Friday, 16 September 2022

समूचे विपक्ष को भाजपा का एजेंट बताकर जयराम ने चला दाँव



कांग्रेस के थिंक टैंक में शामिल जयराम रमेश गंभीर किस्म के नेता हैं और राजनीतिक मामलों में काफ़ी सोच – समझकर बोलते हैं | गत दिवस उन्होंने  बिना लाग - लपेट के कह दिया कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य विपक्षी एकता न होकर पार्टी को मजबूत करना है | उल्लेखनीय है वे इस यात्रा का प्रबंधन देख रहे हैं | बात को स्पष्ट करते हुए श्री रमेश ने कहा कि सभी पार्टियों ने अतीत में कभी न कभी कांग्रेस को कमजोर करने का काम किया है | सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि श्री रमेश ने सीपीएम पर निशाना साधते हुए उसे भाजपा की ए टीम बताया | स्मरणीय है कि जब ममता बैनर्जी ने प. बंगाल में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी तब उनका आरोप था कि काँग्रेस सीपीएम की बी टीम है | वह बात विगत विधानसभा चुनाव में सही साबित हुई जब प. बंगाल में कांग्रेस और वाममोर्चा ने मिलकर ममता के विरुद्ध मोर्चा बनाया | लेकिन दूसरी तरफ केरल में कांग्रेस और वाम  मोर्चा एक दूसरे के  ऐलानिया दुश्मन हैं | श्री रमेश द्वारा की गई यह टिप्पणी  किसी कांग्रेस नेता द्वारा वामपंथी दल पर किया गया सबसे तीखा हमला कहा जा सकता है | वे यहाँ तक बोल गए कि सीपीएम राष्ट्रीय स्तर पर तो कांग्रेस का समर्थन करना चाहती है किन्तु केरल में उसने भाजपा से समझौता कर रखा है | वे ये कहने से भी नहीं चूके कि वामपंथी दलों सहित अन्य विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस को रोकने किसी न किसी रूप में भाजपा से हाथ मिला रखा है | उन्होंने सीपीम के बारे में इस तरह की टिप्पणी उस वक्त की जब श्री गांधी की यात्रा सीपीएम की सत्ता वाले राज्य केरल में ही है जहां की वायनाड  सीट से ही वे सांसद भी हैं | यदि ये टिप्पणी यात्रा के दूसरे प्रभारी दिग्विजय सिंह द्वारा की जाती तब शायद उसे गंभीरता से न लिया गया होता लेकिन श्री रमेश की छवि को देखते हुए ये माना जा सकता है कि उन्होंने विपक्षी दलों ख़ास तौर पर सीपीएम के बारे में जो कहा वह श्री गांधी की भावी राजनीति का हिस्सा है | ऐसे समय जब पूरे देश में विपक्षी एकता की कोशिशें चल रही हैं तब यात्रा के मुख्य प्रबंधक द्वारा विपक्षी दलों पर ये आरोप लगाना कि सभी ने किसी न किसी रूप में भाजपा से हाथ मिला रखा है , उन्हें ये एहसास करवाने का दांव हो सकता है  कि भाजपा का विरोध बिना कांग्रेस को केंद्र में रखे असम्भव है | वैसे श्री रमेश का ये कटाक्ष वास्तविकता के धरातल पर इसलिए सही प्रतीत होता है कि कांग्रेस ही  एकमात्र पार्टी है जिसने कभी भी भाजपा के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गठजोड़ नहीं किया जबकि वामपंथी दलों के अलावा समाजवादी विचारधारा से निकले सभी दलों ने उसकी संगत की  है | आज विपक्ष की एकता का झंडा उठाये फिर रहे नेताओं में ममता , नीतीश , केसीआर भी अतीत में भाजपा से हाथ मिला चुके हैं | तमिलनाडु की दोनों प्रमुख पार्टियाँ भी केंद्र की राजनीति में भाजपा की सहयोगी रह चुकी हैं | यहाँ तक कि जम्मू कश्मीर में भाजपा की दुश्मन नंबर एक नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी तक ने उसके साथ केंद्र और राज्य में सत्ता सुख लूटा | विपक्ष के वे दल जो अब तक भाजपा की संगत से अछूते रहे उनका राष्ट्रीय राजनीति में खास महत्व नहीं है | आम आदमी पार्टी का जहाँ तक सवाल है वह वैसे तो भाजपा से टकराने का दम भरती है लेकिन उसका भी असली निशाना  कांग्रेस ही है जिसे कमजोर किये बिना अरविन्द केजरीवाल की राष्ट्रीय विकल्प बनने की महत्वाकांक्षा अधूरी रहेगी | बीते कुछ सालों में मुस्लिमों के नेता के तौर पर उभर रहे असदुद्दीन ओवैसी पर तो सभी  विरोधी सभी दल आरोप लगाते हैं कि वे भाजपा के एजेंट हैं और मुस्लिम मतों में बंटवारा  करवाकर उसे जितवाने में सहायक बनते हैं | हरियाणा में 25 सितम्बर को स्व. देवीलाल की जयन्ती पर उनके बड़े बेटे पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला द्वारा विपक्षी नेताओं का जो जमावड़ा किया जा रहा है उसमें भी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को नहीं बुलाया गया जबकि विपक्ष के अधिकांश बड़े चेहरे उसमें शामिल होने की स्वीकृति दे चुके हैं | गौरतलब है श्री चौटाला के पोते दुष्यंत हरियाणा की वर्तमान सरकार में भाजपा के साथ उपमुख्यमंत्री बने हुए हैं | इस प्रकार  श्री रमेश की टिप्पणी के गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं जिसके जरिये उन्होंने वामपंथियों सहित समूचे विपक्ष पर ये तोहमत लगा दी कि उन सभी ने भाजपा के साथ हाथ मिला रखा हैं | देखने वाली बात ये होगी कि विपक्ष उनकी इस बात पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करता है क्योंकि केरल से निकलने के बाद श्री गांधी की यात्रा ज्योंही कर्नाटक , आंध्र और तेलंगाना में प्रविष्ट होगी त्योंही उनका सामना उन क्षेत्रीय दलों से भी होने लगेगा जो भाजपा के विरोधी तो हैं लेकिन कांग्रेस को भी अपने प्रभावक्षेत्र में पाँव जमाने की जगह  देने तैयार नहीं हैं | हो सकता है  इसीलिये श्री रमेश ने टिप्पणी के जरिये इन दलों को कठघरे में खड़ा करने का पैंतरा चला हो | हालाँकि श्री गांधी ने यात्रा में अभी तक केवल भाजपा और रास्वसंघ पर ही निशाने साधे हैं लेकिन अब तक वे ये एहसास उत्पन्न नहीं कर सके कि 2024 के महा मुकाबले में वे ही नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष का चेहरा बनेंगे | ऐसे समय में जब विपक्षी खेमे के अनेक छत्रपों द्वारा भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने की भरसक कोशिश चल रही है तब श्री रमेश के मुंह से समूचे विपक्ष पर भाजपा से हाथ मिलाये रखकर कांग्रेस को रोकने जैसा आरोप साधारण बात नहीं है | इस टिप्पणी को  उनकी निजी राय बताकर पल्ला झाड़ लेना भी कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा श्री क्योंकि वे आजकल 24 घंटे श्री गांधी के साथ ही बने हुए हैं | देखना ये है कि ममता , नीतीश और केसीआर जैसे विपक्षी एकता के पैरोकार श्री रमेश के आरोप पर क्या सफाई देते हैं जिसकी वजह से पूरे विपक्ष की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ गई  है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 15 September 2022

राहुल की यात्रा के दौरान बिखराव होना कांग्रेस के लिए चिंता का विषय



कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर उनके विरोधी ये कटाक्ष करते रहे हैं कि भारत जोड़ो यात्रा से पहले उनको कांग्रेस जोड़ो अभियान चलाना चाहिए था | इसके पीछे कांग्रेस में चल रही अंतर्कलह बताई जा रही है | ये भी सुनने में आ रहा है कि जी 23  नामक असंतुष्ट नेताओं के समूह द्वारा विरोध का जो झंडा उठाया गया उससे निपटने में नाकाम गाँधी परिवार ने राहुल की पांच महीने चलने वाली भारत जोड़ो यात्रा का कार्यक्रम बनाया | जो जानकारी आई उसके अनुसार कांग्रेस के वरिष्ट नेता दिग्विजय सिंह और जयराम रमेश बीते अनेक माह से इस यात्रा को पेशेवर तरीके से संपन्न करवाने के काम में जुटे हुए थे | जबकि इसी दौरान पहले कपिल  सिब्बल और उनके बाद  गुलाम नबी आजाद जैसे दो ऐसे नेता कांग्रेस छोड़ गए जो गांधी परिवार के बेहद विश्वासपात्र माने जाते थे | इनके अलावा कुछ और नेताओं का गांधी परिवार के एकाधिकार के विरुद्ध जुबानी  हमला सार्वजनिक रूप से जारी रहा | इस संकट को हल करने में पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी के अलावा राहुल और प्रियंका वाड्रा ने कुछ ठोस कदम उठाये हों ऐसा नजर नहीं आता | राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच चल रही खींचातानी अब मंत्रियों पर जूते – चप्पल फेंके जाने तक बढ़ चुकी है | छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टी. एस . सिंहदेव के बीच रस्साखींच थमने का नाम नहीं ले रही | हिमाचल में आनंद शर्मा कोप भवन में बैठे हैं | गुजरात में भगदड़ लगातार जारी है  | अन्य राज्यों से भी ऐसी ही खबरें लगातार आ ही रही थीं कि गत दिवस गोवा में कांग्रेस के 11 में से 8 विधायक भाजपा में शामिल हो गए | स्मरणीय है विधानसभा चुनाव की टिकिट देते समय कांग्रेस ने इन विधायकों को वफादारी की शपथ दिलवाई थी | इस समय पार्टी  का पूरा ध्यान श्री गांधी की  यात्रा पर केन्द्रित है | उसके तमाम नेता और कार्यकर्ता इस ऊम्मीद को पाल बैठे हैं कि इसके पूरा होने तक कांग्रेस और राहुल दोनों 2024 के लोकसभा  चुनाव में नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने लायक शक्ति अर्जित कर लेंगे और जो जनता कांग्रेस से दूर हो चली थी वह दोबारा उसके साथ जुड़ जायेगी | राजनीतिक नेता का जनता से सीधा संवाद हर दृष्टि से लाभदायक होता है | हालांकि इसके तौर – तरीके  समय , काल और परिस्थिति पर निर्भर करते हैं किन्तु प्रत्यक्ष रूप से लोगों के बीच जाना सूचना क्रांति के इस युग में भी सर्वोत्तम है | लेकिन इसी के साथ ये भी देखना चाहिए कि आगे पाट पीछे सपाट वाली स्थिति न बने | गोवा में जो कुछ हुआ उसके लिए कांग्रेस समर्थक भाजपा द्वारा की जाने वाली सौदेबाजी पर उंगली उठा रहे हैं | लेकिन जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार वहां पार्टी के भीतर खींचातानी काफी समय से चली आ रही थी जिसे दूर करने में हाईकमान द्वारा जो कि वास्तविक रूप में गांधी परिवार ही है , कुछ ख़ास नहीं किया गया | ये इसलिए सही लगता है कि आगामी वर्ष  विधानसभा चुनाव का सामना करने वाले राज्यों में राजस्थान भी है जहाँ पार्टी के दो बड़े नेताओं के बीच वर्चस्व की जंग बिना रुके जारी है और जिसे जब मौका मिलता है दूसरे पक्ष पर धारदार हमला कर देता है | राजस्थान की ताजा घटना वाकई पार्टी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए | अपनी ही सरकार के मंत्री पर जूते फेंकने वालों ने सचिन पायलट के समर्थन में नारे लगाकर अपने इरादे जाहिर कर दिए | बाद में मंत्री महोदय ने भी बिना नाम लिये चुनौती भरे शब्दों में श्री पायलट को ललकारा | इस बारे में रोचक बात ये है कि श्री पायलट और श्री गहलोत दोनों गांधी परिवार के करीबी हैं। लेकिन उनके बीच का झगड़ा दूर करने में किसी की भी रूचि नहीं है | बावजूद इसके कि चुनावी वर्ष में इस तरह के विवाद किसी भी दल के लिए नुकसानदेह होते हैं | ये सब देखते हुए लगता है जैसे कांग्रेस श्री गांधी की यात्रा से ऐसा कोई ब्रह्मास्त्र प्राप्त होने की उम्मीद लगाये बैठी है जिसके प्रयोग से वह अपने राजनीतिक शत्रुओं को चारों खाने चित्त कर देगी | लेकिन वह भूल जाती है कि शत्रु पर विजय तभी प्राप्त होती है जब घरेलू मोर्चे पर भी मजबूती रहे | उस लिहाज से कांग्रेस को अपनी अंदरूनी हालत पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए था ,बजाय श्री गांधी को केंद्र बिंदु में रखने के | भारत जोड़ो यात्रा पार्टी का एक कार्यक्रम है जिसकी उपयोगिता और संभावित लाभों से इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु उसके फेर में बाकी सब उपेक्षित कर दिया गया तो यात्रा के अंत तक बहुत कुछ हाथ से निकल चुका होगा | केवल भाजपा पर खरीद फरोख्त करने का आरोप लगाने से कांग्रेस अपनी दशा नहीं सुधार सकेगी क्योंकि उसका भाजपा से सीधा मुकाबला तो म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ही रह गया है । हिमाचल और गुजरात में आप आदमी पार्टी ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है | बाकी के ज्यादातर राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियाँ भाजपा के लिए कांग्रेस से बड़ी चुनौती हैं | ऐसे में अगर कांग्रेस से नेताओं  का निकलना  इसी तरह जारी रहा तब उसको विपक्षी दल भी कितना वजन देंगे ये प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है | ये देखते हुए कांग्रेस के लिए जरूरी है कि वह राहुल की यात्रा रूपी मोर्चे पर पूरा ध्यान केन्द्रित करने की बजाय अपने संगठन को बिखरने से बचाने पर भी ध्यान दे | उसे इस बात का फैसला भी करना होगा कि श्री गांधी की भारत जोड़ो यात्रा उनको मजबूत करने के लिए हो रही है या फिर कांग्रेस को ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 14 September 2022

हिन्दी भाषियों को हीन भावना से बचना चाहिये



1949 में आज ही  के दिन संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया था। 1953 में उसकी महत्ता स्वीकारते हुए 14 सितम्बर को राजभाषा दिवस घोषित कर दिया गया। इस प्रकार  यह एक तरह से हिन्दी का शासकीय जन्मदिवस है। समय के साथ इसका विस्तार राजभाषा सप्ताह , पखबाड़ा और माह के रूप में भी हो गया। कहने को तो हिन्दी के  लिये ये गौरव की बात है कि अनेकानेक प्रादेशिक भाषाओं के होते हुए भी  सरकारी प्रेरणा से  देश भर में उसका प्रशस्तिगान होता है। अनगिनत आयोजनों में हिन्दी की सहजता और सरलता के बखान के साथ ही उसकी  स्वीकार्यता का संकल्प दोहराया जाता है। प्रतियोगिताएँ , पुरस्कार  , सम्मान  , गोष्ठियां , कवि सम्मलेन, पोस्टर - बैनर , जैसे अनेक ऐसे कर्मकांड किये जाते हैं जिनसे हम सब बखूबी परिचित हैं। लंबे समय से केंद्र  सरकार के सभी विभागों  तथा उपक्रमों में राजभाषा अधिकारी पदस्थ  हैं जिनका कार्य हिन्दी में कामकाज में वृद्धि के लिये गैर हिन्दी भाषियों को हिन्दी में प्रशिक्षित करना है। राजभाषा अधिकारियों को रखे जाने से शासकीय कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग काफी बढ़ा भी। यद्यपि भाषावार प्रान्तों के गठन की भूल का खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है । राजनीति ने जाति और धर्म की तरह से ही भाषा को भी वोट बैंक का जरिया  बना दिया। तमिलनाडु में जहाँ हिन्दी का सर्वाधिक विरोध होता  है  वहां  के लोग अंग्रेजी  पटर-पटर करने वालों का विरोध नहीं करते। कुछ समय पहले हिन्दी लादने के विरोध में पूर्व केंद्रीय मंत्री डी. राजा ने तो अलग तमिल देश की धमकी तक दे डाली। महाराष्ट्र में शिवसेना और मनसे भी मराठी भाषा के नाम पर लोगों को  भड़काने से बाज नहीं आतीं। इससे प्रोत्साहित होकर अन्य राज्यों में भी  क्षेत्रीय भाषा को राजनीतिक मुद्दा बनाने का कुचक्र रचा जाने लगा है। इस सम्बन्ध में संतोष का विषय है कि उत्तर भारतीय राज्यों में न्यायालयों के अतिरिक्त ही  राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर की  प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिन्दी को मान्यता  मिल गयी है। इन सबसे  हिन्दी के भविष्य के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है। लेकिन दूसरा पक्ष  चिंता भी पैदा कर रहा है। और वह है हिन्दी भाषियों के ही  एक बड़े वर्ग द्वारा उसकी उपेक्षा जो काफी हद तक  हीनभावना से प्रेरित है। उल्लेखनीय है पहले संपन्न वर्ग में ही अंग्रेजी का आकर्षण था क्योंकि वह अभिजात्यता की प्रतीक मानी जाती है। लेकिन बीते कुछ दशकों में मध्यम वर्ग में भी जिस तरह अंग्रेजी के प्रति अनुराग बढ़ा उसके कारण हिन्दी का अधिक नुकसान हो रहा है। शिक्षा के अँग्रेजी माध्यम को सफलता की  सीढ़ी मान लेने की सोच  के परिणामस्वरुप विद्यालयीन  शिक्षा का स्वरूप ही पूरी तरह से  बदल गया जिससे जहाँ देखो वहाँ कान्वेंट स्कूल के बोर्ड टंग गये। यद्यपि इनमें अध्ययनरत कमजोर आर्थिक स्थिति वाले बच्चे काम चलाऊ अंग्रेजी  ही सीख जाएँ तो भी उसका लाभ है परंतु अंग्रेजी माध्यम के मोहपाश में बंधने के बाद हिन्दी भाषी प्रान्तों के बच्चे अंग्रेजी तो सीख नहीं पाते किंतु हिन्दी में भी कमजोर हो जाते हैं। इस स्थिति के लिये  शिक्षा प्रणाली के साथ माता - पिता भी कम दोषी दोषी  नहीं हैं जिन्होंने अंग्रेजी की मृगमरीचिका में अपनी संतानों को उनकी  मातृभाषा से ही अनजान बना दिया। ये कहना न तो गलत है और न ही अहंकार कि हिन्दी का खात्मा किसी के लिये सम्भव  नहीं  है क्योंकि यही ऐसी भाषा है जो पूरे देश में समझी जाती  है।  