ दिनों पहले ही उनकी काठमांडू यात्रा भी विवादों में घिर गयी जहाँ एक मित्र की विवाह पार्टी में शामिल होने वे एक नाईट क्लब में गये जिसमें नेपाल स्थित चीन की राजदूत भी शरीक थीं | हालाँकि प्रधानमंत्री से प्रश्न पूछने का श्री गांधी को पूरा अधिकार है | लेकिन बतौर सांसद और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के नेता होने के कारण उनसे ये अपेक्षा रहती है कि सुरक्षा संबंधी मामलों में  गंभीरता बरतें | गौरतलब है  दूतावासों के जनसंपर्क अधिकारी  सांसदों से संवाद और संपर्क बनाये रखते हैं | दूतावास में होने वाली दावतों में भी सांसदों को आमंत्रित करना कूटनीतिक जगत में आम है | लेकिन जब सीमा पर युद्ध की स्थिति हो तब हमलावार देश के  , जो हमारा ऐलानिया दुश्मन माना जाता है , के दूतावास में श्री गांधी क्या करने गये थे इस बात का खुलासा उन्हें करना चाहिये था | इसके उलट वे दूतावास जाने से ही इंकार करते रहे लेकिन बाद में मान गए | यदि वहां हुई बात सार्वजनिक करने योग्य नहीं थी  तब वे प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री से मिलकर  जानकारी दे सकते थे | लेकिन ऐसा करने की बजाय वे प्रधानमंत्री पर चीन से डरने जैसी बात कहें तो उनकी राजनीतिक  परिपक्वता पर संदेह और बढ़ता ही है | 2019 में बीजिंग में श्री गांधी ने चीन सरकार के कुछ मंत्रियों से बातचीत की थी  | लेकिन श्री गांधी ने आज तक इस बारे में मुंह नहीं खोला | ये देखते हुए  प्रधानमंत्री पर चीन से डरने जैसा आरोप लगाकर वे अपने को हंसी का पात्र बना रहे हैं | कांग्रेस में चूंकि उनको रोकने – टोकने वाला कोई है नहीं इसलिए वे जो मुंह में आता है बोल जाते  हैं जिसका नुकसान पार्टी को उठाना पड़ता है | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि आज कांग्रेस जिस दयनीय हालत में आ गई उसके लिए श्री गांधी ही ज्यादातर जिम्मेदार हैं जिनको राष्ट्रीय  राजनीति में  लंबा समय बीतने के बाद भी ये समझ नहीं आई की कब , कहां और क्या बोलना है ? वायनाड स्थित अपने कार्यालय में चीन समर्थित सीपीएम की छात्र इकाई एसएफ़आई द्वारा की गई तोड़फोड़ का विरोध करने का साहस तक तो उनमें हुआ नहीं | ऐसे में  वे प्रधानमंत्री के साहस पर उँगलियाँ उठाकर ये साबित करने का ही प्रयास कर रहे हैं कि उनके प्रति अक्सर प्रयुक्त होने वाला संबोधन गलत नहीं है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Monday, 11 July 2022

ब्रिटेन की राजनीति में भारतीय मूल के लोगों का बढ़ता प्रभाव शुभ संकेत



रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला किये जाने के बाद से दुनिया भर में कूटनीतिक , सामरिक और आर्थिक समीकरण बदल रहे हैं | ये  महज संयोग है या ज्योतिषीय गणना के अनुसार नक्षत्रों की स्थिति  में होने वाले परिवर्तन का प्रभाव ये विश्लेषण का विषय है किन्तु वैश्विक परिदृश्य में लगातार आ रहे बदलाव निश्चित रूप से चौंकाने वाले हैं | श्रीलंका में आये आर्थिक संकट से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता और चीन द्वारा ताईवान पर सैन्य कार्रवाई के जरिये कब्ज़ा करने की आशंका के बीच जापान , आस्ट्रेलिया ,अमेरिका और भारत के बीच बने क्वाड नामक संगठन की बैठक , रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों के कारण विश्व भर में महंगाई की मार , कच्चे तेल और गैस की किल्लत से उत्पन्न ऊर्जा संकट , रूस और यूक्रेन की लड़ाई लम्बी खिंचने से विश्व युद्ध का बढ़ता खतरा आदि बातों के बीच जापान के पूर्व  प्रधानमंत्री शिंजो आबे की हत्या और श्रीलंका में जन विद्रोह की घटनाओं से पूरी दुनिया हैरान कर दिया | लेकिन इसी बीच ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के विरुद्ध उनकी पार्टी में उठे विरोध  ने न सिर्फ यूरोप अपितु भारत का ध्यान भी आकर्षित किया  है | जॉनसन पर मुख्य आरोप ये हैं कि उन्होंने अपने एक सहयोगी क्रिस पिंचर पर लगे यौन दुराचार के आरोपों की  उपेक्षा करते हुए उन्हें संसद में उप मुख्य सचेतक बना दिया | हालाँकि उन्होंने उसके लिए माफी मांग ली लेकिन उनके साथियों ने ही इसे स्वीकार नहीं किया और 50 से ज्यादा मंत्रियों और  सांसदों ने त्यागपत्र देकर उन पर दबाव बना दिया | उसके बाद वे प्रधानमंत्री  पद त्यागने के लिए तो राजी हो गए लेकिन आगामी अक्टूबर में कंजरवेटिव पार्टी के अधिवेशन  तक सत्ता  पर बने रहने की जिद कर रहे हैं | दूसरी ओर उन पर तत्काल कुर्सी खाली करने और कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त करने की मांग जोर पकड़ रही है | उनके उत्तराधिकारी के तौर पर जिन लोगों की चर्चा हो रही है उनमें भारतीय मूल के पूर्व मंत्री ऋषि सुनक और प्रीति पटेल भी हैं |  ऋषि के पास वित्त और प्रीति के पास गृह विभाग का होना इस बात का सूचक है कि भारत को सैकड़ों वर्षों तक गुलाम बनाकर रखने वाले ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों ने  चिकित्सा , शिक्षा और व्यवसाय के अलावा  राजनीति में भी  अपना दखल इस हद तक बढ़ा लिया कि उन्हें प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल माना जाने लगा | उल्लेखनीय है ऋषि के पूर्वज बहुत पहले भारत छोड़कर कीनिया और फिर वहां से ब्रिटेन में जा बसे | लेकिन उनका विवाह देश की प्रमुख आईटी कम्पनी इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की बेटी से हुआ है | और इस वजह से भारत के साथ उनका जीवंत सम्पर्क मानना गलत नहीं होगा | हालाँकि प्रीति पटेल के पति अंग्रेज हैं और वे पूरी तरह से ब्रिटिश रंग में रंगी हैं | बावजूद इसके यदि इन दोनों में से कोई भी प्रधानमंत्री बन जाता है तो भारत के साथ ब्रिटेन के रिश्तों में नजदीकी  बढ़ेगी |  यूक्रेन संकट के बाद  रूस पर प्रतिबंध लगने के बावजूद जब भारत ने उसकी निंदा करने से खुद को अलग रखते हुए व्यापार जारी रखा तब अमेरिका के साथ ब्रिटेन भी काफी नाराज था | लेकिन उसके बाद भी वह भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है जिसे जल्द अंतिम रूप दे दिया जायेगा | कुछ  समय पहले श्री जॉनसन की भारत यात्रा के पीछे ये भी एक उद्देश्य था | बहरहाल ये तो तय है कि अमेरिका और कैनेडा की तरह ही ब्रिटेन में भी भारतीय मूल के लोगों के दबदबे  में वृद्धि हुई  है | आज की दुनिया में कैरीबियन देशों के साथ ही कैनेडा , अमेरिका , ब्रिटेन , ऑस्ट्रेलिया , मॉरीशस , द. अफ्रीका  सहित अनेक अफ्रीकी देशों में भारतीय मूल के लोगों ने व्यापार , उद्योग , विज्ञान , बैंकिंग के साथ ही राजनीति में  जो  पकड़   बनाई वह निश्चित तौर पर शुभ संकेत है | भले ही ऐसे लोगों ने  उन देशों की  नागरिकता ग्रहण कर ली हो और  ऋषि तथा  प्रीति  सदृश  युवाओं के जन्म  के साथ लालन - पालन भी वहीं हुआ किन्तु उनका नाम भारतीय होना इस बात का प्रमाण है कि उनके परिवार का भारत के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव  कायम है | संचार क्रांति और आवागमन के साधनों के विकसित हो जाने से भारत के साथ इन लोगों के सम्पर्क में नवीनता और निरंतरता दोनों नजर आने लगे हैं | दो पीढ़ी से विदेश में रह रहे भारतीय  मूल के अनेक लोगों ने अपने पूर्वजों की भूमि में  निवेश के लिये हाथ बढ़ाये हैं | 11 मई 1998 को भारत  द्वारा परमाणु परीक्षण किये जाने पर दुनिया भर की बड़ी ताकतों ने हम पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे | उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के लोगों से सहयोग की अपील की जिसका जादुई असर हुआ और देखते ही देखते बड़ी मात्रा में  विदेशी मुद्रा भारत में आई | उसके बाद से ही प्रवासी भारतीय सम्मेलन आयोजित होने लगे जिसका जबरदस्त लाभ देश को हुआ | बीते कुछ दशकों से  बहुत बड़ी संख्या में युवा पीढ़ी विदेशों में जाकर कार्यरत है | खाड़ी देशों में तो श्रमिक स्तर तक के भारतीय भी  हैं लेकिन विकसित देशों में इंजीनियरिंग , चिकित्सा , शिक्षा , अनुसन्धान , अन्तरिक्ष विज्ञान , सूचना तकनीक , प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन के अलावा राजनीति में भी भारतवंशियों ने कामयाबी के झंडे फहराए हैं | इसकी वजह से साठ – सत्तर के दशक तक सपेरों और मदारियों का देश समझे जाने वाले भारत के प्रति दुनिया का नजरिया बदला है | भारत के उद्योगपतियों ने दुनिया की प्रतिष्ठित  औद्योगिक   इकाइयों को खरीदने का जो साहस बीते वर्षों में दिखाया उसने देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि की है | यही वजह है कि आजादी के पहले या उसके एक –  दो दशक बाद तक विदेशों में जा बसे भारतीयों को उतना सम्मान नहीं मिला जितना आज मिल रहा है | उस दृष्टि से विदेशों में सरकारी अथवा अन्य किसी महत्वपूर्ण दायित्व को ग्रहण करने वाले  भारतीय को अपने मूल देश का नाम बताने में शर्म महसूस नहीं होती | अमेरिका में उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का भले ही सीधे तौर पर भारत के साथ रिश्ता न हो लेकिन उनके निर्वाचन में भारतीयों का बड़ा योगदान था | उस देश में राज्यों के गवर्नर और सांसदों के साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रशासनिक टीम में भारतीयों की बड़ी संख्या का ही प्रभाव है कि वहाईट हॉउस में भी दीपावली मनाई जाने लगी | ये देखते हुए यदि भारतीय मूल का कोई भी व्यक्ति ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने में सफल होता है तो उससे भारत की प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता वैश्विक स्तर पर और बढ़ेगी |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 10 July 2022

श्रीलंका की आग में भारत को अपने हाथ जलने से बचाना होगा



भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में जिस तरह का जन विद्रोह हो गया है उसके लिए वहां के शासक विशेष रूप से राजपक्षे परिवार पूरी तरह दोषी है जिसने बजाय भारत के , चीन जैसे शातिर और गैर भरोसेमंद राष्ट्र के साथ नजदीकियां बढ़ाकर खूब कर्ज लिया और अपने देश के  अनेक महत्वपूर्ण बंदरगाह तथा अन्यथा परियोजनाएं उसके हाथ सौंप दीं | इनमें हब्बनटोटा बंदरगाह सबसे प्रमुख है जिसे महिंद्रा राजपक्षे सरकार ने 99 साल के लिए चीन को पट्टे पर दे दिया | इसकी शर्तों के अनुसार इसके निर्माण पर आये खर्च की वसूली चीन उसके व्यवसायिक उपयोग से करेगा | हालांकि बाद में श्रीलंका को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तब उसने बंदरगाह की सुरक्षा का जिम्मा चीन की सेना को देने की बजाय खुद करने का फैसला किया | वरना चीन चाहता था कि उस बंदरगाह पर उसकी अनुमति के बिना श्रीलंका का कोई नागरिक तक प्रवेश न करे | धीरे – धीरे वहां  की जनता को भी ये बात समझ में आई कि उनका देश चीन का आर्थिक उपनिवेश बनने के कगार पर आ चुका है | लेकिन राजनीतिक अस्थिरता का लाभ लेकर राजपक्षे परिवार थोक के भाव सत्ता पर काबिज हो गया | राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री , महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री और यहाँ तक कि सेना के ताकतवर पदों पर भी इसी परिवार के सदस्य अथवा