Tuesday, 10 January 2023

वरना जोशीमठ जैसे हादसे होते ही रहेंगे



अब ये तय हो चुका है कि जिस तरह टिहरी बाँध बन जाने से गढ़वाल अंचल के अनेक स्थान जलमग्न हो गये उसी तरह जोशीमठ का बड़ा हिस्सा भी अतीत होने जा रहा है | जो स्थितियां अब तक सामने में आई हैं उनके अनुसार उसे  खाली करने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं है | उसके साथ ही सैकड़ों अन्य गाँवों में  भी विस्थापन  प्रारंभ हो गया है | जिस तरह से वहां धरती धंस रही है उसे देखते हुए किसी बड़े भूगर्भीय बदलाव की आशंका से लोगों में दहशत है | अपना आशियाना उजड़ते देख रहे लोगों के मन पर क्या बीत रही होगी ये वे ही जानते हैं | जोशीमठ का स्वरूप क़स्बानुमा ही है | सर्दियों में भगवान बद्रीनाथ यहीं आकर विराजते हैं | शंकराचार्य जी की पीठ भी यहीं है | बद्रीनाथ धाम का यह प्रवेश द्वार होने से भी महत्वपूर्ण है | चीन सीमा के सन्निकट होने से यह सैन्य दृष्टि से काफी संवेदनशील माना जाता है | बद्रीनाथ के अलावा फूलों की घाटी और औली नामक पर्यटन स्थल जाने के लिए भी जोशीमठ शुरुआती स्थल है | शाम के बाद चूंकि उक्त  स्थलों तक जाने की अनुमति नहीं होती , लिहाजा ये  सैलानियों और पर्यटकों के रात्रिकालीन विश्राम का केंद्र बन गया था | औली को पर्यटन स्थल के रूप में  काफ़ी बाद में विकसित किया गया लेकिन बद्रीनाथ की यात्रा तो सदियों से होती आ रही है | पहले ज़माने में  तीर्थयात्री पैदल आते थे और  रास्ते भर स्थानीय लोगों के लकड़ी से  बने मकान उनके आश्रय स्थल होते थे जिन्हें चट्टियां कहा जाता था | लेकिन जब से सडकें बनीं और मोटर वाहन से आना - जाना सुलभ हुआ तब से जोशीमठ बद्रीनाथ के पहले रात्रिकालीन पड़ाव बन गया | और  वहां स्थानीय लोगों के साथ ही बाहरी व्यवसायियों ने होटल और अतिथि गृह बनाने शुरू कर दिये  | ध्यान  देने वाली  बात ये है कि दशकों पूर्व तकनीकी रिपोर्ट में दी गई चेतावनी का उल्लंघन करते हुए भी इसको कस्बे से शहर बनाने की कोशिश होती रही | पहाड़ी भूमि  की क्षमता और तासीर को उपेक्षित करते हुए  निर्माण के लिए पहाड़ों को खोदा - तोड़ा गया जिसका दुष्परिणाम अब जाकर नजर आया | आज वहां दो आलीशान होटल धराशायी किये जा रहे है | पूरे शहर को तीन हिस्सों में बांटकर लोगों को सुरक्षित स्थान पर रखने की योजना भी बन गई है | केन्द्र सरकार हर स्थिति से निपटने को तैयार है | जोशीमठ के लोगों को बचाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में हो रही बैठकें इसका प्रमाण है | लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि एक बार फिर आग लगने पर कुआ खोदने की परम्परा दोहराई जा रही है | उत्तरकाशी सहित उत्तराखंड के अनेक इलाकों में भूस्खलन की घटनाओं से बहुत नुकसान हो चुका है | पहाड़ से मलबा गिरने के कारण अनेक स्थानों पर नदी का जलस्तर ऊपर उठ जाने से दर्जनों  गाँव उजड़ने को मजबूर हो गए | ये स्थिति केवल गढ़वाल में नहीं अपितु समूचे उत्तराखंड और हिमाचल के अनेक स्थानों की है | हिमालय पर्वतमाला भूकम्प की दृष्टि से बेहद संवेदनशील होने के कारण उसमें  चल  रहे विकास कार्यों  से होने वाले नुकसान की अनदेखी के कारण कब क्या हो जाए ये फ़िलहाल तो कोई नहीं बता पायेगा लेकिन जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए न  तो प्रकृति को दोष दे सकते हैं और न ही पर्वतों और नदियों को क्योंकि  उनकी अपनी दुनिया है जिसमें मानवीय दखलंदाजी एक सीमा तक ही  स्वीकार्य है | लेकिन ज्योंही मनुष्य अपने ज्ञान और उससे अर्जित शक्ति पर अहंकार करते हुए प्रकृति से छेड़खानी करता है तो एक सीमा  के बाद वह अपना  क्रोध व्यक्त किये बिना नहीं मानती | पर्वतों की दुर्गम तीर्थ यात्रा के पीछे का उद्देश्य भी आमोद - प्रमोद नहीं था | इसीलिए उसमें होने वाले कष्टों में भी यात्री आनंद की अनुभूति करते थे | लेकिन अब समूचा परिदृश्य बदल गया है | तीर्थयात्रा और पर्यटन के घालमेल का परिणाम ही जोशीमठ के मौजूदा हालात के तौर पर सामने है | आजकल वन्य प्राणियों के बस्तियों में घुसने और जहरीले सर्पों के घरों में डेरा ज़माने की खबरें आये दिन सुनाई देती हैं | इसका कारण उनके ठिकाने में किया जाने वाला अतिक्रमण है | जंगलों की बेरहमी से कटाई और शहरों के असीमित विस्तार की वजह से इन प्राणियों के संसार  में मानवीय दखल के  कारण मजबूरी या प्रतिशोधस्वरूप वे हमारी बस्ती और घरों में आने लगें तो उनका कसूर नहीं है | प्रकृति की जो रचना है उसको नुकसान पहुँचाने की भारी कीमत चुकाने के बावजूद भी हमें अक्ल नहीं आ रही तो फिर जोशीमठ जैसे हादसों की पुनरावृत्ति होती रहेगी |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 9 January 2023

प्रवासी सम्मेलन से भारत की वैश्विक भूमिका और मजबूत होगी



म.प्र की  व्यवसायिक राजधानी इंदौर में 17 वें भारतीय प्रवासी दिवस का आयोजन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की भूमिका के मद्देनजर बेहद महत्वपूर्ण और सामयिक है | विश्व के अनेक देशों में जाकर बस गए भारतवंशियों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक तौर पर जोड़े रखने में प्रवासी दिवस का यह आयोजन बहुत सहायक साबित हुआ है | 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी घोषणा की थी और 2003 में प्रथम प्रवासी सम्मलेन आयोजित हुआ | इंदौर का यह 17 वाँ आयोजन है | इसका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहाँ आज इसको संबोधित किया वहीं कल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसके समापन में शामिल होंगी | विदेश मंत्री एस. जयशंकर विगत अनेक दिनों से इंदौर में आयोजन की तैयारियों में जुटे हुए हैं | इस आयोजन की तिथि 9 जनवरी रखने के पीछे कारण ये है कि 1915 में इसी तारीख को महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे | दरअसल प्रवासी सम्मलेन की सोच उस समय पैदा हुई जब वाजपेयी सरकार द्वारा 1998 में किये गए परमाणु परीक्षण के बाद  अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे | तब वाजपेयी जी ने  विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों का आह्वान  किया और उन्होंने भारत में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भेजकर उन प्रतिबंधों के विरूद्ध मजबूती से खड़े होने में देश को सक्षम बनाया | 2003 के बाद से अप्रवासियों को परदेशी न  मानते हुए वतन के प्रति उनके मन में जो भावना है उसे और सुदृढ़ करने का प्रयास लगातार चलता रहा है | बाद में आई सरकारों ने भी उसके महत्व को समझा जिसका अनुकूल परिणाम देखने मिला  है | प्रधानमंत्री बनने के बाद श्री मोदी ने प्रवासियों से सम्पर्क बढ़ाने पर काफी जोर दिया | इसीलिये वे अपनी हर प्रमुख विदेश यात्रा में वहां रह रहे भारत वंशियों से मिलकर उन्हें भारत से जोड़े रखने का प्रयास करते हैं | इस बारे में ये  उल्लेखनीय है कि आज  भारतीय मूल के लोग सारी दुनिया में फैल चुके हैं | उनमें बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्होंने अपने परिश्रम और योग्यता से सम्मान और समृद्धि अर्जित कर ली है | अपनी जन्मभूमि को छोड़कर गये इन लोगों की मन में ये भावना आ  चुकी है कि उन्हें भारत को विकसित देश बनाने के लिए कुछ करना चाहिए | प्रवासी दिवस का आयोजन उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है | इसके जरिये पूंजी निवेश तो आता ही है भारतीय संस्कृति के प्रति उनके मन में जो श्रृद्धा और प्रेम है वह भी मजबूत होता है | अमेरिका , कैनेडा और ब्रिटेन जैसे समृद्ध देशों में सुविधाजनक जीवन यापन कर रहे भारतीय मूल के लोगों में अपनी मातृभूमि को विश्व के विकसित देशों की कतार में खड़ा करने की जो ललक विगत 10 – 15 साल में जागी है उसका काफी श्रेय प्रवासी सम्मलेन को दिया जा सकता है | सूचना तकनीक के विकास के बाद से भारत ने सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में जो चमत्कारिक प्रगति की उसकी वजह से बड़ी संख्या में भारतीय युवक विदेशों में जाकर काम कर रहे हैं | निश्चित रूप से उन्हें वहां बेहतर अवसर उपलब्ध हैं | लेकिन देश से दूर रहकर भी इसके विकास से जुड़े रहने की भावना उनके मन में जीवंत रहे इसके लिए उनसे संपर्क और संवाद बनाये रखना देश के दूरगामी  हितों में है | भारत सरकार ने प्रवासी भारतीयों से संपर्क स्थापित रखने के लिए ही अप्रवासी भारतीय मंत्रालय भी बना  रखा है जो उनकी तमाम  समस्याओं का समाधान करता है | इस मंत्रालय की वजह से विदेशों में बसे भारतवंशियों को  अपने देश के साथ जुड़े रहने में काफी सुविधा हुई है | इंदौर में प्रवासी सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पूरा विश्व कोरोना के बाद की परिस्थितियों से जूझ रहा  है | दूबरे में दो आसाढ़ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए रूस और यूक्रेन युद्ध जैसी मुसीबत आ खड़ी हुई जिसकी वजह से तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडराने लगा है | ऐसे में भारत की भूमिका पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं | न सिर्फ आर्थिक अपितु कूटनीतिक क्षेत्र में भी हमारा प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है | इस उपलब्धि में सरकार की नीतियां तो प्रशंसा की पात्र हैं ही किन्तु अप्रवासी भारतीयों की भूमिका को भी इसका श्रेय जाता है | अमेरिका , कैनेडा , ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की राजनीति में भारतीय मूल के लोगों का  महत्वपूर्ण पदों पर बैठना इसका प्रमाण है | उस दृष्टि से इंदौर का सम्मेलन  रणनीतिक दृष्टि से भी काफी महत्त्व रखता है | प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का इसमें आकर  विदेशों से आये प्रतिनिधियों को सम्मानित करना एक  बुद्धिमत्तापूर्ण कदम है | उम्मीद की जा सकती है कि इसके जरिये भारत अपनी वैश्विक भूमिका को और मजबूत कर  सकेगा |

 रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 7 January 2023

जोशीमठ : विकास के नाम पर विनाश का पूर्वाभ्यास



क्रिया की प्रतिक्रिया के सिद्धांत का ताजा प्रमाण है उत्तराखंड में जोशीमठ शहर के धंसने की घटना | बीते कुछ दिनों से वहां दहशत का माहौल है | शहर के वाशिंदे रात को चैन की नींद सो नहीं पा रहे | उन्हें इस बात का भय सता रहा है कि कहीं उनके मकान की छत ही न गिर जाये | बद्रीनाथ धाम जाने वाले मार्ग में जोशीमठ अंतिम पड़ाव है | शीतकाल में भगवान बद्रीनाथ यहीं विराजते हैं | उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जाने वाले मार्गों के उन्नयन के साथ ही जोशीमठ में एक सुरंग का निर्माण हो रहा है | जो इस हादसे की वजह मानी जा रही  है | जैसे ही ये पता चला कि शहर धंस रहा है ,  काम बंद कर जांच शुरू कर  दी गयी | प्रशासन के साथ ही आपदा प्रबंधन की टीमें जोशीमठ में मौजूद रहकर  बचाव की  कार्ययोजना बनाने में जुटी है | उधर हल्दवानी से भी इसी तरह की खबर आने से उत्तराखंड के साथ ही केंद्र सरकार की चिंता भी बढ़ गई  है | राहत एवं बचाव की तैयारियों के अलावा नुकसान को कम से कम करने की दिशा में भी प्रयास चल पड़े हैं | वैसे  उत्तराखंड में ये पहली घटना नहीं है जब भूकंप , भूस्खलन , बादल फटने और पहाड़ के धसकने से नदियों में अचानक आई बाढ़ से तबाही मची हो | दूसरे शब्दों में कहें तो प्रकृति निरंतर चेतावनी देती आ रही है कि हिमालय के समूचे क्षेत्र के भूगर्भीय संतुलन को बिगाड़ने से बचें | वृक्षों की  अंधाधुंध कटाई के कारण पहाड़ जिस तरह नंगे हुए उसकी वजह से उनका धसकना शुरू हुआ | पानी के जो झरने कदम – कदम पर नजर आ जाते थे वे धीरे – धीरे लुप्त हो गए | हरियाली कम हुई तो तापमान बढ़ने लगा जिसका असर ग्लेशियरों के पिघलने के तौर पर सामने आ रहा है  | टिहरी बाँध के निर्माण के विरोध में चले आंदोलन के समय जो चेतावनियाँ दी गईं थीं उनको नजरअंदाज किये जाने के नुकसान आज सबके सामने आ चुके हैं | इसी तरह वृक्षों की बेरहम कटाई रोकने के लिये चले चिपको आन्दोलन पर भी ध्यान नहीं दिए जाने से समूचे उत्तराखंड का पर्यावरण प्रभावित हुआ | हिमालय पर्वतमाला के इस क्षेत्र को ठोस चट्टानी मानने की मानसिकता ने विकास की जो रूपरेखा तैयार की उसी का दुष्परिणाम जोशीमठ में उत्पन्न नए खतरे के रूप में प्रकट हुआ है | पहाड़ों का सीना चीरकर विकसित किये जा रहे चौड़े – चौड़े राजमार्ग , नदियों की धारा रोककर लगाये जा रहे पन बिजली संयंत्र , कांक्रीट से बन रहे मकान और साल दर साल यात्रियों की बढ़ती संख्या के कारण वाहनों की धमाचौकड़ी ने देवभूमि कहलाने वाले उत्तराखंड में मानवीय हस्तक्षेप जरूरत से ज्यादा बढ़ा दिया | लेकिन विकास और ज्यादा कमाई के फेर में न सिर्फ सरकार अपितु वहां रहने वाले वाशिंदे भी ये भूल गए कि पहाड़ और प्रकृति की सहनशीलता की सीमा है | जब तक उनसे बर्दाश्त हुआ तब तक वे शांत बने रहे लेकिन जब लगा कि विकास की वासना में अँधा मनुष्य उसकी खामोशी को कमजोरी मानकर अत्याचार जारी रखने पर आमादा है तब उसने पहले तो हलके संकेतों से अपनी नाराजगी व्यक्त की और जब उस पर भी इंसानी दुस्साहस जारी रहा तब उन्हें ये लगने लगा कि साधारण  चेतावनियों से काम नहीं चल रहा और उसी के बाद प्रकृति ने अपना रौद्र रूप विभिन्न तरीकों से प्रदर्शित करना प्रारंभ किया | लेकिन अपने गरूर में डूबी व्यवस्था और अधकचरी आयातित सोच ने विकास के जो मापदंड तय किये उसमें प्रकृति और पर्यावरण पर अत्याचार पहली पायदान थी | विगत कुछ दशक में उत्तराखंड जिस तरह के भूगर्भीय परिवर्तन झेल रहा है वे सही मायनों में आने वाले संकट के संकेत थे किन्तु हमारे कम या बिना पढ़े बुजुर्ग भले ही अंग्रेजी तो क्या ठीक से हिन्दी में भी अपनी बात व्यक्त न कर पाते हों किन्तु वे प्रकृति की भाषा को समझकर उसकी तकलीफें दूर करने में सक्षम थे | लेकिन विज्ञान और तकनीक के जानकार जिस दुनिया में विचरण करते हैं उसमें प्रकृति से सामंजस्य बनाकर चलने के बजाय उससे टकराकर  पराजित करने की जो मानसिकता है उसी का दुष्परिणाम प्राकृतिक आपदाओं के रूप  में समय – समय पर सामने आता रहता है | लेकिन अब चिंता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि उनकी पुनरावृत्ति जल्दी – जल्दी होने लगी है | जोशीमठ के अलावा उत्तराखंड के अन्य इलाकों में लगातार आ रही आपदाएं किसी बड़े खतरे का संकेत हैं | बुद्धिमत्ता इसी में है कि बजाय  हठधर्मिता दिखाने के उन गलतियों को सुधारने का प्रयास हो जिनके कारण शीतलता का प्रतीक हिमालय गुस्से से लाल होने लगा है | अब भी यदि हम नहीं चेते तो फिर ये कहना गलत न होगा कि विकास के नाम पर विनाश का पूर्वाभ्यास हो रहा है | 

रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 6 January 2023

वरना पेट्रोल से भी महंगा बिकेगा पानी



जल ही जीवन है का नारा जगह – जगह देखने मिल जाता है | इस पर बौद्धिक चिंतन – मनन भी खूब होता है | वैश्विक तापमान बढ़ने की वजह से अब तो पृथ्वी पर  ध्रुव क्षेत्रों के ग्लेशियर तक पिघलने लगे हैं जिसकी वजह से समुद्री जल का स्तर बढ़ने और तटवर्ती शहरों के अलावा मालदीव जैसे टापू नुमा देशों के डूब जाने की आशंका है | ये कहना गलत नहीं है कि जिस तरह 20 वीं सदी में कच्चे  तेल के स्रोतों पर कब्ज़ा करने के लिए महाशक्तियाँ आपस में टकराती रहीं ठीक वैसी ही आशंका 21 वीं सदी के उत्तरार्ध में जलस्रोतों पर आधिपत्य हेतु हो सकती है | बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिक क्रांति ने परम्परागत जल प्रबन्धन की व्यवस्था को पूरी तरह बदलकर रख दिया | जल के उपयोग हेतु  किया जाने वाला श्रम तकनीक के विकास की वजह से कम हो जाने के कारण उसका उपयोग फिजूलखर्ची की सीमा तक जा पहुंचा | जिसका प्रमाण नगर निगम  के नलों से आने वाले पानी से मोटर वाहन धोये जाने के रूप में देखा जा सकता है | उस दृष्टि से ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के विकास के साथ ही जल संरक्षण इस सदी की सबसे प्रमुख प्राथमिकता है | इसलिए गत दिवस म.प्र की राजधानी भोपाल में आयोजित वाटर विजन 2047 सेमीनार को आभासी माध्यम से संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से जल संरक्षण हेतु जागरूक रहने का जो आह्वान किया वह पूरी तरह सामयिक है | केंद्र सरकार के जलशक्ति मंत्रालय द्वारा आयोजित सेमीनार में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं | निश्चित रूप से यह विषय पूरे देश के लिए चिंता का कारण है | विकास दर के आधार पर भारत को दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था की मान्यता मिलना गौरवान्वित करता है किन्तु इसी के साथ ये भी विचार योग्य है कि बड़ी संख्या में छोटी – छोटी नदियाँ अस्तित्वहीन हो चली हैं | गावों  और शहरों में सैकड़ों साल पहले बने तालाब लापरवाही के चलते प्रदूषित होने के बाद सूखते गए | ऐसा ही हश्र कुओं का हुआ | धरती के सीने को छेदकर जल निकालने की तरकीब और तकनीक ने पानी के परम्परागत स्रोतों को नष्ट करने में प्रमुख भूमिका निभाई | जब तक पानी प्राप्त करना श्रम साध्य था तब तक उसकी अहमियत का एहसास सभी को था लेकिन ज्यों  – ज्यों उसे पाने में आसानी होती गई त्यों – त्यों उसके संचय का संस्कार भी लुप्त होता गया | विकास की वासना में हम ये भूल गए कि प्रकृति हमें जो भी देती है उसकी सीमा का उल्लंघन समूची मानव जाति के लिए विनाश का आधार बन रहा  है | भारत जैसे देश में जहाँ का मौसम विविधताओं से भरा है , जल संरक्षण मौजूदा समय की सबसे बड़ी जरूरत है | ऐसे में जब प्रधानमंत्री द्वारा प्रारम्भ अटल जल योजना के अंतर्गत प्रत्येक घर में नलों द्वारा पानी पहुंचाए जाने पर जोरदार काम चल रहा है तब जल स्रोतों के साथ ही वर्षा जल का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए | खेतों को सींचने के लिए भी ड्राप इरीगेशन की जो तकनीक इजरायल ने दी है उसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग किया जाना जरूरी है | सबसे बड़ी जरूरत है भवनों  की छतों से वर्षा के जल को वाटर हार्वेस्टिंग के जरिये सहेजने की | नये घरों के निर्माण हेतु इसकी अनिवार्यता के बावजूद नगरीय निकायों की  अनदेखी इस दिशा में किये जाने वाले प्रयासों को फलीभूत नहीं होने देती | केंद्र सरकार को चाहिये वाटर हार्वेस्टिंग को कानूनी अनिवार्यता का रूप दे | इसकी मदद से प्रति वर्ष अपार जलराशि बेकार होने से बचाये जाने के अलावा निकटवर्ती भूजल स्तर उठाने में भी मदद मिलेगी | जल का संरक्षण , संग्रहण और संवर्धन तीनों पर एक साथ अमल किये जाने का युद्धस्तर पर प्रयास होना चाहिए | लेकिन जैसा श्री मोदी ने अपने सम्बोधन में कहा जब तक जनता  स्वप्रेरित होकर इस अभियान में सहभागिता नहीं देती तब तक लक्ष्य कितने भी बड़े तय कर  लिए जावें और योजनाओं का खाका तैयार हो जाये लेकिन जमीन पर नतीजे नहीं दिखाई देंगे | उन्होंने स्वच्छता अभियान का हवाला देते हुए कहा कि वह इसीलिये प्रभावशाली हो सका क्योंकि वह जनता का अभियान बन गया  | 140  करोड़ की आबादी के लिए  रोटी , कपड़ा  और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ ही उसे जीवन यापन  हेतु जल की पर्याप्त आपूर्ति भी उतनी ही जरूरी है | कविवर रहीम सैकड़ों साल पहले बड़े ही सरल शब्दों में कह गए थे कि रहिमन पानी राखिये , बिन पानी सब सून | उनके इन चंद शब्दों में निहित अर्थ को समझकर उसे अपने आचरण में चरितार्थ करना ही मानवता की निरंतरता का मूल मंत्र हैं | प्रधानमंत्री श्री मोदी भविष्य के लिए जिस प्रकार का ढांचा खड़ा करना चाहते हैं उसमें जन सहयोग की भी महती जरूरत है | जल संरक्षण के बारे में सोचते समय हमें केवल अपने नहीं  अपितु अपनी संतानों की प्यास बुझाने के बारे में भी  सोचना चाहिए | वरना वह दिन दूर नहीं जब बाजारवादी ताकतें  पानी को पेट्रोल से भी महंगा कर देंगी |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 5 January 2023

सम्मेद शिखर मसले का मिल बैठकर हल निकालना जरूरी



झारखंड स्थित जैन समाज के पवित्र तीर्थस्थल सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल घोषित करने के झारखंड सरकार के निर्णय के विरुद्ध पूरे देश में जैन समाज आंदोलित और आक्रोशित है | एक वयोवृद्ध मुनि की तो अनशन के चलते मृत्यु तक हो गयी | जैन समुदाय की चिंता का विषय ये है कि उनके प्रमुख तीर्थस्थल को पर्यटन स्थल का रूप देने के बाद वह आमोद – प्रमोद के साथ ही उन सब सुविधाओं से परिपूर्ण हो जायेगा जो जैन  जीवन शैली में निषिद्ध हैं | मसलन वहां बड़े – बड़े होटल खुलेंगे जिनमें माँस – मदिरा के  सेवन के अलावा पर्यटकों  की  मौज - मस्ती से भी इस तीर्थ स्थल के सात्विक वातावरण पर तामसी प्रवृत्ति हावी होगी | जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार इस क्षेत्र में आदिवासी समाज का भी कोई धार्मिक स्थल है | आदिवासी बहुल इस राज्य में  झामुमो (झारखण्ड मुक्ति मोर्चा) के हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं जो अपने समुदाय के लोगों को संतुष्ट करने के लिए सम्मेद शिखर में पर्यटन को विकसित करना चाह रहे हैं | साथ ही  जिस तरह जैन समाज इस मुद्दे पर संगठित है उसी तरह से श्री सोरेन की पार्टी आदिवासी समुदाय के  शक्ति प्रदर्शन  की तैयारी कर रही है | यदि ऐसा हुआ तब टकराव की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है | हालाँकि जैन धर्म को मानने वाले अहिंसा में विश्वास करते हैं इसलिए उनके आन्दोलन शांतिपूर्ण होते हैं | इसी तरह आदिवासी समुदाय भी  सामाजिक अनुशासन से बंधा होने के कारण टकराव से बचता है | लेकिन जिस बात का डर है वह ये कि आदिवासियों के बीच नक्सली और ईसाई मिशनरियों की जो घुसपैठ है वह दोनों समुदायों के बीच वैमनस्य उत्पन्न करते हुए अपना उल्लू सीधा कर सकती है | ये सम्भावना भी जताई जा रही है कि केंद्र सरकार अपने अधिकार का उपयोग करते हुए कोई ऐसा निर्णय लेगी जिससे इस विवाद को नासूर बनने से रोका जा सके | लेकिन उसके सामने भी ये समस्या है कि एक पक्ष को खुश करने में दूसरा नाराज न हो जाये |  केंद्र में बैठी भाजपा सरकार के लिए भी इस मसले पर ठोस निर्णय करना आसान नहीं रहेगा क्योंकि इसी वर्ष जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना हैं उनमें जैन और आदिवासी मतदाता अनेक सीटों पर निर्णायक संख्या में होने से केंद्र सरकार किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले दसियों बार सोचेगी ताकि कर्नाटक , म.प्र , राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की चुनावी संभावनाएं प्रभावित न हों | समस्या कांग्रेस के सामने भी है क्योंकि वह झारखंड सरकार में हिस्सेदार रहने  से सम्मेद शिखर विवाद में पक्ष बने बिना नहीं रहेगी | राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसकी सरकार होने से उसे भी दोनों समुदायों के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी | इस मामले में झामुमो पूरी तरह निश्चिंत है क्योंकि झारखंड में उसका जनाधार मुख्यतः आदिवासी समुदाय के बीच ही है इसलिए वह छोटे से जैन वोट बैंक को नजरअंदाज भी कर सकता है जबकि भाजपा और कांग्रेस के लिए ऐसा  करना बेहद कठिन है | लेकिन एक  पहलू ये भी है कि इस विवाद की आड़ में कुछ शरारती तत्व जैन समाज को मुख्यधारा से अलग करने का प्रयास करने में जुट गए हैं| इसके लिए सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों का उपयोग जिस तरह से किया जा रहा है वह चिंता  का बड़ा कारण है | जैन समुदाय भले ही राजनीतिक कारणों से अल्पसंख्यक दर्जे में रख दिया गया हो लेकिन वह मुस्लिम और ईसाई समाज से सर्वथा भिन्न है | उसकी  पहिचान मुख्य तौर पर व्यवसायी के रूप में होने से वह समाज की मुख्यधारा में पूरी तरह रचा बसा है और उन्मादी सोच का भी उसमें कोई स्थान नहीं है | इस आधार पर सम्मेद शिखर मुद्दे पर सामाजिक विद्वेष पैदा करने की किसी भी साजिश पर निगाह रखना जरूरी है | इस तरह के विवाद अन्य राज्यों में भी  होते रहते हैं | बेहतर है उन्हें सभी पक्ष मिलकर इस तरह सुलझा लें जिससे कि आपसी सौहार्द्र और समन्वय बना रहे | सबसे बड़ी बात ये है कि देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं एक आदिवासी हैं | उनके अलावा भी आदिवासी समुदाय के  अनेक राजनीतिक नेता और नौकरशाह महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं | उन सबको चाहिए वे जैन समाज के साथ बैठकर बीच का रास्ता निकालें | आदिवासियों  के जो सामाजिक मुखिया हैं उन्हें भी  संवाद की स्थिति बनाकर विवाद का समुचित हल निकालने हेतु पहल करनी चाहिए | देश वैसे भी अनेकानेक घरेलू समस्याओं से जूझ रहा है | राजनीति के सौदागर ऐसे मामलों में आग पर पानी की बजाय घी डालने से बाज नहीं आते | संदर्भित विवाद में भी ऐसा ही होता लग रहा है | बेहतर होगा  दोनों पक्ष  समझदारी  का परिचय देते हुए राजनीतिक जमात को इस मुद्दे से दूर ही रखें अन्यथा मामला और उलझता जाएगा क्योंकि वोटों की फसल जहरीले बीजों से ही लहलहाती है |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 4 January 2023

कोहरे के दौरान रेल और हवाई यातायात की दिक्कतें रोकने का पुख्ता प्रबंध हो



उत्तर भारत में कड़ाके की  सर्दी पड़ रही है | पहाड़ों से आ रही बर्फीली हवाएं  जनजीवन को प्रभावित कर रही हैं | राजस्थान में अनेक स्थानों पर पारा शून्य से भी नीचे आ चुका है | सुबह होने के बावजूद कोहरा छाये रहने से जहाँ लोग धूप से वंचित हो जाते हैं वहीं सड़क दुर्घटनाएं बढ़ जाती  हैं | लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित होता है रेल गाड़ियों और हवाई जहाजों का आवगमन | उत्तर भारत जाने और  आने वाली रेलों के  घन्टों विलम्ब से चलने का सिलसिला शुरू हो चुका है | विमानों को भी उड़ान भरने और उतरने में परेशानी होने से या तो उड़ानें रद्द हो रही हैं या फिर उनकी  समय सारिणी बुरी तरह गड़बड़ाने लगी है | ये पहली सर्दी नहीं है जिसमें इस तरह की समस्या उत्पन्न हुई हो | हर साल इस मौसम में रेल और हवाई यातायात पर कोहरे की मार पड़ती है | हालाँकि अमेरिका , कैनेडा और यूरोप के ज्यादातर देश सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण इस तरह की मुसीबत झेलते हैं | रूस सहित चीन का  बड़ा  भूभाग इन दिनों हिमाछाद्दित हो जाता है | लेकिन वहां इस मौसम के अनुरूप तमाम व्यवस्थाएं होने से प्रतिकूलता में भी अनुकूलता का प्रबंध कर लिया गया है | इसके ठीक विपरीत हमारे देश में विकास की गति तो बहुत तेज है जिसका परिणाम तेजी से विकसित हो रही विमान सेवाएं और द्रुत गति से दौड़ती वन्दे भारत रेल गाड़ियाँ हैं | बुलेट ट्रेन की महत्वाकाँक्षी योजना पर भी काम हो रहा है | देश में विश्वस्तरीय एक्सप्रेस राजमार्गों का निर्माण युद्धस्तर पर होने से एक तरफ जहां सडक मार्ग पर यातायात में उल्लेखनीय वृद्धि देखने मिल रही है वहीं प्रमुख मार्गों पर चलने  वाली रेल गाड़ियों में भी यात्रियों की भीड़ पूरे साल देखी जाती है | लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार का प्रमाण है कि वातानुकूलित श्रेणी में यात्रा करने वाले निरंतर बढ़ रहे हैं | ऐसा ही कुछ विमान सेवाओं के बारे में है | बीते कुछ सालों में देश के अनेक नगरों में नये हवाई अड्डे या तो बनाये गये हैं या पहले से मौजूद विमानतल का उन्नयन किया गया है | इसकी वजह से अब महानगरों से निकलकर विमान सेवा मझोले आकार के शहरों तक भी पहुँचने लगी है | हवाई यातयात पर निगाह रखने वाली संस्थाओं के अनुसार अब मध्यम वर्गीय परिवारों में भी हवाई जहाज में बैठने की लालसा पैदा हो गयी है | निजी विमानन कंपनियों के इस व्यवसाय में उतरने से भी विमान सुविधाएँ लगातर वृद्धि की ओर हैं | लेकिन इस सबके बावजूद सर्दियों के कुछ महीनों में जब कोहरे की वजह से सूर्यदेव छिपे रहते हैं तब रेल और हवाई यातायात में आने वाली दिक्कतों को दूर करने का कोई भी सार्थक प्रयास देखने नहीं मिल रहा | मसलन हर साल बजट में ये सुनने में मिलता है कि रेल गाड़ियों को कोहरे में भी समय से चलाने के लिए जरूरी उपकरणों की व्यवस्था की जा रही है | इसके लिए बजट में समुचित प्रावधान भी किये जाते हैं परन्तु समस्या जस की तस बनी रहती है | इसी प्रकार  हवाई अड्डों पर कोहरे के दौरान विमानों के सुरक्षित उड़ने और उतरने के लिये किये जा रहे इंतजाम भी हवा हवाई ही हैं | इसकी वजह से यात्रियों को तो परेशानी होती ही है लेकिन रेलवे  और विमान कंपनियों को भी  आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है | ऐसे में जब हमारा देश दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और जल्द ही हम जापान और जर्मनी से आगे निकलने की राह पर बढ़ रहे हैं तब इस तरह की तकनीकी कमियां हमारे विकास को आधा – अधूरा साबित करती हैं | प्रधानमंत्री ने आर्थिक क्षेत्र के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किये हैं उनको पूरा करने के लिए हमें इस तरह की सेवाओं को विश्वस्तरीय बनाने पर भी जोर देना होगा | कोहरे में रेल और हवाई जहाजों के निर्बाध सञ्चालन के लिये अत्याधुनिक तकनीक आधारित उपकरण खरीदना समय की मांग है | केंद्र सरकार को इस दिशा में गंभीरता से विचार कर जरूरी कदम उठाना चाहिए |


रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 3 January 2023

गंगा : मानव की बजाय खुद के कल्याण की मोहताज हो गई



कोलकाता से आई एक रिपोर्ट के अनुसार प. बंगाल में गंगा नदी का जल पीने तो क्या नहाने लायक तक नहीं है | इसकी मुख्य वजह उद्योगों से निकलकर उसमें मिलने  वाला दूषित जल और पदार्थ हैं  | यद्यपि मैदानी इलाकों में आने के बाद से ही गंगा की पवित्रता पर मानवीय दखलंदाजी का दुष्प्रभाव पड़ने लगता है किन्तु प. बंगाल से जो जानकारी आई है उसके अनुसार तो स्थिति बहुत ही खराब है | गंगा शुद्धि अभियान पर अरबों रूपये खर्च होने के बाद भी उसकी दशा सुधरने की बजाय अगर  और बिगड़ रही है तब ये कहना  गलत नहीं  होगा कि प्रयास या तो आधे – अधूरे थे या फिर योजना का क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं किया गया | गंगा के पानी में किस स्थान पर कितना प्रदूषण है ये वैज्ञानिक परीक्षणों से स्पष्ट किया जाता है | उस दृष्टि से प. बंगाल के जो ताजा आंकड़े आये हैं वे भयावह हैं क्योंकि गंगा किनारे रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए वह केवल पवित्र नदी ही नहीं अपितु जल आपूर्ति का स्रोत भी है | उनके रोजमर्रे की जरूरतों में पानी का जो हिस्सा है वह उन्हें गंगा से ही प्राप्त होता है | ऐसे में यदि उसका जल पीने तो क्या नहाने योग्य भी नहीं रहा तब उसका होना निरर्थक है | एक नदी जिसके जल की शुद्धता सदियों से असंदिग्ध रही हो वह यदि विज्ञानं के विकास के साथ ही  प्रदूषित होती चली गयी तो  ये साबित होता है कि प्राथमिकताओं में कहीं न कहीं दिशाहीनता रही | हालांकि गंगा या अन्य नदियाँ एकाएक अपवित्र हो गयी हों ऐसा नहीं है | औद्योगिकीकरण के साथ ही आबादी के असीमित विस्तार ने नदियों के जल को दूषित करना शुरू किया | इसीलिये न सिर्फ गंगा अपितु देश  की सभी छोटी - बड़ी नदियों की दशा एक सी हो गयी है | नालों का गन्दा पानी खुले आम उनमें मिलता हुआ देखा जा सकता है | यहां तक कि सीवर से आने वाला पानी भी निकटस्थ नदी में छोड़ा जाता है | जब शहर छोटे हुआ करते थे तब नाले – नालियों का जल आस पास के खेतों में उपयोग होता था | लेकिन बेतहाशा शहरीकरण  के कारण वे  खेत कांक्रीट के जंगलों  में तब्दील हो चुके हैं | इस वजह से शहरी बस्तियों का निस्तारित  पानी ,   जल स्रोतों को प्रदूषित करने का कारण बन रहा है जिससे  गंगा ही नहीं वरन देश की अधिकतर नदियों के साथ ही कुँए और तालाब का जल शुद्धता गँवा बैठा है | यहाँ तक कि भूजल भी अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता | इसके लिए प्रथम दृष्टया तो सरकार ही कसूरवार है क्योंकि जल स्रोतों की  सुरक्षा  और  शुद्धता के लिए उसे जो प्रबंध करने चाहिए थे वे उसने नहीं किये और जो किये भी वे अपर्याप्त होने के साथ ही अव्यवस्था  और भ्रष्टचार का शिकार होकर रह गए | गंगा शुद्धि इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है | हालाँकि ये कहना भी सही नहीं है कि कुछ भी नहीं हुआ लेकिन हालात चूंकि अपेक्षित स्तर तक नहीं सुधर सके इसलिए माना जा सकता है कि प्रयासों में ईमानदारी और प्रतिबद्धता की कमी रही | बहरहाल प.बंगाल से गंगा की दुर्दशा संबंधी जो जानकारी आई है वह केवल सरकार के ही नहीं अपितु  समाज के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए |  ये कहते हुए पल्ला झाड़ लेना गैर जिम्मेदाराना सोच है कि  सरकार , स्थानीय प्रशासन , नगरीय निकाय और उद्योग इसके लिए कसूरवार हैं | नदियों के साथ ही अन्य जल स्रोतों के प्रति श्रृद्धा का भाव रखने वाले समाज में उनकी पवित्रता और सुरक्षा को लेकर जो लापरवाही देखने में आती है वह भी उनका सत्यानाश करने की दोषी है | जिन नदियों में स्नान कर हम पुण्य कमाने की लालसा रखते हैं उन्हें अशुद्ध करने से बड़ा पाप नहीं है | प्रकृति और शुद्ध पर्यावरण हमें ईश्वर की अनुपम देन  है | लेकिन हम उसके प्रति कृतज्ञ होने के बजाय एहसान फरामोश हो चले हैं | राजधानी दिल्ली में छठ पूजा के दिन  श्रृद्धालु यमुना के जिस जल में स्नान और पूजन - अर्चन करते हैं उसके चित्र देखकर घिन आती है | उसके बाद भी लोग उस जल से अपनी धार्मिक आस्था का निर्वहन करते हैं तो उसे श्रद्धा कहें या मूर्खता ये विश्लेषण का विषय है | कोरोना काल में जब लॉक डाउन की वजह से लोग घरों में रहने मजबूर थे तब नदियाँ अपने नैसर्गिक रूप में लौट आई थीं | उस समय के तमाम चित्र और वीडियो जमकर प्रसारित हुए  जिन्हें लोगों की सराहना भी मिली किन्तु ज्योंही लॉक डाउन से आजादी मिली त्योंही नदियों की बदहाली पहले जैसे हो गयी | तमाम अनुभवों के बाद निष्कर्ष यही है कि प्रकृति से मिली इस अमूल्य दौलत के प्रति हम जिस तरह से लापरवाह हैं उस रवैये को बदलना होगा | पूरी तरह सरकार के भरोसे बैठे रहना  उचित नहीं  है | वह जो कर रही है , उसे करने दें किन्तु जहाँ हम गलत हैं उसमें सुधार कर लिया जावे तो काफी कुछ बदलाव आ सकता है | इसी तरह  नदियों के संरक्षण हेतु केवल पर्यावरणविद संघर्ष करें और हम दूर खड़े देखते रहे तो बड़ी बात नहीं नदियों का जल , पीने और नहाने ही नहीं अपितु छूने लायक तक न बचेगा | हमारे देश में प्रत्येक नदी गंगा का प्रतीक मानकर पूजी जाती है | लेकिन उसके बचाव हेतु हम क्या करते हैं , इस प्रश्न का जवाब कोई नहीं  देता | गौरतलब है गंगा न तो एक दिन में प्रदूषित हुई और न ही थोड़े से प्रयासों से स्वच्छ होने वाली है | जब तक नदियों के प्रति आस्थावान लोग उन पर अत्याचार करना बंद नहीं करते तब तक वे धीमी मौत की शिकार होती रहेंगी | गंगा का पृथ्वी पर अवतरण मानव  कल्याण के लिए हुआ था लेकिन बदले में मानव ने उसे जो दिया उसके कारण आज वह अपने कल्याण की मोहताज हो गई है | 

रवीन्द्र वाजपेयी