Friday, 16 December 2022

गालियों , गोलियों और नग्नता के बिना भी सफल फ़िल्में बनी हैं




शाहरुख खान की आने वाली फिल्म पठान को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है | उसका जो एक गीत  जारी हुआ उसमें  नायिका को  भगवा रंग के कम वस्त्रों और  उत्तेजक मुद्राओं  में नायक के साथ दिखाया गया जिसके प्रति नाराजगी जताते हिन्दू संगठन खुलकर सामने आ रहे हैं | अनेक राजनेताओं और धर्मगुरुओं  ने भी विरोध करते हुए सिनेमा गृह जला देने तक की बात  कही है | जहाँ  भाजपा की सरकारें हैं वहां फिल्म  पर रोक लगाने की मांग भी उठ  रही है | नायिका दीपिका पादुकोण द्वारा दिल्ली की जे.एन.यू में हुए  भारत विरोधी आन्दोलन को दिए समर्थन  का हवाला देते हुए उन्हें टुकड़े – टुकड़े गैंग से जुड़ा बताया जा रहा है | विरोध करने वालों का आरोप है कि बेशर्म रंग नामक गीत में  दीपिका को भगवा वस्त्र पहनाकर  अश्लील दृश्य फिल्माने का मकसद   हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाना है और  भगवा रंग को सनातन धर्मियों के लिए पवित्र होने से  बेशर्म रंग कहना आपत्तिजनक है | दूसरी तरफ फिल्म के बचाव में भी एक वर्ग मुखर है | भगवा कपड़े  पहने अन्य नायिकाओं के चित्र दिखाकर  कहा  जा रहा है कि ऐसा पूर्व में भी होता रहा है किन्तु तब विरोध नहीं हुआ | भाजपा समर्थक कही  जाने वाली नायिका  कंगना रनौत के बदन उघाड़ू चित्रों के जरिये पठान के विरोधियों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप भी लगाया जा रहा है | सबसे बड़ी  बात ये उठ रही है कि फिल्म सेंसर बोर्ड ने इस तरह के दृश्यों और गाने को अनुमति कैसे दे दी जिससे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं | पठान समर्थकों का कहना है  कि  फिल्म का विरोध कर रहे व्यक्तियों और संगठनों को  सेंसर बोर्ड के उन लोगों को हटाने की माँग करनी चाहिए  जिन्होंने उसको प्रदर्शन हेतु प्रमाणपत्र प्रदान किया | ये पहला अवसर नहीं है जब किसी फिल्म का  प्रदर्शित होने के पूर्व ही विरोध शुरू हो गया | ऐतिहासिक कथानक पर बनी फिल्मों में तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने पर बवाल मचता रहा है | कुछ फ़िल्में इसलिए विरोध का शिकार हुईं क्योंकि उनकी कहानी सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध थी  | अश्लीलता का अतिरेक भी लोगों को नागवार गुजरा है | इसमें दो मत नहीं है कि फ़िल्म उद्योग के कुछ पटकथा लेखक , निर्देशक और अभिनेता जान  बूझकर ऐसी फ़िल्में लेकर आते हैं जिन पर विवाद पैदा होता है |  पठान का जो गीत और  दृश्य प्रसारित किये गये उनसे इस बात का संदेह होता है कि  सोच - समझकर ऐसा किया गया  | अनेक निर्माता उन दृश्यों  और संवादों को हटा देते हैं जिन पर ऐतराज किया जाता है | जोधा – अकबर फिल्म के निर्माताओं ने करणी सेना वालों को फिल्म दिखाकर उनके सुझाये फेरबदल कर दिए | हालांकि विवादित हुई कुछ फ़िल्में जब बिना बदलाव किये ही प्रदर्शित हुईं तब उन्हें दर्शक  नहीं मिले जबकि कुछ अपेक्षा से ज्यादा सफल रहीं | कुल मिलाकर  मामला बड़ा पेचीदा है | पठान फिल्म को भाजपा शासित राज्यों में भले ही विरोध झेलना पड़े लेकिन जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकारें हैं वे उसे पूरा समर्थन और संरक्षण प्रदान करेंगीं ये भी तय है | इस प्रकार विरोध और समर्थन का ये मुकाबला हमारे समाज की पहिचान बनता जा रहा है जिसका लाभ फिल्म निर्माता उठा लेते हैं  | उदाहरण के लिए बाबा रामदेव को समाज  के बड़े वर्ग का समर्थन मिलने से उनके व्यावसायिक कारोबार को भी जबर्दस्त सहारा मिला | लेकिन इसी कारण वे दूसरे तबके के लिए उपहास और नफरत का पात्र बने  | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि फ़िल्मी दुनिया में लम्बे समय तक एक विचारधारा विशेष का आधिपत्य रहा | विशेष तौर पर पटकथा , गीत और संवाद  लेखन में कथित प्रगतिशील लोग हावी थे  | कुछ अभिनेताओं , निर्माताओं और निर्देशकों के राजनीतिक प्रतिबद्धता के प्रति समर्पित होने से फिल्मों पर उनका असर साफ़ नजर आता रहा | अस्सी के दशक के साथ ही फिल्मों में माफिया का प्रवेश हुआ जिससे फिल्म निर्माण का स्वरूप और संस्कृति पूरी तरह बदल गई | समानांतर  सिनेमा के नाम पर होने वाले प्रयोग नग्नता को कला का पर्याय बताने में जुट गए | सेंसर नामक केंची की धार दिन ब दिन भोंथरी होती जाने से उसका रहना न रहना बराबर हो गया | कुल मिलाकर सारा खेल येन केन प्रकारेण पैसा बटोरना रह गया है | रही – सही  कसर पूरी कर दी छोटे परदे पर ओ.टी.टी के पदार्पण ने ,  जिसमें वास्तविकता के नाम पर अश्लीलता परोसने का अभियान चल पड़ा है | गालियों और गोलियों की बौछारों से भरी ये  श्रृंखलाएं  मनोरंजन के नाम पर कौन सा  सन्देश दे रही हैं ये  फिल्म समीक्षकों के ही नहीं अपितु समाजशास्त्रियों के लिए भी चिंतन – मनन का विषय है | टीवी पर मनोरंजन का दौर जिन धरावाहिकों से शुरू हुआ वे पारिवारिक माहौल को पेश करने के कारण लोकप्रिय हुए  जिन्हें तीन पीढ़ियों के लोग एक साथ देखते थे | लेकिन आज छोटा पर्दा जो परोस रहा है उसमें अधिकतर की विषय वस्तु वयस्कों के लिए ही है | लेकिन सभी वयस्क  गंदी गालियों को सुनना पसंद करते हैं ,ये पूरी तरह गलत है | सबसे  बड़ी बात ये है कि समाज की सोच को विकृत करने की साजिश  पर विराम कैसे लगाया जाए ? फिल्म उद्योग में  बॉक्स आफिस फार्मूला बहुत महत्वपूर्ण होता है | निर्माता को अपने निवेश की चिंता रहती है तो कलाकारों को छवि की | लेकिन अनेक निर्माता – निर्देशक और अभिनेता ऐसे भी हुए जिन्होंने बिना बॉक्स आफिस की फ़िक्र किये साधारण बजट से ऐसी असाधारण फ़िल्में बनाईं जिन्होंने लोकप्रियता के कीर्तिमान स्थापित कर डाले | शाहरुख खान को फिल्म उद्योग में आये चौथाई सदी से ज्यादा बीत चुका है | लेकिन आज  तक वे एक भी ऐसी भूमिका में नहीं दिखे जो उन्हें कालजयी बना सके | ऐसा नहीं है कि प्रयोगधर्मी फ़िल्में पहली नहीं बनीं किन्तु उनमें सामाजिक मर्यादाओं का ध्यान रखा गया | वयस्क कथानक पर भी अनेक फ़िल्में आईं किन्त्तु उनमें से एक भी बिमल रॉय , गुरुदत्त ,   हृषिकेश मुखर्जी और वासु भट्टाचार्य की फिल्मों के सामने नहीं ठहरीं | गुलज़ार ने भी फिल्म रूपी माध्यम का बहुत ही करीने से उपयोग किया और सितारा अभिनेताओं के साथ कम बजट में बेहतरीन और सफल फ़िल्में बनाईं  | आशय मात्र इतना है कि फ़िल्में केवल मनोरंजन और पैसा कमाने का जरिया न होकर समाज को संदेश देने का माध्यम भी है | अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को भी ये सोचना चाहिए कि उनके भी कुछ सामाजिक सरोकार हैं | ध्यान रहे दादा कोडके जैसे फिल्मकारों पर विस्मृति की धूल जम चुकी है जबकि व्ही. शांताराम का नाम उनके अवसान के दशकों बाद भी आदर के साथ लिया जाता है | 

: रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 15 December 2022

फुटबाल विश्व कप में भारत की गैर मौजूदगी शर्मनाक



 
खेल प्रेमियों के सिर पर इन दिनों फुटबाल  का जादू सवार है | कतर में हो रहे विश्व कप का फायनल मुकाबला अर्जेंटीना और फ़्रांस के बीच होना है | संभवतः ये दुनिया में सबसे ज्यादा देखा जाना वाला  मैच होगा | वैसे भी फुटबाल विश्व का सबसे लोकप्रिय खेल है जो  दुनिया के छोटे बड़े सभी देशों में  खेला जाता है | इसके सितारा खिलाड़ियों को पेशेवर क्लबों से करोड़ों रु. मिलते हैं | विश्व कप तो खैर चार बरस बाद होता है लेकिन यूरोप और दक्षिण अमेरिका के क्लबों के बीच चलने वाले मुकाबलों  के प्रति भी जबरदस्त दीवानगी देखने मिलती है | ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में तो फ़ुटबाल के सितारा खिलाड़ी वहां के राष्ट्रीय महानायक माने जाते हैं | केवल संपन्न देश ही नहीं वरन आर्थिक दृष्टि से कमजोर छोटे – छोटे देश तक फुटबाल विश्व कप में अपने प्रदर्शन से खेल प्रेमियों का दिल जीत लेते हैं | कतर विश्व कप में भी अनेक छोटे देशों ने महारथियों को धूल चटाते हुए बड़े उलटफेर कर डाले | भारत में  विश्व कप के मैच देखने वालों की संख्या करोड़ों में होगी | देश के पूर्वी इलाके में फ़ुटबाल का काफी जोर है | यहाँ से अनेक अंतर्राष्ट्रीय ख़िलाड़ी निकले जिन्हें यूरोप के क्लबों में खेलने का अवसर भी मिला | एक ज़माने में कोलकाता में फ़ुटबाल की  दीवानगी क्रिकेट से ज्यादा  होती थी | मोहन बगान और मोहम्मडन स्पोर्टिंग के नाम पूरे देश में जाने जाते थे | गोवा भी फ़ुटबाल का बड़ा केंद्र है | लेकिन भारतीय खेल प्रेमी ये देखकर निराश होते हैं कि फ़ुटबाल के विश्व कप में भारत का नाम कहीं नहीं है | उपलब्ध जानकारी के अनुसार 1950 के विश्व कप में भारतीय टीम को खेलने की पात्रता मिल गयी थी | लेकिन उस समय तक भारतीय खिलाड़ी नंगे पाँव खेलते थे जिसकी अनुमति  आयोजकों ने नहीं दी | दूसरा कारण ये बताया जाता है कि फुटबाल संघ के पास आर्थिक संसाधन नहीं थे | लेकिन अब वह बात नहीं है | बावजूद उसके विश्व कप जैसे प्रतिष्ठित आयोजन में हमारी टीम  का न खेलना शर्मनाक है | इस बार के क्वालीफाइंग मैचों के दूसरे राउंड में ही हमारी टीम बाहर हो गई थी | हालाँकि पहले की अपेक्षा स्थिति में काफी सुधार हुआ है | खिलाड़ियों का मनोबल और आर्थिक स्थिति भी पूर्वापेक्षा सुधरी है | ओलम्पिक खेलों के मद्देनजर जैसी तैयारी बीते कुछ सालों में की गयी उसके अच्छे परिणाम निकले और पदक तालिका में भारत नजर आने लगा | इसी तरह बैडमिन्टन के खेल में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति में सुधार किया है | हॉकी में  लंबे समय तक चले  निराशाजनक प्रदर्शन के बाद स्थिति बेहतर हुई  है  | वहीं  निशानेबाजी और मुक्केबाजी के अलावा भी कुछ मैदानी खेल हैं जिनमें भारत की मौजूदगी महसूस की जा सकती है | क्रिकेट का तो भारत सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है | आईपीएल के सफल आयोजन से इस खेल में भारत का डंका दुनिया भर में बज रहा है | लेकिन फ़ुटबाल में आज तक अपेक्षित परिणाम नहीं आना , सोचने को बाध्य करता है क्योंकि  सवाल विश्व कप में खेलने का न होकर देश की छवि से जुड़ा हुआ है | किसी भी देश की प्रतिष्ठा में खेलों में उसका प्रदर्शन काफी सहायक बनता है | एक जमाना था जब चीन वैश्विक बिरादरी से कटा  हुआ था | लेकिन जबसे उसे ओलम्पिक में भाग लेने का अवसर मिला उसने अपने को अमेरिका और रूस के मुकाबले खड़ा  करने पर ध्यान दिया जिसका अनुकूल परिणाम भी उसे मिला | दुर्भाग्य से हमारे देश में खेल संगठनों में राजनीति का अतिक्रमण जिस तरह हुआ उसने खेल और खिलाड़ियों को बहुत नुकसान पहुँचाया | फुटबाल भी उससे अछूती नहीं रही | यही वजह है कि इतने बड़े देश की टीम विश्व कप खेलने की पात्रता हासिल नहीं कर पाती | भारत सरकार का खेल मंत्रालय इस दिशा में काफी सक्रिय हुआ है | ये देखते हुए यह अपेक्षा करना गलत नहीं होगा कि 2026 में होने वाले अगले फुटबाल विश्व कप में हमारी टीम को हिस्सा लेने का अवसर मिलेगा | लेकिन ये तभी संभव है जब अभी से इस बारे में युद्धस्तर पर तैयारी शुरू की जावे | संभावित युवा खिलाड़ियों को देश – विदेश जहाँ भी जरूरी हो समुचित प्रशिक्षण दिलवाने का प्रबंध किये जाने के साथ ही किसी विश्व स्तरीय कोच से अनुबंध कर उसकी सेवाएँ ली जावें | यदि सरकार और फुटबाल के पुराने खिलाड़ी तथा प्रशासक ठान लें तो अगले विश्व कप में भारतीय टीम बड़े उलटफेर करने लायक बन सकती है | एक समय था जब हमारे क्रिकेटर  तेज गेंदबाजों के सामने बचते फिरते थे |  नारी कांट्रेक्टर का तो कैरियर ही सिर में गेंद लग जाने के कारण खत्म हो गया | सत्तर  के दशक तक भारत के पास एकाध अपवाद छोडकर कोई ढंग  का तेज गेंदबाज नहीं था | उस वजह से हमारे बल्लेबाजों को भी तेज गेंदों का सामना करने  का अभ्यास न था | लेकिन आज हमारे पास विश्व स्तरीय तेज गेंदबाज भी हैं और बल्लेबाज भी | इसका कारण क्रिकेट पर दिया गया ध्यान है | हॉकी भी बीच में पतन के कगार पर पहुंच गई थी लेकिन उसके पुनरुत्थान  की कोशिशों का लाभ हुआ | ओलम्पिक की समयबद्ध तैयारी भी रंग लाने लगी है | इससे साबित होता है कि योजना  बनाकर खेलों का विकास किया जाना  संभव है | भारत सरकार को चाहिए वह अगले फ़ुटबाल विश्व कप के लिए अभी से तैयारी शुरू करे और  इसके लिए प्रायोजक और प्रशिक्षक भी तलाशे जावें | लेकिन इसे  जूनून की शक्ल देनी होगी | दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल में 140 करोड़ की आबादी वाले देश का सम्मानजनक स्थान नहीं होना विचारणीय  है |


रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 14 December 2022

जिनपिंग अपने बचाव में भारत पर हमले की रणनीति पर चल रहे



अरुणाचल के तवांग क्षेत्र में चीनी सैनिकों की घुसपैठ को भरतीय सेना ने जिस तरह विफल किया उससे  साबित हो गया कि गलवान घाटी की घटना के बाद सीमा पर हमारी चौकसी काफी अच्छी है | जिस प्रकार की जानकारी अधिकृत रूप से आई  उसके अनुसार चीनी सैनिकों ने पूरी तैयारी के बाद भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश की किन्तु बिना देर  लगाये हमारे सैनिकों ने उन्हें न सिर्फ पीछे धकेला अपितु अच्छी – खासी पिटाई भी की | हालांकि कुछ जवानों को चोटें आईं किन्तु इस मुठभेड़ में भी चीनी सैनिक ज्यादा संख्या में घायल हुए | स्मरणीय है गलवान में भी हमले की शुरुआत चीनी सेना की तरफ से हुई थी जिसमें एक भारतीय कर्नल मारे गये किन्तु  हमारे जवानों के पलटवार में चीनी  सेना को जबरदस्त नुकसान हुआ | उस घटना के बाद से लद्दाख से भूटान तक चीन की किसी भी सैन्य कार्रवाई से निपटने के लिए हमारी तैयारियां काफी पुख्ता हुई हैं | थलसेना तो थी ही किन्तु अब अग्रिम मोर्चे पर वायुसेना भी मुस्तैद है | मिसाइलें वगैरह भी लगाई गई हैं | ऐसा नहीं है कि चीन इन सबसे बेखबर हो किन्तु उसकी नीति यही है कि अपने पड़ोसियों को चैन से बैठने न दिया जाए | बीते कुछ समय से वह वन चाइना योजना के अंतर्गत ताइवान पर चढ़ाई  की रिहर्सल करता रहता है | यद्यपि अमेरिका के भय से  वह सीधा हमला करने से बच रहा है और फिर यूक्रेन में रूस के राष्ट्रपति पुतिन जिस तरह उलझ गये हैं उससे भी चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग सतर्क हैं | लेकिन देश के  अंदरूनी हालात उनकी परेशानी का कारण बने हुए हैं | भले ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के हाल ही में संपन्न सम्मलेन में उन्होंने अपनी सत्ता कायम रखने पर मुहर लगवा ली किन्तु कोरोना का प्रकोप बढ़ते जाने से करोड़ों लोग घरों में कैद  हैं | लॉक डाउन लगाकर  कारखानों में कार्यरत लोगों को घर नहीं आने दिया जा रहा | जरूरी चीजों की आपूर्ति गड़बड़ा चुकी है जिसकी वजह से आम जनता में रोष है | बीते अनेक दशकों में ये पहला अवसर है जब चीन में नाराज लोग सड़कों पर उतरकर सरकार के विरोध में प्रदर्शन और नारेबाजी करने का साहस दिखा रहे हैं  | ये चीन के भीतरी माहौल में बड़े  बदलाव का इशारा है | इसीलिये अब ये कहा जाने लगा है कि वहां सोवियत संघ जैसे बिखराव की शुरुआत होने लगी है | कोरोना के बाद वैश्विक परिदृश्य में हुए बदलाव से चीन के प्रति नफरत में वृद्धि का दुष्प्रभाव उसकी आर्थिक स्थिति पर भी दिखाई दे रहा है | निर्यात और विदेशी निवेश में तो कमी आई ही अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भी अपना कारोबार वहां से समेटना शुरू कर दिया है | इन सबसे परेशान जिनपिंग युद्ध का माहौल बनाकर जनता का ध्यान घरेलू मोर्चे से हटाने की नीति पर चल रहे हैं | उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि ताइवान को हड़पना आसान नहीं होगा | इसीलिये उन्होंने भारत में घुसपैठ की योजना पर काम शुरू कर दिया है | ऐसा करना उसके लिए इसलिए भी आसान है क्योंकि दोनों देशों की सीमा पर शांति के समय भी फ़ौजी तैनाती रहती है | हालाँकि हर मुठभेड़ के बाद दोनों देशों के  सैन्य कमांडरों की  मेल - मुलाकात में  मामला सुलझाकर दोबारा वैसा न होने की प्रतिबद्धता भी दोहराई जाती है किन्तु चीन अपनी आदत से बाज न आते हुए तनाव के हालात पैदा करता रहता है | अरुणाचल की सीमा पर उसकी  हरकतें लगातार जारी रहती हैं | हमारी सीमा से सटे अपने इलाके में गाँव बसाने की उसकी योजना जारी है | यद्यपि दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति कायम है कि गोली नहीं चलाई जावेगी | यही वजह है कि पहले डोकलाम और उसके बाद गलवान में हुई झड़पों के दौरान हाथापाई और डंडों का इस्तेमाल ही हुआ | तवांग की ताजा झड़प में भी कंटीले तार लगे डंडों जैसी चीजें  ही उपयोग की गईं | ज्यादातर मामलों में धक्का - मुक्की और हाथापाई ही देखने मिली है | ये कहना गलत न होगा कि चीन इन हरकतों के जरिये भारतीय सेना की ताकत और मुस्तैदी का परीक्षण करता रहता है | ये संतोष का विषय है कि 1962 में मिली हार के बाद से ही चीन के साथ निपटने की तैयारी लगातार होती रही किन्तु बीते आठ साल में जिस पैमाने पर अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के साथ ही सीमावर्ती इलाकों में सडक , पुल , हवाई पट्टी आदि का विकास किया गया उससे सेना के साथ – साथ  सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वालों का आत्मविश्वास भी बढ़ा है | इसका अनुभव गलवान हादसे के समय हुआ जब लद्दाख की जनता किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने तैयार नजर आई | कुछ – कुछ वैसा ही तवांग से आ रही प्रतिक्रिया से भी ज़ाहिर हो रहा है | सरकार और सेना के बीच बेहतर समन्वय बने रहने से किसी भी हमले के समय तेजी से पलटवार करना संभव हो जाता है | तवांग में हमारे जवान जिस तत्परता से सक्रिय हुए और चीनी टुकड़ियों को पीटकर खदेड़ दिया उससे देश का मनोबल बढ़ा है | लेकिन ऐसे मामलों में राजनीति से बचना चाहिए क्योंकि जान हथेली पर रखकर  सीमाओं की सुरक्षा के लिये तैनात फ़ौजी जवान और अधिकारी जब सुनते हैं कि उनकी क्षमता और वीरता पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं तो उनका मन खिन्न हो जाता है | चीन इस घटना के बाद शांत बैठ जाएगा ये मान लेना मूर्खता होगी | हो सकता है उसकी अगली हरकत किसी दूसरे इलाके में देखने मिले क्योंकि  उसके अंदरूनी हालात जैसे – जैसे खराब  होंगे वैसे – वैसे वह भारतीय सीमा पर अशांति पैदा करने की कोशिश करेगा |                                     
रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 13 December 2022

