Monday, 15 August 2022

राजनीतिक और आर्थिक से ज्यादा मानसिक गुलामी खतरनाक



हजारों साल के ज्ञात इतिहास और वक्त के थपेड़ों से अपने अस्तित्व को बचाए रखने वाली संस्कृति से समृद्ध देश के साथ गुलामी शब्द का जुड़ना किसी दुर्भाग्य से कम नहीं था  | लेकिन हमारे महान भारतवर्ष को इस दुर्भाग्य से गुजरना पड़ा और लगभग चार सौ वर्षों तक विदेशियों की दासता झेलने के बाद आखिरकार 15 अगस्त 1947 को वह अंग्रेजों की दासता से मुक्त होकर एक स्वाधीन देश बना | पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों की सत्ता के अधीन रहने के बाद जब हम आजाद हुए तो  देश खुशियों में डूबा हुआ  था  | हालाँकि आजादी की लड़ाई में जितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी उससे ज्यादा लोगों को देश के विभाजन में जान गंवाना पड़ी | लेकिन  गलतियों से सीख न लेने की प्रवृत्ति  हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गई  | और इसीलिए 75 साल पहले भारत माता के टुकड़े कर मुसलमानों के लिए अलग  बनाये गए पाकिस्तान में  हिन्दुओं और सिखों को अपना सब कुछ छोड़कर पलायन हेतु मजबूर किए जाने के बावजूद देश जश्न मनाता रहा  |  आजादी की वह  तारीख कभी भुलाई नहीं जा सकेगी किन्तु आज जब उस दौर की चश्मदीद पीढ़ी लुप्तप्राय  है और बीते 75 साल में  उन  बातों पर पर्दा डालकर रखा गया जिनसे  भावी पीढ़ी विभाजन के लिए जिम्मेदार उन गलतियों के बारे  में जान सकती थी , तब ये जरूरी हो जाता है कि  अमृत महोत्सव की खुशी के साथ उन गलतियों का भी ईमानदार विश्लेषण किया जावे जिनके कारण  परतंत्रता का कलंक हमारे माथे पर लगा रहा | इतिहास वह नींव है जिस पर किसी भी देश का भविष्य खड़ा होता है | कहने को तो हमें अपने गौरवशाली अतीत पर बड़ा गर्व है लेकिन चार सौ साल की  दासता की यादें शर्मिंदा करती हैं | और इसीलिए आज  स्वाधीनता दिवस पर  उन बातों पर भी चिंतन – मनन होना चाहिए जिनके कारण हमने अपनी आजादी खोई थी |  सच्चाई ये है कि आज भी  हमारी एकता और अखंडता पर खतरा मंडरा रहा है  | भले ही अब  19 वीं और 20 वीं सदी के उपनिवेशवाद का लौटना संभव नहीं रहा लेकिन देश को भीतर से कमजोर करने वाली वह मानसिकता पुष्पित – पल्लवित है जिसने मोहम्मद गौरी और गजनवी जैसों के लिए लाल कालीन बिछाये थे  | पाठक सोच रहे होंगे अमृत महोत्सव जैसे अवसर पर गुलामी के घावों को कुरेदने का क्या औचित्य है ? लेकिन बिना इतिहास में झांके ऐतिहासिकता का जिक्र सार्थक नहीं होता  | इसलिए ये जरूरी  है कि अपनी  उपलब्धियों को जीवंत रखने के साथ ही  हमें उन गलतियों को भी सदैव याद रखना चाहिए जिनकी वजह से सोने की चिड़िया विदेशी पिंजरे में कैद होकर रह गई थी | जिस पश्चिमी सीमा पर हमारे सबसे जुझारू और लड़ाकू जाति समूह रहते थे वहीं से सबसे जयादा आक्रान्ता आकर हमें लूटकर जाते रहे और अंततः एक ने आकर यहीं ठिकाना जमा लिया | सोचने का विषय ये है कि जब पहला विदेशी हमला हुआ तभी हमने इस बात का पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किया कि दोबारा किसी की हिम्मत न हो हमारी तरफ देखने की | विचारणीय है कि जिस देश ने सिकंदर के विश्व विजय के इरादों को ध्वस्त कर दिया हो वह सैकड़ों की संख्या में आने वाले लुटेरों के सामने घुटना टेक कैसे हो गया ?  इतिहास में छिपी उन भयानक भूलों पर पड़ी  धूल को हटाये बिना आजादी के अमृत महोत्सव का जश्न महज औपचारिकता का निर्वहन रह जाएगा | आज देश में एक ऐसा वर्ग है जिसे भारत की प्राचीनता पर ही संदेह है | संगठित देश के तौर पर हमारे अस्तित्व को नकारने वाले भी हैं  | ऐसे लोगों की  शातिर सोच बीते 75 साल से ये समझाने की साजिश रच रही है कि कारवाँ आते गए हिन्दोस्तां बनता गया | आज जरूरत इस सोच को बदलने की है | आजादी के 75 सालों में देश ने बेशक बहुत कुछ किया और कमाया | वैश्विक मंचों पर हमारी उपस्थिति उभरती हुई विश्व शक्ति का एहसास करवाती है | पृथ्वी से अन्तरिक्ष तक हमारी उपलब्धियों का गौरवगान हो रहा है | सैन्य और आर्थिक मोर्चे पर हमारी  शक्ति का लोहा पूरी दुनिया मान रही है | लेकिन आज भी वे कारण उपस्थित हैं जिनसे आजादी के लिए खतरा  है | सता की खातिर समाज को जातियों में खंड – खंड कर देना , धार्मिकता के नाम पर  सदियों पुरानी अरब से आयातित कट्टरता को गले से लगाये रखना , सेना के पराक्रम पर सवालिया निशान लगाना ,और  देश की अखंडता के विरुद्ध उठने  वाली आवाजों को आजादी का नाम देना इस बात का प्रमाण है कि आज भी जयचंद और मीर जाफर वाली सोच को जीवित रखने वाले मौजूद हैं , जो चिंता का विषय है | हालाँकि बीते 75 सालों  में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिस पर गर्व किया जा सकता है और जिस तरह का आत्मविश्वास युवा पीढ़ी में है वह आश्वस्त करता है | राजनीतिक स्थायित्व और नेतृत्व की दृढ़ता की वजह से किसी भी वैश्विक संकट के समय दुनिया भारत की तरफ देखने लगी  है | विश्व जनमत को अपनी तरफ मोड़ने की शक्ति भी हम हासिल चुके हैं | वैश्विक महामारी के रूप में आई आपदा का जिस कुशलता और साहस के साथ भारत ने मुकाबला किया उससे  विश्व आश्चर्यचकित रह गया | लेकिन आंतरिक तौर पर देश को कमजोर करने वाली विघटनकारी ताकतें भी तेजी से सिर उठा रही हैं | पंजाब में खालिस्तानी मानसिकता का उभार शुभ संकेत नहीं है | इसी तरह  इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाने का जो सुनियोजित्त षडयंत्र हाल के दिनों में देखने मिला वह एक और  विभाजन की भूमिका तैयार करने जैसी शरारत  ही है | क्षेत्रीयता के नाम पर देश की अखंडता को  दी जा रही चुनौती  दुर्भाग्यपूर्ण है |   सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार , जो देश को घुन की तरह खाए जा रहा है | सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाने वाली छापेमारी में जिस बड़े पैमाने  पर  काला धन बाहर आ रहा है उससे यह साबित हो गया है कि बीते 75 सालों में किस बेरहमी से देश को लूटा गया | जनकल्याण की सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों को मिलने की बजाय नौकरशाहों और नेताओं के गठजोड़ ने हड़प लिया | लोकतंत्र के नाम पर चुनावों में जनता के धन की बर्बादी के खेल को रोकना रोकना समय की मांग है वरना मुफ्तखोरी  का नशा  कार्यसंस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर देगा | कृषि का घटता रकबा भी भविष्य में कृषि प्रधान देश के विशेषण के छिन जाने का कारण बन सकता है | हर समय किसी न किसी राज्य में होने वाले चुनाव  नीतिगत अनिश्चितता के साथ ही भ्रष्टाचार के बड़े स्रोत बन गये हैं | कुल मिलाकर आजादी के इस अमृत महोत्सव में हमें उन विषैली प्रवृत्तियों  के प्रति भी सावधान रहना होगा जो धीरे – धीरे व्यवस्था रूपी  शिराओं में फैलती जा रही हैं | बीते 75 सालों में जो हासिल  किया गया उस पर गर्व करना पूरी तरह सही है लेकिन आत्ममुग्धता से बचते हुए  उन हालातों  और गलतियों को दोहराए  जाने से बचना होगा जिनके कारण भारत माता को सैकड़ों सालों तक दासता का दंश सहना पड़ा | इसलिए आज हर्षोल्लास के साथ ही गंभीर चिंतन का भी दिन है  क्योंकि गुलामी की मानसिकता के बीज  किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं और जरा सी असावधानी होते ही उनके अंकुरित होने का अंदेशा बना हुआ है | इस बात को सदैव याद रखना चाहिए कि राजनीतिक और आर्थिक से ज्यादा मानसिक गुलामी  ज्यादा खतरनाक होती है |  15 अगस्त 1947 को हम राजनीतिक तौर पर भले ही स्वतंत्र हो गए लेकिन मानसिक गुलामी  बदस्तूर जारी रही , वरना भारत के साथ  इण्डिया शब्द संविधान में न लिखा जाता  |

