Wednesday, 17 May 2023

मुसलमानों ने कांग्रेस से मांगी अपने समर्थन की कीमत




कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के लिए  उसके पक्ष में मुस्लिम  मतदाताओं की गोलबंदी होने की  बात पहले ही  सामने आ चुकी है।  लेकिन अब जो  सुनने मिल रहा है उससे ये साफ है कि आगामी चुनावों में मुसलमान  भाजपा को हराने के लिए जो भी विकल्प नजर आएगा उसके साथ खड़े हो जायेंगे | प.बंगाल के पिछले चुनाव में इसका प्रमाण देखा जा चुका है | कर्नाटक के ताजा चुनाव परिणाम के बाद  मुस्लिम समुदाय द्वारा  कांग्रेस को जिताने की कीमत के तौर पर उपमुख्यमंत्री पद के साथ पांच महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री पद मांगे जा रहे हैं  | मुस्लिम वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शफ़ी सादी ने  कहा है कि कांग्रेस को पहले ही  बता दिया गया  था कि उपमुख्यमंत्री मुस्लिम होना चाहिए |  चूंकि एक समुदाय के तौर पर हमने कांग्रेस की बहुत मदद की है इसलिए समय आ गया है जब बदले में हमको भी कुछ मिले | सादी ने गृह , राजस्व ,  शिक्षा और  स्वास्थ्य  जैसे मंत्रालय  मांगे हैं | उनके अनुसार इन सभी को लागू करने हेतु सुन्नी उलेमा बोर्ड में आपातकालीन बैठक भी की जा चुकी है | उनने ये भी कहा कि हमारी सहायता के लिए धन्यवाद देना कांग्रेस की जिम्मेदारी है | इस मांग के सामने आते ही कर्नाटक ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति में भी मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा चुनाव जिताने के एवज में सौदेबाजी का चलन सामने आने के साथ ही कांग्रेस पर ये स्पष्ट करने का  दबाव आ गया है कि क्या उसने मुस्लिम मतों के बदले उपमुख्यमंत्री पद का वायदा किया था ? ये बात भी स्पष्ट हो गयी कि मुस्लिमों के समर्थन का आधार अब केवल भाजपा की पराजय को सुनिश्चित करना होगा | बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने पांच सीटें जीतकर तेजस्वी यादव का खेल बिगाड़ दिया था | इसी तरह उ.प्र में भी ओवैसी ने मुस्लिम मतों में विभाजन करवाया जिससे सपा को नुकसान हुआ | उसके बाद से ही ओवैसी को  भाजपा की बी टीम प्रचारित किया जाने लगा  | कर्नाटक के चुनाव ने ओवैसी की उस योजना को भी धक्का पहुँचाया है जिसके अंतर्गत वे मुसलमानों को अपने झंडे तले इकट्ठा करते हुए उनको एक राजनीतिक ताकत के तौर पर स्थापित करना चाह रहे थे | तेलंगाना में भी विधानसभा चुनाव निकट हैं जो ओवैसी का घरेलू मैदान है |  वहां सत्तारूढ़ बीआरएस और उसके मुखिया के. सी. राव सबसे मजबूत माने जा रहे हैं । वहीं कांग्रेस के  लगातार कमजोर होने से भाजपा ने विकल्प के तौर पर अपने पैर जमाये हैं | ऐसे में तेलंगाना का मुसलमान भाजपा को रोकने के लिए श्री राव को समर्थन देगा या कांग्रेस को ,  ये बड़ा सवाल है | ऐसे में ओवैसी  यदि  तेलंगाना में मुस्लिम समुदाय के सरदार नहीं बन पाए तब उनका क्या होगा ये चिंता भी उनको करनी होगी | बहरहाल कर्नाटक के मुस्लिम समुदाय द्वारा महज 9 विधायकों के साथ ही उपमुख्यमंत्री और पांच प्रमुख विभागों के मंत्री मांगने की जो हिम्मत की गई ,  उसे कांग्रेस किस सीमा तक स्वीकार करेगी ये देखने वाली बात होगी  क्योंकि यदि वह वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष की मांगों को मान लेती है तब ये कहना न गलत  नहीं होगा कि साम्प्रदायिकता को दिन रात गालियाँ देने वाली पार्टी ने  सत्ता हासिल करने के लिए मुल्ला – मौलवियों के साथ गुपचुप समझौता किया था | अभी तक शफी साद द्वारा की गयी मांग के बारे में कांग्रेस के किसी नेता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं  दी है । लेकिन मुस्लिम पक्ष ने जिस तरह कहा है कि चुनाव के पहले ही मुस्लिम उपमुख्यमंत्री की बात हो चुकी थी उससे लगता है कि अब वे भाजपा को हरवाने से ही संतुष्ट नहीं होने वाले | अपितु उनको समर्थन के बदले उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी भी चाहिए | स्मरणीय है सपा के संस्थापक स्व. मुलायम सिंह यादव के दाहिने हाथ कहे जाने वाले आज़म खान को लगता रहा कि मुलायम सिंह उनको उत्तराधिकारी बनायेंगे किन्तु  जब उन्होंने अपने पुत्र अखिलेश को मुख्यमंत्री बनवा दिया  तभी से आज़म खान उखड़े – उखड़े रहने लगे | लेकिन कर्नाटक के नतीजे के बाद जिस तरह से मुस्लिम उलेमाओं ने कांग्रेस पर दबाव बनाना शुरू किया उससे  राजनीति की नई सूरत सामने आई है । जिस तरह से शफी साद ने कांग्रेस से धन्यवाद देने के बात कही उससे साफ है कि चुनाव जीतने कांग्रेस ने मुस्लिमों को सत्ता में हिस्सेदारी का वायदा किया था। मुस्लिम नेता का ये कहना मायने रखता है कि 136 में से 72 यानि आधे से ज्यादा सीटें कांग्रेस मुस्लिम समर्थन से जीती। गौरतलब है कर्नाटक में भाजपा का मत प्रतिशत यथावत रहा किंतु जनता दल (एस) के 5 फीसदी मत कांग्रेस के खाते में  चले जाने से उसे स्पष्ट बहुमत मिल गया। दरअसल उसके नेता कुमारस्वामी का रिकॉर्ड देखते हुए मुसलमानों को लगा कि त्रिशंकु की स्थिति में वे भाजपा के साथ जा सकते हैं। इसीलिए उन्होंने जनता दल (एस) से किनारा करते हुए कांग्रेस की झोली भर दी। बहरहाल , कर्नाटक की राजनीति में मुस्लिम समीकरण का ये उभार कांग्रेस ही नहीं बाकी गैर भाजपा पार्टियों के लिए भी सिरदर्द बन सकता है क्योंकि अब मुसलमान वोट देने के बाद  सत्ता में हिस्सेदारी भी मांगने लगे हैं । शफी साद ने कहा भी है  कि मुसलमानों के लिए 30 सीटें कांग्रेस से मांगी थी किंतु 15 मिलीं और उनमें से 9 जीतकर आए। कर्नाटक के कुछ  उलेमा तो मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग भी करने लगे हैं , जो  दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। स्मरणीय है आजादी के कुछ दशक पहले अंग्रेजों की शह पर मो.अली जिन्ना ने भी मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग बुलंद कर पाकिस्तान के निर्माण की बुनियाद रखी थी। ये देखते हुए  सवाल ये है कि आने वाले समय में अपने  समर्थन के बदले  मुस्लिम समुदाय केंद्र में उपप्रधानमंत्री के अलावा रक्षा , गृह और विदेश विभाग में मुस्लिम मंत्री की मांग करेगा तब कांग्रेस या बाकी धर्मनिरपेक्ष दल क्या उसे मंजूर करेंगे ?