जिन दक्षिणी राज्यों में उसका विरोध सतह पर दिखाई देता है वहां के लोग उत्तर  भारत में आकर नौकरी करने में तनिक भी  संकोच नहीं करते। इसी तरह उप्र और बिहार जैसे विशुद्ध हिन्दी भाषी प्रदेशों के मजदूर बिना स्थानीय भाषा सीखे ही दक्षिण  ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर के राज्यों में भी कार्य करते हैं। कोरोना के दौरान लॉक डाउन की वजह से  काम बंद हो जाने पर  जब महानगरों से मजदूरों का पलायन हुआ तब ये वास्तविकता सामने आई कि हिन्दी विरोधी  राज्यों में भी हिन्दी बोलने वाले श्रमिकों का कोई विरोध नहीं है। ये  देखते हुए हिन्दी भाषी लोगों को अपनी भाषा के प्रति हीन भावन से मुक्त होना चाहिए । अंग्रेजी को बतौर भाषा सीखना अच्छा है लेकिन उसी में डूब जाने  की प्रवृत्ति हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए खतरा है। क्योंकि भाषा के साथ आने वाले साहित्य और संस्कृति का प्रभाव पीढिय़ों तक बना रहता है जिससे कालांतर में उसे अपनाने वाला  समाज अपनी पहिचान खो बैठता है। अनेक देशों  में विदेशी भाषा के आधिपत्य ने उनकी जड़ों को  नष्ट कर दिया। हिन्दी  दिवस के नाम पर होने वाले सभी आयोजन  उसके प्रचार - प्रसार की दृष्टि से तो अच्छे हैं किंतु हिन्दी भाषी लोग जब तक मातृभाषा के प्रति आकर्षित नहीं होते तब तक उसको सरकारी संरक्षण  कितना भी मिलता रहे लेकिन  राष्ट्रभाषा होने के बाद भी वह उपेक्षित ही रहेगी। ऐसे में हिन्दी भाषी ही यदि उसे ईमानदारी से अपना लें तो उसका विरोध धीरे - धीरे खत्म होता जाएगा। इसीलिए आज के दिन का सबसे सरल सन्देश यही है कि हिन्दी की बातें कम करें लेकिन  हिन्दी में बातें ज्यादा करें ।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 13 September 2022

पुतिन ने रूस को आगे कुआ पीछे खाई वाली स्थिति में फंसा दिया



जब यूक्रेन पर रूस ने हमला किया तब लग रहा था कि वह इकतरफा मुकाबला है  | इसलिए जब उसके राष्ट्रपति जेलेंस्की ने मुकाबला करने की जिद पकड़ी तो उसे मूर्खता कहा गया | प्रारंभ में रूसी फौजों ने तेजी से यूक्रेन के इलाकों पर कब्जा करना शुरू कर दिया वहीं  वायुसेना ने भी भीतरी हिस्सों में तबाही मचाकर अव्यवस्था का माहौल बना दिया | लाखों लोग बेघरबार हो गए | बड़ी संख्या में शरणार्थी भागकर पड़ोसी देशों में जाने लगे | पहले – पहल  लग रहा था कि अमेरिका और उसके साथी देश यूक्रेन में सेनायें भेजकर रूस को सबक सिखायेंगे | लेकिन ऐसा नहीं होने से यूक्रेन के पराजित होने की आशंका बढ़ने लगी | यद्यपि उसे सैन्य साजो – सामान की  आपूर्ति के अलावा भरपूर आर्थिक मदद दी जाती रही जिसके दम पर उसने रूस के मुकाबले का हौसला दिखाया | सबसे बड़ी बात ये  रही कि यूक्रेन की जनता ने जबरदस्त देशभक्ति का परिचय दिया | रूसी हमले लगातार जारी हैंलेकिन यूक्रेन का मनोबल कायम है जिसके दम पर उसने रूसी सेनाओं को अपनी राजधानी कीव तक पहुंचने से रोक रखा है | यद्यपि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि रूस पूरी तरह विफल हो गया किन्तु ये कहना भी गलत न होगा कि अपार सैन्य शक्ति के बावजूद राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने इरादे में सफल नहीं हो सके हैं | प्रारंभ में तो आर्थिक प्रतिबंधों के रूप में उनको विश्व बिरादरी का विरोध सहना पड़ा परन्तु  अब रूस के भीतर भी उनके प्रति नाराजगी बढ़ने लगी है | हालाँकि उन्हें हटाये जाने की संभावना तो नजर नहीं आ रही क्योंकि रूस की कुख्यात ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी के मुखिया रहे पुतिन इस तरह के षडयंत्रों से अच्छी तरह वाकिफ हैं | लेकिन जनता के स्तर पर रूस में विरोध के संकेत मिलने लगे हैं | इसका कारण जनजीवन का प्रभावित होना है | आर्थिक प्रतिबंधों के कारण निर्यात ठंडा  होने से एक तरफ जहां रूस की  आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है वहीं दूसरी तरफ आयात रुकने से जरूरी चीजों की किल्लत है | जब तक साम्यवादी शासन रहा तब तक जनता  सरकार के इशारों पर नाचने मजबूर थी | लेकिन बीते तीन दशक में इस देश ने दुनिया के माहौल को देखा और जाना | पर्यटकों के साथ ही बड़ी संख्या में व्यवसायी रूस आने जाने लगे जिसकी वजह से  समाज की सोच में भी  खुलापन आया वरना साम्यवादी व्यवस्था के एकाएक धराशायी होने के बाद आम रूसी नागरिकों को आटे -  दाल का भाव तक नहीं मालूम था | पूंजीवाद की चमक के साथ ही उपभोक्तावादी संस्कृति भी पनपी जिसने रूस को  दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिये प्रेरित किया | हालाँकि साम्यवादी दौर में पली – बढ़ी पीढ़ी आज भी बंद दरवाजे वाली  मानसिकता से प्रेरित है लेकिन नई पीढ़ी वैश्विक माहौल के साथ सामंजस्य बनाते हुए पश्चिमी सोच से प्रभावित है | यही कारण है कि  प्रखर राष्ट्रवाद के बावजूद आम रूसी यूक्रेन पर हमला करने के औचित्य को नहीं समझ सका | पुतिन ने हालांकि ये कदम रूस  के दीर्घकालिक आर्थिक और सामरिक हितों की खातिर उठाया लेकिन अब ऐसा लगने लगा है कि जिस तरह अमेरिका वियतनाम  पराजित होकर निकला था  उसी  त्रासदी से पुतिन को भी रूबरू होना पड़ेगा | ताजा खबरों के मुताबिक रूस इस जंग में थका – थका नजर आने लगा है | राष्ट्रपति पुतिन अब तक अपनी सेना को भी इस लड़ाई के उद्देश्य से सहमत नहीं करवा सके | यही वजह है कि जब यूक्रेनी जनता ने उसके  टैंको के सामने आकर प्रतिरोध किया तब बजाय उन्हंा उड़ा देने के टैंक या तो रुक गए या लौट गए | बीते कुछ दिनों से आ रही खबरों के अनुसार अनेक सीमावर्ती गाँवों को यूक्रेनी सेना ने रूसी कब्जे से खाली करवा लिया है | इस बात की भी पुष्टि हो गई है कि हवाई हमलों और मिसाइलों का सहारा लेने के बाद भी रूस के सैनिक बड़ी संख्या में मारे गये जिसकी वजह से पुतिन को वैसा ही विरोध झेलना पड़ रहा है जैसा अमेरिका में  वियतनाम युद्ध के दौरान और हालिया सालों में अफगानिस्तान में उसके सैनिकों के हताहत होने पर देखने मिला | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि पुतिन ने भी वहीं गलती कर डाली जो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मन तानाशाह हिटलर कर बैठा था | उल्लेखनीय है हिटलर ने युद्धोन्माद में रूस पर चढ़ाई कर तो दी और शुरू – शुरू में उसकी फौजें आगे बढ़ती भी गईं किन्तु जैसे – जैसे समय बीतता गया वे रूस के भीतर उलझकर रह गईं जिसका अंत जर्मनी की पराजय  के रूप में देखने मिला | छह महीनों में रूस ने यूक्रेन में ढांचागत नुकसान तो जबरदस्त कर दिया परन्तु उसके हाथ ऐसी कोई सफलता नहीं लगी जिससे वह जीत के प्रति आश्वस्त हो सके | आने वाले दिनों में इस जंग की दिशा क्या होगी ये कहना कठिन है | लेकिन परमाणु युद्ध की धमकी देने के बाद भी यदि पुतिन यूक्रेन को घुटनाटेक नहीं करवा सके तो ये मानने में कुछ भी गलत नहीं है कि उनका आकलन सतही तौर पर गलत साबित हो गया | उन्हें लगता था कि यूक्रेन की आंतरिक व्यवस्थाओं को तहस  नहस करने से जनता त्रस्त होकर जेलेंस्की के खिलाफ खड़ीं जायेगी | लेकिन केजीबी के पूर्व प्रमुख होने के नाते उन्हें सोवियत संघ को  अफगानिस्तान में मिले कटु  अनुभवों से सबक लेना चाहिए था जिसमें वे चूक गए | भले ही रूस में साम्यवाद दफन हो चुका है लेकिन ऐसा लगता है पुतिन दोबारा सोवियत संघ जैसी  व्यवस्था को जन्म देना चाहते हैं | यूक्रेन उसका सबसे प्रमुख घटक रहा जिसके पास प्राकृतिक और आर्थिक संसाधन प्रचुर मात्रा में होने के साथ ही भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है | यही वजह है कि वह अभी तक पुतिन के अहंकारी रवैये के विरुद्ध तनकर खड़ा हुआ है | यदि रूस हताशा में कोई बड़ा कदम उठाये तभी वह यूक्रेन पर पूर्ण विजय की बात  सोच सकता है किन्तु आज की स्थिति में पुतिन भी उस तानाशाह की तरह हो गये हैं  जो सता के नशे में चूर होकर शेर की पीठ पर बैठ तो गया लेकिन अब उतरना उसके लिए खतरे से खाली नहीं है | युद्ध विशेषज्ञों का कहना है कि वे यूक्रेन को डरा धमकाकर रूस के आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा करना चाहते थे लेकिन अमेरिका और उसके साथी देशों ने ऐसा होने नहीं दिया | यद्यपि विश्व युद्ध की  आशंका को टालने के लिए वे खुलकर  लड़ने तो नहीं आये परन्तु जिस तरह वियतनाम युद्ध के  समय  रूस और चीन ने वहां के साम्यवादी गुरिल्लों को पीछे से सहायता देकर  लड़ते रहने का हौसला दिया ठीक उसी नीति पर चलते हुए अमेर्रिकी गुट के देश यूक्रेन को टेका लगाये हुए हैं | दूसरी  तरफ पुतिन के साथ दिक्कत ये हैं कि इस युद्ध में सैन्य मुकाबले के अलावा मनोवैज्ञानिक लड़ाई में उलझ गए हैं जिसमें आगे कुआ और पीछे खाई है | यहाँ उल्लेख करना जरूरी है कि पुतिन के करीबी आधा दर्जन बड़े उद्योगपति बीते छह माह में रहस्यमय तरीके से मौत के मुंह में समा चुके हैं |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 12 September 2022

ताकि हमारे युवाओं को उच्च शिक्षा हेतु विदेश न जाना पड़े



हमारे देश में विश्वस्तरीय कारें बन रही हैं | मोबाइल उत्पादन में भी हम सबसे आगे निकल आये हैं | सॉफ्टवेयर बनाने के काम में भी भारत दुनिया भर में अग्रणी है | हमारे अंतरिक्ष केंद्र अब दूसरे देशों के उपग्रह प्रक्षेपित करने में सक्षम है | ब्रह्मोस मिसाइल और तेजस लड़ाकू विमान के जरिये हम रक्षा उपकरणों के निर्यात में भी आगे बढ़ रहे हैं | अमेरिका , कैनेडा , ब्रिटेन , जर्मनी , आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में भारतीय चिकित्सक , अन्तरिक्ष वैज्ञानिक , साफ्टवेयर इंजीनियर और वितीय विशेषज्ञ बड़ी संख्या में कार्यरत हैं | गूगल और माइक्रोसाफ्ट जैसी विश्वस्तरीय कम्पनियों के उच्च प्रबन्धन में भी भारतीय लोगों की मौजूदगी देखे जा सकती है | कहने का आशय ये है कि वर्तमान विश्व में भारत से गये लोग अपनी योग्यता और परिश्रम के बलबूते सम्मान , प्रसिद्धि और धन अर्जित कर रहे हैं | अमेरिका के राष्ट्रपति की सलाहकार मंडली में अनेक भारतीय  महत्वपूर्ण स्थानों पर बैठे हैं | ब्रिटेन में तो भारतीय  मूल के ऋषि सुनाक प्रधानमंत्री बनते – बनते रह गये | लेकिन इसके साथ ही ये बात भी  सामने  आई है कि लाखों भारतीय छात्र प्रतिवर्ष उच्च शिक्षा ग्रहण करने विदेश जाते हैं | बीते साल के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका ,ब्रिटेन , ऑस्ट्रेलिया , कैनेडा और जर्मनी में ही लगभग 6 लाख भारतीय विद्यार्थी थे | इस साल की शुरुआत में जब रूस द्वारा किये गए हमले के बाद यूक्रेन में हालात बिगड़ने लगे तब वहां से हजारों भारतीय छात्रों की वापसी के लिए केंद्र सरकार को जबरदस्त मशक्कत करनी पड़ी थी | कोरोना काल के दौरान अमेरिका सहित अन्य देशों ने वीसा देना बंद कर दिया था परन्तु ताजा खबरों के अनुसार इस साल अमेरिका ने भारतीय छात्रों को दिए जाने वीसा की संख्या बढ़ाकर दोगुनी कर दी है | इसे भारत के प्रति अमेरिका के दोस्ताना रवैये के तौर पर देखा जा रहा है | लेकिन सवाल ये है कि विकास के बड़े – बड़े दावों के बावजूद हमारे देश में उच्च शिक्षा के इतने प्रबंध नहीं हो सके जिससे विदेश जाकर पढ़ने का चलन बढ़ता ही जा रहा है | इसके अलावा समाज के एक तबके में विदेश जाकर पढ़ना प्रतिष्ठा सूचक माना जाता है | यदि छात्र उन  तकनीकी और वैज्ञानिक विषयों की शिक्षा प्राप्त करने विदेश जावे जिसकी सुविधा  भारत में न हो , तब तो समझा जा सकता है लेकिन महज दिखावे और रईसी के लिए विदेशों में शिक्षा हासिल करना अटपटा लगता है | इस बारे में चिंता का विषय ये भी है कि विदेशों में शिक्षा करने वाले ज्यादातर युवा वहीं काम करने लगते हैं जिससे उनकी प्रतिभा का लाभ देश को नहीं मिल पाता | प्रतिभा