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर अनन्त शुभकामनाओं सहित ,

रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 August 2022

महंगाई : आंकड़ों की बाजीगरी का भी अमृत महोत्सव



बीते दो दिनों से सुनने में आ रहा है कि 
जुलाई में खुदरा महंगाई घटकर 6.71 फीसदी हो गई जो जून में 7.01 थी | राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के  आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच महीनों में ये आंकड़ा सबसे कम है | यद्यपि उक्त संस्थान ने ये भी स्पष्ट किया है कि अभी भी महंगाई निर्धारित दर से ज्यादा है जो कि 2 से 6 फीसदी होनी चाहिये | अधिकृत आंकड़ों के अनुसार  जुलाई 2021 में वह  5.59 प्रतिशत के स्तर पर थी  जबकि अप्रैल आते – आते उछलते हुए 7.79 तक जा पहुँची | राहत की  खबर औद्योगिक उत्पादन में ही देखी गई जो जून के महीने में 12.3 प्रतिशत बढ़ गया | अर्थशास्त्र में नीतिगत नियोजन आंकड़ों  के आधार पर ही किया जाता है | रिजर्व बैंक भी महंगाई के आंकड़ों के आधार पर ही ब्याज दर घटाता – बढ़ाता है | हाल ही में रिजर्व बैंक द्वारा ऋणों पर ब्याज दर बढ़ाये जाने का उद्देश्य  भी महंगाई पर काबू करना था | ये बात तो सर्वविदित है कि कोरोना के संक्रमण ने जिस तरह पूरी दुनिया के अर्थतंत्र को हिलाया उससे भारत भी अछूता नहीं रह सका | हालांकि दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों ने ये स्वीकार किया कि कोरोना काल में भी दुनिया के विकसित देशों की  तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रही और ये भी कि इस वैश्विक महामारी से जूझने में भारतीय प्रबंधन काफी अच्छा रहा | इसमें भी दो राय नहीं हैं कि 135 करोड़ की विशाल आबादी का भरण - पोषण करना उस विकट स्थिति में बहुत ही कठिन था | इसके साथ ही इतनी बड़ी जनसँख्या को कोरोना से बचाव हेतु टीके लगाना भी आसान काम न था | लेकिन आज भी जब दुनिया के तमाम देश कोरोना के कहर से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं तब भारत में आर्थिक स्थितियां सामान्य होने लगी हैं | इसका प्रमाण रिहायशी घरों , कारों और दोपहिया वाहनों की बिक्री में वृद्धि के अलावा पर्यटन व्यवसाय में दिखाई दे रही तेजी है | बीती गर्मियों में शादी – विवाह भी खूब हुए जिनके कारण उपभोक्ता बाजार में रौनक रही | वहीं उससे जुड़ी अन्य व्यवसायिक गतिविधियों का ठहराव भी दूर हुआ | जीएसटी की मासिक वसूली का आंकड़ा जिस तेजी से बढ़ता जा रहा है उससे भी आर्थिक सुस्ती खत्म होने के संकेत मिले हैं | पेट्रोल – डीजल की बिक्री लगातार बढ़ते जाने से ये जाहिर हो रहा है कि परिवहन और सड़क मार्ग से होने वाला आवागमन कोरोना पूर्व की स्थिति में आ चुका है | निर्माण गतिविधियों के रफ़्तार पकड़ने के कारण मजदूरों को काम मिलने लगा है | हवाई और रेल यात्रियों की संख्या में भी वृद्धि देखी जा रही है | कुल मिलाकर बाजार में मांग  बढ़ने से उत्पादन करने वालों का हौसला बढ़ा जिसकी वजह से भी कीमतों में स्थिरता  आई होगी | दरअसल महंगाई बढ़ने के पीछे एक कारण रूस - यूक्रेन के बीच छिड़ी लड़ाई भी है जिससे खाद्यान्न और खाने का तेल बेतहाशा महंगा हो गया | ऐसा लगता है सरकार द्वारा अनाज का निर्यात रोकने का असर कीमतों पर पड़ने से खुदरा महंगाई नीचे आ गई | अन्यथा महंगाई कम होने  का खास अनुभव नहीं हो रहा | उलटे उपभोक्ता बाजार में तकरीबन हर चीज के जो दाम बीते दो साल में बढ़े , वे वहीं ठहर गये | इस आधार पर देखें तो महंगाई घटने का दावा सच्चाई से दूर लगता है | वैसे भी सरकारी संस्थान के आंकड़ों  में हेराफेरी  नई बात  नहीं है | राजनीतिक कारणों से भी उनको सरकार की छवि के मद्देनजर प्रसारित – प्रचारित किया जाता है | बीते दिनों संसद के मानसून सत्र में विपक्ष द्वारा महंगाई को लेकर सरकार को घेरने का भरपूर प्रयास भी किया गया | यद्यपि कुछ हद तक  ये तो माना  जा सकता है कि रोजमर्रे की उपभोक्ता वस्तुओं के दामों का बढ़ना तो रुका ही है | लेकिन हाल ही में रसोई गैस के महंगे होने से महंगाई का आंकड़ा लगता है फिर जस का तस हो जायेगा | अभी बाजार के जो संकेत हैं वे एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाले स्थिति बयाँ कर रहे हैं | पेट्रोल - डीजल की कीमतें काफी दिनों से स्थिर हैं लेकिन रूस – यूक्रेन युद्ध के कारण कच्चे तेल और गैस की जो किल्लत है उसकी वजह से अन्य तेल उत्पादक देशों की मुनाफाखोरी भी चरम पर है | ऐसे में मूल्यों की स्थिरता पर सदैव संदेह के बादल मंडराते रहते हैं | ये देखते हुए महंगाई घटने के जो आंकड़े विगत दिवस जारी हुए वे ऊँट के मुंह में जीरे से भी कम कहे जाएँ तो गलत न होगा | असली सर्वेक्षण इस बात का होना चाहिए कि दैनिक उपयोग की जिन भी चीजों के दाम कोरोना के कारण बढ़े ,  वे वापस  लौटे या नहीं ? ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि बाजार का चरित्र यही है कि कुछ अपवाद छोड़कर एक बार बढ़े हुए दाम भले ही कुछ समय के लिए स्थिर हो जाएं लेकिन लौटकर नीचे नहीं आते | केंद्र और विभिन्न राज्यों ने हाल ही में कर्मचारियों और पेंशनधारियीं का मंहगाई भत्ता बढ़ाया था  | 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार राहतों का पिटारा खोलेगी इसमें दो राय नहीं है | दूसरी तरफ रिजर्व बैंक महंगाई पर लगाम लगाने के लिए घिसे – पिटे तरीके आजमायेगा | लेकिन इन कृत्रिम उपायों से महंगाई का घटना अर्थव्यवस्था के वास्तविक चित्र को पेश नहीं करता | आंकड़ों की  बाजीगरी देश बीते 75 साल से देखता आ रहा है | ये बात सच है कि महंगाई और विकास एक दूसरे के समानांतर चलते हैं | लेकिन हमारे देश में उनके  बीच का सामंजस्य बिगड़ता चला गया | यही वजह रही कि विकास कम हुआ और महंगाई ज्यादा बढ़ गई | मसलन लोगों की आय उस अनुपात में नहीं बढ़ सकी जिसमें जरूरी चीजें और सेवाएँ महंगी हुई हैं | इस आधार पर जो ताजा आंकड़े आये हैं उनको वास्तविकता की कसौटी पर कसने पर कुछ अलग ही स्थिति नजर आयेगी | उम्मीद की जा सकती है कि आजादी के अमृत महोत्सव पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसी कुछ घोषणा करेंगें जिससे आम आदमी राहत महसूस करे क्योंकि आंकड़ों की विश्वसनीयता भी नेताओं की तरह खत्म हो चुकी है |