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 16 May 2023

राजस्थान में मंत्री ही कह रहा सरकार को भ्रष्ट तब कांग्रेस नेतृत्व मौन क्यों



कर्नाटक में भाजपा की करारी हार के  संकेत गत वर्ष अप्रैल माह में  एक ठेकेदार की  मौत के बाद ही मिलने लगे थे जब पूर्व मंत्री और पार्टी के वरिष्ट नेता के.एस, ईश्वरप्पा पर 40  प्रतिशत कमीशन मांगने का आरोप लगा | बाद में मामला और आगे बढ़ा जब ठेकेदारों के संघ ने राज्य सरकार के विभागों में भुगतान न होने और भ्रष्टाचार के कारण  बाहरी ठेकेदारों को काम देने का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन भी किये | उसी के कारण भाजपा की बोम्मई सरकार 40 परसेंट के नाम से बदनाम होने लगी | कांग्रेस के स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय नेताओं तक ने भाजपा को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी | यद्यपि भाजपा के प्रचारतंत्र ने भी कांग्रेस  के राज में हुए भ्रष्टाचार की सूची सार्वजनिक करते हुए जवाबी दाँव चला लेकिन जनता के मन में कहीं न कहीं 40 परसेंट वाली बात घर कर गयी जिसकी वजह से सुशिक्षित मतदाताओं ने उसकी पराजय का मन बना लिया | पार्टी समर्थक वह तबका जो उसके विरोध में मतदान नहीं करना चाहता था वह घर से नहीं निकला और यही कारण रहा कि शहरी क्षेत्रों में भी भाजपा को निराशा हाथ लगी | हालांकि ये अकेला मुद्दा नहीं था जिसने कांग्रेस को भारी जीत दिलवाई किन्तु ये बात माननी होगी कि भाजपा की  पराजय की नींव इसी आरोप पर रखी गयी | लेकिन कर्नाटक के चुनाव से अलग हटकर निगाह घुमाएँ तो कांग्रेस शासित राजस्थान में इन दिनों मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच चल रहे राजनीतिक मुकाबले से कांग्रेस के लिए जो शोचनीय स्थिति उत्पन्न हो गयी है वह उसके लिए आगामी विधानसभा चुनाव में गड्ढा खोदने का काम कर सकती है | श्री पायलट आये दिन मुख्यमंत्री पर ये आरोप लगा रहे हैं  कि वे पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विरुद्ध भ्रष्टाचार के जो आरोप उनके द्वारा लगाये गए थे , उनकी जांच करवाने से कतरा रहे हैं | इसके जवाब में श्री गहलोत ने पायलट समर्थक विधायकों पर सरकार गिराने के लिए भाजपा से करोड़ों रुपए लेने का आरोप लगाते हुए ये तंज कसा कि वे पैसे लौटाने में असमर्थ हों तो उनको कांग्रेस के फंड से दिलवा दिए जायेंगे और उसी के साथ उन्होंने वसुंधरा राजे की ये कहते हुए तारीफ भी कर डाली कि उनके कारण ही पायलट खेमे की  बगावत विफल हो गई। उल्लेखनीय है हाल ही में श्री पायलट ,  वसुंधरा राजे की जांच हेतु दिन भर धरना भी दे चुके थे। उसके बाद उन्होंने भ्रष्टाचार के तीन मामलों की जांच हेतु अजमेर से जयपुर तक पांच दिवसीय पद यात्रा भी की जिसके समापन पर गत दिवस जयपुर में जबरदस्त भीड़ उमड़ी तथा 14 विधायकों  सहित एक राज्य मंत्री राजेंद्र गुढ़ा भी उपस्थित रहे जिन्होंने आरोप लगाया कि गहलोत सरकार ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं और बिना पैसे लिए कोई काम नहीं होता । दूसरी तरफ श्री पायलट ने चेतावनी दी कि 15 दिन में यदि उनके द्वारा उठाए तीनों मामलों में जांच शुरू नहीं की जाती तब वे प्रदेशव्यापी आंदोलन करेंगे। इस मामले में श्री गहलोत और श्री पायलट के बीच की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता तो समझ में आती है किंतु जब राज्य  का एक मंत्री ही सार्वजनिक सभा में ये कहे कि सरकार ने भ्रष्टाचार के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं तब फिर विपक्ष के लिए कहने के लिए कुछ बचता ही कहां है ? और मुख्यमंत्री अपने विधायकों पर विपक्षी पार्टी से उसकी सरकार गिराने के एवज में करोड़ों की  धनराशि लेने के बात ऐलानिया कहता फिरे तब उन विधायकों की बेईमानी और गद्दारी को प्रमाणित करने की जरूरत ही नहीं बच रहती।  ऐसे में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को इस बात का स्पष्टीकरण देना चाहिए कि कर्नाटक के ठेकेदारों द्वारा भाजपा की राज्य सरकार पर कमीशनखोरी का आरोप लगाए जाने के बाद पार्टी ने उसी से अपना चुनाव प्रचार शुरू किया किंतु राजस्थान में उसकी अपनी सरकार पर उसी का एक मंत्री रिकॉर्ड तोड़ भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के बावजूद सत्ता में कैसे बना है ?  और जिन विधायकों पर खुद मुख्यमंत्री करोड़ों रु.भाजपा से लेने का आरोप लगा रहे हैं उनके विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई हुई ? कर्नाटक में भाजपा सरकार को तो जनता ने सजा दे दी किंतु जब राजस्थान में उसके अपने ही मंत्री द्वारा सरकार और मुख्यमंत्री द्वारा  विधायकों पर भ्रष्टाचार के आरोप बेधड़क लगाए जा रहे हैं तब कांग्रेस नेतृत्व इस बारे में आंखें मूंदकर क्यों बैठा हुआ है ? आज तक न तो राहुल गांधी और न ही किसी अन्य नेता ने  राजस्थान में कांग्रेस के भीतर से ही सरकार और पार्टी दोनों  पर लगाए जा रहे आरोपों के बारे में एक शब्द नहीं कहा ।  भाजपा से मिलकर सरकार गिराने के लिए करोड़ों डकारने के आरोपी विधायक भी पार्टी में बने हुए हैं और सरकार को  भ्रष्टतम कहने वाले मंत्री महोदय भी सरकार का हिस्सा हैं । ये स्थिति हास्यास्पद भी है और चिंताजनक भी। विपक्ष द्वारा लगाए जाने वाले  आरोपों को सत्ता पक्ष द्वारा नकारे जाने पर  किसी को आश्चर्य नहीं होता लेकिन राजस्थान में तो कांग्रेसी कुनबे में ही आरोप - प्रत्यारोप का सिलसिला जिस तरह बेशर्मी  के साथ चल पड़ा है उसे देखते हुए आगामी चुनाव में जब श्री पायलट और श्री गहलोत द्वारा चलाए जा रहे आरोपों के तीर यदि विपक्ष के हाथ में बतौर हथियार काम करेंगे तब राहुल गांधी किस मुंह से बचाव करेंगे ये बड़ा सवाल है क्योंकि भ्रष्टाचार हमारे देश की ऐसी बुराई है जिसमें सभी पार्टियां लिप्त हैं। मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है किंतु पूरी तरह पाक - साफ होने का दावा कोई नहीं कर सकता । देखने वाली बात ये होगी कि कर्नाटक में भाजपा सरकार को 40 परसेंट कमीशन के नाम पर घेरने वाली कांग्रेस , राजस्थान में अपनी सरकार के बारे में क्या करती है ? 

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 13 May 2023

द केरला स्टोरी : चंद्रचूड़ का सवाल विचारणीय



इन दिनों देश भर में  द केरला स्टोरी नामक फिल्म की बड़ी चर्चा है। इसमें ये दर्शाया गया है कि किस तरह हिंदू लड़कियों को भावनात्मक तरीके से बहलाकर इस्लामी  आतंकवाद के जाल में फंसाया जाता है ।  फिल्म पर रोक लगाने की अर्जी भी लगी किंतु केरल उच्च न्यायालय ने उसे नामंजूर कर दिया। लेकिन पहले  तमिलनाडु और फिर प. बंगाल की सरकार को  उक्त फिल्म की  वजह से राज्य की कानून व्यवस्था के लिए खतरा महसूस हुआ और उन्होंने इस  पर रोक लगा दी। इसके विरोध में फिल्म निर्माताओं द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई गई जिसने गत दिवस प. बंगाल सरकार से  पूछा कि जब पूरे देश में फिल्म देखी जा रही है तब उस पर प्रतिबंध लगाने का क्या औचित्य है ? तमिलनाडु सरकार को भी नोटिस भेजा गया है।  मुख्य न्यायाधीश डी. वाय.चंद्रचूड ने टिप्पणी की कि फिल्म अच्छी है या बुरी इसका निर्णय जनता को करने दीजिए। इसके पहले अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने भी फिल्म का विरोध करने पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा था कि सेंसर बोर्ड की स्वीकृति ही किसी फिल्म के प्रदर्शन का आधार माना जाना चाहिए। बहरहाल द केरला स्टोरी पूरे देश में  पसंद की जा रही है और व्यवसायिक तौर पर भी उसने अच्छा कारोबार किया है। हालांकि ये भी सच है कि भाजपा द्वारा उसका समर्थन किए जाने और उसके शासित राज्यों में पार्टी  नेताओं द्वारा कार्यकर्ताओं के साथ सामूहिक रूप से फिल्म देखे जाने के कारण भी उसे अतिरिक्त आय हुई है। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो निष्पक्ष समीक्षक भी मानते हैं कि फिल्म का कथानक सच्चाई के करीब होने से प्रभावशाली है। लव जिहाद एक सामाजिक समस्या के तौर पर सामने आया है। इसका अपराधिक और आतंकवादी पहलू भी विभिन्न प्रकरणों में उजागर हो चुका है। वैसे तो देश के अनेक हिस्सों से इस आशय की खबरें आया करती हैं किंतु केरल में मुस्लिम आबादी की बहुलता और फिर उसके युवकों का बड़ी संख्या में खाड़ी देशों में कार्यरत होना भी लव जिहाद में सहायक हुआ है। संदर्भित फिल्म में जो दिखाई गया वह बेहद गंभीर विषय है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद का प्रतीक माने जाने वाले संगठन के साथ लव जिहाद के तार जुड़े बताए गए हैं। फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अब सामाजिक जीवन से जुड़ी समस्याओं और घटनाओं को पटकथा का विषय बनाया जाने लगा है। ओटीटी नामक नए माध्यम में तो खुलेपन के नाम पर जो दिखाया जा रहा है वह भारतीय संदर्भों में घोर आपत्तिजनक होने के बाद भी  सेंसर बोर्ड का नियंत्रण नहीं होने से  सांस्कृतिक प्रदूषण के तौर पर  घर - घर में घुसता जा रहा है । लेकिन  उसका विरोध करने के बजाय जब कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी जैसी फिल्मों पर प्रतिबंध लगाए जाने की कोशिश होती है तब ये सोचना पड़ता है कि राजनीतिक नफे - नुकसान के मद्देनजर हमारे राजनेता उन सच्चाइयों पर पर्दा डालने से बाज नहीं आते जिनसे देश का हित - अहित जुड़ा हुआ है। विवेक अग्निहोत्री की कश्मीर फाइल्स नामक फिल्म में 1990 में कश्मीर घाटी से पंडितों के पलायन को आधार बनाकर वास्तविकता का जो चित्रण किया गया , उस  बारे में देश कम ही जानता था । इसी तरह लव जिहाद ,  हिंदू लड़की को प्रेम जाल में  फंसाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाने तक सीमित माना जाता था परंतु  द केरला स्टोरी ने जो दिखाया उसने दर्शकों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे अपनी बच्चियों को इस खतरे से बचाने के प्रति सतर्क रहें । फिल्म के प्रस्तुतीकरण में कुछ नाटकीयता हो सकती है किंतु उसे सिरे से नकारते हुए उसका  प्रदर्शन रोकना संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक है। इसलिए श्री चंद्रचूड़ की ये टिप्पणी विचारणीय है कि फिल्म अच्छी है या बुरी इसका फैसला दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए। उस लिहाज से हाल ही  में प्रदर्शित कुछ फिल्मों के विरोध का जो सिलसिला चला उससे गलत परिपाटी तैयार हो रही है। शाहरुख खान की पठान फिल्म के कुछ दृश्यों को लेकर उसका जबर्दस्त विरोध हुआ तो उसके समर्थक भी सामने आ  गए । फिल्म ने रिकॉर्ड तोड़  सफलता हासिल कर ली। जिसके कारण विरोध बेअसर साबित हुआ। हालांकि ये भी सही है कि फिल्म निर्माण करने वाले और उसकी पटकथा लिखने वालों को समाज की भावनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए । भारत जैसे देश में जहां धार्मिक विविधता के अलावा सामाजिक और क्षेत्रीय भावनाएं काफी प्रबल हैं , वहां फिल्म बनाना बेहद कठिन काम है। विशेष रूप से आज के दौर में जब संचार क्रांति के कारण फिल्म प्रदर्शित होने के पूर्व ही उसके बारे में पूरी जानकारी सार्वजनिक हो जाती है जिससे उसे लेकर विरोध और समर्थन भी शुरू हो जाता है।  लेकिन द केरला स्टोरी सदृश फिल्में तो समाज को जागरूक और जिम्मेदार बनाने में सहायक होती हैं । ऐसे में ममता बैनर्जी और स्टालिन जैसे नेताओं को उस पर रोक लगाने से पहले अपने फैसले के औचित्य पर ध्यान देना चाहिए था। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रचूड़ का ये पूछना तर्कसंगत है कि जब पूरे देश में उक्त फिल्म शांति के साथ चल रही है तब उस पर रोक लगाने का आधार क्या है ? इसलिए ये उम्मीद की जा सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी फैसला इस बारे में आयेगा वह भविष्य के लिए दिशा निर्देशक बन सकता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 12 May 2023

