Monday, 8 May 2023

राजस्थान उच्च न्यायालय गहलोत से सबूत मांगे : आरोप गंभीर हैं



राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत देश के सबसे अनुभवी राजनेताओं में से हैं | अतीत में वे केन्द्रीय मंत्री भी रहे  | कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन में भी महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करने के कारण ही उनको पार्टी अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने जा रही थी लेकिन एन वक्त पर वे फ़ैल गए और उनके समर्थक विधायकों ने थोक में विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफे सौंपकर पार्टी  हाईकमान पर दबाव बना दिया जिससे उसे अपना निर्णय बदलकर मल्लिकार्जुन खरगे को अध्यक्ष बनाना पड़ा | श्री गहलोत का वह पैंतरा खुले तौर पर अनुशासनहीनता थी  किन्तु गांधी परिवार तक उनके कान पकड़ने की हिम्मत न कर सका | उसके आगे का घटनाचक्र किसी से छिपा नहीं है | दरअसल राजस्थान कांग्रेस में चल रहे शीतयुद्ध में श्री गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट दो खेमे हैं | दोनों ने पार्टी का अनुशासन तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी  किन्तु शीर्ष नेतृत्व किसी  के विरुद्ध कार्रवाई करने का साहस न बटोर सका | और यही कारण है कि  दोनों तरफ से बयानों के तीर बिना रुके चला करते हैं | श्री पायलट हमेशा इस बात को उठाते हैं कि विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफा दे चुके विधायकों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? दूसरी ओर मुख्यमंत्री श्री पायलट के साथ बगावत पर उतारू हुए विधायकों द्वारा भाजपा नेताओं से करोड़ों रूपये लेने का आरोप लगते हुए जवाबी  दांव चलते हैं | लेकिन गत दिवस धौलपुर दौरे पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम में श्री गहलोत ने ये कहकर राजनीतिक माहौल में हलचल मचा दी कि जिन विधायकों ने अमित  शाह  , धर्मेन्द्र प्रधान और गजेन्द्र शेखावत से 10 – 15 करोड़ रूपये लिए थे और अब तक नहीं लौटाए उनको चाहिए वे लौटाकर दबावमुक्त हो जाएँ  | यदि उसमें से कुछ खर्च कर लिया हो तो बताएं मैं कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन से कहकर दिलवा दूंगा | इसके साथ ही उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री भाजपा नेत्री वसुंधरा राजे की ये कहते हुए तारीफ की कि उन्होंने सरकार गिराने के पायलट खेमे के प्रयास को विफल कर दिया | हालाँकि श्रीमती राजे ने मुख्यमंत्री के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है | श्री पायलट के साथ जो विधायक गहलोत सरकार गिराने हरियाणा के मानेसर में जा बैठे थे उनके द्वारा भाजपा के उक्त नेताओं से 10 – 15 करोड़ रूपये लिए जाने का आरोप श्री गहलोत पहले भी लगा चुके थे | लेकिन गत दिवस उन्होंने जिस तरह वह राशि वापस करने के लिए पार्टी से पैसे  दिलवाने की बात कही उसे केवल राजनीतिक कटाक्ष मानकर उपेक्षित करना राजनीतिक विमर्श में रही – सही गंभीरता को नष्ट करने जैसा होगा | एक राज्य का मुख्यमंत्री यदि अपनी ही पार्टी के विधायकों पर दूसरी पार्टी के नेताओं से सरकार गिराने के लिए 10 – 15 करोड़ रूपये लेने जैसी बात बार – बार दोहराए तो फिर उससे ही ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या कारण रहा  जो उन्होंने उन विधायकों के विरुद्ध पार्टी से अनुशासन की कारवाई करने के लिए  नहीं कहा और  उनकी अपनी सरकार ने  इतनी बड़ी रकम लेने वाले विधायकों के  विरुद्ध आर्थिक अपराध का प्रकरण दर्ज नहीं किया | श्री गहलोत एक संवैधानिक पद पर हैं | ऐसे में उनसे अपेक्षित है कि वे राजनीतिक दांवपेंच दिखाते समय ऐसी कोई बात न बोलें जिसका प्रमाण उनके पास नहीं है | और यदि है , तब इतनी बड़ी राशि सरकार गिराने के लिए लेने वाले उनके अपने दल के ही विधायक छुट्टा कैसे घूम रहे हैं ? मुख्यमंत्री का ये कहना कि वे पैसा लौटा दें और यदि खर्च हो गया तब  वे कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन से दिलवा देंगे , बेहद बचकाना और गैर जिम्मेदाराना है | अव्वल तो विपक्षी दल से  अपनी ही सरकार गिराने के लिए मोटी रकम लेने वाले विधायकों को अब तक पार्टी क्यों ढो रही है , इसका जवाब श्री गहलोत को देना चाहिये | गत दिवस जिस अंदाज में श्री  गहलोत ने बागी कांग्रेस विधायकों पर तंज कसा वह अप्रत्यक्ष रूप से तो श्री पायलट पर किया गया हमला ही है | भले ही  भाजपा नेत्री वसुंधरा राजे के बारे में की गई उनकी टिप्पणी उन दोनों का व्यक्तिगत मामला है लेकिन कांग्रेस विधायकों द्वारा सरकार गिराने के लिए 10 – 15 करोड़ जैसी बड़ी रकम लेकर न लौटाने और खर्च हो जाने की स्थिति में पार्टी फंड से दिलवाने जैसी बातें करने के बाद खुद श्री गहलोत पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए | बेहतर हो राजस्थान उच्च न्यायालय उनके कल दिए गए बयान का स्वतः संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री से उनकी बात का सबूत मांगें क्योंकि इस तरह के आरोपों को हल्के में लिये जाने के कारण ही राजनीति और राजनेताओं की साख मिट्टी में मिलती जा रही है |

