Thursday, 25 May 2023

ऐतिहासिक अवसर पर बहिष्कार ठीक नहीं



नए संसद भवन का शुभारंभ आगामी 28 मई को होने जा रहा है। लोकसभाध्यक्ष के आग्रह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस भवन का उद्घाटन करने वाले हैं । कांग्रेस के साथ ही 19 विपक्षी दल इस समारोह का बहिष्कार करने की घोषणा कर चुके हैं। उनकी आपत्ति इस बात पर है कि संसद और संविधान के संरक्षक के तौर पर राष्ट्रपति को नया संसद भवन राष्ट्र को समर्पित करना था। प्रधानमंत्री से तत्संबंधी मांग भी की गई है ।  ये भी कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू चूंकि आदिवासी समुदाय से आती हैं इसलिए उनसे उद्घाटन करवाना था।  कुछ लोगों को इस बात पर भी ऐतराज है कि 28 मई की तारीख इसलिए रखी गई क्योंकि वह स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर का जन्मदिवस है। और  सरकार  ने इस तिथि को जान बूझकर चुना क्योंकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी कुछ समय पहले तक सावरकर जी की तीखी आलोचना करते हुए उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाया करते थे। वो तो जब एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने  उन पर दबाव बनाया तब उनकी जुबान पर ताला लगा। लेकिन बहिष्कार की घोषणा कर रहे  विपक्षी दलों को मुख्य शिकायत इस बात की ही है कि प्रधानमंत्री नये संसद भवन  का उद्घाटन कर रहे हैं । उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत की राय में तो नए संसद भवन की जरूरत ही नहीं थी और मौजूदा भवन आगामी 100 साल तक काम आ सकता है । वैसे भी इस नए भवन सहित समूचे सेंट्रल विस्ता परियोजना को लेकर राहुल गांधी सहित अधिकतर दल आलोचना करते हुए इसे जनता के धन की बरबादी बताते रहे हैं। बहरहाल रिकॉर्ड समय में  बनकर तैयार हुए इस संसद भवन में ही मानसून सत्र का आयोजन होगा। अत्याधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण इस  भवन को भविष्य में  दोनों सदनों की सदस्य संख्या बढ़ने का ध्यान  रखकर बनाया गया है। इसके भूमिपूजन से लेकर उद्घाटन की  तारीख तय होने तक कांग्रेस और उसके सहयोगी  विपक्षी दलों ने इस समूची परियोजना का  विरोध करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा । चूंकि इस पूरे प्रकल्प के पीछे प्रधानमंत्री की दूरगामी सोच है इसलिए तमाम गुणात्मक बातों को नजरंदाज करते हुए इसकी आलोचना की जाती रही है। राष्ट्रीय राजधानी में  केंद्र सरकार का जो प्रशासनिक प्रबंध है वह काफी पुराना होने से स्थानाभाव के कारण अव्यवस्थित है। मौजूदा संसद भवन में जगह कम होने पर ही एनेक्सी बनाई गई थी लेकिन वह भी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रही। विभिन्न पार्टियों के लिए आवंटित स्थान भी छोटा पड़ रहा है। उस दृष्टि से नए भवन का निर्माण समयोचित है। रही बात उद्घाटन कौन कर रहा है तो विपक्ष को अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है । लेकिन जब लोकसभाध्यक्ष  ओम बिरला ने  प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर लिया तब विरोध को जारी रखते हुए भी समारोह में शामिल होना लोकतांत्रिक संस्था के सम्मान में जरूरी है। 19 दलों के बहिष्कार के बावजूद भी अनेक ऐसे विपक्षी दल उद्घाटन में शामिल होने जा रहे हैं जिनका भाजपा से गठबंधन नहीं है। और फिर उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करने से विपक्ष उस ऐतिहासिक अवसर से वंचित भी हो जायेगा जब आजाद भारत की संसद वैश्विक स्तर के भवन में आने जा रही है।जो आंकड़े आए हैं उनके अनुसार 40 फीसदी से कम सदस्य बहिष्कार करेंगे । ऐसे में सदन तो खचाखच भरा रहेगा और प्रधानमंत्री की बात भी पूरी दुनिया में प्रसारित होगी ही जिसमें आत्मनिर्भर भारत की झलक इस भवन के माध्यम से दिखाई जायेगी।  विपक्ष ने विरोध में जो कहना था वह कह दिया । आगे भी उसके पास ऐसा करने का अधिकार होगा।  लेकिन विरोध और बहिष्कार में अंतर करना चाहिए। मसलन सरकार की बहुत सी बातें उसे अच्छी नहीं लगती लेकिन वह सदन में उसका पुरजोर विरोध करता है। नई संसद में भी उसके पास ऐसा करने का अवसर रहेगा किंतु संसद भवन का उद्घाटन एक ऐतिहासिक अवसर है जिसका राजनीतिकरण करना अच्छा नहीं है।बेहतर हो अभी भी वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे। विरोध के लिए  संसदीय प्रजातंत्र में बहुत से अवसर विपक्ष को मिलते हैं किंतु कुछ प्रसंग ऐसे होते हैं जब राजनीति के साथ ही राष्ट्रीय महत्व जुड़ जाता है । और तब सभी उसमें शामिल होकर उसकी गरिमा बढ़ाते हैं । नए संसद भवन का उद्घाटन भी ऐसा ही आयोजन है जिसे राष्ट्रीय महत्व का मानकर यथोचित सम्मान दिया जाना चाहिए । जिससे संसद के सत्र में इस भवन में आने पर किसी को अपराधबोध न हो।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 24 May 2023