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 12 August 2022

नेता , नौकरशाह और न्यायाधीश भी तो मुफ्त रेवड़ियां छोड़ने आगे आयें



देश के मुख्य न्यायाधीश एन.वी.रमना कुछ ही दिनों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं | उसके पहले वे चुनावी वायदों की शक्ल में मुफ्त रेवड़ियाँ बाँटने की जो प्रतिस्पर्धा राजनीतिक दलों में चल रही  है उस पर रोक लगाने संबंधी  याचिका का निपटारा करने के इच्छुक दिखाई दे रहे हैं | वरिष्ट अधिवक्ता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल को अदालत मित्र बनाने के साथ ही  आम आदमी पार्टी को भी  स्वतः संज्ञान लेते हुए  बतौर एक पक्ष जोड़ा गया है | केंद्र सरकार ने अदालत से गुहार लगाई है कि जब तक विधायिका इस बारे में कोई निर्णय नहीं करती तब तक अदालत मुफ्त रेवड़ियों की बंदरबांट पर रोक लगाने की पहल करे | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो लगभग रोज इस बारे में बोल रहे हैं | गत दिवस श्री रमना ने अपने से जुड़े दो वाकये सुनाकर इस बात पर जोर दिया कि मुफ्त के नाम पर जो किया जा रहा है वह बजाय जाति और वर्ग विशेष के , आर्थिक आधार पर होना चाहिए जिससे समाज के सभी लोगों को उसका लाभ मिले | मुफ्त रेवड़ियों और सुविधाओं के वर्गीकरण पर भी चर्चा हुई | न्यायालय द्वारा बीते दिनों बनाये गये पैनल में चुनाव आयोग के शामिल होने संबंधी अनिच्छा का जिक्र भी आया | अभी तक जो देखने मिला उसके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय , चुनाव आयोग और केंद्र सरकार तीनों इस बात पर चिंतित दिखते हैं कि चुनावी वायदों के रूप में की जाने वाली घोषणाओं से सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बोझ असहनीय होता जा रहा है | और पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने की महत्वाकांक्षा पूरी होने की  राह में मुफ्त रेवड़ियाँ बड़ी बाधा बन रही हैं |  रोचक बात ये है कि सभी दल अपने वायदों को जन कल्याण  का नाम देते हैं वहीं दूसरे की घोषणा मुफ्त रेवड़ी बता दी जाती है | बसों में वृद्ध महिलाओं को निःशुल्क यात्रा की सुविधा कुछ राज्यों में मिलने पर रेलवे में वरिष्ट नागरिकों को मिलने वाली रियायत भी शुरू करने का मुद्दा उठता है | वृद्धावस्था और निराश्रित पेंशन के साथ ही किसान कल्याण निधि को भी रेवड़ी की श्रेणी में रखा जा रहा है | बढ़ते – बढ़ते बात गरीबों को दिए जा रहे मुफ्त खाद्यान्न तक जा पहुँची | आम आदमी  पार्टी का कहना है कि ये सब उसकी बढ़ती लोकप्रियता से डरकर हो रहा  है | हालाँकि मुख्य न्यायाधीश भी जनकल्याण की योजनाओं को जारी रखने के पक्षधर हैं लेकिन ये कहना गलत न होगा कि संसद , सरकार , न्यायपालिका , चुनाव आयोग और राजनीतिक दल कोई भी मुफ्तखोरी बंद करने का दोष अपने सिर पर लेने तैयार नहीं  हैं | और इसका  सबसे बड़ा कारण ये है कि सांसद , मंत्री , न्यायाधीश , नौकरशाह और राजनेता सभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मुफ्त सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं | इसलिए  जब दूसरे की  सुविधाएँ बंद करने का मसला उठता है तो उनके कंधे अपराधबोध से झुक  जाते हैं | प्रधानमन्त्री ने गत दिवस तंज कसा कि कोई डीजल – पेट्रोल मुफ्त देने का वायदा भी कर सकता है | शायद उनका इशारा उ.प्र के विधानसभा चुनाव में ऑटो चालकों को माह में एक – दो  बार मुफ्त  पेट्रोल दिए जाने के वायदे की तरफ था | लेकिन जो प्रधानमंत्री लगभग रोज ही मुफ्तखोरी के विरुद्ध देश को चेता रहे हैं उन्होंने भी तो अपने आठ वर्ष के कार्यकाल में मुफ्त बांटने में लेशमात्र संकोच नहीं किया | और जब जनता सांसदों / विधायकों को मिलने वाली  मुफ्त यात्रा , इलाज और पेंशन पर सवाल उठाती है तब प्रधानमंत्री की अपनी  पार्टी भाजपा और किसी दूसरी पार्टी की तरफ से जनता की  मांग के समर्थन में एक भी आवाज नहीं सुनाई देती | समाजवादी और वामपंथी विचाराधारा का झंडा उठाने वाले जनप्रतिनिधि भी सरकार से मिल  रही मुफ्त सुविधाओं में कटौती करने की मांग को अनसुना कर देते हैं | ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी खजाना जनता को बांटी जाने वाली रेवड़ियों से ही खाली होता है ?  नेता , नौकरशाह , न्यायाधीश , मंत्री और चुने हुए जनप्रतिनिधि भी तो नव सामंतवाद के प्रतीक बनकर वही सब कर रहे हैं जो अंग्रेजी सत्ता के दौर में हुआ करता था | इस बारे में यक्ष प्रश्न ये है कि आजादी के 75 वर्ष पूरे करने वाले देश में आज भी जब करोड़ों लोगों को हजार – दो हजार रूपये की पेंशन से गुजारा करना पड़ता हो और करोड़ों लोग गरीबी के कारण मुफ्त अनाज के लिए मोहताज हों तब इस देश का नेतृत्व कर चुके लोगों  की ईमानदारी और क्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक है | सही बात ये है कि व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे महानुभाव अपने सुख और सुविधाओं पर तो बेरहमी से धन खर्च करना अधिकार समझते हैं ,  लेकिन जनता  को मिलने वाली सुविधाएँ  फिजूलखर्ची लगती हैं | ये देखते हुए प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश सहित चुनिन्दा अर्थशास्त्रियों द्वारा चुनावी वायदों के जरिये परोसी जा रही रेवड़ियों के दुष्परिणाम पर जो चिंता व्यक्त की जा रही है वह सैद्धांतिक और व्यवहारिक आधार पर पूरी तरह उचित है किन्तु ऐसा कहने से पहले सरकारी खजाने को लूटने वाले विशेषाधिकार संपन्न तबके के ऐशो – आराम पर हो रहे  अपव्यय को रोकने का साहस और नैतिकता भी दिखाई जानी चाहिए | सत्ता हासिल करने के लिये मुफ्त रेवड़ियाँ बाँटने की संस्कृति ने चुनाव  को डिस्काउंट सेल  और मतदाता को ग्राहक बनाकर रख दिया है | देश की बड़ी आबादी मुफ्त रेवड़ियों के फेर में निठल्लेपन को अपना चुकी है | कोरोना काल में मुफ्त अनाज वितरण वाकई जरूरी था वरना श्रीलंका जैसे हालात पैदा होना तय था | लेकिन उसके बाद जब अर्थव्यवस्था में सुधार के दावे किये जा रहे हैं और उद्योग , व्यवसाय सब पूर्व की स्थिति में लौट आये हैं तब इस योजना की समीक्षा कर केवल उन्हीं परिवारों को मुफ्त खाद्यान्न मिलना चाहिए जो सही मायनों में इसके पात्र हों | बूढ़े , अशक्त , निराश्रित आदि की चिंता करना वाकई सरकार का कर्तव्य है | विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन की योजना गरीब बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए आकृष्ट करने शुरू हुई थी लेकिन वह घोर अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का शिकार बन गई | सर्वोच्च न्यायालय ने भी जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ  हितग्राही तक न पहुंचने की बात कही है | मुफ्त रेवड़ियों के वितरण को लेकर शुरू हुई बहस या विमर्श तब तक अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकेगा जब तक नेता , न्यायाधीश और  जनप्रतिनिधि खुद होकर उन्हें मिल रही मुफ्त सुविधाओं और रेवड़ियां त्यागने की पहल नहीं करते | आजादी के अमृतकाल में इस बात का विचार मंथन जरूरी हैं कि बीते 75 साल में आर्थिक विषमता घटने की बजाय और बढ़ती क्यों जा रही है ? जब आजादी मिली तब इस देश में केवल गरीब थे लेकिन आज उससे ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं तो क्या ये स्थिति शर्मनाक नहीं है ? और यदि है तो जो लोग मुफ्त रेवड़ियों के बाँटे जाने पर चिंतित और व्यथित हैं उनमें से कितने उन्हें मिलने वाली मुफ्त सरकारी सुविधाओं को खजाने पर बोझ मानकर छोड़ने की ईमानदारी दिखायेंगे ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 August 2022

नीतीश ने भाजपा से बचने बड़ी मुसीबत मोल ले ली



बिहार में सरकार बदल गयी किन्तु मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहेंगे | आठवीं बार मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश ने भाजपा से नाता तोड़कर दोबारा राजद से गठजोड़ कर लिया | उन्हें भाजपा छोड़ बाकी सभी दलों का समर्थन भी हासिल हो गया | सब कुछ बड़े ही नाटकीय तरीके से हुआ  जिससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि लम्बे समय से नीतीश और भाजपा के रिश्तों में सहजता खत्म हो चुकी थी | हालांकि नीतीश सदैव भाजपा पर हावी रहे जो सत्ता के लालच में हर दबाव को सहती रही | लेकिन दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने जब जद ( यू ) को एक ही मंत्री पद देना तय किया तब जो गाँठ बंधना शुरू हुई वह और कसती गयी | दोनों तरफ से  बयानों के तीर चलते रहे | विधानसभा अध्यक्ष के साथ सदन के भीतर हुए नीतीश के विवाद ने भी आग में घी का काम किया | लेकिन नागरिकता संशोधन , कृषि कानून , जाति आधारित जनगणना और अग्निवीर योजना जैसे केंद्र सरकार के फैसलों का जिस तरह नीतीश ने विरोध किया उससे भाजपा भी नाराज थी | लेकिन नीतीश भाजपा की मजबूरी बन गये थे | मजबूरी नीतीश के सामने भी थी क्योंकि बीते दस साल में वे दो बार लालू के साथ आये और फिर अलग होकर भाजपा से जुड़े | हालाँकि वे आज जिस मुकाम पर हैं उसमें भाजपा का ही योगदान है जिसने उन्हें केंद्र में मंत्री पद के साथ ही लम्बे समय तक बिहार का मुख्यमंत्री बनाये रखा | लालू के जंगल राज के विरुद्ध भाजपा के समर्थन से वे बिहार में सुशासन बाबू के तौर पर स्थापित हुए | दस साल तक ये गठबंधन चला लेकिन 2013 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो नीतीश ने एनडीए त्याग  दिया परन्तु लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ़ होने का बाद विधानसभा चुनाव में उन्हीं लालू के साथ गलबहियां करने लगे जिनके जंगलराज और चारा घोटाले जैसे  भ्रष्टाचार के विरुद्ध खुलकर खड़े रहे | बिहार में बहार है ,नीतीशै कुमार है का नारा गूंजा और उस गठबंधन ने मोदी लहर को रोक लिया | लेकिन महज दो साल के भीतर वे दौड़े – दौड़े उन्हीं मोदी के पास गये जिनकी वजह से उन्होंने भाजपा के साथ दो दशक का गठबंधन तोड़ा था | उसके बाद 2019 का लोकसभा और 2020 का विधानसभा चुनाव दोनों ने मिलकर लड़ा | इन दोनों में प्रधानमंत्री सितारा प्रचारक रहे और नीतीश ने उनके साथ मंच साझा करने में संकोच भी नहीं किया | ये वही मोदी हैं जिनका बिहार में आना उनको उस समय भी नागवार गुजरता था जब वे एनडीए में रहे | खुन्नस इतनी ज्यादा थी कि प्राकृतिक आपदा के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर श्री मोदी द्वारा भेजी गई सहायता राशि तक लौटा दी और पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आये नेताओं को दिया भोज भी  रद्द कर दिया क्योंकि उसमें श्री मोदी होते | लेकिन 2017 में जब लगा कि लालू  कुनबे के साथ सरकार चलाने से सुशासन बाबू की छवि तार – तार हो जायेगी तो  श्री मोदी की शरण लेने में संकोच नाहीं किया   | 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के प्रति  काफी नाराजगी रही जिससे उनकी सीटें घटकर 45 हो गईं | यदि श्री मोदी धुआंधार प्रचार न करते तब नीतीश के हाथ से सत्ता खिसक जाती | बड़ी पार्टी बनने के बाद भी भाजपा ने उनको मुख्यमंत्री बनाया जो उसकी भी मजबूरी थी | भाजपा जानती  थी कि उसके पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो लालू और नीतीश की टक्कर का हो | सही बात ये है कि बिहार में राजनीति के तीन ध्रुव नीतीश , भाजपा और लालू के तौर पर बन गए हैं | इनमें से कोई भी अपनी दम पर  चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है | लेकिन ये भी सही है कि बीते दो दशक में बिहार में यदि किसी ने अपना विस्तार किया तो भाजपा ने , जबकि नीतीश और लालू दोनों सिकुड़े हैं | वहीं रामविलास पासवान के निधन के बाद उनका अपना कुनबा भी छिन्न – भिन्न हो गया | पिछले विधानसभा चुनाव में उनके बेटे चिराग ने जिस तरह एनडीए में रहते हुए जद ( यू ) के उम्मीदवारों को हरवाया  उससे नीतीश के मन में ये बात बैठ गयी कि वह भाजपा का खेल था | हालाँकि चिराग की बजाय भाजपा ने उनके चाचा पारस को केंद्र में मंत्री बनाया  किन्तु केंद्र  में दो मंत्रियों की मांग पूरी न होने के बाद से ही नीतीश सशंकित हो उठे थे | इसीलिये केंद्र सरकार के निर्णयों और नीतियों का विरोध करते रहे जबकि भाजपा उनके साथ भागीदार थी | हालाँकि उनको उम्मीद रही  कि भाजपा उन्हें  उपराष्ट्रपति बनाकर उपकृत करेगी किन्तु जब ऐसा नहीं हुआ तब उनको ये डर सताने लगा कि बिहार में भी महाराष्ट्र जैसा खेल न हो जाए | कांग्रेस के कुछ विधायकों के भाजपा के संपर्क में होने की भनक लगने से उनके कान  खड़े हो गए | हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का वह बयान भी उनको चुभ गया कि क्षेत्रीय पार्टियाँ खत्म हो जायेंगी | उनके मन में ये बात घर करने लग गई थी कि उनका तख्ता पलट किया जा सकता है और उस सूरत में वे लालू और कांग्रेस से समर्थन मांगेगे तो उनका हाथ दबा रहेगा | ये देखते हुए उन्होंने वही किया जिसकी उम्मीद थी |  इसके पीछे उनकी एक चाल और भी है | बीते दिनों जब ओवैसी की पार्टी के विधायक तेजस्वी के साथ आये तो राजद सबसे बड़ा दल बन गया | जैसी खबरें चल रही थीं उनके अनुसार नीतीश को समर्थन दे रही छोटी पार्टियाँ और निर्दलीयों पर तेजस्वी जिस तरह से डोरे डाल रहे थे उससे भी वे सतर्क थे | इसलिए उन्होंने ऐसा पैंतरा चला कि  भाजपा से भी पिंड छूटा  , वहीं तेजस्वी की मुख्यमंत्री बनने की योजना पर भी पानी फेर दिया | कहा जा रहा है कि इस दांव के बाद वे 2024 में श्री मोदी के मुकाबले विपक्ष का सर्वमान्य चेहरा बन जायेंगे | लेकिन ये  दिवास्वप्न ही रहेगा क्योंकि ममता बैनर्जी , शरद पवार , और राहुल गांधी इतनी आसानी से पीछे हट जायेंगे ये मान लेना मूर्खता होगी | अरविन्द केजरीवाल की भी महत्वाकांक्षाएं कम नहीं है | इससे भी बड़ी बात ये है कि आपराधिक मामलों में घिरे लालू परिवार के विरुद्ध चल रही जांचों के  हश्र पर इस  सरकार का भविष्य निर्भर  करेगा | नीतीश को ये तो पता ही है कि  तेजस्वी और तेजप्रताप पहले भी उनके कन्धों पर सवार हो गये थे और इस बार भी वे बाज नहीं आयेंगे | 2024 के चुनाव के पहले  देश की राजनीति में कितने उलटफेर होंगे ये कोई नहीं बता सकता | हालाँकि नीतीश ने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि वे राजनीति के कितने चतुर खिलाड़ी हैं | लेकिन जिस भय से उन्होंने भाजपा से दूरी बनाई वह लालू और कांग्रेस के साथ जाने से तो और बढ़ जाएगा क्योंकि उसी कारण तो वे 2017 में उस गठबंधन को छोड़ भाजपा के साथ लौटे थे | रही बात भाजपा की तो नीतीश के साथ रहते –रहते उसने बिहार में अपना जनाधार इतना तो बढ़ा ही लिया कि उसके बिना वहां की राजनीति की कल्पना नहीं  की जा सकती |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 August 2022

खेलों में पदक जीतने वाले महानायक से कम नहीं



बीते 28 जुलाई  से  इंग्लैण्ड के बर्मिंघम  में चल रहे राष्ट्रमंडल खेल गत दिवस संपन्न हो गए | इस आयोजन में भारत के खिलाड़ियों ने कुल 61 पदक जीतकर तालिका में चौथा स्थान अर्जित किया , जिनमें 22 स्वर्णपदक हैं | कुश्ती में भारतीय दल के प्रत्येक खिलाड़ी ने कोई न कोई पदक जीता | इस बार निशानेबाजी नहीं हुई वरना पदक संख्या और ज्यादा हो जाती | सबसे बड़ी बात ये  देखने मिली कि जिन खेलों में भारत की उपस्थिति नाममात्र की रहा करती थी उनमें भी  हमारे खिलाड़ियों ने पदक जीतकर अपना दबदबा साबित कर दिया | 2024 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में होने वाले ओलम्पिक खेलों के मद्देनजर राष्ट्रमंडल खेलों में हासिल  सफलता निश्चित तौर पर खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने में सहायक साबित होगी | इस आयोजन की खास बात ये रही कि पदक जीतने वाले अनेक लड़के – लड़कियां बहुत ही साधारण आर्थिक और सामाजिक परिस्थिति से निकले हुए हैं | उनके माता – पिता किसी तरह गुजर - बसर करते हैं | विपरीत हालातों के बावजूद अपने संकल्प और कठोर परिश्रम से अंतर्राष्ट्रीय खेलों के विजय मंच पर भारत का राष्ट्रध्वज फहराने वाले ये खिलाड़ी सही मायनों में महानायक हैं | ये परम संतोष का विषय है कि  युवा पीढ़ी के मन में खेलों के प्रति पेशेवर दृष्टिकोण पनप रहा है | इसी वजह से अब हमारा दल केवल अपनी हाजिरी लगाने नहीं जाता अपितु उसमें शामिल खिलाड़ी अपने प्रदर्शन से ये साबित करते हैं कि भारत की प्रगति कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रही | इन खेलों की पदक तालिका में आस्ट्रेलिया , इंग्लैण्ड और कैनेडा के बाद भारत चौथे स्थान पर रहा |  हालाँकि पहले और दूसरे स्थान पर आये देशों से हम काफी पीछे हैं लेकिन तीसरे और हमारे बीच अंतर सम्मानजनक है | इस बारे में संतोषजनक बात ये भी है कि बीते दो दशक में अब क्रिकेट , टेनिस , बैडमिन्टन जैसे ग्लैमरयुक्त खेलों से हटकर अन्य मैदानी खेलों के प्रति  भी भारतीय युवाओं में आकर्षण बढ़ा है | कुश्ती , भारोत्तोलन , निशानेबाजी और मुक्केबाजी के अलावा एथलेटिक्स में भी जिस तरह नई प्रतिभाएं अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों पर अपने को साबित करने लगी हैं वह बहुत ही शुभ लक्षण है | पिछड़े समझे जाने वाले इलाकों विशेष रूप से  उत्तर पूर्वी राज्यों से निकलने वाले खिलाड़ी जिस परिवेश और परिस्थिति से आते हैं वह देखकर उनके जुनून के प्रति सम्मान और बढ़ जाता है | यद्यपि इस बार  राष्ट्रमंडल खेलों में 72 देश शामिल हुए लेकिन आस्ट्रेलिया , इंग्लैण्ड , कैनेडा , न्यूजीलैंड , भारत और दक्षिण अफ्रीका के अतिरिक्त बाकी की उपस्थिति एक दो खेलों को छोड़कर औपचारिक ही रहती है | कुछ देश तो भौगोलिक और जनसँख्या के लिहाज से भी बेहद छोटे हैं | उस दृष्टि से भारत को तो राष्ट्रमंडल खेलों में पदक तालिका में सबसे ऊपर होना चाहिए परन्तु कटु सत्य है कि आजादी की बाद जो प्राथमिकतायें देश को आगे ले जाने के लिए निश्चित की गईं उनमें खेल और खिलाड़ी  फेहरिस्त में बहुत नीचे थे | यद्यपि पंजाब जैसे राज्य ने खेलों के विकास पर समय रहते ध्यान दिया जिसकी वजह से वहां से काफी खिलाड़ी निकले और उनके लिए वह आर्थिक दृष्टि से भी आय का साधन बना | अन्य  राज्य उस दृष्टि से काफी पिछड़ गये  | यहाँ तक कि राष्ट्रीय खेल कहे जाने वाले हॉकी में भी हम पिछड़ते चले गये | रह गया तो केवल क्रिकेट जो  महानगरों से निकलकर गाँवों तक में फ़ैल गया | लेकिन धीरे – धीरे ही सही बीते दो दशक के भीतर मैदानी खेलों के प्रति  भी आकर्षण बढ़ा और साधनों के अभाव में भी अनेक ऐसे खिलाड़ी उभरे जिन्होंने वैश्विक स्तर पर अपना कौशल दिखाया | पिछले ओलम्पिक में हमारे दल को प्राप्त  पदकों की संख्या उत्साहवर्धक थी | देश में क्रिकेट के बाद टेनिस और बैडमिन्टन का दबदबा बना था | लेकिन अब निशानेबाजी , मुक्केबाजी , कुश्ती , भारोत्तोलन और अन्य एथेलेटिक्स में  भी हमारे खिलाड़ी जिस तरह से रूचि ले रहे हैं उससे  भविष्य की उम्मीदें बढ़ी हैं | सरकार के अलावा निजी क्षेत्र से प्रायोजक  मिल जाने के कारण अनेक खिलाड़ी प्रतियोगिताओं के पूर्व विदेश  में रहकर प्राशिक्षण प्राप्त करते हैं जिसका प्रभाव उनके प्रदर्शन में नजर आता है | ये भी अच्छे संकेत हैं  कि इन खेलों के प्रशिक्षण संस्थान  पूर्व खिलाड़ियों द्वारा संचालित किये जाने लगे हैं | पदक जीतने वालों को मिलने वाले पुरस्कार , पदोन्नति और प्रोत्साहन भी खेलों में भविष्य बनाने के लिए युवाओं को प्रेरित करते हैं | बीते कुछ सालों में आम जनता में भी क्रिकेटरों की दीवानगी के साथ ही अन्य खेलों में अच्छा प्रदर्शन करने वालों के प्रति भी रूचि और सम्मान जागा है | इस बारे में भारत सरकार को चाहिए वह  औद्योगिक संगठनों की मदद से इन खेलों की विश्व स्तरीय प्रतियोगिता आयोजित करे | इसी प्रकार आईपीएल की तर्ज पर फ़ुटबाल , बैडमिन्टन और लॉन टेनिस जैसे खेलों की विश्वस्तरीय पेशेवर प्रतियोगिताएं आयोजित की जावें जिनसे देश की प्रतिष्ठा के साथ ही पर्यटन और प्रबंधन कौशल में वृद्धि होती है | भारत में मूलभूत ढांचे के अंतर्गत जिस तरह राजमार्ग और फ्लायओवर आदि बनाये जा रहे हैं वैसे ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम तैयार  किये जाएँ जिससे  आने वाले एक दशक के भीतर हम विश्व ओलम्पिक की मेजबानी के लिए अपनी दवेदारी पेश करते हुए ज्यादा  से ज्यादा  पदक जीतने के लिए उदीयमान खिलाड़ी तैयार करने पर ध्यान दें | इसके लिए ये भी जरूरी है कि खेल संघों को मठाधीशों की राजनीति से मुक्त किया जाए | 135 करोड़ की आबादी वाला जो देश धरती से अंतरिक्ष तक अपनी उपस्थिति से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है उसका ओलम्पिक की पदक तालिका में नीचे रहना शोभा नहीं देता |  इसीलिये राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतकर आजादी के अमृत महोत्सव की खुशियों में वृद्धि करने वाले सभी खिलाड़ी हमारे लिए आदरणीय हैं | जो पदक पाने से चूक गए उनका भी उतना ही सम्मान होना  चाहिए क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की किसी भी प्रतियोगिता में सम्मिलित होने की पात्रता भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 8 August 2022

कहीं नीतीश की दशा भी उद्धव जैसी न हो जाए



राजनीति में स्थायी दोस्त अथवा दुश्मन नहीं होते | इस उक्ति को चरितार्थ होते हुए देखने के लिए भारत सबसे उपयुक्त देश है | ये शोध का विषय है कि बीते 75 वर्षों के दौरान भारतीय राजनीति में सिद्धांतों  की लक्ष्मण रेखा लांघकर कितने समझौते किये गए ? पहले  जिसे अनैतिक  समझा जाता था वह बेमेल गठबंधन और  साझा न्यूनतम कार्यक्रम ( कॉमन मिनिमम प्रोग्राम ) के रूप में स्थापित हो गया जिसमें अनेक दल मिलकर सरकार बनाते हैं | चूंकि इसमें जनहित नहीं होता अतः निजी स्वार्थों की पूर्ति रुकते ही बिखराव हो जाता है | मौजूदा राजनीति में सैद्धांतिक छुआछूत समाप्त हो चुकी है | दुश्मन कब दोस्त बन जाए कहना कठिन है | ये सिलसिला 1967 में बनी संविद सरकारों के रूप में शुरू हुआ था जिसके पीछे स्व. डा. राम मनोहर लोहिया द्वारा दिया गया गैर कांग्रेसवाद का नारा था | उस प्रयोग में घोर विरोधी माने जाने वाले जनसंघ और कम्युनिस्ट सरकार में शामिल रहे | यद्यपि वह दौर ज्यादा नहीं चला लेकिन उसने सैद्धांतिक पहिचान को नष्ट करते हुए दलबदल को मान्यता दिलवा दी | उसके बाद राजनीतिक अस्पृश्यता का दौर कुछ वर्षों तक फिर जारी रहा लेकिन 1975 में लगे आपातकाल ने अंततः विरोधी विचारधारा वाले दलों को एकजुट होने बाध्य कर दिया जिसका परिणाम जनता पार्टी थी | 1977 में इस पार्टी ने केंद्र से कांग्रेस को सत्ता से हटाकर इतिहास तो रचा लेकिन नेताओं की पदलिप्सा और अहं की वजह से वह सरकार आधे कार्यकाल में ही गिर गई और गैर कांग्रेसवाद के  अधिकांश समर्थक  कांग्रेस की गोद में जा बैठे | तबसे राजनीति में ऐसे गठबंधन बनने का प्रादुर्भाव हुआ जिनका उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना था | हालाँकि भाजपा और वामपंथी दलों ने गठबंधन की राजनीति में भी अपने दूरगामी लक्ष्य सामने रखे जिसके उदाहरण डा.मनमोहन सिंह जैसे पूंजीवादी सोच वाले प्रधानमंत्री को वामपंथी समर्थन और भाजपा द्वारा जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर बनाई गई सरकार थे | महाराष्ट्र में शिवसेना का कांग्रेस के समर्थन से सत्ता हासिल करना सबसे ताजा नजीर है | देश की राजनीति में समाजवादी विचारधारा  और मंडल आन्दोलन की जमीन बना बिहार भी गठबंधन बनने और टूटने के लिए विख्यात है | बीते अनेक दशकों से इस राज्य की राजनीति लालू प्रासाद यादव , नीतीश कुमार और स्व. रामविलास पासवान के इर्द गिर्द घूमती रही है | ये तीनों 1974 में स्व. जयप्रकाश नारायण द्वारा शुरू किये गये छात्र आन्दोलन की उपज थे  | एक ज़माने में  तीनों एक ही थाली में खाया  करते थे किन्तु फिर इनके बीच  समाजवादी संस्कृति का पालन करते हुए कभी एक साथ तो कभी कोसों दूर चले जाने का क्रम जारी रहा | जिन पासवान ने गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद से न हटाये जाने के विरोध में अटल जी की  सरकार और भाजपा से नाता तोड़ लिया था वे ही मोदी सरकार में मंत्री बन बैठे | इसी तरह लालू यादव  कांग्रेस के साथ राज्य और केंद्र में सत्ता  सुख लूटने में नहीं सकुचाये | जहाँ तक नीतीश  कुमार की बात है तो ये कहना गलत न होगा कि उनकी छवि लालू और रामविलास की तुलना में अच्छी रही | बिहार को गुंडा राज से मुक्त कर विकास की राह पर आगे बढाने का श्रेय भी उनको जाता है |  वे वाजपेयी सरकार में भी वे मंत्री रहे | हालाँकि एनडीए में रहते हुए भी वे श्री मोदी से खुन्नस रखते थे | लेकिन बाद में स्व. पासवान की तरह उनके साथ आ गए | बिहार की सत्ता में लम्बे समय तक बने रहने का अवसर उन्हें भाजपा के कारण ही मिलता रहा | बावजूद उसके 2014 में श्री मोदी के राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरने के बाद 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने एक बार फिर लालू का हाथ थामा और सत्ता में लौटे | लेकिन लालू के बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप की हरकतों से त्रस्त होकर 2017 में नीतीश ने सीधे श्री मोदी से मिलकर भाजपा के साथ सरकार बना ली | 2019 के लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन को अच्छी सफलता मिली | लेकिन केन्द्रीय मंत्रीमंडल में एक ही जगह दिए जाने से नाराज होकर उनकी पार्टी जद ( यू ) सरकार से बाहर रही परन्तु उसके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह नीतीश की इच्छा के विरुद्ध मंत्री बन गये| इसी तरह हरिवंश नारायण सिंह राज्यसभा के उप सभापति बने | 2020 के विधानसभा चुनाव में जद ( यू ) और भाजपा मिलकर ही लड़े और उनके गठबंधन को मामूली बहुमत भी मिला |  लेकिन नीतीश की सीटें भाजपा से कम आईं जिसकी वजह स्व. पासवान के बेटे चिराग द्वारा जद ( यू ) के विरुद्ध ऊम्मीदवार उतारा जाना था | चिराग उस समय तक एनडीए में थे | हालाँकि भाजपा ने ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद नीतीश को गद्दी पर बिठा दिया किन्तु उनके मन में ये डर बैठ गया कि वह महाराष्ट्र की तरह बिहार में भी बड़े भाई की भूमिका में आती जा रही है जिससे उनका प्रभाव क्षीण हो रहा है |  यही वजह है कि 2020 के बाद से  केंद्र सरकार से टकराने का मौका वे तलाशते  रहे | हाल ही में  जाति आधारित जनगणना करवाने  का फैसला उसी दिशा  में एक कदम था | पिछली छठ पूजा के अवसर पर लालू के परिवार में शामिल होने के साथ ही उन्होंने ये संकेत देना शुरु कर दिया कि उनका मन भाजपा से उचटने लगा है | हाल ही में राज्यसभा के चुनाव में उन्होंने आरसीपी सिंह को टिकिट नहीं दी जिससे वे मोदी मंत्रीमंडल से बाहर हो गये | राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से तो उनको जद ( यू ) ने पहले ही चलता कर दिया था | आख़िरकार श्री सिंह ने पार्टी छोड़ते हुए नीतीश पर आरोपों की बौछार लगा दी | उधर जद ( यू ) का कहना है कि भाजपा उनको  एकनाथ शिंदे बनाकर महाराष्ट्र जैसा खेल रचना चाह रही थी | लेकिन समय रहते हमने उसे विफल कर दिया | अब खबर ये है कि नीतीश फिर से  तेजस्वी के साथ  सरकार बनाने जा रहे हैं | इस प्रयास में वे कितना सफल होंगे ये तो फिलहाल कहना मुश्किल है लेकिन ऐसा लगता है प्रधानमंत्री के लिए अनेक मर्तबा नाम चलने के  बावजूद बिहार तक सीमित रह जाने से वे कुंठित हो चले हैं | कुछ समय पहले उनका नाम पहले राष्ट्रपति और फिर उप राष्ट्रपति के लिए भी चला लेकिन भाजपा ने उनको मौक़ा नहीं  दिया | यद्यपि नीतीश की पार्टी ने एनडीए के ऊम्मीदवार का ही समर्थन किया लेकिन दिल्ली में आयोजित राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण में उनके न जाने से चर्चाओं का दौर चल पड़ा | आरसीपी प्रकरण के बाद जद ( यू ) जिस तरह आक्रामक  है उसे बड़े राजनीतिक घटनाचक्र का संकेत कहा जा सकता है | लेकिन इस आयु में अब नीतीश के पास करने को कुछ ख़ास नहीं है | लालू पुत्रों के साथ वे सरकार तो बना सकते हैं लेकिन उनके साथ पिछले कटु अनुभवों के बावजूद यदि वे ऐसा करते हैं तब ये कहना गलत न होगा कि वे अपना बुढापा खराब करने जा रहे हैं | उन्हें लग रहा होगा कि शायद 2024 में विपक्ष उन्हें प्रधानमत्री के चेहरे के तौर पर पेश करेगा लेकिन तब तक वे मुख्यमंत्री भी रहेंगे या नहीं इस बात की गारंटी नहीं हैं क्योंकि राबडी  देवी और तेजस्वी इस बात को कभी  भूल नहीं सकेंगे कि लालू  की इस दुर्दशा के जिम्मेदार नीतीश ही हैं | ऐसे में बड़ी  बात नहीं होगी कि आरजेडी के साथ सरकार बनाने की कोशिश में उनकी दशा भी उद्धव ठाकरे जैसी हो जाए | 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Saturday, 6 August 2022

अपनी घेराबंदी हुई तो लोकतंत्र खतरे में दिखने लगा



कांग्रेस के पूर्व और संभवतः भावी अध्यक्ष राहुल गांधी ने गत दिवस कहा कि देश में लोकतंत्र खत्म हो चुका है |  सभी सरकारी संस्थाओं में रास्वसंघ के लोग बैठे हैं और इसी कारण विपक्ष प्रभाव  नहीं छोड़ पाता | उनके मुताबिक संस्थागत ढांचे की मदद से ही चुनाव जीते जाते हैं | लगे हाथ उन्होंने ये कटाक्ष भी कर दिया कि हिटलर भी चुनाव जीतकर ही सत्ता में आया था | उनके अनुसार कांग्रेस ने अपने शासनकाल में कभी भी इन संस्थाओं पर कब्ज़ा नहीं किया और उस समय लड़ाई दो – तीन राजनीतिक दलों के बीच होती थी | पार्टी द्वारा महंगाई के विरुद्ध दिल्ली में किये जा रहे प्रदर्शन के पूर्व पार्टी मुख्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में उन्होंने लोकतंत्र पर खतरे का कई बार उल्लेख किया | परोक्ष तौर पर वे ये भी कह गये कि विपक्ष बुरी तरह कमजोर हो चुका है और मौजूदा हालात के चलते उसका चुनाव जीतना कठिन है | राजनीति में श्री गांधी को आये लम्बा समय बीत चुका है | लोकसभा सदस्य के साथ ही वे कांग्रेस पार्टी के महासचिव और अध्यक्ष भी बने | आज भी ज्यादातर लोग उनको ही कांग्रेस का भविष्य मानते हैं | यद्यपि उनके नेतृत्व में ही कांग्रेस अपने सबसे बुरे दिनों में आ पहुँची है | देश का नेतृत्व करना तो बड़ी बात है अब तो विपक्षी पार्टियाँ  तक उसकी अगुआई स्वीकार करने  तैयार नहीं है | राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष में हुआ  जबरदस्त बिखराव आया इसका प्रमाण है  | सही बात ये है कि 2014 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद हौसला पस्त होने के कारण विपक्ष की भूमिका का निर्वहन भी वह नहीं कर सकी | 2019 के बाद तो उसकी हालत और पतली होने लगी और परिणामस्वरूप  पार्टी के भीतर पहली बार अनेक वरिष्ट नेता सामूहिक तौर पर राहुल के विरुद्ध मैदान में कूद पड़े | हालाँकि  हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने  अध्यक्षता छोड़ दी और उनकी माताजी सोनिया गांधी कार्यकारी अध्यक्ष बनकर पार्टी चलाने लगीं | लेकिन तीन साल बीतने के बाद भी कांग्रेस अपना अध्यक्ष नहीं चुन सकी और ले – देकर पार्टी मां, बेटे और बेटी के नियंत्रण में बनी हुई है | लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष की जरूरत को महसूस करने वाले लोगों की शिकायत ये रही है कि कांग्रेस विपक्ष की अपनी भूमिका सही ढंग से नहीं निभा सकी जिससे उसकी स्वीकार्यता घटती जा रही है ।  उ.प्र विधानसभा चुनाव में मात्र दो सीटें जीतने के कारण 2024 में भी उसके लिए कोई सम्भावना नजर नहीं आ रही | लेकिन बीते कुछ समय से पार्टी अचानक चैतन्य नजर आने लगी | देश भर में महंगाई के विरुद्ध हुआ प्रदर्शन उसी का परिणाम है | संभवतः आगामी 2 अक्टूबर से राहुल पदयात्रा पर भी निकलने वाले हैं | निश्चित रूप से पार्टी की सेहत के लिए ये अच्छा निर्णय  है लेकिन इस  आक्रामकता और सक्रियता के पीछे न तो महंगाई और बेरोजगारी है और न ही लोकतंत्र की चिंता | कांग्रेस और गांधी परिवार  को सड़क पर उतरता देख खुश हो रहे लोगों को  ये गलतफहमी दूर कर लेनी  चाहिए कि वे जनता अथवा लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने मैदान में उतरे हैं  | सत्य  तो ये है कि जब – जब इस परिवार पर कोई मुसीबत आती है  तब – तब  उसे लोकतंत्र खतरे में दिखने लगता है | 1975 में जब स्व. इंदिरा गांधी का चुनाव उच्च न्यायालय ने अवैध घोषित कर दिया तब श्रीमती गांधी ने लोकतंत्र के खतरे में पड़ जाने के नाम पर आपातकाल लगाकर समूचे विपक्ष को जेल में डाल दिया , अख़बारों पर  सेंसरशिप लागू की गई , मौलिक अधिकार निलम्बित हो गये , विपक्ष की अनुपस्थिति में मनमाने संविधान संशोधन संसद में किये गये | अपने पिता के साथी रहे जयप्रकाश नारायण , आचार्य कृपलानी और मोराजी देसाई जैसे प्रखर गांधीवादी नेताओं को लोकतंत्र विरोधी मानकर जेल में डालने में इंदिरा जी ने तनिक भी संकोच नहीं किया | उस दृष्टि से राहुल का ये कहना कि हिटलर भी चुनाव जीतकर आया था , सही मायनों में उनकी दादी पर पूरी तरह सही बैठता है | श्री गांधी शायद ये भूल गए कि पत्रकार वार्ता में सरकार की तीखी आलोचना करना लोकतंत्र में ही संभव है | वास्तविकता ये है कि ईडी ( प्रवर्तन निदेशालय ) द्वारा की गई घेराबंदी के बाद राहुल और उनके परिवार को याद आया कि लोकतंत्र खतरे में है , महंगाई और बेरोजगारी बढ़ रही है और इसके लिए काले कपड़े पहिनकर सड़कों पर नजर आना चाहिए | जनता से जुड़े मुद्दों पर विपक्षी पार्टियां और  नेता सरकार के विरुद्ध आवाज उठायें तो ये उनका अधिकार ही नहीं अपितु कर्तव्य भी है | सत्तारूढ़ पार्टी को चुनाव में हराकर सरकार में आने की आकांक्षा भी लोकतान्त्रिक प्रणाली में स्वीकार्य है | लेकिन श्री गांधी  भूल जाते हैं कि लोकतंत्र तब खतरे में पड़ता है जब सत्ता  किसी व्यक्ति या परिवार की मुट्ठी में कैद हो जाती है |  नेहरू – गांधी परिवार आजादी के बाद चूंकि  लम्बे समय तक सत्ता में रहा इसलिए राहुल विपक्ष में रहते हुए खुद को असहज महसूस करते हैं और इसीलिये उनका गुस्सा बातों और व्यवहार में झलकता है | बीते आठ सालों से कांग्रेस विपक्ष में है | महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ भी  इस दौरान बनी रहीं | इनके अलावा भी अनेक ऐसे मुद्दे रहे जिन पर उसको सड़कों पर उतरकर जनता की आवाज उठाना चाहिए थी | उस दृष्टि से इस दौरान श्री गांधी जितने महीनों अपनी गुप्त विदेश यात्राओं पर रहे उतने दिनों में देश का चप्पा – चप्पा छान लेते तो वह कांग्रेस के साथ – साथ देश और लोकतंत्र के लिए फायदेमंद रहता | अब जबकि वे और उनकी माँ काँग्रेस पार्टी के पैसे से नेशनल हेराल्ड की अरबों रूपये की संपत्ति के तीन चौथाई मालिक बन जाने के मामले में घिर गये तब उन्हें लोकतंत्र , महंगाई और बेरोजगारी का ख्याल आया | बेहतर हो राहुल समय निकालकर 1975 से 1977 के घटनाक्रम का सूक्ष्म अध्ययन करें तो उन्हें समझ आएगा कि लोकतंत्र को कुचलने का दुस्साहस किसने , क्यों और कैसे किया ? मौजूदा केंद्र सरकार से उनका मतभेद स्वाभाविक है | रास्वसंघ से उनका दुराव  भी समझ में आता है | लेकिन उनका ये कहना हास्यास्पद है कि देश को सिर्फ चार लोग चला रहे हैं क्योंकि ऐसा कहते समय वे भूल गए कि उनकी अपनी पार्टी तो परिवार के तीन लोगों द्वारा ही संचालित है | और जहां तक बात विभिन्न संस्थानों में रास्वसंघ के लोगों के बैठने पर उनके ऐतराज की है तो श्री गांधी शायद भूल गए होंगे कि कांग्रेस के राज में आयातित विचारधारा के पोषक वामपंथी मानसिकता वाले लोग महत्वपूर्ण संस्थानों पर काबिज थे जिन्होंने देश को भीतर से कमजोर करने का काम तो किया ही लगे हाथ कांग्रेस की जड़ों में मठा डालते हुए उसे इस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया कि बाकी विपक्षी दल तक उसके साथ खड़े होने में छिटकने लगे हैं | अच्छा तो यही होगा कि राहुल जमीनी सच्चाई को समझें | लोकतंत्र किसी परिवार या पार्टी का बंधुआ न होकर जनता के निर्णय से चलने वाली व्यवस्था है और उसी जनता ने कांग्रेस और गांधी परिवार को सत्ता से उतार फेंका | 

- रवीन्द्र वाजपेयी