Saturday, 18 March 2023

क्षेत्रीय दल बन रहे कांग्रेस के लिए मुसीबत



कांग्रेस  के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की  बहुचर्चित भारत जोड़ो यात्रा के पूर्ण होने के बाद ये माना जा रहा था कि इस यात्रा से उनका नया  अवतार हुआ है जो पूर्वापेक्षा ज्यादा परिपक्व , गंभीर और दायित्वबोध से परिपूर्ण है | मोदी विरोधी मीडिया विशेष रूप से यू ट्यूबर पत्रकारों ने तो उनमें भावी प्रधानमंत्री की छवि देखनी भी शुरू कर दी | यात्रा खत्म होने के बाद से कांग्रेस सुनियोजित तरीके से श्री गांधी को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने का प्रयास कर रही है | नागपुर में हुए कांग्रेस के 85 वें अधिवेशन में सोनिया गांधी ने राजनीति से सन्यास लेने का संकेत देने के साथ ही  उक्त यात्रा को राजनीति का टर्निंग प्वाइंट बताकर बाकी विपक्षी दलों को ये संकेत दे दिया कि अब उन्हें राहुल के नेतृत्व में ही कार्य करना होगा | सही मायनों में भारत  जोड़ो यात्रा का असली उद्देश्य था ही श्री गांधी को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र बिंदु में स्थापित करना, जिससे उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद हेतु नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में पेश किया जा सके | यात्रा के बाद कुछ समय तो उसका असर दिखा किन्तु जल्द ही विपक्षी दलों  ने इस बात का आकलन करना शुरू कर दिया कि कांग्रेस के साथ जाने में फायदा होगा या दूर रहने में | विशेष रूप से वे क्षेत्रीय दल जो  कांग्रेस से निकलकर बने या फिर उनके प्रभावक्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर है ,उसे किसी भी प्रकार से महत्व  देने तैयार नहीं हैं | यही वजह है कि शरद पवार जैसे नेता भी , जिसने महाराष्ट्र में कांग्रेस को शिवसेना  के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिये मजबूर कर दिया , कांग्रेस के नेतृत्व में चलने से बच रहे हैं | संसद में गौतम अडानी समूह को लेकर जो गतिरोध इस सत्र में बना हुआ है उसमें कांग्रेस के साथ एनसीपी , तृणमूल कांग्रेस , सपा , बीजद , वाईएसआर कांग्रेस , तेलुगुदेशम , बसपा जैसी पार्टियों के न आने से विपक्षी एकता का जैसा स्वरूप कांग्रेस चाहती है वह नहीं  बन पा रहा | इसका प्रत्यक्ष प्रमाण गत दिवस सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा कोलकाता में ममता बैनर्जी से मिलकर क्षेत्रीय दलों का भाजपा और कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाने की घोषणा से हुआ | भले ही अभी बाकी क्षेत्रीय दलों की सहमति नहीं मिल पाई किन्तु ममता और अखिलेश ही यदि कांग्रेस को किनारे करने आगे आये तो प.बंगाल और उ.प्र में लोकसभा की 125  सीटों पर वह लड़ाई में नजर आने लायक तक  नहीं रहेगी | और यही ममता चाहती रही हैं जिससे प्रधानमंत्री के लिए मुकाबला राहुल  बनाम  मोदी बनाने की कांग्रेस की सोच कारगर न  हो सके | संसद में जो क्षेत्रीय दल कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा बुलाई जा रही बैठकों से दूरी बनाये हुए हैं वे भी अपने फायदे के लिए सपा और तृणमूल द्वारा बनाये जा रहे तीसरे मोर्चे में आ सकते हैं | इस बारे में  उल्लेखनीय है कि उक्त दोनों नेता ये समझ गये हैं कि चुनाव पूर्व कांग्रेस के साथ गठबंधन से उसको  फायदा होगा क्योंकि वह उनके राज्यों में भी सीटें मांगेगी | लेकिन चुनाव बाद यदि किसी को बहुमत न  मिला तब 25 – 30 सांसदों वाले गुट के पास सत्ता की चाबी  होगी | जितने भी चुनाव सर्वे आ रहे हैं उनके अनुसार कांग्रेस किसी भी स्थिति में 100 का आंकडा छूने की स्थिति में नहीं है | और उससे कहीं ज्यादा ताकत क्षेत्रीय दलों के पास संयुक्त रूप से  रहेगी | जिससे भाजपा - कांग्रेस को पीछे छोड़कर ममता या वैसा ही अन्य कोई विपक्षी नेता प्रधानमंत्री बन सकेगा | देवगौड़ा और गुजराल जैसे प्रयोग को दोहराए जाने की सोच अखिलेश और ममता के मन में हैं | चाहते तो श्री पवार भी मन ही मन कुछ – कुछ ऐसा ही हैं परन्तु वे चुप रहकर काम करने वालों में से हैं | इसीलिये विपक्षी मोर्चे के सवाल पर उन्होंने ये प्रस्ताव दिया था कि जो विपक्षी पार्टी जहां ताकतवर है उसे उसके राज्य में  भाजपा से लड़ने दिया जाए | और चुनाव बाद आगे की राजनीति तय हो  | यद्यपि उनके सुझाव पर किसी ने भी प्रतिक्रया नहीं दी लेकिन इस सबसे एक बात साफ़ हो रही है कि भाजपा के विरोध में मोर्चा बनाने की बजाय कुछ विपक्षी दल कांग्रेस की राह में कांटे बिछाने सक्रिय हो उठे हैं | दरअसल 2017 में  कांग्रेस  के साथ  मिलकर उ.प्र विधानसभा चुनाव लड़ने का जो कटु अनुभव अखिलेश को है उसके  कारण वे राहुल के साथ खड़े होने राजी नहीं है | ममता भी इस बात से खार खाये बैठी हैं कि कांग्रेस उनके घोर शत्रु वामपंथियों के साथ प.बंगाल के साथ ही पूर्वोत्तर राज्यों में गठबंधन बनाये हुए है | ये सब देखते हुए  कहना पड़ रहा है कि श्री गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का क्या लाभ उन्हें या कांग्रेस को हुआ ये तो फिलहाल कहना मुश्किल है लेकिन इतना जरूर समझ में आने लगा है कि वह पूरे  विपक्ष को भाजपा के विरुद्ध जोड़ने में विफल साबित हो रही है | अखिलेश और ममता की जुगलबंदी से एक बात शीशे की तरह से साफ है कि क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व के लिये भाजपा से भयभीत तो हैं लेकिन वे कांग्रेस को भी दोबारा उभरने का अवसर भी नहीं देना चाह रहे |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 17 March 2023