मोदी की हत्या की बात कहने वाले को कड़ा दंड मिले वरना ये प्रवृत्ति और बढ़ेगी



म.प्र में भारत यात्रा के दौरान एक सभा में राहुल गांधी ने कहा था कि वे नरेंद्र मोदी और आरएसएस से लड़ते हैं लेकिन उनके मन में इनके प्रति नफरत नहीं है | एक लोकतांत्रिक देश में किसी  राजनीतिक नेता द्वारा अपने विरोधी व्यक्ति अथवा संगठन के विरुद्ध इस तरह की बात कहना स्वाभाविक ही है | हालाँकि उसके बाद गुजरात में चुनाव प्रचार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड्गे ने श्री मोदी को रावण कहकर श्री गांधी की भावना के विरुद्ध आचरण किया जिस पर भाजपा ने कांग्रेस को घेरा | चुनाव परिणाम से ये स्पष्ट हुआ कि कांग्रेस की शर्मनाक हार में श्री खड़गे का बयान भी सहायक साबित हुआ | अतीत में भी प्रधानमंत्री के विरुद्ध ऐसी ही टिप्पणियाँ होती रही हैं जिनका भाजपा ने जमकर लाभ  उठाया | देश की मौजूदा राजनीति जिस मुकाम पर आकर खड़ी है उसमें शालीनता और सौजन्यता तेजी से लुप्त हो रही हैं | वैचारिक विरोध  व्यक्तिगत वैमनस्यता में बदलने लगा  है | लेकिन हद तो तब हो गई जब गत दिवस म.प्र में कांग्रेस के वरिष्ट नेता और पूर्व मंत्री राजा पटेरिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के लिए तैयार रहने जैसी बात पार्टी कार्यकर्ताओं से कह डाली | उन्होने ये भी कहा कि संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिये श्री मोदी को हराना जरूरी है | जब हत्या जैसी बात पर बवाल होने लगा तब जाकर उनको होश आया और फिर गांधी के अनुयायी होने का ढोंग रचते हुए उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि उनके बयान को गलत तरीके से प्रसारित किया गया है और हत्या से उनका आशय पराजित करना रहा | भाजपा ने बिना देर लगाए उक्त नेता के साथ ही कांग्रेस को भी घेरना शुरू कर दिया  | मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा खुद मोर्चे पर आ गये और श्री पटेरिया  के विरुद्ध थाने में प्रकरण भी दर्ज कर लिया गया | चूंकि उक्त बयान के वीडियो उपलब्ध हैं इसलिए वे ये कहने की चालाकी नहीं दिखा सके कि उन्होंने श्री मोदी की हत्या जैसी बात कही ही नहीं | उनके स्पष्टीकरण में भी किसी तरह का अफसोस नजर नहीं आया | भाजपा ने जब दबाव बढ़ाया तब कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता के.के.मिश्रा ने बजाय श्री पटेरिया की निंदा करने के ये कहकर पिंड छुडा लिया कि उस बयान से पार्टी का कोई संबंध नहीं है | पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं की टिप्पणियाँ भी अब तक नहीं सुनाई दीं  | प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने कांग्रेस के अहिंसावादी होने का हवाला देते हुए श्री पटेरिया के बयान की निंदा तो की किन्तु इसके साथ ही ये भी जोड़ दिया कि यदि वीडियो में कही बात सही है तो | राहुल गांधी ने भी इसका संज्ञान नहीं लिया जबकि कुछ दिन पहले ही उन्होंने श्री मोदी से लड़ाई के बाद भी नफरत न होने  जैसी बात कही थी | होना तो ये चाहिए था कि कांग्रेस उक्त नेता को निलम्बित कर फिर उनसे सफाई मांगती | लेकिन उसने बयान से दूरी बनाने की बात कहकर अपना दामन बचाने का दांव चला  | वैसे तो   श्री पटेरिया लम्बे समय से प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर पड़े हैं लेकिन पूर्व में वे सत्ता और संगठन दोनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके हैं | भले ही वे राजनीतिक तौर पर सड़क पर आ गये हों किन्तु उनको सड़क छाप नेता नहीं माना जा सकता | और इस आधार पर श्री मोदी की हत्या के लिए तैयार रहने जैसी बात को न ही जुबान का फिसलना कह सकते हैं और न ही उनके भाषाई ज्ञान में कमी को इसका कारण माना जा सकता है | इसीलिये उक्त बयान बहुत ही आपत्तिजनक और अपराध की श्रेणी में रखे जाने योग्य है | श्री मोदी तो खैर ,देश के प्रधानमंत्री हैं किन्तु किसी साधारण व्यक्ति की हत्या की बात कहना किसी भी ऐसे समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता जहां संविधान के अनुसार समूची व्यवस्था संचालित होती है | प्रधानमंत्री की हत्या की बात कहना तो क्या सोचना भी गंभीर अपराध है और इसलिए श्री पटेरिया को कानून के अनुसार   समुचित सजा मिलना जरूरी है  | यदि ऐसा नहीं होता तब राजनीतिक बिरादरी और आतंकवादियों में कोई फर्क नहीं बचेगा | ऐसा लगता है उक्त कांग्रेसी नेता सिर तन से जुदा वाली मनसिकता से प्रेरित हैं , अन्यथा लम्बे राजनीतिक अनुभव के बाद इस तरह की निम्नस्तरीय बात कहने का और दूसरा कारण नहीं हो सकता | गांधी के अनुयायी होने का दावा करने वाले श्री पटेरिया ने श्री मोदी के विरूद्ध अपनी भड़ास जिस भी वजह से निकाली हो किन्तु उनकी टिप्पणी बापू का भी अपमान है | होना तो ये चाहिए था कि भाजपा से पहले कांग्रेसजन अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए उनको पार्टी से बाहर करने की मांग उठाते  किन्तु  अनेक नेता और समर्थक सोशल मीडिया पर उन्हें साहसी बता रहे हैं | इस मामले का अंत कहाँ और कैसे होगा ये फ़िलहाल तो कहना मुश्किल है लेकिन देश के प्रधानमंत्री की हत्या जैसी बात खुले आम कहने वाले व्यक्ति का अब तक पार्टी में बना रहना कांग्रेस के लिए भी शर्मनाक है | यदि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की बुद्धि और विवेक अब तक जीवित है तब उन्हें  श्री पटेरिया को निकाल बाहर करते हुए खुद आगे आकर माफी मांगना चाहिए | अन्यथा इस गंभीर अपराध की पुनरावृत्ति बढ़ सकती है | और उस दौर की कल्पना से भी पांव कांपने लगते हैं |   


रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 December 2022

म.प्र में गुजरात फॉर्मूले की सफलता को लेकर भाजपा असमंजस में



गुजरात में ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा के राष्ट्रीय संगठन ने निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए रणनीति तैयार करने का काम शुरू कर दिया है | उसी सिलसिले में ये खबर बड़ी तेजी से उभर रही है कि म.प्र में भी गुजरात फार्मूले को दोहराते हुए सरकार और संगठन में बड़े  पैमाने पर परिवर्तन किया जायेगा जिससे मौजूदा चेहरों के प्रति जनता और कार्यकर्ताओं की  नाराजगी चुनाव में सामने न आये | गुजरात में मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों को बदलने का दांव जिस तरह कारगर हुआ उससे केन्द्रीय नेतृत्व काफी प्रसन्न है | वैसे तो आगामी वर्ष राजस्थान  और छत्तीसगढ़ में भी चुनाव होना हैं जहां विपक्ष में होने से भाजपा को  सरकार विरोधी भावना का भय नहीं है | लेकिन म.प्र उसकी चिंता का विषय बना हुआ है | नगर निगम चुनाव में ग्वालियर , जबलपुर , रीवा जैसे बड़े शहरों के साथ मुरैना और कटनी में  महापौर प्रत्याशी हारने को पार्टी आलाकमान खतरे का संकेत मान रही है |  हालाँकि पार्टी के पार्षद  ज्यादा जीते जिससे ये संकेत मिला कि प्रत्याशी चयन में ज़रा सी भी लापरवाही या मनमानी जनता और पार्टी के परम्परागत समर्थकों को भी बर्दाश्त नहीं होती | शहरी मतदाताओं ने 2018 में भी पार्टी को झटका दिया था | भोपाल , जबलपुर , इंदौर , ग्वालियर आदि में कांग्रेस ने सेंध लगाते हुए भाजपा से प्रदेश की सत्ता छीन ली  | भले ही कांग्रेस के दो दर्जन विधायकों के दलबदल से शिवराज सिंह चौहान का राजयोग लौट आया लेकिन उन विधायकों को पार्टी संगठन सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पा रहा | पिछला चुनाव हारे अनेक भाजपा प्रत्याशियों को कांग्रेस से आये विधायकों  की वजह से अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है | ग्वालियर में सिधिया समर्थक को महापौर  की टिकिट न देने का प्रतिकूल परिणाम  निकलने के बाद उच्च नेतृत्व इस बात से चिंतित है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से आये नेताओं के साथ पार्टी के कार्यकर्ताओं का सामंजस्य नहीं बैठा तो 2018 वाली गफलत दोहराई जा  सकती है | यही वजह है कि गुजरात जैसे प्रयोग की बात उठने पर सिंधिया समर्थकों के रुख का आकलन करना जरूरी होगा क्योंकि उनमें से अनेक  भाजपाई संस्कृति में ढल नहीं पा रहे  | ये सब देखते हुए म.प्र में  गुजरात जैसा बदलाव आसान  नहीं होगा | इसका कारण ये है कि यहाँ नरेंद्र मोदी और अमित शाह का वैसा दबाव नहीं है जैसा गुजरात में था | हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा ने बड़े पैमाने पर विधायकों की टिकिट काटने का प्रयोग किया था | लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का गृह प्रदेश होने के बावजूद भी खुलकर बगावत हुई जिसका खामियाजा सरकार हाथ से निकलने के रूप में सामने है | और फिर ये भी कि गुजरात में विधानसभा चुनाव से काफी पहले सरकार का चेहरा बदलने का दांव चला गया था जिससे मुख्यमंत्री और मंत्रियों को पैर ज़माने का पर्याप्त समय मिल गया | उस दृष्टि से म.प्र में  सरकार का ढांचा बदलने पर  नए लोगों  को ज्यादा समय नहीं मिल सकेगा |  सबसे बड़ी बात ये है कि मुख्यमंत्री पद के लिए श्री चौहान की टक्कर का ऐसा कोई सर्वसम्मत नेता नजर नहीं आ रहा जो पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही रास्वसंघ को भी स्वीकार्य हो और आम जनता में जिसकी छवि साफ सुथरी हो | और फिर  सिंधिया गुट से तालमेल बिठाने की समझ भी उसमें होना जरूरी है क्योंकि ग्वालियर के पूर्व  महाराज कम से कम अपनी रियासत के अंतर्गत आने वाली सीटों पर तो  वर्चस्व चाहेंगे | इन सबके परिप्रेक्ष्य में भाजपा आलाकमान के समक्ष म.प्र को लेकर तरह – तरह की दुविधाएं हैं | मुख्यमंत्री ने बहुत ही चतुराई के साथ प्रदेश में ओबीसी आबादी का बहुमत प्रचारित कर राष्ट्रीय नेतृत्व को अपनी उपयोगिता जता दी है | हालाँकि आदिवासी सीटों पर भाजपा और संघ दोनों का काफी ध्यान है किन्तु चुनाव जिताने के लिए जो सक्रियता और दांव पेच आवश्यक माने जाते हैं उनमें श्री  चौहान का अनुभव सर्वाधिक है | यद्यपि लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण जनमानस में सहज  रूप से उत्पन्न होने वाला विरोध भी शीर्ष नेतृत्व को आशंकित किये हुए है | 2018 में तमाम अनुकूलताओं के बाद भी जीत जिस तरह आते - आते चली गई उसके कारण दूध का जला छाछ भी फूंक फूंककर पीता है वाली मनःस्थिति पार्टी में है | उल्लेखनीय है म.प्र  भाजपा का सबसे  पुराना गढ़ रहा है | यहाँ तक कि जब पूरे देश में जनसंघ पैर ज़माने की कोशिश में था तब भी प्रदेश के मध्यभारत और मालवा अंचल में उसके सांसद जीतते थे | अटल जी और आडवाणी जी ही नहीं अपितु जगन्नाथ राव जोशी , डा.वसंत कुमार पंडित , भैरोसिंह शेखावत, सुषमा स्वराज , ओ. राज गोपाल और प्रकाश जावडेकर  जैसे नेता म.प्र से लोकसभा और  राज्यसभा के लिए चुने जाते रहे हैं | तमिलनाडु के भी एक  नेता यहाँ से राज्यसभा भेजे गये थे जिनका नाम भाजपाई तक न जानते होंगे | उस दृष्टि से ये कहना गलत न होगा कि ये राज्य पार्टी के लिए हिन्दुत्व की सबसे पुरानी प्रयोगशाला रहा है | इसीलिये जब वह पिछले चुनाव में विजय  की देहलीज पर आकर रुक गयी तब उसे बड़ा झटका माना गया | ऐसे में पार्टी के सामने म.प्र पर कब्जा बनाये रखना रणनीतिक और वैचारिक तौर पर  आवश्यक है | फिलहाल चल रही चर्चाओं के अनुसार जिन विधायकों और मंत्रियों की रिपोर्ट ठीक नहीं है उनका टिकिट काटे जाने पर संभावित नुकसान  के बारे में पार्टी नेतृत्व विमर्श कर रहा है | चर्चा तो संगठन में भी बड़े बदलाव की है | लेकिन ऐसा करने के लिए अब ज्यादा समय नहीं बचा है | आखिरी  वक्त पर किया बदलाव किस तरह घातक होता है ये भाजपा दिल्ली में देख चुकी है जहां मदनलाल खुराना और साहेब सिंह वर्मा की लड़ाई के बीच 1998 में सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया था | लेकिन वह दांव इस कदर उल्टा पड़ा कि बीते लगभग 25 साल से भाजपा दिल्ली विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए तरस रही है | उस दृष्टि से म.प्र की सत्ता में गुजरात जैसा  बड़ा बदलाव करना आसान नहीं लगता | विधायकों के टिकिट काटना जरूर संभव है क्योंकि अनेक विधायक और मंत्री ऐसे हैं जिनकी छवि बेहद खराब है | जहाँ तक बात संगठन की है तो उससे विशेष फर्क नहीं पड़ता क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष कोई भी रहे , चलती मुख्यमंत्री की ही है |  


:रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 10 December 2022

गुजरात और हिमाचल से आये सन्देश : मुफ्त उपहार की राजनीति ढलान पर



मुफ्त उपहारों की राजनीति किसने शुरू की ये शोध का विषय हो सकता है | लेकिन गुजरात और हिमाचल प्रदेश के ताजा  चुनाव परिणाम इशारा करते हैं कि खैरातों के वायदे पर चुनाव जीतने का फार्मूला हर जगह कारगर नहीं होता | यद्यपि दिल्ली  नगर निगम में आम आदमी पार्टी ने भाजपा को हरा दिया लेकिन पंजाब में विशाल बहुमत के साथ सरकार बना चुकी इस पार्टी को पड़ोसी हिमाचल में एक भी सीट नहीं मिली | वहीं गुजरात में भी अरविन्द केजरीवाल के दावों के बावजूद वह दहाई तक पहुँचने में विफल रही | हिमाचल में तो 68 में से  67 उम्मीदवार जमानत गँवा बैठे | गुजरात में यद्यपि उसे 12 फीसदी मत प्राप्त हुए लेकिन मुख्य विपक्षी दल बनने की योजना फुस्स होकर रह गई और  मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी हार गया | दरअसल  दिल्ली के  फॉर्मूले को अपनाकर पंजाब में सरकार बना लेने के बाद श्री केजरीवाल को ये मुगालता हो गया कि मुफ्त बिजली – पानी का वायदा हर राज्य में कामयाब हो जाएगा | गुजरात और हिमाचल तो खैर आम आदमी पार्टी के लिए नए मैदान थे लेकिन दिल्ली के स्थानीय निकाय चुनाव में भी उसे विधानसभा जैसा  भारी बहुमत नहीं मिला | और तो और  मतों का प्रतिशत भी काफी कम हो गया | यदि कांग्रेस वहां ज़रा सा भी जोर मारती तो आम आदमी पार्टी बहुमत से वंचित रह सकती थी | अनेक राजनीतिक विश्लेषकों ने   दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन पर श्री  केजरीवाल को आगाह किया कि उनका जादू ढलान पर है | इस चुनाव में भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच मतों का अंतर  भी बेहद कम हो गया और भाजपा ने तो अपने मत पिछले चुनाव की तुलना में बढ़ा लिए | दिल्ली की जनता का एक बड़ा वर्ग मुफ्त सुविधाओं  से प्रभावित नहीं हो रहा वरना भाजपा को जैसा श्री केजरीवाल दावा। करते रहे , 20 सीटें ही मिलतीं | इसी तरह के ऊंचे  दावे उन्होंने गुजरात में भी किये परन्तु  मुफ्त बिजली और दिल्ली के शिक्षा मॉडल का आकर्षण काम न आया |  मोदी विरोधी अभियान चलाने वाले जो पत्रकार दिल्ली नगर निगम में आम आदमी पार्टी की जीत पर श्री केजरीवाल को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बताने में जुटे थे वे ही गुजरात के नतीजे आने के बाद उन्हें खलनायक बताते हुए ये कहते सुने जाने लगे कि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा  हासिल करने के फेर में वे भाजपा को मजबूत कर रहे हैं और उनकी महत्वाकांक्षा  आगे पाट पीछे  सपाट साबित होगी | ऐसा सोचना गलत भी नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय पार्टी के पास चूंकि उसका संगठन होता है इसलिए वह किसी प्रादेशिक नेता को भी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर सकती है | उस दृष्टि से आम आदमी पार्टी अभी बहुत पीछे है | उसे ये सोचना चाहिए कि मुफ्त बिजली और पानी जैसी सुविधाएँ निश्चित तौर पर काम करती हैं लेकिन उन्हें हर मर्ज की दवा मान लेना नासमझी है | दिल्ली में दो बार  विधानसभा चुनाव जीतने के बावजूद आम आदमी पार्टी पिछला  नगर निगम और लोकसभा चुनाव  हार गयी थी | जहां तक बात पंजाब की थी तो वहां अकाली भाजपा – गठबंधन टूटने के साथ ही कांग्रेस का अंदरूनी झगड़ा बढ़ने से मतदाता भ्रमित  थे | भाजपा का संगठन भी कमजोर था जिससे  आम आदमी पार्टी को मैदान साफ़ मिल गया | लेकिन  आतंकवाद के बीज दोबारा अंकुरित होने के साथ ही वहां कानून व्यवस्था की स्थित लगातार बिगड़ने के साथ ही  बिजली का संकट भी दिखने लगा है | इसी तरह दिल्ली में मध्यमवर्गीय बिजली उपभोक्ता इस बात से परेशान हैं कि मुफ्त की सीमा  से एक यूनिट ज्यादा बिजली जलते ही उनका बिल छलांगे मारने लगता है | हिमाचल में आम आदमी पार्टी के साथ ही कांग्रेस ने मुफ्त बिजली के साथ पुरानी पेंशन योजना बहाल करने का आश्वासन दे डाला | ऐसे में वहां के मतदाताओं ने क्षेत्रीय की बजाय राष्ट्रीय पार्टी को प्राथमिकता दी | भाजपा ने चूंकि इससे परहेज किया इसलिये  कांग्रेस से महज एक फीसदी मत कम पाने से वह लगभग 20 सीटें हार गई ।हालांकि  उसकी अपनी गलतियाँ ज्यादा जिम्मेदार रहीं | जहाँ तक बात गुजरात की है तो श्री केजरीवाल ने यहाँ जमकर मेहनत की | गली – गली घूमकर वचन पत्र बांटे | दिल्ली और पंजाब के उदाहरण भी पेश किये | पंजाब सरकार के पूर्ण पृष्ठ वाले विज्ञापन भी मतदाताओं को प्रभावित्त करने के उद्देश्य से प्रकाशित कराए गए परन्तु इसका असर नहीं पड़ा | निश्चित रूप से वह भाजपा का मजबूत किला है और प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का घरेलू मैदान भी किन्तु दिल्ली में भाजपा के सातों सांसद होने के बाद भी आम आदमी पार्टी कामयाब हो गई | जिसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस का कमजोर हो जाना है | यही स्थिति गुजरात में भी साफ़ नजर  आ रही थी जहाँ कांग्रेस पूरी तरह भगवान भरोसे रही | उसके प्रभारी बने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने राज्य में पार्टी के भीतर चल रहे शीतयुद्ध में उलझे थे | दूसरी तरफ कांग्रेस के तमाम बड़े नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में चेहरा दिखाने में लगे रहे | जिसका लाभ आम आदमी पार्टी को मिला | लेकिन इसके पीछे मुफ्त बिजली के वायदे की कोई भूमिका नहीं है | कुल मिलाकर मुफ्त उपहारों की राजनीति के लिए ये चुनाव बड़ा झटका रहे  | सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग भी समय – समय पर इस बारे में अपना ऐतराज जता चुके हैं | लेकिन राजनीतिक दलों के बीच मतैक्य न होने से बात आगे नहीं बढ़ पा रही | उ.प्र के पिछले चुनाव में भी सपा द्वारा भी मुफ्त बिजली का दांव चला गया था जिसे मतदाताओं ने नकार दिया | गुजरात और हिमाचल के चुनाव परिणाम आम आदमी पार्टी को ये नसीहत देने के लिए पर्याप्त हैं कि अव्वल तो राष्ट्रीय विकल्प बनने का उसका सपना जल्दबाजी है और दूसरा ये भी कि मुफ्त उपहार वाला तरीका लंबे सफर में काम नहीं आने वाला | दिल्ली के  राष्ट्रीय राजधानी होने से वहां विकास की समस्या नहीं रहती किन्तु बड़े राज्यों में मुफ्त सुविधाएँ सरकारी खजाना करने का कारण बन जाती हैं | एक वर्ग को खुश करने वाली योजना दूसरे वर्ग को नाराज करती है | उस दृष्टि से गुजरात में आम आदमी पार्टी के मंसूबे पूरे न होने के साथ ही हिमाचल में उसका सफाया मुफ्त उपहारों की राजनीति के दिन लदने का इशारा है | श्री केजरीवाल के लिए भी इन दोनों राज्यों के मतदाताओं ने ये संदेश छोड़ा है कि राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए केवल मतों का प्रतिशत नहीं अपितु व्यापक दृष्टिकोण और दूरगामी सोच चाहिए | साथ ही  बिना  संगठनात्मक ढांचे के पार्टी का फैलाव करना समय , शक्ति और संसाधनों की बर्बादी है | अतीत में ऐसा करने वाले अनेक क्षेत्रीय नेता इतिहास के पन्नों में गुम होकर रह गये | स्व. चौ. चरण सिंह और एच.डी देवगौड़ा भले ही प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गये लेकिन राष्ट्रीय नेता न बन सके |


:रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 9 December 2022

उपराष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के बीच टकराव अच्छा संकेत नहीं



 
राज्यसभा के सभापति की आसंदी पर विराजमान होते ही उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने  न्यायाधीशों की  नियुक्ति  संबंधी कालेजियम  व्यवस्था पर  टिप्पणी करते हुए कहा कि संसद सर्वोच्च है और उसके अधिकारों में न्यायपालिका  तभी  हस्तक्षेप कर सकती है जब संविधान की व्याख्या करने का कोई बड़ा मामला हो  | उच्च सदन में पहले ही दिन वे बोले कि न्यायिक नियुक्ति आयोग संबंधी संविधान संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द करने  के बाद संसद की चुप्पी खेदजनक है | उन्होंने याद  दिलाया कि 2014 में दोनों सदनों ने उक्त संशोधन एकमत से पारित किया था जिसका  अधिकतर राज्यों ने भी  अनुमोदन किया | ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध बताकर निरस्त कर देना दुर्भाग्यपूर्ण था | उनकी टिप्पणी पर सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जिस तरह की प्रतिक्रिया दी उससे लगता है ये विषय अहं की लड़ाई में बदल रहा है | न्यायाधीश संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने उपराष्ट्रपति की बात  पर ऐतराज जताते हुए कहा कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है तो सर्वोच्च न्यायालय को उसकी समीक्षा का | ऐसे में उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा कालेजियम  की आलोचना किया जाना गलत है | पीठ ने अटॉर्नी जनरल से कहा  कि वे सरकार को बता दें कि कालेजियम देश का कानून होने से उसका पालन अपेक्षित है | श्री धनखड़ ने  राज्यसभा में पहले दिन  ही कालेजियम का विवाद छेड़कर संसद की सर्वोच्चता का जो मुद्दा उठाया  वह दरअसल केंद्र सरकार के रुख का ही समर्थन है |  कुछ दिन पहले उनके द्वारा एक समारोह में मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रचूड़ के समक्ष भी ये विषय  उठाया गया था | उपराष्ट्रपति खुद भी सर्वोच्च न्यायालय में बतौर अधिवक्ता कार्य कर चुके हैं | देखना ये है कि उसकी पीठ द्वारा उनको भेजे गये सन्देश पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है ? स्मरणीय है श्री धनखड़ बतौर अधिवक्ता , सांसद , मंत्री और राज्यपाल अपनी बात दबंगी से कहने के लिए जाने जाते रहे हैं | ऐसे में माना जा सकता है कि वे श्री कौल की टिप्पणी पर चुप नहीं बैठेंगे | और तब  दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति का सर्वोच्च न्याय पीठ से सीधा टकराव अभूतपूर्व रहेगा | लेकिन ये संविधान में वर्णित नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत की भावना के विरुद्ध होगा | संसद द्वारा पारित और विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित होने के  बाद किसी संविधान संशोधन को संविधान विरोधी बताकर खारिज किये जाने की आलोचना पर न्यायपालिका की ओर से अक्सर ये सुनाई देता है कि शाह बानो को गुजारा भत्ता दिए जाने के फैसले  को संसद ने  जब उलट दिया था तब वह क्या न्यायापलिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप न था ? ऐसे में  ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि लोकतंत्र के तीन अंगों के बीच का ये टकराव किस सीमा तक जाएगा ? सबसे बड़ी बात है कि अब उपराष्ट्रपति भी इसमें शामिल हो गए हैं | सही बात ये है कि उपराष्ट्रपति ने न्यायिक नियुक्ति आयोग संशोधन को रद्द किये जाने पर संसद द्वारा साधी गयी चुप्पी को खेदजनक बताकर ठहरे हुए पानी में पत्थर फेक दिया है | ये  विचारणीय है कि सर्वसम्मति से पारित  संशोधन को न्यायपालिका द्वारा संविधान विरुद्ध मानने के बाद संसद  मुंह में दही जमाकर बैठ गयी | इसी तरह   कालेजियम  पर विपक्षी दलों का रवैया भी समझ से परे है | जब इसे लेकर चल रही बहस सार्वजनिक होती जा रही है और न्यायपालिका तथा  सरकार के साथ ही अब संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा भी  अपना विचार रख दिया गया तब विधायिका से जुड़े लोग इस पर मौन रहें ये अटपटा लगता है | ये बात भी मायने रखती है कि श्री धनखड़  उच्च सदन के पीठासीन अधिकारी होने से  संसदीय प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से भी हैं | उनका ये उलाहना विचारणीय है कि विधायी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो संविधान संशोधन अस्तित्व में आया उसे यदि सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक कहते हुए रद्द कर दिया तब इतने सालों तक संसद ने उस बारे में कोई विचार क्यों नहीं किया ? यदि संसद अपने फैसले को सही मानती है  तब उसे न्यायपालिका से इस बारे में मंत्रणा करते हुए पूछना चाहिए कि संशोधन के किस हिस्से से उसे आपत्ति है और क्या उसे दूर करते हुए नया संशोधन लाया जा सकता है ? दूसरी तरफ न्यायपालिका का भी ये कहना श्रेष्ठता की भावना से प्रेरित है कालेजियम अमरत्व प्राप्त व्यवस्था है | इसे कानून बताना भी भ्रम पैदा करता है क्योंकि  इसका संविधान में कोई उल्लेख नहीं है | उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय की  पीठ ने अटॉर्नी जनरल के जरिये समझाइश की शक्ल में जो सन्देश  भेजा है वह नये ढंग के टकराव की वजह बन सकता है |  पीठ ने  स्पष्ट  कहा है कि जब तक कालेजियम है , उसे मानना होगा | साथ ही उसने संसद द्वारा बनाये गए कानून की समीक्षा करने की जो बात कही उसकी सीमाएं भी विचारणीय हैं | स्मरण रहे कालेजियम द्वारा भेजी गई सिफारिश को केंद्र सरकार द्वारा लौटाए जाने के बाद अगर वह दोबारा भेजी जाती है तब वह  उसे मानने बाध्य होती है | इसी तरह  संसद द्वारा पारित किसी विधेयक पर असहमत होकर राष्ट्रपति  उसे लौटा सकते हैं परंतु  दोबारा पारित होने पर वे उसे अनुमोदित करने बाध्य हैं | ऐसे में न्यायपालिका द्वारा रद्द किसी भी कानून को संसद दोबारा पारित कर देती है तब उसके बारे में सर्वोच्च न्यायालय क्या करेगा , ये भी स्पष्ट होना जरूरी है | हमारे संविधान में कार्यपालिका , विधायिका और न्यायपालिका सभी के अधिकार वर्णित हैं | ये भी  अपेक्षा है कि तीनों समन्वय बनाकर चलेंगे | अतीत में भी अनेक अवसरों पर टकराव के हालात बने किन्तु समाधान निकल आया | ये देखते हुए न्यायपालिका और कार्यपालिका को बैठकर कालेजियम व्यवस्था को लेकर उत्पन्न विवाद का हल भी तलाशना होगा अन्यथा दोनों की साख और नीयत पर सवाल उठेंगे | ये चिंता का विषय है कि न्यायपालिका के प्रति आम जनमानस में सम्मान और विश्वास दोनों घटा है | स्मरण रहे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने सर्वोच्च न्यायालय के सम्मन पर जाने से इंकार कर  दिया था |

: रवीन्द्र वाजपेयी