Thursday, 16 February 2023

टाटा द्वारा विमान खरीदी भारतीय उड्डयन व्यवसाय की ऊंची उड़ान



जब एयर इंडिया को टाटा ने खरीदा तब इस बात  को लेकर बड़ा हल्ला मचा था कि सरकार अपनी संपत्तियों को बेच रही है | लेकिन एयर इण्डिया को जिस तरह से रोजाना घाटा हो रहा था उसे देखते हुए उसका विनिवेश बुद्धिमत्ता भरा निर्णय था | ये प्रस्ताव वैसे तो डा.मनमोहन सिंह की सरकार के समय से ही विचाराधीन था लेकिन निर्णय क्षमता की कमी से बात आगे नहीं बढ़ सकी | मोदी सरकार के आने के बाद घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों के विनिवेश का काम तेज हुआ  | हालाँकि अभी भी वह तय लक्ष्य से पीछे है लेकिन फिर भी अनेक उपक्रमों को बेचकर सरकार ने अपने घाटे को कम करने का प्रबन्ध कर लिया | एयर इण्डिया उस दृष्टि से काफी अहम सौदा था | आलोचकों की मानें तो टाटा काफी फायदे में रहा क्योंकि विदेशी उड़ानों की जितनी अनुमति एयर इंडिया के  पास हैं  उतनी  किसी और भारतीय उड्डयन कम्पनी के पास नहीं होने से एक तरह से एकाधिकार का लाभ उसे मिलता है | बावजूद उसके सरकारी  तंत्र की लचर कार्यप्रणाली और प्रतिस्पर्धा में टिके रहने की अक्षमता ने उसको सफ़ेद हाथी बनाकर रख दिया | अतीत में किये गए सौदों में बिना जरूरत विमान खरीद लिए जाने से कम्पनी का भट्टा बैठ गया | लेकिन टाटा समूह के हाथ में जाते ही एयर इण्डिया के कायाकल्प की शुरुवात हो गयी | घरेलू उड्डयन व्यवसाय में इंडिगो के पास आधे से ज्यादा कारोबार है जिसकी तुलना में एयर इंडिया बहुत पीछे है | लेकिन गत दिवस टाटा ने विश्व का सबसे बड़ा उड्डयन सौदा करते हुए भारतीय उड्डयन व्यवसाय को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के साथ ही घरेलू मोर्चे पर भी मजबूती प्रदान करने का रास्ता साफ़ कर दिया | कुल 470 विमानों के इस सौदे में अमेरिका की बोईंग से 220 और फ़्रांस की एयर बस से 250 विमान खरीदने का करार हुआ | सबसे बड़ी बात ये रही कि इस सौदे पर हस्ताक्षर होते समय अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन , फ़्रांस के राष्ट्रपति मेक्रान , ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आभासी माध्यम से जुड़े रहे और उनकी आपस में चर्चा भी हुई | इस बारे में ये पूछा जा सकता है कि ब्रिटेन को इससे क्या लेना देना तो उसका जवाब ये है कि एयर बस में जिस रोल्स रायस का एंजिन लगता है वह ब्रिटेन की कम्पनी है जो अपनी आलीशान कारों के लिए प्रसिद्ध है | लेकिन उसका मुख्य कार्य एंजिन बनाना ही है | चूंकि अरबों - खरबों का  सौदा उनके देश की निजी कम्पनी को हुआ इसलिए ही वहाँ के राष्ट्राध्यक्ष इस अवसर पर अपनी मौजूदगी  दर्ज कराने में नहीं झिझके और उसे  कूटनीतिक अवसर में बदलते हुए श्री मोदी को बधाई देकर भारत के साथ बढ़ते व्यापारिक संबंधों के प्रति संतोष व्यक्त किया | इस बारे में विचारणीय बात ये है कि संसद के बजट सत्र में विपक्ष ने प्रधानमंत्री और गौतम अडानी की निकटता पर हल्ला मचाते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने अडानी समूह को विदेशों में ठेके दिलवाने में अपने प्रभाव का उपयोग किया | लेकिन टाटा समूह द्वारा किये गये संदर्भित सौदे के समय अमेरिका , फ़्रांस और ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्ष  की आभासी उपस्थिति और उनका श्री मोदी से  बात करना भारत के विपक्षी  दलों को ये सन्देश है कि अपने देश के उद्योगपति और व्यवसायी को विदेशी सौदे दिलवाने में वहां की सरकारें खुलकर मदद करती हैं क्योंकि उससे अंततः फायदा तो देश का ही होता है | उल्लेखनीय है टाटा समूह ने दुनिया  की प्रसिद्ध ऑटोमोबाइल कम्पनी फोर्ड से जगुआर और लैंड रोवर ब्रांड भी खरीद लिया था | लंदन के जिस होटल में विमानों का सौदा हुआ वह भी संयोगवश टाटा समूह का ही है | हालाँकि विमानों की आपूर्ति होने में दो साल लगेंगे लेकिन कुछ विमान इस साल के आखिर में  एयर इण्डिया के बेड़े में आ जायेंगे | भारत में घरेलू उड्डयन व्यवसाय जिस तेजी से बढ़ रहा है और मोदी सरकार लगातार नये विमान तल बनाने का निर्णय ले रही है उससे आने वाले कुछ ही सालों में विमानन कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जिसका लाभ यात्रियों को मिलेगा | 470 विमान आने के बाद एयर इण्डिया वैश्विक स्तर पर भी विदेशी एयर लाइंस को टक्कर दे सकेगी | यहाँ यह उल्लेखनीय कि बड़ी संख्या में  भारतीय  दुनिया के विभिन्न  देशों में बसे हुए हैं | उनकी पहली प्राथमिकता एयर इंडिया ही होती है किन्तु विमानों की कमी और सेवा में गुणवत्ता के अभाव के चलते उन्हें दूसरी एयर लाइंस के विमानों से आना - जाना  पड़ता है | जैसे - जैसे बोईंग और एयर बस की आपूर्ति उक्त सौदे के अंतर्गत होती जायेगी वैसे - वैसे  एयर इण्डिया तो आगे बढ़ेगी ही भारत को भी उसका लाभ मिलेगा | इसके चलते विदेशी पर्यटकों की आवक भी बढ़ सकती है | घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों के विनिवेश के बाद निजी क्षेत्र का बेहतर प्रबंधन उनको किस तरह विकसित कर सकता है उसका सबसे ताजा उदाहरण है एयर  इंडिया द्वारा किया गया 470 विमानों का सौदा | इस अवसर  चार देशों के राष्ट्राध्यक्षों की आभासी उपस्थिति इसकी महत्ता का प्रमाण तो है ही साथ ही इस बात को दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर होने  वाले निजी व्यावसायिक सौदों में भी संबंधित देशों की सरकारों की कितनी भूमिका रहती है | अब देखना ये है कि अडानी समूह को सरकारी संरक्षण दिए जाने का आरोप लगाने वाले विपक्षी नेता और अन्य आलोचक टाटा द्वारा की गई  दुनिया की सबसे बड़ी विमान खरीदी के करार के समय श्री मोदी की विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ आभासी मौजूदगी पर क्या कहते हैं ?

रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 15 February 2023

भारत विरोधी रिपोर्टिंग के लिये बीबीसी पर पहले प्रतिबन्ध तक लगे हैं




बीबीसी ( ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन ) भारतीयों के लिए एक जाना  पहिचाना नाम है | यद्यपि संचार माध्यमों के असीमित विकास की वजह से अब इसकी अहमियत पहले जैसी तो नहीं रही किन्तु अभी भी ये धारणा कुछ हद तक कायम  है कि यह  निष्पक्ष तो है ही साथ ही समाचार प्रेषण में तेज भी है | हाल ही में बीबीसी  अपनी दो  डाक्युमेंटरी को लेकर चर्चा में आया था जिनमें 2002 के गुजरात दंगों के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में किया गया था | भारत सरकार ने इसे देश की  छवि खराब करने वाला प्रयास बताते हुए कुछ सोशल  मीडिया प्लेटफार्मों को  उनकी लिंक  हटाने का निर्देश दिया | जिस पर  विपक्षी  दलों ने अभिव्यक्ति की  स्वतंत्रता का मुद्दा उछालकर प्रधानमंत्री और सरकार पर ताबड़तोड़ आरोप लगाये  |  डाक्युमेंटरी के प्रसारण को रोकने के बावजूद वामपंथी छत्र संगठनों ने जेएनयू , जामिया मिलिया और उस्मानिया विवि में  उसे दिखाने का प्रयास भी किया जिसे लेकर विवाद भी हुए | बहरहाल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक द्वारा डाक्युमेंटरी की  विषयवस्तु से असहमति व्यक्त करते हुए उसे श्री मोदी की छवि खराब करने का प्रयास बताया | वह मामला जैसे तैसे ठंडा पड़ा ही था  लेकिन गत दिवस आयकर विभाग की सर्वेक्षण टीमों के   बीबीसी के दिल्ली और मुम्बई  स्थित कार्यालयों पर में पहुँचने पर  बवाल मच गया | विपक्ष ने  इसे अघोषित आपातकाल बता डाला | वहीं भाजपा ने बीबीसी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उसकी तीखी आलोचना की | यद्यपि  आयकर विभाग ने स्पष्ट किया कि ये छापा नहीं सामान्य सर्वेक्षण है और बीबीसी ने भी कहा कि वह  पूरा सहयोग कर रही  है | आयकर टीम का कहना है कि वह अन्तर्राष्ट्रीय करों संबंधी गड़बड़ियों की जाँच कर रही है | इस बारे में ये भी पता चला है कि बीबीसी वर्ल्ड सर्विस हेतु विदेशों से सहयोग राशि आती है | आयकर विभाग को संदेह है कि उसका उपयोग नियम विरुद्ध किया जा रहा है | हालाँकि सर्वेक्षण पूरा होने के बाद ही दोनों पक्ष अपना अधिकृत बयान देंगे | और कोई समय होता तब शायद इतना बवाल न मचता  किन्तु गुजरात दंगों संबंधी डाक्युमेंटरी पर हुए विवाद के बाद आयकर विभाग  की कार्रवाई पर विपक्ष द्वारा राजनीतिक लाभ को देखते हुए उंगली उठाना  स्वाभाविक है | लेकिन बीबीसी को दूध का धुला साबित करना कांग्रेस के लिए भी दोहरा रवैया अपनाने जैसा है क्योंकि वर्ष 1970 में इंदिरा गांधी के शासन काल में  बीबीसी पर एक शो के जरिये भारत की नकारात्मक छवि पेश करने के आरोप में दिल्ली कार्यालय को 2 वर्ष  के  लिए बंद कर दिया गया था | 2008 में बीबीसी ने बाल श्रमिकों के कारखाने में काम करने वाला जो फुटेज दिखाया उसे लेकर भी सरकार के साथ टकराव हुआ और पड़ताल करने पर वह फुटेज फर्जी निकला | 2015 में भी निर्भया काण्ड संबंधी डाक्युमेंटरी के वैश्विक प्रसारण पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने रोक लगाई थी | जबकि  2017 में राष्ट्रीय उद्यानों और वन्य जीव अभ्यारणों में शूटिंग करने के आरोप में इन स्थानों में पांच साल तक शूटिंग हेतु बीबीसी पर रोक लगी  | 100 वर्ष पहले स्थापित इस संस्थान का इतिहास बहुत ही समृद्ध  है | लेकिन भारत के प्रति इसका रवैया औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित रहा है | मसलन भारत की सरकार और समाज दोनों की नकारात्मक छवि पेश करने की वजह से बीबीसी हमेशा विवादित होती रही है | उक्त उदाहरणों से ये साबित हो जता है कि बीबीसी के विरुद्ध पहली बार कोई कदम नहीं उठाया गया अपितु ये सिलसिला इंदिरा जी के दौर से चला आ रहा है और पी.