काश ,नए प्रशासक जनता के चेहरों पर मुस्कान ला सकें



संघ लोकसेवा आयोग के परीक्षा परिणाम गत दिवस घोषित हो गए | इसमें प्रथम चार स्थानों पर लड़कियां रहीं | 54 अभ्यर्थी हिंदी माध्यम से इस प्रतियोगिता में कामयाब रहे | ये भी देखने वाली बात है कि कला संकाय के अंतर्गत आने वाले विषयों को लेकर भी बड़ी संख्या में प्रतिभागी सफल हुए जिनमें हिंदी साहित्य भी है | अन्यथा इस परीक्षा पर तकनीकी विषय के विद्यार्थियों का वर्चस्व होता जा रहा है | एक बात और भी प्रशंसनीय है कि अब इस परीक्षा में उत्तीर्ण  होने वाले लड़के – लड़कियाँ  महानगरों और संपन्न परिवारों से ही नहीं अपितु छोटे – छोटे शहरों और बेहद साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं | ये चयनित उम्मीदवार  देश की प्रशासनिक व्यवस्था संचालित करते हैं जिन्हें नौकरशाह कहा जाता है | ब्रिटिश सत्ता के ज़माने में सिविल सर्विसेस का जो ढांचा खड़ा किया गया था वही  इस परीक्षा के माध्यम से जारी है | विदेश सेवा , प्रशासन , पुलिस , रेलवे , राजस्व , संचार , वन और सूचना जैसे विभागों के अधिकारी इसी परीक्षा के जरिये चुने जाते हैं | परीक्षा में हासिल अंकों के आधार पर प्रावीण्य सूची तैयार होती है और उसी के अनुसार  अभ्यर्थी की पसंद का विभाग और राज्य उसे दिया जाता है | हालाँकि सभी सेवाएं अपने आप में महत्वपूर्ण हैं  किन्तु विदेश सेवा के आकर्षण के बावजूद सबसे ज्यादा उम्मीदवार प्रशासन में जाना चाहते हैं जिसे आम बोलचाल की भाषा में कलेक्टर ( आई.ए.एस )कहा जाता है क्योंकि इस सेवा में आने वाले अधिकारी ही अंततः देश के सबसे बड़े नौकरशाह अर्थात केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव तक जा सकते हैं | दूसरा आकर्षण पुलिस सेवा ( आईपीएस ) का होता है | हालाँकि अनेक सफल उम्मीदवार रेलवे और राजस्व जैसे विभागों को भी अपनी पसंद बनाते हैं | लेकिन मुख्य आकर्षण आज भी आईएएस और आईपीएस का ही है | इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि इन्हीं दो विभागों के अधिकारियों का आम जनता के साथ ही राजनेताओं से सीधा सम्बन्ध होता है | इसी वजह से ये सबसे ज्यादा चर्चा में रहते हैं | उदाहरण के लिए अनेक केन्द्रीय विभागों के शीर्ष अधिकारी शहर में  आते और चले जाते हैं किन्तु उनको सीमित लोग ही जानते हैं किन्तु जिले का कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक अपनी नियुक्ति होने से स्थानान्तरण तक खबरों में बना रहता है इसी कारण से आजकल आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से निकले मेधावी छात्र तक कलेक्टर और एस.पी बनना चाहते हैं | गत  दिवस जो नतीजे आये उनमें भी बड़ी संख्या इंजीनियरों की है। चूंकि प्रशासन और पुलिस विभाग  में तकनीकी जानकारी आवश्यक होती जा रही है इसलिए इस विधा में शिक्षित विद्यार्थियों का चयन किया जाता है | लेकिन इसकी वजह से कला संकाय से जुड़े विषयों के अभ्यर्थी पिछड़ जाते  हैं | ऐसा ही कुछ अंग्रेजी माध्यम में नहीं पढ़े विद्यार्थियों के साथ भी होता है | लेकिन इस वर्ष जिस तरह से आधा सैकड़ा प्रतियोगी हिन्दी माध्यम से सफल हुए वह शुभ संकेत है | और लगभग 34 फीसदी बेटियों का चयन आधी आबादी की देश के प्रशासनिक व्यवस्था में सक्रिय भूमिका का उदाहरण  है। आजकल कोचिंग सुविधा के कारण इस परीक्षा में सफल होने के लिए पेशेवर प्रशिक्षकों का मार्गदर्शन भी मिलने लगा है जिसकी मदद से अनेक ऐसे अभ्यर्थी भी सफल होने लगे हैं जो इस परीक्षा को हौवा मानकर इससे दूर रहा करते थे।लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो संघ लोकसेवा आयोग की इस  परीक्षा में सफलता अर्जित करने वाले देश के मेधावी युवा - युवतियां जब प्रशासनिक व्यवस्था का अंग बनने के बाद उसकी बुराइयों में लिप्त हो जाते हैं तब चिंता होती है। हालांकि आज भी ऐसे अनेक युवा अधिकारी हैं जो अपनी ईमानदारी , कार्यकुशलता और संवेदनशीलता के कारण आम जनता के चहेते बन जाते हैं । किसी राजनेता के दबाव के चलते इनका स्थानांतरण किए जाने पर जनता द्वारा सरकार के विरुद्ध  खड़े हो जाने  के उदाहरण भी देखने मिले हैं । लेकिन ऐसा अपवादस्वरूप ही होता है। वरना आजकल तो महिला प्रशासनिक अधिकारी तक जिस बड़ी संख्या  में   भ्रष्टाचार करते हुए पकड़ी जा रही हैं वह देखते हुए प्रशासनिक सेवाओं का विकृत पहलू भी उजागर हो रहा है। सवाल ये भी है कि कठोर परिश्रम से अर्जित मान - सम्मान  वाले इस पेशे में आने के बाद प्रशासनिक अधिकारी भ्रष्ट होता है तो उसका कारण उसकी लालची प्रवृत्ति है या फिर सरकारी तन्त्र में व्याप्त कार्य संस्कृति जिसके चलते वह अपनी  शिक्षा और योग्यता से उत्पन्न गौरव को भूलकर किसी भी तरह से पैसा कमाने में जुट जाता है। हालांकि ये कहना गलत न होगा कि इसके लिए सत्ता में बैठे नेतागण और हमारे देश की चुनाव प्रणाली भी कम जिम्मेदार नहीं है जो भ्रष्टाचार की जननी है किंतु यदि कोई अधिकारी भ्रष्टाचार और सत्ताधीशों की खुशामद करना छोड़ दे तो उसके सामने  सिवाय स्थानांतरण के और कोई दिक्कत नहीं आती। प्रशासनिक सेवा में अनेक अधिकारी हैं जिन्होंने अपने सेवाकाल में अल्पकाल  छोड़कर फील्ड पोस्टिंग के बजाय सचिवालय में काम करना पसंद किया। आशय साफ है कि मलाईदार विभाग नामक जो विशेषण मंत्री से शुरू होता है वह उच्च अधिकारी से लेकर निचले स्तर तक बदस्तूर कायम है। कलेक्टर एक जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी है। यही बात पुलिस अधीक्षक के साथ है किंतु उनकी राजनीतिक पहुंच इस बात से साबित होती है कि वे किस जिले में पदस्थ किए गए। इसी तरह सचिव भी किस विभाग का है ये महत्वपूर्ण है। इसके चलते समूची प्रशासनिक व्यवस्था का राजनीतिकरण हो गया है । और ज्यादातर अधिकारी किसी नेता या राजनीतिक दल के करीबी माने जाते हैं । इस तरह की बातें सुनाई देने के बाद इस प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल प्रतियोगियों के प्रति जो शुरुआती सम्मान उत्पन्न होता है वह  बाद में घटने लगता है। बेहतर हो संघ लोकसेवा आयोग  इस परीक्षा रूपी बाधा को पार करने वाले युवा इस छवि को बदलने की प्रतिबद्धता भी दिखाएं। उनमें से अधिकतर की प्रतिक्रिया यही है कि वे सिविल सर्वेंट बनकर देश की सेवा कर सकेंगे किंतु यदि वे सरकारी दफ़्तर में आने वाले जरूरतमंदों के चेहरों पर मुस्कान ला सकें और बिना सौजन्य भेंट के लोगों का सही काम हो जाए तभी उनकी  योग्यता सही मायनों में प्रमाणित हो सकेगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी 



