Thursday, 18 August 2022

बिहार में आई बहार , कानून मंत्री फरार



राजनीति के अपराधीकरण को लेकर उपदेशात्मक बातें तो सभी  करते हैं लेकिन जब उनका पालन करने का समय आता है तब व्यवहारिकता बीच में आ जाती है | ये बात बिलकुल सही है कि महज आरोप लगने से किसी को अपराधी मान लेना उचित नहीं है | अदालत द्वारा दण्डित  किये जाने पर ही व्यक्ति दोषी कहा जाता है किन्तु जब बात नैतिकता और शुचिता की हो तब मापदंड बदल जाते हैं | गांधी , लोहिया और दीनदयाल नामक जो तीन राजनीतिक धाराएँ इस देश की राजनीति में  दिशा निर्देशक रहीं हैं उनमें नैतिकता के महत्व और जरूरत को स्वीकार किया जाता है | यहाँ मार्क्स और माओ के अनुयायियों की बात इसलिए नहीं की जा रही क्योंकि उनके लिए  भारतीय आदर्श बेमानी हैं और वे सत्ता के लिए खून बहाने की मानसिकता से प्रेरित हैं | आजादी के 75 साल पूरे होने पर समूचे देश ने स्वाधीनता संग्राम के महानायकों के योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके द्वारा स्थापित आदर्शों का अनुसरण करने का संकल्प भी लिया | आजादी के बाद की प्रारंभिक राजनीति में नीति , नीयत और नैतिकता के समावेश पर भी खूब विमर्श सुनने –  देखने मिला परन्तु बिहार में नई – नई बनी महा गठबंधन सरकार में कानून मंत्री बनाये गए कार्तिकेय सिंह की  आपराधिक पृष्ठभूमि सामने आने के बाद ये कहना पूरी तरह सही होगा कि सत्ता और नैतिकता का कोई रिश्ता नहीं रह गया है | इस बारे में ज्ञात हुआ है कि बरसों  पुराने अपहरण के मामले में उनका नाम है | गत 12 अगस्त को अदालत ने अग्रिम जमानत की  अर्जी पर विचार करते हुए आगामी 1 सितम्बर तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक भी लगा दी थी | लेकिन 16 अगस्त को मामले की सुनवाई पर जब वे हाजिर नहीं हुए तब उनके विरुद्ध वारंट जारी किया गया | विपक्ष का आरोप है कि जिस समय कार्तिकेय को अदालत में उपस्थित रहना उसी समय वे मंत्री पद की  शपथ ले रहे थे और जिसके बाद उनको कानून मंत्रालय दे दिया गया | यद्यपि बिहार जैसे राज्य की राजनीति में नैतिकता ख़ास मायने नहीं रखती क्योंकि लालू प्रसाद  यादव ने अपने शासनकाल में अपराधियों को जिस तरह से संरक्षण और प्रोत्साहन दिया उसके कारण ये  तत्व राजनीति पर कब्जा करने में सफल हो गए | बावजूद इसके नीतीश कुमार उन नेताओं में थे जिन्होंने लालू का  विरोध करने का साहस दिखाया और सफल भी हुए | उनको सुशासन बाबू का ख़िताब भी इसी वजह से हासिल भी हुआ | लेकिन हालिया राजनीतिक परिवर्तन के बाद उन्होंने जिस तरह से लालू के परिवार के समक्ष घुटने टेके उससे लगने लगा है कि वे अपनी साफ़ – सुथरी छवि को भी मुख्यमंत्री की गद्दी पर बने रहने के  लिए दांव पर लगाने तैयार हो गये हैं | कार्तिकेय पर भाजपा नेताओं द्वारा लगाए गये आरोपों से लालू जिस तरह बौखलाए वह तो फिर भी समझ  में आने वाली बात है क्योंकि उनकी राजनीति ऐसे लोगों के बलबूते पर ही चलती रही है | लेकिन बिहार के मुख्यंमत्री पद पर बरसों से काबिज नीतीश का ये कहना गले नहीं उतरता कि उनको कार्तिकेय प्रकरण की जानकारी नहीं थी | एक बार मान भी लें कि वे उनके विरुद्ध अदालत द्वारा जारी वारंट से अनभिज्ञ थे तब भी विपक्ष द्वारा मुद्दा उठाये जाते ही पुलिस और प्रशासन से कहकर उनकी पूरी कर्मपत्री हासिल कर सकते थे | लेकिन उन्होंने इन पंक्तियों के लिखे जाने तक न तो कार्तिकेय को पाक साफ़ ठहराया और न ही उन्हें मंत्री पद से हटाया |  इस बारे में मंत्री जी के अधिवक्ता का कहना है कि उन पर कई साल  पहले  अपहरण का प्रकरण दर्ज हुआ था | लेकिन पुलिस ने प्रारंभिक जाँच के बाद ही उन्हें निर्दोष मानकर तत्संबंधी जानकारी अदालत में भी पेश कर दी थी | लेकिन उसके बाद भी वारंट के जारी होने से सवाल उठना स्वाभाविक है | रही बात मुख्यमंत्री की अनभिज्ञता की तो अब जबकि वे जान चुके हैं तब तो  उन्हें कार्तिकेय को मंत्री बनाये रखने पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि जिस सरकार का कानून मंत्री ही अपहरण जैसे मामले में फंसा हो तो उसकी छवि को लेकर कैसी अवधारणा जनमानस में बनेगी ये बताने की जरूरत नहीं है | वैसे वास्तविकता तो ये है कि नीतीश ने अपने हाथ से अपने पर काट लिए हैं | उनके मंत्रीमंडल में लालू की  पार्टी के मंत्रियों की भरमार है | तेजस्वी और तेजप्रताप दोनों को मंत्री बनाने से साबित हो गया कि मुख्यमंत्री ने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया है | हालाँकि केवल नीतीश को ही इसके लिए कसूरवार ठहराना एकपक्षीय सोच होगी क्योंकि अपराधी से परहेज करने की सोच राजनीति में पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है | क्षेत्रीय पार्टियों पर तो  अपराधी तत्वों का दबदबा किसी से छिपा नहीं रहा लेकिन अब भाजपा और कांग्रेस भी इससे मुक्त नहीं रहीं | इसीलिये इस सम्बन्ध में की जाने वाली आलोचना वजनदारी नहीं रखती | हालाँकि लालू  की पार्टी के एक नेता ने कार्तिकेय के बारे में विचार किये जाने की बात कही है , वहीं इस सरकार को समर्थन कर रही भाकपा माले ने  नीतीश और तेजस्वी से इस  बारे में पुनर्विचार न होने पर  समर्थन वापिस लेने की धमकी भी दे डाली | कार्तिकेय अपहरण के मामले में अदालत द्वारा दोषी पाए जाते हैं या बरी किये जावेंगे ये कहना कठिन है लेकिन इस विवाद की वजह से नीतीश कुमार और उनकी नई नवेली सरकार के लिए सिर मुंडाते ही ओले पड़ने वाली कहावत चरितार्थ हो गई | रही बात भाजपा अथवा अन्य  किसी के द्वारा की जा रही आलोचना की तो घूम – फिरकर बात वहीं  आ जाती है कि पहला पत्थर वह मारे जिसने कभी कोई पाप न किया हो | लगता है हमाम में सभी के निर्वस्त्र होने वाली उक्ति आज की भारतीय राजनीति के लिए ही बनी थी |  