वी नरसिम्हा राव और डा. मनमोहन सिंह के समय भी बीबीसी और सरकार में टकराव के अनेक मौके आये | भले ही आयकर विभाग द्वारा की जा रही जाँच का समय प्रधानमंत्री के बारे में आई डाक्युमेंटरी से जोड़ा जा रहा हो लेकिन सामान्य सर्वेक्षण को अघोषित आपातकाल कह देना जल्दबाजी है | विपक्ष को आयकर विभाग की कार्रवाई पूरी होने का इंतजार करना था | इस बारे में बीबीसी प्रबंधन ज्यादा परिपक्व निकला जिसने इस बारे में केवल इतना कहा कि आयकर विभाग का अमला   उनके कार्यालयों में सर्वेक्षण हेतु आया है और वे उसे पूरा सहयोग दे रहे हैं |  यदि सर्वेक्षण में कुछ भी गलत निकलता है तब बीबीसी के साथ भी वही होगा जो आयकर संबंधी नियमों के  अंतर्गत मान्य है | लेकिन भाजपा प्रवक्ताओं को अपनी जुबान पर लगाम लगाना चाहिए जिन्होंने बीबीसी के बारे में तरह – तरह की बातें कहकर आयकर विभाग की कार्रवाई को राजनीतिक प्रेरित बताने वालों को मौका दे दिया | दूसरी तरफ बीबीसी को भी ये  देखना  होगा   कि भारत में अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता है उसका दुरूपयोग करते हुए देश की छवि धूमिल  करने से वह बचे | आलोचना और कमियां निकालना बुरा नहीं है क्योंकि इन्टरनेट के ज़माने में कुछ भी छिपाकर रखना मुश्किल है | लेकिन सच दिखाने की आपाधापी में बीबीसी यदि कुछ भी दिखाए तो उसका विरोध तो होगा ही | इंदिरा जी द्वारा लगाये गए आपातकाल के दौरान बीबीसी तत्कालीन विपक्ष को अत्यंत प्रिय था क्योंकि तब वह श्रीमती गांधी के विरुद्ध समाचार प्रसारित करता था |  उस समय कांग्रेस उसकी भूमिका से नाराज रहा करती थी किन्तु अब वही उसकी तरफदारी कर रही है | बेहतर हो इस बारे में सभी राजनीतिक दल तात्कालिक लाभ अर्जित करने की बजाय देश की छवि को प्राथमिकता दें | केवल बीबीसी ही नहीं बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन के प्रमुख समाचार पत्र भी भारत के बारे में भ्रामक खबरें छापने से बाज नहीं आते | सबसे बड़ी बात तो ये है कि उनको इस तरह की जानकारी हमारे पत्रकार ही देते हैं | कोरोना के समय अमेरिका के अनेक अख़बारों ने भारत में बड़े पैमाने पर मौतों का प्रचार किया जबकि खुद उनके  देश में कहीं ज्यादा लोग मारे गए थे | लगातार नकारात्मक समाचारों की वजह से ही बीबीसी पहले जैसा लोकप्रिय नहीं है | उसकी वित्तीय स्थिति भी बिगड़ रही है क्योंकि ब्रिटिश सरकार उसका अनुदान घटाती जा रही है  | इसके पीछे भी यही सोच है  कि अब बीबीसी जैसे संस्थान धीरे - धीरे प्रतिस्पर्धा से बाहर होते जायेंगे | लेकिन आयकर विभाग को ये साबित करना होगा कि उसकी कार्रवाई सामान्य प्रक्रिया है अन्यथा सरकार पर लग रहे आरोपों को बल मिलेगा | दूसरी तरफ बीबीसी को अपना रवैया बदलते हुए भारत के बारे में पूर्वाग्रह त्यागने होंगे क्योंकि अब ये  देश गुलामी के दंश से उबर चुका है और उसकी अर्थव्यवस्था ब्रिटेन को पीछे छोड़ चुकी है | गुजरात दंगों की बजाय यदि बीबीसी ब्रिटिश सत्ता द्वारा किये गए जलियांवाला बाग़ नरसंहार पर डाक्युमेंटरी बनाता तब उसे निष्पक्ष माना जाता किन्तु आज भी उसे लगता है कि उसके नाम के साथ जुड़ा ब्रिटिश शब्द भारतीयों को गुलाम समझने का  अधिकार देता है |


रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 14 February 2023

छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम जरूरी



हिंडनबर्ग नामक अमेरिकी संस्थान की रिपोर्ट में  भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी की कंपनियों द्वारा अपने शेयरों के मूल्य उनकी वास्तविक  कीमत से ज्यादा रखने एवं लेखा पुस्तकों में की गयी कथित हेराफेरी के खुलासे के बाद शेयर बाजार की  उठापटक से निवेशकों को हुए नुकसान का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है | न्यायालय ने केंद्र सरकार को निवेशकों के हितों के संरक्षण  हेतु पुख्ता व्यवस्था करने का निर्देश दिया जिसके बाद सरकार उक्त मामले की जाँच हेतु समिति बनाने राजी हो गयी | सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में काम करने वाली इस समिति में प्रस्तावित  विशेषज्ञों के नाम न्यायालय को बंद लिफाफे में देने के लिए सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आश्वस्त किया | हालांकि अडानी मामले की जांच सेबी भी कर रही है वहीं उसकी कंपनियों में निवेश करने वाले भारतीय  स्टेट  बैंक और जीवन बीमा निगम भी अपने स्तर पर पड़ताल में जुटे हैं | लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की चिंता इस बारे में है कि भविष्य में शेयर बाजार में निवेश करने वालों का धन सुरक्षित रहे | यद्यपि शेयर बाजार है तो सट्टेबाजी ही जिसमें पैसा लगाने वाला जब कमाता है तब उसे घाटे के लिए भी तैयार रहना चाहिए | इस बारे में ये कहना गलत नहीं है कि शेयर बाजार के छोटे निवेशक बिना पूरी जानकारी के ज्यादा मुनाफे के आकर्षण में अपना पैसा लगा  देते हैं |  संबंधित कम्पनी और शेयर बाजार की चाल के बारे में पूरी जानकारी न होने से वे  गिरावट के संकेतों को समझ नहीं पाते और घाटा उठाते हैं | यद्यपि अडानी मामले में तो बड़े निवेशकों को भी अंदाज नहीं था कि उनके शेयर धड़ाम से नीचे आयेंगे लेकिन ये देखने में आया है कि जब भी शेयर बाजार में बड़ा धमाका होता है छोटे निवेशक ही घाटा उठाते हैं | अतीत में जब भी ऐसी स्थिति निर्मित हुई तब - तब सरकार और न्यायालय दोनों ने इस बात की जरूरत जताई कि निवेशकों का धन सुरक्षित रहे | सेबी की स्थापना भी इसीलिये की गई थी | दरअसल शेयर बाजार किसी ज़माने में सीमित लोगों का ही विषय था लेकिन उदारीकरण के बाद ज्योंही  बाजारवाद ने भारत में दस्तक दी त्योंही बैंकों द्वारा जमा राशि पर दिया जाने वाला ब्याज कम होने लगा | राष्ट्रीय बचत पत्रों के अलावा सरकार द्वारा संचालित अन्य बचत योजनाओं में धन लगाने पर भी ब्याज की दरों में कमी होती चली गई | इसके पीछे बिश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाव भी बताया गया | डा. मनमोहन सिंह ,  पी. चिदम्बरम और मोंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे लोगों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के चरित्र को पूरी  उपभोक्तावाद में बदल दिया | इधर जमा पर ब्याज दरें  कम हुईं उधर कर्ज भी सस्ता किया गया जिससे उदारवाद ने उधारवाद की शक्ल अख्तियार कर ली | इसके साथ ही शेयर बाजार में ज्यादा मुनाफे की खबरें आने लगीं जिससे छोटा निवेशक आकर्षित हुआ | उसे इस हतु प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाले कथित सलाहकार भी तेजी से उभरे | इसका असर ये हुआ कि मध्यम वर्ग के वे लोग जो बैंकों और पोस्ट ऑफिस में अपनी बचत रखते थे वे भी शेयर बाजार के फेर में फंस गए | ऐसा नहीं है कि सभी को घाटा हुआ हो | म्यूचल फंड और शेयरों के जरिये छोटे निवेशकों ने भी अच्छी खासी कमाई की किन्तु इसमें उन लोगों की संख्या ज्यादा रही जिन्होंने शेयर बाजार के उतार चढ़ाव पर पैनी निगाह रखी और उसमें गहरी रूचि ली | दूसरी तरफ  बहुत बड़ा निवेशक ऐसा भी  रहा जो किसी और को देखकर बिना सोचे समझे इस व्यवसाय में कूदा और जब भी बड़ा घोटाला हुआ उसे इसका नुकसान झेलना पड़ा | अडानी मामला  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो होने की वजह से विदेशी निवेशकों के बिदक जाने का खतरा पैदा हो गया जिससे  सरकार भी चिंता में पड़ गई | हालाँकि उसने संयुक्त संसदीय समिति ( जेपीसी ) बनाने की विपक्ष की मांग को सिरे से नकार दिया किन्तु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त चिंता से सहमत होते हुए  विशेषज्ञों की समिति बनाने पर रजामंदी देकर अच्छा किया क्योंकि न्यायालय की निगरानी होने से  समिति के कामकाज में राजनीति नहीं आयेगी | जबकि जेपीसी की रिपोर्ट हमेशा विवादों में फंसी रहती है | उसमें सत्ता पक्ष का  बहुमत होने से उसकी निष्पक्षता पर हमेशा सवाल उठा करते हैं | दूसरी तरफ विपक्ष की रुचि सरकार को घेरने में रहने से जाँच में गम्भीरता नहीं रहती | अतीत में जितनी भी जेपीसी बनीं उनकी रिपोर्ट केवल एक दस्तावेज बनकर रह गयी | उस दृष्टि से सरकार और सर्वोच्च न्यायालय सही दिशा में जा रहे हैं क्योंकि राजनीतिक सवाल - जवाब में निवेशकों के हित उपेक्षित हो जाते हैं | सरकार ने इस दिशा में कानूनी प्रावधान  बनाने पर भी सहमति दिखाई है जो स्वागतयोग्य है | लेकिन शेयर बाजार के खतरों से छोटे निवेशकों को समय रहते आगाह करने वाली प्रणाली विकसित किये बिना इस तरह के हालात भविष्य में भी बनते रहेंगे | अडानी समूह पर  हिंडनबर्ग ने जो आरोप लगाये उनकी जांच भी बारीकी से होना चाहिए जिससे निवेशकों को सच्चाई का पता चल सके | अन्यथा हमेशा की तरह सियासी तमाशे में बहुत सी ऐसी बातें दबकर रह जायेंगीं जो छोटे निवेशकों के हितों से जुडी हुई हैं | संस्थागत निवेशकों के बारे में भी नियमन और पारदर्शी होना चाहिए जिससे उंगली उठाने की गुंजाईश न रहे | स्टेट बैंक और भारतीय जीवन निगम ने अडानी समूह में जो निवेश किया गया उसे लेकर तरह  – तरह की बातें हो रही हैं | जीवन बीमा निगम के तो डूबने की  आशंका तक व्यक्त की गयी | हालाँकि दोनों संस्थानों ने निवेश प्रक्रिया के नियमानुसार होने के साथ ही अपनी पूंजी सुरक्षित होने और  उस पर लाभ अर्जित किये जाने की बात कही है | लेकिन उनको और खुलकर अपना स्पष्टीकरण देना चाहिए जिससे उनमें धन लगाने वाला बचतकर्ता भयमुक्त हो सके | उम्मीद की जा सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद इस मामले की सच्चाई सामने आ जायेगी और निवेशकों के धन की सुरक्षा हेतु कोई न कोई त्रुटि रहित व्यवस्था भविष्य के लिए की जा सकेगी |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 13 February 2023

