Monday, 12 June 2023

अफीम से भी खतरनाक नशा है मुफ्तखोरी



अरविंद केजरीवाल इस बात से परेशान हैं कि मुफ्त बिजली का उनका चुनाव जिताऊ मंत्र अन्य पार्टियों ने भी सीख लिया । हाल ही में उनका एक बयान आया जिसमें वे खीजते हुए कह रहे थे कि चलो अच्छा हुआ बाकी पार्टियां भी उनकी नकल करते हुए जनता को लाभ पहुंचाने तैयार हुईं। वैसे भी इस समय देश में मुफ्त उपहार बांटने  की होड़ लगी हुई है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पहले महिलाओं को मोबाइल फोन के साथ तीन साल तक का डेटा मुफ्त देने की बात कही। जब एक करोड़ से ज्यादा मोबाइल खरीदने की व्यवस्था न हो सकी तब ये ऐलान कर दिया गया कि उसकी कीमत उनके खातों में जमा कर दी जावेगी।  म.प्र में भी कांग्रेस ने भाजपा सरकार द्वारा लाड़ली बहना योजना नामक ब्रह्मास्त्र के अंतर्गत 1 हजार प्रतिमाह दिए जाने के जवाब में 1500 रु. हर महीने देने का वायदा कर दिया है ,मुफ्त और सस्ती बिजली के अलावा सस्ता रसोई गैस सिलेंडर और पुरानी पेंशन की बहाली अलग से। जिन भी राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहां मतदाताओं को ग्राहक की तरह लुभाने के लिए राजनीतिक पार्टियां डिस्काउंट सेल की तर्ज पर अपनी दुकानें खोलकर बैठ गई हैं । ऐसे में क्षेत्रीय से राष्ट्रीय पार्टी बनकर पूरे देश में छा जाने को बेताब आम आदमी पार्टी को ये चिंता सताने लगी है कि जब सभी पार्टियां मुफ्त उपहारों की बरसात करेंगी तब मतदाता उसे क्यों आजमाएंगे ? उदाहरण के लिए हिमाचल और गुजरात में मुफ्त बिजली और मोहल्ला क्लीनिक की गारंटी वाला उसका दांव औंधे मुंह गिरा। पंजाब में कांग्रेस की अंतर्कलह और भाजपा - अकाली गठबंधन टूटने का लाभ जरूर उसे मिला। लेकिन धीरे - धीरे ही सही मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली इन योजनाओं से भी जनता को विरक्ति होने लगेगी , यदि उसकी रोजमर्रा की दिक्कतें जस की तस बनी रहीं तो। उदाहरण के लिए म.प्र में शिवराज सरकार ने महिलाओं को 1 हजार रु. हर महीने देने की बात कही तो कांग्रेस 1500 का वायदा लेकर आ गई। इस पैंतरे का मुकाबला करने के लिए मुख्यमंत्री ने लाड़ली बहना योजना के अंतर्गत दी जा रही राशि को क्रमशः बढ़ाते हुए 3 हजार तक ले जाने की घोषणा कर डाली। साथ ही उसकी पात्रता आयु घटाकर 21 वर्ष कर दी। कांग्रेस इसका क्या जवाब देती है ये भी देखना होगा। राजनीतिक पार्टियों की इस दरियादिली को देखकर जनता के एक वर्ग में इस बात की नाराजगी है कि केवल चुनाव के समय ही इतनी उदारता क्यों दिखाई जाती है ? और फिर जो करदाता हैं उनके भीतर  भी ये सवाल रह - रहकर कौंधता है कि उनसे वसूले जाने वाले कर का उपयोग वोटों की खरीद - फरोख्त के लिए किया जा रहा है। हालांकि अपवाद स्वरूप कुछ को छोड़ सभी राजनीतिक दल चुनाव में  बाजारवाद को लेकर कूदने लगे हैं। यद्यपि जरूरतमंदों की जिंदगी आसान करने के लिए सरकार द्वारा सहायता का हाथ बढ़ाना लोक कल्याणकारी राज्य का मूलभूत सिद्धांत है। शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार हमारे देश की प्रमुख जरूरत है। ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कुछ नहीं हुआ  किंतु  वह अपर्याप्त है। और इसीलिए जनता के मन में व्यवस्था के प्रति असंतोष और आक्रोश बढ़ता जा रहा है। जब तक कांग्रेस का एकाधिकार रहा तब तक उसे मुफ्त उपहार की चिंता नहीं रही। लेकिन जब सत्ता बदलने लगी तब राजनीतिक पार्टियों द्वारा चुनाव दर चुनाव  नए वायदों के साथ मैदान में उतरने की नीति अपनाई जाने लगी। बात आरक्षण  और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से जातिवाद तक आने के बाद  धार्मिक ध्रुवीकरण पर आकर टिकी किंतु अंततः नजर मतदाता की जेब पर गई और फिर शुरू हुआ मुफ्त खैरातें बांटने का सिलसिला जो रुकने का नाम नहीं ले रहा। स्व.अर्जुन सिंह ने म.प्र में एक बत्ती कनेक्शन के जरिए मुफ्त बिजली देने की शुरुवात की और साथ में गरीबों को सरकारी जमीनों के  पट्टे भी बांटे जाने लगे। नतीजा ये  हुआ कि देश का सबसे समृद्ध म. प्र विद्युत मंडल बदहाली के कगार पर जा पहुंचा।और सरकारी जमीन पर कब्जे की होड़ में झुग्गी - झोपड़ियों का जाल फैलता गया। आने वाली सभी सरकारों ने कमोबेश इसी नीति को जारी रखा। नाम और स्वरूप जरूर  बदलते गए। धीरे -  धीरे ये चलन राष्ट्रव्यापी हो गया। होना तो ये चाहिए था कि  गरीबों की सामाजिक , आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में सुधार किया जाता । लेकिन जिस तरह आरक्षण का दायरा बढ़ाने  के बाद भी अनु. जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की  बेरोजगारी खत्म नहीं की जा सकी उसी तरह से मुफ्त उपहारों की ये प्रतिस्पर्धा भी मतदाताओं को लुभाने में कहां तक सफल होगी ये बड़ा सवाल है। सबसे बड़ी बात ये है  कि इन घोषणाओं और प्रलोभनों से चुनाव जीतने में भले आसानी होती होगी किंतु बुनियादी समस्याएं यथावत हैं। उदाहरण के तौर पर आजादी के 75 साल बाद भी आरक्षण अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल साबित हुआ । उसके नाम पर चुनाव भले जीते जाते रहे हों लेकिन समाज को जातियों में तोड़ने का बड़ा अपराध भी हुआ। इसी तरह चुनावी खैरातों का अंतिम परिणाम समाज में  असंतोष को बढ़ावा देने वाला ही होगा क्योंकि इसके दूरगामी नतीजे आर्थिक खोखलेपन को जन्म देंगे। बेहतर है देश में अधोसंरचना के कामों पर अधिकाधिक खर्च हो और  मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने की जगह करों का बोझ कम करते हुए महंगाई को नियंत्रित करते हुए समाज के सभी वर्गों को राहत देने की व्यवस्था की जाए। मसलन राजस्थान और म.प्र में सबसे महंगा पेट्रोल - डीजल है लेकिन कोई भी पार्टी इनको सस्ता किए जाने की बात नहीं कर रही जबकि ऐसा होने पर महंगाई पर तत्काल नियंत्रण किया जा सकता है। समय आ गया है जब केवल चुनाव जीतने और फिर सत्ता में बने रहने के लिए सौदेबाजी करने की  बजाय करोड़ों लोगों का उपयोग उत्पादकता बढ़ाने हेतु किया जावे । ध्यान रहे जरूरत से ज्यादा मुफ्तखोरी अफीम से भी ज्यादा खतरनाक नशा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 10 June 2023