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 17 August 2022

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग की शुरुआत अपने दल से ही करें प्रधानमंत्री



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनसंवाद की कला में बेहद पारंगत हैं | किसी भी सार्वजनिक आयोजन में उनका उद्बोधन देश के विकास और भविष्य पर केन्द्रित रहता है | दो दिन पूर्व नौवीं बार लालकिले की प्राचीर से लगभग 86 मिनिट तक उन्होंने देश और दुनिया की बातें कीं | मौका चूंकि स्वाधीनता के अमृत महोत्सव का था लिहाजा भाषण का पहला हिस्सा स्वाधीनता सेनानियों और अन्य महापुरुषों के प्रति सम्मान व्यक्त करने पर केन्द्रित रहा और तदुपरांत वे मौजूदा समस्याओं और  25 वर्ष बाद के भारत के संभावित चित्र में अपनी कल्पनाओं के रंग भरने में जुट गये | इस दौरान प्रधानमंत्री ने पांच प्रण करने का आह्वान किया | ये हैं भारत को विकसित राष्ट्र बनाना , मानसिक गुलामी से मुक्ति , अपनी विरासत पर गर्व , एकता और एकजुटता तथा नागरिक कर्तव्यों का बोध | निश्चित रूप से इन पंचभूत संकल्पों से कोई असहमत नहीं हो सकता क्योंकि इनके जरिये भारत न केवल विकसित अपितु सुसंस्कृत , संगठित  और अनुशासित देश बन सकेगा |  प्रधानमंत्री ने 2047 में आजादी की शताब्दि तक के 25 वर्ष को अमृतकाल बताते हुए युवाओं से कहा कि ये उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होगा क्योंकि भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने में उन्हें अपना महत्वपूर्ण योगदान देने का अवसर मिलेगा | बीते कुछ समय से वे चूंकि रेवड़ी राजनीति के दुष्प्रभावों पर बोलते आ रहे थे इसलिए बीते वर्षों के विपरीत उनकी तरफ से किसी भी प्रकार की नई सौगात अथवा  कार्यक्रम की घोषणा नहीं की गयी | लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे जरूर रहे जिन पर उन्होंने सांकेतिक शैली में अपनी बात कही जिनमें सबसे प्रमुख थे भ्रष्टाचार और परिवारवाद | जहाँ तक बात परिवारवाद की है तो वह राजनीतिक दलों द्वारा विकसित संस्कृति के रूप में स्थापित बुराई है | लेकिन भ्रष्टाचार तो  समूची व्यवस्था से लिपटी विषबेल  है जिसे जितना काटो  उतना फैलती जा रही है | इसकी शुरुवात कब , कैसे और किसके द्वारा की गई ये शोध का विषय है किन्तु  ये वास्तविकता है  कि बीते 75 साल में  हम आजादी के समय तय किये गए लक्ष्यों के अनुरूप विकसित देशों की बराबरी नहीं कर सके तो उसकी सबसे बड़ी वजह भ्रष्टाचार ही है | श्री मोदी ने आयकर विभाग और ईडी के छापों में बड़ी मात्रा में बरामद हो रहे काले धन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि देश के करोड़ों लोगों के पास रहने की जगह नहीं है वहीं  कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके पास काला धन रखने के लिए  जगह कम पड़ रही है | उनका इशारा संभवतः कोलकाता में ममता सरकार के वरिष्ट मंत्री पार्थ चटर्जी के ठिकानों से बरामद 50 करोड़ की तरफ रहा होगा | दरअसल  देश में आये दिन किसी न किसी के पास छापों में करोड़ों की नगदी और काली कमाई से अर्जित संपत्ति का खुलासा होता है | पार्थ चटर्जी तो  मंत्री रहे लेकिन अदना से सरकारी लिपिकों , पुलिस कर्मियों और ग्राम पंचायत के सचिव जैसों के यहाँ जब बेहिसाब नोटों के  बण्डल जप्त होते हैं तब भ्रष्टाचार को प्रमाणित करने के लिए किसी जांच आयोग की जरूरत महसूस नहीं होती | उस दृष्टि से उसके विरुद्ध निर्णायक लड़ाई का आह्वान उद्बोधन की मुख्य बात मानी जानी चाहिये क्योंकि इस पर काबू किये बिना देश  एक कदम आगे , दो कदम पीछे की स्थिति में बना रहेगा  | लेकिन भ्रष्टाचार से लड़ने में सफलता के लिए प्रधानमंत्री को शुरुआत  अपने घर अर्थात भाजपा से करनी होगी और दूसरी बात अगला चुनाव जीतने के दबाव से मुक्त होकर कदम उठाने होंगे | आज केंद्र के साथ ही देश के बड़े हिस्से में भाजपा का राज है | श्री मोदी तो भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हैं लेकिन क्या राज्यों में कार्यरत भाजपा सरकारों को ये प्रमाणपत्र दिया जा सकता है ? म.प्र और हाल ही में बनी महाराष्ट्र की सरकार में दूसरी पार्टी से आये विधायकों में से अनेक दागदार होने के बावजूद मंत्री बना दिए गए या फिर  उनकी घेराबंदी में ढील दे दी गई | टीवी पर होने वाली बहसों में भाजपा के प्रवक्ता इस सवाल का जवाब देने से बचते नजर आते हैं कि आयकर और ईडी वालों को भाजपा नेताओं या उसके साथ जुड़े कारोबारियों में कोई भी भ्रष्ट क्यों नहीं लगता ? केंद्र सरकार के प्रयासों से देश भर में वैश्विक स्तर के राजमार्गों का जो निर्माण हो रहा है उसके प्रति हर किसी के मन में प्रशंसा का भाव है लेकिन भाजपा शासित राज्यों की सरकारों द्वारा बनाये जाने वाले प्रादेशिक राजमार्गों के निर्माण में होने वाले भ्रष्टाचार को लेकर आम जन क्या कहते हैं इसका संज्ञान लिया जाना भी जरूरी है | इसी तरह सरकारी नौकरियों में होने वाला लेन देन भाजपा की हुकूमत वाले राज्यों में भी बेरोकटोक जारी है | इस हेतु ली  जाने वाली परीक्षाओं के पर्चे लीक होने से वे आगे बढ़ जाती हैं | परीक्षाओं के बाद साक्षात्कार हो जाने पर भी नियुक्तियां होने में बरसों - बरस बीत जाते हैं | प्रधानमंत्री आवास योजना हेतु मिलने वाली राशि के वितरण में सरकारी अमला और सरपंच  खुलकर घूसखोरी करते हैं | स्थानीय निकायों में मकान का नक्शा बिना चढ़ोत्री के स्वीकृत  नहीं होता | बिना घूस खिलाये व्यावसायिक निर्माण की अनुमति मिलना तो सपने देखने जैसा है | शराब और खनन के ठेकों में जितना भ्रष्टाचार अन्य राज्यों में है उतना ही भाजपाई सरकारों की छत्रछाया में चल रहा है | परिवहन विभाग में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने यद्यपि काफी सुधार किये हैं लेकिन आरटीओ का नाम लेते ही भ्रष्टाचार की बू आने लगती है | आशय ये है कि जिस तरह श्री मोदी ने गुजरात में  मुख्यमंत्री रहते हुए विकास का एक मॉडल पेश किया था वैसा ही प्रयास उन्हें भाजपा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार  मुक्त शासन व्यवस्था बनाने के लिए करना चाहिए जिससे पार्टी विथ डिफ़रेंस का दावा जमीनी तौर पर सही साबित हो सके | प्रधानमंत्री ने 2047  में आजादी की शताब्दि तक जिस अमृत काल की बात की है यदि उस दौरान केवल भ्रष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था बनाने का लक्ष्य सामने रखकर उस पर काम  किया जावे तभी  भारत को विकसित देश बनाने का सपना साकार हो सकता  है | यद्यपि  भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हैं जिन्हें उखाड़ना आसान नहीं है | लेकिन देश को बर्बादी और विखंडन से बचाना है तो श्री मोदी को बिना लिहाज किये  कदम बढाने होंगे | और ऐसा करने पर उन्हें जनता का साथ भी खुलकर मिलेगा क्योंकि भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा पीड़ित वही है | प्रधानमंत्री से देश को अपेक्षा है कि वे अपनी तरह ही  भाजपा को भी  भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त करने का दुस्साहस करेंगे | सही  बात ये है कि आज के  परिदृश्य में वे ही ऐसे व्यक्ति हैं जिनमें कठोर फैसले करने का माद्दा है | ऐसे में उन्हें चाहिए लोकसभा चुनाव के पहले तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने आह्वान के अनुरूप कड़े से कड़े कदम उठायें जिससे विकास की गति और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि हो | वरना हर साल 15 अगस्त आता रहेगा और हम अच्छे – अच्छे भाषण सुनकर फिर उसी ढर्रे पर लौट आयेंगें जो बीते 75 साल से हमारे जीवन के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 15 August 2022

राजनीतिक और आर्थिक से ज्यादा मानसिक गुलामी खतरनाक



हजारों साल के ज्ञात इतिहास और वक्त के थपेड़ों से अपने अस्तित्व को बचाए रखने वाली संस्कृति से समृद्ध देश के साथ गुलामी शब्द का जुड़ना किसी दुर्भाग्य से कम नहीं था  | लेकिन हमारे महान भारतवर्ष को इस दुर्भाग्य से गुजरना पड़ा और लगभग चार सौ वर्षों तक विदेशियों की दासता झेलने के बाद आखिरकार 15 अगस्त 1947 को वह अंग्रेजों की दासता से मुक्त होकर एक स्वाधीन देश बना | पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों की सत्ता के अधीन रहने के बाद जब हम आजाद हुए तो  देश खुशियों में डूबा हुआ  था  | हालाँकि आजादी की लड़ाई में जितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी उससे ज्यादा लोगों को देश के विभाजन में जान गंवाना पड़ी | लेकिन  गलतियों से सीख न लेने की प्रवृत्ति  हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गई  | और इसीलिए 75 साल पहले भारत माता के टुकड़े कर मुसलमानों के लिए अलग  बनाये गए पाकिस्तान में  हिन्दुओं और सिखों को अपना सब कुछ छोड़कर पलायन हेतु मजबूर किए जाने के बावजूद देश जश्न मनाता रहा  |  आजादी की वह  तारीख कभी भुलाई नहीं जा सकेगी किन्तु आज जब उस दौर की चश्मदीद पीढ़ी लुप्तप्राय  है और बीते 75 साल में  उन  बातों पर पर्दा डालकर रखा गया जिनसे  भावी पीढ़ी विभाजन के लिए जिम्मेदार उन गलतियों के बारे  में जान सकती थी , तब ये जरूरी हो जाता है कि  अमृत महोत्सव की खुशी के साथ उन गलतियों का भी ईमानदार विश्लेषण किया जावे जिनके कारण  परतंत्रता का कलंक हमारे माथे पर लगा रहा | इतिहास वह नींव है जिस पर किसी भी देश का भविष्य खड़ा होता है | कहने को तो हमें अपने गौरवशाली अतीत पर बड़ा गर्व है लेकिन चार सौ साल की  दासता की यादें शर्मिंदा करती हैं | और इसीलिए आज  स्वाधीनता दिवस पर  उन बातों पर भी चिंतन – मनन होना चाहिए जिनके कारण हमने अपनी आजादी खोई थी |  सच्चाई ये है कि आज भी  हमारी एकता और अखंडता पर खतरा मंडरा रहा है  | भले ही अब  19 वीं और 20 वीं सदी के उपनिवेशवाद का लौटना संभव नहीं रहा लेकिन देश को भीतर से कमजोर करने वाली वह मानसिकता पुष्पित – पल्लवित है जिसने मोहम्मद गौरी और गजनवी जैसों के लिए लाल कालीन बिछाये थे  | पाठक सोच रहे होंगे अमृत महोत्सव जैसे अवसर पर गुलामी के घावों को कुरेदने का क्या औचित्य है ? लेकिन बिना इतिहास में झांके ऐतिहासिकता का जिक्र सार्थक नहीं होता  | इसलिए ये जरूरी  है कि अपनी  उपलब्धियों को जीवंत रखने के साथ ही  हमें उन गलतियों को भी सदैव याद रखना चाहिए जिनकी वजह से सोने की चिड़िया विदेशी पिंजरे में कैद होकर रह गई थी | जिस पश्चिमी सीमा पर हमारे सबसे जुझारू और लड़ाकू जाति समूह रहते थे वहीं से सबसे जयादा आक्रान्ता आकर हमें लूटकर जाते रहे और अंततः एक ने आकर यहीं ठिकाना जमा लिया | सोचने का विषय ये है कि जब पहला विदेशी हमला हुआ तभी हमने इस बात का पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किया कि दोबारा किसी की हिम्मत न हो हमारी तरफ देखने की | विचारणीय है कि जिस देश ने सिकंदर के विश्व विजय के इरादों को ध्वस्त कर दिया हो वह सैकड़ों की संख्या में आने वाले लुटेरों के सामने घुटना टेक कैसे हो गया ?  इतिहास में छिपी उन भयानक भूलों पर पड़ी  धूल को हटाये बिना आजादी के अमृत महोत्सव का जश्न महज औपचारिकता का निर्वहन रह जाएगा | आज देश में एक ऐसा वर्ग है जिसे भारत की प्राचीनता पर ही संदेह है | संगठित देश के तौर पर हमारे अस्तित्व को नकारने वाले भी हैं  | ऐसे लोगों की  शातिर सोच बीते 75 साल से ये समझाने की साजिश रच रही है कि कारवाँ आते गए हिन्दोस्तां बनता गया | आज जरूरत इस सोच को बदलने की है | आजादी के 75 सालों में देश ने बेशक बहुत कुछ किया और कमाया | वैश्विक मंचों पर हमारी उपस्थिति उभरती हुई विश्व शक्ति का एहसास करवाती है | पृथ्वी से अन्तरिक्ष तक हमारी उपलब्धियों का गौरवगान हो रहा है | सैन्य और आर्थिक मोर्चे पर हमारी  शक्ति का लोहा पूरी दुनिया मान रही है | लेकिन आज भी वे कारण उपस्थित हैं जिनसे आजादी के लिए खतरा  है | सता की खातिर समाज को जातियों में खंड – खंड कर देना , धार्मिकता के नाम पर  सदियों पुरानी अरब से आयातित कट्टरता को गले से लगाये रखना , सेना के पराक्रम पर सवालिया निशान लगाना ,और  देश की अखंडता के विरुद्ध उठने  वाली आवाजों को आजादी का नाम देना इस बात का प्रमाण है कि आज भी जयचंद और मीर जाफर वाली सोच को जीवित रखने वाले मौजूद हैं , जो चिंता का विषय है | हालाँकि बीते 75 सालों  में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिस पर गर्व किया जा सकता है और जिस तरह का आत्मविश्वास युवा पीढ़ी में है वह आश्वस्त करता है | राजनीतिक स्थायित्व और नेतृत्व की दृढ़ता की वजह से किसी भी वैश्विक संकट के समय दुनिया भारत की तरफ देखने लगी  है | विश्व जनमत को अपनी तरफ मोड़ने की शक्ति भी हम हासिल चुके हैं | वैश्विक महामारी के रूप में आई आपदा का जिस कुशलता और साहस के साथ भारत ने मुकाबला किया उससे  विश्व आश्चर्यचकित रह गया | लेकिन आंतरिक तौर पर देश को कमजोर करने वाली विघटनकारी ताकतें भी तेजी से सिर उठा रही हैं | पंजाब में खालिस्तानी मानसिकता का उभार शुभ संकेत नहीं है | इसी तरह  इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाने का जो सुनियोजित्त षडयंत्र हाल के दिनों में देखने मिला वह एक और  विभाजन की भूमिका तैयार करने जैसी शरारत  ही है | क्षेत्रीयता के नाम पर देश की अखंडता को  दी जा रही चुनौती  दुर्भाग्यपूर्ण है |   सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार , जो देश को घुन की तरह खाए जा रहा है | सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाने वाली छापेमारी में जिस बड़े पैमाने  पर  काला धन बाहर आ रहा है उससे यह साबित हो गया है कि बीते 75 सालों में किस बेरहमी से देश को लूटा गया | जनकल्याण की सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों को मिलने की बजाय नौकरशाहों और नेताओं के गठजोड़ ने हड़प लिया | लोकतंत्र के नाम पर चुनावों में जनता के धन की बर्बादी के खेल को रोकना रोकना समय की मांग है वरना मुफ्तखोरी  का नशा  कार्यसंस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर देगा | कृषि का घटता रकबा भी भविष्य में कृषि प्रधान देश के विशेषण के छिन जाने का कारण बन सकता है | हर समय किसी न किसी राज्य में होने वाले चुनाव  नीतिगत अनिश्चितता के साथ ही भ्रष्टाचार के बड़े स्रोत बन गये हैं | कुल मिलाकर आजादी के इस अमृत महोत्सव में हमें उन विषैली प्रवृत्तियों  के प्रति भी सावधान रहना होगा जो धीरे – धीरे व्यवस्था रूपी  शिराओं में फैलती जा रही हैं | बीते 75 सालों में जो हासिल  किया गया उस पर गर्व करना पूरी तरह सही है लेकिन आत्ममुग्धता से बचते हुए  उन हालातों  और गलतियों को दोहराए  जाने से बचना होगा जिनके कारण भारत माता को सैकड़ों सालों तक दासता का दंश सहना पड़ा | इसलिए आज हर्षोल्लास के साथ ही गंभीर चिंतन का भी दिन है  क्योंकि गुलामी की मानसिकता के बीज  किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं और जरा सी असावधानी होते ही उनके अंकुरित होने का अंदेशा बना हुआ है | इस बात को सदैव याद रखना चाहिए कि राजनीतिक और आर्थिक से ज्यादा मानसिक गुलामी  ज्यादा खतरनाक होती है |  15 अगस्त 1947 को हम राजनीतिक तौर पर भले ही स्वतंत्र हो गए लेकिन मानसिक गुलामी  बदस्तूर जारी रही , वरना भारत के साथ  इण्डिया शब्द संविधान में न लिखा जाता  |

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर अनन्त शुभकामनाओं सहित ,

रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 August 2022

महंगाई : आंकड़ों की बाजीगरी का भी अमृत महोत्सव



बीते दो दिनों से सुनने में आ रहा है कि 
जुलाई में खुदरा महंगाई घटकर 6.71 फीसदी हो गई जो जून में 7.01 थी | राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के  आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच महीनों में ये आंकड़ा सबसे कम है | यद्यपि उक्त संस्थान ने ये भी स्पष्ट किया है कि अभी भी महंगाई निर्धारित दर से ज्यादा है जो कि 2 से 6 फीसदी होनी चाहिये | अधिकृत आंकड़ों के अनुसार  जुलाई 2021 में वह  5.59 प्रतिशत के स्तर पर थी  जबकि अप्रैल आते – आते उछलते हुए 7.79 तक जा पहुँची | राहत की  खबर औद्योगिक उत्पादन में ही देखी गई जो जून के महीने में 12.3 प्रतिशत बढ़ गया | अर्थशास्त्र में नीतिगत नियोजन आंकड़ों  के आधार पर ही किया जाता है | रिजर्व बैंक भी महंगाई के आंकड़ों के आधार पर ही ब्याज दर घटाता – बढ़ाता है | हाल ही में रिजर्व बैंक द्वारा ऋणों पर ब्याज दर बढ़ाये जाने का उद्देश्य  भी महंगाई पर काबू करना था | ये बात तो सर्वविदित है कि कोरोना के संक्रमण ने जिस तरह पूरी दुनिया के अर्थतंत्र को हिलाया उससे भारत भी अछूता नहीं रह सका | हालांकि दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों ने ये स्वीकार किया कि कोरोना काल में भी दुनिया के विकसित देशों की  तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रही और ये भी कि इस वैश्विक महामारी से जूझने में भारतीय प्रबंधन काफी अच्छा रहा | इसमें भी दो राय नहीं हैं कि 135 करोड़ की विशाल आबादी का भरण - पोषण करना उस विकट स्थिति में बहुत ही कठिन था | इसके साथ ही इतनी बड़ी जनसँख्या को कोरोना से बचाव हेतु टीके लगाना भी आसान काम न था | लेकिन आज भी जब दुनिया के तमाम देश कोरोना के कहर से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं तब भारत में आर्थिक स्थितियां सामान्य होने लगी हैं | इसका प्रमाण रिहायशी घरों , कारों और दोपहिया वाहनों की बिक्री में वृद्धि के अलावा पर्यटन व्यवसाय में दिखाई दे रही तेजी है | बीती गर्मियों में शादी – विवाह भी खूब हुए जिनके कारण उपभोक्ता बाजार में रौनक रही | वहीं उससे जुड़ी अन्य व्यवसायिक गतिविधियों का ठहराव भी दूर हुआ | जीएसटी की मासिक वसूली का आंकड़ा जिस तेजी से बढ़ता जा रहा है उससे भी आर्थिक सुस्ती खत्म होने के संकेत मिले हैं | पेट्रोल – डीजल की बिक्री लगातार बढ़ते जाने से ये जाहिर हो रहा है कि परिवहन और सड़क मार्ग से होने वाला आवागमन कोरोना पूर्व की स्थिति में आ चुका है | निर्माण गतिविधियों के रफ़्तार पकड़ने के कारण मजदूरों को काम मिलने लगा है | हवाई और रेल यात्रियों की संख्या में भी वृद्धि देखी जा रही है | कुल मिलाकर बाजार में मांग  बढ़ने से उत्पादन करने वालों का हौसला बढ़ा जिसकी वजह से भी कीमतों में स्थिरता  आई होगी | दरअसल महंगाई बढ़ने के पीछे एक कारण रूस - यूक्रेन के बीच छिड़ी लड़ाई भी है जिससे खाद्यान्न और खाने का तेल बेतहाशा महंगा हो गया | ऐसा लगता है सरकार द्वारा अनाज का निर्यात रोकने का असर कीमतों पर पड़ने से खुदरा महंगाई नीचे आ गई | अन्यथा महंगाई कम होने  का खास अनुभव नहीं हो रहा | उलटे उपभोक्ता बाजार में तकरीबन हर चीज के जो दाम बीते दो साल में बढ़े , वे वहीं ठहर गये | इस आधार पर देखें तो महंगाई घटने का दावा सच्चाई से दूर लगता है | वैसे भी सरकारी संस्थान के आंकड़ों  में हेराफेरी  नई बात  नहीं है | राजनीतिक कारणों से भी उनको सरकार की छवि के मद्देनजर प्रसारित – प्रचारित किया जाता है | बीते दिनों संसद के मानसून सत्र में विपक्ष द्वारा महंगाई को लेकर सरकार को घेरने का भरपूर प्रयास भी किया गया | यद्यपि कुछ हद तक  ये तो माना  जा सकता है कि रोजमर्रे की उपभोक्ता वस्तुओं के दामों का बढ़ना तो रुका ही है | लेकिन हाल ही में रसोई गैस के महंगे होने से महंगाई का आंकड़ा लगता है फिर जस का तस हो जायेगा | अभी बाजार के जो संकेत हैं वे एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाले स्थिति बयाँ कर रहे हैं | पेट्रोल - डीजल की कीमतें काफी दिनों से स्थिर हैं लेकिन रूस – यूक्रेन युद्ध के कारण कच्चे तेल और गैस की जो किल्लत है उसकी वजह से अन्य तेल उत्पादक देशों की मुनाफाखोरी भी चरम पर है | ऐसे में मूल्यों की स्थिरता पर सदैव संदेह के बादल मंडराते रहते हैं | ये देखते हुए महंगाई घटने के जो आंकड़े विगत दिवस जारी हुए वे ऊँट के मुंह में जीरे से भी कम कहे जाएँ तो गलत न होगा | असली सर्वेक्षण इस बात का होना चाहिए कि दैनिक उपयोग की जिन भी चीजों के दाम कोरोना के कारण बढ़े ,  वे वापस  लौटे या नहीं ? ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि बाजार का चरित्र यही है कि कुछ अपवाद छोड़कर एक बार बढ़े हुए दाम भले ही कुछ समय के लिए स्थिर हो जाएं लेकिन लौटकर नीचे नहीं आते | केंद्र और विभिन्न राज्यों ने हाल ही में कर्मचारियों और पेंशनधारियीं का मंहगाई भत्ता बढ़ाया था  | 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार राहतों का पिटारा खोलेगी इसमें दो राय नहीं है | दूसरी तरफ रिजर्व बैंक महंगाई पर लगाम लगाने के लिए घिसे – पिटे तरीके आजमायेगा | लेकिन इन कृत्रिम उपायों से महंगाई का घटना अर्थव्यवस्था के वास्तविक चित्र को पेश नहीं करता | आंकड़ों की  बाजीगरी देश बीते 75 साल से देखता आ रहा है | ये बात सच है कि महंगाई और विकास एक दूसरे के समानांतर चलते हैं | लेकिन हमारे देश में उनके  बीच का सामंजस्य बिगड़ता चला गया | यही वजह रही कि विकास कम हुआ और महंगाई ज्यादा बढ़ गई | मसलन लोगों की आय उस अनुपात में नहीं बढ़ सकी जिसमें जरूरी चीजें और सेवाएँ महंगी हुई हैं | इस आधार पर जो ताजा आंकड़े आये हैं उनको वास्तविकता की कसौटी पर कसने पर कुछ अलग ही स्थिति नजर आयेगी | उम्मीद की जा सकती है कि आजादी के अमृत महोत्सव पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसी कुछ घोषणा करेंगें जिससे आम आदमी राहत महसूस करे क्योंकि आंकड़ों की विश्वसनीयता भी नेताओं की तरह खत्म हो चुकी है |

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 12 August 2022

नेता , नौकरशाह और न्यायाधीश भी तो मुफ्त रेवड़ियां छोड़ने आगे आयें



देश के मुख्य न्यायाधीश एन.वी.रमना कुछ ही दिनों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं | उसके पहले वे चुनावी वायदों की शक्ल में मुफ्त रेवड़ियाँ बाँटने की जो प्रतिस्पर्धा राजनीतिक दलों में चल रही  है उस पर रोक लगाने संबंधी  याचिका का निपटारा करने के इच्छुक दिखाई दे रहे हैं | वरिष्ट अधिवक्ता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल को अदालत मित्र बनाने के साथ ही  आम आदमी पार्टी को भी  स्वतः संज्ञान लेते हुए  बतौर एक पक्ष जोड़ा गया है | केंद्र सरकार ने अदालत से गुहार लगाई है कि जब तक विधायिका इस बारे में कोई निर्णय नहीं करती तब तक अदालत मुफ्त रेवड़ियों की बंदरबांट पर रोक लगाने की पहल करे | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो लगभग रोज इस बारे में बोल रहे हैं | गत दिवस श्री रमना ने अपने से जुड़े दो वाकये सुनाकर इस बात पर जोर दिया कि मुफ्त के नाम पर जो किया जा रहा है वह बजाय जाति और वर्ग विशेष के , आर्थिक आधार पर होना चाहिए जिससे समाज के सभी लोगों को उसका लाभ मिले | मुफ्त रेवड़ियों और सुविधाओं के वर्गीकरण पर भी चर्चा हुई | न्यायालय द्वारा बीते दिनों बनाये गये पैनल में चुनाव आयोग के शामिल होने संबंधी अनिच्छा का जिक्र भी आया | अभी तक जो देखने मिला उसके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय , चुनाव आयोग और केंद्र सरकार तीनों इस बात पर चिंतित दिखते हैं कि चुनावी वायदों के रूप में की जाने वाली घोषणाओं से सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बोझ असहनीय होता जा रहा है | और पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने की महत्वाकांक्षा पूरी होने की  राह में मुफ्त रेवड़ियाँ बड़ी बाधा बन रही हैं |  रोचक बात ये है कि सभी दल अपने वायदों को जन कल्याण  का नाम देते हैं वहीं दूसरे की घोषणा मुफ्त रेवड़ी बता दी जाती है | बसों में वृद्ध महिलाओं को निःशुल्क यात्रा की सुविधा कुछ राज्यों में मिलने पर रेलवे में वरिष्ट नागरिकों को मिलने वाली रियायत भी शुरू करने का मुद्दा उठता है | वृद्धावस्था और निराश्रित पेंशन के साथ ही किसान कल्याण निधि को भी रेवड़ी की श्रेणी में रखा जा रहा है | बढ़ते – बढ़ते बात गरीबों को दिए जा रहे मुफ्त खाद्यान्न तक जा पहुँची | आम आदमी  पार्टी का कहना है कि ये सब उसकी बढ़ती लोकप्रियता से डरकर हो रहा  है | हालाँकि मुख्य न्यायाधीश भी जनकल्याण की योजनाओं को जारी रखने के पक्षधर हैं लेकिन ये कहना गलत न होगा कि संसद , सरकार , न्यायपालिका , चुनाव आयोग और राजनीतिक दल कोई भी मुफ्तखोरी बंद करने का दोष अपने सिर पर लेने तैयार नहीं  हैं | और इसका  सबसे बड़ा कारण ये है कि सांसद , मंत्री , न्यायाधीश , नौकरशाह और राजनेता सभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मुफ्त सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं | इसलिए  जब दूसरे की  सुविधाएँ बंद करने का मसला उठता है तो उनके कंधे अपराधबोध से झुक  जाते हैं | प्रधानमन्त्री ने गत दिवस तंज कसा कि कोई डीजल – पेट्रोल मुफ्त देने का वायदा भी कर सकता है | शायद उनका इशारा उ.प्र के विधानसभा चुनाव में ऑटो चालकों को माह में एक – दो  बार मुफ्त  पेट्रोल दिए जाने के वायदे की तरफ था | लेकिन जो प्रधानमंत्री लगभग रोज ही मुफ्तखोरी के विरुद्ध देश को चेता रहे हैं उन्होंने भी तो अपने आठ वर्ष के कार्यकाल में मुफ्त बांटने में लेशमात्र संकोच नहीं किया | और जब जनता सांसदों / विधायकों को मिलने वाली  मुफ्त यात्रा , इलाज और पेंशन पर सवाल उठाती है तब प्रधानमंत्री की अपनी  पार्टी भाजपा और किसी दूसरी पार्टी की तरफ से जनता की  मांग के समर्थन में एक भी आवाज नहीं सुनाई देती | समाजवादी और वामपंथी विचाराधारा का झंडा उठाने वाले जनप्रतिनिधि भी सरकार से मिल  रही मुफ्त सुविधाओं में कटौती करने की मांग को अनसुना कर देते हैं | ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी खजाना जनता को बांटी जाने वाली रेवड़ियों से ही खाली होता है ?  नेता , नौकरशाह , न्यायाधीश , मंत्री और चुने हुए जनप्रतिनिधि भी तो नव सामंतवाद के प्रतीक बनकर वही सब कर रहे हैं जो अंग्रेजी सत्ता के दौर में हुआ करता था | इस बारे में यक्ष प्रश्न ये है कि आजादी के 75 वर्ष पूरे करने वाले देश में आज भी जब करोड़ों लोगों को हजार – दो हजार रूपये की पेंशन से गुजारा करना पड़ता हो और करोड़ों लोग गरीबी के कारण मुफ्त अनाज के लिए मोहताज हों तब इस देश का नेतृत्व कर चुके लोगों  की ईमानदारी और क्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक है | सही बात ये है कि व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे महानुभाव अपने सुख और सुविधाओं पर तो बेरहमी से धन खर्च करना अधिकार समझते हैं ,  लेकिन जनता  को मिलने वाली सुविधाएँ  फिजूलखर्ची लगती हैं | ये देखते हुए प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश सहित चुनिन्दा अर्थशास्त्रियों द्वारा चुनावी वायदों के जरिये परोसी जा रही रेवड़ियों के दुष्परिणाम पर जो चिंता व्यक्त की जा रही है वह सैद्धांतिक और व्यवहारिक आधार पर पूरी तरह उचित है किन्तु ऐसा कहने से पहले सरकारी खजाने को लूटने वाले विशेषाधिकार संपन्न तबके के ऐशो – आराम पर हो रहे  अपव्यय को रोकने का साहस और नैतिकता भी दिखाई जानी चाहिए | सत्ता हासिल करने के लिये मुफ्त रेवड़ियाँ बाँटने की संस्कृति ने चुनाव  को डिस्काउंट सेल  और मतदाता को ग्राहक बनाकर रख दिया है | देश की बड़ी आबादी मुफ्त रेवड़ियों के फेर में निठल्लेपन को अपना चुकी है | कोरोना काल में मुफ्त अनाज वितरण वाकई जरूरी था वरना श्रीलंका जैसे हालात पैदा होना तय था | लेकिन उसके बाद जब अर्थव्यवस्था में सुधार के दावे किये जा रहे हैं और उद्योग , व्यवसाय सब पूर्व की स्थिति में लौट आये हैं तब इस योजना की समीक्षा कर केवल उन्हीं परिवारों को मुफ्त खाद्यान्न मिलना चाहिए जो सही मायनों में इसके पात्र हों | बूढ़े , अशक्त , निराश्रित आदि की चिंता करना वाकई सरकार का कर्तव्य है | विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन की योजना गरीब बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए आकृष्ट करने शुरू हुई थी लेकिन वह घोर अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का शिकार बन गई | सर्वोच्च न्यायालय ने भी जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ  हितग्राही तक न पहुंचने की बात कही है | मुफ्त रेवड़ियों के वितरण को लेकर शुरू हुई बहस या विमर्श तब तक अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकेगा जब तक नेता , न्यायाधीश और  जनप्रतिनिधि खुद होकर उन्हें मिल रही मुफ्त सुविधाओं और रेवड़ियां त्यागने की पहल नहीं करते | आजादी के अमृतकाल में इस बात का विचार मंथन जरूरी हैं कि बीते 75 साल में आर्थिक विषमता घटने की बजाय और बढ़ती क्यों जा रही है ? जब आजादी मिली तब इस देश में केवल गरीब थे लेकिन आज उससे ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं तो क्या ये स्थिति शर्मनाक नहीं है ? और यदि है तो जो लोग मुफ्त रेवड़ियों के बाँटे जाने पर चिंतित और व्यथित हैं उनमें से कितने उन्हें मिलने वाली मुफ्त सरकारी सुविधाओं को खजाने पर बोझ मानकर छोड़ने की ईमानदारी दिखायेंगे ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 August 2022

नीतीश ने भाजपा से बचने बड़ी मुसीबत मोल ले ली



बिहार में सरकार बदल गयी किन्तु मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहेंगे | आठवीं बार मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश ने भाजपा से नाता तोड़कर दोबारा राजद से गठजोड़ कर लिया | उन्हें भाजपा छोड़ बाकी सभी दलों का समर्थन भी हासिल हो गया | सब कुछ बड़े ही नाटकीय तरीके से हुआ  जिससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि लम्बे समय से नीतीश और भाजपा के रिश्तों में सहजता खत्म हो चुकी थी | हालांकि नीतीश सदैव भाजपा पर हावी रहे जो सत्ता के लालच में हर दबाव को सहती रही | लेकिन दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने जब जद ( यू ) को एक ही मंत्री पद देना तय किया तब जो गाँठ बंधना शुरू हुई वह और कसती गयी | दोनों तरफ से  बयानों के तीर चलते रहे | विधानसभा अध्यक्ष के साथ सदन के भीतर हुए नीतीश के विवाद ने भी आग में घी का काम किया | लेकिन नागरिकता संशोधन , कृषि कानून , जाति आधारित जनगणना और अग्निवीर योजना जैसे केंद्र सरकार के फैसलों का जिस तरह नीतीश ने विरोध किया उससे भाजपा भी नाराज थी | लेकिन नीतीश भाजपा की मजबूरी बन गये थे | मजबूरी नीतीश के सामने भी थी क्योंकि बीते दस साल में वे दो बार लालू के साथ आये और फिर अलग होकर भाजपा से जुड़े | हालाँकि वे आज जिस मुकाम पर हैं उसमें भाजपा का ही योगदान है जिसने उन्हें केंद्र में मंत्री पद के साथ ही लम्बे समय तक बिहार का मुख्यमंत्री बनाये रखा | लालू के जंगल राज के विरुद्ध भाजपा के समर्थन से वे बिहार में सुशासन बाबू के तौर पर स्थापित हुए | दस साल तक ये गठबंधन चला लेकिन 2013 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो नीतीश ने एनडीए त्याग  दिया परन्तु लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ़ होने का बाद विधानसभा चुनाव में उन्हीं लालू के साथ गलबहियां करने लगे जिनके जंगलराज और चारा घोटाले जैसे  भ्रष्टाचार के विरुद्ध खुलकर खड़े रहे | बिहार में बहार है ,नीतीशै कुमार है का नारा गूंजा और उस गठबंधन ने मोदी लहर को रोक लिया | लेकिन महज दो साल के भीतर वे दौड़े – दौड़े उन्हीं मोदी के पास गये जिनकी वजह से उन्होंने भाजपा के साथ दो दशक का गठबंधन तोड़ा था | उसके बाद 2019 का लोकसभा और 2020 का विधानसभा चुनाव दोनों ने मिलकर लड़ा | इन दोनों में प्रधानमंत्री सितारा प्रचारक रहे और नीतीश ने उनके साथ मंच साझा करने में संकोच भी नहीं किया | ये वही मोदी हैं जिनका बिहार में आना उनको उस समय भी नागवार गुजरता था जब वे एनडीए में रहे | खुन्नस इतनी ज्यादा थी कि प्राकृतिक आपदा के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर श्री मोदी द्वारा भेजी गई सहायता राशि तक लौटा दी और पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आये नेताओं को दिया भोज भी  रद्द कर दिया क्योंकि उसमें श्री मोदी होते | लेकिन 2017 में जब लगा कि लालू  कुनबे के साथ सरकार चलाने से सुशासन बाबू की छवि तार – तार हो जायेगी तो  श्री मोदी की शरण लेने में संकोच नाहीं किया   | 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के प्रति  काफी नाराजगी रही जिससे उनकी सीटें घटकर 45 हो गईं | यदि श्री मोदी धुआंधार प्रचार न करते तब नीतीश के हाथ से सत्ता खिसक जाती | बड़ी पार्टी बनने के बाद भी भाजपा ने उनको मुख्यमंत्री बनाया जो उसकी भी मजबूरी थी | भाजपा जानती  थी कि उसके पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो लालू और नीतीश की टक्कर का हो | सही बात ये है कि बिहार में राजनीति के तीन ध्रुव नीतीश , भाजपा और लालू के तौर पर बन गए हैं | इनमें से कोई भी अपनी दम पर  चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है | लेकिन ये भी सही है कि बीते दो दशक में बिहार में यदि किसी ने अपना विस्तार किया तो भाजपा ने , जबकि नीतीश और लालू दोनों सिकुड़े हैं | वहीं रामविलास पासवान के निधन के बाद उनका अपना कुनबा भी छिन्न – भिन्न हो गया | पिछले विधानसभा चुनाव में उनके बेटे चिराग ने जिस तरह एनडीए में रहते हुए जद ( यू ) के उम्मीदवारों को हरवाया  उससे नीतीश के मन में ये बात बैठ गयी कि वह भाजपा का खेल था | हालाँकि चिराग की बजाय भाजपा ने उनके चाचा पारस को केंद्र में मंत्री बनाया  किन्तु केंद्र  में दो मंत्रियों की मांग पूरी न होने के बाद से ही नीतीश सशंकित हो उठे थे | इसीलिये केंद्र सरकार के निर्णयों और नीतियों का विरोध करते रहे जबकि भाजपा उनके साथ भागीदार थी | हालाँकि उनको उम्मीद रही  कि भाजपा उन्हें  उपराष्ट्रपति बनाकर उपकृत करेगी किन्तु जब ऐसा नहीं हुआ तब उनको ये डर सताने लगा कि बिहार में भी महाराष्ट्र जैसा खेल न हो जाए | कांग्रेस के कुछ विधायकों के भाजपा के संपर्क में होने की भनक लगने से उनके कान  खड़े हो गए | हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का वह बयान भी उनको चुभ गया कि क्षेत्रीय पार्टियाँ खत्म हो जायेंगी | उनके मन में ये बात घर करने लग गई थी कि उनका तख्ता पलट किया जा सकता है और उस सूरत में वे लालू और कांग्रेस से समर्थन मांगेगे तो उनका हाथ दबा रहेगा | ये देखते हुए उन्होंने वही किया जिसकी उम्मीद थी |  इसके पीछे उनकी एक चाल और भी है | बीते दिनों जब ओवैसी की पार्टी के विधायक तेजस्वी के साथ आये तो राजद सबसे बड़ा दल बन गया | जैसी खबरें चल रही थीं उनके अनुसार नीतीश को समर्थन दे रही छोटी पार्टियाँ और निर्दलीयों पर तेजस्वी जिस तरह से डोरे डाल रहे थे उससे भी वे सतर्क थे | इसलिए उन्होंने ऐसा पैंतरा चला कि  भाजपा से भी पिंड छूटा  , वहीं तेजस्वी की मुख्यमंत्री बनने की योजना पर भी पानी फेर दिया | कहा जा रहा है कि इस दांव के बाद वे 2024 में श्री मोदी के मुकाबले विपक्ष का सर्वमान्य चेहरा बन जायेंगे | लेकिन ये  दिवास्वप्न ही रहेगा क्योंकि ममता बैनर्जी , शरद पवार , और राहुल गांधी इतनी आसानी से पीछे हट जायेंगे ये मान लेना मूर्खता होगी | अरविन्द केजरीवाल की भी महत्वाकांक्षाएं कम नहीं है | इससे भी बड़ी बात ये है कि आपराधिक मामलों में घिरे लालू परिवार के विरुद्ध चल रही जांचों के  हश्र पर इस  सरकार का भविष्य निर्भर  करेगा | नीतीश को ये तो पता ही है कि  तेजस्वी और तेजप्रताप पहले भी उनके कन्धों पर सवार हो गये थे और इस बार भी वे बाज नहीं आयेंगे | 2024 के चुनाव के पहले  देश की राजनीति में कितने उलटफेर होंगे ये कोई नहीं बता सकता | हालाँकि नीतीश ने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि वे राजनीति के कितने चतुर खिलाड़ी हैं | लेकिन जिस भय से उन्होंने भाजपा से दूरी बनाई वह लालू और कांग्रेस के साथ जाने से तो और बढ़ जाएगा क्योंकि उसी कारण तो वे 2017 में उस गठबंधन को छोड़ भाजपा के साथ लौटे थे | रही बात भाजपा की तो नीतीश के साथ रहते –रहते उसने बिहार में अपना जनाधार इतना तो बढ़ा ही लिया कि उसके बिना वहां की राजनीति की कल्पना नहीं  की जा सकती |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 August 2022

खेलों में पदक जीतने वाले महानायक से कम नहीं



बीते 28 जुलाई  से  इंग्लैण्ड के बर्मिंघम  में चल रहे राष्ट्रमंडल खेल गत दिवस संपन्न हो गए | इस आयोजन में भारत के खिलाड़ियों ने कुल 61 पदक जीतकर तालिका में चौथा स्थान अर्जित किया , जिनमें 22 स्वर्णपदक हैं | कुश्ती में भारतीय दल के प्रत्येक खिलाड़ी ने कोई न कोई पदक जीता | इस बार निशानेबाजी नहीं हुई वरना पदक संख्या और ज्यादा हो जाती | सबसे बड़ी बात ये  देखने मिली कि जिन खेलों में भारत की उपस्थिति नाममात्र की रहा करती थी उनमें भी  हमारे खिलाड़ियों ने पदक जीतकर अपना दबदबा साबित कर दिया | 2024 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में होने वाले ओलम्पिक खेलों के मद्देनजर राष्ट्रमंडल खेलों में हासिल  सफलता निश्चित तौर पर खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने में सहायक साबित होगी | इस आयोजन की खास बात ये रही कि पदक जीतने वाले अनेक लड़के – लड़कियां बहुत ही साधारण आर्थिक और सामाजिक परिस्थिति से निकले हुए हैं | उनके माता – पिता किसी तरह गुजर - बसर करते हैं | विपरीत हालातों के बावजूद अपने संकल्प और कठोर परिश्रम से अंतर्राष्ट्रीय खेलों के विजय मंच पर भारत का राष्ट्रध्वज फहराने वाले ये खिलाड़ी सही मायनों में महानायक हैं | ये परम संतोष का विषय है कि  युवा पीढ़ी के मन में खेलों के प्रति पेशेवर दृष्टिकोण पनप रहा है | इसी वजह से अब हमारा दल केवल अपनी हाजिरी लगाने नहीं जाता अपितु उसमें शामिल खिलाड़ी अपने प्रदर्शन से ये साबित करते हैं कि भारत की प्रगति कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रही | इन खेलों की पदक तालिका में आस्ट्रेलिया , इंग्लैण्ड और कैनेडा के बाद भारत चौथे स्थान पर रहा |  हालाँकि पहले और दूसरे स्थान पर आये देशों से हम काफी पीछे हैं लेकिन तीसरे और हमारे बीच अंतर सम्मानजनक है | इस बारे में संतोषजनक बात ये भी है कि बीते दो दशक में अब क्रिकेट , टेनिस , बैडमिन्टन जैसे ग्लैमरयुक्त खेलों से हटकर अन्य मैदानी खेलों के प्रति  भी भारतीय युवाओं में आकर्षण बढ़ा है | कुश्ती , भारोत्तोलन , निशानेबाजी और मुक्केबाजी के अलावा एथलेटिक्स में भी जिस तरह नई प्रतिभाएं अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों पर अपने को साबित करने लगी हैं वह बहुत ही शुभ लक्षण है | पिछड़े समझे जाने वाले इलाकों विशेष रूप से  उत्तर पूर्वी राज्यों से निकलने वाले खिलाड़ी जिस परिवेश और परिस्थिति से आते हैं वह देखकर उनके जुनून के प्रति सम्मान और बढ़ जाता है | यद्यपि इस बार  राष्ट्रमंडल खेलों में 72 देश शामिल हुए लेकिन आस्ट्रेलिया , इंग्लैण्ड , कैनेडा , न्यूजीलैंड , भारत और दक्षिण अफ्रीका के अतिरिक्त बाकी की उपस्थिति एक दो खेलों को छोड़कर औपचारिक ही रहती है | कुछ देश तो भौगोलिक और जनसँख्या के लिहाज से भी बेहद छोटे हैं | उस दृष्टि से भारत को तो राष्ट्रमंडल खेलों में पदक तालिका में सबसे ऊपर होना चाहिए परन्तु कटु सत्य है कि आजादी की बाद जो प्राथमिकतायें देश को आगे ले जाने के लिए निश्चित की गईं उनमें खेल और खिलाड़ी  फेहरिस्त में बहुत नीचे थे | यद्यपि पंजाब जैसे राज्य ने खेलों के विकास पर समय रहते ध्यान दिया जिसकी वजह से वहां से काफी खिलाड़ी निकले और उनके लिए वह आर्थिक दृष्टि से भी आय का साधन बना | अन्य  राज्य उस दृष्टि से काफी पिछड़ गये  | यहाँ तक कि राष्ट्रीय खेल कहे जाने वाले हॉकी में भी हम पिछड़ते चले गये | रह गया तो केवल क्रिकेट जो  महानगरों से निकलकर गाँवों तक में फ़ैल गया | लेकिन धीरे – धीरे ही सही बीते दो दशक के भीतर मैदानी खेलों के प्रति  भी आकर्षण बढ़ा और साधनों के अभाव में भी अनेक ऐसे खिलाड़ी उभरे जिन्होंने वैश्विक स्तर पर अपना कौशल दिखाया | पिछले ओलम्पिक में हमारे दल को प्राप्त  पदकों की संख्या उत्साहवर्धक थी | देश में क्रिकेट के बाद टेनिस और बैडमिन्टन का दबदबा बना था | लेकिन अब निशानेबाजी , मुक्केबाजी , कुश्ती , भारोत्तोलन और अन्य एथेलेटिक्स में  भी हमारे खिलाड़ी जिस तरह से रूचि ले रहे हैं उससे  भविष्य की उम्मीदें बढ़ी हैं | सरकार के अलावा निजी क्षेत्र से प्रायोजक  मिल जाने के कारण अनेक खिलाड़ी प्रतियोगिताओं के पूर्व विदेश  में रहकर प्राशिक्षण प्राप्त करते हैं जिसका प्रभाव उनके प्रदर्शन में नजर आता है | ये भी अच्छे संकेत हैं  कि इन खेलों के प्रशिक्षण संस्थान  पूर्व खिलाड़ियों द्वारा संचालित किये जाने लगे हैं | पदक जीतने वालों को मिलने वाले पुरस्कार , पदोन्नति और प्रोत्साहन भी खेलों में भविष्य बनाने के लिए युवाओं को प्रेरित करते हैं | बीते कुछ सालों में आम जनता में भी क्रिकेटरों की दीवानगी के साथ ही अन्य खेलों में अच्छा प्रदर्शन करने वालों के प्रति भी रूचि और सम्मान जागा है | इस बारे में भारत सरकार को चाहिए वह  औद्योगिक संगठनों की मदद से इन खेलों की विश्व स्तरीय प्रतियोगिता आयोजित करे | इसी प्रकार आईपीएल की तर्ज पर फ़ुटबाल , बैडमिन्टन और लॉन टेनिस जैसे खेलों की विश्वस्तरीय पेशेवर प्रतियोगिताएं आयोजित की जावें जिनसे देश की प्रतिष्ठा के साथ ही पर्यटन और प्रबंधन कौशल में वृद्धि होती है | भारत में मूलभूत ढांचे के अंतर्गत जिस तरह राजमार्ग और फ्लायओवर आदि बनाये जा रहे हैं वैसे ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम तैयार  किये जाएँ जिससे  आने वाले एक दशक के भीतर हम विश्व ओलम्पिक की मेजबानी के लिए अपनी दवेदारी पेश करते हुए ज्यादा  से ज्यादा  पदक जीतने के लिए उदीयमान खिलाड़ी तैयार करने पर ध्यान दें | इसके लिए ये भी जरूरी है कि खेल संघों को मठाधीशों की राजनीति से मुक्त किया जाए | 135 करोड़ की आबादी वाला जो देश धरती से अंतरिक्ष तक अपनी उपस्थिति से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है उसका ओलम्पिक की पदक तालिका में नीचे रहना शोभा नहीं देता |  इसीलिये राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतकर आजादी के अमृत महोत्सव की खुशियों में वृद्धि करने वाले सभी खिलाड़ी हमारे लिए आदरणीय हैं | जो पदक पाने से चूक गए उनका भी उतना ही सम्मान होना  चाहिए क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की किसी भी प्रतियोगिता में सम्मिलित होने की पात्रता भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी