Wednesday, 8 February 2023

सदन को बाधित कर विपक्ष अप्रत्यक्ष रूप से सरकार की मदद कर रहा



बजट सत्र संसद का सबसे महत्वपूर्ण और लंबा सत्र होता है । इस सत्र में देश की भावी आर्थिक दशा और दिशा का निर्धारण होता है। हालांकि देखा गया है की बजट के बारे में बहस का स्तर निरंतर गिरता चला जा रहा है और इसीलिए इस महत्वपूर्ण विषय पर जितना गंभीर विमर्श होना चाहिए उतना नहीं हो पाता। इसके लिए केवल विपक्ष ही नहीं अपितु सत्ता पक्ष भी बराबर का दोषी है । ये कहना गलत नहीं है कि अब सांसद पहले की तरह तैयारी कर नहीं आते। यद्यपि नई संसद के गठन के पूर्व नवनिर्वाचित सदस्यों को वरिष्ठ सांसदों द्वारा संसदीय प्रक्रिया से प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम भी रखा जाता है । संसद में हुई पुरानी बहसों का रिकॉर्ड संसद के पुस्तकालय में सुरक्षित है । जिनसे सांसदों को मार्गदर्शन लेना चाहिए परंतु   आज के सांसद पुस्तकालय में बहुत कम दिखाई देते हैं। वैसे न केवल बजट बल्कि अन्य सत्रों में भी जरा जरा सी बातों पर विपक्ष हंगामा करते हुए सदन को चलने नहीं देता जिसके कारण से बहुत से महत्वपूर्ण प्रस्ताव बिना समुचित बहस के पारित हो जाते हैं। ऐसा होने से सत्ता पक्ष विधायी कार्य करने की औपचारिकता तो पूरी कर देता है किंतु यह परिपाटी संसदीय प्रजातंत्र की सार्थकता और उपयोगिता दोनों पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। संसद के मौजूदा बजट सत्र में विपक्ष द्वारा गौतम अडानी की कंपनियों के बारे में अमेरिका की हिंडनबर्ग नामक संस्था की रिपोर्ट को लेकर हंगामा मचा रखा है। उसकी मांग है कि इस मामले की जांच के लिए  संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन किया जाए। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का कहना है कि इस , विवाद से सरकार और संसद दोनों का कोई संबंध नहीं है और शेयर मार्केट को नियंत्रित निर्देशित करने वाली संस्था सेबी इस मामले की जांच कर ही रही है।इसलिए इस पर चर्चा गैर जरूरी होगी ।  वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार के इशारे पर भारतीय स्टेट बैंक और जीवन बीमा निगम जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों ने गौतम अडानी की कंपनियों को अनाप शनाप कर्ज देकर  आम जनता द्वारा जमा किया हुआ धन खतरे में डाल दिया है । जवाब में सरकार कह रही है कि जो कुछ हुआ  वह नियमानुसार है और इस वजह से जेपीसी के गठन का कोई औचित्य और आवश्यकता नहीं है । लेकिन अपनी मांग को लेकर  विपक्ष सदन नहीं चलने दे रहा जिससे जनता के धन की बर्बादी हो रही है। यद्यपि अतीत में जब मौजूदा सत्ताधीश विपक्ष में रहे तब वे भी सदन को बाधित करने के लिए इसी तरह का आचरण किया करते थे। गत दिवस राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस होने के  सरकारी अनुरोध पर विपक्ष ने सहमति दी जिसके बाद कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधे आरोप लगाया कि उनके संरक्षण के कारण ही गौतम अडानी देखते देखते देखते समृद्धि और सफलता के चरम शिखर पर जा पहुंचे। श्री गांधी के भाषण का अधिकांश समय अडानी और मोदी के संबंधों  पर केंद्रित था। लेकिन   भाषण के अंत में राष्ट्रपति के अभिभाषण के समर्थन या विरोध का कोई उल्लेख उन्होंने नहीं किया । इससे साबित होता है कि विपक्ष के वरिष्ठ नेता तक को इस बात का ज्ञान नहीं था कि वह किस विषय पर बोलने खड़े हुए थे। आज प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपना वक्तव्य देने जा रहे हैं। निश्चित रूप से वे श्री गांधी के आरोपों का सिलसिलेवार जवाब देंगे और जैसा कि बीते 8 वर्षों में देखने  जब-जब भी श्री मोदी ने सदन में किसी भी विषय पर  भाषण दिया तब तब उन्होंने विपक्ष को पूरी तरह धराशायी कर दिया । निश्चित रूप से गौतम अडानी की कंपनियों को लेकर हिंडनबर्ग द्वारा किया गया खुलासा कई गंभीर बातों की ओर इशारा करता है क्योंकि इससे भारत में पूंजी बाजार के नियमन में पारदर्शिता का सवाल उठ खड़ा हुआ है। लेकिन इस विषय पर  यदि आगे भी सदन को चलने नहीं दिया गया और गतिरोध बना रहा तो इससे नुकसान विपक्ष का ही होगा।  उदाहरण के लिए कल  राहुल गांधी ने सरकार के विरुद्ध आरोपों की जो झड़ी लगाई उससे विपक्ष की जागरूकता और सक्रियता दोनों का परिचय मिला। भारत जोड़ो यात्रा के बाद यह श्री गांधी का संसद में पहला भाषण था जिसमें उनका जोश पूरी तरह नजर आया।  लेकिन विपक्ष ने आगे भी  संसद में गतिरोध जारी रखा तो फिर  सरकार  अपने प्रस्तावों को तो हंगामे के बीच भी पारित करवा लेगी परंतु विपक्ष सरकार को घेरने के अपने अवसर को गंवा देगा। वैसे राज्यसभा में भी कांग्रेस ने अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस की शुरुवात कर दी है। और लोकसभा में प्रधानमंत्री के भाषण के बाद यह पारित भी हो जायेगा । इसके बाद अगर विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ा रहकर सदन को चलने नहीं देता तो फिर ये मानकर चलना होगा कि उसके पास मुद्दों का अभाव है और इसीलिए देश में ये अवधारणा मजबूत होती जा रही है कि कांग्रेस विपक्ष की भूमिका का निर्वहन सही तरीके से नहीं कर पा रही। बेहतर होगा सभी विपक्षी दल बजट सत्र का सदुपयोग करें। सरकार को घेरने का उन्हें पूरा अधिकार है और यह उनका लोकतांत्रिक कर्तव्य भी है। लेकिन संसदीय प्रक्रिया को बाधित करने से  सिवाय तात्कालिक प्रचार के और कुछ हासिल नहीं होता। देश के सामने अडानी से भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर संसद में विस्तृत चर्चा होनी चाहिए किंतु इसके लिए सदन का चलना और उसमें विपक्ष का रहना जरूरी है। बेहतर होगा विपक्ष अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए चतुराई के साथ पेश आए। अल्पमत में होने के बाबजूद भी वह चाहे तो सरकार की गलतियों का पर्दाफाश कर सकता है लेकिन ये तभी संभव है जब सदन सुचारू रूप से चले।अन्यथा सदन के संचालन को बाधित कर वह अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को मदद ही पहुंचा रहा है।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 7 February 2023

नीतीश और उपेंद्र का झगड़ा समाजवादी परंपरा का निर्वहन



बिहार  में जद(यू) का विवाद जिस तरह सड़क पर आ गया है उससे लगता है अगले लोकसभा चुनाव के पहले वहां की सियासत में बड़ा तूफान आ सकता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरुद्ध खुलकर जंग छेड़ने से जद(यू) के साथ ही तेजस्वी यादव की राजद भी भन्नाई हुई है। उपेंद्र जद(यू) की ओर से विधान परिषद के सदस्य हैं। पूर्व में वे  केन्द्र की एनडीए  सरकार में मंत्री भी रहे किंतु बाद में नाराज होकर नीतीश के साथ लौट आए। दरअसल नीतीश और उपेन्द्र ने ही स्व. जॉर्ज फर्नांडीज के नेतृत्व में समता पार्टी बनाई थी।  उसके बाद से गंगा में बहुत पानी बह चुका है। नीतीश ने भी न जाने कितने पाले बदले । जिन लालू के साथ उन्होंने सियासत शुरू की उनके साथ मिलने बिछड़ने और फिर मिलने की कहानियां सर्वविदित हैं। और फिर ये भी देखने में आया कि कभी नरेंद्र मोदी के घोर विरोधी रहे नीतीश उन्हीं की शरण में जा बैठे। इसी तरह की पलटी उनके पहले स्व.रामविलास पासवान मार चुके थे जिन्होंने गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी सरकार और एनडीए छोड़ दिया किंतु 2014 आते तक वे भी श्री मोदी  के साथ खड़े हो गए । इसी तरह नीतीश भी लालू से चली अदावत के बाद आखिरकार राजद से गलबहियां कर बैठे और जिन  तेजस्वी और तेजप्रताप के कारण भाजपा के साथ आकर जुड़े थे , लौटकर फिर उन्हीं के साथ याराना बना लिया। इसका असली कारण बिहार में भाजपा का मजबूत होता जाना था । नीतीश को भय सताने लगा कि धीरे धीरे वे हाशिए पर चले जायेंगे। 2020 के विधानसभा चुनाव में सीटों की संख्या में भाजपा से पीछे रह जाने के बावजूद यद्यपि वे मुख्यमंत्री बने रहे किंतु उन्हें भावी खतरों का अनुमान होने लगा था। उस चुनाव में लोजपा नेता चिराग पासवान द्वारा जद (यू) के प्रत्याशियों के विरुद्ध उम्मीदवार उतारे जाने से नीतीश की पार्टी पिछड़ गई।चिराग की पीठ पर भाजपा का हाथ बताया जाता रहा। और आज भी वे खुद को मोदी का हनुमान कहते हैं। 2019 में केन्द्र सरकार में जद (यू) को एक मंत्री पद के ऑफर से नीतीश रुष्ट हो गए थे। और वहीं से खाई पैदा हो गई।भाजपा ने उनकी मर्जी के विरुद्ध आरसीपी सिंह नामक पूर्व नौकरशाह को मंत्री बनाकर जो दांव खेला उसके बाद उनका गुस्सा बढ़ता गया । आरसीपी कभी नीतीश के खासमखास हुआ करते थे इसीलिए उन्होंने उनको पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष तक बनाया।  लेकिन उपेंद्र कुशवाहा की नाराजगी का कारण कुछ समय पहले नीतीश कुमार द्वारा किया गया यह ऐलान है कि महागठबंधन अगला विधानसभा चुनाव तेजस्वी के नेतृत्व में लड़ेगा । दरअसल उनको अपेक्षा थी कि समता पार्टी बनाते समय  कुशवाहा समाज के साथ कोइरी और उन जैसी अन्य पिछड़ी जातियों का समर्थन दिलवाने के उपकार स्वरुप नीतीश उन्हें अगले मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करेंगे किंतु जैसे ही उन्होंने तेजस्वी के नाम को आगे बढ़ाया तब पहले तो उन्होंने हल्का विरोध किया किंतु जब  लगा कि उन्हें  तवज्जो नहीं मिल रही तो उन्होंने खुलकर बागी रवैया अपनाया । जवाब में जब नीतीश के समर्थक पार्टी  अध्यक्ष और कुछ  नेताओं ने यह कहना शुरू किया उपेंद्र पार्टी छोड़कर चले जाएं तो उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि वे अपना हिस्सा लिए बिना नहीं जाएंगे और इस बात को लगातार दोहराते रहे ।  धीरे-धीरे बात बढ़ती गई और उपेंद्र ने ये कहना शुरू किया कि वे पार्टी को नष्ट होते हुए नहीं देख सकते और  किसी के कहने से उसे छोड़कर नहीं जाएंगे । उधर नीतीश ने भी कह दिया कि उन्हें जहां जाना है जाएं उनको कोई फर्क नहीं पड़ता । तेजस्वी आरोप लगा रहे हैं कि श्री कुशवाहा भाजपा के इशारे पर यह सब कर रहे हैं । हालांकि  अभी तक उपेन्द्र ने अपने पत्ते  पूरी तरह नहीं खोले  लेकिन उनके तेवर रोजाना तीखे होते जा रहे हैं । ऐसे में यह जंग किस मोड़ पर जाकर रुकेगी  कहना फिलहाल मुश्किल है। राजनीति के जानकार  कह रहे हैं कि बिहार में उपेंद्र , भाजपा के लिए मंच तैयार करने में जुटे हैं और लोकसभा चुनाव आने के पहले  बड़ा  धमाका हो सकता है । यद्यपि ये भी संभावना है कि नीतीश उनकी ताकत का आकलन करते हुए उन्हें पार्टी से बाहर करते हुए आरसीपी सिंह वाले अंजाम तक पहुंचा दें। दूसरी तरफ ये खतरा भी है कि जद (यू) की आंतरिक फूट से  नीतीश सरकार के बहुमत खोने पर विधानसभा भंग करने की नौबत आ जाए। भाजपा को भी लग रहा है यदि नीतीश और तेजस्वी की सरकार चलती रही तब 2024 में पिछली सफलता दोहराना कठिन हो जायेगा। दरअसल जिस सोशल इंजीनियरिंग को  भाजपा ने अपनाकर उ.प्र कब्जा लिया उससे नीतीश भी भयग्रस्त तो हैं लेकिन जिस तरह की रहस्यमयी राजनीति वे करते हैं उसमें कब कौन सा  पैंतरा चल देंगे कहना कठिन है। हालांकि उनके और उपेन्द्र के बीच की जंग से एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया कि स्व. लोहिया जी के मानसपुत्र ज्यादा समय तक एक साथ नहीं रह पाते । इसीलिए  बिहार में जो काम भाजपा न कर सकी वह उपेंद्र और आरसीपी सिंह जैसे नेता अच्छी तरह से कर रहे हैं । जिसमें चिराग पासवान  भी जुड़ते देखे जा सकते हैं । वहीं इस पूरे परिदृश्य में कांग्रेस दर्शक दीर्घा तक सिमटकर रह गई है जिसे कोई भाव नहीं दे रहा।राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से जद (यू) और  राजद के दूर बने रहने से ये बात प्रमाणित भी हो गई।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 6 February 2023

मुशर्रफ : दोगलेपन के कारण खुद भी मिटे और मुल्क भी तबाह कर दिया



पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ नहीं रहे। दुबई के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।नवाज शरीफ का तख्ता पलटकर सत्ता पर काबिज हुए मुशर्रफ का जन्म दिल्ली में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। सेना में भर्ती होकर वे सेनाध्यक्ष के ओहदे  तक जा पहुंचे । जब स्व. अटलबिहारी वाजपेयी बस लेकर शांति प्रक्रिया बहाल करने लाहौर गए तो उस वक्त वे लाहौर में मौजूद रहने के बजाय इस्लामाबाद में अलग खिचड़ी पका रहे थे। नवाज शरीफ और अटल जी के बीच लाहौर घोषणापत्र के जरिए रिश्ते सुधारने की दिशा में अनेक कदम उठाए गए। रेल और सड़क यातायात के साथ ही व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध कायम करने का पुरजोर प्रयास हुआ । लेकिन बतौर फौजी जनरल मुशर्रफ को ये बर्दाश्त नहीं हुआ क्योंकि पाकिस्तान में फौजी जनरलों की अहमियत भारत विरोध के कारण ही कायम रहती है। आतंकवादियों को भी फौज ही प्रशिक्षित , प्रेरित और प्रश्रय देती है। जब मुशर्रफ को लगा कि वाजपेयी जी की सदाशयता से प्रभावित नवाज भारत के साथ शांति स्थापित करने के लिए कुछ बड़े कदम उठा सकते हैं तब उन्होंने कारगिल में घुसपैठ का कुचक्र रचा जिसमें पाकिस्तान को बुरी तरह पराजित तो होना ही पड़ा  लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर भी उसकी किरकिरी हुई । पराकाष्ठा तब हो गई जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने नवाज को वाशिंगटन बुलाकर तत्काल कारगिल से फौजें हटाने की हिदायत दे डाली। जानकार बताते हैं शरीफ उस युद्ध की योजना से पूरी तरह अनभिज्ञ थे। मुशर्रफ को भय था कि वे अटल जी की लाहौर यात्रा से प्रभावित होकर जंग की अनुमति नहीं देंगे । इसीलिए उस युद्ध से उनको राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों ही दृष्टि से नीचा देखना पड़ा । स्मरण रहे 2018 में दोनों देश परमाणु परीक्षण कर चुके थे ।  जिसकी वजह से रिश्तों में जबर्दस्त तल्खी थी। बावजूद उसके  20 फरवरी 1999 को श्री वाजपेयी बस में बैठकर सीमा पार लाहौर पहुंचे थे । उनके साथ देव आनंद , जावेद अख्तर और कपिल देव जैसी हस्तियां भी थीं। पाकिस्तान में उनके प्रति जबर्दस्त आकर्षण देखा गया। लेकिन शत्रुता मिटाकर दोस्ती और विकास के रास्ते पर चलने की उस कोशिश को मुशर्रफ ने चंद महीनों बाद ही पलीता लगाकर मई में कारगिल में घुसपैठ की गोपनीय चाल चल दी। यहां नवाज के अलावा वायु और नौसेना को भी  बेखबर रखा गया । और जब जंग हार गए तब अक्टूबर में शरीफ का तख्ता पलटकर सत्ता पर काबिज हो गए। नवाज को बाद में सऊदी अरब के दबाव में विदेश जाने मिल गया। दो साल बाद मुशर्रफ फर्जी चुनाव करवाकर राष्ट्रपति बन बैठे ताकि उनकी छवि लोकतांत्रिक तरीके से चुने नेता की बने। उनके पिछले रवैए के वावजूद बतौर राष्ट्रपति अटल जी ने उन्हें बातचीत हेतु भारत आमंत्रित किया और वे आए भी किंतु आगरा में हुई वह बातचीत साझा घोषणापत्र में कश्मीर के उल्लेख की उनकी जिद की वजह से बेनतीजा खत्म हो गई । 2008 में उनको पाकिस्तान छोड़कर भागना पड़ा क्योंकि अदालत ने उन्हें मृत्युदंड की सजा सुना दी थी। यद्यपि बरसों बाद वे वतन लौटे तो जरूर लेकिन न पद मिला , न ही प्रतिष्ठा। पाकिस्तान उनके हटने के बाद भले ही लोकतांत्रिक सरकार द्वारा संचालित हो रहा है लेकिन उन्होंने वहां आतंकवादी संगठनों की जड़ें इतनी मजबूत कर दीं कि वे सेना के साथ मिलकर मनमानी किया करते हैं।  बीते अनेक वर्षों से वे  इलाज के नाम पर दुबई में निर्वासित जीवन बिता रहे थे। सही बात ये है कि उन्होंने जीवन में एक भी ऐसा कार्य नहीं किया जिसके लिए वे सम्मान के साथ याद किया जाएं । इसके ठीक उलट वे दगाबाज और दोगले चरित्र के तौर पर इतिहास के किसी कोने में पड़े मिलेंगे। अमेरिका ने 9/11 के हमले के बाद जब अल कायदा के विरुद्ध जंग छेड़ते हुए अफगानिस्तान में डेरा जमाया तब मुशर्रफ उसके साथ खड़े दिखाई दिए। जबकि उस हमले के योजनाकार ओसामा बिन लादेन को भी पाकिस्तान ने ही गुपचुप तरीके से शरण दी। एक तरफ आतंकवाद को बढ़ावा और दूसरी तरफ अमेरिका की मदद जैसे दोहरे रवैए के कारण मुशर्रफ साख और धाक गंवाते चले गए। उनके जीवनकाल में ही उनके विरोधी सत्तासीन होते रहे वे स्वयं  पूरी तरह उपेक्षित और दयनीय बनकर रह गए। इसका कारण उनकी षडयंत्रकारी सोच ही थी। उदाहरण के तौर पर जिस नवाज शरीफ ने उनको सेना प्रमुख बनाया उनको मुशर्रफ ने  पहले तो कारगिल में घुसपैठ के बारे में  अंधेरे में रखा और फिर युद्ध में पराजित होने के बाद जब लगा कि वे इसके लिए जिम्मेदार ठहराए जायेंगे तब उन्हीं का  तख्ता पलट दिया। अटल जी के निमंत्रण पर हुई आगरा वार्ता के जरिए वे चाहते तो दोनों देशों के बीच रिश्तों का एक नया युग शुरू कर सकते थे परंतु जब वार्ता सुखद मोड़ पर आने को थी तब उन्होंने घोषणापत्र में कश्मीर के उल्लेख के साथ ही आतंकवादियों को आजादी का सिपाही माने जाने की जिद पकड़कर सब गुड़ गोबर कर दिया। आज पाकिस्तान जिस बदहाली और कंगाली से गुजर रहा है हालांकि उसके लिए कमोबेश तो वहां के सभी शासक जिम्मेदार हैं लेकिन आजादी के 50 साल बाद जब दोनों देशों में नई पीढ़ी की भूमिका निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने की स्थिति में आ गई थी तब मुशर्रफ यदि लाहौर बस यात्रा से उत्पन्न संभावनाओं को कारगिल की जंग में बेमौत मरने न छोड़ते तो आज पाकिस्तान में लोकतंत्र भी मजबूत होता और मुल्क मौजूदा शर्मनाक स्थिति में न पहुंचता। दुर्भाग्य से मुशर्रफ के बाद भी इस देश की बदनसीबी बनी रही। नरेन्द्र मोदी द्वारा भी काबुल से लौटते समय लाहौर में रुककर नवाज से मिलने का निर्णय एक साहसिक कूटनीतिक  पहल थी किंतु उसे भी आतंकवादी हमलों ने नष्ट कर दिया। इस प्रकार  पाकिस्तान का ये दुर्भाग्य ही रहा कि भारत के साथ रिश्ते सुधारने की हर कोशिश को नाकामयाब किया जाता रहा। और मुशर्रफ उसके सबसे बड़े खलनायकों में से ही एक थे  जिन्हें जिंदगी भर किए गए छल कपट के कारण मौत के लिए अपने वतन की धरती तक नसीब नहीं हुई। बलूचिस्तान की जनता का उस निर्दयी फौजी तानाशाह ने जिस निर्दयता से दमन करवाया उसी की वजह से वह हिस्सा पाकिस्तान से अलग होने पर आमादा है ।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 4 February 2023

रामचरित मानस जलाने की सजा : सपा पांचों सीटें हार गई



उ. प्र में शिक्षक वर्ग की 2 और स्नातक वर्ग की 3 विधान परिषद सीटों के लिए हुए चुनाव परिणाम तकरीबन इकतरफा रहे।  भाजपा ने जहां 4 सीटें जीतीं वहीं 1 पर निर्दलीय ने बाजी मारी। इन परिणामों से बहुत दूरगामी निष्कर्ष निकालना तो जल्दबाजी होगी किंतु  मुख्य विपक्षी सपा (समाजवादी पार्टी) के लिए जरूर ये किसी धक्के से कम नहीं हैं । मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव में शानदार विजय हासिल करने के बाद हुए इन चुनावों में वह भाजपा को पटकनी देने के जो सपने देख रही थी वे धूल धूसरित हो गए। भाजपा एक सीट हारी अवश्य किंतु वह भी बजाय सपा या बसपा के निर्दलीय के पास जाना इस बात का सूचक है कि राज्य में गत वर्ष हुए विधानसभा चुनाव का राजनीतिक माहौल यथावत है । साथ ही इससे ये भी स्पष्ट हुआ कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश के जनमानस पर छाए हुए हैं। वैसे भी हाल ही में आए एक सर्वे में उनको देश का सबसे अच्छा मुख्यमंत्री माना गया है। उक्त चुनाव में शिक्षक और स्नातक वर्ग के मतदाता थे इसलिए इन परिणामों का काफी महत्व है। लेकिन  एक मुद्दा जिसने इन चुनावों पर असर डाला , वह था रामचरित मानस के विरोध में बनाया गया घृणित महौल जिसके चलते लखनऊ में उस पवित्र ग्रंथ की प्रतियां तक जलाई गईं। सपा नेता स्वामीप्रसाद मौर्य ने मानस  की एक चौपाई को आधार बनाकर पहले तो उसके रचयिता तुलसीदास जी पर अनर्गल आरोप लगाए परन्तु जब विरोध हुआ तो पिछड़े और दलित जैसे घिसे पिटे मुद्दे उठाकर जातिवादी जहर फैलाने की शरारत की। स्वामीप्रसाद की वह घिनौनी हरकत सपा में शामिल अनेक नेताओं को  रास नहीं आई। सुनने में आया कि पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन्हें बुलाकर जवाब मांगा। उनके चाचा शिवपाल यादव ने भी स्वामीप्रसाद की बकवास को उनका निजी विचार बताकर किनारा कर लिया। वहां तक तो बात समझ में आने वाली थी किंतु उसके बाद अखिलेश ने उस स्तरहीन हरकत के लिए स्वामीप्रसाद को पुरस्कृत करते हुए सपा का राष्ट्रीय महामंत्री बना दिया और वह भी शिवपाल के बराबरी का । और तो और खुद को शूद्र बताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से संदर्भित चौपाई का अर्थ पूछने जैसा बयान देकर अप्रत्यक्ष रूप से स्वामीप्रसाद द्वारा बोए गए जहर के बीज को खाद पानी देने की हिमाकत कर डाली। इससे प्रोत्साहित होकर उनकी जुबान और तीखी होती चली गई। राजनीतिक विश्लेषक इस मुहिम को बसपा समर्थक  दलित मतदाताओं में सेंध लगाने की रणनीति मानते हुए 2024 का गुणा भाग लगाने में जुट गए।  लेकिन विधानपरिषद की पांच सीटों के चुनाव परिणाम ने स्वामीप्रसाद और सपा दोनों के गाल पर जो झन्नाटेदार  चांटा  जमाया वह इस बात का प्रमाण है कि जातिवाद के नाम पर सामाजिक ढांचे को नष्ट करने की राजनीति अब अंतिम सांसें गिन रही है और सनातनी समाज सदियों से चली आ रही कुरीतियों को बजाय विद्वेष और संघर्ष के सद्भाव और समरसता  बढ़ाकर दूर करने की दिशा में बढ़ रहा है।आदि काल से जिन  विभूतियों ने हमारी चेतना को निर्देशित किया उनके प्रति असम्मान व्यक्त करने वालों को किस तरह कूड़ेदान में फेंका जा रहा है उसका सबसे अच्छा उदाहरण उ . प्र ही है। मंडल और दलित राजनीति के साथ ही मुस्लिम गठजोड़ के जरिए राष्ट्रवादी ताकतों और मुख्यधारा की सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध किए गठबंधन कुछ समय तक तो प्रभावशाली रहे किंतु जल्द ही बुलबुले की तरह फूट गए। यद्यपि उस दौर को पुनर्जीवित करने की अपवित्र कोशिशें अलग अलग रूप में  फिर सामने  आती रहती हैं लेकिन जनता उनके मोहपाश में फंसने की बजाय  दूर जाने लगी है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण विधान परिषद के लिए हुए ताजा चुनावों के परिणाम हैं। पता नहीं अखिलेश और विकृत मानसिकता से ग्रसित उनके स्वामीप्रसाद जैसे बगलगीर इन परिणामों से कितना सबक लेंगे किंतु यदि वे दीवार पर लिखी इबारत भी नहीं पढ़ पा रहे तब तो उनकी राजनीतिक समझ और विवेक दोनों पर प्रश्नचिन्ह लगना लाजमी है। हालांकि इन लोगों से किसी सार्थक सोच की आशा करना मरुस्थल में जल ढूंढने जैसा है किंतु लोकतांत्रिक समाज में  सत्ता की दौड़ में शामिल लोग इतना भी गिर सकते हैं ये देखकर पीड़ा होती है। स्वामीप्रसाद को तो छोड़ भी दें किंतु अखिलेश जो विदेश से पढ़कर आए और अंतर्जातीय विवाह करते हुए अपनी प्रगतिशील सोच का परिचय भी दिया ,  जब वे इस तरह की घटिया हरकतों का हिस्सा बनते हैं तब लगता है उनकी शिक्षा और निजी जीवन में दिखने वाला व्यवहार फर्जी है। इससे भी बढ़कर बात ये है कि चाहे अखिलेश हों या मायावती , जब ये नेतागण जाति की संकुचित सोच से बाहर आने तैयार नहीं  तब उस वर्ग के लोग इनके चरण चुम्बन क्यों करते हैं जिसे ये पानी पी पीकर गालियां देते और नफरत की नजर से देखते हैं। अखिलेश और स्वामीप्रसाद सरीखे नेताओं को तुलसीदास और रामचरित मानस पर उंगलियां उठाने का ये त्वरित परिणाम तो मिल गया। अब भी उनकी बदजुबानी और हेकड़ी जारी रही तो उनकी दशा भी मायावती जैसी होनी तय है।


रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 3 February 2023

अडानी पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी



अंजाम क्या होगा ये तो फिलहाल कहना कठिन है किंतु हफ्ते भर पहले दुनिया के तीसरे और भारत के सबसे धनाढ्य व्यक्ति कहलाने वाले अडानी समूह के कर्ताधर्ता गौतम अडानी के बारे में अर्श से फर्श पर आने की कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। अमेरिका के एक छोटी से संस्थान हिंडनबर्ग द्वारा ज्योंही अडानी समूह में व्याप्त वित्तीय गड़बड़ियों पर एक विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट सार्वजनिक की गई त्योंही पूरी दुनिया में इस समूह की साख एक झटके में धराशायी हो गई। इसका कारण उसका वैश्विक व्यवसायिक विस्तार है। चूंकि अडानी समूह ने विदेशी बैंकों और वित्तीय संस्थानों से भी भारी मात्रा में कर्ज ले रखे थे इसलिए उन सबकी सांसें ऊपर नीचे होने लगीं। समूह की कंपनियों के शेयरों के दाम पेड़ से सूखे पत्तों की तरह गिरने लगे। भारत में इस घटनाक्रम से ज्यादा बवाल इसलिए मचा क्योंकि स्टेट बैंक सहित अनेक बैंकों के अलावा भारतीय जीवन बीमा निगम ने अडानी समूह  को जो कर्ज दिया उसे लेकर लंबे समय से ये आरोप लगता रहा कि वह उसकी संपत्ति से कहीं अधिक है । जिस रिपोर्ट पर ये तूफान उठा उसके अनुसार अडानी समूह ने अपने शेयरों का मूल्य वास्तविकता से कहीं ज्यादा दिखाकर कर्ज देने वालों को धोखे में रखा जिससे उनके लिए उसकी वसूली मुश्किल होगी। उक्त संस्थान इसके पूर्व भी अनेक अन्तर्राष्ट्रीय कंपनियों की इसी तरह पोल खोल चुका था। वह कुछ व्यक्तियों का छोटा सा समूह है जो कंपनियों के कारोबार का सूक्ष्म अध्ययन कर उनकी गड़बड़ियां उजागर करता है। यद्यपि उस पर आरोप है कि इससे उसे व्यवसायिक लाभ पहुंचता है । अडानी समूह ने भी उसी आरोप को दोहराया है। इस बारे में सबसे बड़ी बात ये हुई  कि उक्त रिपोर्ट अडानी समूह द्वारा निवेशकों से 20 हजार करोड़ उगाहने के लिए जारी इश्यू (एफ पी ओ) के एक दिन पहले सार्वजनिक की गई। सच्चाई जो भी हो लेकिन उक्त रिपोर्ट ने गौतम अडानी की ऊंची उड़ान को न सिर्फ रोका अपितु उसे आपातकालीन लैंडिंग हेतु बाध्य कर दिया। उसके शेयर लगातार नीचे आते जा रहे हैं । अपनी साख बचाने समूह ने एफपीओ में निवेश करने वालों के पैसे लौटाने का ऐलान भी कर दिया जबकि उसे आशातीत समर्थन मिला था। समूह ने रिपोर्ट जारी करने वाले संस्थान को 400 पृष्ठ का स्पष्टीकरण भेजने के साथ ये आरोप भी मढ़ा कि यह रिपोर्ट भारत के विरुद्ध षडयंत्र है ताकि उसकी विकास यात्रा में रुकावट आए। कानूनी कारवाई की धमकी भी दी गई । लेकिन इसका असर निवेशकों पर नहीं हुआ तथा अडानी नाम वाली लगभग सभी कपनियों के शेयर पूंजी बाजार में गोते लगाने लगे जिससे उसका बाजार में मूल्यांकन भी लगातार कम होता जा रहा है। इस बारे में उल्लेखनीय है कि अडानी और अंबानी ( मुकेश) समूह काफी समय से विपक्ष के निशाने पर हैं। राहुल गांधी तो हर भाषण में उनका उल्लेख करते हैं। ये आरोप लगाया जाता है कि मोदी सरकार आने के बाद इन दोनों  समूहों को सरकार का संरक्षण मिलने से ये अनुचित तरीकों से आगे बढ़ते जा रहे हैं। विशेष रूप से गौतम अडानी पर ज्यादा हमले हुए। आलोचकों का ये दावा है कि अडानी समूह को विदेशों में भी बड़े काम दिलवाने में सरकारी प्रभाव का इस्तेमाल हुआ । इसके अलावा भारतीय बैंकों तथा भारतीय जीवन बीमा निगम ने भी उनकी हैसियत से ज्यादा का कर्ज बांटकर जनता का पैसा फंसवा दिया। इसीलिए जैसे ही संदर्भित रिपोर्ट आई उसके बाद बैंकों ने अडानी से पूछताछ शुरू की वहीं रिजर्व बैंक भी सक्रिय हो उठा।उधर विपक्ष संसद में आक्रामक है। प्रधान न्यायाधीश अथवा जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) से जांच करवाने की मांग भी उठ रही है। यद्यपि गौतम अडानी साख बचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं किंतु उनकी विश्वसनीयता पर मंडरा रहे  बादल और घने होते जा रहे हैं। अमेरिका के शेयर बाजार से वे बाहर किए जा चुके हैं और भारत में भी उनके शेयरों की कीमत हर दिन गिर रही है। कुछ कंपनियों के शेयर तो आधे तक घट गए। हालांकि भारतीय बैंक अभी भी अपने कर्ज की अदायगी को लेकर निश्चिंत हैं। हो सकता है जैसा गौतम अडानी दावा कर रहे हैं कि अपनी भारी सुरक्षित नगदी से वे इस संकट से बाहर भी आज जायेंगे  किंतु विजय माल्या प्रकरण के बाद भी जिस तरह से उद्योगपतियों को कर्ज देने में हुए बैंक घोटाले सामने आते गए उससे ये तो साफ है  कि बैंकिंग  प्रणाली में भी  भ्रष्टाचार की फसल लहलहा रही है। अडानी समूह का गुजरात कनेक्शन स्वाभाविक तौर पर प्रधानमंत्री से भी जोड़ा जाता है जिस कारण से वे विपक्ष की आंख में किरकिरी बन गए।हालांकि उदारीकरण के बाद शुरू हुए उधारीकरण  से इस तरह के घोटाले होते ही जा रहे हैं। हर्षद मेहता से इसकी शुरुवात हुई । इनमें बैंकों और जनता दोनों का पैसा डूबता है। सेबी नामक संस्था शेयर बाजार के क्रियाकलापों पर नजर रखती है । लेकिन उसके बाद भी गड़बड़ियां हो रही हैं । यद्यपि विकसित देशों में भी ये सब होता है किंतु भारत की अर्थव्यवस्था और आम निवेशक इतना सुदृढ़ नहीं है जो ऐसे झटके लगातार सहन कर सके। इस मामले में गौतम अडानी से ज्यादा  केंद्र सरकार की साख दांव पर लगी है। इसलिए उसे चाहिए कि वास्तविकता को सामने लाया जावे। अमेरिका से रिपोर्ट जारी होने के बाद से ही सरकार पर अडानी समूह का बचाव किए जाने के आरोप लग रहे हैं। 9 राज्यों के चुनाव निकट होने से विपक्ष को अच्छा मुद्दा हाथ लग गया। सरकार को उक्त रिपोर्ट की निष्पक्ष जांच करवाकर दोषियों को उचित दंड दिलवाने की व्यवस्था करनी चाहिए क्योंकि इस तरह के घोटालों से विदेशी निवेशक भी छिड़कते हैं । और यदि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट किसी व्यवसायिक कूट रचना का परिणाम है तो उसे भी साफ किया जावे।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 2 February 2023

बजट: लोक लुभावन की बजाय ठोस उपायों पर जोर



वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार पांचवां बजट पेश करते हुए उम्मीद के मुताबिक मध्यमवर्ग को खुश करने का जो प्रयास किया उसका निशाना सीधे सीधे चुनावों पर है। उल्लेखनीय है इसी वर्ष 9 राज्यों में विधानसभा और अगले वर्ष  लोकसभा का चुनाव होना है। मोदी सरकार आने के बाद से आयकर के ढांचे में मामूली फेरबदल तो किए गए किंतु छूट की सीमा यथावत रखने से नौकरीपेशा करदाता को कोई लाभ नहीं हुआ। इस वर्ष नई आयकर योजना में छूट की सीमा 5 से बढ़ाकर 7 लाख कर दी गई और पूरे बजट में वित्तमंत्री को सबसे ज्यादा तालियां इसी पर मिलीं। हालांकि अनेक आयकर दाताओं के साथ विपक्ष का आरोप है कि यह महज आंकड़ों की बाजीगरी है क्योंकि इस योजना में केवल 50 हजार की एकमुश्त बचत छूट ही मिलेगी जबकि पुराने तरीके को चुनने वाले करदाता को विभिन्न बचतों का लाभ मिलने से  10 लाख तक की आय पर भी कर मुक्त हुआ जा सकता है। हालांकि नई योजना में करदाता को बचत योजनाओं में निवेश के बिना ही 7 लाख तक कर के दायरे से मुक्ति मिल जाती है। इसके पीछे का उद्देश्य आयकरदाताओं की संख्या में वृद्धि करने के साथ ही ज्यादा लोगों को आयकर विवरणी भरने प्रेरित करना है जिससे आर्थिक स्थिति के मूल्यांकन में सुविधा हो। जीएसटी लागू होने से यद्यपि सरकार के पास मूल्य नियंत्रण का सीमित अधिकार रह गया है इसलिए वह मामूली फेरबदल कर सकी जिससे टीवी , मोबाइल , साइकिल और खिलौने जहां सस्ते हुए वहीं सोने , चांदी के दाम बढ़ेंगे।इलेक्ट्रॉनिक वाहनों की कीमतें कम करने हेतु लीथियम बैटरी का आयात तो सस्ता किया गया किंतु पेट्रोल , डीजल और रसोई गैस के दाम घटाने की चर्चा तक नहीं हुई । दूसरी ओर इस बजट में कौशल विकास पर जोर देने हेतु युवाओं को छात्रवृत्ति के साथ तकनीकी प्रशिक्षण देने का जो प्रावधान है वह ईमानदारी से अमल में आ जाए तो बड़ी उपलब्धि होगी। मुफ्त खाद्यान्न योजना की अवधि में वृद्धि अब मजबूरी बन गई है परंतु इंफ्रास्ट्रक्चर पर 10 लाख करोड़ रु. का प्रावधान बजट के विकासोन्मुखी चेहरे को उजागर करता है। इसके अंतर्गत हवाई अड्डे , हेलीपैड,  रेलवे स्टेशनों का उन्नयन , नर्सिंग कालेज जैसे निर्माण होने से देश आगे बढ़ेगा। वहीं प्रधानमंत्री आवास योजना का आवंटन 66 फीसदी बढ़ाए जाने से आवास समस्या हल की जा सकेगी। उक्त दोनों प्रावधान सरकारी खर्च को बढ़ाएंगे जिससे उद्योग व्यापार जगत को गति मिलेगी। बजट में जैविक कृषि और मोटे अनाज उत्पादन के साथ ही गोबर आधारित उर्वरक की दिशा में किए जाने वाले प्रयास शुभ संकेत हैं। हालांकि वित्तमंत्री ने आयकर के अलावा ऐसा कोई बिंदु शामिल नहीं किया जिससे आम जनता को तत्काल राहत मिलती दिखाई दे। इसीलिए विपक्ष को आलोचना के लिए काफी सामग्री मिल गई। उन्होंने महंगाई और बेरोजगारी  जैसी समस्याओं का प्रत्यक्ष समाधान भी प्रस्तुत नहीं किया किंतु इंफ्रास्ट्रक्चर और आवास योजना में यदि ज्यादा पैसा खर्च होता है तो उससे रोजगार सृजन होना तय है परंतु महंगाई पर बजट खामोश है। बावजूद इसके सूक्ष्म ,लघु तथा मध्यम उद्योगों के लिए बिना गारंटी कर्ज के लिए 2 लाख करोड़ का आवंटन स्वागत योग्य है क्योंकि सकल घरेलू उत्पादन में विशेष रूप से कोरोना के बाद से इस क्षेत्र का महत्व बढ़ा है।  यद्यपि बुजुर्गो और महिलाओं के लिए आकर्षक जमा योजना घोषित की गई किंतु उसके अलावा छोटी बचत को प्रोत्साहित करने में वित्तमंत्री ने खास रुचि नहीं दिखाई। शायद इसका कारण बाजार में मांग बढ़ाकर विकास दर को मजबूती देना है । यदि वह वाकई 7 फीसदी रही तो इसे सरकार की सफलता माना जाएगा और देश की वैश्विक रेटिंग सुधरेगी। किसान आंदोलन हालांकि फिलहाल ठंडा है और कृषि उत्पादकों को दाम भी अच्छे मिल रहे हैं किंतु चुनाव आते तक आंदोलन फिर शुरू हो सकता है। उस दृष्टि से बजट में कुछ खास नजर नहीं आता । इसीलिए भाजपा समर्थक भारतीय किसान संघ तक वित्तमंत्री से नाराज है। ऐसा लगता है अर्थव्यवस्था के बारे में जो मजबूत संकेत विशेष रूप से जीएसटी की रिकॉर्ड वसूली से मिले उनसे सरकार सोच रही है कि वह विकास के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन करते हुए जनता को प्रसन्न करने में कामयाब हो जायेगी। 2024 के लोकसभा चुनाव हेतु किए गए हालिया सर्वेक्षण के निष्कर्ष भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वापसी बता रहे हैं। लेकिन सरकार को पता है अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में कभी भी बड़ा बदलाव होने पर महंगाई और बढ़ने का खतरा हो सकता है। इसीलिए पेट्रोलियम पदार्थों के वैश्विक मूल्य कम होने के बावजूद उनकी कीमतों को घटाने का मामला आपातकालीन उपाय के तौर पर सुरक्षित रखा गया है। इलेक्ट्रॉनिक वाहनों को सस्ता कर कच्चे तेल का आयात घटाना भी सरकार की दूरगामी योजना का हिस्सा है।परिवहन मंत्री नितिन गडकरी इस दिशा में काफी प्रयासरत हैं। 2030 तक 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन का लक्ष्य इसीलिए रखा गया है। पर्यावरण के साथ के साथ ही जल संरक्षण के बारे में भी अनेक प्रावधान वित्त मंत्री ने किए जो बौद्धिक विमर्श तक सीमित रहने के बाद भी बजट में गहराई को दर्शाते हैं। विदेश यात्रा करने वाले लाखों लोगों द्वारा आयकर विवरणी न भरने का जिक्र हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था। बजट में इसे अनिवार्य कर दिया गया जिससे काले धन से दुनिया घूमने वालों पर शिकंजा कसेगा। वहीं वित्तमंत्री ने घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। कुल मिलाकर बजट मौजूदा हालातों में संतुलित ही कहा जायेगा। वित्तमंत्री ने सीधे जनता की जेब गर्म न की हो लेकिन उसे हल्का करने से भी वे बचीं। सबसे बडी बात ये रही कि लोकलुभावन न होते हुए भी इस बजट को जनविरोधी कहना अतिशयोक्ति होगी। शेयर बाजार का बजट भाषण के दौरान उछलना और फिर सामान्य हो जाना इस बात का सूचक है कि सरकार ने कृत्रिम वृद्धि की बजाय ठोस उपाय तलाशे हैं । वित्तमंत्री द्वारा खैरातों की बरसात से बचने का अंदाज ये साबित करता है कि सरकार में पर्याप्त आत्मविश्वास है । और इसी के दम पर देश कोरोना से लड़कर बाहर आ सका। ऐसे में जब अमेरिका , जापान , ब्रिटेन और चीन की विकास दर ठहराव का संकेत दे रही है तब भारत का 7 फीसदी या उसके करीब रहना उत्साहवर्धक है। और फिर श्रीमती सीतारमण पर प्रधानमंत्री का विश्वास भी ये जताने को काफी है कि हालात काबू में हैं । वरना वे पूरे पांच साल वित्तमंत्री न रह पातीं ।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 1 February 2023