अन्य नेता भी वित्तमंत्री सीतारमण से प्रेरणा लें



केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण अपनी सादगी के लिए जानी जाती हैं । बतौर वित्तमंत्री उनके कार्यकाल का आकलन सभी अपने - अपने ढंग से करते हैं किंतु उनके बारे में जो ताजा खबर आई वह बाकी राजनेताओं के लिए एक संदेश है। उनकी बेटी का विवाह दो दिन पूर्व  संपन्न हुआ। वित्तमंत्री की बेटी की शादी में  दिग्गज राजनेताओं के साथ ही देश - विदेश के बड़े से बड़े उद्योगपतियों की उपस्थिति से किसी को आश्चर्य नहीं होता । और जब उनका दामाद प्रधानमंत्री कार्यालय में ओएसडी के पद पर पदस्थ हो तब तो जबर्दस्त तामझाम की जा सकती थी। अनेक मंत्री और अन्य बड़े नेता  बेटे - बेटियों के विवाह में अपने वैभव का प्रदर्शन खुलकर कर चुके हैं । जिसमें हजारों की भीड़ एकत्र हुई। प्रधानमंत्री से लगाकर तो निचले स्तर तक के कार्यकर्ता शामिल हुए । राजनीतिक मतभेद त्यागकर अन्य दलों के लोग भी आशीर्वाद देने हाजिरी लगाते हैं । जिनको ऐसी शादियों का निमंत्रण मिलता है वे इसे अपना सौभाग्य मानकर  दौड़े - दौड़े जाते हैं । ये भी  कहा जा सकता  है कि राजनीतिक नेताओं के लिए ऐसे अवसर जनाधार दिखाने के साथ ही धाक जमाने का जरिया होता है। लेकिन श्रीमती सीतारमण ने इस सबसे अलग हटकर  बेटी के विवाह का समूचा आयोजन अपने निवास पर ही किया । इसमें न बड़े नेता बुलाए गए और न ही  अन्य वी.आई .पी । केवल परिवार के सदस्य और कुछ नजदीकी मित्र ही पारंपरिक तरीके से संपन्न उक्त विवाह के साक्षी बने। जैसे ही उसके चित्र सोशल मीडिया पर आए त्योंही वित्तमंत्री के इस कार्य  की प्रशंसा होने लगी। यदि वे इसके बाद कोई स्वागत समारोह आयोजित नहीं करतीं तब उनका ये निर्णय निश्चित रूप से तमाम सत्ताधीश नेताओं और अन्य विशिष्ट जनों के लिए अनुकरणीय है। नेतागण अपने बेटे - बेटियों के विवाह में भीड़ एकत्र कर अपना रुतबा दिखाते हैं । जनता को खुश करने के लिए भी उन्हें ऐसा करना पड़ता है किंतु हंसी तब आती है जब वे सार्वजनिक मंचों पर विवाह जैसे आयोजनों में फिजूलखर्ची से बचने के उपदेश देते हैं । विभिन्न संगठनों द्वारा आयोजित किए जाने वाले सामूहिक विवाह समारोह में भी बतौर अतिथि नेताओं द्वारा शादियों में  दिखावे को रोकने के भाषण झाड़े जाते हैं । लेकिन जब उनका अपना मौका आता है तो वे उन उपदेशों के विपरीत अपनी संपन्नता का वीभत्स प्रदर्शन करने से बाज नहीं आते। उस दृष्टि से श्रीमती सीतारमण ने जो उदाहरण पेश किया वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय और अनुकरणीय है । यद्यपि कोई अपने परिवार में होने वाली शादी में सादगी अपनाए या तामझाम दिखाए ये उसका निजी मसला है किंतु राजनेता केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं रहते ।  बल्कि उनका आचरण समाज को भी प्रभावित करता है। आजकल शादियों पर किए जाने वाला खर्च  प्रतिष्ठा का मापदंड बन गया है। किसी बड़े व्यक्ति के यहां हुई शादी पर वैभव का कितना प्रदर्शन हुआ उससे उसकी सामाजिक हैसियत तय की जाने लगी है । नेताओं की जमात भी इससे प्रेरित और प्रभावित  है । उस दृष्टि से वित्तमंत्री ने एक आदर्श प्रस्तुत किया है। उनकी आर्थिक नीतियों की आलोचना करने वाले भी उनके द्वारा बेटी के विवाह को पारिवारिक आयोजन तक सीमित रखने के उनके निर्णय की प्रशंसा करेंगे और करना भी चाहिए। लेकिन इसके आगे सवाल ये है कि सत्ता और विपक्ष में बैठे अन्य नेतागण क्या श्रीमती सीतारमण से प्रेरित होकर विवाह जैसे आयोजन में  फिजूलखर्ची से बचेंगे ?  ज्यादा समय नहीं बीता जब कोरोना काल में अतिथियों की संख्या सीमित किए जाने की वजह से कम खर्च में  विवाह समारोह आयोजित किए जाने लगे थे। ज्यादातर लोग इस बात से खुश थे कि कम खर्च में इतना महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हो सका। कोरोना के बाद से जीवन के प्रति लोगों के दृष्टिकोण में बदलाव आने की बात आम तौर पर सुनी जाती है । लेकिन ज्योंही महामारी का प्रकोप कम हुआ त्योंही विवाह आयोजनों में  फिजूलखर्ची का दौर लौट आया। इससे साबित होता है कि ऐसे मामलों में  सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी है। पहले दहेज नामक बुराई के विरुद्ध आवाजें उठती थीं। कानून ने तो उस पर रोक लगाई ही , सामाजिक तौर पर भी उसके विरुद्ध काफी जागरूकता आई।  अनेक शिक्षित युवाओं ने अपने माता - पिता को दहेज लेने से रोका। वहीं अनेक युवतियों ने दहेज  मांगने वाले लड़के से विवाह करने से इंकार करने का साहस दिखाया ।  दूसरी तरफ विवाह समारोहों पर होने वाला खर्च बेतहाशा बढ़ जाने से वधू पक्ष पर दहेज से कहीं ज्यादा बोझ आने लगा। ऐसे में  इस बुराई को  तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक समाज के प्रमुख लोग फिजूलखर्ची से बचने का उदाहरण पेश नहीं करते। उस दृष्टि से  श्रीमती सीतारमण ने अच्छा प्रयास किया है। सभी ऐसा ही करें इसके लिए जबरदस्ती तो नहीं की जा सकती परंतु राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका निभाने वाला वर्ग ही यदि वित्तमंत्री से प्रेरित होकर उनका अनुसरण करने  लगे तो इससे साधारण आर्थिक स्थिति वालों का हौसला बुलंद होगा जो बड़े लोगों की नकल करने के फेर में कर्ज लेकर शादियों में रईसी का प्रदर्शन करते हैं ।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 9 June 2023