Tuesday, 23 May 2023

म.प्र की राजनीति में शालीनता और सौजन्यता का कम होना चिंताजनक



म.प्र में इस वर्ष के अंत तक  विधानसभा चुनाव होने वाले हैं | अभी तक जो स्थिति है उसके अनुसार भाजपा और कांग्रेस में ही मुख्य मुकाबला होने वाला है | यद्यपि बसपा और सपा का भी कुछ सीटों पर असर है  लेकिन प्रदेश की राजनीति दो ध्रुवीय ही बनी हुई है | पिछले वर्ष हुए निकाय चुनाव में सिंगरौली नगर निगम में आम आदमी पार्टी का महापौर जीत जाने के बाद इस बात की सम्भावना भी है कि अरविन्द केजरीवाल इस बार इस प्रदेश में तीसरी ताकत बनने के लिए हाथ पाँव मारेंगे | हाल ही में वे पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के साथ भोपाल में रैली भी कर चुके थे | हालाँकि दिल्ली में केंद्र सरकार के साथ चल रही रस्साकशी और कर्नाटक में अधिकतर उम्मीदवारों की जमानत जप्ती की वजह से आम आदमी पार्टी का हौसला गिरा है और फिर जो रणनीति समझ में आ रही है उसके मुताबिक तो यह पार्टी राजस्थान में ज्यादा ध्यान केन्द्रित कर रही है जिसका कारण संभवतः उसका  दिल्ली से करीब होना ही है , जहां कांग्रेस की अंदरूनी कलह के बीच उसे अपनी जगह बनाने की गुंजाईश नजर आ रही है | उस दृष्टि से म.प्र में अभी तीसरी शक्ति की संभावना नजर नहीं आ रहीं | और इसीलिये चुनाव पूर्व चलने वाली ज़ुबानी जंग भी भाजपा और कांग्रेस के बीच ही सिमटी हुई है | लेकिन चिंता का विषय ये है कि आरोप – प्रत्यारोप का जो आदान – प्रदान हो रहा है उसमें वैचारिक और नीतिगत मुद्दों से ज्यादा निजी मामले हैं | सत्ताधारी दल अपनी  उपलब्धियां प्रचारित करे और विपक्ष उसकी नाकामियां सामने लाये ये तो लोकतंत्र का चिरपरिचित स्वभाव है किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर अब ये बात देखने मिल रही है कि राजनेता  नीतिगत आलोचना की बजाय एक दूसरे पर निजी हमले करने पर उतारू हैं | इसकी शुरुआत किसने की ये कह पाना आसान नहीं है किन्तु म.प्र की ये विशिष्टता रही है कि यहाँ सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत कटुता नहीं रही | श्यामाचरण शुक्ल और मोतीलाल वोरा के मुख्यमंत्री रहते हुए नेता प्रतिपक्ष कैलाश जोशी के साथ मधुर सम्बन्ध थे | सदन और उसके बाहर एक दूसरे के प्रति अपमानजनक टिप्पणी शायद ही कभी सुनाई दी हो | इसी तरह अर्जुन सिंह और सुन्दरलाल पटवा के बीच व्यक्तिगत रिश्ते में राजनीतिक मतभेद कभी बाधा नहीं बने | सौजन्यता का यह सिलसिला दिग्विजय सिंह और विक्रम वर्मा के समय भी जारी रहा | लेकिन उसके बाद से राजनीति का वह सुनहरा दौर धीरे – धीरे विदा होने लगा | जो दिग्विजय सिंह कभी कुशाभाऊ ठाकरे के सार्वजानिक तौर पर चरण छूने में संकोच नहीं करते थे वे हिन्दू विरोधी बयानों के कारण अपनी छवि खराब कर बैठे | हालांकि हाल ही में उन्होंने स्व. पटवा के भतीजे विधायक  सुरेन्द्र के निवास पर जाकर सबको चौंकाया था किन्तु श्री वर्मा के साथ उनके रिश्तों वाली बात अब नहीं दिखाई देती | लेकिन ऐसा केवल कांग्रेस के साथ ही नहीं है | भाजपा में भी अब कुशाभाऊ ठाकरे का दौर अतीत की बात हो चली है जिनके समक्ष उनके कट्टर विरोधी भी श्रीद्धावनत हो जाया करते थे | हालाँकि वर्तमान  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी सौजन्यता की प्रतिमूर्ति हैं और उनकी भाषा भी बहुत ही संयमित है किन्तु बाकी नेताओं द्वारा मर्यादा का ध्यान नहीं रखा जाता | कांग्रेस में भी कमलनाथ का वर्चस्व होने के बाद राजनीतिक संवाद  का स्तर गिरा है | कभी - कभी ऐसा लगता है जैसे बड़े नेता अपने मातहतों को ऊल -  जलूल बोलने की छूट दे देते हैं | वर्ना गाली का जवाब गाली ही हो ये जरूरी नहीं होता | पहले भी राजनीति में व्यक्तिगत आरोप  लगा करते थे लेकिन  शालीनता का ध्यान रखा जाता था | मानहानि के मुकदमे शायद ही कभी सुनाई देते हों | गलत शब्दों के प्रयोग पर बिना  झिझके माफी मांग लेने और माफीनामा स्वीकार करने का बड़प्पन साधारण बात  थी | लेकिन बीते कुछ समय से शांति का टापू कहे जाने वाले प्रदेश में राजनीतिक विमर्श का जो स्तर देखने मिल रहा है वह चिंता के साथ ही गहन चिंतन का विषय है | प्रदेश के विकास के बारे में सभी पार्टियां अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर करती  रही हैं किन्तु इसके लिए समन्वित प्रयास शायद ही दिखाई दिए हों | इसका प्रमाण  निकाय चुनाव में महापौर और सदन का बहुमत अलग पार्टी के पास होने से उत्पन्न हालात से बखूबी समझा जा सकता है | जिस तरह परिवार में ये कहा जाता है कि बच्चे अपने बड़े - बुजुर्गों के व्यवहार से सीखते हैं , उसी तरह राजनीतिक दल में छोटे स्तर का कार्यकर्ता अपने वरिष्टों के आचरण और अभिव्यक्ति की शैली से प्रेरणा लेता है | ये देखते हुए अब ये जिम्मेदारी भाजपा और काँग्रेस दोनों के वरिष्ट नेताओं की है कि वे अपने दल के भीतर आचरण और संयमित वाणी का उदाहरण पेश करें | चुनाव तो आते – जाते रहेंगे और सरकारें भी बनती – बिगड़ती रहेंगी किन्तु राजनीति यदि प्रतिस्पर्धा की बजाय शत्रुता का रूप ले लेगी तब लोकतंत्र का वही स्वरूप देखने मिलेगा जो पाकिस्तान में कायम है | म.प्र देश के सबसे शांत राज्यों में से है | इसका प्राकृतिक सौन्दर्य भी अपने आप में अनूठा है | देश के सभी अंचलों के लोग यहाँ आकर स्थायी रूप से बसे होने के कारण यहाँ क्षेत्रीयता और भाषा जैसे विवाद नहीं रहे | खुद कमलनाथ प्रदेश के बाहर से आकर छिंदवाड़ा के सांसद बने और 2018 में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचे | अन्य राज्यों से आकर और भी  राजनेता यहाँ से लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं | 1971  में दमोह लोकसभा सीट से कांग्रेस ने उस समय के  राष्ट्रपति वी.वी गिरि के पुत्र शंकर गिरि को उतारा और वे जीत भी गए जबकि उनको यहाँ की भाषा तक नहीं आती थी | स्व. सुषमा स्वराज भी विदिशा से सांसद चुनी गईं | कहने का आशय ये है कि विधानसभा चुनाव के मद्देनजर होने वाले आरोप - प्रत्यारोप को निजी आक्रमण से जितना बचाया जा सके उतना बेहतर होगा ,  क्योंकि अंततः उसका असर समाज पर भी पड़ता है | और आज की राजनीति  में कब कौन पाला  बदलकर  यहाँ से वहां हो जाये कहना कठिन है | 2018 के चुनाव में कांग्रेस के पोस्टर बॉय रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया महज 15 माह बाद ही भाजपा के साथ आ गये | इस तरह का पाला बदल इस चुनाव के पहले आये दिन देखने  मिल  रहा है | इसलिए अपने विरोधी को अपमानित करने और उसके बारे में अशोभनीय बातें कहने के पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्या पता कल वह आपके साथ आकर बैठ जाए |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 22 May 2023

विपक्षी एकता की कोशिश में भी भेदभाव




कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर कांग्रेस द्वारा विपक्ष के अनेक नेताओं को दावत देकर बुलाया गया। इसका उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा के विरोध में विपक्षी मोर्चा बनाने की मुहिम में अपना हाथ ऊपर रखना था । दरअसल इसकी कोशिश पार्टी ने संसद के बजट सत्र के दौरान अडानी विवाद में जेपीसी की मांग और उसके बाद राहुल गांधी की सदस्यता जाने के समय ही प्रारंभ कर दी थी। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बुलावे पर एक दो को छोड़कर शेष विपक्षी दलों के नेतागण संसद में सरकार को घेरने जमा भी होते रहे , लेकिन कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका। और जैसे ही जेपीसी मामले में शरद पवार ने अडानी की तरफदारी की तो कांग्रेस की वह मुहिम फुस्स होकर रह गई। राहुल को भी कानून की अदालत में ही अपना मामला ले जाना पड़ा। उसके बाद कर्नाटक के चुनाव आ गए जिसमें कांग्रेस को जोरदार सफलता मिली तो उसका मनोवैज्ञानिक लाभ लेते हुए उसने विपक्ष को अपने मंच पर जमा करते हुए ये संदेश देने का प्रयास किया कि भाजपा के विरुद्ध संयुक्त मोर्चे की अगुआई करने में वही सक्षम है। उसके बुलावे पर तमाम दिग्गज विपक्षी नेता आए भी। जिनमें शरद पवार , नीतीश कुमार , हेमंत सोरेन , स्टालिन, तेजस्वी यादव , डी राजा ,सीताराम येचुरी , फारुख अब्दुल्ला, मेहबूबा मुफ्ती आदि थे। नीतीश वैसे भी इन दिनों विपक्षी एकता के सूत्रधार बने हुए हैं । लेकिन कांग्रेस ने एकता प्रयासों के बीच भी अपनी हेकड़ी नहीं छोड़ी। जिसके चलते नवीन पटनायक , अरविंद केजरीवाल , जगनमोहन रेड्डी , पी. विजयन, के.चंद्रशेखर राव ,मायावती जैसे नेताओं को बुलावा नहीं भेजा। ममता बैनर्जी को हालांकि बुलाया गया किंतु वे बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों के गठबंधन से खफा होने से नहीं आईं। हास्यास्पद बात ये भी रही कि राजा और येचुरी को तो बुलाया गया किंतु केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री को न बुलाना अटपटा सा लगा। इसी तरह पड़ोसी तेलंगाना और आंध्र के मुख्यमंत्री भी आमंत्रित नहीं किए गए। कुल मिलाकर कहें तो विपक्षी एकता के इस प्रयास में भी कांग्रेस बड़ा दिल नहीं दिखा सकी। राजनीतिक दृष्टि से देखने पर उसने उन नेताओं को बुलाने से परहेज किया जिनके राज्यों में उसे उनका विरोध करना पड़ता हैं । आंध्र , तेलंगाना , दिल्ली और पंजाब इसके उदहारण हैं। लेकिन ममता बैनर्जी को बुलाए जाने के बाद भी उनका न आना इस बात का इशारा कर गया कि कांग्रेस से भी कुछ क्षेत्रीय दलों को चिढ़ है क्योंकि उसका ऊपर उठना उनके भविष्य के लिए खतरनाक होगा। शपथ ग्रहण के बाद सीपीएम के पूर्व महासचिव और पोलित ब्यूरो सदस्य प्रकाश करात ने कांग्रेस द्वारा विपक्ष के बीच भेदभाव किए जाने पर गुस्सा व्यक्त किया । ऐसे में प्रश्न खड़ा होता है कि क्या विपक्ष की कथित एकता भी गुटबाजी का शिकार होकर रह गई ? उल्लेखनीय है सपा प्रमुख अखिलेश यादव और ममता बैनर्जी मिलकर कांग्रेस से अलग विपक्ष का तीसरा मोर्चा बनाने की पेशकश भी कर चुके हैं । उक्त आयोजन में निजी कारणों से अखिलेश भी नहीं गए और बाद में उनके और ममता की ओर से कांग्रेस को ये संदेश भी भेज दिया गया कि वह यदि 200 लोकसभा सीटों पर लड़ने राजी हो तो उसके साथ तालमेल बनाया जा सकता है। हालांकि कांग्रेस ने इसका उत्तर नहीं दिया किंतु ऐसा ही संकेत शुरुआती दौर में नीतीश भी कर चुके थे। इस सबसे लगता है कि कांग्रेस विपक्षी एकता तो चाहती है किंतु उसके भीतर श्रेष्ठता और वरिष्टता का जो भाव है , वह इसमें बाधक बन रहा है। राहुल की भारत जोड़ो यात्रा के बाद कर्नाटक का चुनाव जीतने से पार्टी का आत्मविश्वास निश्चित तौर पर बढ़ा है किंतु राजनीतिक विश्लेषक भी मान रहे हैं कि ये परिणाम 2024 के महासंग्राम की भविष्यवाणी नहीं हैं। इसका कारण ये बताया जा रहा है कि भारतीय मतदाता राज्य और केंद्र में अलग - अलग तरीके से मतदान करने लगा है। बीते दस साल में ये बात सामने आई है कि लोकसभा और विधानसभा में अलग - अलग सरकारें चुनने जैसा फैसला मतदाताओं ने किया। ये देखते हुए अनेक विपक्षी दल कांग्रेस की स्थिति में बहुत ज्यादा सुधार आने के प्रति आशंकित हैं । दूसरी तरफ कांग्रेस भी इस बात से भयभीत है कि सभी विपक्षियों को एकजुट करने के फेर में कहीं उसकी स्थिति कमजोर न हो जाए क्योंकि हर पार्टी अपने लिए हैसियत से ज्यादा मांगती है। उत्तर भारत के दो बड़े राज्यों के साथ ही बंगाल में कांग्रेस की हालत बेहद दयनीय है। ऐसे में वह विपक्ष का नेतृत्व किस प्रकार कर सकेगी ये समझ से परे है। कर्नाटक के शपथ ग्रहण को विपक्षी एकता का प्रकटीकरण कहने वाले ये भूल जाते हैं कि नवीन पटनायक ,ममता बैनर्जी , जगनमोहन रेड्डी , के. चंद्रशेखर राव , अरविंद केजरीवाल , पी. विजयन और मायावती के बिना बनाया जाने वाला विपक्षी मोर्चा महज औपचारिकता बनकर रह जायेगा। 

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 20 May 2023

100 से बड़ा नोट होना ही नहीं चाहिये


मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : संपादकीय
-रवीन्द्र वाजपेयी 

100 से बड़ा नोट होना ही नहीं चाहिये  

कल शाम जैसे ही रिजर्व बैंक ने 2 हजार के नोट चलन से बाहर करने की सूचना सार्वजनिक की तो पहले - पहल  ये माना गया कि यह 2016 में की गयी नोटबंदी जैसा ही कदम है , जिसकी वजह से पूरे देश को अकल्पनीय परेशानियां झेलना पड़ी थीं | आज भी उस वक्त की याद आते ही लोग सन्न रह जाते हैं जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए 500 और 1 हजार के नोट बंद करने  की  घोषणा कर डाली | उसके बाद के हालात पर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है | उस कदम का उद्देश्य क्या था ये अधिकृत तौर पर आज तक स्पष्ट नहीं हो सका | कोई उसे काले धन पर चोट बता रहा था तो कोई आतंकवादियों की आर्थिक सहायता को रोक देने का उपाय | लेकिन आम तौर पर यही समझा गया कि वह दांव काले धन को बाहर लाने चला गया था | लेकिन अमल में हुई कुछ गलतियों की वजह से उस दुस्साहसिक कदम का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका | काले धन वालों ने येन केन प्रकारेण अपने नोट ठिकाने लगा दिए , जिसमें बैंक कर्मचारी , पेट्रोल पम्प आदि के साथ सरकारी विभाग भी शामिल रहे | ये कहना गलत न होगा कि समाचार माध्यमों के जरिये आ रही खबरों से सरकार घबरा सी गयी और उसने नोट बदलने के लिए जिस तरह की रियायत और मोहलत दी उसने उस निर्णय के असली उद्देश्य पर पानी फेर दिया | उसके बाद अर्थव्यवस्था में आये ठहराव के कारण उसको चौतरफा आलोचना झेलनी पड़ी | यद्यपि उसके बाद भी भाजपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव जीत लिया किन्तु नोटबंदी रूपी वह हादसा आज भी सिहरन पैदा कर देता है | और फिर सरकार ने 2 हजार का नया नोट जारी कर नए सवाल भी पैदा कर दिए | मसलन काले धन को बाहर  लाने के लिए बड़े नोट बंद करने के बाद उससे भी बड़ा नोट जारी करने का औचित्य क्या था ? लेकिन गत दिवस की गई नोटबंदी के साथ रिजर्व बैंक ने ये  साफ़ किया कि उस समय मुद्रा की कमी को दूर करने के लिये 2 हजार का नोट शुरू किया गया था किन्तु अब वह मकसद पूरा हो चुका है इसलिए उसे  वापस लेने की प्रक्रिया के तहत ये कदम उठाया  गया है | बीते तीन - चार सालों से वैसे भी इस नोट की छपाई बंद थी और जितने नोट बैंक में गए भी उनको दोबारा चलन में लाने की बजाय वापस रिजर्व बैंक भेज दिया गया | लेकिन ईडी और आयकर के छापों में जप्त किया गया काला धन ज्यादातर 2 हजार के नोटों की शक्ल में ही मिला | इससे इस अवधारणा की पुष्टि हुई कि बड़े नोट काले धन के संचय में मददगार बनते हैं | इसीलिये कल जब रिजर्व बैंक ने उक्त घोषणा की तब कुछ देर तक तो घबराहट रही लेकिन जैसे ही स्पष्ट हुआ कि 2 हजार का नोट तत्काल प्रभाव से बंद नहीं होगा और उसे बैंक से बदलने के लिए 30 सितंबर तक का समय मिलेगा तो लोगों ने राहत की सांस ली | इस दौरान उसके जरिये मौद्रिक लेन देन भी सामान्य तरीके से जारी रहेगा | जिनके खाते बैंक में नहीं हैं वे एक बार में 20 हजार के नोट बदल सकेंगे जबकि खातेदार कितनी भी मात्रा में 2 हजार  के नोट खाते में जमा कर पायेगा |  कुछ लोग इस निर्णय को र्रिजर्व बैंक द्वारा भूल सुधार करना बता रहे हैं तो कुछ के अनुसार ये एक और भूल है | विपक्ष इसे जनता को परेशानी में डालने वाला बताकर इसकी आलोचना कर रहा है | प्रधानमंत्री की निर्णय क्षमता पर सवाल दागे जा रहे हैं । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने तो पढ़े – लिखे  प्रधानमंत्री की जरूरत बताते हुए श्री मोदी पर तंज कस डाला | लेकिन  सबसे अलग हटकर देखें तो इस निर्णय को नोटबंदी के अगले चरण के तौर पर देखा जा सकता है | इसमें दो राय नहीं है कि 2016 के फैसले के बाद काले धन से कारोबार करना कुछ हद तक तो कठिन हुआ है | इसी तरह जीएसटी के  आने से भी व्यापार में पारदर्शिता बढ़ी है | हालाँकि पूरी तरह से काले धन का प्रचलन बंद हो गया , ये सोच लेना तो सच्चाई से आँखें मूंदना होगा लेकिन उस पर नियंत्रण तो हुआ  है | जब रिजर्व बैंक को ये लगा कि 2 हजार का नोट सामान्य चलन से बाहर होकर काले धन वालों की तिजोरियों में कैद हो चुका है तब उसने ये फैसला करने की हिम्मत जुटाई | सरकार भी इस बात से आश्वस्त थी कि इस निर्णय से आम जनता को हलाकान नहीं होना पड़ेगा क्योंकि उसके पास 2 हजार के नोट या तो हैं नहीं और यदि हैं तो न के बराबर होंगे | बहरहाल इस बार चूंकि पर्याप्त समय देने के साथ काफी सरल तरीका रहेगा नोट बदलने का और तब तक 2 हजार का नोट चलन में रहने से उसके अवैध होने का खतरा भी नहीं है ,  इसलिए बैंकों में पिछली बार जैसी भीड़ शायद ही हो | लेकिन इसके बाद की परिस्थिति पर भी विचार करना चाहिए | अर्थात बीते कुछ सालों में जबसे नगदी में लेन देन में निरंतर कमी आ रही है और नई पीढ़ी तेजी से डिजिटल आर्थिक व्यवहार को अपनाती जा रही है तब बड़े नोटों के प्रचलन को भी धीरे – धीरे कम करते हुए बंद करना चाहिए | अमेरिका में सबसे बड़ा नोट 100 डालर का होता है | कहते हैं नोटबंदी की भूमिका में ऐसा ही कुछ करने की सोच थी किन्तु फिर जो फैसला हुआ वह सही होते हुए भी परेशानी का सबब बन गया | अच्छा हुआ सरकार और रिजर्व बैंक दोनों ने पिछले अनुभव या गलतियों से सबल लेते हुए जनता की असुविधा का ध्यान रखा | ये भी कहा जा सकता है कि इस बार पर्याप्त मात्रा में नए नोट तैयार किये जा चुके होंगे जिससे  नोट बदलने वाले को तत्काल भुगतान किया जा सके | इस बारे में बेहतर होगा कि अगले कदम के तौर पर 500 का नोट भी बंद किया जाए |  ये बात तो हर कोई जानता है कि बड़े नोट घूसखोरी और  भ्रष्टाचार के जरिये काले धन में परिवर्तित होकर चलन से बाहर हो जाते हैं | कम मूल्य की मुद्रा को छिपाने में भी काले धन वाले को परेशानी होगी | इसलिए आधे - अधूरे मन से काम करने के बजाय सरकार को  ठोस निर्णय लेना चाहिए। भ्रष्टाचार हमारे देश की  सबसे बड़ी समस्या है और उसका पोषण काले धन से ही होता है। इसलिए उसकी जड़ें काटने के लिए सबसे सुलभ तरीका बड़े नोटों को बंद करना ही है। रिजर्व बैंक द्वारा गत दिवस उठाया गया कदम समयोचित होने के साथ ही आने वाले चुनावों में काले धन के उपयोग पर लगाम लगाने में सहायक होगा ये उम्मीद की जानी चाहिए। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 19 May 2023

मंत्री भले हट गया लेकिन मुद्दा अभी जीवित है



कल सुबह जब कानून मंत्री किरण रिजिजू का विभाग बदले जाने की खबर आई तब हर किसी को अचरज हुआ क्योंकि वे मोदी सरकार के अत्यंत कार्यकुशल सदस्यों में से माने  जाते हैं | रविशंकर प्रसाद को हटाये जाने के बाद जब श्री रिजिजू को उनके स्थान पर बिठाया गया  तब ये कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ट अधिवक्ता होने के नाते चूंकि नीतिगत मामलों में वे न्यायपालिका के साथ मतभेदों पर खुलकर सरकार का पक्ष नहीं रख पाते लिहाजा ऐसा कानून मंत्री नियुक्त किया गया  जिसका अदालत से पाला न पड़ता हो | उल्लेखनीय है अतीत में अनेक नामी अधिवक्ता कानून मंत्री रह चुके हैं लेकिन ये कहना गलत न होगा कि इन दिनों जिस तरह की तल्खी सरकार और न्यायपालिका के बीच देखने मिल रही है वह अपने आप में अभूतपूर्व कही जा सकती है | वैसे तो अनेक फैसले इसकी वजह माने  जा सकते हैं किंतु मुख्य कारण है उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु प्रचलित कालेजियम व्यवस्था। जिसे मोदी सरकार के आने के  बाद लोकसभा में सर्वसम्मति और राज्यसभा में केवल स्व.राम जेठमलानी के विरोध के बाद रद्द करते हुए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का कानून पारित कर दिया गया । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उसे असंविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। हालांकि केंद्र सरकार ने दोबारा उस विषय को संसद में लाने का प्रयास नहीं किया किंतु इसे लेकर न्यायपालिका के साथ उसके रिश्तों में खटास आ गई।जिसका प्रमाण सार्वजनिक मंचों पर भी मिलने लगा। जबसे श्री रिजिजू कानून मंत्री बने तबसे वे कालेजियम को असंवैधानिक बताने के साथ ही अनेक ऐसे बयान देते रहे जिनसे न्यायपालिका में नाराजगी बढ़ रही थी। इसका चरम तब आया जब उपराष्ट्रपति बनने के बाद जगदीप धनखड़ ने भी श्री रिजिजू की ही तरह से  ही कालेजियम की संवैधानिकता पर सवाल उठा दिए। इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने सॉलिसिटर जनरल के जरिए ये संदेश भी दिया कि संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति द्वारा इस तरह की बात कहना संतुलन बिगाड़ने वाला होगा। यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि श्री धनखड़ स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर चुके हैं। हालांकि उसके बाद भी उन्होंने कालेजियम की आलोचना में कोई संकोच नहीं किया किंतु कानून मंत्री के रूप में श्री रिजिजू की आलोचना न्यायपालिका को  नागवार गुजर रही थी। हाल ही में उन्होंने न्यायाधीशों और वकीलों के बारे में जो तीखी टिप्पणियां की गईं उनका विरोध होने के बाद  सरकार को लगा कि बात बढ़ सकती है।इसलिए गत दिवस पहले श्री रिजिजू और बाद में कानून राज्य  मंत्री एस.पी. सिंह बघेल को हटाकर दूसरे मंत्रालय में भेज दिया गया। कानून विभाग का स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री अर्जुनराम मेघवाल को दिया गया जो संसदीय कार्य और संस्कृति राज्यमंत्री भी हैं और राजस्थान में पूर्व आईएएस अधिकारी भी रह चुके हैं । उनके बारे में ये प्रचारित किए जाने के पीछे भी राजनीतिक कारण है कि वे बहुत सादगी पसंद और सरल व्यक्ति हैं । इसका उद्देश्य संभवतः न्यायपालिका को संदेश देना है कि उन्हें नए मंत्री से वह सब नहीं सुनना पड़ेगा जिससे वह अपने आपको असहज महसूस करती है। इस बारे में ये भी कहा जा रहा है कि हाल ही में देश के  मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सिलसिले में मिले तब श्री चंद्रचूड़ ने श्री रिजिजू के आलोचनात्मक बयानों पर शिकायत दर्ज की। उसी दौरान श्री मोदी ने कानून मंत्री को बदलने का फैसला किया। ये बात भी चर्चा में  है कि मुख्य न्यायाधीश के लंबे कार्यकाल को देखते हुए भी प्रधानमंत्री न्यायपालिका से टकराव टालना चाह रहे हैं । हाल ही में कुछ फैसले ऐसे आए  जिनसे सरकार के सामने परेशानी खड़ी हो गई। प्रधानमंत्री निश्चित तौर पर कुशल राजनेता हैं और व्यक्तिगत व्यवहार में अपने विरोधी के प्रति भी उनकी सौजन्यता प्रसिद्ध है । कानून मंत्री बदलकर उन्होंने श्री चंद्रचूड़ को ये एहसास करवा दिया  कि सरकार मुख्य न्यायाधीश की भावनाओं के प्रति कितनी संवेदनशील और सतर्क है किंतु इसके साथ ही ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि श्री रिजिजू को हटाए जाने के बाद कालेजियम मुद्दे पर क्या केंद्र सरकार का दृष्टिकोण भी बदल गया ? और ये भी कि क्या उपराष्ट्रपति श्री धनखड़ भी इस विषय पर तीखी टिप्पणियां से बचेंगे ? हालांकि राजनीतिक नेताओं द्वारा फायदे और नुकसान को ध्यान में रखते हुए अपनी नीति और निर्णय परिवर्तित कर देना सामान्य बात है। हाल ही में देखने आया कि वीर सावरकर के बारे में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा की जाने वाली टिप्पणियां उस समय से बंद हो गईं जब एनसीपी नेता शरद पवार ने कांग्रेस को आगाह किया कि उनसे महाराष्ट्र में नुकसान हो सकता है। उसके बाद से श्री गांधी ने  सावरकर का नाम लेना ही छोड़ दिया। तो क्या न्यायपालिका की नाराजगी से बचने भाजपा भी कालेजियम का विरोध करना बंद कर देगी? बेहतर होगा वह इस बारे में  अपना विचार सार्वजनिक करे क्योंकि श्री रिजिजू बिना पार्टी की  सहमति के कालेजियम के विरुद्ध बोलने का दुस्साहस नहीं कर  सकते थे । अन्यथा बजाय दूसरे विभाग में भेजे जाने के वे  सरकार से बाहर किए जाते। कालेजियम का विषय काफी ज्वलंत है जो न्यायपालिका में पारदर्शिता और परिवारवाद को रोकने से जुड़ा है। बेहतर होगा भाजपा गैर सरकारी स्तर पर इस बारे में राष्ट्रीय विमर्श जारी रखे। न्यायपालिका का सम्मान बेहद जरूरी है।किंतु उसे अपनी मर्जी का मालिक बनाकर स्वच्छंद बना देना भी लोकतंत्र के लिए घातक होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 18 May 2023

पायलट से प्रेरणा ले रहे कांग्रेस के असंतुष्ट



कांग्रेस आलाकमान द्वारा कर्नाटक का विवाद आखिरकार सुलझा लिया गया | लेकिन इस पूरे मामले में एक बात सामने आ गई कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपने गृह राज्य में ही प्रभावहीन साबित हुए | चार दिन की मशक्कत के बाद मुख्यमंत्री पद की गुत्थी सुलझ तो गयी लेकिन इस दौरान ये बात खुलकर सामने आई कि कांग्रेस में अब गांधी परिवार भी पहले जैसा ताकतवर नहीं रहा | कर्नाटक के प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार ने मुख्यमंत्री बनने के लिए जिस तरह का दबाव बनाया उसे देखकर ये लगा कि पार्टी आलाकमान द्वारा नाराज नेताओं को मनाये जाते समय दिए जाने वाले आश्वासनों पर भरोसा कम होता जा रहा है | जैसी जानकारी आई है उसके अनुसार श्री खरगे के अलावा राहुल गांधी तक की बात शिवकुमार ने नहीं मानी । पार्टी आलाकमान द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नाम पर मोहर  लगा देने के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष उनके मातहत उपमुख्यमंत्री बनने के लिए राजी नहीं थे | आलाकमान ने उनको प्रदेश अध्यक्ष बने रहने के प्रस्ताव के साथ दो मंत्रालय का प्रस्ताव भी दिया परन्तु वे ऐंठे रहे | आखिकार मोर्चा सोनिया गांधी को सम्भालना पड़ा जिन्होंने शिमला  से वीडियो वार्ता के जरिये शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बने रहने के लिए राजी कर लिया | आधे मंत्री भी उनकी मर्जी के रहेंगे और ढाई साल बाद मुख्यमंत्री पद पर उनकी ताजपोशी की  जायेगी |  उल्लेखनीय है कि चुनाव परिणाम के बाद राहुल ने कहा था कि मुख्यमंत्री का चयन चुने हुए विधायक करेंगे | उसके बाद पर्यवेक्षकों को कहा गया कि विधायकों की राय लें | खुद श्री खरगे रायशुमारी में लगे रहे और ये मानकर कि बहुमत  सिद्धारमैया के साथ है ,उनके नाम का निर्णय कर दिया गया। लेकिन इसके विरोध में  शिवकुमार ने जिस तरह के तेवर दिखाए उसके बाद राजनीति के जानकार ये सोचने बाध्य हुए कि भले ही गांधी परिवार ने जी - 23 नामक असंतुष्टों को पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में जोरदार शिकस्त देते हुए शशि थरूर के मुकाबले श्री खरगे को भारी विजय दिलवा दी किंतु उसके बाद भी राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री पद के दावेदार क्रमशः सचिन पायलट और टी. एस. सिंहदेव का गुस्सा कम नहीं हो रहा। हालांकि छत्तीसगढ़ में खुलकर बगावत तो नहीं देखने मिली किंतु ढाई - ढाई साल तक मुख्यमंत्री बनाए जाने का जो फार्मूला आलाकमान ने 2018 में सरकार बनने पर भूपेश बघेल और श्री सिंहदेव के बीच तय किया था , उस पर अमल न होने से दोनों के बीच की खुन्नस समय - समय पर सामने आती रहती है। चुनाव करीब होने की वजह से फिलहाल तो मुख्यमंत्री बदले जाने की संभावना क्षीण है किंतु श्री सिंहदेव भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह पर चल पड़े तो इस छोटे से राज्य में कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं । जहां तक राजस्थान का मुद्दा है तो वहां अब तक के हालात ये स्पष्ट कर रहे हैं कि श्री पायलट पार्टी में रहते हुए भी आलाकमान की सर्वोच्चता को ठेंगा दिखाने की जुर्रत लगातार करते जा रहे हैं। लेकिन गांधी परिवार उनके विरुद्ध कोई भी कदम उठाने से डर रहा है । ये संभवतः पहला मौका है जब किसी प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री रहा नेता अपनी पार्टी की ही सरकार को भ्रष्ट बताते हुए  सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहा है किंतु उसे पार्टी से निकालना तो दूर रहा , एक नोटिस देने की हिम्मत  तक आलाकमान नहीं कर पा रहा। ऐसा लगता है शिवकुमार जिस तरह से राहुल और श्री खरगे के सामने अपनी जिद पर अड़े रहे उसकी प्रेरणा उनको श्री पायलट के दुस्साहस से मिली। भले ही श्रीमती गांधी ने उन्हें मना लिया लेकिन देखने वाली बात ये है कि उनकी बात भी पहली बार में उन्होंने ठुकरा दी थी। कुल मिलाकर जो स्थितियां कर्नाटक में देखने मिलीं उनसे ये साफ हो गया कि कांग्रेस में गांधी परिवार नामक असली आलाकमान  का रुतबा भी अब ढलान पर है। कर्नाटक की जीत को राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का सुपरिणाम बताने वाले राजनीतिक विश्लेषक भी ये देखकर हैरान हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में फंसे  शिवकुमार ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को पूरे चार दिन तक शीर्षासन करवाए रखा। उनको मनाने के लिए सत्ता संचालन में बराबरी की हैसियत देने का वायदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के लिए  स्थायी सिरदर्द साबित होगा। कांग्रेस आलाकमान चाहता तो शिवकुमार पर चल रहे मामलों का हवाला देते हुए उनकी अकड़ कम कर सकता था किंतु उल्टे उन्होंने आलाकमान की निर्णय क्षमता को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। इसे कर्नाटक में कांग्रेस के  नाटक का मध्यांतर कहना गलत नहीं होगा। शिवकुमार के लिए सत्ता में बने रहना जरूरी भी है और मजबूरी भी क्योंकि राज्य के जिन डीजीपी को वे अयोग्य ,  अक्षम और भाजपा का कार्यकर्ता बताते रहे उनको केंद्र सरकार ने सीबीआई का मुखिया बनाकर उनके सिर पर तलवार लटका दी है। आगे क्या होगा ये आज कहना तो जल्दबाजी होगी  लेकिन कर्नाटक की कांग्रेस राजनीति में बीते चार दिन जो देखने मिला उससे अन्य राज्यों के असंतुष्ट कांग्रेसियों के हौसले बुलंद हुए हैं। विशेष रूप से जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं वहां आलाकमान के लिए नई - नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कोई बड़ा धमाका हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी