Monday, 27 February 2023

खुद को भाजपा का विकल्प साबित करने पर रहेगा कांग्रेस का फोकस



रायपुर में कांग्रेस के 85 वें अधिवेशन  में राजनीतिक , आर्थिक और अन्य प्रस्ताव पारित हुए। अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित अनेक नेताओं ने वर्तमान परिदृश्य पर विचार व्यक्त किए। लेकिन  पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और  राहुल गांधी के भाषण पर सबकी निगाहें लगी थीं। इसके पीछे भी कारण ये था कि पार्टी लंबे समय से अनिश्चितता में फंसी थी। 2019 में नरेंद्र मोदी के दोबारा सत्ता में आने के बाद राहुल ने अध्यक्ष पद त्याग तो दिया किंतु गांधी परिवार ने  कमान अपने पास ही रखी और श्रीमती गांधी कार्यकारी अध्यक्ष बन गईं। हालांकि राहुल लगातार दोहराते रहे कि  परिवार का कोई सदस्य उक्त पद पर नहीं बैठेगा। लेकिन  संगठन पर पूरा नियंत्रण उसी का बना रहा। उस दौरान कांग्रेस को अनेक राज्यों  के चुनावों में  मुंह की खानी पड़ी । पंजाब उसके हाथ से निकल गया। प.बंगाल में तो उसका सफ़ाया हो गया। उत्तराखंड और गोवा में भी निराशा हाथ लगी। पंजाब में तो पार्टी  विभाजित हो गई और वही कहानी राजस्थान में दोहराए जाने के हालात हैं। जहां गांधी परिवार के विश्वस्त अशोक गहलोत ने हाईकमान को अंगूठा दिखाकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से इंकार करते हुए राज्य की सत्ता न छोड़ने का ऐलान कर दिया। गहलोत समर्थक विधायकों ने  सामूहिक  त्यागपत्र देकर सरकार गिराने तक की स्थिति बना दी और हाइकमान असहाय बना रहा। लेकिन इसके पहले से ही पार्टी में असंतोष के स्वर उठने लगे थे। जी 23 नामक समूह ने  अध्यक्ष सहित कांग्रेस वर्किंग कमेटी के चुनाव हेतु पत्र लिखकर उसे सार्वजनिक भी कर दिया । बिना किसी का नाम लिए परिवारवाद के विरुद्ध टिप्पणियां होने लगीं। जाहिर था  राहुल की विफलताओं के मद्देनजर जी 23 ने ऊर्जावान नेतृत्व को आगे बढ़ाने का अभियान छेड़ा। लेकिन असफलता हाथ लगने पर उनमें से अनेक पार्टी छोड़कर चलते बने। कैप्टन अमरिंदर सिंह , सुनील  जाखड़ , गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल , आरपीएन सिंह वे नाम हैं जो बीते दो साल में पार्टी छोड़ बैठे। गुजरात में हार्दिक पटेल भी उसी कतार में शामिल हो गए । इससे निपटने के लिए गांधी परिवार ने पार्टी अध्यक्ष के  चुनाव का ऐलान और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा जैसे दो कदम उठाए। पहले का मकसद असंतुष्टों को ये बताना था कि उसकी संगठन पर काबिज रहने की मंशा नहीं है। लेकिन जब श्री गहलोत पीछे हटे तो श्री खरगे पर दांव लगा दिया गया। उधर राहुल यात्रा पर निकल पड़े ये दर्शाने के लिए मानो वे पूरी तरह निर्लिप्त हों। हालांकि श्रीमती गांधी के श्री खरगे के साथ खड़े हो जाने से पूरी पार्टी को ये संदेश दे दिया गया कि प्रथम परिवार उनके साथ है। इसीलिए  शशि थरूर  बड़े  अंतर से हारे क्योंकि वे जी 23 समूह का हिस्सा थे। उसके बाद योजनाबद्ध तरीके से पूरा फोकस राहुल की यात्रा पर केंद्रित किया गया और इसीलिए यात्रा की चर्चा और प्रभाव कम