वरना कैनेडा में अलग खालिस्तान बनाने की मांग उठने लगेगी



दिल्ली में किसान आंदोलन के दौरान जब भिंडरावाले की तस्वीर वाली टी शर्ट पहिए सिख युवक धरना स्थल पर नजर आए तभी ये आशंका हुई थी कि खालिस्तानी आंदोलन किसानों की आड़ में सिर उठा रहा है। चूंकि उसकी अगुआई पंजाब से हुई थी इसलिए सिख किसानों की संख्या काफी थी। धरना स्थल पर लंगर की व्यवस्था भी पंजाब के गुरुद्वारों से ही हो रही थी । धीरे - धीरे ये खबरें भी  आईं कि आंदोलन को कैनेडा और ब्रिटेन के खालिस्तान समर्थक संगठनों से धन भी मिल रहा था।  वहां किसान आंदोलन के पक्ष में जिस तरह से प्रदर्शन हुए उससे भी उक्त आशंका को बल मिला। बाद में गणतंत्र दिवस पर लालकिले की प्राचीर पर  निशान साहेब वाला झंडा फहराकर तलवारें घुमाने जैसी हरकत के साथ ही  शासकीय संपत्ति को क्षतिग्रस्त किए जाने से  इस बात की पुष्टि हो गई कि राष्ट्रविरोधी ताकतें किसान आंदोलन में घुसकर अपना उल्लू सीधा करना चाह रही थीं।आंदोलन खत्म होने के बाद हुए पंजाब विधानसभा के  चुनाव में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गई । यद्यपि उसे कांग्रेस की आपसी फूट का परिणाम माना गया लेकिन शीघ्र ही ये बात समझ में आने लगी कि सत्ता परिवर्तन के पीछे  कोई अदृश्य खेल भी था । भगवंत सिंह मान  के सत्ता संभालने के बाद अमृतसर के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर के निकट लगातार विस्फोट होने लगे।  थाने में बंद एक उग्रवादी को  जिस तरह सशस्त्र भीड़ ने रिहा कराया , उसके बाद ये बात साफ हो गई कि खालिस्तान की जो चिंगारी लंबे समय से दबी हुई थी वह नई सरकार के सत्ता में आते ही भड़कने लगी । भिंडरावाले के नए संस्करण के तौर पर उभरे एक कथित नेता की फरारी से माहौल तनावपूर्ण होने लगा। अनेक हिंदू मंदिरों पर हमले की घटनाएं भी हुईं। इस साल  आपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर  हुए आंदोलन कुछ ज्यादा ही बड़े थे। कुल मिलाकर ये बात स्पष्ट हो गई कि पंजाब में  सत्ता बदलने के बाद खालिस्तान समर्थक अपने को सुविधाजनक स्थिति में मानने लगे । जल्द ही ये बात भी उजागर हो गई कि विदेशों में सक्रिय खालिस्तानी संगठन भी खुलकर भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो गए हैं । ब्रिटेन और कैनेडा में खालिस्तान के पक्ष में धरना , जुलूस और पोस्टर बाजी की हालिया खबरें इस बात का प्रमाण हैं कि पंजाब में सिर उठा रहे खालिस्तान समर्थक और विदेश में खालिस्तान का झंडा उठा रहे संगठनों के बीच संबंध है । हाल ही में जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी अमेरिका गए तब उनकी सभा में भी खालिस्तानी समर्थक घुस आए और नारेबाजी की । लेकिन कैनेडा से जो ताजा खबर आई वह चिंताजनक है। वहां के एक शहर में भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्व.  इंदिरा गांधी की हत्या की झांकी निकाली गई जिस पर विदेश  मंत्री एस.जयशंकर ने कड़ा  विरोध करते हुए कैनेडा सरकार को चेतावनी दी  कि वह अपनी धरती का उपयोग खालिस्तानी तत्वों को न करने दे क्योंकि यह दोनों देशों के आपसी रिश्तों के लिए नुकसानदेह होगा । उल्लेखनीय है कैनेडा में बब्बर खालसा जैसे अनेक सिख संगठन हैं जो खुलकर खालिस्तान की मांग उठाते हैं। पंजाब में चलने वाली खालिस्तानी गतिविधियों को आर्थिक सहायता उनसे  मिलने की बात भी किसी से छिपी नहीं है। ये कहना भी गलत न होगा कि दिल्ली में पूरे साल चले किसानों के धरने के दौरान  जिस तरह से वहां निहंगो द्वारा हिंसक वारदातें की गईं उससे खालिस्तानी आंदोलन के बीजों के दोबारा अंकुरित होने की आशंका जन्मी जिसकी पुष्टि ब्रिटेन और कैनेडा में हुए  उग्र प्रदर्शनों से हुई। उसी के बाद से पंजाब में खालिस्तान की मांग उठने और राज्य के भीतरी हिस्सों में गड़बड़ियों के समाचार आने लगे । हालांकि किसान आंदोलन को  खालिस्तान समर्थक कहना तो सही नहीं है किंतु उसका लाभ लेकर देश विरोधी ताकतें अपना जाल फैलाने में कामयाब हो गईं। अमेरिका में श्री गांधी के कार्यक्रम में सिख संगठनों द्वारा नारेबाजी के बाद कैनेडा में इंदिरा जी की हत्या का दृश्य दिखाने वाली झांकी निकाले जाने से साफ है कि किसी बड़ी योजना की रूपरेखा बन रही है। विदेश मंत्री श्री जयशंकर ने कैनेडा सरकार को चेतावनी देते हुए जो बयान दिया वह सही समय पर उठाया गया कदम है क्योंकि जहां पाकिस्तान  , खालिस्तानी आतंकवादियों को प्रशिक्षित करने का काम करता है वहीं कैनेडा में सक्रिय खालिस्तानी संगठन इन आतंकवादियों को आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवाने के दोषी हैं। भारत के लिए चिंता की बात ये है कि  भारतीय मूल के लाखों सिख कैनेडा के नागरिक  हैं जिनका वहां के राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में भी काफी प्रभाव है। ये देखते हुए कैनेडा सरकार भी उनके  विरुद्ध कार्रवाई करने में हिचकती है । लेकिन भारत के साथ कूटनीतिक रिश्ते मजबूत होने से कैनेडा को भी ये ध्यान रखना चाहिए कि उसकी जमीन पर भारत विरोधी गतिविधियां जोर न पकड़ें। उसे ये बात समझ लेना चाहिए कि भारत में खालिस्तान बनाए जाने की  मांग को  उसने अपने यहां उठने से नहीं रोका तो  एक - दो दशक बाद कैनेडा में ही सिखों के लिए अलग देश का आंदोलन जन्म लेने लगेगा। उसको ये बात जान लेना चाहिए कि जिस ओसामा बिन लादेन को पालने - पोलने में अमेरिका ने मदद की वही कालांतर में उसके लिए भस्मासुर बना। कैनेडा को अमेरिका के उस अंजाम से सबक  लेना चाहिए। ब्रिटेन , फ्रांस और जर्मनी भी उग्रवाद को नजरंदाज करने की सजा भोग रहे हैं । भारत सरकार द्वारा कैनेडा से जो विरोध व्यक्त किया गया वह तो पूरी तरह सही है किंतु  घरेलू मोर्चे पर भी  इस कूटनीति को सर्वदलीय समर्थन मिलना चाहिए। आम आदमी पार्टी से भी अपेक्षा है कि इस बारे में अपना दृष्टिकोण सामने रखे क्योंकि पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन के पनपने से वह भी संदेह के दायरे में आने लगी है। किसी जमाने में अरविंद केजरीवाल के दाहिने हाथ रहे डा.कुमार विश्वास ने इस बारे में जो आरोप लगाए थे , उनका संज्ञान लिया जाना भी जरूरी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 8 June 2023

वृक्षों की लाशों पर होने वाला विकास रोकना अच्छी खबर




विश्व पर्यावरण दिवस के दो दिन बाद ही  भोपाल में जनता के दबाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पीपल और बरगद के दो पेड़ काटने पर रोक लगा दी। दरअसल एक सड़क निर्माण के लिए उक्त पेड़ों को काटने की कोशिश लोक निर्माण विभाग कर रहा था किंतु निकटवर्ती आवासीय कालोनी के निवासी इसके विरोध में संगठित हुए और  छोटे बच्चे इन पेड़ों से लिपटकर खड़े हो गए। लोगों का कहना था कि  महिलाएं उन वृक्षों की पूजा करती हैं और फिर 20 वर्ष पुराने पीपल और बरगद के इन पेड़ों के कटने से पर्यावरण को भी क्षति पहुंचेगी। शाम होते - होते मुख्यमंत्री ने एक वीडियो प्रसारित करते हुए पेड़ों को काटने की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए कहा कि सड़क घुमा दी जावेगी किंतु वृक्ष जहां हैं वहीं खड़े रहेंगे। उन्होंने छोटे बच्चों  की आंदोलन में सहभागिता का भी  उल्लेख किया। साथ ही लोगों से प्रतिदिन पौधारोपण की अपील भी की। उल्लेखनीय है श्री चौहान भी नित्यप्रति पौधारोपण करते हैं ।  दो वृक्षों को बचाने संगठित हुए क्षेत्रीय जन , विशेष रूप से  बच्चे बधाई के पात्र हैं । मुख्यमंत्री की भी प्रशंसा की जानी चाहिए  जिन्होंने  पेड़ों को बचाने के लिए सड़क कुछ दूर से बनाने का निर्देश दिया। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है । उक्त घटना चूंकि राजधानी भोपाल की है इसलिए उसकी गूंज मुख्यमंत्री के कानों तक पहुंच गई और दो दशक पुराने पवित्र वृक्ष कत्ल होने बच गए। लेकिन प्रदेश के बाकी हिस्सों में न जाने कितने हरे - भरे वृक्ष रोजाना  काटे जाते हैं किंतु शासन और प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। लेकिन जैसी जागरूकता और जिद भोपाल की बाग मुगलिया एक्स्टेंशन कालोनी के वाशिंदों ने दिखाई वैसी अन्य शहरों में देखने नहीं मिलती। और जहां दिखाई भी देती है वहां स्थानीय जनप्रतिनिधि जनता का साथ देने के बजाय उसे विकास विरोधी बताने लगते हैं। प्रदेश के ही जबलपुर शहर में डुमना हवाई अड्डे जाने वाली सड़क चौड़ी करने सैकड़ों वृक्ष  बेरहमी से काट डाले गए। उल्लेखनीय है भोपाल की जनता ने स्मार्ट सिटी परियोजना को उन स्थानों से हटवाकर अन्यत्र स्थानांतरित करवा दिया था क्योंकि उसकी वजह से सैकड़ों वृक्ष काट दिए जाते। संदर्भित घटना में  जिन अधिकारियों ने उन वृक्षों को काटने का निर्णय लिया उनकी बुद्धि और विवेक पर भी सवाल उठते हैं। सड़क निर्माण की योजना बनाते समय ही इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखा गया कि दो दशक पुराने पर्यावरण की दृष्टि से बेहद उपयोगी वृक्ष बीच में आयेंगे तो उन्हें बचाने हेतु सड़क को थोड़ा इधर - उधर किया जाता । विकसित देशों में तो विशाल वृक्षों को विकास कार्यों में बाधक बनने पर दूसरी जगह स्थानांतरित करने की  तकनीक का इस्तेमाल होता है। हमारे देश में भी कई जगह ऐसा हुआ लेकिन उसमें सफलता का प्रतिशत कम ही है। ऐसे में बेहतर यही होता है कि निर्माण की ऐसी योजना  बनाई जावे जिससे वृक्ष भी बचे रहें और विकास भी न रुके। ये तो किसी को भी  बताने की जरूरत नहीं है कि 20 वर्ष पुराने ऐसे वृक्षों को काटने से कितना नुकसान होता जो 24 घंटे ऑक्सीजन वातावरण में प्रवाहित करते हैं । पीपल और बरगद की पूजा  का संस्कार किसी अंधविश्वास के कारण नहीं अपितु प्रकृति के संरक्षण में इनके योगदान के कारण  है। ऐसे में इस तरह की विकास योजनाएं बनाते समय ये  ध्यान में रखा जाना  चाहिए था कि उसके दायरे में आने वाले वृक्षों को , खासकर जो काफी पुराने और बड़े हों , काटने से बचा जावे। लोकनिर्माण विभाग के जिन अभियंताओं ने सड़क की योजना बनाई उनसे ये पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखा ? इस बारे में ये भी उल्लेखनीय है कि भोपाल देश की उन राजधानियों में से है जो अपनी हरियाली के लिए जानी जाती जाती हैं । यहां के बड़े और छोटे तालाब जल संरक्षण के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। प्रदेश की राजधानी बनने के बाद यहां कांक्रीट की जंगलनुमा अट्टालिकाएं बनती गईं और शहर की सीमाएं भी विस्तारित हुईं किंतु आज भी भोपाल प्राकृतिक दृष्टि से काफी सुंदर और समृद्ध है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इतने बड़े शहर में  एक - दो वृक्ष कट जाने से क्या हो जाता ? लेकिन इसी सोच ने तो देश के अनेक इलाकों से जंगल साफ कर दिए । हिमालय में समय -समय पर आने वाली प्राकृतिक आपदाएं भी वृक्षों की अंधाधुंध कटाई  का ही दुष्परिणाम है। म.प्र में सौभाग्यवश  वन संपदा प्रचुर मात्रा में है । हालांकि विकास कार्यों के कारण बड़ी संख्या में वृक्षों का कत्ल हो चुका है किंतु धीरे - धीरे पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है । भोपाल की आवासीय कालोनी के निवासियों ने उसी का परिचय देते हुए दो वृक्षों की रक्षा के लिए मोर्चा खोला और अंततः मुख्यमंत्री ने खुद होकर उनकी मांग को मंजूर करने की सौजन्यता दिखाई। इसे निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा सकता है किंतु ये भी सही है कि संचार क्रांति के दौर में इस तरह की घटनाओं का व्यापक प्रचार होने से अन्य लोग भी प्रभावित होते हैं। हालांकि ये बात तो स्वीकार करनी ही होगी कि विकास कार्य नहीं रोके जा सकते। राजमार्ग , बांध और आवासीय क्षेत्रों के निर्माण भी समय की मांग होने से जारी रहेंगे किंतु वैसा करते समय प्रकृति और पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो ये ध्यान में रखना जरूरी है।  वृक्ष को भी मनुष्य की तरह मानते हुए उसकी जीवन रक्षा की जानी चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 7 June 2023