जनसंख्या को दुधारू गाय बनाना जरूरी: मुफ्तखोरी उत्पादकता पर भारी



पहले श्रीलंका और अब पाकिस्तान में जरूरी चीजों की किल्लत के साथ ही अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिरने से हालात बेकाबू नजर आ रहे हैं।।श्रीलंका में तो राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना तक पड़ा और जनता राष्ट्रपति भवन में घुस गई। विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो जाने से पेट्रोल डीजल का आयात अवरुद्ध हो गया। संकट के उस दौर में भारत ने बड़े भाई की भूमिका का निर्वहन किया जबकि श्रीलंका की सरकार चीन के प्रभाव में आकर भारत के व्यापारिक और सामरिक हितों की उपेक्षा करती  रही। ये पड़ोसी देश इस आर्थिक बदहाली से उबर पाता उसके पहले ही पाकिस्तान नामक दूसरे पड़ोसी देश में भी तकरीबन वैसे ही हालात उत्पन्न हो गए। खाने पीने की चीजों के अभाव के अलावा पेट्रोल डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। कर्ज देने वाले  विदेशी संस्थानों के दबाव में मुद्रा का अवमूल्यन करने से विदेशी मुद्रा का संग्रह खलास होने को है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष , अमेरिका और सऊदी अरब खैरात की बजाय कड़ी शर्तों पर कर्ज देने पर अड़े हैं। इसका कारण पाकिस्तान द्वारा पिछला कर्ज समय पर न लौटाना है। उक्त दोनों देशों में राजनीतिक अस्थिरता के साथ घटिया आर्थिक प्रबंधन के कारण अर्थव्यवस्था जमीन पर आ गिरी। उनकी दशा देखकर हमारे देश में भी चिंता व्यक्त की जाने लगी है। जानकार लोगों का मानना है कि मुफ्त उपहार बांटने का सिलसिला न रुका तो कुछ वर्षों बाद सरकार के लिए आर्थिक प्रबंधन कठिन हो जायेगा। उदाहरण के लिए गत वर्ष गर्मी जल्दी शुरू होने से गेहूं का उत्पादन  कुछ कम हुआ। ऊपर से यूक्रेन और रूस में युद्ध लंबा खिंच गया जो गेहूं के सबसे बड़े निर्यातक हैं । लेकिन जंग ने उसमें बाधा उत्पन्न कर दी जिससे विश्व भर में हमारे गेंहू की मांग बढ़ गई। किसान को अच्छी कीमत और सरकार को विदेशी मुद्रा का लालच जागा । लेकिन कुछ समय  बाद ही निर्यात रोकना पड़ा क्योंकि घरेलू बाजार में आटा महंगा हो गया। साथ ही अन्य कृषि उत्पाद भी महंगे हुए। अमेरिकी नीतियों के कारण रुपए का विनिमय मूल्य भी डालर के मुकाबले कमजोर होने से व्यापार घाटा अनुमान से बढ़ गया। गत वर्ष खुले बाजार में दाम ऊंचे होने से किसानों ने अपना अनाज सरकारी खरीद के बजाय वहां बेचा जिससे  सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए किया जाने वाला भंडारण लक्ष्य से कम रहा । इस वर्ष भी रबी फसल आने से पूर्व ही ग्रामीण अंचलों से खबर आ रही है कि किसान बजाय सरकार के  खुले बाजार में अपना उत्पाद बेचेगा। इधर आटे के दामों को नीचे लाने के लिए सरकार ने अपने संग्रह में से 30 लाख टन गेहूं बाजार में बेचने की घोषणा कर डाली।  बाजार की हलचल से लगता है इस साल सरकारी खरीदी और कम रहेगी जिससे मुफ्त खाद्यान्न योजना को चलाते रहना बेहद मुश्किल होगा।  भले ही सरकार अगले तीन साल तक के अन्न भंडारण का दावा कर रही है लेकिन जो वैश्विक आसार हैं  उनके मद्देनजर उसके दावों और योजनाओं को अमली जामा पहिनाना बहुत कठिन होगा । कुछ जानकार लोग आगामी वर्षों में खाद्यान्न संकट की आशंका भी जता रहे हैं । उनका मानना है कि आगामी लोकसभा चुनाव तक तो मुफ्त खाद्यान्न योजना जारी रखना सरकार में बैठे लोगों की मजबूरी है। उसके अलावा सरकार के गैर उत्पादक खर्चे भी अर्थव्यवस्था के कंधे झुकाने में मददगार साबित हो रहे हैं।  कुछ विपक्षी राज्यों द्वारा पुरानी पेंशन  योजना लागू करने के फैसले की आलोचना विपक्ष समर्थक अर्थशास्त्री भी कर रहे हैं क्योंकि इससे सरकार का खजाना खाली हो जायेगा। जिन राज्यों में चुनाव होना है वे और केंद्र सरकार विभिन्न ऐसी योजनाएं चला रहे हैं जिनका सीधा असर उनके खजाने पर पड़ रहा है किंतु  बंद करने की बजाय  उनकी संख्या और बढ़ाकर  माल़ ए मुफ्त दिल ए बेरहम वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। बात चूंकि श्रीलंका और पाकिस्तान से शुरू हुई इसलिए हमें भी उन गलतियों से बचना चाहिए जो अर्थव्यवस्था को गर्त में डालती हैं और इसके लिए जरूरी है देश के निर्माण में सबके योगदान की। दुर्भाग्य से हम अभी इस लक्ष्य से दूर हैं। सवाल ये है कि बिना रोजगार के सभी से काम लेना कैसे मुमकिन होगा ? इस बारे में विचारणीय मुद्दा ये है कि केवल सरकारी नौकरी को रोजगार का समानार्थी मान लेना आज की दुनिया में बेमानी है और जब भारत जैसे देश में कुशल के साथ ही अकुशल श्रमिकों का भी जबर्दस्त अभाव है तब बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों की सत्यता पर संदेह होता है। हमारी अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है । लेकिन एक तरफ तो कृषि कार्य हेतु श्रमिक नहीं मिलते दूसरी तरफ काम की तलाश में ग्रामीण मजदूर शहर का रुख करते देखे जा सकते हैं। इन हालातों में सरकारों को ये देखना चाहिए कि उनकी कल्याणकारी योजनाएं आगे पाट पीछे सपाट तो साबित नहीं हो रहीं। कहा जा रहा है कारोबार के लिए सर्वत्र अनुकूल वातावरण है । सबसे बडी बात मानव संसाधनों की प्रचुरता है  , तब जनसंख्या में चीन को पीछे छोड़ने के  करीब आ चुका हमारा देश आर्थिक ढांचे में उससे आगे क्यों नहीं निकल पा रहा ये चिंता के साथ चिंतन का भी विषय है। दरअसल अधिकारों को लेकर तो बीते 75 वर्षों में लोगों में जागरूकता आई है किंतु कर्तव्य अर्थात कार्य संस्कृति के बारे में अभी भी बेहद लापरवाही भरा रवैया है। ये शोचनीय प्रश्न है कि सत्ता में आने वाली हर पार्टी रोजगार देने के वायदे पर युवाओं का समर्थन हासिल करती है किंतु उन्हें ये समझाने में विफल रहती है कि रोजगार का अर्थ शासकीय नौकरी ही नहीं अपितु अन्य कार्यों से आजीविका चलाने से है। कोरोना काल में जब लॉक डाउन की वजह से सब कुछ बंद था तब छोटे कारोबारियों विशेष रूप से रोजाना कमाने वालों ने जिस तरह वैकल्पिक रोजगार के तौर तरीके ढूंढकर घर चलाया दरअसल वही भविष्य का चित्र है। स्टार्ट अप नामक नई संस्कृति के परिणाम बहुत  संतोषजनक नहीं होने पर भी उम्मीद जगाते हैं क्योंकि इनके माध्यम से ढर्रे से हटकर आजीविका अर्जित करने की मानसिकता उत्पन्न हुई है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से शिक्षित होकर निकले अनेक युवाओं ने एकदम अलग तरह के काम में हाथ आजमाया और वे जल्द ही उदाहरण बनकर  उभरे। दरअसल कुछ नया करने का साहस ही उद्यमिता की पहली सीढ़ी है जिस पर चढ़े बिना युवा पीढ़ी अपना भविष्य नहीं बना सकती।  वित्तीय विशेषज्ञ भी ये मान रहे हैं कि बेरोजगारी बड़ी समस्या तो है लेकिन लाइलाज भी नहीं। और आखिर कब तक 80 करोड़ लोगों को मुफ्त में खाद्यान्न दिया जाता रहेगा। यदि हमने अपनी विशाल जनसंख्या को उत्पादन से नहीं जोड़ा तो वह ऐसी गाय बनकर रह जायेगी जो खाती तो है किंतु दूध नहीं देती। प्रति व्यक्ति आय के साथ प्रति व्यक्ति उत्पादकता पर जोर देना समय की मांग है । वर्ना वोट बैंक की राजनीति श्रमिकों की कमी और बेरोजगारी जैसे बेमेल आंकड़े पेश करती रहेगी और मुफ्त अनाज प्राप्त करने के बाद उसे किराने वाले को बेचकर शराब पीने का सिलसिला जारी रहेगा। मुफ्तखोरी के दूरगामी घातक परिणामों का आकलन करना बेहद जरूरी है।

रवीन्द्र वाजपेयी