Thursday, 25 August 2022

प्रकृति वंदन : पर्यावरण संरक्षण की दिशा में संघ का सराहनीय कदम



रास्वसंघ को उसके विरोधी सांप्रदायिक संगठन मानते हैं | हिन्दू समाज को अनुशासन और एकता के सूत्र में पिरोने के लिए 1925 से कार्यरत संघ का विस्तार जिस तरह हुआ वह समाजशास्त्रियों  के लिए जिज्ञासा का विषय रहा है | अपनी स्थापना के समय से ही प्रचार और  आत्मप्रशंसा से दूर रहने की वजह से इस संगठन के बारे में भ्रांतियां भी बहुत फैलाई गईं | लेकिन उन सबसे अविचलित रहते हुए उसने कार्य जारी रखा और 2025 में शताब्दि वर्ष की ओर बढ़ रहे संघ ने सामाजिक जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है | उसके लगभग तीन दर्जन अनुषांगिक संगठन विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं | संघ चूंकि खुद को सांस्कृतिक संगठन कहता है और भारतीय संस्कृति में उसकी अगाध श्रृद्धा है इसलिए उसके हर प्रकल्प  में भारतीय परम्पराओं का पालन किया जाता है | आज देश का एक भी भाग ऐसा नहीं है , जहाँ संघ की उपस्थिति न हो | वैचारिक तौर पर भी उसकी स्वीकृति और आकर्षण बढ़ा है जिसका सबसे बड़ा कारण उसकी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता और लक्ष्य केन्द्रित कार्यशैली है | भारतीयता से सराबोर इस संगठन को पुरातनपंथी या दकियानूसी कहने वाले कथित प्रगतिशील लोगों के लिए ये बात शोचनीय होना चाहिए कि जिस वामपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर वे संघ को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास करते रहे वह अपनी जन्मभूमि में ही दम तोड़ बैठी , जबकि तीन – तीन बार प्रतिबंधित किये जाने के बावजूद संघ शक्तिशाली होता गया और उसके प्रभावक्षेत्र में भी वृद्धि हो रही है | अब तो विदेशों में भी उसकी जड़ें जम रही हैं | ये बात पूरी तरह सही है कि समाज के एक बड़े वर्ग को संघ में भारतीय संस्कृति का संरक्षक नजर आता है | आज जब राजनीति पूरी तरह कलुषित हो चुकी है तब संघ  राष्ट्रवाद , निःस्वार्थ सेवा और अनुशासन के  प्रतीक के तौर पर लोगों का विश्वास अर्जित करने में सफल है | पश्चिमी संस्कृति को ही प्रगतिशीलता का परिचायक मानने वाले लोगों के दुष्प्रचार के बावजूद वह  भारतीय जनमानस में ये बात स्थापित करने में सफल हुआ है कि भारत  की सारी समस्याओं का हल भारत में ही है परन्तु उसके लिए हमें अपने सामर्थ्य पर भरोसा करना होगा | यही वजह है कि संघ ने दैनिक शाखाओं के जरिये हिन्दू समाज को संगठित करने के अपने मूल कार्य के अलावा समाज की रचनात्मक शक्तियों को देश के विकास और मजबूती के लिए एकजुट करने का अभियान शुरू किया जिसके  उत्साहजनक परिणाम आने लगे हैं | इसी दिशा में उसने पर्यावरण संरक्षण का अभियान हाथ में लिया | आगामी 28 अगस्त को प्रकृति वंदन नामक कार्यक्रम के अंतर्गत देश भर में 55 लाख पर्यावरण प्रेमी प्रकृति की पूजा , वृक्षारोपण और तालाबों की सफाई जैसे कार्य करेंगे | इसके अंतर्गत देश के 150 से भी अधिक विश्वविद्यालयों के छात्र एक सप्ताह तक पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न कार्यों में योगदान देंगे | जिसे वन वीक फार नेशन का नाम दिया गया है | गत वर्ष भी संघ द्वारा आयोजित प्रकृति वंदन दिवस के साथ 52 लाख लोग जुड़े थे | यह आयोजन निश्चित रूप से धर्म और आध्यात्मिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों और संगठनों के लिए प्रेरणादायक है | हमारे देश में राजनीति और धर्म दो ऐसे क्षेत्र हैं जो हर समय सक्रिय रहते हैं और जिनसे करोड़ों लोगों का सीधा जुड़ाव है | यदि इस जनशक्ति का उपयोग प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण हेतु किया जा सके तो  देश में शुद्ध हवा की उपलब्धता बढ़ सकती है , जलस्रोतों को सूखने से बचाया जा सकता है और औसत जन स्वास्थ्य में सुधार के कारण लोगों की जीवनशैली में गुणात्मक सुधार होना भी संभव है | अब चूंकि संघ जैसा समर्पित संगठन प्रकृति वंदन अभियान के साथ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हुआ है तब ये मानकर चला जा सकता है कि प्रकृति की रक्षा के लिए लाखों समर्पित व्यक्ति संगठित होकर जो कुछ भी करेंगे उसके सुपरिणाम आने वाले समय में महसूस किये जा सकेंगे | इस बारे में ये भी अपेक्षित है कि जिस तरह राजनीतिक पार्टियाँ सत्ता की खातिर वैचारिक मतभेदों के बावजूद भी एकजुट हो जाती हैं ठीक वैसे ही संघ की विचारधारा से असहमति रखने वालों को भी चाहिए कि प्रकृति वंदन के इस अनुष्ठान का हिस्सा बनकर प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण में योगदान दें | अनुभव बताते हैं कि संघ ने जो भी कार्य हाथ में लिया उसे सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाया है | कन्याकुमारी में समुद्र के बीच विशाल चट्टान पर निर्मित विवेकानंद शिला स्मारक और  अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर जैसे प्रकल्प को साकार बनाने में संघ की भूमिका और योगदान किसी से छिपा नहीं है | शिक्षा , कला , संस्कृति , इतिहास , विज्ञान और अब प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में संघ का आगे आना आश्वस्त करता है | प्राप्त जानकारी के अनुसार संघ राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के संरक्षण हेतु कार्यरत विभिन्न संगठनों के साथ ही शिक्षण संस्थानों को भी इस अभियान में शामिल करने के लिए प्रयासरत है | उसकी संगठन क्षमता को देखते  हुए इस कार्य की सफलता सुनिश्चित लगती है | संघ के आलोचकों को भी  इस अभियान में सहयोग देना चाहिये क्योंकि इसके साथ देश का भविष्य जुड़ा हुआ है |


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 24 August 2022

जांच रुकवाने का प्रलोभन देने वाले पर आपराधिक प्रकरण दर्ज करें सिसौदिया



दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने ये कहकर सनसनी मचा दी कि भाजपा ने उनको ऑफर दिया है कि आम आदमी पार्टी तोड़कर भाजपा में आने पर सीबीआई और ईडी के मामले खत्म करवा दिए जायेंगे  | लेकिन वे महाराणा प्रताप के वंशज हैं इसलिए सिर कटवा लेंगे लेकिन झुकायेंगे नहीं | भारतीय राजनीति में इस तरह की बातें आये दिन सुनाई देती हैं | जात – पांत मिटाने का उपदेश देने वाले राजनीतिक जब नेता किसी भी मामले में  घिर जाते हैं तब उनको अपनी जाति याद आने लगती है | उस दृष्टि से सिसौदिया जी को अचानक अपने महान पूर्वज की याद आ जाना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता | उनके यहाँ सीबीआई छापे को राजपूतों की आन  – बान – शान के  साथ गुस्ताखी बताते हुए पार्टी के एक नेता ने गुजरात में 5 हजार राजपूतों के आम आदमी  पार्टी में शामिल होने की घोषणा कर डाली और श्री सिसौदिया भी राजपूत नेता बनकर गुजरात जा पहुंचे  | आने वाले दिनों में वे मेवाड़ के राजवंश से अपनी रिश्तेदारी  भी निकाल लें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | लेकिन राजनीति में आने से पहले पत्रकारिता करते रहे मनीष ने अब तक इस बात का खुलासा नहीं किया कि वह कौन व्यक्ति  था जिसने सीबीआई और ईडी जांच बंद करवाने की शर्त पर उन्हें भाजपा में शामिल होने का न्यौता दिया था | दिल्ली के उपमुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर होने के नाते उनका ये दायित्व है कि इस तरह का प्रलोभन देने वाले व्यक्ति का नाम उजागर करने के साथ ही उसके विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाएं |  यदि उन्हें कोई पद देने की बात कही जाती तब वह राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा होता लेकिन सीबीआई और ईडी की जांच बंद करवाने का  आश्वासन आपराधिक कृत्य है और ऐसा दुस्साहस करने वाले को दण्डित किया ही जाना चाहिए | साफ़ – सुथरी राजनीति का नारा लेकर मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी अपने आक्रामक तेवरों के लिये जानी जाती है | पंजाब में उसकी  सरकार के एक मंत्री के कारनामे उजागर होते ही उसे जेल भेजने जैसा साहसिक कार्य वहां के मुख्यमंत्री ने खुद होकर किया | लेकिन दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री को जेल जाने के बाद भी  पद से न हटाया जाना पार्टी के दोहरे चरित्र को पेश कर रहा है | श्री सिसौदिया जब आबकारी नीति में घोटाले के आरोप में फंस गये तब उनको राणा प्रताप से अपना खून का रिश्ता याद आया | हो सकता है आम आदमी पार्टी राजस्थान के विधानसभा चुनाव में उनको बतौर राजपूत नेता पेश करे | लेकिन राजनीतिक दांव पेंच अपनी जगह हैं परन्तु पार्टी छोड़कर आने पर अपराधिक प्रकरणों की जांच बंद करवाने का प्रस्ताव पूरी तरह गैर कानूनी है | ऐसे में श्री सिसौदिया को अपनी प्रामाणिकता साबित करने के लिए उस शख्स के विरुद्ध आपराधिक  प्रकरण दर्ज करवाने आगे आना चाहिए जिसने उनको कथित प्रलोभन दिया | हालाँकि ऐसे मामलों में फंसने पर ज्यादातर नेता इसी तरह की  शान हांकते हैं | प. बंगाल के एक वजनदार मंत्री की महिला मित्र के यहाँ  50 करोड़ नगदी मिलने के पहले तक मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और  तृणमूल कांग्रेस के अन्य नेता ईडी और सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाते नहीं थकते थे | लेकिन जबसे नोटों का जखीरा जप्त हुआ तबसे सबकी  बोलती बंद है | श्री सिसौदिया के यहाँ पड़े छापे के बाद सीबीआई ने उस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं  किया इसलिए कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी किन्तु उन्हें भाजपा में आने का जो सशर्त ऑफर मिला उसका खुलासा तो होना ही चाहिए | अन्यथा बतौर शिक्षा मंत्री उनकी  जो छवि बनी है वह तार – तार होते देर नहीं लगेगी | सीबीआई के छापे  के बाद  श्री सिसौदिया की  पहली  प्रतिक्रिया बहुत ही संयत और परिपक्व थी  | ये कहना भी गलत न होगा कि शिक्षा  के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के कारण उन्हें जन सहानुभूति भी मिली | लेकिन दलबदल करने के बदले जाँच खत्म करवाने जैसे ऑफर का जिक्र करने के बाद वे व्यर्थ के विवाद में फंस गये हैं | हालांकि  भाजपा के बारे में ये बात काफी प्रचारित की  रही है कि वह अपने विरोधियों को डराने और   विपक्षी राज्य  सरकारें गिराने के लिए सीबीआई और ईडी का दुरूपयोग कर रही है | लेकिन श्री सिसौदिया ने जिस ऑफर की बात कही है वैसा   आरोप ममता बैनर्जी और संजय राउत जैसे नेताओं द्वारा लगाये जाने पर लोग उतनी गंभीरता से नहीं लेते किन्तु दिल्ली के उपमुख्यमंत्री की छवि एक सौम्य नेता की रही है | इसलिए उनके द्वारा कही गयी बात में तथ्य की अपेक्षा की जाती है | आरोप लगाने के बाद  ये पूछे जाने पर कि किसने उन्हें संदर्भित प्रस्ताव दिया , उनकी तरफ से कोई जवाब न मिलने से विश्वसनीयता  पर सवाल उठ खड़े हुए हैं | आम आदमी पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविन्द केजरीवाल भी अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी को भारत रत्न दिलवाने की  मांग करते हुए आबकारी घोटाले के कारण उनके दामन पर पड़े छींटों को धोने का प्रयास तो कर  रहे हैं लेकिन उनका भी ये दायित्व है कि जिस भाजपा नेता ने उनके उपमुख्यमंत्री को पार्टी तोड़कर उनके साथ आने का न्यौता दिया उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करें | अन्यथा न सिर्फ श्री सिसौदिया अपितु पूरी पार्टी की प्रामाणिकता पर सवाल उठने लगेंगे | इस बारे में ये उल्लेखनीय है कि दिल्ली में किये गये एक ताजा  सर्वेक्षण में 51 प्रतिशत लोगों ने श्री सिसौदिया को आबकारी घोटाले में दोषी माना है | ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस ने भी खुलकर श्री सिसौदिया पर डाले गये छापे का समर्थन कर  उन्हें तत्काल मंत्रीमंडल से हटाये जाने की  मांग की है  |  

- रवीन्द्र वाजपेयी


 

Tuesday, 23 August 2022

विपक्षी एकता की राह में कांटे बिछा रही ममता की एकला चलो नीति



एक तरफ आम आदमी पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव को मोदी विरुद्ध केजरीवाल बताने पर जुटी है वहीं प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने विपक्षी एकता के प्रयासों को नया मोड़ देते हुए कह दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को खड़ा करने का मॉडल पूरी तरह असफल है | इसके साथ ही भाजपा के विरुद्ध विपक्ष का महागठबंधन बनाने की कोशिश पर भी तृणमूल कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए कहा है कि केवल बिहार , महाराष्ट्र और झारखंड में इसकी जरूरत है | बाकी राज्यों में जो क्षेत्रीय पार्टी है उसे ही भाजपा का सामना करने का अवसर दिया जाए | पार्टी के प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रायन ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी , तमिलनाडु में द्रमुक , और उ.प्र में सपा बतौर क्षेत्रीय ताकत भाजपा से जूझेंगी | ममता बैनर्जी के हवाले से साफ़ कर दिया गया कि प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सभी 42 सीटों पर मैदान में उतरेगी | यद्यपि ममता राहुल गांधी का मखौल पहले भी उड़ा चुकी हैं लेकिन इस बार तो उन्होंने बिना लाग लपेट के कह दिया कि वे श्री मोदी का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं | तृणमूल द्वारा कुछ राज्यों में क्षेत्रीय दलों के आधिपत्य को स्वीकार किया गया है वहीं बिहार , महाराष्ट्र और झारखंड में विपक्ष के महागठबंधन की गुंजाईश बताकर उसने नीतीश , शरद पवार और हेमंत सोरेन को झटका दे दिया  | सबसे बड़ी बात ये है कि कांग्रेस को पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिया गया है जबकि म.प्र , राजस्थान , हिमाचल और छत्तीसगढ़ के अलावा गुजरात में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से ही होता आया है | कर्नाटक और केरल में भी वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है | क्षेत्रीय पार्टियों को उनके प्रभाव वाले राज्य में सर्वेसर्वा बनाने के पीछे ममता की सोच प.बंगाल पर अपना एकछत्र राज कायम रखना है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का महागठबंधन यदि आकार लेता है तब वामपंथी और कांग्रेस प. बंगाल में अपना हिस्सा मांगेंगे  जिसके लिए ममता किसी भी कीमत पर तैयार नहीं हैं | उन्हें लग रहा है कि पिछला विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने जिस तरह से भाजपा में तोड़फोड़ की है उसके बाद वह आगामी लोकसभा चुनाव में 2014 और 2019 वाला प्रदर्शन शायद ही दोहरा सकेगी और तृणमूल 35 सीटें भी जीत गई तो उनकी वजनदारी बढ़ जायेगी  | हालांकि  इस मामले में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन भी काफी मजबूत हैं लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में न तो उनकी रूचि है और न ही  स्वीकार्यता | जहां तक बात उ.प्र की है तो ये जगजाहिर है कि वहां भाजपा को रोकना आसान नहीं होगा | इसी तरह बिहार में भले ही नीतीश ने लालू यादव की पार्टी से गठबंधन कर लिया हो लेकिन दोनों के बीच बंटवारे के कारण नीतीश का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होना नामुमकिन है | शरद पवार के साथ भी यही समस्या है क्योंकि उन्हें अबकी बार कांग्रेस  के अलावा शिवसेना के साथ भी सीटों की साझेदारी करनी होगी | लेकिन ममता और तृणमूल इस बात को भूल रही हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव के पहले  गुजरात , हिमाचल , कर्नाटक , म.प्र , छत्तीसगढ़ ,राजस्थान और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होंगे और उनके नतीजे भी राष्ट्रीय राजनीति को अपने तरीके से प्रभावित करेंगे | ऐसे में उन्होंने अभी से महागठबंधन पर सवाल उठाकर कांग्रेस को हाशिये पर धकेलने का जो दांव चला है वह उनके स्वभाव को देखते हुए  स्वाभाविक है | लेकिन अचानक बदले उनके सुरों से राजनीति पर नजर रखने वाले थोडा भौंचक जरूर हैं क्योंकि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद सुश्री बैनर्जी ने शरद पवार और सोनिया गांधी से मिलकर मोदी विरोधी महागठबंधन बनाने की भूमिका तैयार की थी | हालाँकि उसी दौरान उन्होंने खुद को श्री  मोदी के मुकाबले खड़ा किये जाने की जो बात की  उससे कांग्रेस चौकन्नी हो गई थी | और फिर गोवा विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने अपने उम्मीदवार उतारकर जब  विपक्ष का खेल खराब किया उसके बाद से  श्री पवार और कांग्रेस दोनों सशंकित हो उठे  | हालाँकि राष्ट्रपति चुनाव के बहाने भी सुश्री बैनर्जी ने विपक्ष  को एकजुट  करने का प्रयास किया लेकिन शरद पवार , गोपालकृष्ण गांधी  और फारुख अब्दुल्ला  किसी ने भी उम्मीदवार बनने पर स्वीकृति नहीं दी | उसके बाद मजबूरी में उन्होंने यशवंत सिन्हा को उतारा लेकिन भाजपा ने द्रौपदी मुर्मु को सामने लाकर विपक्ष की एकता को छिन्न - भिन्न कर दिया | | उसके बाद उपराष्ट्रपति चुनाव आया लेकिन कोलकाता में ईडी द्वारा ममता सरकार के वरिष्ट मंत्री पार्थ चटर्जी के काले धन को उजागर किये जाने के बाद उनके तेवर ढीले पड़ गए और राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की एकता का प्रयास करने वाली तृणमूल कांग्रेस ने उपराष्ट्रपति चुनाव से दूर रहने का ऐलान करते हुए भाजपा उम्मीदवार जगदीप धनखड़ की जीत को आसान बना दिया जबकि प. बंगाल के राज्यपाल के रूप में उनके साथ ममता के रिश्ते बहुत ही तनावपूर्ण रहे | ये पैंतरा निश्चित तौर पर चौंकाने वाला था | राजनीति के जानकार ये मान रहे हैं कि श्री चटर्जी की करीबी महिला के निवास से बड़ी मात्रा में काला धन जप्त होने के बाद से ममता दबाव में आ गईं | उनके भतीजे अभिषेक और उनकी पत्नी भी सीबीआई जाँच के शिकंजे में होने के अलावा  अनेक तृणमूल विधायक गम्भीर अपराधों के आरोपी हैं | राज्य से जुड़ी वित्तीय मांगों को लेकर प्रधानमंत्री से दिल्ली में उनकी मुलाकात के बाद ये कयास जोर पकड़ने लगे कि वे केंद्र से टकराने के खतरों को भांप चुकी हैं और अब अपना  ध्यान केवल प. बंगाल में लगाएंगी | उस दृष्टि से प. बंगाल में सभी लोकसभा सीटों पर लड़ने का उनका ऐलान विपक्षी एकता की राह में कांटे बिछाने जैसा ही है | इसी के साथ कांग्रेस का मनोबल तोड़ने के साथ विपक्ष के गठबंधन को तथाकथित कहकर तृणमूल  परोक्ष रूप से भाजपा की राह आसान बनाने का काम ही कर रही  है | दरअसल उन्हें लगने लगा है कि विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास उनके गले पड़ जाएगा | इसीलिए उन्होंने एकला  चलो की नीति पर चलने का मन बना लिया है | क्षेत्रीय दलों को उनके वर्चस्व वाले राज्यों का चौधरी बना देने का उनका सुझाव विपक्ष की संभावित एकता में पलीता लगाने की कोशिश प्रतीत होती है | तृणमूल के अचानक बदले रुख से लगता है कि ममता दूरगामी राजनीति के मद्देनजर अपने पांसे चल रही हैं जिसका उद्देश्य खुद को मजबूत रखते हुए बाकी विपक्ष को आपस में लड़ने के के लिए छोड़ देना है | इसे भविष्य में भाजपा से नजदीकी बढ़ाने के तौर पर भी देखा जा सकता है | आखिरकार अतीत में भी तो वे एनडीए में रहते हुए वाजपेयी सरकार में मंत्री थीं |

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 22 August 2022

अध्यक्ष को लेकर बनी अनिश्चितता कांग्रेस के लिए नुकसानदेह



देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के लिए पूर्णकालिक अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है | 2019 में मिली करारी हार की  जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद त्याग दिया था | कई महीनों की मान – मनौव्वल के बाद भी वे राजी नहीं हुए और किसी अन्य पर रजामंदी नहीं बनी तब कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर एक बार फिर सोनिया गांधी को ही कमान सौंप दी गई | बीते तीन साल से कांग्रेस में अध्यक्ष के चुनाव को लेकर चर्चा चल रही है | सोनिया जी अस्वस्थतावश इस दायित्व को ठीक से सँभालने में असमर्थ हैं | ऐसे में बात लौट फिरकर राहुल और उनकी बहन प्रियंका वाड्रा पर आ जाती है | लेकिन राहुल की  अस्थिर सोच और उ.प्र चुनाव में प्रियंका की विफलता के कारण अनिश्चितता बनी रही जिसका असर पार्टी की सेहत पर पड़ने से दो दर्जन नेताओं द्वारा जी – 23 नामक समूह बनाकर आंतरिक लोकतंत्र की बहाली हेतु आवाज उठाई गई | उनमें से कपिल सिब्बल तो सपा की  टिकिट पर राज्यसभा में आ भी गये | बाकी के भले ही पार्टी में बने हुए हैं लेकिन उनकी नाराजगी का आलम ये हैं कि गुलाम नबी आजाद ने जम्मू कश्मीर और  आनन्द शर्मा ने हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव अभियान का प्रभारी बनाये जाने पर त्यागपत्र दे दिया | चौतरफा दबाव के बाद अब कांग्रेस में नया अध्यक्ष चुनने के लिये कवायद शुरू हुई है | बीते तीन सालों से ये माना जाता रहा है कि राहुल ही  फिर से पार्टी की बागडोर संभालेंगे क्योंकि ज्यादातर कांग्रेसजन मानते हैं कि गांधी परिवार के बिना पार्टी को एकजुट रखना असंभव होगा | लेकिन आम जनता के बीच पार्टी का चेहरा बने रहने के बाद भी राहुल अध्यक्ष बनने से बचते रहे | जहां तक बात प्रियंका की है तो उ.प्र में कांग्रेस का सफाया  होने के बाद उनकी क्षमता पर भी सवालिया निशान लगे हैं | वैसे भी 2019 में अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद राहुल ने ऐलानिया तौर पर कहा था कि अगला अध्यक्ष गैर गांधी होगा | गत दिवस उन्होंने अध्यक्ष बनने से फिर इंकार कर दिया जिसके बाद गैर गांधी अद्यक्ष  को लेकर नए सिरे से कयास लग रहे हैं | लेकिन ये भी सुनने में आ रहा है कि यदि किसी नाम पर सहमति न बनी तब श्रीमती गांधी को ही कार्यकारी अध्यक्ष बनाये रखकर   लोकसभा चुनाव तक काम चलाया जावेगा | ये देखकर इस बात का आश्चर्य होता है कि आजादी के बाद अधिकांश समय देश पर राज करने वाली पार्टी के पास राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने हेतु सक्षम नेता का अभाव हो गया है | हालाँकि ऐसा नहीं है कि जो नाम सामने आये हैं वे जनता के बीच अपरिचित हों या उनका  कोई जनाधार न हो | राज्यसभा के जरिये राजनीति में बने रहे चंद दरबारियों को छोड़ दें तो भी अनेक ऐसे नेता कांग्रेस में हैं जो अपने राज्य में प्रभावशाली होने की वजह से राष्ट्रीय मंच पर भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं | लेकिन दूसरी तरफ ये भी उतना ही सही है कि कांग्रेस में एक अवधारणा सुनियोजित तरीके से स्थापित कर दी गयी है कि गांधी परिवार रूपी संजीवनी के बिना पार्टी का जीवित रहना संभव नहीं  है | यही वजह है कि उसके अति विश्वस्त माने जाने वाले नेताओं को भी पार्टी की कमान सौंपने की सम्भावना आख़िरी क्षण में खत्म कर दी जाती है | ताजा खबर है कि राहुल के इनका करने से उत्पन्न  स्थिति में श्रीमती गांधी की  वर्तमान हैसियत बरकरार रखते हुए उनके साथ कुछ सहायक और जोड़ दिए जाएँ जिससे उन पर ज्यादा बोझ न आये | ऐसे में पार्टी पर परिवार का नियन्त्रण भी बना रहेगा और राहुल त्याग की प्रतिमूर्ति बने रहेंगे | लेकिन गांधी परिवार को ये समझ लेना चाहिये कि कांग्रेस यदि नए नेतृत्व को सामने नहीं लाती तब 2024 आते - आते तक पार्टी के पास जो बची – खुची पूंजी है वह भी खिसक जाये तो अचम्भा नहीं होगा | गुलाम नबी  आजाद और आनंद शर्मा के हालिया निर्णय  खुले संकेत हैं | राहुल को भी ये बात समझ लेनी चाहिए कि कांग्रेस अपनी दम पर आगामी चुनाव में नरेंद्र मोदी का सामना करने में सक्षम नहीं है | और अब तो विपक्ष के बाकी दल भी उसका नेतृत्व स्वीकार करने में हिचक रहे हैं | नीतीश कुमार द्वारा  भाजपा का साथ छोड़ देने के बाद  देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर एक एजेंसी के ताजा सर्वेक्षण में जो निष्कर्ष आये हैं उसमें  हालाँकि लोगों ने कांग्रेस को पूरी तरह नहीं नकारा किन्तु राहुल के बारे में निराशा खुलकर सामने आई है | विपक्ष के जो चेहरे लोगों की पसंद बने उनमें दिल्ली  के मुख्यमंत्री अरविन्द  केजरीवाल हालाँकि नरेंद्र मोदी से काफी पीछे हैं लेकिन राहुल गांधी से बहुत आगे | और यही बात कांग्रेस की चिंता का विषय होना चाहिए | वैसे भी आम आदमी पार्टी इस बात को लोगों के मन – मस्तिष्क में बिठाने में कामयाब हो रही है कि भाजपा का विकल्प बनने की  ताकत कांग्रेस में नहीं बची और श्री केजरीवाल ही आगामी लोकसभा चुनाव में श्री मोदी के मुकाबला करने का दम रखते हैं | हालाँकि 2024 आने में अभी देर है और तब तक देश की राजनीति में न जाने कौन से परिवर्तन हो जाएँ लेकिन इतना तो सच है कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर में आ पहुँची और उनके अध्यक्ष पद छोड़ देने के बावजूद जिस तरह से पार्टी अभी तक उनके परिवार की गिरफ्त में ही  है उसके कारण आम जनता के मन में उसके प्रति आकर्षण खत्म होने लगा है | पंजाब और राजस्थान की  अंतर्कलह रोकने में गांधी परिवार जिस तरह विफल साबित हुआ उससे भी पार्टी का भविष्य खतरे में है | गुजरात में आम आदमी पार्टी जिस तेजी से उभर रही है उसे देखते हुए कहा जाने लगा है कि वहां कांग्रेस की बजाय वह भाजपा से मुकाबला करने जा रही है | ऐसे में कांग्रेस को चाहिए कि वह राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर अनिश्चितता समाप्त करते हुए तदर्थवाद से बाहर निकले | यदि उसे गांधी परिवार के अधीन ही रहना है तो फिर राहुल को साहस के साथ जिम्मेदारी सम्भालना चाहिए | आधे – अधूरे मन से राजनीति करने का ज़माना  खत्म हो चुका  है | हालाँकि श्री गांधी अगले महीने से देश की पदयात्रा पर निकल रहे हैं | लेकिन यदि वे पार्टी के अध्यक्ष नहीं बने तब उनकी यात्रा को अपेक्षित प्रतिसाद नहीं मिल सकेगा क्योंकि बाकी विपक्षी पार्टियों को भी उनमें संभावना नजर आनी बंद हो चुकी है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 20 August 2022