फैसला हुआ भी और नहीं भी



सर्वोच्च न्यायालय ने गत वर्ष  महाराष्ट्र में हुए सत्ता परिवर्तन पर जो  फैसला दिया वह कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि उसमें राज्यपाल और विधानसभा के स्पीकर की शक्तियों और आचरण पर साफ़ – साफ टिप्पणियाँ करते हुए कहा गया है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को सदन  में बहुमत साबित करने का निर्देश देकर राज्यपाल ने गलत किया क्योंकि शिवसेना के बागी विधायकों ने ऐसा कोई अनुरोध उनसे नहीं किया था | इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने स्पीकर द्वारा बागी गुट की ओर से नया सचेतक नियुक्त किये जाने को भी नियम विरुद्ध बताते हुए कहा कि ये परिवर्तन करने का अधिकार भी शिवसेना के अविभाजित गुट के पास ही था | लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने 16 शिवसेना  विधायकों की योग्यता संबंधी उद्धव गुट की अर्जी का फैसला करने का निर्देश स्पीकर को देते हुए कहा कि उनके अधिकारों पर फैसला करने का निर्णय पांच सदस्यीय संविधान पीठ के लिए संभव नहीं है इसलिए उसे सात सदस्यों वाली बड़ी पीठ को अग्रेषित किया जा रहा है , जो निश्चित समय सीमा के भीतर अपना  फैसला सुनाएगी | मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली उक्त पीठ ने पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे द्वारा उनकी सरकार की बहाली की अर्जी को ये कहते हुए रद्द कर दिया कि चूंकि उन्होंने खुद होकर अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया था इसलिए उनको बहाल किया जाना असंभव है | इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में जो कुछ भी कहा वह कानून की व्याख्या के साथ बौद्धिक महत्व तक सीमित होकर रह गया | गौरतलब है इस फैसले का महाराष्ट्र की राजनीति पर गहरा असर होने की संभावना राष्ट्रीय स्तर तक व्यक्त की जा रही थी | शरद पवार की पार्टी एनसीपी में हुई उठापटक को भी इसी से जुड़ा माना जा रहा था | श्री पवार के भतीजे अजीत को एकनाथ शिंदे का विकल्प बनाने की बात भी राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा का विषय बनी रही | शरद पवार द्वारा पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिए जाने के बाद तो उनका और भाजपा का गठबंधन होने की अटकलें भी हवा में तैरने लगीं | लेकिन गत दिवस आये फैसले के बाद उन सब पर फ़िलहाल विराम लग गया है | एकनाथ शिंदे सरकार के भविष्य पर मंडरा रहा खतरा भी सात सदस्यों वाली बड़ी पीठ के फैसले तक तो टल ही गया है | उसके पहले स्पीकर 16 विधायकों की योग्यता पर क्या फैसला लेते हैं ये देखने वाली बात होगी क्योंकि वे इसे कब तक लंबित रखें इसे लेकर कोई समय सीमा तय नहीं की गई है | बहरहाल इस फैसले में एक बात अजीब है कि गत वर्ष राज्यपाल द्वारा जब उद्धव ठाकरे को सदन में बहुमत साबित करने कहा गया था तब राजभवन के उस फैसले पर रोक लगाने की अर्जी सर्वोच्च न्यायालय ने ही ठुकरा दी थी । जबकि गत दिवस आये निर्णय में राज्यपाल के निर्णय को गलत ठहराया गया है | लेकिन सबसे बड़ी बात 16 बागी विधायकों की अयोग्यता से सम्बंधित थी जिस पर संविधान पीठ ने आलोचनात्मक टिप्पणियाँ तो कीं किन्तु अध्यक्ष के अधिकारों सबंधी निर्णय करने में खुद को अक्षम मानते हुए सात सदस्यों की पीठ को अंतिम फैसला करने हेतु भेजे जाने से ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जब पांच सदस्यों वाली पीठ ने अध्यक्ष के निर्णयों को गलत ठहरा दिया तो फिर उसे 16 सदस्यों वाले मामले में भी अपना मत देना चाहिए था | यदि उसे लग रहा था कि पांच सदस्यों वाली पीठ की सीमायें हैं तब पहले ही बड़ी पीठ के समक्ष सुनवाई होती जिससे इस समूचे मामले में अभी भी जो अनिश्चितता बनी हुए है वह खत्म हो सकती थी | इस मामले में राज्यपाल और स्पीकर की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने जो कटाक्ष किये उनका महत्व इसलिए नहीं रह गया क्योंकि संविधान पीठ ने जो कुछ भी कहा उसका तात्कालिक नतीजा तो कुछ निकला ही नहीं | आगामी वर्ष वैसे भी महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने हैं | ऐसे में यदि सात सदस्य  वाली पीठ ने भी लम्बा समय लिया तब इस मामले का किताबी महत्व ही रह जाएगा | ऐसा ही 1992 में बाबरी ढांचा टूटने के बाद  भाजपा की राज्य सरकारों को भंग करने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लेकर हुआ था जिसमें म.प्र .की पटवा सरकार की बर्खास्तगी को अवैध ठहराया गया था । लेकिन तब तक अगला चुनाव भी हो चुका था | बेहतर हो न्यायपालिका ऐसे प्रकरणों में समय की नजाकत को भी समझा करे अन्यथा उसके फैसले होकर भी न हुए जैसे रह जायेंगे | महाराष्ट्र संबंधी ताजा फैसले के साथ भी ऐसा ही है |


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 11 May 2023

राष्ट्रीय राजधानी में दो सरकारों के होते झगड़े रुकने वाले नहीं




सर्वोच्च न्यायालय ने  दिल्ली की चुनी हुई सरकार को प्रशासनिक अमले के स्थानांतरण एवं पदस्थापना संबंधी अधिकार देते हुए स्पष्ट किया कि उपराज्यपाल भूमि , कानून व्यवस्था और पुलिस संबंधी निर्णय छोड़कर  अधिकारियों के तबादले आदि के मामले में निर्वाचित सरकार का निर्णय मानने बाध्य होंगे। प्रधान न्यायाधीश डी. वाय.चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने अतीत में उच्च न्यायालय द्वारा इस बारे में उपराज्यपाल के पक्ष में दिए फैसले से असहमति जताते हुए कहा कि चूंकि दिल्ली की सरकार को कानून बनाने का अधिकार है तब अधिकारियों के तबादले और पोस्टिंग जैसे निर्णयों में उपराज्यपाल की मर्जी के अधीन रहने से संघीय ढांचे की परिकल्पना को धक्का पहुंचेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने दो टूक कहा कि भले ही दिल्ली पूर्ण राज्य न हो लेकिन उसमें केंद्र का नियंत्रण इतना ज्यादा नहीं होना चाहिए जिससे राज्य का काम प्रभावित हो। साथ ही पीठ ने ये टिप्पणी भी की यदि प्रशासनिक अमले का स्थानांतरण और पदस्थापना का अधिकार चुनी हुई सरकार के पास नहीं रहेगा तो नौकरशाही उसके नियंत्रण में भी नहीं रहेगी। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में दिल्ली सरकार की ओर से पेश इस तर्क को स्वीकार किया कि  उपराज्यपाल के अधीन रहने से वह काम करने में अड़चन महसूस करती है। इस फैसले को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की भी जीत माना जायेगा। साथ ही इसके कारण केंद्र सरकार की जबर्दस्त किरकिरी भी हुई जिसके ऊपर ये आरोप लगा करता है  कि राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के कारण वह केजरीवाल सरकार को काम नहीं करने देती और छोटी - छोटी सी बातों पर उपराज्यपाल के जरिए अड़ंगेबाजी करती है। ये बात पूरी तरह सही है कि जबसे दिल्ली में केजरीवाल सरकार बनी तभी से उसका केंद्र के साथ टकराव होता रहा है। इसमें कौन कितना सही या गलत है इसका निर्णय करना आसान नहीं होगा क्योंकि दोनों पक्षों ने किसी न किसी रूप में मर्यादा का उल्लंघन किया। संघीय ढांचा नामक व्यवस्था में नियंत्रण और संतुलन के साथ ही सामंजस्य और सौजन्यता की  भी आवश्यकता होती है। दुर्भाग्य से हमारे देश में राजनीतिक मतभेद चूंकि मनभेद का रूप ले चुके हैं इसलिए विरोधी विचारधारा वाली केंद्र और राज्य सरकार के बीच तनाव और टकराव चलता रहता है। लेकिन केंद्र शासित क्षेत्र को तो एक तरह से केंद्र सरकार के उपनिवेश जैसा मान लिया जाता है। इसीलिए उपराज्यपाल भी चुनी हुई सरकार पर हावी रहते हैं। जिन भी केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र की विरोधी पार्टी का शासन  है वहां इस तरह के झगड़े होते रहते हैं।  पुडुचेरी और दिल्ली के अलावा जम्मू - कश्मीर में भी विधानसभा बनाई गई और प्रदेश की सरकार बाकायदा चुनाव के जरिए बनती है। यद्यपि 370 खत्म होने के पहले जम्मू - कश्मीर भी पूर्ण राज्य था और केंद्र शासित बनाए जाने बाद वहां विधानसभा चुनाव नहीं हुए। लेकिन दिल्ली की स्थिति इसलिए भिन्न है क्योंकि वह राष्ट्रीय राजधानी भी है। उस दृष्टि से उसमें दो अलग सरकारें प्रभावशील हों , ये अटपटा और अव्यवहारिक है । केजरीवाल सरकार पुलिस पर भी अपना नियंत्रण चाहती है।लेकिन आज के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी जमीन , कानून व्यवस्था और पुलिस पर केंद्र के नियंत्रण को मान्य करते हुए चुनी हुई सरकार को प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानांतरण और पद स्थापना का काम सौंपने  संबंधी जो निर्णय दिया उससे समस्या का आंशिक समाधान ही होगा और भविष्य में केजरीवाल सरकार इस बात के लिए लड़ेगी कि उसे वे सभी अधिकार मिलना चाहिए जो एक निर्वाचित राज्य सरकार को संविधान में  दिए गए हैं । ये देखते हुए केंद्र शासित राज्य की व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं। चंडीगढ़ , दादरा नगर हवेली , लक्षद्वीप , दमन और दिव , लद्दाख आदि केंद्र शासित क्षेत्रों में प्रशासक काम देखते हैं । वहीं दिल्ली ,पुडुचेरी और अंडमान निकोबार और जम्मू - कश्मीर  में उपराज्यपाल हैं । लेकिन फिलहाल चुनी हुई विधानसभा केवल दिल्ली और पुडुचेरी में ही है। उसमें भी विवाद की स्थिति दिल्ली में सबसे ज्यादा है क्योंकि यहां केंद्र सरकार का मुख्यालय होने से शक्तियों और अधिकारों का विकेंद्रीकरण या बंटवारा बेहद कठिन है । निश्चित रूप से केजरीवाल सरकार के पास दिल्ली की जनता का जबर्दस्त जनादेश है किंतु दूसरी तरफ ये भी सही है कि राष्ट्रीय राजधानी में दो सरकारों का एक साथ होना समस्या पैदा करता रहेगा। केंद्र शासित होने के बाद भी जिस तरह अन्य क्षेत्र बिना विधानसभा के अपना शासन चलाते हैं वैसा ही दिल्ली के लिए भी श्रेयस्कर होता। विधान सभा बनने से पूर्व  दिल्ली में महानगर परिषद (मेट्रो पॉलिटन काउंसिल ) होती थी जिसकी संरचना मौजूदा विधान सभा जैसी ही थी। निर्वाचित सदन , उसका सभापति और  मुख्य कार्यकारी काउंसलर होता था जिसकी हैसियत कमोबेश मुख्यमंत्री जैसी ही थी। लेकिन उसका केंद्र से टकराव नहीं होता था।लेकिन अधिक अधिकार के चाहत में विधानसभा की मांग के साथ राज्य का दर्जा देने का जोर बढ़ा और राजनीतिक दबाव के कारण राष्ट्रीय राजधानी को केंद्र शासित राज्य मानकर वहां निर्वाचित विधानसभा और उप राज्यपाल ( लेफ्टीनेंट गवर्नर ) का पद सृजित किया गया। शुरू - शुरू में तो ठीक चला किंतु आम आदमी पार्टी के सत्तासीन होने के बाद केंद्र सरकार के साथ दिल्ली सरकार की टकराहट बढ़ती गई जिसकी वजह  से ही सर्वोच्च न्यायालय को आज का फ़ैसला करना पड़ा। इस मामले को राजनीतिक दृष्टि की बजाय सामान्य नजरिये से देखें तो ये महसूस होता है कि राष्ट्रीय राजधानी में दो चुनी हुई सरकारों का होना हमेशा टकराव पैदा करता रहेगा। केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार और कर्तव्य संविधान में उल्लिखित हैं । लेकिन केंद्र शासित क्षेत्र में चुनी हुई विधानसभा बनने के बाद उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना ही उचित होता है जैसा गोवा के मामले में हो भी चुका है। आज के फैसले के बाद हो सकता है केंद्र सरकार के नीति  नियंत्रक दिल्ली की विधानसभा को खत्म कर वहां किसी कम अधिकार संपन्न प्रशासनिक ढांचे को खड़ा करें क्योंकि जिस तरह का टकराव बीते कुछ सालों में देखने मिल रहा है उससे एक बात साफ है कि हमारे देश में अधिकारों के बारे में तो जरूरत से ज्यादा जागरूकता है किंतु दायित्वबोध की चिंता किसी को नहीं।

 - रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 10 May 2023

इमरान ने जो बोया वही काट रहे




पाकिस्तान में गत दिवस पूर्व प्रधानमन्त्री इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद हालात अराजक हो गए हैं | हालांकि इस देश के लिए ऐसी स्थिति कोई नई नहीं है । लेकिन पहली बार ऐसा देखने मिल रहा है जब सेना के विरुद्ध जनता सड़कों पर उतर आई | फ़ौजी अफसरों के घरों पर हमलों के अलावा लाहौर के गवर्नर हाउस और रावलपिंडी में सैन्य मुख्यालय में आग लगाने जैसी घटनाएँ तक हो रही हैं | पूरे देश में निषेधाज्ञा के बाद इन्टरनेट बंद कर दिया गया है | इमरान की पार्टी पीटीआई पूरे देश में आन्दोलन कर रही है |  समर्थक इस बात की आशंका जता रहे हैं कि हिरासत में उनकी ज़हर देकर हत्या की जा सकती है | ये डर भी है कि अवसर का लाभ उठाकर सेना तख्ता पलटकर सत्ता पर काबिज हो जायेगी । ये भी संभव है कि जनता के गुस्से से बचने के लिए फ़ौजी जनरल इस बार सीधे सत्ता पर न बैठते हुए कठपुतली सरकार चलाते रहें | यद्यपि परवेज मुशर्रफ के बाद पाकिस्तान में लोकतंत्र लौटा और तमाम अटकलबाजियों के  बावजूद फौज सत्ता पर कब्जा करने से बचती रही | इसका कारण न्यायपालिका का साहसिक रवैया भी रहा।बीच में  राजनीतिक अस्थिरता का भी दौर चला | इमरान ने सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तानी हुकूमत और सियासत दोनों की छवि बदलने की काफी कोशिश की और अपने पूर्ववर्ती शासकों को अय्याश बताते हुए खुद को मितव्ययी और जनहितैषी साबित करने का स्वांग भी रचा | आतंकवादियों के पर कतरने और भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश भी की | करतारपुर साहेब कारीडोर का शुभारम्भ भी उन्हीं की सत्ता के चलते हुआ | लेकिन शुरुआती नरमी और सद्भावना के बाद वे भी घूम फिरकर उसी ढर्रे पर लौट आये और भारत के विरुद्ध ज़हर उगलने लगे | आतंकवाद को नियंत्रण कर दोनों देशों के बीच सम्बन्ध सुधारने के बजाय वे  कश्मीर को लेकर घिसी – पिटी नीति पर चल पड़े | जानकारों का कहना है कि इमरान के ऊपर भी फौज का उतना ही दबाव बना रहा जितना पहले की सरकारों पर था और उसी के चलते वे भारत विरोधी रवैया ढोने बाध्य हो गए। जिस तरह अपनी गिरफ्तारी के विरुद्ध जनता को सड़कों पर उतरने का आह्वान इमरान ने गत दिवस किया यदि ऐसा ही साहस वे प्रधानमंत्री रहते दिखाते तब जनता के साथ ही पाकिस्तान के उन बुद्धिजीवियों , पत्रकारों , कलाकारों और साहित्यकारों का भरपूर समर्थन उनको मिला होता जो मुल्क की बदहाली से चिंतित तो हैं लेकिन सत्ता में बैठे हुक्मरानों का संरक्षण न मिलने की  वजह से उनकी आवाज दबी रह जाती है। पाकिस्तान का निर्माण ही  इस्लामिक कट्टरता के  आधार पर हुआ था लेकिन शुरुआती दौर में भी एक तबका था , जो इस्लाम में पूरा भरोसा रखने के बाद भी प्रगतिशील माना जाता था। उसने अपनी बात रखने की  हिम्मत भी दिखाई लेकिन इस मुल्क का दुर्भाग्य रहा कि सत्ता पर कब्जा करने की औरंगजेबी संस्कृति जल्द ही वहां लागू हो गई । जिसके परिणामस्वरूप  हत्या और फौजी बगावत जैसी घटनाएं पाकिस्तान की तकदीर बन गईं। ऐसा भी नहीं था कि मजहबी कट्टरता के चलते सभी लोग मदरसों में पढ़े हों। पाकिस्तान की सत्ता में आए अनेक राजनेता विदेशों में शिक्षा ग्रहण करने के बाद सियासत में उतरे लेकिन उनका रवैया  ले देकर भारत विरोधी ही रहा और अपने निहित स्वार्थों के लिए उन्होंने सेना को मनमर्जी करने की छूट दी। इसका नतीजा ही है कि पाकिस्तान की घरेलू और विदेश नीति का संचालन राजसत्ता के समानांतर सेना के जनरल भी करने लगे । और इसी दौरान उनमें सत्ता पर काबिज होने का लालच जागा जिसका उदाहरण जनरल अयूब , याह्या खां , जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ के तौर पर देखने मिला। इमरान चुनाव जीतकर जब सत्ता में आए तब पाकिस्तान में लोकतंत्र की वापसी की उम्मीदें जागी थीं। ऑक्सफोर्ड में पढ़े इमरान पाकिस्तान में आधुनिकता के प्रतीक थे। युवाओं में उनके प्रति दीवानगी थी। क्रिकेट विश्व कप जिताने के बाद वे महानायक की छवि हासिल कर चुके थे। उनका दृष्टिकोण इस्लामिक होने के बाद भी वैश्विक माना जाता था। भारत में क्रिकेट के बहाने अनेक प्रभावशाली लोगों से उनके अच्छे रिश्ते थे । लेकिन कुछ समय सीधे चलने के बाद वे भी कुत्ते की पूंछ बन गए। आखिरकार वही हुआ जो पाकिस्तान की नियति है। उनको सत्ता से हटाकर शरीफ और जरदारी परिवार ने सत्ता पर कब्जा कर लिया । जिस ठसक के साथ इमरान आए  वह उनके जाने के समय नहीं दिखी।  भले ही सेना ने सामान्य तरीके से सत्ता परिवर्तन हो जाने दिया किंतु इमरान भी अब वही आरोप झेल रहे हैं जो वे अपने पूर्ववर्ती  शासकों पर  लगाया करते थे। दुर्भाग्य से पाकिस्तान की वर्तमान सत्ता भी भारत विरोध को ही अपना धर्म मान बैठी। प्रधानमंत्री शाहबाज और विदेशमंत्री बिलावल जरदारी जितनी मेहनत कश्मीर में आतंकवाद को पालने - पोसने में कर रहे हैं उतनी अपने मुल्क की बदहाली दूर करने में करते होते तो आज उसको भीख का कटोरा लेकर दुनिया भर में न घूमना पड़ता । पाकिस्तान में भले ही छोटा हो किंतु एक तबका ऐसा है जो भारत से प्रभावित है।वहां के टीवी चैनलों में होने वाली बहस के अलावा अनेक यू ट्यूबर भारत संबंधी जो कार्यक्रम दिखाते हैं उनसे लगता है कि शिक्षित वर्ग विशेष रूप से युवाओं में ये भावना बलवती होती जा रही है कि भारत से लड़ते रहने और कश्मीर की जिद पालने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इसलिए बेहतर हो व्यापारिक रिश्ते कायम कर दोनों ओर खुशहाली लाई जाए। लेकिन इमरान इन संकेतों को समझे बिना पुराने ढर्रे पर चलते हुए अपनी दुर्गति करवा बैठे। लोकतंत्र की रक्षा के लिए जनता का  सड़कों पर उतरकर फौजी संस्थानों पर हमला करना निश्चित रूप से बड़े बदलाव का संकेत है किंतु इसकी कितनी कीमत पाकिस्तान को चुकानी पड़ेगी ये फिलहाल कोई नहीं जानता।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 9 May 2023

मिग -21 को साभार विदाई देने का वक्त आ गया है



भारतीय वायुसेना का एक प्रशिक्षण मिग - 21 विमान गत दिवस राजस्थान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यद्यपि पायलट तो समय पर विमान से कूद गया किंतु आवासीय क्षेत्र पर उसके गिर जाने से तीन महिलाएं मारी गईं। दुर्घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। पायलट के सुरक्षित बच जाने से दुर्घटना के बारे में पुख्ता जानकारी मिल सकेगी किंतु ये  सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि आखिर बाबा आदम के जमाने के मिग विमान वायुसेना आखिर क्यों ढोए जा रही है ? निश्चित तौर पर एक जमाना था जब मिग - 21 हमारी वायुसेना का सबसे अग्रणी लड़ाकू विमान था जिसने अनेक युद्धों में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को विजय दिलाई। इसके बाद मिग - 27 श्रृंखला भी आई। साथ ही मिग विमानों के निर्माता रूस ने नए तकनीकी सुधार करते हुए पुराने विमानों का उन्नयन भी किया। बावजूद उसके , समय के साथ जब सुखोई ,मिराज और रफेल जैसे आधुनिकतम लड़ाकू विमान आए तब मिग - 21 तुलनात्मक तौर पर काफी पिछड़ता गया। आज के दौर में सेना की बहादुरी और बेहतर प्रशिक्षण  के साथ नवीनतम तकनीक के अस्त्र - शस्त्रों का महत्व बहुत ज्यादा है । राइफल , तोप, टैंक , मिसाइल , पनडुब्बियां , लड़ाकू विमान , रडार आदि में तकनीकी उन्नयन अब नियमित प्रक्रिया बन गई है। सेना को इसके बारे में प्रशिक्षण भी दिया जाता है। ऐसे में दशकों पुराने हो चुके मिग श्रृंखला के लड़ाकू विमानों को संग्रहालय में रखने की जगह वायुसेना की दैनंदिन गतिविधियों में उपयोग करना अव्यवहारिक लगता है। बताते हैं अभी भी चूंकि भारतीय वायुसेना के बेड़े  में लड़ाकू विमानों की संख्या जरूरत के लिहाज से अपर्याप्त है । यद्यपि मोदी सरकार ने विगत 9 वर्षों में रिकॉर्ड सैन्य खरीदी की है किंतु लड़ाकू विमानों की आपूर्ति में लंबा समय लगता है । इसलिए  पुराने लड़ाकू विमानों को उपयोग में लाया जा रहा है। मिग - 21 से  प्रशिक्षण विमान का काम वायुसेना ले रही है। लेकिन हर साल इस श्रेणी के दो - चार विमान दुर्घटनाग्रस्त होने से अनुभवी और प्रशिक्षु पायलट मारे जाते हैं। इसी कारण लंबे समय से मिग - 21 विमानों को वायुसेना से अलग हटाकर संग्रहालय में सजाए जाने की सलाह विशेषज्ञ देते आए हैं किंतु अज्ञात कारणों से वायुसेना उनका मोह नहीं छोड़ पा रही। गत दिवस राजस्थान के हनुमानगढ़  के बहलोल नगर ग्राम में उसके गिर जाने से 3 महिलाओं की मौत वाकई दुखद है क्योंकि आम तौर पर प्रशिक्षण विमान भी रिहायशी बस्ती से दूर ही उड़ते हैं। ये भी अच्छा था कि उक्त गांव की आबादी महज 600 है। यदि विमान किसी बड़ी आबादी वाले क्षेत्र में गिरता तो मानवीय क्षति और ज्यादा हो सकती थी। और जब वायुसेना का पायलट ऐसी दुर्घटना में मारा जाता है तब विमान के साथ होने वाला वह नुकसान बहुत भारी होता है। ये देखते हुए इस तरह के विमानों को अब विश्राम दे देना चाहिए क्योंकि गाहे - बगाहे इनके दुर्घटनाग्रस्त होते रहने से जनता का मनोबल तो गिरता ही है , विदेशों में भी हमारी सैन्य क्षमता पर सवाल उठते हैं। हमारे दो पड़ोसी शत्रुओं के पास अत्याधुनिक लड़ाकू विमान होने से हमें न चाहते हुए ही अपनी सेना के तीनों अंगों को सुसज्जित करना पड़ रहा है। और फिर आज के जमाने की जंग जमीन से ज्यादा हवा में और वह भी तकनीक के भरोसे लड़ी जाती है। ये देखते हुए मिग - 21 लड़ाकू विमानों को साभार विदाई दी जाए। उन्होंने अपनी क्षमता से ज्यादा अपनी सेवाएं दी हैं ।उनका गौरवशाली इतिहास भी संजोया जाना चाहिए लेकिन उनको वायुसेना के बेड़े से हटाना समय की अनिवार्यता बनती जा रही है। हर दुर्घटना के बाद इसकी चर्चा होती है लेकिन ठोस निर्णय नहीं हो पाता। बेहतर हो ताजा हादसे के बाद वायुसेना और सरकार दोनों इस बारे में कोई ठोस निर्णय लेंगी।


-रवीन्द्र वाजपेयी