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 6 May 2023

चाचा ने तो चाल चल दी , अब भतीजे का इंतजार



एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) के अध्यक्ष शरद पवार ने चार दिन तक अनिश्चितता बनाये रखने के बाद अध्यक्ष पद से अपना त्यागपत्र वापस ले लिया | हालाँकि उनके द्वारा पार्टी संगठन में दायित्वों का विकेंद्रीकरण किये जाने के साथ ही नए नेताओं का सृजन करने की बात भी कही गयी है | लेकिन उनके इस्तीफा देने और वापस लेने के बीच के चार दिन जिस तरह का माहौल पार्टी  के भीतर बनाकर रखा गया उससे एक बात साफ़ है कि श्री पवार मजबूत की बजाय मजबूर नेता बनकर रह गए हैं | उनके द्वारा जिन कारणों से इस्तीफा दिया गया था उनमें एक था उनका स्वास्थ्य और दूसरा उत्तराधिकारी का चयन | जब इस्तीफा वापस लेने की बात चली  तब उनकी धर्मपत्नी और भतीजे अजीत पवार दोनों ने बड़े ही विश्वास के साथ ये दावा किया  था कि इस बार वे अपने निर्णय पर अडिग रहेंगे | लेकिन वे दावे गलत साबित हुए और मान -  मनौवल के बाद आखिरकार श्री पवार ने पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के अनुरोध के नाम पर अध्यक्ष बने रहने की मनुहार मान ली | हालाँकि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों ने भी एनसीपी प्रमुख से अध्यक्ष पद न छोड़ने की अपील की थी क्योंकि भाजपा के विरुद्ध विपक्ष का मोर्चा बनाने के लिए उन जैसे वरिष्ट नेता की जरूरत होगी | इस बात को लेकर भी विपक्षी नेताओं में खलबली थी कि श्री पवार यदि पार्टी प्रमुख पद से हटे तो एनसीपी में बिखराव रोकना मुश्किल हो जायेगा | विशेष रूप से अजीत पवार के भाजपा के साथ जाकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन जाने की अटकलों से शिवसेना और कांग्रेस ही नहीं ,  बाकी विपक्षी दल भी घबराहट में थे | जब श्री पवार ने इस्तीफ़ा दिया तब ये आकलन लगाया गया कि वे अजीत के भाजपा के साथ जुड़ने का दोष अपने ऊपर नहीं लेना चाहते। लेकिन उनको ये लग गया कि  उनके हटने के बाद भले ही वे अपनी बेटी सुप्रिया सुले को पार्टी की कमान सौंप दें किंतु  भतीजा उस फैसले को स्वीकार नहीं करेगा और उसके द्वारा खुद मुख्तियारी का ऐलान किए जाने से पार्टी छिन्न - भिन्न हो जायेगी। पार्टी में प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल जैसे अनेक नेता हैं जो श्री पवार के साथ ही अजीत के साथ भी अंतरंगता रखते हैं। श्री पवार के हट जाने पर ये तबका सुप्रिया के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता।और फिर वे ये भी जानते हैं कि यदि वे खुद होकर अजीत को उपेक्षित करेंगे तब फिर उसके पार्टी छोड़ने का रास्ता साफ हो जाएगा। ऐसे में वे उसको भी साधे रखना चाहते थे। बहरहाल उनके इस्तीफा देने के बाद तक तो ये माना जा रहा था कि श्री पवार  नए नेतृत्व को पार्टी की  बागडोर सौंपकर आराम करना चाहेंगे। ये भी चर्चा थी कि भतीजे को महाराष्ट्र और बेटी को राष्ट्रीय राजनीति का जिम्मा सौंपकर वे मार्गदर्शक की भूमिका में  आ जाएंगे । लेकिन महज चार दिन में ही उनको ये एहसास हो गया कि बात उतनी सरल नहीं है जितनी वे समझ रहे थे। और ये भी कि उनके पद छोड़ने के बाद जो नेता उनके अगल - बगल नजर आते थे वे सब अजीत के पाले में खड़े हो जाएंगे क्योंकि सुप्रिया से उनका संवाद उतना सहज नहीं है। एक बात और ये भी श्री पवार समझ गए कि भाजपा के साथ जाने पर जो कुछ मिलेगा वह अजीत के खाते में होगा। और एक बार भतीजा  स्वतंत्र हुआ तो फिर पार्टी पर चाचा का नियंत्रण कमजोर होते देर नहीं लगेगी। आखिरी समय में समाजवादी पार्टी के संस्थापक  मुलायम सिंह यादव की जो उपेक्षा हुई उससे भी श्री पवार वाकिफ थे। हालांकि अपनी आत्मकथा के दूसरे भाग में उन्होंने जिस तरह से उद्धव ठाकरे की प्रशासनिक और संगठनात्मक क्षमता पर सवाल उठाने के साथ ही भाजपा सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री और एकनाथ शिंदे सरकार में उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रशंसा की उससे ये संकेत मिला कि अजीत के भाजपा प्रवेश की पटकथा उन्होंने तैयार कर दी है । लेकिन राजनीतिक वानप्रस्थ की ओर चार कदम बढ़ाने के बाद वे पुनः लौट आए । हालांकि न तो उनका पहला फैसला चौंकाने वाला था और न ही बाद वाला। सही मायनों में अब ये लगने लगा है कि श्री पवार जो करना चाह रहे वह हो नहीं पा रहा और इसीलिए वे इस बात को लेकर भयभीत हो चले हैं कि पार्टी की कमान छोड़ने के बाद उनकी कोई नहीं सुनेगा और अजीत सर्वशक्तिमान हो जायेंगे। बीते कुछ दिन में ही उनको ये समझ में आ गया कि वे चाहकर भी बेटी सुप्रिया को उत्तराधिकारी नहीं बना पाएंगे और एनसीपी का बहुमत भतीजे के साथ खड़ा हो जायेगा जिनकी संगठन के भीतर तक पहुंच है। 2019 में जब अजीत ने देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सरकार बनाई तब जिस मजबूती के साथ श्री पवार ने उस बगावत को विफल करते हुए उनकी घर वापसी करवाई और फिर कांग्रेस - शिवसेना के बीच बेमेल गठबंधन करवाकर अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिया उसके बाद वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के सबसे कद्दावर नेता के तौर पर स्थापित हो चले थे। उनकी वजन दारी का सबसे ताजा प्रमाण हैं वीर सावरकर मुद्दे पर  राहुल गांधी को चुप रहने मजबूर कर देना और अदानी मुद्दे पर कांग्रेस की जेपीसी की मांग को निरर्थक बताने के बाद गौतम अदानी से लंबी मुलाकात करना । लोग तो ये कहने लगे थे कि उसी के बाद श्री पवार भाजपा के करीब जाते दिखे । लेकिन गत दिवस उन्होंने जिस तरह अपने कदम पीछे खींचे उससे लगा कि उनका आत्मविश्वास कहीं न कहीं डगमगाया है। देखना ये है कि चाचा के इस पैंतरे का भतीजा क्या जवाब देता है?