नए मतदाता : अब्दुल्ला और महबूबा को बपौती खत्म होने का भय



जम्मू कश्मीर की राजनीति में नया उबाल आ गया है | निर्वाचन आयोग ने निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए लगभग 25 लाख नए मतदाता जोड़े जाने की बात कही है | इसमें 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं के अलावा राज्य में निवास करने वाले गैर कश्मीरी कर्मचारी , छात्र , मजदूर या सामान्य रूप से रहने वाला कोई भी अन्य व्यक्ति मतदाता बन सकेगा जबकि धारा 370 के रहते तक  राज्य का स्थायी निवासी ही मतदाता बन सकता था | इस धारा को  विलोपित करने के साथ ही  लद्दाख को अलग केन्द्र शासित क्षेत्र  बनाये जाने के बाद विधानसभा सीटों का परिसीमन नए सिरे से किये जाने का  फारुख , उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती सहित घाटी के अन्य अलगाववादी नेताओं द्वारा इस आधार पर विरोध किया गया कि जम्मू क्षेत्र में सीटें बढ़ जाने से घाटी का वर्चस्व कम हो जाएगा  |  और अब 25 लाख नए मतदाता जोड़े जाने के  फैसले से  घाटी के राजनीतिक दलों के पेट में खलबली मच गयी है क्योंकि राज्य के मूल निवासी न होने के कारण वे अलगाववाद के विरोध में राष्ट्रीय एकता और अखंडता के पक्ष में मतदान कर सकते हैं | जम्मू के हिन्दू बहुल क्षेत्र में तो राष्ट्रवादी धारा  सदैव बहती रही लेकिन घाटी में शुरू से ही 90 फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम होने से उसे देश की मुख्यधारा से काटे रखने में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार कामयाब होते रहे | हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे संगठन भी जम्मू में पांव नहीं जमा सके जबकि घाटी में भारत विरोधी माहौल बनाने में उन्हें कामयाबी मिली  | 2019 में धारा 370 विलोपित कर  जम्मू कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति खत्म कर दी गई | जिसके परिणामस्वरूप  इस राज्य में जाकर बसने पर लगी बंदिश भी नहीं रही  | उस फैसले के बाद से विधानसभा भंग चल रही है | नए परिसीमन के बाद चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों को अंतिम रूप देने के तहत नए मतदता जोड़ने का फैसला लिया  | इसका विरोध कर रहे  घाटी के नेताओं का  कहना है कि 25 लाख नए मतदाता शामिल करने का उद्देश्य राजनीतिक संतुलन भाजपा के पक्ष में झुकाना है | विशेष  रूप से घाटी के भीतर  अन्य राज्यों के मतदाताओं को मत देने का अवसर मिलने पर  नेशनल   कांफ्रेंस और पीडीपी के अलावा बाकी छोटी – छोटी पार्टियों की चौधराहट के लिए खतरा पैदा हो जाएगा | अब तक जितने भी चुनाव हुए उनमें घाटी सदैव राष्ट्रीय धारा के विरुद्ध जाती रही है | पहले कांग्रेस और फिर  भाजपा ने घाटी में पैर ज़माने के काफी प्रयास किये लेकिन वहां के लोगों के मन में जो जहर अलगाववादी नेताओं द्वारा भरा जाता रहा उसके कारण वे राष्ट्रीय पार्टियों को  तिरस्कृत करते रहे | परिसीमन के कारण नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी पहले ही परेशान थे और ऊपर से राज्य में रह रहे गैर कश्मीरियों को मताधिकार दिए जाने की खबर आ गई | वैसे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार का डर अपनी जगह ठीक है क्योंकि जम्मू कश्मीर में अस्थायी तौर पर रह रहे 25 लाख  मतदाताओं के नाम जोड़े जाने से राज्य का चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है | घाटी के अलगाववादी नेताओं को ये बात समझ में आने लगी है कि  नए मतदाता उनके चंगुल में फंसने से रहे और उनका मत निश्चित रूप से राष्ट्रवादी शक्तियों को मजबूत बनाने के लिए जायेगा जिससे नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी का वर्चस्व खत्म होना तय है | सवाल ये है कि जब  कश्मीर घाटी के नेताओं को केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में पूरे देश पर राज करने वाली व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाता रहा तब वे किस मुंह से घाटी को देश से अलग मानते हैं ? महबूबा मुफ्ती के पिता स्व. मुफ्ती मो. सईद तो 1989 में वी.पी सिंह सरकार में गृहमंत्री तक बनाये गये थे | फारुख और उनके बेटे उमर भी केंद्र में मंत्री रह चुके हैं | फारुख का नाम हाल ही में  ममता बैनर्जी ने  राष्ट्रपति हेतु भी  आगे बढ़ाया था | कश्मीर घाटी के अनेक लोग देश के अन्य हिस्सों में काम करते हैं | हजारों छात्र भी दूसरे राज्यों में अध्ययनरत हैं | उच्च शिक्षा के  संस्थानों में जम्मू कश्मीर के लिए विशेष कोटा रहा है | ऐसे में घाटी  के नेता किस हक  से गैर कश्मीरी अस्थायी रहवासियों को मताधिकार देने का विरोध कर रहे हैं ? रही बात उनके प्रभावक्षेत्र के घटने की तो धारा 370  हटने के बाद कश्मीर घाटी भी देश के अन्य हिस्सों की तरह हो चुकी है , जहाँ कोई भी जाकर रह सकता है | ये बात  जरूर है कि आतंकवाद के कारण इस दिशा  में अपेक्षानुसार प्रगति नहीं हुई | ये बात भी काबिले गौर है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी भी उम्मीद के  मुताबिक नहीं हो पा रही क्योंकि पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी घाटी में रह रहे पंडितों की हत्या कर डर का माहौल बनाये हुए हैं | ये बात सौ फीसदी सही है कि कश्मीर घाटी के मुस्लिम स्वरूप को एकाएक बदले बिना वहां अलगाववाद को समाप्त करना संभव नहीं है | हिन्दुओं और सिखों की जो आबादी फ़िलहाल वहां रह रही है वह भी जब पूर्णरूपेण सुरक्षित नहीं है तब नए लोगों का वहां आकर बसना मौजूदा हालात में तो मुमकिन नजर नहीं आता | लेकिन घाटी का राजनीतिक संतुलन नए मतदाताओं को शामिल कर बदलते हुए अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार का वर्चस्व कम किया जा सके तो वहां  मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति का श्री गणेश हो सकता है | इसलिए चुनाव आयोग को बिना विरोध की परवाह किये जम्मू कश्मीर में अस्थायी रूप से रह रहे लोगों को मतदान का अधिकार प्रदान कर देना चाहिए | उस दृष्टि से आगामी विधानसभा चुनाव इस समस्याग्रस्त राज्य के साथ ही देश के  लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होगा | धारा 370 हटाकर जम्मू कश्मीर को देश के अन्य राज्यों जैसा बना देने के बाद अब वहां ऐसी सरकार की  जरूरत ही जो पूरी तरह से अलगाववादी सोच से मुक्त हो | इस साल  रिकॉर्ड संख्या में सैलानी घाटी में आये थे जिससे वहां आर्थिक गतिविधियाँ तेज हुई हैं | अब जरूरत ऐसी राज्य सरकार की है जो भारत की एकता और अखंडता के लिए प्रतिबद्ध हो | नए मतदाता इस उद्देश्य को पूरा करने में सहायक होंगे ये उम्मीद की जा सकती है और इसी वजह से अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के पेट में मरोड़ होने लगा है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 August 2022