होने के पहले ही अधिवेशन का आयोजन भी किया गया। जिसमें श्रीमती गांधी ने यात्रा को टर्निंग प्वाइंट बताकर ये जता दिया कि कांग्रेस को विजय पथ पर ले जाने की क्षमता उनके बेटे में ही है और उसे ये दायित्व देकर वे कार्यमुक्त हो रही हैं। भाषण प्रियंका का भी हुआ किंतु  केंद्र बिंदु राहुल रहे। उन्होंने वैसे तो लोकसभा में दिए अपने भाषण को ही लगभग दोहराया किंतु 52 साल में भी अपना घर न होने जैसी बातें करते हुए उपस्थित कांग्रेसजनों  के भावनात्मक दोहन का दांव भी चला। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के चुनाव को टालते हुए श्री खरगे को मनोनयन का अधिकार देना इस बात का प्रमाण है कि  भले ही अध्यक्ष का चुनाव कर लिया गया किंतु पार्टी की  सर्वोच्च संस्था के लोकतंत्रीकरण की बात गांधी परिवार को मंजूर नहीं है। चुनाव न कराने का कारण भी ये सुनने में आया कि विभिन्न  राज्यों में विधानसभा  चुनाव होने से चुनाव कराना पार्टी में फूट का कारण बन सकता है। हालांकि जी 23 में बचे खुचे नेताओं ने फिलहाल भले ही मौन साध रखा हो लेकिन ज्यादा समय तक ये स्थिति नहीं रहेगी। राजस्थान में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं किंतु गहलोत और पायलट का झगड़ा यथावत है। दूसरे राज्यों में भी संगठन की स्थिति अच्छी नहीं है। छत्तीसगढ़ में टी. एस.सिंहदेव मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के विरुद्ध मौके की तलाश कर रहे हैं वहीं म.प्र में मुख्यमंत्री के चेहरे पर बवाल है। लेकिन इस सब पर ध्यान दिए बिना भारत जोड़ो यात्रा के दूसरे चरण की घोषणा कर दी गई। त्रिपुरा ,मेघालय और नागालैंड विधानसभा चुनाव की भी गुजरात जैसी उपेक्षा की गई । ऐसा लगता है कांग्रेस का पूरा ध्यान राहुल के नेतृत्व को चमकाते हुए आगामी लोकसभा चुनाव पर लगा है। इसीलिए विपक्ष के साथ गठबंधन की कोई चर्चा नहीं हुई। उल्टे जयराम रमेश ये बोल गए कि इस साल 9 राज्यों के चुनाव को देखते हुए इस बारे में बात करने का ये समय नहीं है। इस प्रकार कांग्रेस के इस  बहुप्रतीक्षित अधिवेशन का सार यही है कि  जिस सर्वोच्च आसंदी पर अभी तक श्रीमती गांधी विराजमान थीं उस पर अब राहुल बैठेंगे।और विपक्ष से गठबंधन इसी शर्त पर होगा कि सब उनके नेतृत्व में लड़ने को तैयार हों। जहां तक बात कार्यसंस्कृति  की है तो उसमें किसी परिवर्तन का कोई संकेत नहीं मिला। आने वाले दिनों में कांग्रेस अरुणाचल से गुजरात तक की श्री गांधी की यात्रा पर पूरा ध्यान लगायेगी। ये सोचकर कि इससे उसके आंतरिक झगड़े तो दबे रहेंगे ही साथ ही अन्य विपक्षी दलों को भी ये संदेश जाएगा कि वही राष्ट्रीय दल है इसलिए भाजपा को रोकने की शक्ति उसी में है। पहली यात्रा से उसका उत्साह निश्चित तौर पर बढ़ा है लेकिन दूसरी यात्रा जिन राज्यों से गुजरेगी वहां क्षेत्रीय दल काफी ताकतवर हैं । इसलिए आने वाले कुछ महीने राष्ट्रीय राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे । विशेष रूप से कांग्रेस की भूमिका पर सबकी नजर रहेगी।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 25 February 2023

पंजाब में खालिस्तानी आतंक के उभार को नजरंदाज करना घातक होगा



पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए एक वर्ष होने जा रहा है। इस दौरान भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में बनी आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली मॉडल के अनुरूप बिजली , पानी , चिकित्सा और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर जो काम किया उसके प्रति जनता की प्रतिक्रिया मिली जुली है क्योंकि राज्य की वित्तीय स्थिति दयनीय होने से बहुत सारे चुनावी वायदे अब तक पूरे होने की राह देख रहे हैं। लेकिन इस सबसे अलग हटकर  पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन जिस तरह जोर पकड़ रहा है उसे देखते हुए ये कहना गलत न होगा कि पंजाब में एक बार फिर अलगाववाद की चिंगारी फूटने को है। वारिस पंजाब दे नामक संगठन के मुखिया अभिनेता दीप सिद्धू की गत वर्ष गैंगवार में मौत हो जाने के बाद अमृतपाल सिंह नामक नौजवान इस संगठन का अध्यक्ष बन गया। ये वही दीप था जो 26 जनवरी 2021 को किसान आंदोलन के दौरान लालकिले पर चढ़कर खालिस्तानी नारे लगाने के मामले में आरोपी था। उसने पंजाब के युवकों में आजादी का जहर फैलाने का बीड़ा उठा रखा था। उसकी मौत के बाद दुबई में ट्रांसपोर्ट का काम करने वाले अमृत पाल सिंह ने आकर  उसका स्थान ले लिया । हालांकि वारिस दे पंजाब से जुड़े अनेक नेता उसके मुखिया बन जाने से नाराज हैं किंतु अपने भड़काऊ भाषणों से अमृत पाल खालिस्तान  समर्थकों को रास आ रहा है। यहां तक कि उसे दूसरा  भिंडरावाले कहा जाने लगा है। बीते दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बयान दिया था कि पंजाब में खालिस्तान का आंदोलन चलाने वालों पर केंद्र सरकार की नजर है। उस पर अमृत पाल ने धमकी दी कि इंदिरा ने भी दबाने की कोशिश की थी क्या हुआ , अब अमित शाह भी अपनी इच्छा पूरी कर लें । इसके साथ ही उसने ये भी जोड़ा कि पंजाब का बच्चा बच्चा खालिस्तान चाहता है। अमृतपाल की कार्यप्रणाली भी भिंडरावाले जैसी ही है। तीन दिन पूर्व अमृतसर जिले के अजनाला थाने में बंद उसके खासमखास लवप्रीत सिंह तूफान  को रिहा करवाने हजारों लोग बंदूक , तलवार और भाले लेकर जा पहुंचे। उनके दबाव के बाद पुलिस  लवप्रीत  को रिहा करने मजबूर हो गई। ऐसी ही अनेक घटनाएं पंजाब में आए दिन हो रही हैं किंतु सभी प्रकाश में नहीं आ पातीं। खालिस्तानी आंदोलन बीते कई दशकों तक दबा रहने के  बाद 2020 में  शुरू हुए किसान आंदोलन की आड़ में जोर पकड़ने लगा। उस आंदोलन को कैनेडा और ब्रिटेन में बसे खालिस्तान समर्थक संगठनों ने जिस प्रकार समर्थन दिया उसके बाद उसे विदेशी आर्थिक सहायता मिलने की  चर्चा  भी खूब हुई। किसानों के आंदोलन में जिस तरह से उग्रवादी सिख घुस आए उसने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए। प्रधानमंत्री द्वारा कृषि कानूनों को वापिस लेने की घोषणा के बाद आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु दीप सिद्धू ने  पंजाब में घूम घूमकर ये कहना शुरू दिया कि कानून वापस होने के बाद भी सिख युवकों को शांत नहीं बैठना चाहिए। और उसी के बाद पंजाब में सिखों और हिंदुओं के बीच झगड़ा फैलाने का कुचक्र रचा जाने लगा। आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद अनेक हिंदू मंदिरों पर सिखों द्वारा किए गए हमले नए खतरे का संकेत है क्योंकि ऐसा तो अस्सी नब्बे के दशक में भी नहीं हुआ जब खालिस्तान के नाम पर पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था। इस आधार पर यह आशंका मजबूत होने लगी है कि पंजाब में कश्मीर जैसी स्थिति बनाकर हिंदुओं को विशेष रूप से जो गांवों में हैं , आतंकित करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। इससे लगता है विदेशों में बैठे खालिस्तानी संगठन अब बदली हुई रणनीति पर काम कर रहे हैं। उस दृष्टि से पंजाब सरकार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन ऐसा लगता है आम आदमी पार्टी की सरकार इस बारे में बेहद लापरवाह रवैया अपना रही है। पंजाब की राजनीति में अकाली दल के कमजोर हो जाने से  सिख समुदाय नेतृत्व विहीन हो गया है। जिसका लाभ लेते हुए खालिस्तानी पंजाब में अलगाववाद को पनपाने में लगे हैं। किसान आंदोलन से जुड़े सिखों में इस बात को लेकर निराशा है कि एक साल तक चले संघर्ष के बावजूद उनके हाथ कुछ नहीं लगा। आंदोलन की समाप्ति के बाद राजनीतिक दलों ने किसान संगठनों की मांगों से किनारा करना शुरू कर दिया। यही वजह है कि वे भगवंत मान सरकार के विरुद्ध भी आवाज उठा रहे हैं । जिसका लाभ उठाकर खालिस्तानी संगठन अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। ऐसी ही गलती इंदिरा गांधी के दौर में हुई जब भिंडरावाले को अपने लिए फायदेमंद मानकर उसकी गतिविधियों को नजरंदाज किया जाता रहा जिसका दुष्परिणाम ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार और अंततः इंदिरा जी की हत्या के रूप में सामने आया। उस अनुभव से सबक लेते हुए केंद्र सरकार को पंजाब पर विशेष ध्यान देना चाहिए जिससे अमृत पाल सिंह को भिंडरावाले पार्ट 2 बनने से रोका जाए। जिस तरह उसने गृह मंत्री अमित शाह को धमकी दी है वह साधारण बात नहीं है क्योंकि उसकी भाषा से उसके खतरनाक इरादे झलकते हैं।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 24 February 2023

पहले कांग्रेस खुद को सक्षम विपक्ष तो साबित करे



कांग्रेस का 85 वां राष्ट्रीय अधिवेशन आज से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रारंभ हो रहा है। मल्लिकार्जुन खरगे के अध्यक्ष बन जाने के बाद पार्टी को गतिशील बनाने का यह प्रयास न सिर्फ कांग्रेस अपितु प्रजातंत्र के लिए भी शुभ संकेत है । देश के समक्ष इस समय चिंता के जो विषय हैं उनमें से एक  मजबूत विपक्ष का अभाव भी है। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है जिसने आजादी के आंदोलन का नेतृत्व किया। स्वाधीन भारत में लंबे समय देश और प्रदेशों पर  उसने राज किया । ये कहना भी गलत नहीं है कि वामपंथियों को छोड़कर शेष सभी राजनीतिक दल कांग्रेस से ही निकले। समाजवादी आंदोलन के अलावा आज की भाजपा के  पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापक डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी पंडित नेहरू के मंत्रीमंडल से स्तीफा देकर बाहर आए थे।कहने का आशय ये कि आजादी के बाद विपक्ष का जो स्वरूप बना वह कांग्रेस से वैचारिक मतभेदों से ही उभरा । और इसीलिए लंबे समय तक भारतीय  राजनीति में कांग्रेस संस्कृति शब्द एक विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता रहा। ये कहना  भी गलत नहीं है कि कांग्रेस ने ही बाकी दलों को सत्ता के लिए जाति और धार्मिक तुष्टीकरण के फार्मूले सिखाए जिसका उसे जबर्दस्त नुकसान हुआ। कालांतर में उभरे क्षेत्रीय दलों में भी अधिकतर उसी से टूटकर या फिर उसकी नीतियों से नाराज होकर बने। धार्मिक तुष्टीकरण के लिए अल्पसंख्यकवाद को बढ़ावा एवं भाषावार प्रांतों का गठन कांग्रेस की उन गलतियों में से है जिनका नुकसान देश भुगत रहा है। इनकी वजह से क्षेत्रीयतावाद के अलावा धार्मिक कट्टरता को भी धीरे धीरे बढ़ावा मिला।इन सबकी वजह से कांग्रेस का प्रभाव क्षीण होते होते ये स्थिति बन गई कि वह राज्यों की  सत्ता से अलग होते  होते केंद्र की सत्ता भी गंवा बैठी। यहां तक कि लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष बनने की पात्रता भी उससे छिन गई । लेकिन इसका दुष्परिणाम ये हो रहा है कि राष्ट्रीय सोच रखने वाले विपक्ष का अभाव हो गया तथा छोटे छोटे दल राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं पाल बैठे । यही वजह है कि ममता बैनर्जी और के. सी.राव जैसे नेता तक कांग्रेस के झंडे तले भाजपा विरोधी विपक्षी मोर्चा बनाने में आगे पीछे हो रहे हैं। ममता तो पहले ही खुद को नरेंद्र मोदी का  विकल्प घोषित कर चुकी हैं । कांग्रेस अधिवेशन के शुरु होने के पहले ही तृणमूल कांग्रेस की मुखर सांसद महुआ मोइत्रा का ये बयान ध्यान देने योग्य है कि उनकी पार्टी ही भाजपा का विकल्प है। ये सब देखते हुए कांग्रेस को इस अधिवेशन के जरिए ये स्पष्ट करना होगा कि वह चुनाव पूर्व विपक्षी गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में रहते हुए राहुल गांधी को श्री मोदी के मुकाबले पेश करने का दबाव बनाएगी या फिर गठबंधन को बहुमत मिलने के बाद ही प्रधानमंत्री का मसला हल होगा। इसके साथ ही कांग्रेस को ये भी स्पष्ट करना होगा कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण पर उसका क्या रवैया रहेगा।बीते कुछ वर्षों में  पार्टी नर्म हिंदुत्व को अपनाने का प्रयास तो कर रही है किंतु वह आधा अधूरा प्रतीत होता है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने विभिन्न धार्मिक केंद्रों पर पूजा अर्चना की । लेकिन पार्टी चाहकर भी भाजपा की तरह खुलकर धार्मिक और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण व्यक्त नहीं कर पाती। उ.प्र ,  बिहार , प.बंगाल जैसे बड़े राज्यों में वह घुटनों के बल पर है। वर्तमान  में  वह राजस्थान , म. प्र, गुजरात, छत्तीसगढ़ और हिमाचल में ही भाजपा से सीधे मुकाबले में है। बाकी के राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनना पड़ता है । इसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस का राष्ट्रीय पार्टी की तरह व्यवहार  न करना ही है। ज्वलंत मुद्दों पर नीतिगत अस्पष्टता और वैचारिक भटकाव की वजह से आज देश की सबसे पुरानी पार्टी   अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। यदि वह चाहती है कि 2024 के  चुनाव में नरेंद्र मोदी को टक्कर दे सके तो उसे राहुल गांधी का मोह छोड़कर नीतिगत साहस दिखाना होगा। उसे उन कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण करना चाहिए जिनकी वजह से उसका पराभव शुरू हुआ। दुर्भाग्य से आज भी  गांधी परिवार के अभिनंदन पत्र का वाचन करने वाले चंद नेता ही उस पर हावी हैं । भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल पूरे समय  जिस तरह रास्वसंघ और सावरकर को गालियां देते रहे उससे उनको और कांग्रेस दोनों को कुछ हासिल नहीं हुआ। धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे विषयों पर पार्टी का रुख जनभावनाओं के विपरीत होने से वह एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाली स्थिति में पहुंच जाती है । कांग्रेस को ये मुगालता छोड़ना होगा कि भारत छोड़ो यात्रा से राहुल गांधी इतने लोकप्रिय और ताकतवर हो गए हैं कि सभी विपक्षी दल उनको अपना नेता मान लेंगे। सत्ता की लालसा छोड़ उसको इस अधिवेशन के जरिए खुद को सक्षम विपक्ष के तौर पर पेश करना होगा क्योंकि फिलहाल तो देश को उससे यही अपेक्षा है।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 23 February 2023

दिल्ली नगर निगम में हंगामा प्रजातंत्र के लिए अशुभ संकेत




दिल्ली नगर निगम  चुनाव के परिणाम  दिसंबर 2022 में हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधान सभा के नतीजों के पहले ही आ चुके थे । उन दोनों राज्यों में मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद मंत्रीमंडल भी बन गया लेकिन दिल्ली को महीनों के इंतजार के बाद कल किसी तरह से  नया महापौर मिल सका। इसके पहले दो तीन बार नव निर्वाचित पार्षदों की बैठक हुई किंतु हंगामे की वजह से सदन स्थगित करना पड़ा। ये कहना गलत न होगा कि इस मामले में भाजपा की तरफ़ से की गई अड़ंगेबाजी अनावश्यक और अनुचित थी। 12 मनोनीत पार्षदों को मताधिकार दिलाकर तोड़फोड़ के जरिए महापौर बनवाने की उसकी कोशिश के नैतिक और व्यवहारिक दोनों पक्ष कमजोर थे। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया जिसके कड़े निर्देश के बाद अंततः उपराज्यपाल को चुनाव करवाने बाध्य होना पड़ा और तनावपूर्ण वातावरण में आखिरकार सदन में स्पष्ट बहुमत प्राप्त  आम आदमी पार्टी अपना महापौर और उपमहापौर चुनवाने में सफल हो गई। भाजपा द्वारा अपना उम्मीदवार खड़ा किया जाना सांकेतिक विरोध के लिहाज से गलत नहीं था लेकिन उसके बाद स्थायी समिति के चुनाव के लिए सदन  में हुए होहल्ले ,मारपीट और तोड़फोड़ को देखकर प्रजातंत्र के प्रति श्रद्धा रखने वाले हर किसी का मन दुखी होगा । विपक्ष संसदीय तरीकों से सत्ता पक्ष पर दबाव बनाए उसमें कुछ भी गलत नहीं है । लेकिन  ये जानते हुए भी कि वह अल्पमत में है और सत्ता पक्ष का एक भी निर्वाचित सदस्य  उसके साथ आने तैयार नहीं है , तब बिना ठोस आधार के महापौर के चुनाव में रुकावट पैदा करने से दिल्ली के मतदाताओं को  दो माह तक महापौर से वंचित रहना पड़ा। उसके बाद स्थायी समिति के चुनाव में भी हंगामा और मारपीट की परिस्थिति उत्पन्न करना अच्छा नहीं है। आम आदमी पार्टी दूध की धुली है और उसके सारे व्यवहार लोकतंत्र की कसौटी पर खरे साबित हुए ये कहना तो सही नहीं है किंतु दिल्ली की जनता ने उसे लगातार दो बार विधानसभा में भारी बहुमत दिया तो लोकसभा में बुरी तरह से परास्त भी किया। इससे ये एहसास होता है कि राष्ट्रीय राजधानी के मतदाता एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार से संतुष्ट हैं वहीं उन्होंने देश की सत्ता चलाने के लिए भारतीय जनता पार्टी को उपयुक्त समझा। इसी तरह 2015 में आम आदमी पार्टी को प्रदेश की सत्ता सौंपने के बावजूद 2017 में तीनों नगर निगमों में भाजपा को बहुमत प्रदान कर दिया। इस बार तीनों को मिलाकर एक नगर निगम बनाकर चुनाव हुए जिसमें भाजपा से छीनकर जनता ने आम आदमी पार्टी को बहुमत दे दिया। हालांकि वह विधानसभा चुनाव जैसा भारी भरकम न होकर काम चलाऊ ही है जिससे आम  आदमी पार्टी का सिर भी न चढ़े। दरअसल अरविंद केजरीवाल ये दावा कर रहे थे कि भाजपा को 20 सीटें भी मिल जाएं तो बहुत होगा किंतु  उनकी पार्टी जहां 134 सीटें जीत सकी वहीं भाजपा को 106 सीटें मिलने से मजबूत विपक्ष की स्थिति बन गई । कांग्रेस के 9 और 3 निर्दलीय पार्षद जीते। इस प्रकार मतदाताओं ने विधानसभा के बाद आम आदमी पार्टी को नगर निगम भी सौंपने का फैसला किया किंतु भाजपा को  100 से अधिक सीटें देते हुए  विपक्ष को भी मज़बूत बना दिया। अब इसके बाद तोड़फोड़ के जरिए बहुमत हासिल करने और महापौर के चुनाव को रोकने के लिए उठाए गए कदम रचनात्मक विपक्ष की भूमिका के मद्देनजर किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है । जब ऐसी ही हरकत विपक्ष संसद में करता है तो भाजपा उसकी निन्दा करती है किंतु जहां उसे विपक्ष में बैठना होता है वहां उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करने में वह नहीं  झिझकती । आम आदमी पार्टी को भाजपा अपने लिए चुनौती मान रही है किंतु बेहतर होगा वह राजनीतिक और वैचारिक  तौर तरीके आजमाकर उसके विस्तार को रोकने का प्रयास करे। साथ ही उसे उन कमियों को  दूर करना होगा जिनकी वजह से दिल्ली के मतदाताओं  ने उसे दो बार विधानसभा और एक बार नगर निगम चुनाव में शिकस्त दी। राष्ट्रीय परिदृश्य पर निगाह डालें तो निश्चित रूप से भाजपा बहुत शक्तिशाली है लेकिन अनेक राज्यों में अभी भी वह उस तुलना में कमजोर है। जिन राज्यों में उसे लोकसभा चुनाव में भारी सफलता मिलती रही उनके  मतदाताओं ने प्रदेश की सत्ता किसी और पार्टी को दे दी तो इससे खीजने की बजाय आत्मावलोकन करना चाहिए। उस दृष्टि से दिल्ली नगर निगम में महापौर चुनाव हेतु अब तक का घटनाक्रम अच्छा संकेत नहीं है। जब नगर निगम में ये सब हो रहा है तब विधान सभा और संसद में होने वाले हंगामों को देखकर ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि सत्ता का नशा राजनीतिक दलों पर इस कदर तक चढ़ चुका है कि वे लोकतंत्र के मंदिर तक को अपवित्र करने में भी नहीं लजाते ।


रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 22 February 2023

बाइडन और पुतिन की जवाबी मिसाइलें यूक्रेन संकट के जारी रहने का संकेत



यूक्रेन पर रूस के हमले को एक साल बीतने आ गया। इस जंग के मुख्य प्रतिद्वंदी कहने को तो रूस और यूक्रेन हैं लेकिन शीघ्र ही समझ में आ गया था कि यूक्रेन ने रूस जैसी महाशक्ति से टकराने की हिम्मत अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले नाटो नामक संगठन के समर्थन से की थी। हालांकि यूक्रेन विधिवत नाटो से जुड़  पाता उसके पहले ही रूस ने अपनी धमकी को वास्तविकता में तब्दील कर दिया और पूरी तरह हमला बोलते हुए यूक्रेन में अपनी सेना और टैंक घुसा दिए। उस समय ऐसा लगा था कि युद्ध कुछ दिन में खत्म हो जाएगा लेकिन जल्द ही रूस  ये समझ गया कि  यूक्रेन की सेना ही नहीं बल्कि जनता भी मुकाबले के लिए तैयार है और यहीं से उसने अपनी रणनीति बदलते हुए हवाई हमलों का सहारा लिया। अब तक रूस ने  अनगिनत मिसाइलें दागकर यूक्रेन में बिजलीघरों, अस्पतालों , रिहायशी मकानों सहित इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ीं जन सुविधाओं को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।  वह दो सीमावर्ती प्रदेशों पर भी कब्जा करने में  सफल हो गया जिनमें उसके पाले हुए अलगाववादी पहले से ही आंदोलन चला रहे थे। वहां सेना भेजकर फर्जी जनमत संग्रह करवाते हुए उसने उन्हें अपने में मिला लिया लेकिन अब तक राजधानी कीव पहुंचने में वह नाकाम रहा है और यही उसके राष्ट्रपति पुतिन की खीझ का कारण है। इस युद्ध में अमेरिका या नाटो प्रत्यक्ष भले न कूदा हो किंतु उसने और उसके साथी पश्चिमी यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को युद्ध सामग्री के अलावा आर्थिक तौर पर भी भरपूर सहायता दी जिससे वह अब तक टिका हुआ है। हालांकि रूसी हमलों से पूरा देश खंडहर नजर आने लगा है लेकिन वहां के राष्ट्रपति जेलेंस्की के साहस को मूर्खता बताने वाले अब उनके हौसले की दाद दे रहे हैं। सबसे बड़ी बात यूक्रेन की जनता का उन्हें मिलने वाला समर्थन है। लेकिन जंग की वर्षगांठ के तीन दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन का पोलैंड होते हुए अचानक यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंचकर जेलेंस्की से गले मिलना युद्ध के लम्बा खिंचने का संकेत दे गया। बाइडन ने  साफ शब्दों में  यूक्रेन को नाटो देशों की सहायता मिलने का ऐलान करते हुए उसकी जनता की तारीफ कर डाली। युद्ध शुरू होने के कुछ समय बाद ये अटकलें लगने लगीं थी कि शायद यूक्रेन रूस के साथ समझौता कर लेगा जिसके अंतर्गत राष्ट्रपति पुतिन अपनी पसंद के व्यक्ति को वहां की सत्ता सौंप देंगे। ये अफवाह  भी उड़ी कि जेलेंस्की गुपचुप रूप से पोलैंड होते हुए अमेरिका की शरण में चले जाएंगे। लेकिन वे बातें हवा हवाई होकर रह गईं। बाइडन के कीव आने के दूसरे दिन ही पुतिन ने रूस की संसद को संबोधित करते हुए अमेरिका पर आरोप लगाया कि उसने एक स्थानीय समस्या को वैश्विक स्वरूप दे दिया । उन्होंने बातचीत करने में रुचि तो दिखाई किंतु लगे हाथ ये धमकी भी दे डाली कि वे किसी शर्त या दबाव में वार्ता के लिए तैयार नहीं हैं । पुतिन ने ये भी कहा कि अमेरिका उनके देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करना चाहता है जो उन्हें मंजूर नहीं होगा । उनके इस भाषण को बाइडन की कीव यात्रा का जवाब माना जा रहा है। दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी पोलैंड लौटकर पुतिन की आलोचना का कड़े शब्दों में जिस तरह जवाब दिया उसके बाद ये संभावना और मजबूत हो गई कि एक साल होने के बाद भी  युद्ध  समाप्त होने की बजाय और भीषण हो सकता है। ये भी सोचा जा सकता है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की का हौसला कमजोर पड़ने का एहसास होते ही बाइडन उनका साहस बढ़ाने कीव जा पहुंचे। असलियत जो भी हो लेकिन युद्ध जारी रहने से दुनिया की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। पश्चिमी यूरोप के देश कच्चे तेल के अलावा गैस की किल्लत से हलाकान हैं ।  यूक्रेन सूरजमुखी का सबसे बड़ा उत्पादक होने से उससे बनने वाले खाद्य तेल का संकट भी बढ़ रहा है। रूस और यूक्रेन दोनो गेंहू के बड़े निर्यातक हैं। रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों और यूक्रेन के युद्ध में उलझने से विश्व भर में गेंहू की कमी हो गई है। इन कारणों से जबर्दस्त उथल पुथल मची है जिसने अर्थव्यवस्था को भी अनिश्चितता में फंसा दिया है जो कोरोना से किसी तरह उबरने की स्थिति में आई ही थी। बीते कुछ दिनों में अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडन और उनके रूसी समकक्ष पुतिन के बीच जिस तरह से बयानबाजी हुई उसके बाद शांति स्थापना की कोशिशों को और धक्का पहुंचा है। सबसे अधिक निराश किया  संरासंघ ने जो मध्यस्थता करने की बजाय दूर से बैठा तमाशा देख रहा है । अब  बाइडन और पुतिन जिस अंदाज में जुबानी मिसाइलें छोड़ रहे हैं और यूक्रेन की मदद करने वाले देशों को रूस जिस तरह चेतावनी दे रहा है उससे लगता है एक साल पूरा होने के बावजूद जंग जारी रहेगी और ऐसा होने से वैश्विक शक्ति संतुलन और शांति के लिए बड़ा खतरा बना रहेगा।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 21 February 2023