पलायन का ये सिलसिला उन मेधावी छात्रों और शोधकर्ताओं के साथ भी जुड़ा है जो भारत में शिक्षित होने के बाद बेहतर अवसर की तलाश में परदेस जाकर बस जाते हैं | ये सब देखने के बाद जरूरत इस बात की है कि हमारे देश में न सिर्फ ज्यादा से ज्यादा उच्च शिक्षण संस्थान खोले जाएँ अपितु जो पहले से मौजूद हैं उनका स्तर इस हद तक ऊंचा किया जावे जिससे न सिर्फ हमारे छात्रों का विदेश जाना रुक जाए बल्कि विदेशी छात्र यहाँ शिक्षा और शोध हेतु आने लगें | भारत में आईआईटी और आईआईएम की अनेक शाखाएँ वैश्विक मापदंडों पर खरी उतरती हैं | इनमें विकासशील देशों के छात्र और शोधार्थी आते भी हैं लेकिन सभी के साथ ये स्थिति नहीं है | और यही विचार का विषय होना  चाहिए | इस बारे में उल्लेखनीय है कि अमेरिका के सुप्रसिद्ध हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पास इतना संचित धन है कि उसे पूंजी बाजार में निवेश करने से करोड़ों डालर प्रतिवर्ष की आय होती है | जिसका स्रोत विदेशी छात्रों से मिलने वाले शुल्क के अलावा शोध और पेटेंट से होने वाली कमाई है | हमारे देश में आईआईटी और आईआईएम भी पेशेवर  सेवाओं से धनोपार्जन करते हैं लेकिन कुछ को छोड़कर जितने भी सरकारी विश्वविद्यालय हैं उनमें से अधिकतर धनाभाव से जूझने के कारण पूर्णकालिक प्राध्यापक तक नहीं रख पाते  | संविदा नियुक्ति पर आने वाले शिक्षक अपने भविष्य को लेकर ही चिंतित बने रहते हैं जिससे अध्यापन और शोध दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है | ऐसे में समय की मांग है कि  उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर के अनुरूप संस्थान विकसित  किये जाएँ | जिस तरह विज्ञान और अनुसन्धान के क्षेत्र में देश अपनी खुद की व्यवस्था कर रहा है ठीक वैसी ही सोच उच्च शिक्षा के लिए भी होनी चाहिए | आजकल  देश में निजी क्षेत्र के अनेकानेक विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर  गुणवत्ता युक्त शिक्षा की बजाय व्यवसायीकरण में लिप्त हैं | आजादी के 75 साल का जश्न शिक्षा के स्वदेशीकरण के बिना अधूरा है | यूक्रेन संकट से सबक लेकर हमें अपने देश में उच्च शिक्षा के वे सारे प्रबंध युद्धस्तर पर करने चाहिए जिससे हमारी युवा पीढी़ को पढ़ने के लिए वतन से दूर न जाना पड़े | अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में नस्लीय हमलों की घटनाएँ  जिस तेजी से बढ़ती जा रही हैं उन्हें भविष्य का संकेत मानकर समुचित कदम उठाना जरूरी है |  इसके लिए सबसे पहले ये विश्वास पैदा करना होगा  कि भारत में वैश्विक स्तर की शिक्षा संभव है |  लेकिन इसके लिए नितिन गडकरी जैसे किसी सक्षम और दूरदृष्टि रखने वाले प्रशासक की जरूरत है |  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का जो नारा दिया है उस पर काफी काम होने के दावे किये जाते हैं लेकिन ये पता चलते ही कि लाखों छात्रों ने विदेशों का रुख किया तब ये सोचने को बाध्य होना पड़ता है कि बीते 75 सालों में शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक मापदंडों की बराबरी करने के प्रति हम कहीं न कहीं उदासीन रहे | लेकिन अब जबकि हम वैश्विक शक्ति के तौर पर तेजी से उभर रहे हैं तब भारत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी आकर्षण का केंद्र बने ये आवश्यक प्रतीत होता है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 10 September 2022

सांसदों की संख्या ही नहीं गुणवत्ता में भी वृद्धि हो



दिल्ली में राष्ट्रपति भवन से इण्डिया गेट तक जाने वाले मार्ग का नाम राजपथ से बदलकर कर्तव्य पथ होने के साथ ही  समूचे इलाके का पूरा स्वरूप ही बदल दिया गया है | सेन्ट्रल विस्टा प्रकल्प के अंतर्गत न सिर्फ संसद अपितु सचिवालय सहित अनेक महत्वपूर्ण शासकीय कार्यालय एक जगह लाये जा रहे हैं | संसद का शीतकालीन सत्र भी नई संसद में होगा | तकरीबन 19 एकड़ में फ़ैली इस  परियोजना में उप राष्ट्रपति और  प्रधानमंत्री के आवास भी बनाये गये हैं | आम जनता के आमोद - प्रमोद को दृष्टिगत रखते हुए सभी राज्यों के व्यंजनों के स्टाल लगाये जायेंगे | अभी तक सचिवालय के तौर पर उपयोग हो रहे नॉर्थ और साउथ ब्लॉक संग्रहालय में बदल जायेंगे  |  कुल मिलाकर ये व्यवस्था केन्द्रीय सत्ता के विभिन्न अंगों में बेहतर समन्वय और प्रशासनिक कसावट लाने के उद्देश्य से बनाई गई है | मौजूदा संसद भवन में स्थानाभाव महसूस किया जाने लगा था | उसके समीप बनाई गई एनेक्सी भी बढ़ती संसदीय जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही थी | सबसे बड़ी समस्या विभिन्न मंत्रालयों के अलग – अलग भवनों में होने से थी जिसकी वजह से सुरक्षा प्रबन्ध पर भी खर्च ज्यादा होता रहा | लेकिन सेंट्रल विस्टा के निर्माण के पीछे सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है सांसदों की संख्या में वृद्धि होने पर उनके बैठने के लिए पर्याप्त स्थान की व्यवस्था | हालाँकि इस बारे में अभी तक कोई नीतिगत संकेत तो सामने नहीं आये लेकिन प्रधानमंत्री नर्रेंद्र मोदी की कार्यशैली चौंकाने वाले बड़े निर्णय करने की रही  है | और जैसी कि चर्चा है उसके मुताबिक 2024 का लोकसभा चुनाव वर्तमान 545 की बजाय ज्यादा सीटों के लिए करवाया जा सकता है और उसके लिए बाकायदा संसद में प्रस्ताव लाकर नए सिरे से परिसीमन कराया जाएगा | निश्चित रूप से ये मोदी सरकार का तुरुप का पत्ता होगा जिसका विरोध विपक्ष भी नहीं कर  सकेगा क्योंकि लोकसभा  की सीटें बढ़ने से उसके अवसर भी बढ़ जायेंगे |  प्रश्न ये है