कृपापात्र पदस्थ हो गए | परिणाम ये हुआ कि लोकतंत्र एक ही परिवार की कैद में चला गया | इसके साथ ही श्रीलंका  आय के स्रोत बढ़ाये बिना ताबड़तोड़ कर्ज लेता चला गया | बावजूद इसके किसी तरह उसका काम चल रहा था | 2009 में लिट्टे के खात्मे के बाद ये टापूनुमा देश तेजी से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनने लगा था | उसके कारण अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ ही  विदेशी निवेश आने की रफ्तार बढ़ी | श्रीलंका में वैसे औद्योगिक उत्पादन न के  बराबर होता है लेकिन चाय और मसालों के निर्यात में वह अग्रणी था | वैश्विक मंदी और  कोरोना ने दुनिया के साथ – साथ इस देश को भी झकझोरा। लेकिन इसी दौरान सरकार ने खेती को पूरी तरह से जैविक बनाने का फैसला लेकर रासायनिक खाद और कीटनाशकों का आयात रोक दिया | इसके कारण कृषि उत्पादन में बड़ी गिरावट आई और किसान गुस्से से भर उठे | कोरोना ने पर्यटन उद्योग को तबाह कर दिया किन्तु सरकार ने स्थिति से निबटने के लिए समुचित कदम नहीं उठाने के बजाय देश के खजाने को खाली करने वाले प्रकल्पों पर बेतहाशा धन खर्च किया | विदेशों से लिए गए कर्ज का उपयोग अनुत्पादक कार्यों में किये जाने की वजह से भुगतान संतुलन की स्थिति बुरी तरह गड़बड़ा गई और देश दिवालियेपन की तरफ बढ़ता गया | महंगाई आसमान पर जाने लगी , पेट्रोल डीजल के अलावा बाकी जरूरी चीजों का आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा का अभाव हो गया | राष्ट्रीय मुद्रा का अवमूल्यन होने से अंतर्राष्ट्रीय साख भी लगभग खत्म हो गयी | जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तब विपक्षी दल ,  बुद्धिजीवी और सामाजिक  संगठन सामने आये और देश अस्थिरता की ओर बढ़ चला | जो महिंद्रा राजपक्षे  लिट्टे का खात्मा करने के लिए वैश्विक विरोध को दरकिनार करते हुए नरसंहार  करने तक से नहीं डरे उनको न सिर्फ प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद किसी गुप्त स्थान पर  अपनी जान बचाने के मजबूरी झेलनी पड़  रही है | कुछ लोग उनके विदेश भाग  जाने की बात भी कह  रहे हैं | गत दिवस उनके भाई गोटबाया राजपक्षे भी राष्ट्रपति भवन छोड़कर भागे वहीं उनके सरकारी निवास पर भीड़ ने कब्ज़ा कर लिया | कार्यवाहक प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने भी इस्तीफा दे दिया और उनका निजी आवास भी जनता ने आग के हवाले कर दिया | कुल मिलाकर श्रीलंका इस समय अराजकता , अनिश्चितता और अव्यवस्था के चरमोत्कर्ष पर है | वहां सरकार नाम की कोई चीज नहीं है | पेट्रोल – डीजल के दाम अकल्पनीय ऊंचाई पर हैं | पेट्रोल पम्पों पर सेना तैनात है | लाखों लोग दो समय के भोजन से वंचित हैं | महंगाई अनियंत्रित होने से जनता का धैर्य जवाब दे चुका है | जिसकी परिणिति राष्ट्रपति भवन में जनता के घुसने के रूप में हुई | संकट प्रारंभ होते ही श्रीलंका के तमिल भाषी , तमिलनाडु आने लगे थे | कुछ तो ऐसे भी हैं जो 2009 के संकट के समय से भारत में बतौर शरणार्थी रह रहे हैं | दूसरा बड़ा खतरा श्रीलंका में तमिल राष्ट्र के आन्दोलन का  पुनर्जन्म होने का है जिसका नुकसान भारत को होना तय है क्योंकि तमिलनाडु में शासन कर रही द्रमुक और कुछ अन्य पार्टियां उस  मांग को समर्थन देती रही हैं | द्रमुक नेता डी. राजा तो कुछ दिन पहले ही इस आशय की धमकी भी केंद्र सरकार को दे चुके हैं | इसके अलावा श्रीलंका भारत से आर्थिक सहायता के आलावा सैन्य मदद भी मांग सकता है क्योंकि वहां बड़ा वर्ग ऐसा है है जिसे चीन के हस्तक्षेप का डर है | यद्यपि अभी तक चीन ने श्रीलंका के मामले में हस्तक्षेप नहीं किया लेकिन आगे भी वह निर्लिप्त रहेगा ये सोचना गलत है क्योंकि उसने  बहुत बड़ा निवेश वहां कर रखा है | यहाँ ये भी याद रखने वाली बात है कि पृथक तमिल राष्ट्र का आन्दोलन जिस लिट्टे नामक आतंकवादी संगठन द्वारा चलाया गया वह भी चीन द्वारा ही पालित – पोषित था | इस प्रकार चीन ने श्रीलंका को लेकर दोगली नीति बनाई जिसका दुष्परिणाम सामने है | भारत के लिए वहां के हालत विभिन्न दृष्टियों  से खतरनाक हैं | शरणार्थी समस्या के अलावा तमिल राष्ट्र की नई मांग के अलावा चीन के वहां जाकर बैठ जाने जैसी अनेक बातें हमारी अर्थव्यवस्था के अलावा आन्तरिक और बाहरी सुरक्षा के साथ ही दक्षिण एशियाई शक्ति संतुलन की दृष्टि से बेहद संवेदनशील और चिंता पैदा करने वाली हैं | भारत की  अमेरिका , जापान और आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर क्वाड नामक संगठन में सक्रियता से नाराज चीन मौका पाते ही हमें घेरने का प्रयास  कर सकता है जिसका अवसर  श्रीलंका संकट से  उसको मिल सकता है | हालाँकि  वैकल्पिक सरकार बनाने की कोशिशें की जा रही हैं लेकिन उसके बाद भी आर्थिक संकट का समाधान हुए  बिना वहाँ  स्थिरता नहीं आ सकती | भारत को श्रीलंका में लगी आग से खुद को बचाना होगा । हालाँकि केंद्र सरकार ने हालिया महीनों में इस देश की जो मदद की उसका श्रीलंकाई जनमानस पर  सकारात्मक असर है लेकिन उसके बाद भी हमें बहुत ही  संभलकर आगे बढ़ना होगा क्योंकि लिट्टे संकट के दौरान स्व. राजीव गांधी ने श्रीलंका को लेकर  जिस नीति को अपनाया वही अंततः उनके लिए जानलेवा साबित हुई | अतीत की उन्हीं गलतियों से सीखते हुए फैसला न लिया गया तो फिर वहाँ की आग बुझाने के फेर में हमारे हाथ भी जल सकते हैं | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 July 2022

अमरनाथ हादसा : प्रकृति की शांति भंग करने का दंड है ये आपदाएं



ये पहला हादसा नहीं है जब किसी पर्वतीय तीर्थस्थान पर प्राकृतिक आपदा की वजह से जनहानि हुई हो | 16 जून 2013 की रात उत्तराखंड के चार धामों में से एक केदारनाथ में आये जल सैलाब में  हजारों तीर्थयात्रियों बह गये थे | मंदिर को छोड़कर वहाँ कुछ भी नहीं बचा | केदारनाथ की चढ़ाई जिस गौरीकुंड से प्रारम्भ होती है वहां तक जलप्रलय की स्थिति बन गयी | आज भी अनेक लोग ऐसे हैं जिनका पता नहीं चला | दरअसल  एक दिन पहले से हुई भारी वर्षा के कारण केदारनाथ धाम से और ऊपर स्थित पहाड़ी झीलें लबालब हो जाने के बाद उनसे बहा पानी मौत लेकर नीचे आया |  समूचे उत्तराखंड में वैसी प्राकृतिक आपदा उसके पहले नहीं देखी गयी थी | यद्यपि उसके पहले चमोली में आये भीषण भूकम्प ने भी काफी नुकसान किया था | लेकिन केदारनाथ में आया पानी मानों इन्द्रदेव के कोप का प्रदर्शन ही था | उसका कारण  भी बादल का फटना रहा | उसके बाद केदारनाथ सहित उत्तराखंड के बाकी तीनों धामों में मूलभूत सुविधाओं का काफी विस्तार हुआ | तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या को दृष्टिगत रखते हुए सड़कों का निर्माण बड़े पैमाने पर किया गया ताकि  आवागमन सुलभ होने के साथ ही दुर्घटनाओं को कम किया जा सके | ठहरने के सुरक्षित और सुविधाजनक स्थल विकसित किये जाने से तीर्थयात्रियों का प्रवास पूर्वापेक्षा सुखद होने लगा | लेकिन इस कारण हिमालय के  सुख - चैन में भी खलल पड़ा  | प्रकृति इंसानी जुबान नहीं बोलती लेकिन अपनी बात संकेतों के जरिये समय – समय पर बताती रहती है जिसे मनुष्य या तो बिलकुल नहीं समझ पाता या समझने के बाद  भी उसकी अनदेखी करने का अपराध करता है | यही वजह है कि कभी – कभी  आने वाली प्राकृतिक आपदाएं  जल्दी – जल्दी आने लगी हैं | लेकिन बजाय डरने के इन्सान प्रक्रृति को चुनौती देते हुए उससे लड़ने पर आमादा तो हो जाता  