नीतीश विपक्षी एकता के फेर में अपनी पार्टी ही तुड़वा बैठे



कुछ ही दिन पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ये बयान काफी  चर्चित हुआ था कि कांग्रेस साथ दे दे तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 100 सीटों पर सिमट जाएगी। इसके पहले नीतीश स्पष्ट कर चुके थे कि वे प्रधानमंत्री की दौड़ में नहीं हैं और राहुल गांधी के बन जाने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन उसके बाद वे ये कहते भी सुने गए कि विपक्ष गठबंधन कर चुनाव में उतरे और बहुमत आने के बाद प्रधानमंत्री का फैसला किया जाए। उनके इस पैंतरे से कांग्रेस को खटका हो गया और इसीलिए उसने अभी तक नीतीश के बयान पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त  नहीं की। असल में बाकी विपक्षी दलों में से राहुल की प्रधानमंत्री बनाने की आवाज नहीं उठने से कांग्रेस भी चौकन्नी है जिसे ये लगता था कि श्री गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद समूचा विपक्ष उनको अपना एकक्षत्र नेता स्वीकार कर लेगा। लेकिन द्रमुक को छोड़कर अन्य किसी गैर भाजपा दल ने इस बारे में कुछ भी कहने से परहेज कर रखा है। यहां तक कि नीतीश की सहयोगी लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद तक खुलकर कुछ नहीं बोल रही। विपक्षी गठबंधन और उसके नेतृत्व के मसले पर कांग्रेस अपने रायपुर अधिवेशन में संभवतः निर्णय लेगी या हो सकता है कुछ नेताओं को अन्य दलों से बात करने का दायित्व सौंपे। लेकिन इस बीच विपक्ष को एकजुट कर भाजपा को परास्त करने की मुहिम छेड़ने वाले नीतीश के घर में ही फूट पड़ गई और उनके निकट सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा ने कुछ दिनों तक नाराज बने रहने के बाद गत दिवस जनता दल (यू) छोड़कर राष्ट्रीय लोक जनता दल बनाने की घोषणा कर डाली। हालांकि श्री कुशवाहा इतने ताकतवर तो नहीं कहे जा सकते कि नीतीश की सरकार को खतरा पैदा कर सकें किंतु उनके सजातीय मतदाताओं पर उनका प्रभाव अवश्य है।इस झगड़े के पीछे जनता दल ( यू ) में उत्तराधिकार का मसला था। दरअसल उपेंद्र चाहते थे नीतीश उन्हें अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने का ऐलान करें किंतु  जब उन्होंने तेजस्वी यादव को अगला मुख्यमंत्री बनाने का बयान दिया तो वे रूष्ट हो गए और कई दिन चली तनातनी के बाद आखिरकार किनारा कर गए। उनके इस फैसले के बाद बिहार में एनडीए के फिर मजबूत होने की राह प्रशस्त हो गई है। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार चिराग पासवान और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी दोबारा भाजपा की गोद में जाने तैयार हैं। इस तरह बिहार से विपक्ष की एकता की बजाय बिखराव की शुरुवात हो गई। उ.प्र  में भी सपा ने अब तक राहुल को लेकर कोई आश्वासन नहीं दिया और बसपा भी एकला चलो की नीति पर है। सबसे बड़ी बात ममता बैनर्जी का इस महत्वपूर्ण मुद्दे से कन्नी काट जाना है। इस वर्ष जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें छत्तीसगढ़ और राजस्थान ही कांग्रेस शासित हैं। यदि उत्तर पूर्व के राज्य वह जीत जाए तो भी उसका राष्ट्रीय राजनीति पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऐसा लगता है विपक्षी दल उक्त दो राज्यों के परिणाम देखने के बाद ही ये तय करेंगे कि वे राहुल का नेतृत्व स्वीकार करें अथवा नहीं । यदि कांग्रेस छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सरकार बनाते हुए भाजपा से म.प्र भी छीनने में सफल हो जाती है तब ये अवधारणा मजबूत होगी कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद से कांग्रेस और विशेष रूप से राहुल का ग्राफ उठा है। अन्यथा क्षेत्रीय दल उससे दूरी बनाकर अपना जनाधार पुख्ता करने में लग जायेंगे। ऐसे में सबसे ज्यादा फजीहत होगी नीतीश कुमार की जो भाजपा से इतनी दूर निकल आए हैं कि एनडीए में वापसी लगभग नामुमकिन है वहीं उपेंद्र कुशवाहा के अलग हो जाने से वे और कमजोर हो चले हैं जिससे लालू प्रसाद और उनके बेटे उन पर हावी होने की कोशिश करते हुए इस बात का प्रयास करेंगे कि लोकसभा चुनाव के पहले ही उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में भेजकर राज्य की सत्ता पर काबिज हो जाएं। ये भी हो सकता है कि भाजपा महाराष्ट्र जैसा खेला करते हुए नीतीश को उद्धव ठाकरे वाली स्थिति में पहुंचा दे। बहरहाल आज की स्थिति में नीतीश की स्थिति बहुत ही नाजुक हो गई है। चौबे जी छब्बे बनने चले और दुबे बन गए वाली कहावत उन पर चरितार्थ हो रही है।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 20 February 2023

भारत से रिश्ते सुधारने में ही पाकिस्तान का कल्याण है



पाकिस्तान से आ रही खबरों पर आम भारतीय का खुश होना स्वाभाविक है। इसकी वजह उसका जन्म से आज तक का आचरण है। बीते 75 साल में इस पड़ोसी देश ने भारत के साथ  नफरत , धोखा और दुश्मनी का भाव ही प्रदर्शित किया। यदि इसके हुक्मरान सहअस्तित्व की भावना को लेकर चलते तो दोनों देश मिलकर एशिया में चीन की टक्कर की महाशक्ति बन सकते थे। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है बांग्ला देश जिसने महज 51 साल के भीतर ही अपनी आर्थिक स्थिति में आश्चर्यजनक सुधार करते हुए निर्यात के जरिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार को लबालब कर लिया । 1971 में अस्तित्व में आते समय वह गरीब देशों में शुमार होता था किंतु इस्लामिक देश होते हुए भी उसने आधुनिकता को प्रश्रय दिया। हालांकि वहां भी भारत विरोधी सत्ता बनी और मुस्लिम कट्टरता भी कम नहीं है जिसका प्रमाण हिंदू मंदिरों पर आए दिन होने वाले हमले हैं लेकिन भारत के साथ सीमा एवं अन्य विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने की उसकी नीति ने युद्ध की स्थित नहीं आने दी। वहां के शासक और सेना दोनों इस बात को समझ चुके हैं कि अव्वल तो वे भारत की सैन्य शक्ति के सामने पिद्दी साबित होंगे और दूसरा ये कि हथियारों की होड़ में शामिल होने की बजाय आर्थिक विकास पर ध्यान दिया जावे। बांग्ला देश में भी शुरुआती दौर में पाकिस्तान की तरह से ही सेना द्वारा तख्ता पलटने की कार्रवाई हुई। और सैनिक तानाशाह सत्ता पर काबिज हुए। लेकिन अंततः देश ने लोकतांत्रिक पद्धति को ही प्राथमिकता दी जिसका सुपरिणाम राजनीतिक स्थिरता और भारत के साथ मधुर संबंधों के रूप में देखने मिला। इसके ठीक विपरीत पाकिस्तान ने शुरू से ही भारत को शत्रु मानकर हमलावर रुख अपनाया। 1948 में जम्मू कश्मीर के तत्कालीन महाराजा की अदूरदर्शिता के कारण  भले ही कश्मीर के कुछ हिस्से को हड़पने में वह सफल हो गया किंतु उसके बाद उसने जब भी युद्ध की स्थिति पैदा की उसे जबर्दस्त पराजय के साथ आर्थिक और कूटनीतिक क्षति हुई। और तब उसने आतंकवाद का सहारा लेते हुए भारत को अस्थिर करने का प्रयास किया किंतु इसमें भी वह असफल रहा । उल्टे उसकी आंतरिक हालत बिगड़ने लगी। पहले वहां के सत्ता प्रतिष्ठान पर सेना का दबाव रहता था किंतु बीते तीन दशकों से आतंकवादी संगठन भी सेना की तरह से ही वहां की सरकार पर दबाव बनाने लगे हैं। सैन्य तैयारियों और आतंकवाद को पालने पोसने के फेर में पाकिस्तान का खजाना खाली होता गया। कभी अमेरिका और ब्रिटेन तो कभी सऊदी अरब उसे खैरात रूपी सहारा देते रहे। बाद में चीन सामने आया जिसने उसे कर्ज से लाद दिया। आज की स्थिति में पाकिस्तान कंगाली की हद तक आ पहुंचा है। अमेरिका और सऊदी अरब ने हाथ खींच लिया है। चीन कह रहा है पिछला कर्ज अदा किए बिना नया नहीं देंगे । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जिस तरह की शर्तें रख रहा है वे शर्मनाक हैं। पाकिस्तानी मुद्रा बुरी तरह लड़खड़ा चुकी है। पेट्रोल 250 रु.प्रति लीटर है। आटा , सब्जियां , फल , दवाइयां सभी की महंगाई आसमान छू रही है। घरेलू उत्पादन न के बराबर है। विदेशी मुद्रा का भंडार केवल तीन सप्ताह का आयात बिल चुकाने लायक बचा है। कर्ज का आंकड़ा सकल घरेलू उत्पादन के 80 फीसदी तक पहुंचने से  चिंता का माहौल है। आम जनता की जो भावनाएं सोशल मीडिया के जरिए पता चलती हैं उनके अनुसार नई पीढ़ी के जो लोग शिक्षित हैं उनमें ज्यादातर भारत के प्रति प्रशंसा का भाव रखते हुए उसकी प्रगति से प्रभावित हैं। यहां तक कि वे बांग्ला देश से  तुलना करने पर अपने देश को लेकर शर्म महसूस करते हैं। पाकिस्तान के बुद्धिजीवी खुलकर  ये कहने लगे हैं कि भारत विरोध के नाम जनता का भावनात्मक शोषण होता रहा। कश्मीर विवाद से पिंड छुड़ाने की बात भी अनेक लोग करते सुने जा सकते हैं। लेकिन इन जनभावनाओं से वहां के राजनेता और फौजी अधिकतर असहमत हैं । हाल ही में प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने भारत से बातचीत की इच्छा जताई किंतु उसके कुछ देर बाद ही कश्मीर का मसला उठाकर पीछे हट गए। भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार रुका हुआ है। लेकिन भारतीय वस्तुएं विशेष रूप से सौंदर्य प्रसाधन और दवाएं दुबई और अफगानिस्तान के रास्ते वहां आकर बिकती हैं जिससे दाम बढ़ जाते हैं। पाकिस्तानी व्यापारी भी भारत से सीधे व्यापार के पक्षधर हैं। मौजूदा स्थिति में यदि पाकिस्तान भारत से रिश्ते सुधारकर सीमा पर तनाव पैदा करना और आतंकवाद को बढ़ावा देना बंद कर दे तो उसकी आंतरिक स्थिति बिगड़ने से बच सकती है। आटा और सब्जियां उसे कम कीमत पर हासिल होने से अर्थव्यवस्था को टेका लग सकता है। दोनों देशों के बीच पर्यटन की भी असीम संभावनाएं हैं। लेकिन ये सब तभी हो सकता है जब  पाकिस्तान के हुक्मरान भारत के प्रति शत्रुता का भाव त्यागकर द्विपक्षीय हितों की चिंता करें। पाकिस्तान जिस हालत में है यदि ज्यादा दिन ऐसा चला तब उसके और टुकड़े होना मुमकिन है क्योंकि अब पाक अधिकृत कश्मीर के साथ ही बलूचिस्तान और पश्चिमी सीमा पर अफगानिस्तान से सटे इलाके उससे अलग होने छटपटा रहे हैं। देर सवेर तो सिंध भी उसी रास्ते पर चल सकता है। ऐसे में शाहबाज  शरीफ को अभी भी अक्ल  आ जाए तो इस मुल्क की डूबती नाव किनारे लग सकती है । वरना तो उसका खुदा ही मालिक है।

रवीन्द्र वाजपेयी