कि इसकी जरूरत क्या है तो इस बारे में हुए अनेक अध्ययनों में ये बात निकलकर आ चुकी है कि देश की जनसंख्या के मद्देनजर लोकसभा की सदस्य संख्या में वृद्धि आवश्यक है | ये कितनी हो ये विचार का मुद्दा हो सकता है लेकिन नई लोकसभा में 888 सांसदों के बैठने की व्यवस्था किये जाने से इस दिशा में बड़ा निर्णय होने की प्रबल संभावना है | हालाँकि सांसदों की संख्या में वृद्धि से वेतन - भत्तों , यात्रा और आवास पर होने वाला खर्च भी बढ़ेगा परंतु मतदाताओं की संख्या हर चुनाव में बढ़ती जा रही है जिसे देखते हुए संसद में उनके प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाया जाना उचित ही कहा जाएगा | लेकिन केवल संख्या बढाने मात्र से सांसदों की कार्य शैली में सुधार हो जायेगा और वे जनता के प्रति पहले से अधिक जवाबदेह हो जायेंगे ये उम्मीद पाल लेना अपने आप को धोखा देना होगा | दुर्भाग्य से आजादी के 75 वर्ष बाद भी हमारे देश में ज्यादातार जनप्रतिनिधि कसौटी पर खरे नहीं उतरे | इसका सबसे बड़ा कारण उनमें सीखने की प्रवृत्ति का अभाव है | संसद का पुस्तकालय बहुत ही समृद्ध है लेकिन अवकाश के समय सेंट्रल हॉल अथवा कैंटीन में बतियाते सांसद तो बहुतेरे मिल जायंगे परन्तु  पुस्तकालय में वैसी भीड़ शायद ही किसी ने देखी होगी | नए - नवेले  सांसदों को पुराने सांसदों के अलावा संसद में अधिकारी रहे पूर्व नौकरशाह संसदीय प्रक्रिया का प्रशिक्षण देते हैं | लेकिन इसका समुचित लाभ होता नहीं दिखाई देता | यही वजह है कि संसद और सांसदों के प्रति आम जनता के मन में अपेक्षित सम्मान नहीं रहा | मोदी सरकार ने संसद में होने वाले कामकाज की मात्रा बढ़ाई है | अनेक अवसरों पर सदन अतिरिक्त घंटों तक कार्यरत रहा | इसका लाभ भी हुआ लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि संसद में शोरशराबा तो दोनों पक्षों से होता है लेकिन अच्छे भाषण सुनने नहीं मिलते | राष्ट्रपति के  अभिभाषण और  बजट जैसे विषयों पर भी औपचारिकता ही पूरी की जाती है | उस दृष्टि से प्रधानमंत्री से ये अपेक्षा की जाती है कि वे भाजपा के सांसदों और मंत्रियों की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में भी कदम उठायें |  ये कहना गलत न होगा कि सांसदों की संख्या में वृद्धि से राजनीतिक दलों को भले ही ज्यादा उम्मीदवार उतारने की सुविधा मिल जायेगी किंतु बहस का स्तर नहीं सुधरा तब उसका लाभ ही क्या ? भाजपा से ये उम्मीद इसलिए है क्योंकि वह अपने आपको सबसे अलग बताने का दावा करती है और उसकी एक स्पष्ट और स्थायी विचारधारा भी है | 21 वीं सदी के भारत को यदि विश्व का सिरमौर बनना है  तब संसद और सांसद उससे अछूते रहें , ये संभव नहीं है | प्राधानमंत्री हर चीज  पर बारीकी से नजर रखते हैं | ऐसे में उन्हें भाजपा के भीतर अच्छे जनप्रतिनिधि तैयार करने पर भी ध्यान देना चाहिए | भारत में  नई पीढ़ी की सोच  , जानकारी और अपेक्षाएं भी समय के साथ बदल रही हैं | ऐसे में पुराने ढर्रे की संसद और सांसद उसे  प्रभावित नहीं कर सकेंगे | आजकल हर जगह ये सुनने को मिलता है कि अच्छे लोगों को राजनीति में आना चाहिए | लेकिन ऐसा न होने देने के लिए राजनीतिक दल ही जिम्मेदार हैं क्योंकि उनकी नजर में योग्यता का मापदंड शैक्षणिक योग्यता , पेशेवर अनुभव और उज्ज्वल छवि की बजाय चुनाव जीतने की क्षमता बन गयी है | होना तो ये चाहिए कि सांसदों की गुणवत्ता में सुधार सभी राजनीतिक दलों के चिंतन का विषय बने | लेकिन सत्ता में होने से भाजपा की जिम्मेदारी है कि वह इसको राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाकर संसदीय राजनीति को उच्च कोटि का बनाने आगे आये | प्रधानमंत्री बनने के बाद श्री मोदी ने अनेक नवाचार किये हैं | यदि वे सांसदों की गुणवत्ता में सुधार का बीड़ा उठा लें  तो नये संसद भवन से नई राजनीति की शुरुवात हो सकती है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 9 September 2022

पादरी के चोंगे में छिपे भ्रष्टाचार और विदेशी तार का पर्दाफाश जरूरी



म.प्र और छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरियों की अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं | इसका मुख्य कारण यहाँ आदिवासियों की बड़ी जनसंख्या होना है | ब्रिटिश राज में योजनाबद्ध तरीके से सुदूर इलाकों तक में इन संस्थानों की नींव रखी गई थी | शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के नाम पर भोले – भाले आदिवासी समुदाय में धर्म परिवर्तन का अभियान चलाया गया | धीरे – धीरे उनके मन में ये बात बिठाई जाने लगी कि उनके देवी – देवता तथा पूजा पद्धति  हिन्दुओं से अलग है | पूर्वोत्तर राज्यों में जो अलगाववाद फैला उसका बड़ा कारण वहां के मूल आदिवासी समुदाय का धर्मांतरण ही रहा | म.प्र और छत्तीसगढ़ के साथ ही महाराष्ट्र , बिहार , झारखण्ड , उड़ीसा जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में ईसाई मिशनरियों के प्रभावक्षेत्र में ही नक्सली गतिविधियों का फैलना महज संयोग नहीं   अपितु देश को आन्तरिक रूप से कमजोर करने हेतु रचित षडयंत्र का हिस्सा है | इस बारे में उल्लेखनीय है कि अंग्रेज जाने के पहले भारत में ईसाइयत की जड़ें मजबूत करने के लिए चर्चों को बहुत बड़ी मात्रा में जमीनें दे गए थे | जिनका उपयोग विद्यालयों , अनाथालयों , छात्रावासों और अस्पतालों के लिए भी किया जाने लगा | लेकिन इनका चरम उद्देश्य अंततः धर्मांतरण ही है | यह विडंबना ही है कि अंग्रेजों से मुक्त होने  के बाद भी हम मानसिक तौर पर हीन भावना से नहीं उबर सके जिसका लाभ उठाकर ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में समाज के अभिजात्य वर्ग ने अपने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया | इसका नुकसान ये हुआ कि अंग्रेजी भाषा और संस्कृति युक्त शिक्षा प्राप्त कर प्रगति की दौड़ में आगे निकले लोग शासन और प्रशासन में जम गए जिसका लाभ ईसाई मिशनरियों ने जमकर उठाया | ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि मिशनरियों को बड़ी मात्रा में विदेशों से धन मिलता रहा है जिसका उपयोग ईसाइयत के प्रसार के लिए किया जाता रहा | जब तक अंग्रेजी ज़माने के पादरी रहे तब तक तो इन संस्थाओं का काम केवल ईसाइयत का प्रचार – प्रसार रहा लेकिन जैसे – जैसे आजाद भारत में तैयार पादरी चर्चों और उनके द्वारा संचालित संस्थाओं  से जुड़े  वैसे – वैसे उनमें जमीन – जायजाद की हेराफेरी , गबन , नन बनी महिलाओं के  यौन  शोषण जैसी  बातें भी सामने आने लगीं | पहले - पहल तो धर्म के नाम पर लोग चुप रहे लेकिन जब पानी सिर से ऊपर आने लगा तब  ईसाई समाज के भीतर से भी पादरियों एवं संस्थानों के पदाधिकरियों के काले कारनामों के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं | हालाँकि इन्हें दबाने का काम भी होता रहा किन्तु चोरी के माल में बंटवारे के झगड़े के कारण बहुत सी बातें सामने आने लगीं | हालाँकि  ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करने वाले सत्ताधीशों ने ईसाई मिशनरियों के भ्रष्टाचार के प्रति आंखें मूंदें रखीं | चर्चों की जमीनों की बंदरबांट होती रही और शासन – प्रशासन चुपचाप देखते रहे क्योंकि मिशनरियों द्वारा पढ़ाये नेता और अधिकारी समूचे तंत्र पर हावी जो रहे | इसका ताजा प्रमाण है म.प्र के जबलपुर शहर में गत दिवस एक वरिष्ट ईसाई बिशप पी.सी सिंह के यहाँ आर्थिक अपराध विंग ( ईओडब्ल्यू ) द्वारा मारा गया छापा | इस दौरान उनके यहाँ से 1 करोड़ 65 लाख रु. नगद , 9 आलीशान कारें और 80 लाख के आभूषणों के अलावा 18 हजार डालर विदेशी मुद्रा के रूप में मिले | करोड़ों रूपये की जमीन -  जायजाद के दस्तावेज भी जांच दल ने जप्त किये हैं | चूंकि श्री सिंह जर्मनी में हैं इसलिए उनसे पूछताछ उनके लौटने पर होगी | एक साधारण से पादरी के यहाँ इतनी बड़ी मात्रा में मिली नगदी और सबसे बड़ी बात विदेशी मुद्रा का पाया जाना अनेकानेक संदेहों को जन्म देने वाला है | सबसे रोचक बात ये है कि जिस चर्च से आरोपी बिशप जुड़े हैं उसी के सदस्यों की शिकायत पर उनके यहाँ फीस घोटाले की जाँच हेतु दबिश दी गई थी लेकिन ईओडब्ल्यू टीम की आँखें फटी रह गईं जब फीस घोटाले संबंधी दस्तावेजों के अलावा अनपेक्षित रूप से करोड़ों रूपये की नगदी के साथ ही बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिली | जिससे लगता है बिशप के तार विदेशों से जुड़े भी हो सकते हैं | उनके पासपोर्ट आदि की जांच से भी बहुत से तथ्य उजागर होंगे | इस छापे के बाद ये बात सामने आई है कि श्री सिंह के विरूद्ध देश के अनेक हिस्सों में 99 आपराधिक प्रकरण लंबित हैं | ज़ाहिर है शासन - प्रशासन में अपने रुतबे के कारण वे अभी तक बचते रहे | हालाँकि वे अपने बचाव में ईसाई होने के कारण प्रताड़ित होने का शिगूफा छोड़ सकते थे लेकिन उनकी गर्दन में फंदा डालने वाले चूंकि उन्हीं की  संस्थाओं से जुड़े लोग हैं इसलिए वे प्रदेश सरकार पर ईसाई  विरोधी होने का आरोप भी नहीं लगा सकेंगे | जिस प्रकार की  खबरें उक्त  छापे के बाद छन – छनकर आ रही हैं उनसे  लगता है ईसाई मिशनरियों के कारोबार में धर्मांतरण के साथ ही भारी भ्रष्टाचार भी है | चर्चों से जुड़ी संपत्तियों का भूमाफिया के साथ मिलकर पादरियों ने जिस प्रकार व्यवसायीकरण किया है वह उन शर्तों का खुला उल्लंघन है जो इनके  आवंटन से जुडी हुई हैं |  ये सब देखते हुए कहना गलत न होगा कि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित संस्थाओं में भारी अनियमितताएं हैं और पादरी का चोंगा पहिनकर धर्मगुरु बने लोग न सिर्फ धर्मांतरण के षडयंत्र में लिप्त हैं अपितु आर्थिक अपराधों में भी उनकी सक्रिय भूमिका है | 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से हजारों ऐसी ही धार्मिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं का असली चेहरा सामने आया जिसके बाद उनको मिलने वाली विदेशी सहायता पर रोक लगा दी गयी | ईसाई समाज के भीतर भी ऐसे अनेक फर्जी लोग निकले जो सेवा प्रकल्प के नाम पर विदेशी सहायता का जुगाड़ करने के बाद उसका उपयोग ईसाइयत के प्रचार – प्रसार हेतु करते थे | ये सब देखते हुए जरूरी हो गया है  कि केंद सरकार की जांच एजेंसियां चर्चों की संपत्तियों के गोलमाल के साथ ही ईसाई संस्थानों के कारोबार की सूक्ष्म जांच करवाएं क्योंकि ये बात अनेक मामलों में सामने आ चुकी है कि सेवा की आड़ में धर्मांतरण का जो खेल चल रहा है उसकी वजह से राष्ट्रविरोधी ताकतें मजबूत हो रही हैं | बिशप पी. सी . सिंह की सम्पन्नता के साथ ही उनके यहाँ बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की जप्ती से अनेक सवाल खड़े हो गए हैं | सबसे बड़ी बात ये बात ये है कि उनके विरुद्ध उनके समाज के लोगों ने ही शिकायतें जाँच एजेंसियों को भेजी हैं | यदि इस दिशा में निडर होकर जांच की जावे तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आयेंगें | धर्म परिवर्तन की आड़ में देश को भीतर से कमजोर कर रहे तत्वों का पर्दाफाश राष्ट्रहित में होगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी