Thursday, 8 September 2022

नये मुद्दे और अच्छी छवि के बिना राजनीतिक यात्रा सफल नहीं होती



कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भारतीय राजनीति के ऐसे पात्र हैं जिनकी भूमिका आज तक निर्धारित नहीं हो सकी | पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद भी वे अनमने तरीके से काम करते देखे गए | पिछले लोकसभा चुनाव में निराशाजनक परिणाम के बाद उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ते हुए ऐलान कर दिया कि गांधी नामधारी अध्यक्ष  नहीं बनेगा | उसके बाद भी उनकी मनुहार चली किन्तु  अंत में सोनिया गांधी को ही कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर परिवार का आधिपत्य रखा गया | इतना ही नहीं प्रियंका वाड्रा का दखल भी बढ़ता  गया | जिसका खामियाजा पंजाब की हार के रूप में सामने आया | राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के  शीतयुद्ध के पीछे भी गांधी  परिवार की शह है | उ.प्र की कमान श्रीमती वाड्रा को सौंपने का परिणाम भी बुरा रहा  | इसके साथ ही राहुल द्वारा  कुछ न रहते हुए भी सब कुछ बने रहने की नीति के विरुद्ध लगभग दो दर्जन नेताओं ने मोर्चा खोल दिया | कुछ तो पार्टी से बाहर निकल गये वहीं कुछ बाहर जाने का रास्ता तलाश रहे हैं | ज्यादा दबाव बना तो संगठन के चुनाव की तारीख भी तय कर दी गयी | राहुल की अनिच्छा की आड़ में  अनेक नाम सामने आने लगे | ये आरोप भी उछले कि मतदाता सूचियों में गड़बड़ की जा रही है | बात आगे बढ़ती उसके पहले ही श्री गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा का कार्यक्रम घोषित कर दिया जिसका गत दिवस कन्याकुमारी से शुभारम्भ भी हो गया  | 3500 किमी से ज्यादा दूरी की इस यात्रा के बारे में  प्रचारित किया जा रहा है कि इससे कांग्रेस में नई ऊर्जा का संचार होगा और वह जनता से एक बार फिर जुड़ सकेगी | कहा जा रहा है कि स्व. चन्द्रशेखर , लालकृष्ण आडवाणी और आन्ध्र के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी द्वारा निकाली गयी यात्राओं के बाद हुए सत्ता परिवर्तन की तर्ज पर श्री गांधी की यह यात्रा भी 2024 में केंद्र की सत्ता में कांग्रेस की वापसी का रास्ता तैयार करेगी  | यात्रा ऐसे समय हो रही है जब तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसी रेड्डी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  विपक्ष का गठबंधन बनाने हाथ पाँव मार रहे हैं |  3500 किमी की दूरी 150 दिनों में पूरी होने की योजना है | अर्थात गुजरात चुनाव इसी के बीच हो जायेंगे | यात्रा का उद्देश्य  देश में व्याप्त भय , कट्टरता , बेरोजगारी और विषमता जैसी समस्याओं पर मौजूदा केंद्र सरकार के विरुद्ध जनमत तैयार करना है | संभवतः श्री गांधी के सलाहकारों ने उन्हें ये समझाया है कि लम्बे समय से राष्ट्रीय राजनीति में बने रहने के बावजूद वे जननेता नहीं बन पाए क्योंकि उनका जनता से सीधा जुड़ाव नहीं है | और इसी वजह से वे अमेठी के पुश्तैनी गढ़ में बुरी तरह हारे | भले ही समाचार माध्यम उन्हें सुर्खियों में रखते हों लेकिन आम जनता के बीच आज भी उनकी छवि ऐसे नेता की है जिसे सब  कुछ विरासत में मिला | ये कटाक्ष भी सुनने मिल रहा है कि जब वे पार्टी को ही जोड़कर नहीं रख पा रहे तब भारत जोड़ो अभियान का औचित्य क्या है ? ये भी कहा जा रहा है कि यात्रा का उद्देश्य कांग्रेस में चल रहे शीतयुद्ध को ठंडा करना है | वैसे भी जो मुद्दे यात्रा के दौरान उठाये जाने की बात कही जा रही है वे तो श्री गांधी आये दिन उठाते रहते हैं | और ये भी कि उनका जनता पर कोई असर नहीं पड़ रहा वरना कुछ माह पहले पांच राज्यों के जो चुनाव हुए उनमें काग्रेस का सफाया न होता | साथ ही ये भी ध्यान देने योग्य बात है कि गुजरात के आगामी चुनाव में  विश्लेषक आम आदमी पार्टी को कांग्रेस से ज्यादा प्रभावशाली बता रहे हैं | इस  यात्रा में कांग्रेस के वे सभी बड़े नेता राहुल के इर्द गिर्द दिखेंगे  जिन्हें अभी भी गांधी परिवार में ही पार्टी का भविष्य नजर आता है | लेकिन ऐसी यात्राओं का लाभ तभी मिलता है जब नेता के पीछे पार्टी का संगठन तो हो ही किन्तु उससे भी बड़ी बात होती है मुद्दा | चूंकि श्री गांधी कोई भी ऐसी नई बात नहीं कह रहे जो अन्य विपक्षी नेता न बोलते हों इसलिए यात्रा एक तमाशा भी साबित हो सकती है  | इस बारे में उन्हें और कांग्रेस दोनों को ये ध्यान रखना चाहिए कि स्व. चन्द्रशेखर एक जमीनी नेता रहे जिनकी एक अलग पहिचान थी | तीखे समाजवादी तेवरों की कारण उन्होंने कांग्रेस में रहकर भी उस दौर की सबसे शक्तिशाली नेता स्व. इंदिरा गांधी से भी टकराने का साहस दिखाया | जहां तक लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा की बात थी तो उसके साथ राममंदिर मुद्दा जुड़ा होने से वह कामयाब रही  | लेकिन 2004 में वाजपेयी सरकार के पतन के बाद निकाली गईं यात्राओं में वे वैसा उत्साह नहीं जगा सके क्योंकि उनकी प्रधानमंत्री बनने की चाहत साफ़ तौर पर दिख रही थी | रही बात जगन मोहन की तो राज्यों में चुनाव के पहले नेताओं द्वारा निक़ाली जाने वाली यात्राओं को पहले  भी सफलता मिलती रही है | उस लिहाज से भारत जोड़ो यात्रा राष्ट्रीय स्वरूप तो लिए हुए है लेकिन इसे सैद्धांतिक जामा पहिनाने की कोशिश  शायद ही सफल हो सकेगी क्योंकि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा बहुत बुरी स्थिति में है | दूसरी बात इसके साथ ये भी जुड़ गई  कि इसका मकसद येन केन प्रकारेण पार्टी पर श्री गांधी का कब्जा बनाये रखना है | चूंकि यात्रा के केन्द्रीय व्यक्तित्व की छवि एक गम्भीर और परिपक्व नेता की नहीं  है इसलिये  ज्यादा आशा करना उचित नहीं लगता | बेहतर होता श्री गांधी कांग्रेस के संगठन चुनाव संपन्न होने के बाद यह करते | सही बात ये है कि यदि कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में अपना खोया स्थान प्राप्त करना चाहती है तब उसे अपना घर ठीक करना पड़ेगा | उसके लिए ये गहन चिन्तन का विषय है कि भाजपा विरोधी जिस विपक्षी मोर्चे की पहल हो रही है उसकी बागडोर कांग्रेस के हाथ से निकलकर क्षेत्रीय नेताओं के पास है और कुछ प्रादेशिक पार्टियाँ उसके साथ हाथ मिलाने तक को राजी नहीं हैं | आशय ये है कि जब श्री गांधी को कांग्रेस के बिखराव को रोकने के उपाय करने चाहिए थे  तब  वे देश भ्रमण पर चल पड़े  | इससे उन्हें और कांग्रेस को क्या हासिल होगा ये इस बात पर निर्भर होगा कि यात्रा के दौरान भी असंतुष्ट नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला जारी रहता है या नहीं ?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 September 2022

बिल्डर , लीडर और अफसर की तिकड़ी है अवैध निर्माणों की जिम्मेदार


बीते दिनों जब दिल्ली का हिस्सा बन चुके नोएडा में 29 और 32 मंजिला दो गगनचुम्बी आवासीय इमारतें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर गिराई गईं तब ये सवाल उठा था कि नियमों को धता बताते हुए स्वीकृत नक़्शे से अलग निर्मित उन अट्टालिकाओं के खड़े हो जाने तक सम्बंधित विभाग के अधिकारयों ने उनका निर्माण रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया ? गत सप्ताह उ.प्र की राजधानी लखनऊ के एक होटल में आग लगने से चार लोगों की मृत्यु हो गयी | जाँच में सामने आया कि उसका नक्शा ही स्वीकृत नहीं था | अब उसे गिराए जानेकी कार्रवाई हो जा रही है | साथ ही होटल मालिक के विरुद्ध भी मामला दर्ज कर लिया गया | ये होटल लखनऊ के सबसे प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्र हजरतगंज में स्थित था | आज खबर आ गयी कि कर्नाटक की राजधानी बेंगुलुरु में उन 600 इमारतों को गिराया जायेगा जो पानी की निकासी में बाधक साबित हुईं | दरअसल बीत दिनों बेंगुलुरु में बारिश ने 90 साल का कीर्तिमान ध्वस्त कर दिया | परिणामस्वरूप पूरा आई . टी कारीडोर जल प्लावित हो गया | उसके बाद प्रशासन की नींद खुली और तब ये बात सामने आई कि अवैध रूप से किये गये सैकड़ों निर्माणों के कारण बरसाती पानी की निकासी के रास्ते अवरुद्ध हो जाने की वजह से समस्या उठ खड़ी हुई | ये बात भी सामने आई कि बेंगुलुरु के ज्यादातर निर्वाचित जनप्रतिनिधि बिल्डर बन बैठे हैं जिनके दबदबे के सामने प्रशासन लाचार बना रहा और गैरकानूनी निर्माण होते चले गये | बीते माह म.प्र में जबलपुर नगर के एक निजी अस्पताल में आग लगने से अनेक लोग मारे गए | उसके बाद ये बात उजागर हुई कि अस्पताल में आग बुझाने के न तो समुचित इंतजाम थे और न ही निकासी का दूसरा द्वार | हादसे के बाद जबलपुर सहित पूरे प्रदेश के अस्पतालों एवं होटलों आदि में अग्निशमन के प्रबंधों का ऑडिट शुरू किया गया और बहुत सारे लायसेंस भी रद्द किये गए | उक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि हमारे देश में आग लगने के बाद कुआ खोदने वाली कहावत आये दिन चरितार्थ होती रहती है और हादसों के बाद ही ऑंखें खोलने का रिवाज है | उक्त सभी घटनाओं में कानून तोड़ने का दुस्साहस और उसका पालन करवाने के लिए जिम्मेदार अमले का हाथ पर हाथ पर धरे बैठे रहना सामान्य है | जिसके पीछे या तो राजनीतिक प्रभाव होता है या फिर पैसे का दबाव | ऊपर दिए सभी उदाहरण बड़े शहरों से सम्बंधित हैं | नोएडा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का प्रमुख केंद्र है , वहीं लखनऊ उ.प्र की राजधानी | बेंगुलुरु तो आई. टी उद्योग की वजह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर का महानगर बन गया है | जबलपुर भी म.प्र के प्रमुख शहरों में से है जहां उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ है | ऐसे में इन शहरों में प्रशासन के बड़े ओहदेदार भी पदस्थ होते हैं | बावजूद उसके यदि इतने बड़े - बड़े अवैध निर्माण हो जाएं जिनके कारण लोगों की जान चली जाए या शहर पानी में डूब जाए तो मोटी – मोटी तनख्वाह और दीगर सुविधाएँ हासिल करने वाले सरकारी अमले की उपयोगिता ही क्या है ? ऊंची – ऊंची गैर कानूनी इमारतें तन जाएँ , बिना फायर ऑडिट के अस्पताल – होटल चलते रहें और किसी महानगर की जल निकासी अवैध निर्माण और अतिक्रमणों के कारण अवरुद्ध हो तो निश्चित रूप से इसे स्थानीय प्रशासन और उसके अधीन काम करने वाले सम्बंधित विभागों का अपराध मानकर वैसी ही दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए जैसे अवैध निर्माण करने वाले के विरुद्ध की जाती है | हालाँकि ये बात भी बेहिचक स्वीकार करनी होगी कि इस तरह के अवैध काम राजनीतिक संरक्षण और समर्थन के बगैर अपवादस्वरूप ही होते हैं | बिल्डर , लीडर और अफसर की तिकड़ी ही ज्यादातर गैरकानूनी निर्माणों के लिए जिम्मेदार होती है | किसी भी हादसे के बाद जब हल्ला मचता है तब निर्माण करवाने वाला तो लपेटे में आ ही जाता है और ज्यादा से ज्यादा निचले स्तर के अधिकारियों पर गाज गिराने का दिखावा होता है परंतु जो बड़े अधिकारी और नेता इस सबके पीछे होते हैं वे दूध के धुले बने रहते हैं | ये कहना गलत न होगा कि व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास खत्म होने के लिए इस तबके को मिला रक्षा कवच ही है | जब तक ये स्थिति बनी रहेगी तब तक इस तरह के हादसों की पुनरावृत्ति भी होती रहेगी | इसलिए जरूरी है कि दुर्घटना के बाद सख्त कदम उठाये जाने के कर्मकांड के बजाय शासन और प्रशासन अवैध निर्माण और अतिक्रमण को प्रारंभिक स्थिति में ही रोकें | हालाँकि भीड़तंत्र इसमें बाधक बनता है लेकिन प्रशासन चाह ले तो किसी भी तरह का अवैध निर्माण नामुमकिन है | इसी तरह अतिक्रमण के मामले में भी शुरुआती सख्ती से समस्या की जड़ों को ही काटा जा सकता है | ये बात इसलिए कही जा सकती है कि राजधानी और अन्य शहरों में जहाँ मंत्री , न्यायाधीश , प्रशासनिक अधिकारी और दूसरे प्रभावशाली लोग रहते हैं , वहां अतिक्रमण और अवैध बस्तियां नजर नहीं आतीं | ये सब देखते हुए हादसों का इंतजार किये बिना गैरकानूनी निर्माणों की जाँच कर उनके अवैध हिस्से को तोड़ा जाए और अतिक्रमण की प्रवृत्ति को भी योजनाबद्ध तरीके से समाप्त किया जावे | अन्यथा आग में लोग जलकर मरते रहेंगे और वैश्विक शहर कहे जाने वाले महानगरों में भी बाढ़ जैसे हालात बनते रहेंगे | सांप के निकल जाने के बाद लकीर पीटने का सिलसिला बंद होना चाहिए |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 6 September 2022

आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की दुश्मनी विपक्षी एकता में रोड़ा

 

गुजरात के चुनाव नजदीक हैं | राजनीतिक दलों द्वारा रस्ते का माल सस्ते में की आवाज लगा – लगाकर मतदाता रूपी ग्राहकों को लुभाने का जतन किया जा रहा है | इस धंधे में अग्रणी कहे जाने वाले आम आदमी पार्टी के संयोजक हर हफ्ते गुजरात जाकर मुफ्त बिजली , शिक्षा , चिकित्सा , बेरोजगारों को हर माह 3 हजार और महिलाओं को 1 हजार भत्ता  देने का  वचनपत्र बाँट रहे हैं | पुराने बिजली देयक माफ़ करने का भी आश्वासन दिया जा रहा है | दिल्ली मॉडल उनके वायदे का आधार है | लेकिन गत दिवस गुजरात गये राहुल गांधी ने भी कांग्रेस की डिस्काउंट सेल लगा दी | इसमें 300 यूनिट मुफ्त बिजली , 10 लाख सरकारी रोजगार , कोरोना में मारे गये लोगों के परिवारों को 4 लाख , लड़कियों को मुफ्त शिक्षा , 3 हजार अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय और रसोई गैस का सिलेंडर महज 500 रु. में देने का ऐलान किया गया है | ज्यों – ज्यों चुनाव नजदीक आते जायेंगे आश्वासनों की सूची  और आकर्षक बना दी जायेगी | चुनावी पंडित इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी को कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा भाव दे रहे हैं | दावा किया जा रहा है कि गुजरात के युवा इस पार्टी के साथ तेजी  से जुड़ रहे हैं | इसका कारण कांग्रेस के कुनबे में आया बिखराव है | श्री  गांधी का दौरा होने के एक दिन पहले राज्य के युवक कांग्रेस अध्यक्ष विश्वनाथ सिंह वाघेला ने पार्टी छोड़ दी | कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल पहले ही भाजपा में जा चुके हैं | दरअसल अहमद पटेल के न रहने के बाद गुजरात में कांग्रेस नेतृत्वशून्य हो चुकी है जिसका लाभ लेने आम आदमी पार्टी पूरे जोर – शोर से लगी है | उसका सोचना है कि यदि वह गुजरात में भाजपा के प्रमुख प्रतिद्वंदी के तौर पर उभर सकी तब राष्ट्रीय स्तर पर बतौर विकल्प उसकी स्वीकार्यता बढ़ जायेगी | शायद इसीलिये राहुल ने गत दिवस इस पार्टी को उसी के हथियार से कमजोर करने का दांव चला | दरअसल आम आदमी पार्टी ने सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस का ही अब तक किया है | दिल्ली के बाद पंजाब में भी उसे ही हराकर सत्ता छीनी | कुछ माह पहले संपन्न विधानसभा चुनावों में उत्तराखंड और गोवा में भी आम आदमी पार्टी का बड़ा हल्ला था लेकिन नतीजों में वह फुस्स साबित हुई लेकिन उसने कांग्रेस का कबाड़ा करवा दिया |  गुजरात में चूंकि कांग्रेस अब तक की सबसे कमजोर स्थिति में है इसलिए आम आदमी पार्टी को ये लग रहा है यदि उसने यहाँ अच्छा प्रदर्शन किया तब वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के किले में सेंध लगाने का दावा करते हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में बड़े खिलाड़ी के तौर पर मैदान में उतरेगी | वैसे लोकसभा चुनाव के पहले विपक्षी मोर्चेबंदी के लिहाज से गुजरात का चुनाव अच्छा अवसर साबित हो सकता है | लेकिन अपने आपको कट्टर ईमानदार कहने वाली आम आदमी पार्टी कांग्रेस से हाथ मिलायेगी इसमें संदेह है | कांग्रेस भी 2014 में भाजपा को रोकने के लिए दिल्ली में श्री केजरीवाल की अल्पमत सरकार को टेका लगाने की सजा आज तक भोग रही  है |  गत दिवस बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली में श्री गांधी  से मुलाकात की थी और  आज वे श्री केजरीवाल से मिल रहे हैं | लेकिन गुजरात में विपक्षी गठबंधन बनाना उनकी विषयसूची में नहीं है | उधर पंजाब में मिली जीत से उत्साहित आम आदमी पार्टी हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस की जड़ें खोदने में जुटी हुई है | ऐसे में सवाल ये है कि क्या नीतीश कुमार और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी रेड्डी जिस विपक्षी एकता के लिये हाथ पाँव मार रहे हैं उसमें आम आदमी पार्टी साथ होगी या नहीं ? ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि श्री केजरीवाल की रणनीति आम आदमी पार्टी को कांग्रेस की जगह भाजपा का विकल्प साबित करना है | ऐसे में कांग्रेस के साथ गठबंधन में  शरीक होना उसकी सम्भावना को कमजोर करने वाला होगा | ये देखते हुए नीतीश , श्री केजरीवाल को विपक्षी मोर्चे में शामिल करवा पाएंगे इसमें संदेह है | गुजरात में श्री गांधी ने गत दिवस जिस तरह के वायदे किये वे आम आदमी पार्टी को परेशान करने वाले हैं क्योंकि यही तो उसकी  भी रणनीति का हिस्सा है | नीतीश कुमार निश्चित तौर पर विपक्ष की उम्मीद के रूप में उभरे हैं लेकिन टुकड़ों में बंटी विपक्षी राजनीति को केवल भाजपा और मोदी विरोध के नाम पर एकजुट करना आसान नहीं है क्योंकि सबके अपने प्रभावक्षेत्र हैं जहां वे किसी और का प्रवेश बर्दाश्त करने तैयार नहीं होते | इसीलिये आम आदमी पार्टी दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस और अकाली दल के लिए सीटें छोड़ने की दरियादिली दिखायेगी ये सम्भव नहीं दिखता | हाल ही में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया के यहाँ सीबीआई के छापे का  कांग्रेस ने जिस तरह स्वागत किया उसके बाद  आम आदमी पार्टी उसके  साथ किसी भी तरह का रिश्ता रखने तैयार नहीं होगी | राजनीतिक विश्लेषक भी अब ये मानने लगे हैं कि श्री मोदी द्वारा कांग्रेस मुक्त भारत का जो नारा दिया गया उसे वास्तविकता में बदलने के  काम में  आम आदमी पार्टी भी अप्रत्यक्ष रूप से  मदद कर रही है | गुजरात और हिमाचल में भाजपा से सत्ता छीनने में जुटी आम आदमी पार्टी यदि मुख्य विपक्ष ही बन बैठी तो वह भी कांग्रेस का बड़ा नुकसान होगा क्योंकि उसकी वजह से 2024 में राहुल की ताजपोशी का सपना हवा हवाई होकर रह जायेगा |


Monday, 5 September 2022

हसीना की मीठी बातों से बचें क्योंकि पहले आये शरणार्थी ही बोझ बने हुए हैं



बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना आज भारत की चार दिनी  यात्रा पर आ रही हैं | हमारे  निकटस्थ पड़ोसियों में बांग्लादेश ही है जिससे अनेक विरोधाभासों के बावजूद आपसी समबन्ध बेहतर हैं | सीमा संबंधी विवादों को दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व द्वारा समझदारी से सुलझा लिए जाने से पूर्व में उत्पन्न तनाव काफी कम हुआ है | इस पड़ोसी के साथ सांस्कृतिक रिश्ते भी काफी प्रगाढ़ हैं | भाषायी समानता की वजह से साहित्य और संगीत के क्षेत्र में काफी साम्यता है | बांग्लादेश में हिन्दू जनसँख्या भी काफी है और उनके धर्मस्थान भी | हालाँकि ये भी कटु सत्य है कि देश के विभाजन के बीज भी अविभाजित बंगाल में पहले अंग्रेजों और  बाद में मुस्लिम नेताओं द्वारा ही बोये गये थे | यद्यपि  1971 में पूर्वी पाकिस्तान की जगह बांग्लादेश नामक नये देश के उदय में भारत की ही भूमिका रही | हमारी सेना ने पाकिस्तानी फौजी अत्याचारों से इसे मुक्त करवाते हुए जो इतिहास रचा उसे भुलाया जाना असम्भव है | शुरुआती दौर में तो सब अच्छा – अच्छा चलता रहा लेकिन 1975 में शेख मुजीब की हत्या के बाद यह देश भारत विरोधी मानसिकता रखने वालों के हाथ आ गया जिन्होंने सारे एहसान भूलकर शत्रुवत व्यवहार करना शुरू कर दिया | सबसे दुखद बात ये रही कि जिस पाकिस्तान ने लगभग ढाई  दशक तक बंगाली अस्मिता को अपमानित किया उसी के साथ मिलकर बांग्लादेश के हुक्मरान भारत में आतंकवादी गतिविधियां संचालित करने वाले इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों को आश्रय देने लगे | भारत में घटित अनेक बड़ी आतंकवादी घटनाओं में इन संगठनों की भूमिका सामने आ चुकी है | ये भी चिंता का विषय है कि शेख हसीना के कार्यकाल में भी बांग्लादेश में हिन्दू धर्मस्थलों पर वैसे ही हमले होते रहते हैं जैसे पाकिस्तान में देखने मिलते रहे | यही नहीं सदियों से वहां रह रहे हिन्दुओं के साथ बांग्लादेशी मुसलमानों का रवैया भी दिन ब दिन खराब होता जा रहा है | ये तो सारी दुनिया जानती है कि 1971 गृहयुद्ध शुरू होते ही  बांग्लादेश से बड़ी संख्या में लोग  सीमा पार करते हुए  भारत में आ गये जिन्हें हमने मानवीयता के आधार पर शरणार्थी शिविरों में बसाया | लेकिन ये वापिस नहीं लौटे और वोट बैंक की राजनीति का लाभ उठाकर नागरिक बन बैठे | आज पूरे देश में इनका फैलाव हो चुका है | प. बंगाल और असम के अलावा बिहार , उड़ीसा , छत्तीसगढ़ और दिल्ली में इनकी संख्या काफी है | असम में तो 1971 के पहले से ही बांग्लादेश से अवैध रूप से आये मुसलमानों को बसाए जाने का षडयंत्र रचा जाता रहा | जिसके कारण बड़े इलाके मुस्लिमबहुल हो गए | प. बंगाल में भी  पहले वामपंथी और बाद  में. ममता सरकार ने बांग्लादेश से आये मुस्लिमों के प्रति नर्म रुख दिखाते हुए उनको स्थायी रूप से बसने में सहायता और संरक्षण दिया | इन विदेशी नागरिकों को वापिस भेजने की बात तो दूर रही इनकी पहिचान करने के लिए की जाने वाली व्यवस्था का भी विरोध एक तबका करता है | बांग्लादेश ने भी आज तक उनकी वापसी की इच्छा नहीं जताई | ये भी सत्य है कि आज भी वहां से अवैध घुसपैठ जारी है | लेकिन बीते कुछ सालों में म्यांमार ( बर्मा ) से आये रोहिंग्या मुसलमान बड़ी समस्या बन गये हैं | इनके साथ सबसे बड़ी समस्या इनका अपराधी प्रवृत्ति का होना है | शुरू – शुरू में तो मानवीय आधार पर भारत ने इनको पनाह दी लेकिन जैसे ही इनके खतरनाक इरादे उजागर हुए त्योंही इनके विरोध में आवाजें उठीं | लेकिन फिर राजनीति आड़े आने लगी और रोहिंग्या भी अनेक शहरों में बसने लगे | देश  विरोधी अनेक घटनाओं में इनका हाथ साबित हुआ  है | ये मूल रूप से किस देश के  हैं इस पर विवाद है | हालाँकि दो – तीन पीढ़ी पहले इनके पूर्वजों का बांग्लादेश से जाकर म्यांमार के सीमावर्ती इलाकों में डेरा ज़माने के प्रमाण मिले हैं | धीरे – धीरे ये वहां समस्या बनने लगे | मूल म्यामांरवासियों के साथ इनके झगड़े जब बेकाबू होने लगे तब वहां  की सेना और सरकार ने सख्ती  दिखाते हुए   इन्हें खदेड़ना शुरू किया जिस पर ये भागकर बांग्लादेश और भारत में आ गये | शेख हसीना की यात्रा इसी  को लेकर है | यहाँ  आने  के पहले ही  उन्होंने कूटनीतिक भाषा में  भारत की शान में कसीदे पढ़ते हुए उनके देश में बसे रोहिंग्या को बोझ बताकर कहा कि भारत बड़ा देश होने के नाते उनका समायोजन  कर बांग्लादेश  की मदद करे | इस बारे में विश्व बिरादरी से रोहिंग्या मुसलमानों को म्यामांर वापस भेजने की  व्यवस्था हेतु  चर्चा किये जाने की बात भी उन्होंने कही | शेख हसीना बेशक भारत की शुभचिन्तक हैं लेकिन रोहिंग्या मुसलमान जितने उनके लिए समस्या हैं उससे ज्यादा भारत के लिए , जो कि पहले से ही बांग्लादेशी शरणार्थियों के बोझ से दबा हुआ  है | और फिर रोहिंग्या तो स्वभाव से ही उपद्रवी हैं जिनके पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवादी संगठनों से रिश्ते उजागर हो चुके हैं | इसके अलावा श्रीलंका में उत्पन्न संकट की वजह से तमिल शरणार्थी भी तमिलनाडु में आ गये हैं | इसीलिये   भारत को शरणार्थियों की आश्रयस्थली  कहा जाने लगा है | उनके कारण न सिर्फ हमारी अर्थव्यवस्था अपितु आन्तरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा हो गया है | शेख हसीना अपने राष्ट्रीय हितों के लिए भारतीय भारतीय नेतृत्व को प्रभावित करने की कोशिश करेंगी | लेकिन उनकी बातों में आने की बजाय हमे उलटे उन पर दबाव बनाना चाहिए कि वे बांग्लादेशी नागरिकों की वापसी का रास्ता निकालें | इसके साथ ही हिन्दू धर्मस्थलों पर होने वाले हमलों और हिन्दुओं के साथ दुर्व्यवहार के प्रति भी नाराजगी खुलकर जतानी चाहिए | हमारी सज्जनता को पड़ोसी देशों द्वारा सदैव कमजोरी समझा गया है जबकि भारत ने हर संकट में मदद का हाथ बढ़ाया  | ऐसे में अब जबकि शरणार्थी समस्या हमारे लिए ही असहनीय बनती जा आ रही है तब शेख हसीना का यह सोचना कि बड़ा देश होने से हम उनके रोहिंग्या शरणार्थियों को भी समायोजित करें , किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चाहिए वे इस बारे में कड़ा रुख अपनाएं वरना निकट भविष्य में ये शरणार्थी हमारे लिए उसी तरह समस्या बन जायेंगे जैसी फ्रांस , जर्मनी , ब्रिटेन आदि भुगत रहे हैं | याचक बनकर आना और फिर मालिक बनकर हक जताना इन शरणार्थियों का चरित्र जो है |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 3 September 2022

ये सम्मान शिक्षकों को मिलने वाले राष्ट्रपति पुरस्कार से भी बढ़ कर है



कहने को तो बात छोटी सी है लेकिन उसके साथ जुड़ा सन्देश आज के माहौल को देखते हुए बहुत बड़ा है | म.प्र के छतरपुर जिले में राजनगर तहसील की सरकारी माध्यमिक शाला में विगत 13 वर्षों से पदस्थ शिक्षक रामगोपाल  बिरौना का स्थानान्तरण उसी तहसील के सरकारी आदर्श  विद्यालय में कर दिया गया जो कि शासकीय सेवा में एक सामान्य प्रक्रिया है | लेकिन उक्त शिक्षक की विदाई के अवसर पर विद्यार्थी फूट – फूटकर रोये | श्री बिरौना गणित जैसे विषय का अध्यापन करते थे जिसे आम तौर पर कठिन कहा जाता है किन्तु जैसा क्षेत्र के अभिभावकों द्वारा बताया गया , उक्त शिक्षक अपने  शासकीय दायित्व के अलावा भी विद्यार्थियों के प्रति जिस तरह संवेदनशील रहे उसकी वजह से उनके साथ उनका सम्बन्ध शिक्षक से बढ़कर परिवार के सदस्य जैसा बन गया था | किसी छात्र के विद्यालय न आने पर वे उसका कारण पता करने घर पहुंच जाते थे | यदि वह अस्वस्थ होता तो नित्यप्रति उसका हाल जानते रहते | कई बार तो जरूरत पड़ने पर विद्यार्थियों को अपने वाहन से  घर तक पहुँचाने जैसी सौजन्यता भी वे निःसंकोच दिखाते थे | अनेक अभिभावकों ने बताया कि कोरोना काल में जब विद्यालय बंद थे तब श्री बिरौना अपने छात्रों की पढाई के प्रति पूरी तरह चिंता करते रहे ताकि  वे पिछड़ न जाएँ | प्रारंभिक स्तर की शिक्षा में  शिक्षक और छात्रों के बीच मधुर सम्बन्ध होना स्वाभाविक होता है | छोटे बच्चों को शिक्षा के प्रति आकर्षित करने के लिए शिक्षक उनके साथ स्नेहपूर्ण   सम्बन्ध बनाते हैं | लेकिन माध्यमिक स्तर आते – आते तक अनुशासन के फेर में वह स्नेह धीरे – धीरे कम होता जाता है | और फिर सरकारी शालाओं में तो हालात बहुत ही खराब हैं जिनके शिक्षकों की छवि लगातार खराब होती जा रही है | बड़े शहरों में तो फिर भी उन पर निगाह रहती है लेकिन अपेक्षाकृत छोटे स्थानों में सरकारी शालाओं और शिक्षकों के प्रत्ति समाज में अच्छी धारणा नहीं है | इसके लिए सरकार की नीतियों के साथ ही नेताओं और सरकारी अधिकारियों के बच्चों का महंगे निजी विद्यालय में पढ़ना है | आज स्थिति ये है कि ज्यादातर शासकीय शिक्षक अच्छा ख़ासा वेतन लेने के बावजूद अपनी संतानों को निजी विद्यालय में दाखिल करवाते हैं जिससे ये निष्कर्ष निकालना आसान हो जाता है कि शासकीय विद्यालयों में अध्ययन और अध्यापन दोनों की गुणवत्ता खत्म हो चुकी है | ऐसे में राजनगर तहसील से आई उक्त खबर ताजी हवा के खुशनुमा झोके का एहसास करवाती है | दो दिन बाद देश के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का  जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जावेगा  | उस दिन अपने कार्य के प्रति समर्पित योग्य शिक्षकों को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित करने की परम्परा भी है | चंद अपवाद छोड़कर लगभग प्रत्येक शिक्षक की दिली तमन्ना होती है कि उसे ये सम्मान प्राप्त हो |  हालाँकि चयनित सभी शिक्षक सम्मान के पात्र होते हैं इस पर विवाद किया जा सकता है परन्तु  इस बहाने देश के भविष्य निर्माण में  शिक्षकों के योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने की औपचारिकता तो पूरी हो ही जाती है | लेकिन इससे हटकर अपने देश में जो गुरु पूजन की परम्परा गुरु पूर्णिमा के रूप में सदियों से चली आ रही है उसकी पवित्रता असंदिग्ध है क्योंकि उस श्रद्धा और सम्मान में सरकारी तंत्र की भूमिका नहीं रहती और वह स्वप्रेरित है | आज के दौर में जब सब कुछ व्यावसायिक और मशीनी हो गया है तब शिक्षा और शिक्षक के प्रति अवधारणा में भी बदलाव आया है जिसे अस्वाभाविक नहीं  कहा जा सकता | इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि आजादी के 75 साल में शिक्षा को लेकर जितने प्रयोग हुए उतने शायद अन्य किसी क्षेत्र में नहीं हुए होंगे | जो सरकार या शिक्षा मंत्री आया उसने अपने मनमाफिक  बदलाव किये जिनमें कुछ तो वाकई सुधार कहे जा सकते हैं लेकिन बाकी सब अक्ल का अजीर्ण साबित हुए | दूसरी सबसे बड़ी गलती ये हुई कि सरकारी शिक्षकों को आम सरकारी मुलाजिम मानकर वोटर लिस्ट , जनगणना , चुनाव ड्यूटी और ऐसे ही अन्य कार्यों में लगाये जाने की वजह से उनका मूल कार्य प्रभावित होने लगा | और भी अनेक वजहें हैं जिनके कारण प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की ज्यादातर सरकारी शालाओं में अध्ययन और अध्यापन का स्तर औसत से भी नीचे चला गया | लेकिन आज भी अनेक शिक्षक हैं जो व्यवस्था में व्याप्त अव्यवस्था से अछूते रहते हुए अपने कर्तव्य के निर्वहन के प्रति  सहज भी हैं और समर्पित भी | संदर्भित प्रसंग में ऐसे ही शिक्षक  के तौर पर श्री बिरौना चर्चा में आये हैं | इस बारे में ये कहना उचित  होगा कि देश भर में सर्वे किया जावे तो उन जैसे हजारों न सही लेकिन सैकड़ों शिक्षक मिल जायंगे जो सरकारी भर्राशाही के बावजूद शिक्षक को गुरु के तौर पर प्रतिष्ठित करने प्रयासरत हैं | वैसे भी किसी गुरु की सबसे बड़ी उपलब्धि शिष्यों से मिलने वाला सम्मान है और उस दृष्टि से  उक्त शिक्षक के स्थानांतरित होने पर छात्रों का रोना इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में केवल सरकार से मिलने वाला वेतन ही अर्जित नहीं किया अपितु उससे कहीं ज्यादा मूल्यवान  विद्यार्थियों का स्नेह कमाया | आज जब सर्वत्र नकारात्मकता का बोलबाला है तब ऐसे लोगों के कृतित्व का ज्यादा से ज्यादा प्रचार किया  जाना  समाज हित में होगा  |  रचनात्मक कार्यों में लगे लोगों को भी ऐसे शिक्षकों सहित उन  व्यक्तित्वों का सम्मान करना चाहिए जिससे अच्छे कार्य करने के प्रति आकर्षण उत्पन्न किया जा सके | इस बारे में उल्लेखनीय है कि समाज द्वारा दिया गया सम्मान सरकारी पुरस्कार से कहीं ज्यादा प्रतिष्ठित होता है | श्री बिरौना को उनके छात्रों ने सजल नेत्रों से जो विदाई दी उसके सामने राष्ट्रपति भवन में बजने वाली तालियाँ भी फीकी नजर आती हैं |


-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 2 September 2022

महंगाई और बेरोजगारी दूर किये बिना आर्थिक विकास के दावे बेमानी



अगस्त माह में जीएसटी की वसूली से 1.44 लाख करोड़ सरकार के खजाने में आये | यद्यपि ये जुलाई से कुछ कम हैं लेकिन संतोष की बात है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में जीएसटी का आंकड़ा किसी भी महीने 1.40 लाख करोड़ से नीचे नहीं रहा | इसका प्रमुख कारण औद्योगिक उत्पादन और उपभोक्ता मांग में वृद्धि को माना जा रहा है परन्तु  इसका श्रेय महंगाई को भी है | कोरोना काल के बाद अर्थव्यवस्था में महंगाई की वजह से कीमतों में हुई  वृद्धि का असर जीएसटी की वसूली पर भी पड़ा | मूल्य वृद्धि का कारण कुछ हद तक यूक्रेन और रूस के बीच बीते अनेक महीनों से चला आ रहा युद्ध भी है जिसने खद्यान्न निर्यात का रास्ता तो खोला लेकिन उसकी वजह से घरेलू बाजार में दाम बढ़ने से जनता की जेब पर असर पड़ने लगा | जब तक सरकार निर्यात रोकने का निर्णय कर पाती तब तक देश में गेंहू की कीमतों में जबरदस्त उछाल आ चुका था | परिणामस्वरूप आटा , मैदा और सूजी जैसी दैनिक उपयोग की चीजें मंहगी होती गईं | निर्यात रोके जाने का कुछ असर तो कीमतों पर हुआ लेकिन वे पुराने स्तर से अभी भी ऊपर हैं | यही हालत खाने के तेलों की हुई क्योंकि यूक्रेन सूरजमुखी का सबसे बड़ा निर्यातक है लेकिन युद्ध में फंसे होने से उसका विदेशी व्यापार चौपट हो गया | बहरहाल भारत में इन दिनों आर्थिक क्षेत्र में अजीबोगरीब विरोधाभास देखा जा रहा है | एक तरफ  सरकार का दावा है कि औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हो रही है , जमीन - जायजाद का व्यवसाय भी तेजी पकड़ने लगा है , रेल गाड़ियों में प्रतीक्षा सूची लम्बी होने लगी है , हवाई यात्रियों की संख्या में आशातीत वृद्धि से नई – नई एयर लाइंस उड्डयन व्यवसाय में आ रही हैं , पर्यटन स्थलों में सैलानियों का सैलाब देखने मिल रहा है , होटल -  रेस्टारेंट आदि में भी आवक बढ़ी है , निजी और व्यावसायिक परिवहन कोरोना पूर्व की स्थिति से बेहतर होने से  पेट्रोल – डीजल की  बिक्री में लगातार उछाल आया है | यद्यपि बेरोजगारी के आंकड़े अभी भी चिंताजनक हैं  लेकिन आईटी सेक्टर और निर्माण के क्षेत्र में रोजगार की स्थिति सुधरने से चिंता कुछ कम हुई है | इन्हीं सबका असर है कि न सिर्फ  रिजर्व बैंक सहित अन्य सरकारी संस्थान अपितु अर्थव्यवस्था के  आकलन और अनुमान में लगी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां तक इस वित्तीय वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.5 फीसदी के आसपास रहने के साथ ही आगामी कुछ वर्षों  में उसमें और सुधार होने की उम्मीद जता रही हैं | बीते वित्तीय वर्ष में प्रत्यक्ष करों से हुई आय  आशा से अधिक रहने से भी अर्थव्यवस्था की मजबूती का प्रमाण मिला था | जीएसटी की  मासिक वसूली जब 1 लाख करोड़ के पार निकली थी तब आर्थिक जगत में उत्साह का संचार हुआ था | लेकिन उसके  लगातार 1.40 लाख करोड़ से ज्यादा बने  रहने से  सरकार को राहत मिली होगी | इसे अर्थव्यवस्था में आये आत्मविश्वास का परिचायक भी कहा जा सकता है किन्तु दो मोर्चों पर सरकार को ध्यान देना चाहिए | पहला मंहगाई और दूसरा बेरोजगारी | हालाँकि विकास और मूल्यवृद्धि के बीच चोली दामन का साथ माना जाता है किन्तु इस बारे में हमें विकसित देशों की नक़ल से बचना होगा क्योंकि वहां आम आदमी के लिए आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की जो व्यवस्था है वह कम से कम आगामी 25 सालों तक तो इस देश में असम्भव है | दूसरा रोजगार विहीन विकास रूपी जो नई समस्या मानव रहित उद्योग की तकनीक के कारण विकसित हो रही है उसकी तरफ ध्यान देना भी जरूरी है वरना हर हाथ को काम देने का सपना पूरा करना असम्भव  हो जायेगा | रोबोट नामक मशीनी मानव का उपयोग उन देशों के लिए तो आवश्यक है जहाँ आबादी कम है लेकिन हमारे देश में जहां करोड़ों की संख्या में शिक्षित युवा भी बेरोजगार हों और सरकारी नौकरियां तेजी से सिमटती जा रही  हों वहां मशीनों के साथ ही हाथ से किये जाने वाले काम को प्रोत्साहन देना बुद्धिमत्ता होगी | उस दृष्टि से आज की स्थिति में केंद्र सरकार को महंगाई घटाने और रोजगार बढ़ाने की दिशा में अपने आर्थिक नियोजन को केन्द्रित करना चाहिए | इसके लिए सबसे आवश्यक कदम है जीएसटी की विभिन्न दरों की  बजाय एक दर होना और दूसरा पेट्रोल – डीजल को भी जीएसटी के अंतर्गत लाना | यदि सरकार ये कदम उठाए तो इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था में सकारात्मक   सुधार के तौर पर सामने आएगा | उत्पादन की लागत घटने के कारण रोजगार का सृजन होना तय है और उससे भी बड़ी बात ये होगी  कि उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति में वृद्धि होने से बाजार में मांग और बढ़ना तय है  | इस सबसे घूम फिरकर जीएसटी से होने वाली आय कम होने के बजाय बढ़ेगी वहीं उत्पादन लगत घटने से हमारे उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे | बीते कुछ समय से जीएसटी काउन्सिल की बैठक के पूर्व राहत की जो उम्मीदें की जाती रही हैं वे बाद में धरी की धरी रह गईं | पेट्रोल – डीजल को उसके दायरे में लाने के बारे में केंद्र सरकार राज्यों के पाले में गेंद डालकर अलग हो जाती है जबकि काउन्सिल के अध्यक्ष होने के नाते यदि केन्द्रीय वित्तमंत्री तदाशय का प्रस्ताव विचारार्थ रखें और भाजपा शासित राज्य ही उसका समर्थन कर दें तो बाकी के राज्य भी जनता की निगाहों में खलनायक बनने से बचने मजबूर होकर साथ खड़े होंगे | लेकिन केंद्र के साथ राजनीतिक मतभेद रखने वाले राज्य भी पेट्रोल –    डीजल सस्ता करने के बारे में उदासीन बने हुए हैं | ऐसे में ये कहना गलत न होगा  कि अर्थव्यवस्था का उजला पक्ष जनता से की जा रही जबरिया उगाही के कारण देखने मिल रहा है | स्वास्थ्य बीमा पर 18 फीसदी जीएसटी लगाया जाना निश्चित तौर पर औरंगजेब के जजिया कर जैसा है | बेहतर हो केंद्र सरकार अर्थव्यवस्था में सुधार  और अपने राजस्व में आशातीत वृद्धि से जनता को सीधे राहत देते हुए महंगाई और बेरोजगारी के मोर्चे पर प्रभावशाली नतीजों का प्रबंध करें क्योंकि करदाताओं के कन्धों पर बोझ बढ़ाते हुए रोजगार विहीन विकास अंततः जनअसंतोष में वृद्धि  का कारण बनेगा , जो देश हित में नहीं है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 1 September 2022

भारत माता , गांधी जी या भगत सिंह को सरकारी या अदालती प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं



सरकारी रिकॉर्ड महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता नहीं मानता | भारत को माता कहने संबंधी कोई प्रावधान भी हमारे संविधान में नहीं है | लेकिन देश के करोड़ों लोगों के मन में उक्त संबोधान पत्थर पर लकीर की  तरह अंकित हैं | ऐसा ही भाव देश की  आजादी के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले जाने – अनजाने दीवानों के लिए है | इसीलिये जब कोई सरकार अथवा अदालत से ये गुहार लगाता है कि सरदार भगत सिंह को शहीद का दर्जा दिया जावे तब हंसी आती है | उल्लेखनीय है कि गत दिवस पंजाब – हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस आशय की याचिका इस आधार पर निरस्त कर दी कि उसके पास ऐसा कोई अधिकार या आधार नहीं है जिसके बल पर वह भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु को शहीद का दर्जा दे सके | मुख्य न्यायाधीश रविशंकर झा और अरुणा पल्ली की पीठ ने वह  याचिका  खारिज करते हुए  कहा कि उसके पास ऐसा करने के सिवाय और कोई विकल्प भी नहीं है | इसी विषय पर एक यचिका दिल्ली उच्च न्यायालय में भी पेश की गई थी | याचिकाकर्ता की शहीदों के प्रति श्रद्धा सम्माननीय है | देश में करोड़ों लोग हैं जो भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , चंद्रशेखर आजाद , ऊधम सिंह , मदनलाल धींगरा और ऐसे ही न जाने कितने बलिदानियों को अपना आदर्श मानकर उनकी स्मृति को  किसी न किसी  रूप में जीवित रखे हुए हैं | लेकिन इस बारे में अदालत जाने का उद्देश्य ये है कि उनकी शहादत को कानूनी मान्यता अर्थात शासकीय स्वीकृति प्राप्त हो | भावनात्मक तौर पर तो ऐसा करने का औचित्य साबित किया जा सकता है लेकिन वास्तविकता के आधार पर देखें तो गांधी जी और भारत माता की तरह से ही भगत सिंह और उन जैसे अन्य क्रान्तिकारियों के बलिदान को किसी अदालत या सरकार की मुहर से प्रमाणित किये जाने की जरूरत नहीं है | संविधान में इण्डिया जो कि भारत है को एक क्षेत्र कहा गया है | उसमें कहीं भी भारत माता जैसा उल्लेख नहीं है | लेकिन इससे इस भूमि  के साथ जुड़ी भारत के लोगों की भावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ता , फिर वे यहाँ रह रहे हों या दुनिया के किसी भी कोने में | यही सोच उन शहीदों के प्रति भी कायम है जिन्होंने फांसी के फंदे को  हँसते – हँसते चूमा | इस बारे में सुभाष चन्द्र बोस का उल्लेख भी प्रासंगिक होगा जो देश के आजाद होने के पहले ही चल बसे | लेकिन उसके बावजूद भी पूरा भारतवर्ष उन्हें नेताजी के नाम से जानता पहिचानता है | ऐसे और भी उदहारण हैं जिनमें देश के लिए कुछ कर गुजरने वालों को सरकार या क़ानून के बजाय जनता की ओर से भरपूर सम्मान प्राप्त हुआ | बापू के अनन्य शिष्य  विनोबा भावे को राष्ट्र संत  कहा गया | सम्मानसूचक  ये संबोधन उनके प्रति जनमानस में व्याप्त कृतज्ञता के भाव का परिचायक हैं | ऐसे में ये अटपटा लगता है कि शहीदों के बलिदान को अदालत के जरिये प्रमाणित करवाया जावे | हो सकता है ऐसी कोशिशों के पीछे क्रांतिकारियों के योगदान की उपेक्षा किया जाना हो | ये बात तो पूरी तरह सही है कि गांधी जी के सत्याग्रह रूपी तरीके से असहमत उग्रवादी विचारधारा से प्रेरित स्वाधीनता सेनानियों और उनके परिजनों को स्वाधीन भारत  में अपेक्षित महत्त्व नहीं मिला |  बीते सप्ताह दिल्ली स्थित बापू की समाधि पर जाकर बैठने वाले अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद ये आदेश दिया कि दिल्ली सरकार के सभी  कार्यालयों में केवल  डा. आंबेडकर और भगत सिंह का चित्र लगाया जावे | पंजाब में सत्ता हासिल करने के बाद पार्टी ने ऐसा ही वहां भी किया | महात्मा गांधी का चित्र हटाये जाने का विरोध भी हुआ | लेकिन इससे गांधी जी छोटे नहीं हुए | उसी तरह यदि सरकारी दस्तावेज भगत सिंह और उन जैसे अनगिनत लोगों को शहीद नहीं मानते और अदालत भी वैसा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर देती है तो इसमें नाराजगी अथवा चिंता की बात नहीं होनी चाहिए | क्रांतिकारियों के महान बलिदान के प्रति इस देश के करोड़ों लोगों के मन  में जो असीम श्रद्धा है उसके आगे सरकारी या अदालती मान्यता मायने नहीं रखती | देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वालों के योगदान का मूल्यांकन परीक्षा में मिलने वाले अंकों जैसा नहीं किया जा सकता | उनमें कौन छोटा था , कौन बड़ा ये विवाद खड़ा करना भी बेमानी है | बेहतर हो सरकार इस बारे में निष्पक्ष और उदार हो | इसी के साथ इतिहासकार भी अपनी भूमिका के साथ न्याय करें | भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु को शहीद कहे  जाने के लिए सरकार या अदालत की चौखट पर जाकर अर्जी लगाने की इस लिहाज से कोई जरूरत नहीं है | जिस तरह संविधान की नजर में इण्डिया और भारत  महज एक क्षेत्र का नाम है , लेकिन करोड़ों भारतवासी उसे अपनी माँ मानते हैं ठीक वैसे ही कानून की अदालत के पास भगत सिंह और उनके साथियों को शहीद मानने का कोई अधिकार न हो लेकिन ये देश उनकी शहादत के प्रति कृतज्ञ है और जब तक स्वाधीनता संग्राम की यादें बनी रहेंगी तब तक उन बलिदानियों के सम्मान में नत मस्तक रहेगा |

-रवीन्द्र वाजपेयी