Friday, 10 March 2023

आम आदमी पार्टी के सामने छवि और विश्वसनीयता का संकट



आम आदमी पार्टी जिस तेजी से राजनीतिक परिदृश्य पर उभरी उसके बाद ये कहा  जाने लगा था कि वह 2024 तक राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर स्थापित हो जायेगी | दिल्ली विधानसभा के दो चुनाव जिस धमाकेदार अंदाज में उसने जीते उसी की पुनरावृत्ति पंजाब में भी हुई जहां उसने कांग्रेस , अकाली दल और भाजपा सभी का सफाया कर दिया | हालाँकि गोवा , उत्तराखंड , हिमाचल और गुजरात के विधानसभा चुनाव उसके लिए निराशजनक रहे | बावजूद उसके दिल्ली नगर निगम पर कब्जा करने से उसका हौसला बेशक मजबूत हुआ है | और इसी वजह से पार्टी के सर्वेसर्वा  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कर्नाटक के दौरे पर चले गए और उसके बाद उनके छत्तीसगढ़ , म.प्र और राजस्थान प्रवास का कार्यक्रम भी बन गया है जहां  इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं | राष्ट्रीय पार्टी बनने की महत्वाकांक्षा श्री केजरीवाल के मन में पहले दिन से ही  थी और उसी के अंतर्गत उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव  में ही वाराणसी में नरेंद्र मोदी के मुकाबले खड़े होने का दुस्साहस किया | यही नहीं पार्टी के संस्थापकों में रहे कवि कुमार विश्वास को अमेठी और योगेन्द्र यादव को भी  गुडगाँव से मैदान में उतार दिया | ये तीनों तो  चुनाव हार  गए लेकिन पंजाब में पार्टी के चार सदस्य जीतकर आये  जिनमें से एक भगवंत सिंह मान आजकल उस राज्य के मुख्यमंत्री हैं | उसके बाद श्री केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली की विधानसभा में  पार्टी को ऐतिहासिक बहुमत मिला | आम आदमी पार्टी का जन्म दिल्ली में अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल की मांग को लेकर किये गए 12 दिवसीय अनशन के बाद हुआ था | उसके मूलभूत आदर्शों में ईमानदारी , सादगी और  सेवा भाव थे | सत्ता में आने पर सरकारी वाहन , बंगला और वेतन आदि से परहेज की बात भी कही गयी | लेकिन  सरकार बनाते ही बतौर मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल और उनके मंत्रियों ने सारी  सुविधाएं प्राप्त कर लीं | विधायकों के वेतन - भत्ते बढ़ा देने  के साथ ही उनमें से अनेक को मंत्री का दर्जा देकर सत्ता का सुख प्रदान कर  दिया गया | इससे असंतोष फैला और जल्द ही संस्थापक सदस्य  शांति भूषण , प्रशांत  भूषण , कुमार विश्वास , योगेन्द्र यादव और डा. आनंद कुमार पार्टी से निकल गए या निक़ाल दिए गए | उसके राज्यसभा सदस्यों में से संजय सिंह और राघव चड्डा को छोड़ दें तो एक भी ऐसा नहीं है जो पार्टी के सिद्धांतों और आदर्शों के मापदंडों पर खरा उतरता हो | चंदे के बारे में जिस पारदर्शिता का उदाहरण  शुरुआती दौर में पेश किया गया वह  भी धीरे - धीरे हवा - हवाई होकर रह गया | 2014 में पंजाब की चार लोकसभा सीटें जीतने वाला करिश्मा 2019 में केवल भगवंत सिंह मान की एक सीट पर सिमट गया | और जब वे मुख्यमंत्री बने तब उनके द्वारा रिक्त की गयी संगरूर सीट पर भी अकाली दल ( अमृतसर ) के सिमरनजीत सिंह मान  जीत गए जो खालिस्तान समर्थक माने जाते हैं | इस तरह दो राज्यों में भारी बहुमत वाली सरकार चला रही आम आदमी पार्टी का लोकसभा में एक भी सदस्य नहीं है | दिल्ली की सातों सीटों पर भी वह बुरी तरह हारी | इस सबके बाद जब उसने राष्ट्रीय पार्टी के रूप में खुद को स्थापित करने का जो प्रयास किया उसमें उसकी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता का क्षरण होता चला  गया | धीरे – धीरे ये बात सामने आने लगी कि वह भी अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह सत्ता के मकड़जाल में फंसकर रह गयी है और उसके लिए वह किसी भी हद तक जाने तैयार है | पंजाब चुनाव में जब उस पर खालिस्तान समर्थकों से समर्थन लेने का आरोप लगा तब सहसा विश्वास नहीं हुआ किन्तु भगवंत सिंह मान के मुख्यमंत्री बनते ही पंजाब में नब्बे के दशक वाले हालात नजर आने लगे हैं | मुफ्त बिजली और पानी के आश्वासन खजाने के खाली होने से पूरे नहीं हो पा रहे | दिल्ली में भी बिजली की  सब्सिडी घटाने का प्रस्ताव है | जिन मोहल्ला क्लीनिक  और सरकारी विद्यालयों का गुणगान पूरे देश में किया जाता है वे भी अव्यवस्था के  शिकार हो रहे हैं | दिल्ली और पंजाब के मुख्यमंत्री अपने राज्यों की समस्याएँ हल करने की बजाय दूसरे राज्यों  में सरकार बनाने के लिए घूम रहे हैं | इसी बीच दिल्ली का शराब घोटाला उभरकर सामने आ गया जिसमें आम आदमी पार्टी में दूसरे नम्बर की हैसियत रखने वाले उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया गिरफ्तार कर  लिए गए | और उन पर सीबीआई और ईडी दोनों ने शिकंजा कस दिया है | भले ही श्री  केजरीवाल और उनकी पार्टी के अन्य नेता कुछ भी कहें  लेकिन जिस तरह की जानकारी  सामने आ रही है उससे लगता है कि बिना आग लगे धुंआ नहीं निकलता | हालाँकि इस मामले में अंतिम निर्णय तो अदालत करेगी किन्तु इस तरह के घोटालों से किसी भी पार्टी या नेता की छवि और  विश्वसनीयता को होने वाला  नुकसान  दूरगामी असर वाला होता है | और कोई पार्टी होती तो इतनी हायतौबा नहीं मचती लेकिन जो पार्टी स्वयं को गंगा की तरह पवित्र मानने का दावा करती थी जब  उसके दामन पर इस तरह के छींटे पड़ते हैं तब आम जनता द्वारा लगाई  गयी उम्मीदें टूटती हैं | बीते कुछ दिनों में इस घोटाले के बारे में जो कुछ भी जानकारी आई है उसके बाद आम आदमी पार्टी के सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता है | वैसे भी आन्दोलन से निकली राजीतिक पार्टियों की आयु ज्यादा नहीं होती | आम आदमी पार्टी भी उसी दिशा में बढ़ती दिख रही है |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 7 March 2023

विपक्षी गठबंधन मेंढ़क तोलने से भी कठिन काम




लोकसभा चुनाव के लिए एक साल ही बचा है | यद्यपि नई  सरकार का गठन 2024 की मई के अंतिम सप्ताह  में होगा लेकिन उसकी उठापटक शुरू हो चुकी है | भाजपा तो चुनाव को लेकर हर समय सक्रिय रहती है जिसमें  उसका  विशाल संगठनात्मक ढांचा मददगार बनता है | रास्वसंघ भी अदृश्य शक्ति के रूप में उसकी व्यूहरचना को मजबूती प्रदान करता है | एक समय था जब पार्टी उत्तर भारत और  सवर्ण जातियों तक ही सीमित  थी किन्तु नब्बे के दशक से उसका जो उत्थान शुरू हुआ वह 2014 में चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा | उसके बाद उसने अपने को राष्ट्रीय स्वरूप देने का अभियान चलाया | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का जो नारा उछाला उसका अभिप्राय भाजपा को राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित करना था | और ये कहना  गलत नहीं है कि उसने उस उद्देश्य को काफी हद तक पा लिया है | हालाँकि अभी भी कुछ राज्यों में सफलता उससे दूर है और पूर्वोत्तर के  कुछ राज्यों  में वह क्षेत्रीय दलों के साथ सत्ता में हिस्सेदार  है | पंजाब में भी अकाली दल के साथ रहने से उसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बन सका किन्तु अब वह अपना जनाधार बढ़ा रही है |  तमिलनाडु  में उसकी पकड़ न के बराबर है वहीं केरल में संघ का कार्य  फ़ैल जाने के बावजूद भाजपा अभी भी संघर्ष की स्थिति में  है | हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर वह सबसे ज्यादा सांसद और विधायकों के साथ कांग्रेस को बहुत पीछे छोड़ने में कामयाब हो गयी | परिणाम ये हुआ कि एक ज़माने में गैर कांग्रेसवाद के नाम पर विपक्षी गठबंधन बना करते थे लेकिन अब भाजपा के विरोध में विपक्षी पार्टियाँ एकजुट होने के लिए मजबूर हो गई हैं | यहाँ तक कि जो कांग्रेस विरोधी पार्टियों के साथ बैठने में संकोच  करती थी वही अब गठबंधन के लिए आतुर है | अन्य विपक्षी पार्टियाँ भी इस बात पर एकमत हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर को रोकने के लिए  एकजुट होना जरूरी है | कुछ नेता इसके लिए प्रयास भी कर रहे हैं | सबसे ताजा उदाहरण तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के जन्म दिवस पर चेन्नई  में हुआ जमावड़ा है | जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के अलावा फारुख अब्दुल्ला , तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव शामिल हुए | इन सभी  ने 2024 के लिए विपक्ष का गठबंधन बनाने पर जोर दिया | गौरतलब है राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के  श्रीनगर में समापन पर सभी विपक्षी दलों को न्यौता भेजा गया था लेकिन केवल  नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ही उसमें शरीक हुए | जिससे ये संकेत गया कि विपक्ष कांग्रेस को साथ तो रखना चाहता है लेकिन उसके झंडे तले आने को राजी नहीं  है | श्री गांधी की यात्रा में इसीलिये विपक्ष के इक्का – दुक्का नेताओं की ही उपस्थिति रही | इसका सबसे बड़ा कारण क्षेत्रीय दलों के कतिपय नेताओं की महत्वाकांक्षाएं हैं | मसलन ममता बैनर्जी द्वारा लोकसभा चुनाव में अकेले उतरने की घोषणा के साथ ही इस दावे को दोहराना कि भाजपा का मुकाबला वे ही कर सकती हैं |  हाल ही में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में कांग्रेस द्वारा  वामपंथी दलों के साथ गठबंधन से वे बहुत नाराज हैं | प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में भी दोनों एक साथ थे | तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. सी. राव भी कांग्रेस के विरोध का सामना अपने राज्य में करने के कारण उससे दूर रहना चाह रहे हैं | विपक्षी एकता में कांग्रेस के रोड़ा बनने का सबसे नया प्रमाण मिला दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के विरोध में  विपक्षी नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र पर कांग्रेस के किसी नेता के हस्ताक्षर नहीं होने से | इस पत्र पर शरद पवार ,  के.सी.राव ,  ममता बैनर्जी , अरविन्द केजरीवाल , भगवंत  सिंह मान , फारुख अब्दुल्ला , उद्धव ठाकरे , अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के हस्ताक्षर थे | इनमें श्री केजरीवाल और श्री मान को हटा दिया जावे तो महज 7 विपक्षी नेता ही बचते हैं | नीतीश कुमार  , स्टालिन , नवीन पटनायक और  जगनमोहन रेड्डी के अलावा वामपंथी  नेताओं ने भी इस पत्र से दूर रहना ही बेहतर समझा | हालाँकि सभी विपक्षी पार्टियों ने गिरफ्तारी का विरोध किया लेकिन कांग्रेस दोहरा रवैया अपना रही है | सीबीआई और ईडी के जरिये  विपक्षी नेताओं को परेशान करने को लेकर तो वह आवाज उठाने में संकोच नहीं करती किन्तु आम आदमी पार्टी से उसकी पटरी नहीं बैठती क्योंकि उसी की वजह से दिल्ली और पंजाब  में उसका सफाया हो गया | साथ ही वह गुजरात के बाद म.प्र , छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में भी अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है जिससे कांग्रेस को नुकसान होना तय है | आम आदमी पार्टी से कांग्रेस और गांधी परिवार इसलिए भी रुष्ट है क्योंकि जब नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल पर ईडी ने शिकंजा कसा तब उसने उसका विरोध  नहीं किया |  इस प्रकार ये बात सामने आती जा रही है कि बिना अपनी अगुआई के कांग्रेस किसी भी विपक्षी गठबंधन को स्वीकार नहीं करेगी | वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के भी अनेक छत्रप गठबंधन की इच्छा रखते हुए भी कांग्रेस के पीछे चलने की बजाय उसे अपने पीछे चलने के लिए मजबूर करना चाहते हैं | हालाँकि श्री सिसौदिया की गिरफ़्तारी के बाद श्री केजरीवाल की अकड़ कुछ कम तो हुई है लेकिन उनका कांग्रेस के साथ ही विपक्ष के अनेक  दलों से तालमेल  कठिन है | दरअसल  वे खुद को भाजपा के राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर देखते हैं जो अन्य पार्टियों को शायद ही रास आये | ऐसे में विपक्षी गठबंधन  मेंढ़क तौलने जैसे कवायद बनती जा रही है जिसमें एक को बिठाओ तो दूसरा कूद जाता है | संकट के समय में भी कांग्रेस द्वारा आम आदमी पार्टी से दूरी बनाये रखना विपक्षी एकता की कोशिशों को बाधित करने जैसा ही है |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 6 March 2023

पूर्वी भारत से मजदूरों का पलायन आखिर कब तक ?



तमिलनाडु के राजनेता सदैव संघीय  ढांचे का राग अलापते हुए अपने राज्य के हितों की  उपेक्षा करने का आरोप लगाते हैं | हिन्दी का विरोध इस राज्य की सभी क्षेत्रीय पार्टियों का सबसे बड़ा हथियार है | आधी सदी से भी ज्यादा दक्षिण का यह राज्य हिन्दी विरोध का गढ़ बन हुआ है | नौबत यहाँ तक आ गई कि गत वर्ष केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा सरकारी कामकाज में हिन्दी का उपयोग बढ़ाये जाने संबंधी बयान  पर द्रमुक सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डी. राजा ने यहाँ तक कह दिया कि  हिन्दी लादने की कोशिश किये  जाने पर उनका राज्य भारत संघ से अलग होने के बारे में सोच सकता है | इस बारे में याद रखने वाली बात है कि श्रीलंका में  तमिल उग्रवाद को द्रमुक का समर्थन था | और जिस तमिल इलम( देश ) की मांग श्रीलंका में लिट्टे नामक आतंकवादी संगठन कर रहा था उसमें तमिलनाडु भी शामिल था | वर्तमान मुख्यमंत्री स्टालिन के पिता स्व. करूणानिधि लिट्टे के समर्थक थे और इसीलिये राजीव गांधी की हत्या के बाद उनकी  सरकार बर्खास्त कर दी गई | वैसे आजकल कांग्रेस और द्रमुक का गठबंधन चल रहा है | हाल ही में स्टालिन के जन्मदिन पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के अलावा डा. फारुख अब्दुल्ला , तेजस्वी यादव और  अखिलेश यादव ने चेन्नई पहुंचकर 2024 में भाजपा के विरोध में गठबंधन बनाने की मुहिम शुरू की | लेकिन उसके बाद राज्य से बिहारी कामगारों के साथ मारपीट करते हुए वापस जाने का दबाव बनाये जाने की खबरें आने से तेजस्वी यादव और उनके साथ ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए बिहार की जनता को जवाब देना मुश्किल  हो गया | विधानसभा में तेजस्वी ने उन  खबरों को अफवाह बताकर आग में घी डाल दिया | विपक्ष के जबरदस्त दबाव और समाचार माध्यमों में बिहारी श्रमिकों के साथ  मारपीट के सचित्र समाचार आने के  बाद नीतीश सरकार ने सचिव स्तर के अधिकारी वास्तविकता का पता लगाने चेन्नई रवाना भी किये | उधर तमिलनाडु के श्रम मंत्री तथा गृह सचिव ने बिहारी मजदूरों की सुरक्षा का आश्वासन देते हुए उनसे वापस न जाने की अपील भी की | लेकिन जिस बड़ी संख्या में तमिलनाडु में रोजी रोटी कमाने गए श्रमिक अपनी गृहस्थी का सामान बेचकर अपने गाँव लौटे उसके बाद स्टालिन  सरकार के तमाम दावे असत्य साबित हो गए | उल्लेखनीय है तमिलनाडु के कारखानों में बिहार के कामगार बड़ी संख्या में बरसों से कार्यरत हैं | अचानक उनके प्रति स्थानीय लोगों का गुस्सा क्यों पनपा ये वाकई जाँच का विषय है | जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार मजदूरों को हिन्दी में बात करने पर पीटा जा रहा है | उनसे पूछा जाता है कि हिन्दी हो और हाँ कहने पर दुर्व्यवहार के साथ पिटाई की जाती है | ये भी कहा जाता है कि  अपने घर लौट जाओ क्योंकि तुम्हारे कारण हमारा रोजगार छिन रहा है |  इस बारे मे ये जानकारी भी मिली कि तमिलनाडु के युवकों के बीच ये धारणा फैलाई जा रही है कि उत्तर भारत से आने वाले श्रमिक वहां के कारखानों में कम मजदूरी पर भी ज्यादा काम करते हैं इसलिए उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है जिससे स्थानीय लोगों को बेरोजगारी का सामान करना पड़ रहा है | लेकिन इसी के साथ ये भी  पता चला है कि टेक्सटाइल उद्योग के बड़े गढ़ सिरपुर के कारखाना मालिक बिहारी मजदूरों को पलायन से रोक रहे हैं क्योंकि बीते कुछ दिनों में ही हजारों की संख्या में उनके लौट जाने से अनेक कारखाने बंद होने की स्थिति में आ गए और बाकी में उत्पादन घट गया | इस बारे में चिंता की बात ये है कि तमिलनाडु से उठी ये भावना यदि पड़ोसी कर्नाटक , केरल , आन्ध्र और तेलंगाना में भी फैली तब उत्तर भारतीय मजदूरों के सामने तो संकट  आयेगा ही उत्तर और  दक्षिण के बीच वैमनस्य का भाव उत्पन्न होगा जिसके दूरगामी नतीजे घातक होंगे | महाराष्ट्र में भी लम्बे समय तक ऐसा ही माहौल रहा और उत्तर भारतीयों के साथ  मारपीट की घटनाएँ होती रहीं | हालांकि तमिलनाडु में जो हो रहा है उसके पीछे हिन्दी को मुद्दा बनाये जाने से लगता है कि कोई न कोई राजनीतिक दल या नेता इस बवाल के पीछे है | लेकिन ये स्थिति बिहार और उ.प्र के लिए भी विचारणीय विषय होना चाहिए | सवाल ये नहीं है कि आज वहां किसकी सरकार है , बल्कि ये कि इन राज्यों से श्रमिकों का पलायन आखिर होता क्यों है ? इस बारे में जान लेना जरूरी है कि ब्रिटिश राज में मॉरीशस और फिजी के साथ ही कैरीबियन देशों में हजारों की संख्या में जो भारतीय मजदूर ले जाये गए थे उनमें से अधिकतर पूर्वी उ.प्र और बिहार के ही थे | उक्त देशों की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा आज भी उन्हीं भारतीय मजदूरों के वंशजों का  हैं जो  हिन्दू नामों के साथ ही हिन्दू धर्म और संस्कृति का पालन करते हैं | कुछ तो वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक बन गये | इससे स्पष्ट है कि उत्तर भारत के उक्त हिस्सों से श्रमिकों का पलायन नई बात नहीं है | लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी पूर्वी भारत में ये शर्मनाक स्थिति क्यों है ये केवल इन राज्यों के लिए नहीं अपितु पूरे देश के लिए विचारणीय प्रश्न है | छत्तीसगढ़ और म.प्र के बुंदेलखंड से भी श्रमिक अन्य राज्यों में ले जाये जाते हैं | पंजाब और कश्मीर में जब आतंकवाद चरम पर था तब भी वहां उक्त राज्यों से श्रमिक जाकर काम करते थे | इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि ये राज्य अपने मजदूरों को काम देने में विफल रहे हैं | हालाँकि विकास के दावे तो आजकल रोजाना सुनने मिलते हैं किन्तु उनके बाद भी कोई व्यक्ति रोजी रोटी की खातिर  अपना घर छोड़कर ऐसे स्थानों पर जाता है जहां की भाषा और खानपान सर्वथा भिन्न है तब उसकी मजबूरी समझी जा सकती है | तमिलनाडु में जो हो रहा है या अतीत में महाराष्ट्र में जो होता रहा उसकी कोई भी समझदार व्यक्ति प्रशंसा नहीं करेगा परन्तु ये भी स्वीकार करना होगा कि देश में विकास संबंधी विषमता के कारण ही इस तरह का पलायन और फिर संघर्ष की  स्थिति बन जाती है | हो सकता है तमिलनाड़ु में हालात फिर सामान्य हो जाएँ किन्तु समय आ गया है जब पिछड़े राज्यों के लोगों को वहीं रोजगार देने की व्यवस्था की जावे | आखिर  जब इन राज्यों  के नेताओं का पिछड़ापन दूर हो सकता है तो जनता का क्यों नहीं ?


रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 4 March 2023

बदलते ऋतु चक्र के खतरे से दुनिया को बचाने आगे आये भारत



इटली का वेनिस शहर अपनी विशिष्टता के  लिए पूरी दुनिया के पर्यटकों को लुभाता है | इस शहर में सड़कों की जगह नहरें हैं जिनमें आवगमन नावों के जरिये होता है | इटली जाने वाले अधिकांश सैलानी वेनिस जाये बिना नहीं रहते | लेकिन इस वर्ष वेनिस की नहरों में पानी सूख चुका है | यहाँ - वहां नावें बंधी देखी जा सकती हैं | तीन साल पहले भी ये स्थिति बनी थी | समुद्र के किनारे बसे वेनिस को इस साल कम बरसात के कारण ये  त्रासदी झेलनी पड़ रही है | विभिन्न टापुओं से बने वेनिस के किनारे का समुद्री जलस्तर नीचे चले जाने की वजह से संकट और गहरा गया है | मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यूरोप का ऋतु चक्र परिवर्तित हो रहा है  जिसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में वहां वर्षा और हिमपात घटता जाएगा | हाल ही में उत्तरी ध्रुव के बड़े हिमशैल के टूटकर समुद्र में आने की खबर से दुनिया भर में चिंता व्यक्त की गई थी | इसकी वजह पृथ्वी के तापमान में असामान्य वृद्धि  ( ग्लोबल वार्मिंग ) मानी जाती है | इस संकट से बचने के लिए विकसित  देशों द्वारा विकासशील देशों पर पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली गतिविधियाँ रोकने का दबाव डाला जाता है | अनेक अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ भी पर्यावरण संरक्षण हेतु हो चुकी हैं | लेकिन ये विकसित देश ही पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते  है | चूंकि इस बारे में बनने वाली जाँच टीमों में इन्हीं देशों का दबदबा है और सभी प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को भी यही नियंत्रित करते हैं इसलिए वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रदूषण में इनके योगदान की चर्चा कम होती है | जबकि सच्चाई ये है कि धरती , समुद्र और आकाश तीनों में आज जो प्रदूषण है उसके लिए विकसित देश ही  ज्यादा कसूरवार हैं | औद्योगिक विकास के साथ  तकनीक के उन्नयन और विलासितापूर्ण  जीवन शैली के कारण इनका आम नागरिक प्राकृतिक संसाधनों का जितनी बेरहमी से उपयोग करता है  उसकी वजह से ही पृथ्वी का तापमान बढ़ता चला जा रहा है | ये कहना भी गलत न होगा कि विकसित देशों के लोग सुविधाओं के गुलाम हो चुके हैं | वेनिस की नहरों का सूखना और  उत्तरी ध्रुव से विशाल हिम शैलों का टूटकर समुद्र में आ जाना उस भयावह दृश्य  का एहसास करवाता है जिसे भरतीय दर्शन में प्रलय कहा जाता है | भारत में भी इस साल समय से पहले ग्रीष्म ऋतु का आ धमकना भावी खतरों का संकेत है | यूरोप के साथ अमेरिका में भी गर्मियां अब पहले से ज्यादा  तपने लगी हैं | इस वजह से वहां पंखों का चलन बढ़ने की खबरें हैं | भारत  इस साल जी 20 समूह का अध्यक्ष है | इसके वार्षिक सम्मेलन की गतिविधियाँ शुरू हो गयी हैं | इसके पूर्व में भी अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और संरासंघ जैसे वैश्विक मंचों पर भारत द्वारा बदलते मौसम और उसके दुष्प्रभाव पर विश्व समुदाय को अपनी चिंताओं के साथ प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण हेतु भारत के प्राचीन ज्ञान के बारे में अवगत कराया जाता रहा है | ऐसे में जी 20 के अध्यक्ष के रूप में भारत को इस सम्मलेन में आर्थिक और राजनयिक मुद्दों के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के विषय को जोरदारी से उठाते हुए विकसित देशों के सामने विकासशील देशों की भावनाएं और समस्याओं को इस तरह पेश करना चाहिए जिससे कि उनकी मनमानी पर रोक लगाई जा सके | छोटे – छोटे देशों पर पर्यावरण को क्षति पहुँचाने का आरोप लगाने  वाले दुनिया के चौधरी जिस वासना के शिकार हैं वह आने वाले पीढ़ियों के लिए बड़ी त्रासदी को जन्म देने वाली है |  ऐसे में विकास की समूची अवधारणा को बदलना होगा | दुर्भाग्य से संरासंघ जैसे संगठन इस दिशा में अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन करने में विफल रहे हैं | ये देखते हुए भारत को इस मुहिम का नेतृत्व करना चाहिए क्योंकि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में वह ऐसा देश बन चुका है जो विकसित और विकासशील देशों के बीच सेतु का काम कर सकता है | सबसे बड़ी बात ये है कि भारत की छवि एक ईमानदार और जिम्मेदार देश के तौर पर कायम हो चुकी है ,जिसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है और जो शीत युद्ध रूपी गुटबाजी  से दूर रचनात्मक सोच के साथ विश्व बिरादरी में निरन्तर अपनी साख  और धाक  बनाये हुए है | आने वाली गर्मियाँ हमारे देश को जो नया अनुभव देंगी उनके आधार भविष्य की मौसम संबंधी नीति तय करने में भारत दुनिया का नेतृत्व कर सकता है | कोरोना और यूक्रेन संकट में उसकी  निर्णय और नेतृत्व क्षमता शानदार तरीके से उजागर हुई है |

रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 March 2023

पूर्वोत्तर के नतीजे : छोटे राज्यों से बड़ा राजनीतिक सन्देश



तीन पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणाम भले ही राष्ट्रीय राजनीति को गहराई तक प्रभावित न करते हों लेकिन संचार क्रांति के इस दौर में देश के किसी भी कोने में होने वाली छोटी - बड़ी घटना की जानकारी सब दूर फ़ैल जाती है और तदनुसार उसका विश्लेषण भी होता है | उस दृष्टि से त्रिपुरा , नगालैंड और मेघालय विधानसभा चुनाव के जो नतीजे आये उनमें  न सिर्फ राजनीतिक दलों अपितु अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों की भी रूचि देखी गयी क्योंकि उत्तर पूर्व का क्षेत्र अब पहले जैसा  समस्याग्रस्त न रहते हुए विकास के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा  हैं | उच्च स्तरीय राजमार्गों सहित अधो संरचना के अन्य कार्य पूरे देश की तरह वहां भी तेजी से चलने की वजह से  अलगाववादी संगठन कमजोर हुए और मुख्यधारा की राजनीति ने अपने पैर जमाये हैं | हालाँकि कांग्रेस और वामपंथी दलों  की उपस्थिति इन राज्यों में पहले से थी और वे  सरकार  में भी रहे लेकिन  2014 में केंद्र  की सत्ता पर भाजपा के काबिज होने के बाद पूर्वोत्तर की सियासी तस्वीर बदलने लगी और भाजपा ने वहां अपनी उपस्थिति जोरशोर से दर्ज करवा दी | सबसे बड़ा चमत्कार हुआ त्रिपुरा में जो वामपंथी दलों का मजबूत गढ़ था | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर के लगातार दौरे करते हुए वहाँ के लोगों के मन में बैठी इस अवधारणा को काफी हद तक दूर करने में सफलता हासिल की कि वे उपेक्षित हैं | यही वजह रही कि पूर्वोत्तर के वे क्षेत्रीय दल जो भारतीय संघ से जुड़ने से परहेज करते थे भाजपा की  राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति आकर्षित हुए |त्रिपुरा में वामपंथ की  जड़ों को खोदना आसान न था | कांग्रेस तो  इसमें विफल साबित हुई ही , प. बंगाल से  साम्यवादियों को खदेड़ने वाली ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी इस राज्य में नाकाम रही  | लेकिन 2018 में भाजपा ने त्रिपुरा में तो इतिहास रचा ही किन्तु नगालैंड और मेघालय में भी वह क्षेत्रीय दलों के साथ सरकार बनाने में कामयाब हो गयी | इसके अलावा असम , मणिपुर और अरुणाचल में भी उसकी सत्ता है | जानकार इसके लिए मोदी - शाह की जोड़ी के साथ ही रास्वसंघ द्वारा पूर्वोत्तर के आदिवासी तबकों के बीच राष्ट्रवादी भावना के प्रसार  हेतु चलाये जा  रहे प्रकल्पों को श्रेय दे रहे हैं | संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के अथक प्रयासों का ही परिणाम है कि जो आदिवासी और अन्य जातीय कबीले अलगाववादियों के प्रभाव में भारत विरोधी हिंसक  गतिविधियों में लिप्त थे वे हथियार छोड़कर यदि मुख्यधारा में आये तो ये बड़ी उपलब्धि रही जिसके लिए केंद्र सरकार द्वारा  पूर्वोत्तर को विकास में समान  हिस्सा दिए जाने की नीति भी काफी हद तक सहायक बनी | इस बारे में ये याद रखने लायक है कि प्रधानमंत्री बनने के  पूर्व से ही डा.मनमोहन सिंह असम से राज्यसभा में आते रहे लेकिन वे भी इस अंचल से अलगाववादी ताकतों का हौसला ठंडा करने में विफल रहे | भाजपा की  सफलता इसलिए और मायने रखती है कि  पूर्वोत्तर के राज्यों में ईसाइयत का काफी दबदबा रहा है | इसके अलावा वहां के अनेक आदिवासी समुदाय भी अपने को हिन्दू नहीं मानते | कुछ जातियां तो अलग राष्ट्रीयता का राग अलापती रहीं | लेकिन धीरे – धीरे वहां का समूचा परिदृश्य बदलता लग रहा है | इसके कारण भारत का स्विट्जरलैंड कहे जाने वाले पूर्वोत्तर में पर्यटकों की संख्या में भी वृद्धि होने लगी है | इसलिए इन परिणामों को बजाय राजनीति के  राष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी देखना होगा  | कांग्रेस को इस बारे में चिंता और चिन्तन दोनों करना चाहिए कि क्या वजह है जिससे यहाँ के मतदाताओं का उससे मोहभंग होता जा रहा है | उसने वामपंथियों से जो गठबंधन किया वह भी काम नहीं आया और  तीनों राज्यों में उसकी दयनीय स्थिति बन गयी | लेकिन इसके लिए उसका शीर्ष नेतृत्व ही जिम्मेदार है जिसने इन चुनावों को हल्के में लिया और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को वैतरणी पार कराने वाली मान बैठा  | एक तरफ जहां प्रधानमंत्री , गृह मंत्री और रक्षा मंत्री सहित भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तीनों राज्यों में पार्टी की जीत के लिए प्रयास करते देखे गए वहीं कांग्रेस यात्रा की खुमारी में डूबी रही | ऐसे में ये मान लेना गलत न  होगा कि कांग्रेस में हौसले की कमी है | झटका तो तृणमूल कांग्रेस को भी लगा है जो सोचती थी कि बंगाल  जैसा जादू इन राज्यों में भी चला लेगी | हालाँकि ये नतीजे कर्नाटक , तेलंगाना , म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों पर कितना असर डालेंगे ये पक्के तौर पर कह पाना तो कठिन है किन्तु भाजपा का मनोबल इस बात से जरूर बढ़ा होगा कि वह तीनों राज्यों में सत्ता में वापसी कर सकी | इसके साथ ही जिस प्रकार तृणमूल कांग्रेस ने गत दिवस विपक्षी गठबंधन से अलग रहकर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर डाली उससे भी विपक्षी बिखराव का संकेत  मिल रहा है | सबसे बड़ी बात इन चुनाव परिणामों से ये निकलकर आई कि कांग्रेस विपक्षी गठबंधन की नेता बनने के लिए दबाव डालने की हैसियत खो बैठी है | छोटे छोटे राज्यों में उसका हाशिये पर सिमटता  जाना उसके कद को लगातार घटा रहा है | ऐसे में उ.प्र ,बिहार और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में जो क्षेत्रीय दल प्रभावशाली हैं वे उसे भला क्यों भाव देंगे ?

रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 2 March 2023

म.प्र का बजट : चुनाव पर नजर , नहीं लगा नया कर




बजट चाहे केंद्र का हो या राज्य का उस पर दो प्रतिकियाएँ एक जैसी आती हैं | मसलन सत्ता पक्ष के लिए बजट समाज के सभी वर्गों के लिए हितकारी होता है जबकि विपक्ष की नजर में  जन विरोधी और आश्वासनों का झुनझुना | गत दिवस म.प्र की शिवराज सरकार ने इस कार्यकाल का जो अंतिम बजट विधानसभा में पेश किया उसे लेकर भी ऐसी ही  बातें सुनी जा सकती हैं | प्रदेश भर से जो भी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं  वे भी राजनीतिक ध्रुवीकरण से प्रेरित हैं | एक वर्ग को बजट धरती पर स्वर्ग उतार लाने वाला लग रहा है  तो दूसरे  को आसमानी ख्वाब दिखाने वाला खोखला दस्तावेज | पहली बार डिजिटल तरीके से प्रस्तुत बजट में आने वाले विधानसभा चुनाव  की तैयारी साफ़ झलकती है | बजट के पहले ही लाड़ली बहना योजना के अंतर्गत महिलाओं को 1 हजार रु. प्रतिमाह देने के घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आधी आबादी को भाजपा के पक्ष में मोड़ने का जो ब्रह्मास्त्र चला उससे कांग्रेस किस हद तक चिंतित है इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उसके प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने सत्ता में आने पर इस राशि को 1500 रु. प्रतिमाह करने का वायदा उछाल दिया | लाड़ली लक्ष्मी योजना पहले से ही श्री चौहान की मामा छवि को लोकप्रिय बनाये हुए है | बजट में 12 वीं की परीक्षा में प्रथम श्रेणी  प्राप्त  करने वाली छात्राओं को ई स्कूटी देने का प्रस्ताव भी जबरदस्त चुनावी दांव है क्योंकि इनमें से ज्यादातर छात्राएं चुनाव तक मतदाता बन जायेंगी | ऐसा न होने पर भी कम से कम उनके परिजन तो भाजपा का समर्थन करेंगे ऐसा माना जा सकता है | बजट में किसानों के कर्ज  का ब्याज सरकार द्वारा भरे जाने का प्रावधान भी इस  समुदाय को लुभाने का प्रयास है | प्रदेश में सड़कों , फ्लायओवर , पुल सहित प्रतिभा विकास केंद्र खोलने जैसे निर्णयों के साथ ही 1 लाख नौकरियां देने का वायदा भी है | हालाँकि म.प्र की  वित्तीय  स्थिति अच्छी होने का दावा करने के बावजूद राज्य सरकार पेट्रोल और डीजल पर वैट घटाने का साहस नहीं कर पा रही | इसी तरह  सरकारी कर्मचारियों को भत्ता देने के मामले में उदारता बरतने के बावजूद पुरानी पेंशन योजना के बारे में चूंकि भाजपा की केन्द्रीय नीति अनुमति नहीं देती इसलिए म.प्र में उसका आश्वासन दिए जाने से वह बची | लेकिन कांग्रेस ने हिमाचल में इस हथियार का चूंकि सफल प्रयोग किया और छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में उसे लागू भी कर दिया इसलिए म.प्र के चुनाव में भी वह  इस कार्ड को चलेगी | यही देखते हुए शिवराज सरकार ने बजट में महिलाओं और पहली  बार मतदान करने वाली युवतियों को लुभाने का प्रयास किया है | ये भी  सुनने में आया है कि भाजपा ने अपने संगठन के जरिये महिलाओं को प्रति माह दिए जाने वाले 1 हजार रु. के अनुदान हेतु आवेदन पत्र भरवाना ही शुरू कर दिया है | इसी तरह 12 वीं के परीक्षाफल भी चुनाव के काफी पहले आ जायेंगे जिसमें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण छात्राओं  को ई स्कूटी देने का कार्यक्रम भी सम्पन्न करवा लिया जावेगा | जहां तक सवाल नई नौकरियों का है तो यदि राज्य सरकार चुनाव आचार संहिता लागू होने के पहले नियुक्ति पत्र जारी कर सकी तब तो यह भाजपा के लिए तुरुप का पत्ता साबित होगा अन्यथा इसका नुकसान भी हो सकता है | इसमें दो राय नहीं कि प्रदेश में सड़कों और बिजली की स्थिति में काफी सुधार हुआ है लेकिन पेय जल का संकट अनेक हिस्सों में समस्या बना हुआ है | केंद्र सरकार की अटल जल योजना पर काम हो तो रहा है लेकिन रफ़्तार बहुत धीमी है | वैसे एक बात की तारीफ़ तो की ही जायेगी कि इस बजट में वित्त मंत्री ने नया कर लगाने से परहेज किया | जिससे ये आशंका बढ़ गयी है कि सरकार को और कर्ज लेना पड़ेगा जो रिजर्व बैंक द्वारा स्वीकृत सीमा से थोड़ा सा ही कम है | राज्य के मेडीकल कालेजों में एमबीबीएस और  एमडी / एमएस की सीटें बढ़ाये जाने का प्रस्ताव अच्छा है | लेकिन नये मेडिकल कालेजों में शिक्षकों की कमी चिंता का विषय बनी रहेगी | वैसे भी शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट में और ध्यान दिए जाने की अपेक्षा है | बावजूद इस सबके चुनावी साल में ऐसे ही बजट की उम्मीद की जा सकती थी | वित्तमंत्री ने दरियादिली दिखाई जरूर लेकिन हाथ भी खींचकर रखा जिससे पता चलता है सरकार उदारता के बावजूद खजाना लुटाने का साहस नहीं दिखा पाई | हालाँकि आजकल बजट अर्थशास्त्र की बजाय राजनीति शास्त्र से प्रेरित और प्रभावित होते हैं | इसलिए सरकार किसी की भी हो वह वित्तीय स्थिति की बजाय सियासी गुणा - भाग  पर ज्यादा ध्यान देती है | ऐसे में  हो सकता है पेट्रोल – डीजल सस्ता करने का फैसला चुनाव के पहले किया जावे | ये भी सुनने में आ रहा है कि केंद्र सरकार तीन पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणाम देखने के बाद कर्नाटक , छत्तीसगढ़ , राजस्थान और म.प्र के मुकाबले की दृष्टि से पेट्रोल और डीजल सस्ता करने का फैसला ले सकती है  जिसके परिप्रेक्ष्य में राज्यों को भी वैट घटाना होगा | ये भी हो सकता है कि पेट्रोल, डीजल  को भी जीएसटी के तहत लाकर उनकी कीमतें घटाकर विपक्ष को पटकनी दे दी जाए | यही सोचकर शायद मुख्यमंत्री श्री चौहान की सरकार  ने बजट में इन चीजों के बारे में किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी | बहरहाल ये बजट चूंकि  चुनाव को  देखते हुए बनाया गया है इसलिए अपने मकसद में सफल नजर आता है |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 1 March 2023

सिसौदिया दोषी निकले तो केजरीवाल भी नहीं बचने वाले



मनीष सिसौदिया को जमानत मिलेगी या वे लम्बे समय तक  सीबीआई की गिरफ्त में रहेंगे ये सवाल फ़िलहाल अनिश्चितता के घेरे में है | दिल्ली के  घटनाक्रम  पर नजर रख रहे राजनीतिक पंडितों का मानना है कि सीबीआई ने श्री सिसौदिया के विरुद्ध काफ़ी दस्तावेज जुटाए हैं और ये भी कि अभी उन पर ईडी द्वारा भी शिकंजा कसा  जायेगा | गत दिवस जैसे ही सर्वोच्च न्यायालय ने  जमानत देने से इंकार करते हुए उच्च न्यायालय जाने की सलाह दी उसके बाद ही देर शाम उपमुख्यमंत्री के साथ ही बीते 9 महीनों से जेल में बंद मंत्री सत्येन्द्र जैन का इस्तीफा स्वीकार किये जाने की खबर आ गई | कहा जा रहा है कि दोनों ही इस्तीफे मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के पास पहले से ही रखे थे  | ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक  रूप से उठ खड़ा हुआ कि गत वर्ष 30 मई को गिरफ्तार किये गए मंत्री श्री जैन से त्यागपत्र अब तक क्यों नहीं  दिलवाया गया जबकि  श्री सिसौदिया को गिरफ्तारी के दो दिन बाद ही मंत्री पद  छोड़ना पड़ गया | इसके पीछे जो कारण बताया जा रहा है वह ये कि श्री जैन के पास जो विभाग थे वे भी श्री सिसौदिया को दिए जाने के बाद वे 18 विभागों को  देख रहे थे | उनके गिरफ्तार होने के बाद केजरीवाल मंत्रीमंडल में केवल 4 सदस्य बचे जिससे सरकार का कार्य प्रभावित होने लगा | नियमानुसार केवल 6 मंत्री ही हो सकते हैं | ऐसे में त्यागपत्र देने वाले मंत्रियों की जगह दो नए मंत्री बनाकर काम चलाया जायेगा | लेकिन इस सबके कारण न  सिर्फ मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल बल्कि आम आदमी पार्टी की साख को भी बड़ा धक्का लगा है | कहाँ तो पंजाब में सरकार बनाने के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर अपने पैर जमाने की कार्ययोजना पर आगे बढ़ रही थी और कहाँ दिल्ली और पंजाब दोनों में उसकी  साख और क्षमता सवालों के घेरे में आ गयी  है | भ्रष्टाचार के विरूद्ध अन्ना  हजारे के लोकपाल आन्दोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी का उदय जिस शानदार अंदाज में हुआ वह किसी आश्चर्य से कम न था | 2014 की मोदी लहर को महज एक साल के भीतर केजरीवाल के करिश्मे ने रोका वह मामूली बात नहीं थी | हालाँकि  नगर निगम चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में वह कुछ ख़ास न कर पाई लेकिन उसके बाद विधानसभा चुनाव और हाल ही में हुए नगर निगम के चुनाव में मिली जीत ने  दिल्ली को आम आदमी पार्टी का अभेद्य दुर्ग बना दिया | लेकिन ये बात भी सही है कि भ्रष्टाचार के आरोप लगातार केजरीवाल सरकार पर लगते रहे | उसी के साथ अब पंजाब सरकार के राज में जिस तरह से खालिस्तान समर्थक उग्रवादी तत्व सिर उठाने लगे हैं  उससे भी पार्टी की छवि और क्षमता पर संदेह बढ़ने लगा है | राजनीति के जानकारों के अनुसार श्री केजरीवाल राष्ट्रीय नेता बनने की जल्दबाजी  में वही सब करने पर मजबूर हो गये हैं जो अन्य राजनीतिक दल करते  हैं | इसी वजह से पार्टी  के संस्थापकों में से  अनेक उनका साथ छोडकर जा चुके हैं | केवल श्री सिसौदिया ही एक चेहरा हैं जो उनके विकल्प कहें या विश्वासपात्र के रूप में जाने जाते थे और बतौर शिक्षा मंत्री उन्होंने दिल्ली में सरकारी  शालाओं का जिस तरह से गुणवत्तापूर्ण उन्नयन किया उसकी देश के बाहर भी प्रशंसा हुई | मुख्यमंत्री एवं संजय सिंह जैसे नेताओं की तुलना में मनीष काफी शांत नजर आते हैं | ऐसे में सवाल है कि अपने पास कोई मंत्रालय न रखने का जो निर्णय श्री केजरीवाल ने लिया  उसके पीछे शायद  अपनी छवि बनाये रखते हुए मुसीबत आने पर अपने साथियों की बलि चढ़ा देने की सोच ही रही होगी | आम आदमी पार्टी को महीनों से  ये अंदेशा था कि सीबीआई उपमुख्यमंत्री के गिरेबान पर हाथ डालेगी | खुद मनीष भी इस बात को सार्वजानिक तौर पर कह चुके थे | जिस आबकारी नीति को लेकर ये बवाल हुआ यदि वह सही थी तब केजरीवाल सरकार  ने उसे वापिस क्यों लिया इस प्रश्न का कोई जवाब न दिया जाना सरकार के अपराध बोध का ही परिचायक था | आम आदमी पार्टी को श्री  सिसौदिया की गिरफ्तारी पर यूँ तो विपक्षी दलों की तरफ से जोरदार  समर्थन मिला लेकिन कांग्रेस इस मामले में भी दुविधा का शिकार होकर विभाजित हो गयी | राहुल गांधी तो लंदन में हैं किन्तु अशोक गहलोत , शशि थरूर ने जहां  केंद्र सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाया वहीं दिल्ली की अलका लाम्बा और अजय माकन ने इसे भ्रष्टाचार का मामला बताते हुए आम आदमी पार्टी की तीखी आलोचना कर डाली | इस मामले के बाद अरविन्द केजरीवाल की एकला चलो नीति को भी धक्का लग सकता है और बड़ी बात नहीं उनको अपनी ईमानदारी का अहंकार छोड़कर उन्हीं दलों और नेताओं के साथ गठबंधन करना पड़ जाए जो उनके द्वारा जारी भ्रष्ट नेताओं की सूची में शामिल थे | बहरहाल आम आदमी पार्टी और मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल के लिए मौजूदा स्थिति बहुत ही कठिन है | यदि मनीष भी सत्येन्द्र की तरह लम्बे समय तक हिरासत में रहे तब इस्तीफ़े का दबाव अरविन्द पर भी पड़ेगा | दिल्ली में ये चर्चा भी है कि मुख्यमंत्री स्वयं श्री सिसौदिया से छुटकारा पाना चाहते थे | सच्चाई जो भी हो लेकिन इस घटनाचक्र से  मुख्यमंत्री चाहकर भी  भी पाक - साफ़ नहीं निकल सकेंगे क्योंकि श्री सिसौदिया ने भ्रष्टाचार किया हो और श्री केजरीवाल को उसका पता न चले ये कोई नहीं मानेगा | और ऐसे में यदि सीबीआई के आरोप सही प्रमाणित  हो गये तब आम आदमी पार्टी के लिए वह डूब मरने वाली बात होगी | इससे ये विश्वास और प्रबल हो जाएगा कि आन्दोलन से निकली पार्टियाँ आख़िरकार अपने ही अंतर्विरोधों में फंसकर पतन के रास्ते पर चली जाती हैं | वैसे अब तक अन्ना  हजारे का मौन रहना भी चौंकाने वाला है |

रवीन्द्र वाजपेयी