कांग्रेस के बदले रुख से विपक्षी एकता पर खतरे के बादल



विपक्षी एकता के प्रयास अंजाम तक पहुंचने के पूर्व ही में  खटाई में  पड़ते नजर आ रहे हैं। इसका संकेत तब मिला जब 12 जून को पटना में होने वाली विपक्षी दलों की बैठक को टालना पड़ा।  इसका कारण कांग्रेस  अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के पास समय न होना बताया गया है । लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कर्नाटक चुनाव में प्राप्त सफलता के बाद कांग्रेस का हौसला बुलंद  है और वह विपक्षी दलों को यह संदेश देना चाहती है कि उसकी स्थिति उतनी कमजोर नहीं जितनी वे  मान बैठे हैं ।जैसा कि सुनने में आया था नीतीश कुमार और अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 250 सीटों पर लड़ने की समझाइश दी थी जिससे सभी सीटों पर भाजपा के  विरुद्ध एक संयुक्त प्रत्याशी उतारकर विपक्षी मतों का विभाजन रोका जा सके। लेकिन इसका संकेत मिलते ही कांग्रेस के रणनीतिकारों ने 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच 350 सीटों पर सीधी टक्कर का हवाला देते हुए इससे कम सीटों पर रजामंद होने से मना कर दिया ।और यहीं से  एकता के प्रयासों में दरार पढ़नी शुरू हो गई। जैसी की जानकारी है नीतीश  भाजपा के विरोध में विपक्ष के जिस मोर्चे  को आकार देने की मुहिम चला रहे हैं उसमें तृणमूल , सपा ,  आम आदमी पार्टी , तेलुगु देशम , वाईएसआर कांग्रेस  और बीआरएस जैसी पार्टियों को शामिल करने का भी इरादा है  । लेकिन कांग्रेस को इनके साथ गठबंधन करने में एतराज भी है और संकोच भी। पंजाब और दिल्ली में कांग्रेस के अनेक नेता आम आदमी पार्टी से हाथ मिलाने के खिलाफ हैं। वहीं ममता बैनर्जी , अखिलेश यादव , के.सी. राव जैसे नेता कांग्रेस को अपने राज्य में पैर जमाने का अवसर नहीं देना चाहते। चंद्रबाबू नायडू के दोबारा भाजपा के साथ आने की अटकलें तेज हैं वहीं जगन मोहन रेड्डी भाजपा से  अघोषित निकटता बनाए रखने की नीति पर चल रहे हैं। कांग्रेस को ये बात भी गंवारा नहीं हो रही कि नीतीश इस मोर्चे के शिल्पकार बनकर विपक्षी एकता का चेहरा बनें। दरअसल भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस को ये लगने लगा है कि राहुल अब पप्पू की छवि को ध्वस्त करते हुए नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर उभर रहे हैं । विभिन्न सर्वेक्षणों में हालांकि वे श्री मोदी की तुलना में  काफी पीछे हैं किंतु नीतीश सहित बाकी विपक्षी नेता तो मुकाबले में हैं ही नहीं।  कर्नाटक में जीत के बाद कांग्रेस सोचने लगी  है कि विपक्षी गठबंधन की जरूरत अब उससे ज्यादा क्षेत्रीय दलों को है। बिहार  और  महाराष्ट्र सहित कुछ और राज्य हैं जहां कांग्रेस के किनारा कर लेने से उन दलों की स्थिति कमजोर हो जायेगी। जहां तक बात उ.प्र की है तो वहां उसके पास खोने को कुछ नहीं बचा जबकि उसके साथ होने से सपा को कम मतों से हारी सीटों पर ताकत मिल सकती है। दरअसल नीतीश कुमार विपक्षी मोर्चे के संयोजक बनकर दबे पांव प्रधानमंत्री की दौड़ में बने रहना चाहते हैं । उन्हें उन परिस्थितियों की पुनरावृत्ति होने की उम्मीद  है जिनमें एच. डी.देवगौड़ा और इंदर कुमार गुजराल की लॉटरी खुल गई थी। लेकिन कांग्रेस इस बार किसी भी प्रकार का खतरा मोल लिए बिना गठबंधन के अस्तित्व में आने के साथ ही प्रधानमंत्री पद का निर्णय भी कर लेना चाहती है। इसीलिये कांग्रेस को 250 सीटों पर लड़ने का प्रस्ताव  मंजूर नहीं है क्योंकि  यह फॉर्मूला प्रधानमंत्री की कुर्सी पर उसका दावा कमजोर कर सकता है । इस प्रकार विपक्ष की 12 जून को होने वाली बैठक का टलना कांग्रेस की नई रणनीति का हिस्सा है जिसके अंतर्गत वह क्षेत्रीय दलों की शर्तों की बजाय अपनी शर्तों पर विपक्षी एकता को शक्ल देना चाह रही है । उसे ये भी समझ में आने लगा है कि ममता , के.सी.राव और अरविंद केजरीवाल के साथ गठजोड़ चुनाव बाद की परिस्थितियों में उसके लिए नुकसानदेह होगा। सुनने में आया है कि राहुल गांधी चाह रहे हैं कि इसी साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव तक विपक्षी गठबंधन  को लंबित रखा जाए। और यदि उनमें भी उसे हिमाचल और कर्नाटक जैसी सफलता मिल गई तब उसका हाथ सौदेबाजी में काफी ऊंचा हो जायेगा। उल्लेखनीय है म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसका भाजपा से सीधा मुकाबला है। आम आदमी पार्टी यहां उपस्थिति दर्ज कराने हाथ पैर मार रही है जिससे कांग्रेस में चिंता है। विपक्षी मोर्चे के बनने के पहले वह इस बात की प्रति आश्वस्त होना चाहेगी कि क्षेत्रीय दल उसके लिए नुकसानदेह न हों। हालांकि पटना बैठक की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है किंतु कांग्रेस ने 12 जून को उसका आयोजन रोककर आशंकाओं को जन्म दे दिया है। पार्टी को नीतीश का मेजबान बनना भी अच्छा नहीं लग रहा । बड़ी बात नहीं कांग्रेस अगली बैठक दिल्ली में आयोजित करे और खुद उसकी आयोजक बनकर बड़े भाई की भूमिका में वापस लौटे। ऐसा करने से उसे उन विपक्षी दलों की पहिचान हो जायेगी जो गठबंधन में रहते हुए भी उसे पसंद नहीं करते। जाहिर है ममता , अखिलेश और के.सी.राव जैसे नेता कांग्रेस की मेजबानी शायद ही स्वीकार करेंगे। बहरहाल इन सबसे ये लगने लगा है कि नीतीश कुमार द्वारा जिस उत्साह के साथ पटना में विपक्षी जमावड़ा किया जा रहा रहा वह ठंडा पड़ने लगा है। सही मायनों में कांग्रेस विपक्षी एकता का श्रेय और नेतृत्व आसानी से किसी और नेता को देने तैयार नहीं है। राहुल की अमेरिका यात्रा से भी पार्टी में उत्साह है। उसे लगने लगा है कि श्री गांधी ही विपक्षी नेताओं में अकेले हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर पहिचान रखते हैं ।  इसलिए विपक्षी मोर्चे की कमान भी उसी के हाथ में होना चाहिए। देखना ये है कि नीतीश , ममता , अखिलेश , के.सी राव और अरविंद केजरीवाल क्या कांग्रेस के झंडे के नीचे खड़ा होना पसंद करेंगे और राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार करने की शर्त उनको मंजूर होगी ?

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 6 June 2023

मुफ्त उपहार और जाति के समक्ष फीका पड़ जाता है विकास का मुद्दा





जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहां जातीय समीकरणों को साधने का प्रयास चल रहा है। हाल ही में संपन्न कर्नाटक के चुनाव में बाकी मुद्दों पर लिंगायत और वोक्कालिंगा भारी पड़े । सिद्धारमैया सरकार में मंत्रीमंडल के सदस्यों का परिचय  उनके जातीय समूह के तौर पर देते हुए ये भी बताया गया कि ऐसा आगामी लोकसभा चुनाव की व्यूह रचना की दृष्टि से किया गया है। हालांकि इसके लिए केवल कर्नाटक ही एकमात्र उदाहरण नहीं है। इस वर्ष जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं वहां की सरकारें और राजनीतिक पार्टियां विभिन्न जातियों को अपने पक्ष में गोलबंद करने में जुटी हुई हैं। ये देखते हुए अपने को जातियों का रहनुमा प्रचारित करने वाले राजनीतिक नेता भी चुनाव के पहले से ही सौदेबाजी करने लग जाते हैं। जातिगत समीकरणों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि सवर्णों की पार्टी समझी जाने वाली भाजपा सोशल इन्जीनियरिंग नामक हथियार का इस्तेमाल करते हुए सपा और बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए प्रयासरत है तो पिछड़ों की पार्टी कही जाने वाली पार्टी के नेता अखिलेश यादव  ब्राह्मणों को रिझाने परशुराम जी की मूर्ति का अनावरण करने जाते हैं। मायावती ने तो दलितों की सबसे बड़ी प्रतिनिधि पार्टी बसपा का महासचिव पद सतीशचंद्र मिश्र नामक ब्राह्मण को सौंपकर सामाजिक समीकरण अपने पक्ष में झुकाने का दांव चला।जिसके बल पर 2005 में वे स्पष्ट बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बन सकीं। म. प्र में सत्तारूढ़ भाजपा और उसकी प्रमुख प्रतिद्वंदी कांग्रेस भी जातियों के सम्मेलन आयोजित कर उन्हें अपने पाले में लाने के लिए हाथ - पांव मार रही हैं। इसके अलावा मुफ्त उपहारों की भी बरसात हो रही है। कहीं रसोई गैस का सिलेंडर  सस्ता किया जा रहा है तो कहीं महिलाओं के खाते में भी सीधे राशि  जमा हो रही है। विद्यार्थियों को टैबलेट और महिलाओं को मोबाइल बंट रहे हैं । नए - नए विकास कार्य स्वीकृत करने का काम तेजी पर है । गत दिवस राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने गृहनगर जोधपुर में लगभग 50 शिलान्यास और लोकार्पण कर डाले। ऐसा ही नजारा उन सभी राज्यों में है जहां  चुनाव होने वाले हैं। हालांकि आजादी के बाद से ही ये सब होता आया है । जब आचार संहिता वाली बंदिश नहीं थी तब तो मतदान के दो दिन पहले तक सत्ताधारी पार्टी जनता की छोटी - छोटी शिकायतें दूर कर दिया करती थी। लेकिन अब चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद सरकारी वाहन और विश्राम गृह का उपयोग करने के अलावा नई घोषणा करने से सरकार को रोक दिया जाता है। इसलिए चुनाव नजदीक आते - आते तक सरकारें ताबड़तोड़ घोषणाएं करते हुए मतदाताओं को लुभाती हैं । इन सबसे ये साबित होता है कि जिन विकास कार्यों और जन कल्याणकारी योजनाओं के प्रचार पर राज्य सरकारें करोड़ों रुपए लुटाती हैं वे चुनाव आते - आते तक अपना असर खो देती हैं। अन्यथा जातिगत गोलबंदी और चुनाव के ठीक पहले राहत का पिटारा खोलने का क्या मतलब हो सकता है ? म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक बार कहा था कि चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं , विकास से नहीं। हालांकि 2003 में बिजली , सड़क और पानी के मुद्दे पर उनकी सरकार  चली गई थी। उसके बाद म.प्र में हर क्षेत्र में जबरदस्त विकास हुआ और वह बीमारू राज्य के कलंक से मुक्त भी हुआ किन्तु 2018 में शिवराज सिंह चौहान सत्ता गंवा बैठे। इसका सबसे अच्छा उदाहरण 2004 का लोकसभा चुनाव है जब राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के अंतर्गत दक्षिण के जिन राज्यों में सड़कों का निर्माण शुरू हुआ वहां भाजपा को नाकामयाबी मिलने से अटल बिहारी वाजपेयी के हाथ से  सत्ता खिसक गई। अविभाजित आंध्र को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले चंद्रबाबू नायडू भी सत्ता से बाहर हो गए। ऐसे में ये सवाल काफी तेजी से विचार में आता है। कि क्या भारत की  चुनावी राजनीति में विकास प्रभावशाली मुद्दा नहीं रह गया है और सत्ता में आने और उसके बाद उसमें बने रहने के लिए दूसरे टोटके करने जरूरी हैं । यद्यपि उ.प्र विधानसभा का पिछला चुनाव योगी सरकार के राज में बेहतर कानून व्यवस्था के कारण भाजपा के पक्ष में गया किंतु ये भी उतना ही सही है कि जातीय समीकरणों का इस्तेमाल करते हुए सपा  अपनी सीटें दोगुनी करने में कामयाब रही। यही कारण है कि ममता बैनर्जी और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने अपने राज्य के विकास की बजाय चुनाव जीतने के अन्य तरीके अपनाए। ये निश्चित रूप से दुर्भग्यपूर्ण है। हालांकि आजकल प्रत्येक जनप्रतिनिधि पर अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास का दबाव रहता है किंतु चुनाव के दौरान उत्पन्न तात्कालिक मुद्दे उसकी उपलब्धियों पर पानी फेर देते हैं जो वाकई विचारणीय विषय है । अक्सर ये कहा जाता है कि चुनाव में धर्म और जाति की बजाय शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे  विषयों पर चर्चा होनी चाहिए किंतु जब धर्म और जाति सामने आते हैं तब शिक्षा , स्वास्थ्य और बाकी बातें निरर्थक हो जाती हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी विद्यालयों में सुधार जैसा मुद्दा उठाया किंतु उसकी जीत में मुफ्त बिजली और पानी ज्यादा सहायक बने। आने वाले महीनों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में जिस तरह के प्रलोभन दिए जा रहे हैं उनको देखकर लगता है कि राजनीति विचार  नहीं उपहार पर आधारित हो गई है और जाति की दीवारें तोड़ने के बजाय उन्हें और मजबूत किया जाने लगा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 5 June 2023

राजनीति छोड़ हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के बारे में सोचें




उड़ीसा में हुई भीषण रेल दुर्घटना की चर्चा रुक पाती उसके पहले ही बिहार के भागलपुर में गंगा नदी पर बनाये जा रहे पुल का एक हिस्सा गत दिवस भरभराकर नदी में समा गया। रविवार की वजह से काम बंद होने से निर्माणस्थल पर मजदूर नहीं थे इसलिए कोई जनहानि नहीं हुई । इस की लागत 1700 करोड़ से भी ज्यादा है । यह पुल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का महत्वाकांक्षी प्रकल्प बताया जा रहा है। पुल के गिरने के कुछ देर पहले बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव उड़ीसा की रेल दुर्घटना के लिए प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को जिम्मेदार मानकर त्यागपत्र की मांग कर रहे थे। लेकिन अब पूरे देश में भागलपुर की घटना को लेकर नीतीश कुमार पर उंगलियां उठने लगी हैं । इस बारे में रोचक तथ्य ये भी है कि उक्त पुल का एक हिस्सा गत वर्ष भी टूटकर गिरा था। बावजूद उसके निर्माण संबंधी गुणवत्ता नहीं रखी गई जिसका नतीजा सामने है । इस घटना को महज धनहानि मानकर चलना गैर जिम्मेदाराना सोच होगी क्योंकि बरसों से बन रहे इस पुल का निर्माण लंबे समय के लिए टल जाएगा । पुल का हिस्से दो - दो बार गिर जाने की वजह से निर्माण स्थल पर अन्य समस्याएं भी उत्पन्न हो जाएंगी। ठेकेदार बदलने पर नए सिरे से निविदा वगैरह निकालनी पड़ेगी , सो अलग। हालांकि हमारे देश में इस तरह के हादसे गाहे - बगाहे होते ही रहते हैं । गत वर्ष गुजरात में भी मरम्मत के कुछ समय बाद ही पुल टूटकर नदी में समा गया। जिसमें काफी लोग हताहत हो गए थे। उक्त सभी हादसे इस बात की पुष्टि करते हैं कि लापरवाही और भ्रष्टाचार हमारी रगों में खून बनकर बहने लगा है। जब भी कभी हादसे होते हैं तब जो भी सत्ता में बैठा होता है उसे विपक्ष के साथ जनता के गुस्से और आलोचना का शिकार होना पड़ता है। मसलन उड़ीसा में रेल दुर्घटना होते ही पूरा विपक्ष केंद्र सरकार पर हमलावर हो गया। रेलमंत्री अश्विन वैष्णव के त्यागपत्र का दबाव बनाया जाने लगा । लेकिन ज्योंही भागलपुर का निर्माणाधीन पुल धसका त्योंही आलोचना का निशाना घूमकर नीतीश सरकार पर केंद्रित हो गया। रेल दुर्घटना की जांच सीबीआई को सौंपने की बात रेल मंत्री कह चुके हैं और नीतीश ने भी पुल गिरने के मामले की जांच हेतु आदेश दे दिए। इसी के साथ ही लालू ,नीतीश और ममता के रेल मंत्री रहते हुए हुई रेल दुर्घटनाओं तथा उनमें मारे गए लोगों की संख्या के आंकड़े प्रसारित कर ये साबित किया जाने लगा कि वर्तमान केन्द्र सरकार के दौर में उक्त दोनों में कमी आई है । लेकिन विपक्ष द्वारा किए जा रहे हमले और केंद्र सरकार की ओर से हो रहे बचाव के बीच ये प्रश्न उभरकर सामने आता है कि दूसरे की गलती पर तो नैतिकता के नाम पर त्यागपत्र की उम्मीद की जाती है किंतु जब वही बात आपके साथ जुड़ती है तब बलि के बकरे तलाशकर अपनी गर्दन बचाने का काम होता है । उड़ीसा की दुर्घटना में अगर रेल गाड़ियां और पटरियां क्षतिग्रस्त हुई होतीं तब शायद उसे उतनी तवज्जो न मिलती किंतु जिस बड़े पैमाने पर जनहानि हुई वह दुखद है और उसके पीछे जो तकनीकी कमियां और मानवीय लापरवाही का आभास हुआ है वे चिंता का सबब भी हैं किंतु ऐसा ही तो भागलपुर का पुल नदी में गिरने के साथ है। इसके पूर्व भी जब उसका एक निर्माणाधीन हिस्सा गिर गया था उसी समय यदि इन्जीनियरिंग दृष्टि से उसकी ईमानदारी से समीक्षा की गई होती तब शायद कल वाला हादसा न होता। इन सब घटनाओं से ये बात महसूस होती है कि विकास कार्यों में होने वाला भ्रष्टाचार अब राजनीतिक दलों की सीमाओं से ऊपर उठकर समूची प्रशासनिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। तेजस्वी यादव सहित तमाम भाजपा विरोधी नेता रेल दुर्घटना पर श्री वैष्णव का त्यागपत्र मांग रहे हैं। राहुल गांधी ने तो अमेरिका में बैठे हुए ही यह मांग कर डाली। संजय राउत ने स्व.लालबहादुर शास्त्री और स्व.माधवराव सिंधिया के उदाहरण देते हुए रेल मंत्री पर दबाव बनाने का प्रयास किया किंतु अब क्या ये सभी नीतीश कुमार पर पुल गिरने का दोष मढ़ते हुए पद त्यागने का दबाव बनाएंगे ? लेकिन सब जानते हैं कि नैतिकता के पुराने उदाहरण अब फिजूल माने जाते हैं । और इसीलिए दूसरों को नैतिकता और ईमानदारी का उपदेश देने वाले जब अपने सिर पर आती है तो दाएं - बाएं झांकने लगते हैं। दरअसल राजनीति के धंधे में लिप्त तबका केवल क्षणिक उन्माद पैदा करते हुए अपने लाभ के लिए होहल्ला मचाता है। इस सबसे हटकर सोचने वाली बात ये है कि किसी हादसे के बाद दायित्वबोध और नैतिकता के जो प्रवचन दिए जाते हैं यदि दैनिक व्यवहार में राजनेता उन बातों को अमल में लाएं तो इस तरह के हादसों की स्थिति ही न बने। और फिर ऐसे अवसरों पर राजनीति से बाज आना चाहिए क्योंकि इससे बचाव और जांच दोनों प्रभावित होते हैं। उड़ीसा की रेल दुर्घटना और बिहार में पुल का गिर जाना दोनों हमारी व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करती हैं। जब तक छोटी - छोटी बातों में राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार होता रहेगा तब तक ऐसी घटनाओं को रोकना मुश्किल रहेगा। जहां तक बात इस्तीफे की है तो उससे भी कुछ लाभ नहीं होता। और जब जेल जाने के बाद भी मंत्री कुर्सी नहीं छोड़ते तब कुछ कहने को बचता ही कहां है ? होना तो ये चाहिए कि किसी भी दुर्घटना के बाद उसकी पुनरावृत्ति रोकने के बारे में कार्ययोजना बनना चाहिए । एक दूसरे की टांग खींचने की प्रतिस्पर्धा में आगे पाट पीछे सपाट का ये खेल रुकना जरूरी है वरना हादसों का सिलसिला इसी तरह जारी रहेगा ।

- रवीन्द्र वाजपेयी