संसद असफल रही तब जनता सड़क पर फैसले करेगी



संसद सोमवार तक के लिए स्थगित हो गयी | सता पक्ष की जिद हैं राहुल गांधी केम्ब्रिज में दिए गए भाषण के लिए माफी मांगें | कांग्रेस  इसके लिए साफ इंकार कर चुकी है | इसी के साथ राहुल ने लोकसभा में अपनी ब्रिटेन यात्रा के बारे में स्थिति स्पष्ट करने की इच्छा व्यक्त की है किन्तु उनके माफी नामे के बिना इसके लिए सत्ता पक्ष राजी नहीं है |  दूसरी तरफ अधिकांश विपक्ष इस बात के लिए अड़ा हुआ है कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट में गौतम अडानी की कंपनियों पर वित्तीय गड़बड़ियों के जो आरोप लगे हैं उनकी जाँच हेतु जेपीसी ( संयुक्त संसदीय समिति) का गठन किया जाए | इस बारे में सरकार का कहना है कि इस रिपोर्ट और अडानी समूह के शेयरों में हुई उथलपुथल से चूंकि उसका कोई लेना देना नहीं हैं लिहाजा जेपीसी की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती | इस खींचातानी में बजट सत्र के दूसरे चरण का पहला सप्ताह भी बिना विधायी कार्य किये खत्म हो गया | रोचक बात ये है कि कांग्रेस के साथ भी पूरा विपक्ष नहीं है | पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे  ने गत सप्ताह विपक्षी दलों की जो बैठकें बुलाईं उनमें चूंकि अनेक विपक्षी दल शामिल नहीं हुए इसलिए सत्ता पक्ष को ताकत मिल गयी | इसी तरह श्री खडगे के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों का जो मार्च ईडी मुख्यालय गया था उसमें भी  अनेक विपक्षी दिग्गज और उनके नेता नजर नहीं आये | लेकिन कांग्रेस को ये लग रहा है कि इस मुद्दे को लम्बा खींचा जाये जिससे अनेक राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव तक वह  भाजपा और प्रधानमंत्री को घेर सकें | हालाँकि इतने लम्बे समय तक उसे ज़िंदा रखना आसान नहीं होगा | और फिर हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद अब तक अडानी समूह ने पूंजी बाजार में अपने पैर फिर से ज़माने शुरू कर दिए हैं | लेकिन ऐसे मामलों में चूंकि राजनीतिक लाभ ज्यादा महत्वपूर्ण होता है लिहाजा कांग्रेस इस मुहिम को जारी रखने की हरसंभव कोशिश करती रहेगी | जहां तक सत्ता पक्ष का सवाल है तो भाजपा ने राहुल द्वारा  ब्रिटेन यात्रा के दौरान विभिन्न मंचों से जो भी बोला उसे देश और लोकतंत्र विरोधी बताकर उन पर माफी मांगने का दबाव बनाया जा रहा है | कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा अडानी विवाद से बचने के लिए ये दांव खेल रही है | श्री गांधी ने देश में लोकतंत्र की स्थिति पर जो आलोचनात्मक टिप्पणियाँ अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान कीं उनसे भाजपा को उनके विरुद्ध मोर्चा खोलने का अवसर मिल गया है | वहीं सदन में उनका माइक बंद किये जाने का आरोप लगाये जाने को संसद की मर्यादा भंग करना मानकर उनके विरुद्ध कार्रवाई की मांग भी सत्ता पक्ष उठा रहा है | श्री गांधी पर माफी मांगने के लिए दबाव बनाना अपनी जगह ठीक है लेकिन बेहतर होगा उन्हें सदन में उस बारे में अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए और उसके बाद सत्ता पक्ष उन पर कार्रवाई के बारे में सोचे | इस बारे में देखने वाली बात ये है कि अडानी मामलें में सरकार की तरफ से शुरुआत में वित्तमंत्री ने केवल इस आशय का बयान दिया था कि इस समूह को बैंकों और जीवन बीमा निगम से जितना भी ऋण दिया गया वह पूरी तरह से नियमानुसार था तथा  बैंक और बीमा निगम का निवेश पूरी तरह सुरक्षित है | इस बीच सर्वोच्च न्यायालय ने इस विवाद की जाँच हेतु अपनी ओर से एक समिति गठित कर  दी जिससे सरकार को जेपीसी की मांग को टालने का अवसर मिल गया | ज़ाहिर है दोनों तरफ से मोर्चे बंदी हो रही है | लेकिन जैसे संकेत हैं उनके अनुसार इसका  नतीजा कुछ नहीं निकलेगा | सरकार किसी दिन बहुमत के बल पर बजट सहित शेष लंबित विधेयक और  प्रस्ताव पारित करवा लेगी और सत्र समाप्त हो जाएगा | गंभीर मुद्दों पर बहस और ठोस निर्णय करने के लिए संसद का उपयोग करने की बजाय व्यर्थ के विवाद और छोटी – छोटी बातों का बतंगड़ बनाने का खेल चल रहा है | भले ही सबके माइक कार्य कर रहे हों लेकिन जिस तरह से होहल्ला मचता है उसमें कौन क्या बोल रहा है ये न तो सुनाई देता है और न ही समझ में आता है | ऐसे में चाहे प्रधानमंत्री बोलें या विपक्ष का कोई सांसद , उसे सुना ही नहीं जाएगा | संसद के दोनों सदनों की कार्रवाई का सीधा प्रसारण किया जाता है  | लेकिन उसे देखकर सांसदों के मानसिक स्तर और संसदीय परंपराओं के प्रति उनके मन में कितना सम्मान है इसका अंदाजा आसानी से हो जाता है | हालाँकि संसद के दोनों सदनों में ऐसे वरिष्ट सदस्य हैं जो दो दशकों से सांसद हैं | उनमें से बड़ी संख्या उन सदस्यों की भी है जिन्हें सत्ता और विपक्ष दोनों में रहने का पर्याप्त अनुभव है | अतीत में ये देखा गया है कि जब इस तरह के गतिरोध उत्पन्न होते और सदन लगातार बाधित होता तब दोनों पक्षों के वरिष्ट सदस्य अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए बीच का रास्ता निकाल लेते थे | दुर्भाग्य से आज जो भी वरिष्ट सांसद सत्ता और विपक्ष में हैं उनमें पार्टी लाइन से ऊपर उठकर लोकतंत्र की गरिमा बनाये रखने के  लिए प्रयास करने का साहस नहीं बचा | ये भी देखने मिल रहा है कि जिस  उच्च स्तर के निर्दलीय सांसद चुनकर आया करते थे वह दौर अब खत्म हो चुका है | बीते दो दशकों में अनेक ऐसे निर्दलीय लोकसभा और राज्यसभा में चुनकर आये जो या तो बाहुबली थे या धनबली | ऐसे लोगों ने ही  संसद की मान - मर्यादा को  तार – तार कर दिया | दुःख तो तब होता है जब गठबंधन राजनीति ऐसे लोगों को सिर पर बिठाने में संकोच नहीं करती | ये सब देखकर  संसद की गरिमा के बारे में चिंता होने लगती है | सवाल ये नहीं कि भविष्य में होने वाले चुनाव में कौन जीतेगा और कौन नहीं |  बल्कि देश के सामने सबसे गंभीर विचारणीय मुद्दा ये है कि संसद को आन्दोलन स्थल बनाने का ये चलन रुकेगा या नहीं ? यदि हमारे सांसद चाहे वे किसी भी पक्ष के हों , ये सोचकर  मदमस्त हैं कि वे इसी तरह से लोकतन्त्र का मजाक उड़ाते रहेंगे और जनता सब कुछ देखकर भी चुप बनी रहेगी तो वे गलत हैं | उनको ये जान  लेना चाहिए कि जिस दिन जनता का धैर्य टूट गया उस दिन संसद में  सांसदों की बजाय जनता नजर आयेगी | अपने पड़ोसी देशों में ऐसा हो भी चुका है | हालाँकि वह  बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा | लेकिन हालात उसी तरफ बढ़ते दिख रहे हैं क्योंकि  संसद यदि देश के बारे में फैसले करने में असफल रहेगी तब फिर जनता सड़क पर बैठकर संसद का काम करेगी | आखिरकार   सहने की भी हद होती है |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 16 March 2023

अडानी मुद्दे का हश्र भी राफेल खरीदी जैसा ही होने जा रहा



ऐसा लगता है गौतम अडानी के स्वामित्व वाले अडानी समूह पर अमेरिका के हिंडनबर्ग नामक संस्थान द्वारा जारी रिपोर्ट के बाद उठा तूफ़ान  कमजोर पड़ रहा है | भले ही कांग्रेस कुछ विपक्षी दलों के साथ इस मुद्दे को  संसद और उसके बाहर गर्म  रखने की कोशिश कर रही हैं लेकिन शेयर बाजार से आ रही खबरों से ये लगने लगा है कि अडानी समूह कुछ  समय तक लड़खड़ाने के बाद अब संभलने लगा है | जब उक्त  रिपोर्ट के आने के बाद पूरी दुनिया में इस समूह के शेयर औंधे मुंह गिर रहे थे तब भी गौतम ने ये भरोसा जताया था कि उनके पास उपलब्ध नगदी के बल पर वे इस संकट से निकल आयेंगे और निवेशकों का भरोसा पुनः जीत लेंगे | शुरुआत में लगा , वे झूठा दिलासा दे रहे हैं लेकिन इस समूह द्वारा अपने कुछ कर्जों का समय पूर्व भुगतान किये जाते ही उसकी साख लौटने लगी और वैश्विक क्रेडिट एजेंसियों ने अडानी की कंपनियों के बारे में जारी किये  गए नकारात्मक निर्देशों को वापस लेना  शुरू कर दिया | यही नहीं तो एक अप्रवासी भारतीय ने अडानी की  कंपनियों में अरबों रूपये का निवेश करते हुए पूंजी बाजार में इस समूह को जबर्दस्त सहारा दिया | और फिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाई गयी जांच समिति का जिस  प्रकार गौतम ने स्वागत किया उससे भी शेयर बाजार में उनके प्रति विश्वास लौटने लगा | हालाँकि अभी भी अडानी समूह हिंडनबर्ग रिपोर्ट के पहले वाली हैसियत से काफी पीछे है लेकिन गौतम दुनिया के धनाढ्यों की सूची में धरातल से उठकर खड़े होने की स्थिति में पहुँच रहे हैं | जो किसी चमत्कार से कम नहीं है | सबसे बड़ी बात ये हुई कि कांग्रेस की अडानी विरोधी मुहिम को न तो पूरे विपक्ष ने सहयोग दिया और न ही उद्योग जगत ने | आर्थिक जगत के विशेषज्ञ भी इसे बाजार की उठापटक मानकर संयम रखने की सलाह देने लगे | दरअसल हिंडनबर्ग की छवि  भी विघ्नसंतोषी की  है | इसलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अडानी समूह ने जल्दी ही वापसी कर ली | विभिन्न देशों में समूह द्वारा निवेशकों के बीच किए गए  रोड शो का भी सकारात्मक प्रभाव देखने मिल रहा है | भारतीय स्टेट बैंक और जीवन बीमा निगम द्वारा इस समूह में किये निवेश के कारण उनके डूब जाने की आशंका समय के साथ गलत साबित होने से भी अडानी विरोधी  अभियान पहले जैसा दमदार नहीं रहा | शायद यही वजह है कि काग्रेस द्वारा संसद के सत्र के दौरान अडानी मुद्दे पर विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश पहले जैसी सफल नहीं दिख रही | ममता बैनर्जी तो पहले  से ही दूर थीं और अब विपक्ष के बड़े चेहरे शरद पवार भी  अलग खड़े नजर आ रहे हैं | इस बारे में उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के  अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए ज्यादा समय अडानी समूह पर ही  खर्च किया और वे इस बात को ही उछालते रहे कि प्रधानमंत्री के समर्थन से ही गौतम अडानी को बड़ी व्यावसायिक सफलताएँ हासिल हुईं | उस भाषण से कांग्रेस काफ़ी उत्साहित थी और जब  प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में श्री  गांधी द्वारा उन पर लगाये गए आरोपों का जिक्र तक नहीं किया तब कांग्रेस ने इसे श्री गांधी की जीत बताकर जश्न मनाया | मोदी विरोधी यू ट्यूब चैनलों ने भी प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर खूब हल्ला किया | लेकिन संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होते तक यह मुद्दा स्वाभाविक तौर पर थका नजर आने लगा | बची खुची कसर पूरी  कर दी अमेरिका के दो  बैंकों के डूब जाने ने | उसके बाद ये पूछा जाने लगा कि हजारों मील दूर बैठकर अडानी समूह के खाता बहियों की छानबीन करने वाले हिंडनबर्ग को अपने देश के ही बैंकों की गंभीर स्थिति की भनक तक नहीं लगी | भारत में अभी तक अडानी समूह में निवेश  करने वाले बैंकों पर इस तरह का खतरा नहीं आने से भी हिंडनबर्ग रिपोर्ट की गंभीरता में कमी आई | अडानी समूह की तमाम कम्पनियों के शेयर जनवरी और फरवरी में आये गिरावट के दौर से उबरकर फिर से प्रतिस्पर्धा में चूंकि  लौट आये हैं इसलिए  अब गौतम अडानी एक बार फिर से दुनिया के रईसों की सूची में धीरे – धीरे ऊपर आ रहे हैं | यद्यपि  पुरानी स्थिति में  लौटने में कितना समय लगेगा ये बता पाना कठिन है लेकिन समूह के  दिवालिया होने और निवेशकों का पैसा डूब जाने जैसी शंकाएं हवा हवाई होकर रह गईं | इसीलिये कांग्रेस के साथ खड़े विपक्षी दलों के स्वर धीमे पड़ने लगे हैं | मल्लिकार्जुन खडगे द्वारा बुलाई जाने वाली  बैठकों में भी दर्जन भर विपक्षी पार्टियाँ आने से परहेज कर रही हैं | इस वजह से अडानी मुद्दा विभिन्न राज्यों  में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का  ब्रह्मास्त्र बनेगा इसकी सम्भावना लगातार घट रही हैं  | पूंजी बाजार  के जानकार बता रहे हैं कि आगामी दो महीनों के भीतर गौतम अडानी फिर बड़े खिलाड़ी के तौर पर नजर आयेंगे | उनकी सबसे बड़ी सफलता ये रही कि उद्योग जगत ने उन्हें   अपना मौन समर्थन दिया | आनंद महिंद्रा ने तो खुलकर उनकी तरफदारी की | कुछ लोग तो ये कहते सुने गए कि यदि राहुल बजाज जीवित होते तो अडानी के पक्ष में  सबसे ऊंची आवाज में वे ही बोलते | बहरहाल जहां तक इस मुद्दे पर हुई राजनीति का सवाल है  तो ऐसा लग रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के समय श्री गांधी  द्वारा उठाये गए राफेल लड़ाकू विमानों की खरीदी का मुद्दा  जिस तरह मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सका ठीक वही हश्र इस मुद्दे का होता लग रहा है | ये देखते हुए श्री गांधी और कांग्रेस को किसी नए मुद्दे की तलाश शुरू कर देनी  चाहिए |

रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 March 2023

संसद का न चलना भी लोकतंत्र का अपमान है

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस: सम्पादकीय
रवीन्द्र वाजपेयी 


संसद का न चलना भी लोकतंत्र का अपमान है 

विपक्ष अड़ा है अडानी मामले के लिए जेपीसी ( संयुक्त संसदीय समिति ) गठित की जाए | जिसके लिये सत्ता पक्ष जरा भी राजी नहीं है | इस कारण बजट सत्र का पहला भाग हंगामे की भेंट चढ़ गया | होली के बाद सत्र का दूसरा चरण प्रारम्भ होने पर लगा था कि देश और दुनिया के हालातों का संज्ञान लेते हुए हमारे माननीय सांसद अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन करेंगे परन्तु लगातार तीसरे दिन भी हंगामा जारी है | विपक्ष के आक्रमण पर  प्रत्याक्रमण करते हुए सत्ता पक्ष ने भी एक मुद्दा ढूंढ लिया राहुल गांधी द्वारा हाल ही में ब्रिटेन यात्रा के दौरान की गयी टिप्पणियों का | उल्लेखनीय है श्री गांधी ने वहां भारत में लोकतंत्र को खतरे में बताते हुए कहा था कि संसद में उनको बोलने नहीं दिया जाता | इसे लेकर सत्ता पक्ष का कहना है कि श्री गांधी ने लोकतंत्र के साथ देश का भी अपमान किया है इसलिए उनको क्षमा याचना करना चाहिए जिस पर कांग्रेस का पलटवार है कि विदेशों में राष्ट्रीय मुद्दों पर आलोचना की शुरुआत खुद प्रधानमंत्री ने की इसलिए वे माफी मांगें। दोनों तरफ से तलवारें खींची हुई हैं। सत्ताधारी योद्धा झुकने को राजी हैं और न ही विपक्ष के महारथी। बजट सत्र में बजट पर चर्चा को छोड़कर बाकी सब हो रहा है। मोदी सरकार के इस कार्यकाल का यह अंतिम पूर्ण बजट है। अगले वित्त वर्ष का बजट 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाली सरकार द्वारा पेश किया जावेगा। चुनावी वर्ष के मद्देनजर सत्तापक्ष ने बजट को लोक लुभावन बनाने की कोशिश की जबकि विपक्ष ने शुरुआती प्रतिक्रिया में ही उसे  जनविरोधी बता दिया था। बजट का विस्तृत अध्ययन करने सत्र के बीच अवकाश भी दिया गया किंतु दूसरा चरण शुरू हुए तीन दिन बीत जाने पर भी इस महत्वपूर्ण विषय पर विचार करने की जरूरत किसी को महसूस नहीं हो रही। ये बात तय है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जांच समिति बना दिए जाने के बाद अडानी मामले में जेपीसी गठन की मांग का कोई औचित्य नहीं रह गया है। दूसरी तरफ श्री गांधी भी माफी मांगेंगे इसकी संभावना न के बराबर है। ऐसे में देश की जनता के लिए चिंता का विषय है कि उससे जुड़ी समस्याओं एवं राष्ट्रीय महत्व के शेष विषयों पर विचार इस सत्र में होगा भी या नहीं? डा. लोहिया आम जनता को मुल्क के मालिकों कहकर संबोधित किया करते थे किंतु आजकल इस संबोधन को हमारे सांसदों ने एक तरह से चुरा लिया है और जनता की जगह वे खुद को देश का मालिक समझ बैठे हैं। तभी तो सदन में हंगामा करते हुए लोकतंत्र का मजाक बनाने के बाद भी वे जनता के बीच जाने से नहीं डरते। ये स्थिति वाकई शोचनीय है । जब सदन को चलना ही नहीं है तब उसके संचालन पर प्रतिदिन करोड़ों का खर्च क्यों किया जाए ये सवाल उठना स्वाभाविक है। विदेश में जाकर लोकतंत्र का अपमान तो बाद की बात है लेकिन हमारे सांसद लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर जिस उद्दंडता और अशालीनता का परिचय दे रहे हैं वह कहीं ज्यादा बड़ा अपमान है।


रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 14 March 2023

ऑस्कर के लिए लॉबिंग करने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी




भारत को कल दो ऑस्कर अवार्ड मिलने से देश में खुशी है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं  बल्कि विपक्ष ने भी विजेताओं को बधाई दी है | फिल्म उद्योग से जुड़े लोग तो इस उपलब्धि से फूले नहीं समा रहे और इसे दुनिया भर  में भारतीय फिल्म उद्योग के बढ़ते प्रभाव का प्रमाण मान रहे हैं | इसके पहले भी  भारत को कुछ श्रेणियों में ऑस्कर अवार्ड मिल चुके थे जिनमें संगीतकार ए.आर रहमान द्वारा बनाया गया गीत जय हो भी शामिल है | 2009 में भारत में बनी स्लमडाग मिलिओनायर फिल्म के उक्त गीत ने जब ऑस्कर जीता तब भी देश खुश हुआ था | गत दिवस भी प्रमुख अवार्ड नाटू नाटू गीत को मिला |  वहीं दूसरा एक वृत्त चित्र एलीफेंट व्हिसपर्स को | ऑस्कर निश्चित रूप से विश्व सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है | फिल्म जगत इसे नोबल से कम नहीं मानता | फिल्म निर्माण कला और अभिव्यक्ति के साथ मनोरंजन का भी  प्रभावशाली माध्यम रहा है | संचार क्रांति के उद्भव के बाद भले ही टाकीज में जाकर फिल्म देखने का चलन कम हो रहा हो क्योंकि टेलीविजन , कम्प्यूटर और मोबाईल फोन के कारण अब मनोरंजन की विधा ही बदल गयी है | परिवार के साथ सिनेमा देखने की बजाय अब वह निजी शौक में बदल गया है | ओटीटी के उदय ने लघु  फिल्मों का नया दौर शुरू कर दिया जिसने फिल्म निर्माण की पूरी संस्कृति ही परिवर्तित कर डाली | इसके कारण सितारा हैसियत और बॉक्स ऑफिस जैसी बातें महत्वहीन होने लगी हैं | सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली जैसे  शब्द भी कम ही सुनाई देने लगे हैं | अनेक फिल्में तो  बिना सिनेमा हॉल में दिखाए ही करोड़ों का व्यवसाय कर लेती हैं | कथानक , अभिनय संगीत से ज्यादा जोर इस बात पर दिया जाने लगा है कि फिल्म ने कमाई कितनी  की | कम लागत में बनने वाली कुछ फिल्मों ने भी कमाई के कीर्तिमान बना डाले | इतना सब बदल जाने के बाद भी ऑस्कर अवार्ड की महत्ता कायम है और हर फिल्मकार के मन में उसे हासिल करने की इच्छा रहती है | इसके लिए बाकायदा महीनों अमेरिका में रूककर लॉबिंग करनी पड़ती है जिसे  मार्केटिंग भी कह सकते हैं | अभिनेता स्व. देव आनंद की प्रसिद्ध फिल्म गाइड के अंग्रेजी संस्करण के निर्माण से साहित्य का नोबल पुरस्कार जीतने वाली स्व. पर्ल बक भी जुड़ी थीं | जब फिल्म बनी तब देव आनंद और उनके छोटे भाई विजय आनंद ने ऑस्कर के लिए लॉबिंग का प्रयास किया किन्तु जब उन्हें उसके खर्चे मालूम हुए तब वे बिना कुछ किये वापस आ गए | हालाँकि उसके बाद लगान एवं कुछ और फिल्मों के लिए भी  अमेरिका में लॉबिंग हुई लेकिन हाथ  कुछ नहीं आया | इसमें दो मत नहीं है कि भारतीय फिल्म उद्योग तकनीक और कथानक चयन में पश्चिमी  सिनेमा की तुलना में  काफी पीछे है | और इसीलिये बड़े बजट की  फिल्मों में विशेष प्रभाव डालने वाले दृश्यों के लिए विदेशी तकनीशियन बुलाये जाने लगे हैं | लेकिन इस बारे में प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन  का ये कथन  विचारणीय है कि भारत दुनिया में  सबसे ज्यादा फ़िल्में बनाने वाला देश है | और यहाँ सांस्कृतिक तथा भाषायी विविधता की वजह से फिल्मों का कथानक और अभिनय शैली में भी भिन्नता है | इसलिए हॉलीवुड की तर्ज  पर  बॉलीवुड शब्द का प्रयोग अनुचित है और हमें इसे भारतीय फिल्म उद्योग कहते हुए हीन भावना से उबरना चाहिए | श्री बच्चन का ये  कहना भी था कि भारत में भी अनेक विदेशी फिल्में प्रदर्शित की जाती हैं और उनका दर्शक वर्ग भी है किन्तु विदेशी निर्माता भारत  में आयोजित होने वाले अवार्ड आयोजनों में अपनी फिल्मों के लिये किसी सम्मान की अपेक्षा नहीं करते तो फिर हम क्यों ऑस्कर के लिए लालायित रहते हैं | ये भी सही है कि विदेशों में प्रदर्शित होने वाली भारतीय फिल्मों की दर्शक संख्या दरअसल वहां रह रहे भारतीय मूल के लोगों की वजह से बढ़ती जा रही है | उनका संगीत भी अप्रवासी भारतवंशियों के कारण वहां लोकप्रिय हो रहा है | आजकल तो विदेशों में हिंदी के कवि सम्मलेन तक बड़ी संख्या  में हो रहे हैं | ऐसे में एक वैश्विक समाज अपनी श्रेष्ठता के लिए किसी विदेशी संस्थान की चिरौरी करे ये जमता नहीं है | 21वीं  सदी के  भारत की छवि अब सपेरों और मदारियों वाले  देश की नहीं रही | ऐसे में जरूरी है हम अपने मापदंडों को श्रेष्ठता के उस स्तर तक ले जाएँ जिन पर खरा उतरने के प्रति विदेशी भी आकृष्ट हों | हमारे फिल्म उद्योग में लीक से हटकर कला फिल्में भी बनती  हैं  जिनका दर्शक वर्ग है | उनमें  से अनेक को अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में तो खूब प्रशंसा मिलती है लेकिन ऑस्कर जैसे पुरस्कार से वे वंचित रहती हैं क्योंकि उनके पास उसके लिए की जाने वाली महंगी मार्केटिंग के लिए पर्याप्त आर्थिक साधन नहीं होते | वैसे भी पश्चिम के जितने भी पुरस्कार हैं वे आज भी उपनिवेशवाद के दौर की मानसिकता से उबर नहीं पा रहे |  इसका सबसे  बड़ा उदाहरण महात्मा गाँधी को नोबल पुरस्कार नहीं दिया जाना है | वैश्विक  अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने वाले भारत के बड़े बाजार पर निगाहें गड़ाये हुए हैं | इसीलिए एक दौर था जब भारत की अनेक युवतियों को एक के बाद एक विश्व सुन्दरी चुना  गया | उसी तरह हमारे अनेक अभिनेताओं को हॉलीवुड की फिल्मों में अवसर दिया गया जिसका कारण अप्रवासी भारतीयों को आकर्षित करना ही है | ये भी सही है कि विदेशी निर्माता हमारे फिल्म उद्योग में निवेश करने के अवसर तलाश रहे हैं | जिस तेजी से हमारी फिल्मों की  शूटिंग विदेशों में होने लगी है उसे देखते हुए उन्हें लग रहा है कि हमारे फ़िल्मकार भी वैश्विक बाजार पर नजर रख रहे हैं | भारतीय गीत और वृत्त चित्र को ऑस्कर मिलना निश्चित तौर पर खुशी का क्षण है लेकिन हमारे फिल्मकारों को  अब ऑस्कर के लालच से बाहर आकर अपने सृजन को गुणवत्ता के आधार पर इतना श्रेष्ठ बना देना चाहिए कि ऑस्कर की चयन समिति खुद आकर अवार्ड देने की पहल करे | वैसे भी जिस गीत को अवार्ड मिला वह  ऑस्कर की मोहताजी से पहले ही काफी ऊपर आ चुका था |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 13 March 2023

पांच साल काम करने वालों को चुनाव के समय चप्पलें नहीं घिसना पड़तीं



जो विद्यार्थी पूरे साल ध्यानपूर्वक अध्ययन करते हैं उनको  परीक्षा के समय रात – रात भर जागकर न तो रट्टा मारना पड़ता है और न ही गैस पेपर और कुंजियों में सिर खपाना होता है | वे कभी इस बात की  शिकायत भी नहीं करते कि पर्चा कठिन आया था | इसी तरह सत्ता में बैठे जो नेता पांच साल पूरी निष्ठा से जनता से किये गए वायदों को पूरा करने के साथ ही जनहित के अन्य कार्यों पर ध्यान देते हैं उनको न तो चुनाव के समय मुफ्त खैरात  रूपी घूस देने की  जरूरत पड़ती हैं और न ही दबाव में आकर नीतिगत समझौते की मजबूरी झेलनी पड़ती है | इन दिनों देश के अनेक राज्यों में  विधानसभा  चुनाव होने जा रहे हैं | इनके लिए राजनीतिक दलों द्वारा  अपनी रणनीति  को अंतिम रूप दिया जा रहा है | कुछ राज्यों में सीधी लड़ाई हो रही है तो कुछ में गठबंधन की बिसात बिछने के संकेत हैं | पुराने दुश्मनों से दोस्ती के साथ ही बरसों से साथ चल रहे मित्र दूरी बनाते नजर आ रहे हैं | चूंकि राजनीति में  विचारधारा , सिद्धांतों और आदर्शों की जगह नहीं बची और हर निर्णय सत्ता  हासिल करने से प्रेरित है इसलिए बेमेल  गठबंधन से भी  कोई शर्म नहीं करता |  आजकल ये चर्चा जोरों पर है कि प. बंगाल के स्थानीय निकाय चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए कांग्रेस और वामपंथी दल भाजपा के साथ जुगलबंदी कर रहे हैं | जिस पर इन  पार्टियों के वरिष्ट नेता कह रहे हैं कि स्थानीय चुनावों में इस तरह के गठजोड़ होना आम बात  है | इसी तरह जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां सत्ताधारी दल के साथ ही विपक्ष भी मतदाताओं को  नए - नए लालीपॉप दिखाकर अपने पाले में खींचने की कोशिश में जुटा हुआ है | 2004 में वाजपेयी  सरकार के दौर में शासकीय कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना बंद करते हुए नई योजना लागू की गयी | उसके बाद दस साल तक कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार रही जिसने उसी  योजना को  जारी रखा उसके बाद कुछ राज्यों में भी कांग्रेस  की सरकारें बनी | लेकिन  किसी को भी पुरानी पेंशन की सुध नहीं आई | हाल ही में हुए  हिमाचल प्रदेश के  विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा पुरानी पेंशन लागू करने का जो वायदा  किया उसी की वजह से वह चुनाव जीत गयी | छत्तीसगढ़  और राजस्थान की कांग्रेस सरकारों ने भी आगामी चुनाव को देखते हुए पुरानी पेंशन की वापसी कर डाली | भाजपा की केंद्र सरकार पुरानी  पेंशन योजना को बहाल करने राजी नहीं है | कांग्रेस समर्थक माने जाने वाले रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया सहित अनेक अर्थशास्त्री भी चेतावनी  दे चुके हैं कि पुरानी पेंशन योजना  दोबारा लागू करने से सरकारी खजाना खल्लास हो जायेगा | लेकिन चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस की राज्य सरकारें अपने ही पुराने सलाहकारों को अनसुना कर रही हैं | सवाल ये भी है कि बीते चार सालों तक वे इस बारे में उदासीन क्यों बनी रहीं ? ताजा संकेतों के  मुताबिक म.प्र की भाजपा सरकार ने भी पुरानी पेंशन की बहाली पर मंथन शुरू कर दिया है | उसे डर है कि सरकारी कर्मचारी कांग्रेस के पक्ष में न झुक  जाएं | अन्य राज्यों में भी इसी  तरह  के चुनाव जीतू कदम उठाये  जा रहे हैं | ये सब देखकर लगता है कि राजनीतिक नेता चाहे वे सत्ता में  हों या विपक्ष में ,  अपनी  साख खोते जा रहे हैं | यदि सत्ता  में रही  पार्टी  चुनाव पूर्व किये वायदों को पूरा करती जाए और जनता की तकलीफों का सही समय पर इलाज करे तब उसे चुनाव के समय दबाव में आकर ऐसे निर्णय करने की जरूरत नहीं पड़ेगी जिन्हें आर्थिक या अन्य कारणों वह  से टालती रही | यही बात विपक्ष पर भी लागू होती है जो अपना दायित्व सही तरीके से निभाए तो उसे जनता को  अव्यवहारिक वायदे नहीं  करने पड़ेंगे | मसलन म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना योजना शुरू करते हुए महिलाओं को 1 हजार देने की शुरुआत की तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने कांग्रेस की सरकार बनने पर उसे बढ़ाकर 1500 रु. प्रति माह करने का वायदा कर दिया | सवाल ये है कि सत्ता में रहते हुए श्री नाथ को ऐसा करने का ध्यान क्यों नहीं रहा ? इस संदर्भ में राजनीतिक दलों को उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से सबक लेना  चाहिए जो लगातार पांचवी बार मुख्यमंत्री बने | देश के राजनीतिक घटनाचक्र में उनका नाम कभी - कभार ही सुनाई देता है | विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर श्री पटनायक देश  और अपने राज्य के हित को ध्यान में रखते हुए नीति तय करते हैं | उनका भाजपा और कांग्रेस दोनों से मतभेद है लेकिन चाहे केंद्र की सरकार में कोई भी रहा हो , वे सबके साथ सामंजस्य बिठाकर काम करने के लिए जाने जाते हैं | देश में जो राजनेता सबसे कम विवादग्रस्त हैं उनमें श्री पटनायक सबसे अव्वल हैं | सता में रहते हुए वे बिना हल्ला मचाये काम  करते हैं | इसीलिये उड़ीसा बीमारू राज्य के कलंक को धोने में सफल हो रहा है | चुनाव में आसमानी वायदों की जरूरत उनको इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि वे पुराने वायदे निभाने में सफल रहते हैं | उड़ीसा स्वर्ग  बन गया हो ऐसा नहीं है लेकिन काम से काम रखने की शैली ने श्री पटनायक को अजेय बना दिया | अन्य राजनेताओं को उनकी विचारधारा भले ही पसंद न आती हो लेकिन उनमें कुछ न कुछ ऐसा गुण तो है जिसकी वजह से वे लगातार 25 सालों से गद्दी पर जमे रहने के बाद  भी निर्विवाद हैं | घूम फिरकर बात वही पूरे साल पढ़ने वाले विद्यार्थी पर आकर टिक जाती है जिनसे राजनेता प्रेरणा ले लें तो उन्हें चुनाव के समय घुटने टेकने के नौबत ही नहीं आयेगी | लेकिन दुर्भाग्य ये है कि राजनीति चलाने वाले नेताओं के मन में ये बात बैठ चुकी है कि पूरे पांच साल चाहे भले कुछ न करो लेकिन चुनाव आते ही मतदाताओं को उपहार बांटने से उनकी नैया पार हो जाएगी  | जब तक चुनाव घोषणापत्र को हलफनामे की तरह कानूनी स्वरूप नहीं दिया जाता तब तक ये विसंगति बनी रहेगी |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 11 March 2023

सीबीआई और ईडी की निर्भीकता के साथ निष्पक्षता भी जरूरी



पूरे देश में इस समय सबसे बड़ा मुद्दा ईडी और सीबीआई द्वारा विपक्षी नेताओं पर छापेमारी और गिरफ्तारी बना  हुआ है | जिस तरह एक के बाद एक विपक्षी  नेताओं पर शिकंजा कसा  जा रहा है उसे देखते हुए लगता है आने वाले दिनों में कुछ और बड़े नेता जेल के भीतर नजर आयेंगे | दिल्ली शराब घोटाले में मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के बाद  आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के भी लपेटे में आने का संकेत गत दिवस ईडी द्वारा अदालत में पेश किये गए दस्तावेजों से मिला | संयोगवश कल ही ईडी ने नौकरी के बदले जमीन घोटाले में लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के साथ रिश्तेदारों और करीबियों के यहाँ छापे मारे | तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी राव की पुत्री और विधान परिषद सदस्य के. कविता से भी आज ईडी दिल्ली शराब घोटाले में पूछताछ हो रही है | सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी द्वारा आरोपी बनाये जा चुके हैं | उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत और  महारष्ट्र के दो पूर्व मंत्री भी ईडी द्वारा जेल भेजे गए | ये फेहरिस्त काफी  लम्बी है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने की बात कही थी | भ्रष्ट नेताओं पर सीबीआई और ईडी कार्रवाई करें इसमें किसी को ऐतराज नहीं है | अनेक भ्रष्ट नेता जेल जा चुके हैं | जिनमें स्व.जयललिता,  ओमप्रकाश चौटाला और लालू जैसे नाम हैं | इनको मिली सजा को किसी ने गलत नहीं कहा | लेकिन सीबीआई और ईडी द्वारा की जा रही ताबड़तोड़ कार्रवाई के बारे में विपक्षी नेता चिल्ला – चिल्लाकर कह रहे हैं कि केंद्र सरकार इन संस्थाओं का दुरुपयोग विपक्ष का मनोबल तोड़ने के लिए कर रही है | और बिना पर्याप्त सबूतों के ही गिरफ्तारी के जरिये आतंक का वातावरण बनाया जा रहा है | ये आरोप भी है कि उक्त संस्थाएं भाजपा नेताओं के भ्रष्टाचार पर आँख मूँद लेती हैं | सीबीआई और ईडी के निशाने पर रहे अनेक नेताओं के विरुद्ध चल रही जाँच और अन्य कार्रवाई   उनके भाजपा में आते ही या तो बंद कर दी गयी या उसकी गति धीमी हो गयी | इनमें मुकुल राय , शुबेंदु अधिकारी , हिमन्ता बिस्वा सरमा और नारायण राणे के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं | आम आदमी पार्टी इस आरोप को अनेक मर्तबा दोहरा चुकी है कि श्री  सिसौदिया पर भी शराब घोटाले में बरी करने के एवज  में भाजपा में शामिल होने का दबाव डाला गया था | विपक्ष द्वारा ये आरोप भी तेजी  से लगाया जा रहा है कि कर्नाटक के एक भाजपा विधायक के बेटे के यहाँ करोड़ों रूपये नगद मिलने के बावजूद ईडी ने उसका संज्ञान नहीं लिया जबकि श्री सिसौदिया के यहाँ से सीबीआई को एक पैसा तक नहीं मिला फिर भी उनको  जेल में डाल दिया  | भाजपा शासित राज्यों के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच के बारे में दोहरा रवैया अपनाने का आरोप भी  लग रहा है | इसमें दो मत नहीं है कि भ्रष्ट नेताओं के गले में फंदा डाले जाने से आम जनता  खुश होती है |  कोलकाता में ममता बैनर्जी की सरकार के वरिष्ठ मंत्री की महिला मित्र के निवास पर  मिले करोड़ों रूपये मिलने के बाद उस मंत्री के साथ खड़ा होने कोई तैयार नहीं है | मोदी सरकार ने अपने आपको भ्रष्टाचार के आरोपों से बचाए रखा ये भी अब तक तक माना  जा रहा है किन्तु विपक्ष के इस आरोप का  भाजपा   के पास कोई जवाब नहीं है कि क्या उसके सभी नेता राजा हरिश्चन्द्र के अवतार हैं और भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे लोग  जब भाजपा में आ जाते हैं तब उनको अभयदान और ईमानदारी का प्रमाण पत्र कैसे मिल जाता है ? विपक्ष के जिन नेताओं को ईडी अथवा सीबीआई ने जांच के घेरे में लिया वे दोषी हैं या  निर्दोष,  ये तो अदालत में ही तय होगा लेकिन भाजपा के तमाम वे नेता जो उक्त दोनों एजेंसियों की जाँच के दायरे  में हैं उनके बारे में ढुलमुल रवैये से एक तो उनकी विश्वसनीयता पर संदेह होता है वहीं  केवल विपक्ष के नेताओं पर निशाना साधे जाने से निष्पक्षता पर भी आंच आती है | यद्यपि महज इस वजह से नेशनल हेराल्ड और दिल्ली  शराब घोटाले के आरोपियों के विरुद्ध जाँच  रोक देना  या लालू के परिवार को ईमानदार मानकर छोड़ देना  किसी भी दृष्टि से स्वीकार करने योग्य नहीं होगा | लेकिन जब बात जाँच एजेंसियों की प्रामाणिकता की होने लगे तब उसे केवल विरोधियों का दुष्प्रचार मानकर हवा में उड़ा देना भी सही नहीं है | इस बारे  में ध्यान देने योग्य बात ये है कि ईडी और सीबीआई को निष्पक्ष होते हुए दिखना भी चाहिये क्योंकि भारतीय जन मानस में भावुकता बहुत है | इसी कारण भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी पाये जाने के बाद जेल में रहने के बाद  कोई राजनीतिक नेता जब छूटता है तब वह बजाय मुंह छिपाए घूमने के जनता के बीच जाकर हमदर्दी बटोरता है | जयललिता , ओमप्रकाश चौटाला , लालू , येदियुरप्पा जैसे और  भी अनेक उदाहरण हैं जहां जेल से छूटा नेता भीड़ एकत्र करते हुए जनता का समर्थन प्राप्त करने में कामयाब हो जाता है | ऐसे में ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली में निष्पक्षता नहीं रही तो फिर जिन लोगों को वह सीखंचों में डाल रही है वे बाहर निकलने के बाद फिर अपनी नेतागिरी चमकाने में लग जायेंगे | और इससे भी बड़ी बात प्रधानमंत्री की अपने छवि के लिए जरूरी है कि वे इन संस्थाओं के लपेटे में केवल विपक्षी नेताओं को फंसाए जाने संबंधी अवधारणा को गलत साबित करते हुए भाजपा में बैठे दागी नेताओं पर भी वैसी ही कार्रवाई करें जैसी अन्य पर हो रही है | इस बारे में एक बात आम जनता में चर्चा का विषय है कि सीबीआई और ईडी किसी भी मामले में शुरुआत तो बड़े ही जोरशोर से करती हैं लेकिन उसे अंजाम तक पहुँचाने में जो लम्बा समय लगता है उसकी वजह से मामले की गम्भीरता खत्म हो जाती  है | उस दृष्टि से ईडी और सीबीआई जो कदम उठा रही हैं वे बिलकुल सही हैं | भ्रष्टाचार इस देश को दीमक की तरह चाट रहा है इसलिए उसके खात्मे से पवित्र काम  दूसरा नहीं होगा लेकिन उसमें निर्भीकता के साथ ही पारदर्शिता , प्रामाणिकता और निष्पक्षता भी उतनी ही जरूरी है | वरना अच्छा काम भी लोकनिंदा का पात्र बन जाता है |

रवीन्द्र वाजपेयी