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 5 May 2023

वरना , आज मणिपुर जल रहा है कल कोई और जलेगा


पूर्वोत्तर भारत का मणिपुर राज्य अपनी सांस्कृतिक धरोहर के साथ ही प्राकृतिक सौदंर्य के लिए भी प्रसिद्ध है | नगालैंड और मिजोरम की अपेक्षा इसे राष्ट्रीय मुख्यधारा के ज्यादा करीब माना जाता है | बीते अनेक वर्षों से यहाँ शांति के साथ ही राजनीतिक स्थिरता बनी हुई थी | लेकिन अचानक यह राज्य धधक उठा | और कारण बना यहाँ के बहुसंख्यक मैतेई समुदाय को उच्च न्यायलय द्वारा अनु. जनजाति का दर्जा दिए जाने का फैसला | इस बारे में जो अधिकृत जानकारी उपलब्ध है उसके मुताबिक मैतेई समुदाय अंग्रेजी राज में भी जनजातीय वर्ग में शामिल था | आजादी के बाद वह व्यवस्था बदल गयी | उच्च न्यायालय के आदेश से राज्य में रहने वाले नगा – कुकी समुदाय के लोग गुस्से में हैं | इसका एक कारण ये भी है कि इनको राज्य में घुसपैठिया मानकर बाहर करने का आदेश मुख्यमंत्री बीते साल ही दे चुके थे | नगा – कुकी समुदाय में ईसाई धर्म को मानने वाले ज्यादा हैं जबकि मैतेई वर्ग हिन्दू धर्म को मानता है | मणिपुर में कृष्ण भक्ति भी काफी की जाती है | जनसँख्या और सामाजिक प्रभाव के तौर पर मैतेई समुदाय काफी मजबूत है और राजनीतिक तौर पर प्रभुत्व संपन्न भी | इसलिए मौजूदा संकट के पीछे ईसाई मिशनरियों की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि उत्तर पूर्वी राज्यों में अलगाववाद को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका पहले भी उजागर होती रही है | और यही वजह रही कि इस समूचे क्षेत्र को मुख्यधारा से उस तरह नहीं जोड़ा जा सका जैसी अपेक्षा और आवश्यकता थी | ये कहना गलत न होगा कि 2014 में जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तबसे केंद्र सरकार की कार्य सूची में पूर्वोत्तर की ओर काफी ध्यान दिया जाने लगा | अधो संरचना का जितना विकास बीते 9 वर्षों में वहां किया गया, वह चमत्कृत करता है | और उसी का परिणाम है कि त्रिपुरा जैसे वामपंथियों के गढ़ में लगातार दूसरी बार भाजपा अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई | यही स्थिति मणिपुर की भी है | इन सबकी वजह से पूर्वोत्तर के राज्यों में फैला अलगाववाद भी कम हुआ है और सशस्त्र संघर्ष करने वाले अनेक संगठनों ने समझौते के जरिये शांति के रास्ते पर चलने का फैसला किया | लेकिन देश विरोधी ताकतें पूरी तरह खत्म नहीं हुईं हैं | मणिपुर की ताजी घटना उसका प्रमाण है | यदि ये राजनीतिक निर्णय होता तब बात कुछ और होती किन्तु जब उच्च न्यायालय ने मैतेई समुदाय को ऐतिहसिक साक्ष्य के आधार पर जनजातीय समूह मानते हुए अनु. जनजाति का दर्जा देने का फैसला सुनाया तब नगा और कुकी वर्ग उसके विरुद्ध अपील करने स्वतंत्र था परन्तु बजाय इसके मणिपुर जैसे शांत राज्य को अशांति और हिंसा की आग में झोक दिया गया | पूर्वोत्तर के राज्य सीमावर्ती होने से वैसे भी राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से बेहद सम्वेदनशील हैं | विदेशी घुसपैठ होने से यहाँ का जनसँख्या संतुलन लगातार गड़बड़ा रहा है | चूंकि भौगोलिक तौर पर भी यहाँ जंगली और पहाड़ी क्षेत्र की प्रचुरता है इसलिए घुसपैठ रोकना काफी कठिन होता है | उस वजह से एक राज्य की कबीलाई जातियां दूसरे में घुसपैठ करते हुए जंगलों में कब्जा करने में जुटी रहती हैं जिसकी वजह से जातीय संघर्ष होते रहते हैं | वर्तमान विवाद के पीछे भी नगा और कुकी समुदाय द्वारा मणिपुर के वन क्षेत्र में अवैध रूप से की गई घुसपैठ वजह हो सकती है किन्तु मैतेई समुदाय को जनजातीय दर्जा दिए जाने के उच्च न्यायालय के फैसले को बहाना बनाकर हिंसा फैला देने के पीछे धर्मांतरण कर पूर्वोत्तर में अस्थिरता फ़ैलाने और चुनावी राजनीति में मात खा चुके लोग भी हो सकते हैं | केंद्र और राज्य सरकार शांति स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं | लेकिन विवाद ऐसे समय उत्पन्न हुआ जब देश में जातीय जनगणना राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल की जा रही है | बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो इसकी जिद ही पकड़ ली किन्तु उच्च न्यायालय ने उस पर रोक लगा दी | अब चूंकि मणिपुर में उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध हिंसा भड़क उठी तो देश के अन्य राज्यों में भी आरक्षण संबंधी जितने भी मामले अदालतों के समक्ष विचाराधीन हैं उन पर होने वाले फैसलों से नाराज वर्ग कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने में लग जाएगा और वोटों के सौदागर बजाय बुझाने के आग में घी डालने से बाज नहीं आयेंगे | आरक्षण निश्चित रूप से समाज के वंचित वर्ग के सामाजिक और आर्थिक उत्थान का जरिया है | लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों की ज्यादातर जनसँख्या जनजातीय वर्ग की होने से वहां आरक्षण के मौजूदा ढर्रे से अलग हटकर कुछ करने की जरूरत थी | जिसकी तरफ वर्तमान केंद्र सरकार ने ध्यान दिया और उसके सुखद परिणाम भी आने लगे | लेकिन देश को अस्थिर करने वाले तत्वों को ये रास नहीं आ रहा इसलिए मौक़ा पाते ही वे गड़बड़ करने की कोशिश करते हैं| मणिपुर के अलावा भी निकटवर्ती अन्य राज्यों में इस तरह के संघर्ष समय – समय पर होते रहते हैं जिनके लिए सीमा पार से भी मदद मिलती है | बीते कुछ सालों में पूर्वोत्तर में राष्ट्रवादी राजनीति के पैर मजबूती से जमने के कारण धर्मांतरण के जरिये राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की प्रक्रिया पर नियन्त्रण हुआ है और विदेशी धन से समूचे पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने का षडयंत्र कमजोर हो रहा है | इसीलिए बौखलाहट में यहाँ की शान्ति भंग करने के लिए इस तरह के प्रपंच रचे जा रहे हैं | केंद्र सरकार को चाहिए इस घटना के असली कारणों का पर्दाफाश करते हुए उसके लिए जिम्मेदार ताकतों के मंसूबे विफल करे क्योंकि पूर्वोत्तर के किसी भी राज्य में होने वाली हिंसा से राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ती है |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 4 May 2023

लौटकर डाक्टर काम पर आये लेकिन ...



म.प्र के सरकारी डाक्टर पूर्व घोषणानुसार गत दिवस सुबह से हड़ताल पर चले गए थे | इसकी वजह से प्रदेश में सरकारी चिकित्सालयों में स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गईं जिसके कारण  एक मरीज की जान जाने की भी खबर है | हड़ताल के पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उनसे अपना निर्णय बदलने की अपील करते हुए कहा था कि ज्यादातर मांगें चूँकि पूरी हो चुकी थीं इसलिए वे चिकित्सा सेवाओं को ठप करने जैसा कदम न उठायें | लेकिन चिकित्सक अपनी बात पर अड़े रहे और हड़ताल शुरू हो गयी किन्तु इसी दौरान उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए हड़ताल को गैर कानूनी घोषित कर दिया | इस फैसले ने हड़ताली डाक्टर्स के संगठन को निहत्था कर दिया क्योंकि सरकार से लड़ना तो आसान था किन्तु न्यायपालिका से टकराने की हिम्मत न होने के कारण अंततः देर रात उन्हें हड़ताल वापस लेना पड़ी | उनकी मांगों के औचित्य और उन पर सरकार के रवैये से अलग हटकर देखें तो डाक्टरों की हड़ताल सुनने में अटपटा लगता है | अनेक डाक्टरों के यहाँ  किसी दवा कम्पनी द्वारा प्रदर्शित पोस्टर में  लिखा होता है कि हमने ईश्वर में विश्वास नहीं खोया अपितु उसे डाक्टर में स्थानांतरित कर दिया है | इसका आशय है कि पीड़ित व्यक्ति जिस तरह इस विश्वास के साथ मंदिर में दर्शन करने आता है कि भगवान उसकी मनोकामना दूर कर देंगे , ठीक उसी प्रकार  डाक्टर के पास आते समय उसके मन में ये भरोसा होता है कि वो उनकी पीड़ा दूर कर उसे राहत प्रदान करेंगे | ऐसे में जब डाक्टरों की सेवाएं न मिलें  तब न  सिर्फ मरीज अपितु उसके परिजन भी परेशान और निराश हो जाते हैं | कल हुई हड़ताल के दौरान भी ऐसी अनेक घटनाएँ हें जहाँ इलाज के अभाव में लोग भटके | हालाँकि आजकल जगह – जगह निजी चिकित्सालय खुल गए हैं किन्तु उनमें इलाज करवाने की हैसियत न होने पर ही तो इंसान सरकारी अस्पतालों की शरण में आता है | यहाँ उसे समुचित इलाज अथवा सुविधाएं मिलती ही हों ये सोचना तो अतिशयोक्तिपूर्ण होगा किन्तु कड़वी सच्चाई यही है कि देश के आम जन के लिए सरकारी अस्पताल जाना जरूरी भी है और मजबूरी भी | इस बारे में ये कहना पर्याप्त नहीं है कि चूंकि इस समय महामारी की वापसी का खतरा दोबारा पैदा होने के अलावा मौसमी बीमारियाँ भी पैर पसार रही हैं इसलिए  डाक्टरों को हड़ताल से बचना चाहिए | सरकारी अस्पताल चाहे वह देश की राजधानी दिल्ली का एम्स हो या किसी गाँव का प्राथमिक चिकित्सा केंद्र , वहां मरीजों की भीड़ देखकर ही उनकी अहमियत और जरूरत का अंदाज लग जाता है | ऐसे में एक दिन तो क्या एक घंटे भी यदि डाक्टर या अस्पताल के अन्य कर्मचारी काम नहीं करते तो मरीज बेहाल हो जाते हैं | हालाँकि इन सबसे अलग ये बात भी विचारणीय है कि सरकारी डाक्टरों को भी आखिरकार संगठन बनाने और अपनी मागों के लिए आन्दोलन का उतना ही अधिकार है जितना अन्य शासकीय कर्मचारियों को | लेकिन देखने वाली बात ये है कि जिस व्यक्ति के पास इंसानी ज़िन्दगी की रक्षा का दायित्व हो , वह उससे कैसे पीछे हट सकता है ?  शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत किसी चिकित्सक के पंजीयन के समय वह जो शपथ लेता है उसमें हड़ताल की कोई गुंजाईश ही नहीं है | लेकिन हमारे देश में नैतिकता की अपेक्षा केवल दूसरों से करने का चलन है | हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश डी. वाई . चंद्रचूड़ ने वकीलों के हड़ताल करने पर ऐतराज जताते हुए कहा था कि इससे न्यायप्रक्रिया बाधित होती है | इसी तरह की बातें तब भी सुनने में आती हैं जब किसी भी आवश्यक सेवा से जुड़े अमले द्वारा हड़ताल या काम बंद किया जाता है | वैसे इस मामले में सरकार भी कम दोषी नहीं होती जो समस्या को हल किये जाने के बजाय उसे टालती रहती है | ऐसा केवल म.प्र के डाक्टरों के मामले में हुआ हो ऐसा नहीं है बल्कि पूरे देश में आधे से ज्यादा कर्मचारी आन्दोलन होते ही इसीलिये हैं क्योंकि उनकी मांगों पर समय रहते विचार नहीं होता | हालाँकि पूरी गलती सरकार की भी नहीं रहती क्योंकि कर्मचारी संगठन भी कई बार हठधर्मिता दिखाते हैं | और पूरा देश जिस संसद से चलता है जब वहां भी पूरे के पूरे सत्र में काम नहीं होता तब बाकी लोगों को क्या कहा जाये ? आखिर लोग भी तो अपने नेताओं से ही प्रेरणा लेते हैं | ऐसे में जब कोई दूसरा काम नहीं करता तब हमें होने वाली तकलीफ के समय इस बात को याद करना चाहिए कि हमारे काम बंद करने पर औरों को क्या दिक्कतें होती हैं | उच्च न्यायालय के कड़े आदेश की वजह से भले ही डाक्टरों ने हड़ताल वापस ले ली हो किन्तु न उनकी समस्या हल हुई और न ही इस बात की गारंटी है कि वे दोबारा हड़ताल पर नहीं जायेंगे | सरकारी नौकरी वाले डाक्टर तो चाहे जब सामूहिक इस्तीफे का दबाव डालकर सरकार को झुका लेते हैं | ये सब देखते हुए समय आ गया है जब इस तरह की समस्याओं के समुचित स्थायी हल पर ध्यान दिया जाये क्योंकि आज के दौर में जब समूचा परिदृश्य विकासोन्मुखी हो गया है तब चाहे जब जरूरी सेवाओं का अवरुद्ध हो जाना हमारी प्रगति में बाधक बनता है | और फिर जिस पेशे का सीधा रिश्ता मानवीय ज़िन्दगी से जुड़ा हो उसे उसका दायित्व समझाना पड़े तो ये अच्छी स्थिति नहीं है | वैसे कहें भले न किन्तु हड़ताल पर बैठे डाक्टर भी जब अस्पताल से बिना इलाज लौटते बेहाल मरीज को देखते होंगे तब अपराधबोध तो उन्हें भी परेशान करता ही होगा | बेहतर हो वे भी कोई दूसरा रास्ता तलाशें और सरकार भी इस बारे में सतर्क रहे कि ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 3 May 2023

प्रेस की आजादी के बिना लोकतंत्र की कल्पना असंभव , लेकिन ...



आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है | दुनिया भर में पत्रकारों के संगठन लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की गरिमा और सम्मान के लिए  अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करेंगे | 1993 में संरासंघ द्वारा इस दिवस की शुरुआत की गयी थी | दूसरे महायुद्ध के बाद पूरी दुनिया में उपनिवेशवाद दम तोड़ने लगा और एक के बाद एक देश आजाद होते चले गए जिनमें ने अधिकांश ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपनाया | हालाँकि कालान्तर में उनमें से कुछ में तानाशाही ने पैर जमा लिए जबकि कुछ में साम्यवादी शैली का सीमित प्रजातंत्र स्थापित हुआ , जिसमें लिखने , पढ़ने और  बोलने की आजादी पर पहरे बिठा दिए गए | लेकिन  भारत जैसे अनेक देश ऐसे हैं जिनमें समाचार माध्यमों को संविधान के अंतर्गत पूरी तरह से स्वतंत्रता दी गई | इसका एक कारण ये भी था कि आजादी की लड़ाई के तमाम नेता सक्रिय  रूप से पत्रकारिता से जुड़े रहे | महात्मा गांधी और पंडित नेहरु जैसों ने तक अख़बार शुरू किये | गांधी जी तो अपने अख़बार में नियमित लिखते भी थे | आजादी के बाद कांग्रेस की सत्ता आने पर अनेक नेता वैचारिक मतभेदों की वजह से उससे अलग हो गये और अखबार के जरिये अपने विचारों को जनता के बीच प्रसारित करने लगे | डा. राममनोहर लोहिया , जयप्रकाश नारायण , अटल बिहारी वाजपेयी , दीनदयाल उपाध्याय , चंद्रशेखर , जैसे नेताओं ने अखबार चलाये  या  उनमें लेखन करते हुए लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में योगदान दिया | राजनीतिक दलों ने भी अपने मुखपत्र निकाले जिनके जरिये वे अपनी नीतियों और सिद्धांतों का प्रचार करते रहे | इसके अलावा बड़े औद्योगिक घराने भी समाचार पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन करने लगे | हालांकि उनका उद्देश्य  व्यावसायिक रहा किन्तु आजादी के बाद के दो दशकों तक उन प्रतिष्ठानों में काम करने वाले सम्पादक काफी स्वतंत्र थे जिससे उन प्रकाशनों की नीयत पर सवाल नहीं उठे | लेकिन इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद जब प्रतिबद्ध न्यायपालिका की चर्चा शुरू हुई उसी समय से समाचार माध्यमों पर दबाव बनाने की कार्ययोजना भी बनी | जिसके अंतर्गत कभी साम्प्रदायिकता तो कभी किसी और बहाने अपनी आलोचना करने वाले समाचार पत्रों को मिलने वाले शासकीय विज्ञापन रोकने का हथियार चलाया जाने लगा | 1975 में तो खैर , सेंसरशिप जैसा कदम उठाकर श्रीमती गांधी ने प्रेस की स्वतंत्रता की हत्या ही कर डाली | सैकड़ों समाचार पत्र प्रतिबंधित कर दिए गए | आपातकाल रूपी उस निर्णय ने इंदिरा जी की छवि को आम जनता की निगाह में गिरा दिया जिसका खामियाजा उन्हें चुनावी हार के तौर पर भोगना पड़ा | हालाँकि उसके बाद किसी भी प्रधानमंत्री की वैसा दुस्साहस करने की हिम्मत नहीं पड़ी किन्तु सरकारों में बैठे नेताओं को एक बात समझ में आ गई कि पत्रकारिता में भी रीढ़विहीन लोग आ चुके हैं , जिनसे अपने मनमाफिक लिखवाया जा सकता है | आपातकाल के दौर में इंदिरा जी की चाटुकारिता में कुछ प्रकाशन और सम्पादक बेहद निम्न स्तर तक चले गए | बाद में ऐसे ही लोगों के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने कटाक्ष किया था कि श्रीमती गांधी ने तो कोहनी के बल चलने कहा  किन्तु आप तो रेंगने लगे | आपातकाल के बाद का  दौर पत्रकारिता में पीढ़ी परिवर्तन के लिए  जाना जायेगा | आजादी की  लडाई से से जुड़े रहे पत्रकारों के बाद वे नौजवान इस पेशे में आये जिन पर जयप्रकाश जी  के आन्दोलन का असर था | वैचारिक तौर पर वह कांग्रेस के भी विरुद्ध था और रास्वसंघ के भी | वामपंथ  के साथ भी उसका जुड़ाव क्रन्तिकारी कम रूमानी ज्यादा था | इसीलिये  राजीव गांधी विशाल बहुमत हासिल करने के बाद महज पांच साल बाद ही सत्ता से बाहर आ गये | लेकिन उनके शासनकाल में देश में  कम्प्यूटर और मोबाइल का जो पदार्पण हुआ उसने पूरा परिदृश्य बदल डाला | टेलीविजन पर सरकार का एकाधिकार हटने के कारण निजी चैनलों की बाढ़ आ गयी | और फिर इंटरनेट के फैलाव ने तो समाचार जगत का रंग – रूप , चाल - ढाल सब बदल डाली | बीते तीन दशक में देश और दुनिया में प्रेस शब्द अपना असर खोता जा रहा है | सोशल मीडिया ने पत्रकारिता का जैसा विकेंद्रीकरण किया वह कल्पनातीत है | लेकिन इसके कारण प्रेस की स्वतंत्रता जैसा शब्द भी अपना सम्मान खोने लगा क्योंकि न जाने कितने बंदरों के हाथ उस्तरे लग गए | व्हाटस एप जैसे माध्यमों ने समाचार माध्यमों की गरिमा और गम्भीरता ही खत्म कर दी | आज भारत में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों पर सरकार की भक्ति का आरोप लगता है | ये कहना भी  गलत न होगा कि समाचार माध्यम और उनसे जुड़े पत्रकार अब दो खेमे में बंट गए हैं | पहला भाजपा समर्थक और दूसरा विरोधी | एक के लिए मोदी भगवान हैं तो दूसरे के लिए शैतान से भी बदतर | यू ट्यूब चैनलों के माध्यम से हो रही पत्रकरिता का अपना अलग राग – रंग है | उस आधार पर देखें तो ये कहना गलत न होगा कि प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर किया जाने वाला रोना – धोना बेकार है क्योंकि जब मानसिक रूप से कोई पत्रकार एकपक्षीय हो जाए तब वह पत्रकार नहीं प्रवक्ता हो जाता है | सरकार का  अंध समर्थन और अँधा विरोध दोनों पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध हैं | आज भारत में समाचार माध्यमों की आजादी को लेकर जो स्यापा किया जाता है उसमें उन लोगों का हाथ है जो अख़बारों पर सेंसरशिप लगाये जाने वालों की तरफदारी करते नहीं थकते थे | लेकिन चिंता का विषय है कि विदेशी पूंजी और पुरस्कारों के लालच में पत्रकारों की एक जमात राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध काम कर रही है, जो  अच्छा संकेत नहीं है | लोकतंत्र और समाचार माध्यम सभ्य समाज की पहिचान हैं  | दुर्भाग्य से हमारे देश में दोनों संस्थाओं में विकृति आई है | आज का दिन सही मायनों में प्रेस की स्वतंत्रता के साथ ही उसके कर्तव्यों की चर्चा का भी अवसर हैं | कोई भी  स्वतंत्रता बिना दायित्वबोध के कारगर नहीं होती ,ये बात समाचार माध्यम और उनमें कार्यरत पत्रकारों को भी समझनी होगी | पैकेज की चाहत में अपनी गैरत का सौदा करने वाले किस मुंह से स्वतंत्रता की बात करते हैं , ये बड़ा सवाल है | और देश विरोधी ताकतों की गोद में बैठकर गोदी मीडिया का प्रलाप सिवाय पाखण्ड के और क्या है ?

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 2 May 2023

तो चुनाव के समय रेवड़ी बांटने की जरूरत नहीं पड़ेगी




अर्थव्यवस्था में रूचि रखने वाले हर महीने की आख़िरी तारीख को जारी होने  वाले जीएसटी की वसूली के आंकड़े का इन्तजार करते हैं | इसका कारण ये है कि इसी आधार पर हमारे देश में उत्पादन और व्यापार दोनों की गतिशीलता का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है | उस दृष्टि से दो दिन पहले समाप्त हुए अप्रैल माह में जीएसटी की जो वसूली हुई उसने अर्थव्यवस्था को लेकर किये जा रहे दावों की अधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी है | गत दिवस प्राप्त जानकारी के अनुसार नए वित्तीय वर्ष के पहले महीने में जीएसटी से सरकारी खजाने में 1.87 लाख करोड़ जमा हुए , जो अब तक की सबसे बड़ी राशि है | बीते मार्च माह में 1.60 लाख करोड़ आये थे जबकि गत वर्ष अप्रैल में जीएसटी वसूली का आंकड़ा 1,67 540 करोड़ रहा था | वैसे ये सही है कि वित्तीय वर्ष के पहले माह में ज्यादा जीएसटी जमा होता है लेकिन जबसे ये कर प्रणाली लागू हुई है तबसे ये पहली बार हुआ है कि उसकी मासिक वसूली का आंकड़ा 1.75 लाख करोड़ के महत्वाकांक्षी शिखर से भी काफी ऊपर निकल गया | हालाँकि आगे के महीनों में भी इतना रहे ये जरूरी नहीं है लेकिन संतोष का विषय है कि उसकी वसूली महीने दर महीने बढ़ती ही जा रही है | जब ये कर प्रणाली लागू हुई तब इसे लेकर पूरे देश में उहापोह की स्थिति थी | व्यापारी और उद्योगपति इसकी सफलता को लेकर आशंकित भी थे और भयभीत भी | और फिर इसे लागू करने में जो व्यावहारिक परेशानियाँ आईं उनकी वजह से मोदी सरकार का ये निर्णय राजनीति के साथ ही व्यापार और उद्योग जगत में भी आलोचना का शिकार हुआ | राहुल गांधी तो अपनी सरकार आने के बाद जीएसटी को रद्द करने जैसी बात भी कह चुके हैं | इसमें दो राय नहीं है कि इस कर प्रणाली को लागू किये जाने के बाद इसकी प्रक्रिया  में इतनी जल्दी – जल्दी बदलाव किये गए कि व्यापारी , उद्योगपति ही नहीं अपितु कर सलाहकार और चार्टर्ड अकाउंटेंट तक परेशान हो गए | लगभग हर माह कोई न कोई नया प्रावधान लागू होने से जीएसटी एक बोझ लगने लगा | लेकिन इसके बाद भी इसकी स्वीकार्यता बढ़ती चली गई और देश ने इसे स्वीकार कर ही लिया | यद्यपि आज भी इसमें अनेक विसंगतियां हैं | सबसे बड़ी समस्या राज्यों और केंद्र के बीच विश्वास का संकट है | राज्यों की शिकायत है कि इस कर प्रणाली को लागू करते समय उन्हें मिलने वाली क्षतिपूर्ति की राशि समय पर न मिलने से उनका अर्थतन्त्र गड़बड़ा गया | पेट्रोल – डीजल पर जीएसटी लागू न कर पाने के लिए भी राज्यों में आम सहमति नहीं बन पाना है | इसके साथ ही एक समस्या करों के तीन स्तर होने की भी है | ये देखते हुए अब जबकि जीएसटी की वसूली निरंतर बढ़ती जा रही है तब यूक्रेन संकट के कारण कच्चे तेल के बाजार में अनिश्चितता के चलते पेट्रोल – डीजल को जीएसटी के दायरे में लाना संभव न हो सके लेकिन केंद्र सरकार इतना तो कर ही सकती है कि करों के तीन स्तरों को घटाकर दो कर दे और अधिकतम कर किसी भी स्थिति में 15 फीसदी से ज्यादा न हो | हालाँकि केंद्र और राज्यों की सरकार में बैठे सत्ताधीश और उनके सलाहकार शायद जीएसटी की दरों में कटौती के पक्षधर न हों लेकिन दुनिया के जिन देशों में यह कर प्रणाली लागू है , उनमें से अधिकतर में एक तो अधिकतम दर 12 प्रतिशत है और उसके अलावा केवल एक ही स्तर है | हो सकता है प्रधानमंत्री भविष्य में ऐसा कोई कदम उठायें | देश की आर्थिक स्थिति में सुधार के संकेत हर तरफ से मिल रहे हैं | निर्यात का आंकड़ा भी 2021-22 के  वित्तीय वर्ष की तुलना में 50  फीसदी बढ़ गया है | प्रत्यक्ष कर की वसूली भी बड़ी है | देश रक्षा उत्पादनों के निर्यात के क्षेत्र में आगे आने  लगा है | यही सब देखते हुए विदेशी निवेशक भारत की तरफ आकर्षित हुए हैं जिससे विदेशी मुद्रा का भण्डार अपने उच्चतम स्तर पर आ चुका है | ये स्थितियां निश्चित रूप से आश्वस्त करती हैं | लेकिन इसका अनुभव देश के आम नागरिक को तब तक नहीं होगा जब तक देश की आर्थिक प्रगति उसकी निजी अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान नहीं करती | और जीएसटी वह माध्यम है जिसके जरिये केंद्र और राज्य चाह लें तो आम उपभोक्ता को सीधे राहत दी जा सकती  है | इस बारे में केंद्र सरकार में बैठी भाजपा को चाहिए वह जीएसटी काउंसिल  में अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए उसे द्विस्तरीय बनाये और दरों में भी कमी करने का निर्णय करवाए | चूंकि काउंसिल में भाजपा या उसके समर्थित मुख्यमंत्री बहुमत में हैं इसलिए वे ऐसा करवाने में सक्षम हैं | 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व ही यदि प्रधानमंत्री इस आशय का फैसला करवा सकें तो फिर उन्हें और उनकी पार्टी को चुनाव  के समय रेवड़ी बांटने की जरूरत नहीं पड़ेगी |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 1 May 2023

आम आदमी पार्टी भी चल पड़ी उसे ढर्रे पर



दिल्ली में शराब घोटाले के कारण विवाद में फंसी आम आदमी पार्टी की छवि पर एक और संकट पैदा हो गया है | अपने गठन के समय पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि वे सेवा के लिए राजनीति में आये हैं और आम आदमी पार्टी अपने नाम को सार्थक  साबित करते हुए सत्ता के सभी सुखों से दूर रहेगी | उनका एक पुराना साक्षात्कार इन दिनों काफी प्रसारित हो रहा है जिसमें वे ये कहते सुने जा रहे हैं कि सत्ता में आने पर सरकारी वाहन और बंगला आदि का उपयोग नहीं करेंगे | जब उनसे पूछा गया कि सरकारी शिष्टाचार और  सुरक्षा के तहत उन्हें ये सुविधाएं मिलेंगी तब श्री केजरीवाल का जवाब था कि जब वे लेंगे ही नहीं तो ये सवाल कहाँ पैदा होगा ? अन्ना हजारे के लोकपाल आन्दोलन के गर्भ से उत्पन्न आम आदमी पार्टी उस समय राष्ट्रीय राजनीति में ताजी हवा खुशनुमा झोके के समान थी | उसकी बातों और वायदों में आम जनता के कल्याण की भावना झलकती थी | श्री  केजरीवाल के साथ ऐसे चमकते व्यक्ति जुड़े  जिन्होंने जनता को इस बात के लिए आश्वस्त किया कि वे राजनीति के प्रचलित ढर्रे से हटकर बिना किसी स्वार्थ के  सेवा करेंगे |  इसका एहसास भी हुआ जब  केजरीवाल जी मेट्रो में बैठकर शपथ लेने गए | कुछ दिनों तक ये लगा कि ये वो पार्टी है जो अन्ना हजारे की उम्मीदों को साकार कर दिखायेगी | मुफ्त बिजली ,पानी के साथ ही मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी विद्यालयों के उन्नयन जैसे कार्यों से केजरीवाल सरकार ने दिल्ली ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भी अपने लिए आकर्षण पैदा किया | लेकिन इसके साथ ही उसके भीतर  खींचतान  होने लगी | मुद्दा , वही जिसके चलते आजादी के बाद आचार्य नरेंद्र देव , डॉ. लोहिया , जयप्रकाश नारायण और  आचार्य कृपलानी  जैसे समर्पित गांधीवादी कांग्रेस छोडकर बाहर आ गये थे | आम आदमी पार्टी के संस्थापक और उसे एक करोड़ का चेक बतौर पहला चन्दा वाले शांति भूषण , उनके पुत्र प्रशांत भूषण , प्रख्यात कवि कुमार विश्वास , चुनाव विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव और  प्रोफे. आनंद कुमार जैसे नींव के पत्थर धीरे – धीरे या तो बाहर  आ गए या बाहर कर दिए गए | टीवी पत्रकार आशुतोष  भी कुछ समय के लिए इस पार्टी में रहने के बाद मोहभंग होने पर अपने पेशे में लौट आये | कुमार विश्वास और योगेन्द्र यादव ने तो सार्वजनिक तौर पर अनेक अवसरों पर उन विकृतियों को उजागर किया जिनकी वजह से वे पार्टी छोड़ने बाध्य हुए | उनका खुला आरोप था कि सत्ता का सान्निध्य  मिलते ही श्री केजरीवाल और उनके  निकटस्थ उन आदर्शों और सिद्धांतों को भुला बैठे जिनके आधार पर वह पार्टी बनाई गयी थी | राजनीति में मतभेदों के चलते इस तरह के आरोप लगना चूँकि नया नहीं था,  लिहाजा बात आई - गई  हो गई | और फिर दिल्ली की जनता ने लगातार दो बार भारी बहुमत के साथ सत्ता सौंपकर आलोचकों को निराश कर दिया | रही सही कसर पूरी कर दी पंजाब में आम आदमी पार्टी के  सत्ता में धमाकेदार प्रवेश ने | अब तो वह राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत में भी आ चुकी है | और श्री केजरीवाल का नाम भावी प्रधानमंत्री के लिए  सर्वेक्षण में शामिल होने लगा है | अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी हाथ आजमाने के हौसले  से भरपूर है | लेकिन एक तरफ तो उसके आकार और  प्रभावक्षेत्र का विस्तार होता दिख रहा है वहीं  दूसरी तरफ वह उन समस्त बुराइयों का शिकार होती जा रही है जो अन्य राजनीतिक दलों के साथ स्थायी तौर पर जुड़ चुकी हैं | इसी के साथ उस पर वे सभी आरोप चस्पा होने लगे जिनकी वजह से राजनीति जैसा सम्मानजनक क्षेत्र और नेता संबोधन बदनाम होकर रह गया | केजरीवाल सरकार के स्वास्थ्य मंत्री लम्बे समय से जेल में हैं | उसके बाद मार्च के अंतिम दिनों में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया भी शराब घोटाले में गिरफ्तार हो गए | दोनों की जमानत अर्जियां आये दिन रद्द हो रही हैं | इस घोटाले के दाग मुख्यमंत्री के दामन पर भी हैं | लेकिन जिस मामले को लेकर श्री केजरीवाल इन दिनों साख के संकट से गुजर रहे हैं वह है उनके सरकारी निवास के पुनरुद्धार पर 45 करोड़ रूपये खर्च किया जाना | जो  जानकारी सरकारी तौर पर सामने आई है उसके अनुसार अंग्रेजों के ज़माने के बने इस बंगले की  मरम्मत की जरूरत महसूस की गई | लेकिन उससे बढ़कर  शाही सजावट पर पानी की तरह पैसा खर्च करने के बारे में जैसे ही जानकारी आई तो आम आदमी पार्टी और श्री केजरीवाल दोनों आलोचना के घेरे में आ गए | बजाय इसके लिए अपराधबोध से ग्रसित होने के पार्टी के एक प्रवक्ता ने ये कह दिया कि प्रधानमंत्री के बंगले पर तो उससे कई गुना ज्यादा खर्च हुआ | लेकिन ये सफाई संतोषजनक नहीं है | सामान्य तौर पर देखें तो देश भर में मुख्यमंत्रियों सहित उनके मंत्रियों के बंगलों पर बेतहाशा खर्च होता रहा है | इसे लेकर बवाल और सवाल भी  होते रहे |  ऐसे में ये पूछा  जा सकता है कि श्री  केजरीवाल को ही निशाने पर क्यों लिया जा रहा है और जवाब है क्योंकि उन्होंने ऐलानिया तौर पर बंगले , गाड़ी और सुरक्षा जैसे तामझाम से साफ़ मना कर दिया था | यदि बंगला ले भी लिया और उसकी मरम्मत जरूरी थी तो वहां तक भी बात सही थी किन्तु यदि साज – सज्जा पर शाही अंदाज में खर्च किया जाता है तब श्री केजरीवाल को आलोचनाओं का जवाब देने सामने आना चाहिए | प्रधानमंत्री  या किसी और का उदाहरण देकर अपने कार्य पर पर्दा डालने का अधिकार उन्हें नहीं रह गया | आम आदमी पार्टी की जो छवि आम जनता के बीच बनी थी उससे ये विश्वास पैदा हुआ कि देश में नई राजनीतिक संस्कृति का प्रादुर्भाव होगा  किन्तु सिवाय मुफ्त बिजली – पानी के केजरीवाल सरकार ऐसा क्या कर पाई जिसकी वजह से वह देश की सत्ता संभालने की हसरत पाल रही है | और अब मुफ्त उपहार तो हर पार्टी दिल खोलकर लुटा रही है |  तब केजरीवाल जी में कुछ अनोखा नहीं बचा | दरअसल  अपनी बात से पलट जाने की उनकी आदत और धीरे – धीरे सत्ता के सारे सुखों को हथिया लेने की अनैतिकता से विश्वास का संकट  और गहराया है | देश में जो आशा की किरण इस पार्टी और उसके नेताओं ने जगाई थी वह निराशा में बदल गयी है | मुख्यमंत्री के  बंगले में जनता का 45 करोड़ फूंककर केजरीवाल सरकार ने साबित कर दिया कि वह आम आदमी पार्टी नहीं बल्कि आम राजनीतिक  पार्टी ही है जिसकी कथनी  और करनी में जमीन आसमान का अंतर है |


- रवीन्द्र वाजपेयी