बिहार में आई बहार , कानून मंत्री फरार



राजनीति के अपराधीकरण को लेकर उपदेशात्मक बातें तो सभी  करते हैं लेकिन जब उनका पालन करने का समय आता है तब व्यवहारिकता बीच में आ जाती है | ये बात बिलकुल सही है कि महज आरोप लगने से किसी को अपराधी मान लेना उचित नहीं है | अदालत द्वारा दण्डित  किये जाने पर ही व्यक्ति दोषी कहा जाता है किन्तु जब बात नैतिकता और शुचिता की हो तब मापदंड बदल जाते हैं | गांधी , लोहिया और दीनदयाल नामक जो तीन राजनीतिक धाराएँ इस देश की राजनीति में  दिशा निर्देशक रहीं हैं उनमें नैतिकता के महत्व और जरूरत को स्वीकार किया जाता है | यहाँ मार्क्स और माओ के अनुयायियों की बात इसलिए नहीं की जा रही क्योंकि उनके लिए  भारतीय आदर्श बेमानी हैं और वे सत्ता के लिए खून बहाने की मानसिकता से प्रेरित हैं | आजादी के 75 साल पूरे होने पर समूचे देश ने स्वाधीनता संग्राम के महानायकों के योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके द्वारा स्थापित आदर्शों का अनुसरण करने का संकल्प भी लिया | आजादी के बाद की प्रारंभिक राजनीति में नीति , नीयत और नैतिकता के समावेश पर भी खूब विमर्श सुनने –  देखने मिला परन्तु बिहार में नई – नई बनी महा गठबंधन सरकार में कानून मंत्री बनाये गए कार्तिकेय सिंह की  आपराधिक पृष्ठभूमि सामने आने के बाद ये कहना पूरी तरह सही होगा कि सत्ता और नैतिकता का कोई रिश्ता नहीं रह गया है | इस बारे में ज्ञात हुआ है कि बरसों  पुराने अपहरण के मामले में उनका नाम है | गत 12 अगस्त को अदालत ने अग्रिम जमानत की  अर्जी पर विचार करते हुए आगामी 1 सितम्बर तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक भी लगा दी थी | लेकिन 16 अगस्त को मामले की सुनवाई पर जब वे हाजिर नहीं हुए तब उनके विरुद्ध वारंट जारी किया गया | विपक्ष का आरोप है कि जिस समय कार्तिकेय को अदालत में उपस्थित रहना उसी समय वे मंत्री पद की  शपथ ले रहे थे और जिसके बाद उनको कानून मंत्रालय दे दिया गया | यद्यपि बिहार जैसे राज्य की राजनीति में नैतिकता ख़ास मायने नहीं रखती क्योंकि लालू प्रसाद  यादव ने अपने शासनकाल में अपराधियों को जिस तरह से संरक्षण और प्रोत्साहन दिया उसके कारण ये  तत्व राजनीति पर कब्जा करने में सफल हो गए | बावजूद इसके नीतीश कुमार उन नेताओं में थे जिन्होंने लालू का  विरोध करने का साहस दिखाया और सफल भी हुए | उनको सुशासन बाबू का ख़िताब भी इसी वजह से हासिल भी हुआ | लेकिन हालिया राजनीतिक परिवर्तन के बाद उन्होंने जिस तरह से लालू के परिवार के समक्ष घुटने टेके उससे लगने लगा है कि वे अपनी साफ़ – सुथरी छवि को भी मुख्यमंत्री की गद्दी पर बने रहने के  लिए दांव पर लगाने तैयार हो गये हैं | कार्तिकेय पर भाजपा नेताओं द्वारा लगाए गये आरोपों से लालू जिस तरह बौखलाए वह तो फिर भी समझ  में आने वाली बात है क्योंकि उनकी राजनीति ऐसे लोगों के बलबूते पर ही चलती रही है | लेकिन बिहार के मुख्यंमत्री पद पर बरसों से काबिज नीतीश का ये कहना गले नहीं उतरता कि उनको कार्तिकेय प्रकरण की जानकारी नहीं थी | एक बार मान भी लें कि वे उनके विरुद्ध अदालत द्वारा जारी वारंट से अनभिज्ञ थे तब भी विपक्ष द्वारा मुद्दा उठाये जाते ही पुलिस और प्रशासन से कहकर उनकी पूरी कर्मपत्री हासिल कर सकते थे | लेकिन उन्होंने इन पंक्तियों के लिखे जाने तक न तो कार्तिकेय को पाक साफ़ ठहराया और न ही उन्हें मंत्री पद से हटाया |  इस बारे में मंत्री जी के अधिवक्ता का कहना है कि उन पर कई साल  पहले  अपहरण का प्रकरण दर्ज हुआ था | लेकिन पुलिस ने प्रारंभिक जाँच के बाद ही उन्हें निर्दोष मानकर तत्संबंधी जानकारी अदालत में भी पेश कर दी थी | लेकिन उसके बाद भी वारंट के जारी होने से सवाल उठना स्वाभाविक है | रही बात मुख्यमंत्री की अनभिज्ञता की तो अब जबकि वे जान चुके हैं तब तो  उन्हें कार्तिकेय को मंत्री बनाये रखने पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि जिस सरकार का कानून मंत्री ही अपहरण जैसे मामले में फंसा हो तो उसकी छवि को लेकर कैसी अवधारणा जनमानस में बनेगी ये बताने की जरूरत नहीं है | वैसे वास्तविकता तो ये है कि नीतीश ने अपने हाथ से अपने पर काट लिए हैं | उनके मंत्रीमंडल में लालू की  पार्टी के मंत्रियों की भरमार है | तेजस्वी और तेजप्रताप दोनों को मंत्री बनाने से साबित हो गया कि मुख्यमंत्री ने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया है | हालाँकि केवल नीतीश को ही इसके लिए कसूरवार ठहराना एकपक्षीय सोच होगी क्योंकि अपराधी से परहेज करने की सोच राजनीति में पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है | क्षेत्रीय पार्टियों पर तो  अपराधी तत्वों का दबदबा किसी से छिपा नहीं रहा लेकिन अब भाजपा और कांग्रेस भी इससे मुक्त नहीं रहीं | इसीलिये इस सम्बन्ध में की जाने वाली आलोचना वजनदारी नहीं रखती | हालाँकि लालू  की पार्टी के एक नेता ने कार्तिकेय के बारे में विचार किये जाने की बात कही है , वहीं इस सरकार को समर्थन कर रही भाकपा माले ने  नीतीश और तेजस्वी से इस  बारे में पुनर्विचार न होने पर  समर्थन वापिस लेने की धमकी भी दे डाली | कार्तिकेय अपहरण के मामले में अदालत द्वारा दोषी पाए जाते हैं या बरी किये जावेंगे ये कहना कठिन है लेकिन इस विवाद की वजह से नीतीश कुमार और उनकी नई नवेली सरकार के लिए सिर मुंडाते ही ओले पड़ने वाली कहावत चरितार्थ हो गई | रही बात भाजपा अथवा अन्य  किसी के द्वारा की जा रही आलोचना की तो घूम – फिरकर बात वहीं  आ जाती है कि पहला पत्थर वह मारे जिसने कभी कोई पाप न किया हो | लगता है हमाम में सभी के निर्वस्त्र होने वाली उक्ति आज की भारतीय राजनीति के लिए ही बनी थी |  

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 17 August 2022

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग की शुरुआत अपने दल से ही करें प्रधानमंत्री