ॐ और अल्लाह यदि एक हैं तो ॐ कहने से परहेज क्यों




दिल्ली के रामलीला मैदान में जमीयत उलेमा ऐ हिंद के अधिवेशन में बीते शनिवार को उसके प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि ये मुल्क जितना प्रधानमंत्री मोदी और रास्वसंघ प्रमुख मोहन भागवत का है उतना ही उनका भी। उसके बाद वे बोले कि संघ से उनकी दुश्मनी नहीं है अपितु मतभेद हैं जिसे दोनों करीब आकर दूर कर सकते हैं । मौलाना ने मुस्लिमों के साथ भेदभाव का सवाल खड़ा करते हुए मुस्लिम और ईसाई समाज में जो दलित हैं उनको भी आरक्षण देने की मांग की। लेकिन वे ये कहना नहीं भूले कि वैसे तो इस्लाम में जातिगत भेदभाव नहीं होता किंतु हिंदुओं की देखा सीखी ये बुराई उसमें भी घुस आई। और भी ज्वलंत मुद्दों पर वे बोले। गत दिवस अन्य धर्मों के धर्माचार्य भी आमंत्रित किए गए जिसे अच्छा कदम मानकर हिंदू और जैन संत जमीयत के मंच पर उपस्थित हुए किंतु बजाय समन्वय और सम्मान के मौलाना मदनी अपनी असलियत पर उतर आए और संतों से मुखातिब होकर बोले कि डा. भागवत कहते हैं भारत में रहने वाले हर किसी के पूर्वज हिन्दू थे किंतु तुम्हारे पूर्वज हिन्दू नहीं मनु थे जिन्हें मुस्लिम आदम और ईसाई एडम कहते हैं। इसके आगे उन्होंने कहा कि ये पता करने पर कि मनु किसकी पूजा करते  होंगे तो ज्ञात हुआ वे ॐ को पूजते थे जिसका कोई आकार नहीं है तथा वह सर्वव्यापी है और उसे ही मुसलमान अल्लाह कहते हैं। मदनी ने ये भी कहा कि तुम लोग हिंदू की नहीं मनु की संतान हो जो अल्लाह द्वारा धरती पर उतारे गये पहले इंसान थे। इस प्रकार उन्होंने ये साबित करना चाहा कि मुस्लिमों के पूर्वजों को हिंदू बताना गलत  है क्योंकि खुद हिंदू भी मनु या आदम के वंशज है। उनके ये उद्गार सुनकर  जैन मुनि नाराज होकर जाने लगे जिसके बाद हिंदू संत भी उठकर चले गए । लेकिन जाने के पहले मदनी की बात का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि मेलजोल के लिए बुलाने के बाद इस तरह की भड़काऊ बातें करना अपमाजनक है। बहरहाल इस वाकये से एक बार ये साबित हो गया कि जिस देवबंदी इस्लामिक केंद्र से जमीयत जुड़ी हुई है वह कितनी भी उदारवादी बातें करे लेकिन उसके मन में भरी नफरत और अलगाववादी सोच मिटने की बजाय नए नए रूप में सामने आती रहती है। डा. भागवत से तो मान लिया मौलाना मदनी और अन्य मुस्लिम नेताओं का सहमत होना नामुमकिन है लेकिन इस्लाम के साथ हिंदू आध्यात्म और दर्शन के अध्येता केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भी हाल ही में कहा है कि उन्हें हिंदू कहा जाए क्योंकि इस देश का हर वासी हिंदू ही है। मौलाना को जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री द्वय क्रमशः डा.फारुख अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद के उस बयान पर भी ध्यान देना चाहिए कि सैकड़ों साल पहले उनके पुरखे हिंदू ही थे । और तो और खुद मुसलमान ये कहते हैं कि भारत को हिन्दू शब्द तो विदेशी हमलावरों ने दिया जो स का उच्चारण ह करने के कारण सिंधु के इस पार के इलाके को हिंदुस्तान कह बैठे। हिंदुकुश की पहाड़ियों का नाम आज भी यथावत है। मुगलिया इतिहास भी इस देश को हिंदुस्तान ही कहता रहा जिसका शाब्दिक अर्थ हिंदुओं का स्थान अर्थात देश ही हुआ। इस प्रकार भारत पर हमला करने आए मुसलमान या मंगोलों में से जिसने भी ये नामकरण किया किंतु इसे हिंदुस्तान ही कहा जिसका उच्चारण दोष अलग करने पर वह हिन्दुस्थान ही होता है। ऐसे में यदि संघ कहता है कि यह हिंदू राष्ट्र है तो मौलाना और उनके अनुयायियों का रक्तचाप क्यों बढ़ने लगता है ? जब तक आजादी नहीं मिली और पाकिस्तान नहीं बना तब तक सारे मुस्लिम नेता यहां तक कि मो.अली जिन्ना तक इस देश को हिंदुस्तान ही कहा करते थे। यदि संविधान में भारत न लिखकर हिन्दुस्तान लिखा जाता तब हमारी नागरिकता हिंदुस्तानी कहलाती और तब क्या मदनी साहब उसे अस्वीकार करते? उन जैसी अलगाववादी मानसिकता के कारण ही भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग जोर पकड़ रही है। यहां तक कि भारत नाम भी हिंदू परंपरा से ही आया है तब क्या उसका भी विरोध होगा। अंग्रेजी का इंडिया भी सिंधु के अंग्रेजी नाम   इंडस पर आधारित है। संविधान में इस देश का नाम इंडिया जो कि भारत है के स्थान पर हिंदुस्थान जो कि भारत है लिखा जाता तो मौलाना एवं उन जैसी सोच रखने वाले इस तरह की जुर्रत न करते होते। बेहतर है भारत को इंडिया की बजाय हिंदुस्तान कहना ही शुरू किया जाए जिससे यहां रहने वाले के नाम के साथ हिंदू शब्द अनिवार्य रूप से जुड़े। मनु को आदम बताते हुए हमारे संतों से ये कहना कि तुम लोग हिंदुओं की नहीं बल्कि मनु अर्थात आदम की औलाद हो ,  विभाजनकारी सोच को बढ़ावा देने का षडयंत्र है जिसकी गहराई को समझा जाना चाहिए। जरा सोचिए जब मौलाना मदनी जैसे लोग हिंदू और जैन संतों के सामने यदि इस तरह का जहर उगलने बाज नहीं आए तब देवबंद की दीवारों के पीछे इस्लामिक शिक्षा के नाम पर क्या पढ़ाया जाता होगा इसका अंदाज लगाया जा सकता है। समय आ गया है जब इस तरह की  बातों का प्रतिकार होना चाहिये ताकि नई पीढ़ी धर्मनिरपेक्षता की मृग मरीचिका में फंसकर अपनी पवित्र विरासत को न खो बैठे।भारत एक प्राचीन देश है जिसका आध्यात्म ,संस्कृति,  साहित्य और इतिहास विश्व विदित है। जबकि मौलाना साहब जिस धारा से जुड़े हैं उसका प्रादुर्भाव ही लगभग डेढ़ हजार वर्ष  पहले हुआ । वे अपने विश्वास का पालन करें इससे किसी को आपत्ति नहीं है किंतु यदि उनकी नजर में ॐ और अल्लाह एक है तो फिर उन्हें ॐ बोलने में संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि बकौल मौलाना मदनी इसका कोई आकार न होने से ये बुत परस्ती से परे है। लेकिन हिंदुओं को आदम की औलाद मानने वाले मौलाना को योग और सूर्य नमस्कार में स
सांप्रदायिकता दिखती है, शिक्षा के भगवाकरण से मदनी साहब को चिंता है, तीन तलाक पर प्रतिबंध से वे विचलित हैं और समान नागरिक संहिता से उन्हें डर लग रहा है क्योंकि तब ढेर सारी अलगाववादी बातें प्रतिबंधित हो जायेंगी। दरअसल देश के मुसलमानों के सबसे बड़े दुश्मन ये मौलाना रूपी लोग ही हैं जो अपनी कौम को सदियों पुरानी सोच से बाहर निकलने नहीं देना चाहते। दुर्भाग्य तो यह है कि ओवैसी जैसे विदेश में शिक्षित नेता भी मौलानाओं जैसी दकियानूसी सोच से बाहर आने राजी नहीं है। जब तक मुस्लिम समाज के भीतर से सुधार के स्वर नहीं उठते तब तक मदनी और ओवैसी उन्हें बरगलाते रहेंगे और मुसलमान मुख्य धारा से अलग थलग बना रहेगा जो उसके पिछड़ने की भी वजह है।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 11 February 2023

21 वीं सदी में घिसी पिटी राजनीति को तिलांजलि देना जरुरी



देश जब आजाद हुआ तब संविधान में अनु. जाति और जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी | उस समय किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया जबकि संविधान बनाने वालों में सवर्ण जातियों के नेताओं का बोलबाला था | संविधान की ड्राफ्ट कमेटी के प्रमुख डा.भीमराव आम्बेडकर ने इसे एक अस्थायी व्यवस्था बताया था | लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते वह एक स्थायी प्रावधान बन गया | 1989 में वी.पी सिंह की सरकार आने के बाद मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने से ओबीसी ( अन्य पिछड़ा वर्ग ) को भी आरक्षण की सुविधा प्रदान कर दी गई | उसके बाद राजनीति में इस वर्ग के नेताओं का दबदबा बढ़ता गया | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि दलित और आदिवासी समुदाय से एक भी ऐसा नेता नहीं हुआ जो राष्ट्रीय राजनीति को निर्देशित कर पाता | हालाँकि कांशीराम और उनके बाद मायावती  दलित राजनीति के बड़े चेहरे बनकर उभरे लेकिन वे जल्द ही उ.प्र के भीतर सिमटकर रह गए | और फिर मायावती के एकाधिकारवादी रवैये के कारण पार्टी में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व तैयार न हो सका जिसके चलते वह जितनी तेजी से उठी उतनी ही तेजी से उसका पराभव भी सामने आ गया | कांशीराम निश्चित तौर पर दूरदर्शी नेता थे लेकिन मायावती बजाय  दलित उत्थान के अपने आभामंडल को चमकाने के फेर में अविश्वसनीय बनती गईं और उसी वजह से दलित मतदाता तक उनसे दूर जाने लगे | एक शख्सियत रामविलास पासवान की भी उभरी लेकिन वे भी राजनीतिक अवसर वाद के अलावा परिवार के शिकंजे में फंसकर रह गए | जहाँ तक आदिवासी समुदाय का सवाल है तो उसमें  भी नेताओं की फ़ौज निकली लेकिन वे अपनी सीमाओं से बाहर निकलने में असफल रहे | झारखंड में आदिवासी मुख्यमंत्री बनने के बावजूद उसे देश भर के आदिवासी समुदाय की मान्यता नहीं मिल सकी | शिबू सोरेन एक बड़ा नाम होने के बाद भी लालची प्रवृत्ति के कारण साख गँवा बैठे | लेकिन पिछड़े वर्ग से जिस तरह नेताओं का सैलाब निकला उसने राष्ट्रीय राजनीति पर भी अपना प्रभाव छोड़ा | गैर कांग्रेसवाद का नारा देकर विपक्षी एकता की कल्पना करने वाले डा.राममनोहर लोहिया के चेलों ने कांग्रेस के साथ  गठबंधन करते हुए देश के दो सबसे बड़े राज्यों उ.प्र और बिहार में उसको घुटनों के बल चलने मजबूर कर दिया | इसमें दो राय नहीं है कि  मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने से कांग्रेस को जबर्दस्त नुकसान हुआ क्योंकि ओबीसी वर्ग के नेताओं ने कांग्रेस के साथ मिलकर सत्ता का सुख तो लूटा लेकिन उसकी जड़ें भी कमजोर कर दीं | यहां तक कि  मुस्लिम वोट भी उसके हाथ से खिसक रहा है | हालाँकि इसके लिए कांग्रेस भी कम दोषी नहीं है  क्योंकि उसने समय के  साथ अपने को बदलने की  बजाय गांधी परिवार के करिश्मे पर जरूरत से ज्यादा विश्वास किया । जबकि उसकी चमक लगातार घटती जा रही है | दूसरी  तरफ भाजपा ने मंडल रूपी चक्रवात को समय रहते  भांपते हुए उससे बचाव का पुख्ता इंतजाम कर लिया | उच्च जातियों की पार्टी कही  जाने वाली भाजपा ने जिस तरह से ओबीसी , दलित और आदिवासी समुदाय के बीच अपनी पैठ बनाई उसके कारण कांग्रेस का तो सफाया हुआ ही मंडलवादी नेताओं और दलित राजनीति के ठेकेदार भी कमजोर होते चले गए | जिससे ये साबित हो गया कि केवल आरक्षण नामक झुनझुना पकड़ा देने से पिछड़े , दलित और आदिवासी वर्ग को हमेशा अपने मोहपाश में बांधकर नहीं रखा जा सकता | भाजपा के मार्गदर्शक माने जाने वाले रास्वसंघ ने भी हिन्दू समाज के भीतर जाति के नाम पर चली आ रही विसंगतियों को दूर करने का जो अभियान चलाया उसका ही परिणाम है कि आज भाजपा को बिना मुस्लिम तुष्टीकरण किये ही देश  के साथ अनेक प्रदेशों की सत्ता प्राप्त हो सकी | ऐसा नहीं है कि भाजपा जातिगत समीकरणों को साधने से दूर रहती है | लेकिन उसने सोशल इंजीनियरिंग नामक राजनीतिक हथियार का इस्तेमाल बहुत ही सोच समझकर किया जिससे बजाय घृणा  और संघर्ष के सामाजिक समन्वय देखने मिला | इससे ये सिद्ध हो गया कि  तात्कालिक लाभ बांटने  की  राजनीति के दिन लद रहे हैं | हालाँकि अभी भी विभाजनकारी ताकतें अपने निहित स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं | जिसका प्रमाण  हाल ही में रामचरित मानस को लेकर पैदा किये गए विवाद से मिला लेकिन हिन्दू समाज ने जिस समझ्दारी से उसका प्रतिवाद किया उसकी वजह से विवाद शुरू करने वाले अपने कुनबे में भी निंदा के पात्र बन गए। तुष्टीकरण की सियासत भी धीरे धीरे दम तोड़ती दिख रही है।  लेकिन जिस तरह की कोशिशें हो रही हैं उनसे सतर्क रहने की जरूरत है। विपक्ष का धर्म है सत्ता पक्ष को घेरना लेकिन जब राष्ट्रीय हित विशेष रूप से सुरक्षा जैसे मसले पर राजनीति होती है तब दुख होता है। समाज को टुकड़ों में बांटने जैसी राजनीति के विरुद्ध जब तक जनता जागृत नहीं होती तब तक इन शक्तियों को रोकना कठिन होगा। समय आ गया है जब चुनावी राजनीति को ही सब कुछ समझने के बजाय देश के दूरगामी भविष्य को ध्यान में रखते हुए  फैसला करने की मानसिकता पैदा हो। 21 वीं सदी में जब सब कुछ नया हो रहा है तब हमारे देश की राजनीति को भी अपनी चाल और चरित्र बदलना होगा। वरना वोट बैंक की तृष्णा समाज को टुकड़ों में बांटकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है की अवधारणा को नष्ट करने से भी बाज नहीं आएगी।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 10 February 2023

चुनाव + चंदा = लोकतंत्र



जब भारत में वामपंथ और समाजवाद अपने शबाब पर हुआ करता था तब पूंजीपतियों को गाली देना राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा था। 1969 में अपनी पार्टी के भीतर के विरोध को दबाने के लिए स्व. इंदिरा गांधी ने बैंक राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजा महाराजाओं के प्रिवीपर्स बंद कर खुद को आम जनता का चहेता बना लिया। लेकिन उस सबके बाद भी राजनीति में न तो उद्योगपतियों की भूमिका कम हुई और न ही राजा महाराजाओं की। उद्योगपति भले ही चुनाव लड़कर न आते हों किंतु पिछले दरवाजे से राज्यसभा में बैठने का इंतजाम कर ही लेते हैं । के.के.बिरला और उनकी बेटी शोभना भरतिया , राहुल बजाज , ललित सूरी, अनिल अंबानी और विजय माल्या संसद के उच्च सदन के सदस्य रहे हैं। इनके अलावा भी अन्य उद्योगपति अलग अलग पार्टियों की मदद से राज्यसभा का जुगाड़ बिठाते रहे हैं । ररामनाथ  गोयनका जरूर 1971 में जनसंघ की टिकिट पर विदिशा से लोकसभा के लिए चुने गए लेकिन थे वे भी निर्दलीय ही । कुछ नामचीन वकील भी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की मेहरबानी से उच्च सदन में आते रहे हैं । राजा महाराजा तो आज भी अपनी पुरानी रियासतों में असर रखते हैं और चुनाव जीतकर लोकसभा और विधानसभा में नजर आते हैं । कुछ तो मंत्री और मुख्यमंत्री (वसुंधरा राजे) भी बने। जो चुनाव नहीं भी लड़ते वे अपने कृपापत्र को जितवाने का दम रखते हैं। विचारधारा ऐसे मामलों में गौण हो जाया करती है। मसलन समाजवादी पार्टी से पूंजीवाद के प्रतीक अनिल अंबानी और शिवसेना से राहुल बजाज राज्यसभा में पहुंचे। लेकिन ललित सूरी और विजय माल्या  निर्दलीय प्रत्याशी बनकर राज्यसभा जा पहुंचे। जाहिर है वोटों की खरीद इसके पीछे थी। कुल मिलाकर ये देखने में आता रहा है कि राजनीतिक दल बात भले ही जनता की करते हों किंतु पूंजीपतियों के बिना चुनाव नहीं लड़े जा सकते और इसीलिए लोकतंत्र में उनका दखल रहता है। इन दिनों गौतम अडानी नामक उद्योगपति काफी चर्चा में हैं । विशेष रूप से इसलिए क्योंकि उनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नजदीकी माना जाता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में श्री मोदी ने उनके निजी विमान से ही प्रचार किया और प्रधानमंत्री बनने से पूर्व अहमदाबाद से दिल्ली भी उसी विमान से आए। इसलिए ये कहना कि उनके श्री अडानी से निकट संबंध हैं , कतई गलत नहीं हैं । लेकिन जिस बात को लेकर राजनीतिक गलियारों में तूफान उठा हुआ है वह है बीते 9 साल में अडानी समूह के आकार और समृद्धि में बेतहाशा वृद्धि। लोकसभा में कांग्रेस सांसद राहुल  गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलते हुए जब श्री मोदी और श्री अडानी की नजदीकी  का मुद्दा छेड़ा तो जवाब में भाजपा सांसदों ने गांधी जी की बिरला और बजाज से नजदीकी और इंदिरा जी के जमाने में अंबानी की व्यवसायिक सफलता का जिक्र छेड़कर कांग्रेस को घेरा। स्मरणीय है गोलमेज कांफ्रेंस में गांधी जी के साथ गए प्रतिनिधिमंडल में घनश्याम दास बिरला भी शामिल थे। खैर,  आरोप प्रत्यारोप तो राजनीति के अभिन्न हिस्से हैं परंतु जहां तक सवाल राजनेताओं का है तो सच्चाई यही है कि बिना उद्योगपतियों की मदद के राजनीतिक पार्टी चल ही नहीं सकती। जब प.बंगाल में वामपंथी एकाधिकार था तब बिरला परिवार के संस्थानों में हड़ताल नहीं होती थी क्योंकि ज्योति बसु के उनसे अच्छे रिश्ते थे। दुनिया भर में जहां भी लोकतंत्र है और चुनाव के माध्यम से सरकार चुनी जाती है  वहां चंदा उगाही की जाती है। यद्यपि उसके तौर तरीके अलग अलग होते हैं । इसी तरह जो सत्ता में होता है वह अपने देश के उद्योगपतियों की सिफारिश दूसरे देशों में करता है। आजादी के बाद चार पहिया वाहनों में एंबेसेडर और स्कूटरों में बजाज का बोलबाला हुआ करता था जो क्रमशः बिरला और बजाज परिवार द्वारा बनाए जाते थे। एंबेसेडर तो  एक तरह से सरकार का अधिकृत वाहन होती थी जिस पर सारे विशिष्ट जन चलते थे। इसी तरह बजाज स्कूटर के लिए लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी जिससे उसकी कालाबाजारी भी होती थी। लायसेंस कोटा प्रणाली उदारवाद के आने से खत्म हुई तो  नए नए धनकुबेर पनपे। बिरला टाटा को पीछे छोड़ अंबानी समूह ने बहुत तरक्की की। ये गौरव की बात है कि भारतीय उद्योगपतियों ने विदेशों में भी कारोबार फैलाया है। लेकिन बेशक अडानी समूह की उड़ान सबसे ऊंची  होने से वे नजरों में चढ़ गए। श्री गांधी ने भाजपा को अडानी से प्राप्त चंदे की जानकारी भी पूछी। बीते कुछ सालों से भाजपा को मिलने वाले चंदे में बेतहाशा वृद्धि हुई है। लेकिन जब कांग्रेस सत्ता में थी तब उद्योगपति उस पर धनवर्षा किया करते थे और तब भाजपा ऐसी ही तोहमत लगाती थी । चंदे के बदले सत्ता उन्हें उपकृत करती है ये भी सही है किंतु इसके लिए सभी राजनीतिक दल एक जैसे हैं । आम आदमी पार्टी तक ने राज्य सभा की टिकिटें कुछ ऐसे लोगों को दीं जो धन कुबेर हैं। समाजवादी पार्टी ने स्व.अमर सिंह के जरिए फिल्म और उद्योग जगत से खूब फायदा उठाया। जया बच्चन और अनिल अंबानी को राज्यसभा में भेजना इसका प्रमाण है। दरअसल मौजूदा चुनाव प्रणाली इतनी खर्चीली है कि बिना पैसा बहाए चुनाव जीतना असंभव है। खर्च की जो सीमा चुनाव आयोग स्वीकृत करता है वह मजाक है। ऐसे में उद्योगपति ही दुधारू गाय बनकर सामने आते हैं। ऐसी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है जो इनका आर्थिक सहयोग न लेती हो। कम , ज्यादा उसकी ताकत और हैसियत पर निर्भर करता है। गुजरात में कांग्रेस पार्टी या उसके नेताओं ने अडानी समूह से कभी कोई सहयोग न लिया हो ये असंभव है । काले धन को खपाने में चुनाव बड़ा जरिया हैं। इसलिए आज भले भाजपा और अडानी को लेकर हल्ला मचा हो परंतु सभी राजनीतिक दल उद्योगपतियों के काले धन और सुख सुविधाओं के साधनों पर पलते हैं। और जब तक चुनाव प्रणाली में बड़ा सुधार नहीं किया जाता राजनेताओं और उद्योगपतियों के गठजोड़ को तोड़ पाना नामुमकिन है और चुनाव तथा चंदा मिलकर लोकतंत्र के पर्यायवाची बने रहेंगे।


रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 9 February 2023

खतरनाक मोड़ की तरफ बढ़ रही रूस और यूक्रेन की जंग



रूस और यूक्रेन की जंग को एक साल होने जा रहे हैं | सैन्य क्षमता की तुलना करें तो यूक्रेन को कुछ दिनों में ही घुटने टेक देना चाहिए थे क्योंकि रूस जैसी महाशक्ति का मुकाबले करने की क्षमता और साधन  उसके पास नहीं थे | यद्यपि युद्ध का माहौल एकाएक नहीं बना | रूस अनेक सालों से अपने इरादे जाहिर करता आ रहा था | 2014 में क्रीमिया बंदरगाह पर कब्जा करने के साथ ही उसने पूरी दुनिया को बता दिया कि वह किस सीमा तक जा सकता है | बात शायद इतनी न उलझती  यदि यूक्रेन रूस की सारी शर्तें मानते हुए  उसका पिट्ठू बन जाता | लेकिन उसने अपनी सुरक्षा की खातिर अमेरिका प्रायोजित नाटो सैन्य संधि से जुड़ने का जो प्रयास किया उससे रूस के कान खड़े हो गए | भले ही सोवियत संघ के हिस्से रहे तमाम देश अब प्रभुसत्ता संपन्न देश बन गये लेकिन रूस ये नहीं चाहता कि वे अमेरिका के प्रभाव में जाएं क्योंकि  इससे न सिर्फ उसकी सुरक्षा बल्कि आर्थिक हित भी प्रभावित होते हैं | यूक्रेन की देखा सीखी पूर्वी यूरोप के कुछ और देशों ने  नाटो से जुड़ने में रूचि दिखाई जिससे रूस के राष्ट्रपति पुतिन को खतरा महसूस होने लगा । लेकिन यूक्रेन चूंकि बड़ा देश है अतः उसके अमेरिकी खेमे में जाने से उन्हें ज्यादा डर लगा | इसीलिये उसके उन सीमावर्ती  प्रान्तों में जहां रूसी भाषा बोली जाती है रूस ने अलगाववादी आन्दोलन खड़े करवाए और फिर बहाना  बनाकर गत वर्ष फरवरी में विधिवत आक्रमण कर दिया | चूंकि उस समय तक यूक्रेन नाटो का सदस्य नहीं बना था लिहाजा अमेरिका युद्ध में सीधे शामिल नहीं  हो सकता था और फिर वह एक साल पहले ही  अफगानिस्तान से पिंड छुड़ाकर निकला था । इसलिए राष्ट्रपति वाईडन  अपनी  सेना  दूसरे देश की धरती पर भेजने से पीछे हट गये | लेकिन यूक्रेन को यदि अकेला छोड़ दिया जाता तब रूस सीधे सीधे यूरोप के मुहाने पर आकर बैठ जाता जो अमेरिका को मंजूर नहीं था | इसलिए उसने और उसके साथी देशों ने यूकेन को सैन्य सामग्री देने की नीति अपनाई | आर्थिक तथा अन्य सहायता भी दिल खोलकर दी गयी | इसके बलबूते ही यूक्रेन बर्बादी झेलते हुए भी रूस के सामने डटा हुआ है | लेकिन अब जबकि युद्ध की वर्षगांठ आने को है तब दो तरह की संभावनाएं सुनने में आ रही हैं | पहली तो ये कि रूस और यूक्रेन के बीच समझौता  हो जाये जिसके अंतर्गत यूक्रेन रूस के व्यापारिक हितों के अनुकूल अपनी भूमि और बंदरगाहों का उपयोग करने की सुविधा उसे दे और नाटो की सदस्यता का इरादा त्यागते हुए उसका अघोषित उपनिवेश बन जाए | लेकिन ऐसा करते समय पुतिन ये भी चाहेंगे कि वहां के मौजूदा राष्ट्रपति जेलेंस्की हट जाएँ और मास्को समर्थक पिट्ठू सत्ता संभाले | हालाँकि इसके लिए अमेरिका कितना तैयार होता है ये कह पाना कठिन है | दूसरी संभावना ये है कि रूस यूक्रेन को पूरी तरह पराजित कर उस पर कब्जा करने के बाद कठपुतली सरकार वहाँ बनवा दे जैसा सोवियत संघ के ज़माने में हुआ करता था | यद्यपि ऐसा करने के लिये रूस को और आक्रामक होकर निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी जिसमें सैनिकों की बलि के अलावा सैन्य सामग्री  भी काफी खर्च होगी | इसमें दो मत नहीं है कि इस जंग में यूक्रेन  आर्थिक तौर पर तबाह हो गया है | पूरा देश खंडहर में तब्दील होने से तमाम सुविधाएं और व्यवस्थाएं चौपट हो गईं हैं | लाखों लोग देश छोड़कर जा चुके हैं | जनता पूरी तरह हलाकान है | हजारों लोग मारे जा चुके हैं | उधर रूस भी कम परेशान नहीं है |  उसका विदेशी व्यापार  ठप्प पड़ा है  |आर्थिक प्रतिबंधों के कारण उसे अपना कच्चा तेल और  गैस , भारत तथा चीन को सस्ते दाम पर बेचना पड़ रहा है | जनता भी पुतिन से नाराज हो रही है | स्टालिन के ज़माने जैसी हत्याएं भी सुनने में आ रही हैं | कुल मिलाकर वह भी बुरी तरह उलझ गया है | लेकिन इस युद्ध का  अंजाम क्या होगा इसे लेकर  पूरी दुनिया परेशान है । हालांकि अमेरिका , ब्रिटेन और जर्मनी यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति जारी रखने के संकेत दे रहे हैं लेकिन कहीं न कहीं उन्हें भी ये युद्ध निरर्थक लगने लगा है।और इसी कारण स्थितियां खतरनाक मोड़ लेने की ओर बढ़ रही हैं।द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान पर किया गया परमाणु हमला इसका उदाहरण है। रूस इस हद तक जायेगा या नहीं और अमेरिका किस सीमा तक यूक्रेन को मदद देता रहेगा ये बड़े सवाल हैं। कोरोना के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई है ऊपर से इस युद्ध ने सब उलट पलट कर दिया । संरासंघ की लाचारी भी उभरकर सामने आ चुकी है । भारत ने हालांकि युद्ध में किसी  का साथ  न देकर कूटनीतिक कौशल तो दिखा दिया किंतु इससे हमारे आर्थिक हित भी प्रभावित हो रहे हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया को पुतिन के रूप में हिटलर नजर आ रहा है। और डर इसी बात का है कि जीत न मिलने की हालत में वे वह कदम न उठा लें जिसका डर है। वैसे भी बीते एक साल में वे अनेक बार परमाणु हमले की चेतावनी दे चुके हैं। दरअसल विश्व समुदाय के साथ पुतिन का संवाद न के बराबर है। भारत और चीन ही वे देश हैं जिनसे उनका संपर्क है लेकिन दोनों तटस्थ बने हुए हैं। संरासंघ भी मिट्टी का माधो साबित हो चुका है। उसके अलावा भी जो संगठन हैं वे भी बीच बचाव की बजाय दूर से तमाशा देख रहे हैं जबकि इस समय दुनिया में शांति की जरूरत है।ऐसे में  ये युद्ध जल्द न रुका तो इसका अंत हिरोशिमा और  नागासाकी जैसी  विभीषिका उत्पन्न कर सकता है जिसके बाद आग और फैल जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

रवीन्द्र वाजपेयी