है परन्तु वह ये भूल जाता है कि उसकी तमाम वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां उसकी  अदृश्य शक्ति के सामने बौनी हैं | गत दिवस कश्मीर घाटी में स्थित  अमरनाथ में भी केदारनाथ जैसी घटना की पुनरावृत्ति  हुई |  दुर्घटना के बाद सुरक्षित लौटे एक यात्री के अनुसार बादल फटने के समय गुफा के पास अस्थायी आवासीय क्षेत्र में 10 से 15 हजार श्रद्धालु थे | आज सुबह तक 16 मौतों के अलावा लगभग 60 लोगों के लापता होने एवं दर्जनों के आहत होने की जानकारी आई है | यात्रियों के लिए चलाये जा रहे लंगर और अनेक तम्बुओं के बहने के कारण उनका  सामान  भी बाढ़ की भेंट चढ़ गया | हालाँकि इस साल यात्रा की शुरुवात में भी बादल फटने की घटना हुई थी और  जुलाई 2021 में भी जल सैलाब आया था लेकिन जानमाल का इतना नुकसान नहीं हुआ जितना गत दिवस देखने मिला | फिलहाल यात्रा रोक दी गई है और हालात सुधरने के बाद दोबारा प्रारंभ होने का आश्वासन भी प्रशासन दे रहा है | अमरनाथ जाने वाले दोनों रास्तों अर्थात  पहलगाम और बालटाल में हजारों यात्री फंसे हुए हैं |  कोरोना के कारण दो वर्ष के विराम के बाद तीर्थ स्थानों को खोले जाने से इस वर्ष उत्तराखंड के चारों धामों में तीर्थयात्रियों का सैलाब आ गया है | उसी तरह की स्थिति कश्मीर घाटी  में भी है जो  इन दिनों पर्यटकों से लबालब रहती है | लेकिन इस साल अपेक्षा से ज्यादा सैलानी  आये हैं | यही बात अमरनाथ पर भी लागू हो रही है | वैसे ये यात्रा  सैकड़ों सालों से चली आ रही है किन्तु  आतंकवाद के उदय के बाद प्रतिक्रियास्वरूप देश के अन्य हिस्सों से इसमें शामिल होने वालों की संख्या साल दर साल बढ़ती जा रही है | गुफा के निकट का खुला इलाका भी इतना बड़ा नहीं है कि वहां बड़ी संख्या में लोगों के ठहरने का स्थायी प्रबंध हो सके | ऐसे में जरूरी है  कि आस्था के इन केन्द्रों में जाने वाले श्रृद्धालुओं की संख्या पर नियन्त्रण लगाया जाए जिससे पहाड़ों की शांति  में उतना ही  खलल पड़े जितना वे सहन कर सकते हैं | उत्तराखंड स्थित चारों प्रमुख तीर्थों की यात्रा भी सदियों से होती रही है जिसके लिए  पहले यात्री गण पैदल जाया  करते थे | 1962 में चीन के हमले के बाद इन इलाकों में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा  बड़े पैमाने पर सड़कों का जाल बिछाये जाने के बाद   वाहनों द्वारा होने से तीर्थयात्रा   , पर्यटन में बदलने लगी | दूसरी तरफ यात्री सुविधाओं का विस्तार करने के लिए प्रकृति के साथ अत्याचार किये जाने  का परिणाम   पर्यावरण असंतुलन के तौर पर सामने आने लगा  | जो इलाके निर्जन हुआ करते थे वहां लाखों लोगों की आवाजाही और  वाहनों की वजह से ध्वनि और वायु प्रदूषण में वृद्धि दिखने लगी  | शहरों की तरह कचरा भी फैलने लगा | जिसका दुष्प्रभाव ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियरों के पिघलने के रूप में सामने आ रहा है  | बादल फटने जैसी घटनाएँ अतीत में भी होती रहीं लेकिन भीड़ कम होने से ज्यादा नुकसान नहीं होता था | कालान्तर में  जो  हालात बने वे  प्रकृति के क्रोध  को बढाने में सहायक हुए और जिन आपदाओं के बारे में बुजुर्गों से सुना करते थे वे हर साल दो साल बाद लौटकर आने लगीं | दरअसल इनके जरिए प्रकृति हमें चेतावनी दिया करती है लेकिन हम हैं कि विकास और विलासिता की वासना में डूबे होने से उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते | केदारनाथ के बाद अमरनाथ की ताजा घटना को प्रकृति की चेतावनी मानकर यदि हम उसके प्रति अपना व्यवहार नहीं सुधारते तब इस तरह के हादसे बढ़ते जायेंगे और हम लाचार खड़े देखने के सिवाय और कुछ भी करने में असमर्थ रहेंगे | जल , जंगल और जमीन हमें जीने के लिए बहुत कुछ देते हैं लेकिन अभार स्वरूप यदि हम उनकी शांति में बाधा डालेंगे तब उनका रौद्र रूप दिखाना नितान्त स्वाभाविक ही माना जाएगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 July 2022

रोम जलता रहा और नीरो बांसुरी बजाता रहा की उक्ति चरितार्थ हो रही कांग्रेस पर



महाराष्ट्र की राजनीति से फुरसत मिलते ही भाजपा ने नए लक्ष्यों की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं | जिसके तहत हैदराबाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कर तेलंगाना में पैर ज़माने का पैंतरा दिखाया गया | वहां के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करने में प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी से आगे निकलने की कोशिश में  दिल्ली में कई दिनों डेरा डालकर  विपक्षी  गठबंधन बनाने में जुटे रहे किन्तु राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा ने द्रौपदी मुर्मू को उतारकर विपक्षी खेमे को बिखरने मजबूर कर दिया | यहाँ तक कि ममता भी ये कहने लगीं कि भाजपा पहले बता  देती वे भी श्रीमती मुर्मू का  संमर्थन करतीं | दरअसल उन्हें अपने राज्य में अनु. जनजाति के मतदाताओं की नाराजगी  का डर सता रहा है | इस तरह एनडीए के पास 2 फीसदी मतों की कमी का लाभ उठाते हुए  विपक्षी एकता के जरिये गैर भाजपाई राष्ट्रपति बनाकर श्री मोदी की नाक  में नकेल डालने का सपना एक झटके में टूट गया | इससे उत्साहित भाजपा ने राज्यसभा के लिए दक्षिणी राज्यों से चार सदस्यों का मनोनयन करते हुए बड़ा दांव खेल दिया | जिन हस्तियों को नामित किया गया उन पर कोई भी उंगली  नहीं उठा सकता | मसलन केरल से पी.टी. उषा , तमिलनाडु से इलैया राजा , कर्नाटक से वीरेंद्र हेगड़े और आंध्र से के.वी. विजेंद्र प्रसाद का चयन करते हुए  महिला , दलित और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को प्रतिनिधित्व देने के साथ ये भी ध्यान रखा गया कि वे अपने – अपने क्षेत्र में कामयाब और लोकप्रिय हों | महाराष्ट्र में शरद पवार की रचना कही जाने वाली शिवसेना , राकांपा और कांग्रेस की गठबंधन सरकार भविष्य में विपक्षी एकता का आधार बन सकती थी | लेकिन भाजपा ने उस संभावना की भ्रूण हत्या कर दी | शिवसेना में हुई टूटन के कारण उद्धव ठाकरे तो बुरी तरह कमजोर हुए ही लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एकनाथ शिंदे के रूप में मराठा को बिठाकर भाजपा ने श्री पवार के पावर में भी कटौती का दांव चल दिया | दूसरी ओर देश भर में हो रही राजनीतिक उठापटक के बीच कांग्रेस में छाई मुर्दानगी से न सिर्फ जनता अपितु विपक्षी दल भी परेशान हैं | राष्ट्रपति चुनाव में पहले ममता और बाद में श्री पवार ने अगुआई की जबकि राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते इसकी पहल कांग्रेस से अपेक्षित थी | महाराष्ट्र में  सरकार बचाने के लिए भी श्री पवार ही सक्रिय दिखे जबकि कांग्रेस  उदासीन  बनी रही  | राहुल गांधी से दिल्ली में ईडी द्वारा पूछताछ के विरोध में कांग्रेस के तमाम छोटे – बड़े नेता सड़क पर उतरे किन्तु केरल स्थित उनके संसदीय क्षेत्र वायनाड में सत्ताधारी सीपीएम से जुड़े स्टूडेंट  फेडरेशन आफ इण्डिया के कार्यकर्ताओं द्वारा उनके कार्यालय में की गई तोड़फोड़ का विरोध करने का साहस न श्री गांधी में हुआ और न पार्टी में | उलटे राहुल ने लड़के बताकर हमलावरों को माफ़ कर दिया | इससे ऐसा लगता है कांग्रेस अपनी धार खोती जा रही है  | बीते माह राजस्थान के उदयपुर में हुए नव संकल्प चिन्तन शिविर में ऐसा दिखाया गया जैसे पार्टी  नई ऊर्जा के साथ  कूदेगी किन्तु शिविर के दौरान पंजाब में सुनील जाखड़ और उसके बाद गुजरात में हार्दिक पटेल ने उसे छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया | राष्ट्रपति चुनाव में श्रीमती मुर्मू के पक्ष में  विपक्षी खेमे से  समर्थन आने का क्रम जारी है | कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी तो अस्वस्थ हैं लेकिन राहुल चाहते तो यशवंत सिन्हा के पक्ष में प्रयास करते हुए कांग्रेस को जीवंत दिखा सकते थे | लेकिन ताजा खबर ये है कि उपराष्ट्रपति के चुनाव में एनडीए की प्रचंड जीत के आसार देखते हुए कांग्रेस ने अपनी पार्टी के किसी नेता को उतारने तक से इंकार कर दिया है | झारखंड में हेमंत सोरेन के श्रीमती मुर्मू के पक्ष में नजर आने के बाद बड़ी बात नहीं , देर - सवेर वहां भी सत्ता पलट जाए | ऐसे में राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेस का झंडा फहराता नजर आयेगा | लेकिन  राजस्थान में अशोक गहलोत और साचिन पायलट के बीच गतिरोध को उलझाए रखने के कारण कांग्रेस अपने पांव  पर कुल्हाड़ी मारने जैसी मूर्खता कर रही है | उदयपुर में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा कन्हैया नामक हिन्दू दर्जी को नूपुर शर्मा का समर्थन किये जाने पर जिस नृशंस तरीके से मौत के घाट उतारा गया उसकी प्रतिक्रियास्वरूप राज्य में हिंदु भावनाएं उफान पर हैं जिनका सीधा लाभ भाजपा के खाते में जायेगा | यदि श्री पायलट को गांधी परिवार इसी तरह वायदों का झूला झुलाता रहा तब वे भी ज्योतिरादित्य सिंधिया का अनुसरण कर लें तो चौंकाने वाली बात नहीं होगी | वहीं छत्तीसगढ़ में बाहरी प्रत्याशियों को राज्यसभा भेजे जाने से उत्पन्न नाराजगी के साथ ही अनु. जनजाति के अनेक कांग्रेस विधायकों द्वारा  श्रीमती मुर्मू को समर्थन देने की इच्छा जताए जाने से भी  खतरा नजर आने लगा है | भूपेश बघेल सरकार के वरिष्ट मंत्री टी.एस.सिंहदेव भी ढाई – ढाई साल तक मुख्यमंत्री रहने  वाले समझौते के उल्लंघन से भन्नाए हुए हैं और चुनाव के पहले बड़ा धमाका कर सकते हैं | कुल मिलाकर कांग्रेस अब बिना राजा की फौज बनती जा रही है | गत दिवस राज्यसभा से हाल ही में निवृत्त हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री और जी - 23  नामक असंतुष्ट समूह के सदस्य आनंद शर्मा ने भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से मुलाकात कर हलचल मचा दी | इसे  हिमाचल प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है | हालाँकि श्री शर्मा ने ये कहते हुए उस मुलाकात के उद्देश्य पर पर्दा डाले रखा कि वे  दोनों एक ही राज्य के होने से मिलते रहते हैं परन्तु इसके पूर्व इन नेताओं की भेंट की इतनी चर्चा शायद ही हुई हो | ऐसे में राज्यसभा से बाहर होने के बाद श्री शर्मा भी श्री नड्डा से निकटता का लाभ लेते हुए भाजपाई बन जाएँ  तो बड़ी बात नहीं होगी | वैसे भी  त्रिपुरा में मानक साहा और असम में हिमंता बिस्वा सर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने कांग्रेस से आने वालों को सत्ता रूपी प्रसाद का लालच तो दे ही दिया है  | ताजा उदाहरण महाराष्ट्र में श्री शिंदे की ताजपोशी है | ऐसे में यदि हिमाचल में श्री शर्मा को सुरक्षित भविष्य नजर आ रहा हो तो वे भाजपा में आने में संकोच शायद ही करें | इन सब बातों से लगता है कांग्रेस अपना आकर्षण खोती जा रही है | राष्ट्रीय परिदृश्य में भाजपा उस पर बहुत भारी नजर आने लगी है जबकि  ज्यादातर राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों ने उसे हाशिये पर धकेल दिया है | पता नहीं गांधी परिवार को ये सब दिखता है या वह रोम जलता रहा और नीरो बान्सुरी बजाता रहा वाली उक्ति को चरितार्थ कर रहा है ?

-रवीन्द्र वाजपेयी