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनसंवाद की कला में बेहद पारंगत हैं | किसी भी सार्वजनिक आयोजन में उनका उद्बोधन देश के विकास और भविष्य पर केन्द्रित रहता है | दो दिन पूर्व नौवीं बार लालकिले की प्राचीर से लगभग 86 मिनिट तक उन्होंने देश और दुनिया की बातें कीं | मौका चूंकि स्वाधीनता के अमृत महोत्सव का था लिहाजा भाषण का पहला हिस्सा स्वाधीनता सेनानियों और अन्य महापुरुषों के प्रति सम्मान व्यक्त करने पर केन्द्रित रहा और तदुपरांत वे मौजूदा समस्याओं और  25 वर्ष बाद के भारत के संभावित चित्र में अपनी कल्पनाओं के रंग भरने में जुट गये | इस दौरान प्रधानमंत्री ने पांच प्रण करने का आह्वान किया | ये हैं भारत को विकसित राष्ट्र बनाना , मानसिक गुलामी से मुक्ति , अपनी विरासत पर गर्व , एकता और एकजुटता तथा नागरिक कर्तव्यों का बोध | निश्चित रूप से इन पंचभूत संकल्पों से कोई असहमत नहीं हो सकता क्योंकि इनके जरिये भारत न केवल विकसित अपितु सुसंस्कृत , संगठित  और अनुशासित देश बन सकेगा |  प्रधानमंत्री ने 2047 में आजादी की शताब्दि तक के 25 वर्ष को अमृतकाल बताते हुए युवाओं से कहा कि ये उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होगा क्योंकि भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने में उन्हें अपना महत्वपूर्ण योगदान देने का अवसर मिलेगा | बीते कुछ समय से वे चूंकि रेवड़ी राजनीति के दुष्प्रभावों पर बोलते आ रहे थे इसलिए बीते वर्षों के विपरीत उनकी तरफ से किसी भी प्रकार की नई सौगात अथवा  कार्यक्रम की घोषणा नहीं की गयी | लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे जरूर रहे जिन पर उन्होंने सांकेतिक शैली में अपनी बात कही जिनमें सबसे प्रमुख थे भ्रष्टाचार और परिवारवाद | जहाँ तक बात परिवारवाद की है तो वह राजनीतिक दलों द्वारा विकसित संस्कृति के रूप में स्थापित बुराई है | लेकिन भ्रष्टाचार तो  समूची व्यवस्था से लिपटी विषबेल  है जिसे जितना काटो  उतना फैलती जा रही है | इसकी शुरुवात कब , कैसे और किसके द्वारा की गई ये शोध का विषय है किन्तु  ये वास्तविकता है  कि बीते 75 साल में  हम आजादी के समय तय किये गए लक्ष्यों के अनुरूप विकसित देशों की बराबरी नहीं कर सके तो उसकी सबसे बड़ी वजह भ्रष्टाचार ही है | श्री मोदी ने आयकर विभाग और ईडी के छापों में बड़ी मात्रा में बरामद हो रहे काले धन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि देश के करोड़ों लोगों के पास रहने की जगह नहीं है वहीं  कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके पास काला धन रखने के लिए  जगह कम पड़ रही है | उनका इशारा संभवतः कोलकाता में ममता सरकार के वरिष्ट मंत्री पार्थ चटर्जी के ठिकानों से बरामद 50 करोड़ की तरफ रहा होगा | दरअसल  देश में आये दिन किसी न किसी के पास छापों में करोड़ों की नगदी और काली कमाई से अर्जित संपत्ति का खुलासा होता है | पार्थ चटर्जी तो  मंत्री रहे लेकिन अदना से सरकारी लिपिकों , पुलिस कर्मियों और ग्राम पंचायत के सचिव जैसों के यहाँ जब बेहिसाब नोटों के  बण्डल जप्त होते हैं तब भ्रष्टाचार को प्रमाणित करने के लिए किसी जांच आयोग की जरूरत महसूस नहीं होती | उस दृष्टि से उसके विरुद्ध निर्णायक लड़ाई का आह्वान उद्बोधन की मुख्य बात मानी जानी चाहिये क्योंकि इस पर काबू किये बिना देश  एक कदम आगे , दो कदम पीछे की स्थिति में बना रहेगा  | लेकिन भ्रष्टाचार से लड़ने में सफलता के लिए प्रधानमंत्री को शुरुआत  अपने घर अर्थात भाजपा से करनी होगी और दूसरी बात अगला चुनाव जीतने के दबाव से मुक्त होकर कदम उठाने होंगे | आज केंद्र के साथ ही देश के बड़े हिस्से में भाजपा का राज है | श्री मोदी तो भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हैं लेकिन क्या राज्यों में कार्यरत भाजपा सरकारों को ये प्रमाणपत्र दिया जा सकता है ? म.प्र और हाल ही में बनी महाराष्ट्र की सरकार में दूसरी पार्टी से आये विधायकों में से अनेक दागदार होने के बावजूद मंत्री बना दिए गए या फिर  उनकी घेराबंदी में ढील दे दी गई | टीवी पर होने वाली बहसों में भाजपा के प्रवक्ता इस सवाल का जवाब देने से बचते नजर आते हैं कि आयकर और ईडी वालों को भाजपा नेताओं या उसके साथ जुड़े कारोबारियों में कोई भी भ्रष्ट क्यों नहीं लगता ? केंद्र सरकार के प्रयासों से देश भर में वैश्विक स्तर के राजमार्गों का जो निर्माण हो रहा है उसके प्रति हर किसी के मन में प्रशंसा का भाव है लेकिन भाजपा शासित राज्यों की सरकारों द्वारा बनाये जाने वाले प्रादेशिक राजमार्गों के निर्माण में होने वाले भ्रष्टाचार को लेकर आम जन क्या कहते हैं इसका संज्ञान लिया जाना भी जरूरी है | इसी तरह सरकारी नौकरियों में होने वाला लेन देन भाजपा की हुकूमत वाले राज्यों में भी बेरोकटोक जारी है | इस हेतु ली  जाने वाली परीक्षाओं के पर्चे लीक होने से वे आगे बढ़ जाती हैं | परीक्षाओं के बाद साक्षात्कार हो जाने पर भी नियुक्तियां होने में बरसों - बरस बीत जाते हैं | प्रधानमंत्री आवास योजना हेतु मिलने वाली राशि के वितरण में सरकारी अमला और सरपंच  खुलकर घूसखोरी करते हैं | स्थानीय निकायों में मकान का नक्शा बिना चढ़ोत्री के स्वीकृत  नहीं होता | बिना घूस खिलाये व्यावसायिक निर्माण की अनुमति मिलना तो सपने देखने जैसा है | शराब और खनन के ठेकों में जितना भ्रष्टाचार अन्य राज्यों में है उतना ही भाजपाई सरकारों की छत्रछाया में चल रहा है | परिवहन विभाग में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने यद्यपि काफी सुधार किये हैं लेकिन आरटीओ का नाम लेते ही भ्रष्टाचार की बू आने लगती है | आशय ये है कि जिस तरह श्री मोदी ने गुजरात में  मुख्यमंत्री रहते हुए विकास का एक मॉडल पेश किया था वैसा ही प्रयास उन्हें भाजपा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार  मुक्त शासन व्यवस्था बनाने के लिए करना चाहिए जिससे पार्टी विथ डिफ़रेंस का दावा जमीनी तौर पर सही साबित हो सके | प्रधानमंत्री ने 2047  में आजादी की शताब्दि तक जिस अमृत काल की बात की है यदि उस दौरान केवल भ्रष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था बनाने का लक्ष्य सामने रखकर उस पर काम  किया जावे तभी  भारत को विकसित देश बनाने का सपना साकार हो सकता  है | यद्यपि  भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हैं जिन्हें उखाड़ना आसान नहीं है | लेकिन देश को बर्बादी और विखंडन से बचाना है तो श्री मोदी को बिना लिहाज किये  कदम बढाने होंगे | और ऐसा करने पर उन्हें जनता का साथ भी खुलकर मिलेगा क्योंकि भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा पीड़ित वही है | प्रधानमंत्री से देश को अपेक्षा है कि वे अपनी तरह ही  भाजपा को भी  भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त करने का दुस्साहस करेंगे | सही  बात ये है कि आज के  परिदृश्य में वे ही ऐसे व्यक्ति हैं जिनमें कठोर फैसले करने का माद्दा है | ऐसे में उन्हें चाहिए लोकसभा चुनाव के पहले तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने आह्वान के अनुरूप कड़े से कड़े कदम उठायें जिससे विकास की गति और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि हो | वरना हर साल 15 अगस्त आता रहेगा और हम अच्छे – अच्छे भाषण सुनकर फिर उसी ढर्रे पर लौट आयेंगें जो बीते 75 साल से हमारे जीवन के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है |

-रवीन्द्र वाजपेयी