Thursday, 13 July 2023

तृणमूल की प्रमुख प्रतिद्वंदी बनी भाजपा : कांग्रेस और वामदल पिछड़े




प. बंगाल में संपन्न पंचायत चुनाव में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को भारी बहुमत मिला । लगभग 65 फीसदी सीटें जीतकर उसने  अपनी पकड़ साबित कर दी।   हालांकि उच्च न्यायालय ने  परिणामों को अंतिम रूप दिए जाने के पहले चुनाव आयोग द्वारा हिंसा की घटनाओं संबंधी रिपोर्ट का संज्ञान लेने की बात कही है और ये भी पूछा है कि मतदान के दिन हजारों केंद्रों पर गड़बड़ी की शिकायतों के बाद केवल 600 केंद्रों पर ही दोबारा मतदान क्यों करवाया गया ? लेकिन सभी जानते हैं कि  ऐसे मामलों में जो जीता वही सिकंदर,  वाली बात ही लागू होती है। प. बंगाल को जानने  वालों के लिए ये परिणाम अचंभा नहीं हैं। एक दौर था जब  वाम मोर्चे को ऐसी ही जीत मिला करती थी। उस समय मार्क्सवादी आतंक के साए में चुनाव होते थे । लेकिन ताजा चुनाव परिणामों में कुछ ऐसे संकेत भी छिपे हुए हैं जो भावी राजनीति को दिशा देने वाले हो सकते हैं । अव्वल तो ये कि ममता को चुनौती देने की हैसियत कांग्रेस और वामपंथी खो चुके हैं और उनकी जगह भाजपा ने ले ली है जो विधानसभा चुनाव की  तरह से ही त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में  15  से 20 फीसदी सीटें जीतकर  तृणमूल कांग्रेस का  विकल्प बनने की स्थिति में आ गई है। कांग्रेस तथा वामपंथी मिलकर भी उससे बहुत पीछे हैं। एक बात और  काबिले गौर है कि 2018 की अपेक्षा तृणमूल द्वारा जीती सीटों की संख्या में कुछ कमी आई  वहीं भाजपा के अलावा कांग्रेस - वामपंथी गठबंधन की शक्ति में भी मामूली ही सही किंतु वृद्धि तो हुई है।सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात रही अनेक मुस्लिम इलाकों में क्षेत्रीय मुस्लिम दल को मिली सफलता । इससे तृणमूल की  दिक्कतें बढ़ सकती हैं। वहीं भाजपा के लिए भी चिंता का विषय है कि दार्जिलिंग अंचल में गोरखा संगठन ने बाजी मार ली जहां  की लोकसभा सीट पर भाजपा काफी समय से काबिज है।  खास बात ये भी  है कि 2018 में जहां तृणमूल के तकरीबन 35 फीसदी प्रत्याशी निर्विरोध जीते वहीं इस बार वह संख्या घटकर आधे से भी कम रह गई। संभवतः हिंसा में वृद्धि का एक कारण ये भी है। खुश होने का कारण तो कांग्रेस और वामदलों के पास भी है जिनकी ताकत में हल्की सी बढ़ोतरी हुई है  परंतु मुख्य विपक्षी  बनने की उनकी चाहत फिर अधूरी रह गई । ये साफ हो गया है कि राज्य में  भाजपा के पांव से जमते जा रहे हैं। इस चुनाव को 2024 की रिहर्सल मानना तो जल्दबाजी है क्योंकि पूरा मुकाबला ममता के इर्द - गिर्द ही घूमता रहा। विपक्ष जो भी कहे लेकिन आज की स्थिति में सुश्री बैनर्जी के पास वैसी ही ताकत है जैसी कभी स्व.ज्योति बसु के साथ थी। लेकिन  लोकसभा चुनाव के नतीजे भी ऐसे हों ये जरूरी नहीं क्योंकि तब प्रचार में राष्ट्रीय नेताओं की  मौजूदगी रहेगी। और फिर चुनाव पर्यवेक्षकों  के अलावा सुरक्षा बल भी स्थानीय नहीं  होंगे। इसीलिए 2018 के पंचायत चुनाव के बाद 2019 में लोकसभा के  मुकाबले में भाजपा ने जबरदस्त सफलता हासिल की जबकि उसके तीन विधायक ही थे जो मौजूदा स्थिति में बढ़कर 70 के करीब  हैं ।  इस चुनाव का सीधा - सादा फलितार्थ यही है कि राज्य में अब भाजपा दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है ।हालांकि उसके पास कद्दावर प्रादेशिक नेताओं का अभाव है। उसका अपना कैडर बाहरी नेताओं के आने से काफी उपेक्षित हुआ है। ममता का साथ छोड़कर आए नेताओं में सुवेंदु अधिकारी ने जरूर हिम्मत दिखाई है । नंदीग्राम में उनको हराने के बाद उनका कद  और ऊंचा हुआ और भाजपा ने भी  नेता प्रतिपक्ष बनाकर उनका महत्व बढ़ाया । पंचायत चुनाव में भी उन्होंने  नंदीग्राम में भाजपा का दबदबा बनाए रखा। यद्यपि  उन्हें ममता की टक्कर का नहीं माना जा सकता । फिर भी पार्टी का मानना है लोकसभा चुनाव के समीकरण अलग होंगे क्योंकि ममता यदि  प्रधानमंत्री का चेहरा नहीं बनाई जातीं तब उनके लिए पंचायत जैसे परिणाम दोहराना आसान नहीं होगा और कर्नाटक  की तरह ही मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग ममता से छिटककर कांग्रेस के साथ आ सकता है। विपक्ष की जो बैठक 17-18 जुलाई को बेंगलुरु में होने जा रही है उसमें कांग्रेस और वामदल ,  पंचायत चुनाव के मुद्दे पर  ममता को किस तरह घेरते हैं ,  इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा क्योंकि अब तक के रवैये के अनुसार वे लोकसभा चुनाव में एक भी सीट किसी के लिए छोड़ने राजी नहीं हैं। लेकिन  तृणमूल  यदि कांग्रेस और वामदलों के साथ सीटों का बंटवारा करने सहमत हो गई तब भाजपा के लिए 2019 जैसी सुखद स्थिति बनना कठिन होगा। हालांकि उसके लिए ये भी कम उपलब्धि नहीं है कि उस प.बंगाल में तृणमूल के बाद दूसरी पार्टी बन गई ,  जहां 10 साल पहले उसके लिए सांसद - विधायक तो क्या पार्षद जितवाना भी सपने देखने जैसा था।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 12 July 2023

सुख देने वाली प्रकृति को दुख देना तो क्रूरता है


वर्षा काल में कच्चे मकानों के  धसकने , कीचड़ और बाढ़ जैसी दिक्कतें आती हैं। शहरों में निकासी न होने से जलभराव की समस्या भी आम है। पर्यावरण असंतुलन के कारण हो रहे ऋतु परिवर्तन से राजस्थान जैसे मरुस्थलीय राज्य में भी जलप्लावन की स्थिति बनने लगी है। गुजरात में भी कमोबेश ऐसे ही हालात हैं। उ.प्र , बिहार के अलावा पूर्वोत्तर के असम का भी बाढ़ से जन्मजात नाता है। लेकिन देश के पर्वतीय क्षेत्रों से आ रही खबरें चिंता बढ़ाने वाली हैं। उत्तराखंड और हिमाचल का समूचा पहाड़ी इलाका इन दिनों बाढ़ और भूस्खलन का शिकार है। जगह - जगह सैलानी फंसे हुए हैं । सैकड़ों वाहन रास्ता खुलने का इंतजार कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर सड़कें नष्ट हो चुकी हैं , अनेक महत्वपूर्ण पुल बह गए। इन सबकी मरम्मत में लंबा समय और बड़ी राशि खर्च होगी। गर्मियां शुरू होते ही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में तीर्थ यात्रियों के साथ ही पर्यटकों का सैलाब उमड़ पड़ता है। कश्मीर में अमरनाथ यात्रा वर्षाकाल में आयोजित होती है। इसके कारण समूचे पर्वतीय क्षेत्र में लाखों लोगों की आवाजाही बनी रहती है। हालांकि तीर्थयात्राएं और पर्यटन दोनों न जाने कब से होते आ रहे हैं किंतु सड़कों सहित आवागमन के साधनों के विकास ने पहाड़ों से जुड़ी नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली कहावत को पूरी तरह अप्रासंगिक बना दिया है। कहने का आशय ये कि जिन पर्वतीय क्षेत्रों में तीर्थाटन और पर्यटन हेतु जाना बेहद कठिन और खतरों से भरा माना जाता था वह आजकल बच्चों का खेल बन गया है । तीर्थ यात्रा और पर्यटन को मिलाकर अब धार्मिक पर्यटन नामक नया कारोबार जोर पकड़ चुका है। किसी समाज में तीर्थयात्रा और पर्यटन क्रमशः आध्यात्मिकता और खुशनुमा सोच के प्रतीक होते हैं।  उस लिहाज से इन दोनों क्षेत्रों में यदि लोगों की रुचि बढ़ी तो धार्मिकता के साथ ही उसे अर्थव्यवस्था के लिए भी सुखद कहा जा जाना चाहिए । बीते दो पर्यटन मौसमों में जम्मू कश्मीर सहित हिमाचल में सैलानियों की रिकार्ड संख्या को अर्थव्यवस्था में आई उछाल के तौर पर देखा गया। इस साल तो वह रिकार्ड भी टूट गया। यही हाल उत्तराखंड के चार धामों के है। कुछ साल पहले केदारनाथ में जलप्रलय के बाद व्यवस्थाओं में काफी सुधार किए गए थे ।  आपदा प्रबंधन और आवागमन को सुगम और सुरक्षित  बनाने हेतु भी  प्रयास  हुए । परिणामस्वरूप इन दुर्गम स्थानों की यात्रा बेहद आसान बन गई है। यहां तक कि मनाली होते हुए लेह (लद्दाख ) जाने के लिए लगने वाला तीन दिन का समय घटकर आधे से भी कम रह गया है। लेकिन सुविधाओं के विकास से हिमालय स्थित तीर्थ और पर्यटन स्थलों तक पहुंचने वालों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है । वह पहाड़ों की सेहत के लिए कितनी नुकसानदेह है इसकी चर्चा  ज्यादातर भूगर्भशास्त्रियों , मौसम  विशेषज्ञों , पर्यावरणविदों और चंद बुद्धिजीवियों तक ही सीमित है। भावी पीढ़ियों की चिंता करने वाले कुछ और भी लोग हैं जो इस दिशा में सोचते हैं । उदाहरण के लिए सुंदरलाल बहुगुणा और उन जैसे न  जाने कितनों ने अपना समूचा जीवन पर्वतीय के क्षेत्रों प्राकृतिक संतुलन को बचाए रखने झोंंक दिया । भले ही उनको ढेरों  सम्मान और पुरस्कार दिए गए परंतु उनकी बातों पर अमल न होने का ही नतीजा है कि जोशीमठ शहर सहित उत्तराखंड में फैले सदियों पुराने अनेक मंदिर धसक रहे हैं। पहाड़ों पर बारिश पहले भी होती थी जिसके कारण मैदानी इलाकों में बाढ़ आती रही किंतु अब पहाड़ों में बसे शहर और ग्रामीण क्षेत्र भी इस समस्या से जूझ रहे हैं। इसका कारण इन पर्वतीय क्षेत्रों की प्राकृतिक संरचना से की जा रही अविवेकपूर्ण छेड़छाड़ ही है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के बाद सड़कों को चौड़ा करने पहाड़ों को तोड़ने जैसी कारस्तानी ने समूचे उत्तराखंड और हिमाचल को खतरों में झोंक दिया हैं । बढ़ते यात्री वहां के लोगों के लिए  आर्थिक समृद्धि का कारण तो बन रहे हैं लेकिन इसके लिए हिमालय के सीने को जिस तरह छेदा जा रहा है वह अपराध से भी ज्यादा  पाप है। हालांकि ऐसे विचार को विकास विरोधी कहकर खारिज कर दिया जाता है । इसके अलावा संपन्न देशों के पर्वतीय क्षेत्रों में अधो संरचना के विकास का उदाहरण भी दिया जाता है  किंतु उन देशों के मौसम , भूगर्भीय रचना , कम जनसंख्या और सबसे बड़ी बात नियम कानूनों के प्रति दायित्वबोध के कारण प्राकृतिक संतुलन को तुलनात्मक तौर पर उतना नुकसान नहीं होता। उस दृष्टि से हमारे देश की  स्थिति चिंताजनक है। यही कारण है कि पर्वतीय क्षेत्रों में हुए विकास के बाद लोगों में स्वच्छंदता आ गई जिससे विकास का परिणाम विनाश के तौर पर आया। गत वर्ष अमरनाथ में जो जनसैलाब आया उसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता था। समूचा हिमालय उसी तरह व्यवहार करने लगा है। ये देखते हुए अब ये जरूरी  है कि पहाड़ों को भी सांस लेने का समय दिया जाए। केवल लोगों की संख्या पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि वहां वाहनों की आवाजाही  से उत्पन्न शोर शराबे , हेलीकॉप्टरों से होने वाले कम्पन आदि को भी कम किया जावे। बैटरी चालित वाहनों की अनिवार्यता भी एक कदम हो सकता है। साल दर साल बढ़ती आपदाओं में मानवीय जिंदगियों के  साथ -  साथ जो आर्थिक नुकसान होने लगा है उसके बाद अब पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के स्वरूप में बदलाव करना जरूरी हो गया है। जो प्रकृति हमें सुख दे ,  उसे हम दुख दें तो ये उसके प्रति क्रूरता ही होगी। लगातार आ रहे संकेतों के  बाद भी यदि हम नहीं चेते तो फिर ये मान लेना गलत न होगा कि हम किसी बड़े हादसे को निमंत्रण दे रहे हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 11 July 2023

जनसंख्या के बोझ को बढ़ने से रोकने कदम उठाना जरुरी



आज विश्व जनसंख्या दिवस है। पूरी दुनिया में ये विमर्श चल रहा है कि यदि आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन कम होते - होते खत्म होने की कगार पर पहुंच जायेंगे और तब उनके लिए वैसी ही लड़ाई होगी जैसी एक साल से भी ज्यादा समय से रूस और यूक्रेन के बीच चली आ रही है। इसके पहले से पश्चिम एशिया में जिस तरह की अशांति है उसका कारण भी कच्चे तेल नामक काला सोना ही है। चीन के विस्तारवाद के पीछे भी प्राकृतिक संसाधनों को हथियाना है। पेट्रोल और गैस के अलावा भविष्य में पेय जल की समस्या भी विकराल होने जा रही है।और तब उसके लिए भी संघर्ष होगा। उल्लेखनीय है भारत हाल ही में चीन को पीछे छोड़ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। दूसरी तरफ चीन और जापान सरीखे देश जन्म दर में गिरावट से चिंतित हैं क्योंकि उसके कारण उनके उद्योगों को श्रमिक मिलने की किल्लत होने लगी है। हालांकि परिवार नामक संस्था के टूटने की वजह से भी अनेक विकसित देशों में आबादी का आंकड़ा ठहरा हुआ है। यूरोप के कुछ छोटे देश ऐसे हैं जिनकी आबादी तो लाखों में है किंतु अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों और तकनीकी विकास के कारण वे दुनिया के विकसित और संपन्न राष्ट्रों में शुमार होते हैं।  भारत सदृश विशाल देश तक उनसे आर्थिक सहायता और तकनीकी सलाह लेते हैं। स्वीडन की बोफोर्स तोप इसका उदाहरण है। लेकिन इन देशों में बेहतर जिंदगी के चलते अन्य देशों के नागरिक जिस तेजी से यहां बसते जा रहे हैं उसकी वजह से माहौल बिगड़ने का अंदेशा है विशेष रूप से अरब देशों से शरणार्थी बनकर आए मुस्लिम समस्या बन रहे हैं । दुनिया की बढ़ती आबादी से  जमीन और पानी की कमी ही नहीं हो रही बल्कि वाहनों की बढ़ती संख्या से पर्यावरण के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। समुद्र में चल रहे हजारों जहाज और आकाश में विचरते वायुयानों से जो प्रदूषण होता है उसका दुष्प्रभाव धरती पर रहने वालों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष ये है कि आज जितने संसाधन पृथ्वी पर हैं वे जनसंख्या के अनुपात में रोजाना घट रहे हैं। सुविधाजनक और विलासिता पूर्ण जीवनशैली के प्रति बढ़ते रुझान के कारण प्रकृति के साथ खिलवाड़ हो रहा है। यही कारण है कि प्राकृतिक आपदाओं का आगमन जल्दी - जल्दी होने लगा है। विकास की वासना ने जानलेवा कोरोना के वायरस पूरी दुनिया में फैलाकर मानव जाति को ज्ञात इतिहास की जो सबसे बड़ी महामारी दी उससे ये भी साबित हो गया कि मनुष्य की अनगिनत कथित उपलब्धियां किसी न किसी बिंदु पर आकर शक्तिहीन हो जाती हैं । अमेरिका जैसा विकसित और ताकतवर देश भी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय कुछ न करने की स्थिति में आ जाता है। विश्व भर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की जा रही है किंतु इस संकट को हल करने की दिशा में जितना दिखावा होता है उसका आधा भी काम नहीं होने से स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे की बन चुकी है। विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन के लिए उपदेश देने वाले बड़े राष्ट्र खुद पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाते हैं ये किसी से छिपा नहीं है। चीन ने अपनी आबादी में वृद्धि को तो जोर -  जबरदस्ती से थाम लिया लेकिन कार्बन उत्सर्जन के मामले में वह बेहद लापरवाह है। विश्व की जो संस्थाएं इस बारे में जांच आदि करती हैं उनसे भी चीन किसी प्रकार का सहयोग नहीं करता। भारत की ही बात करें तो हमारी आबादी 143 करोड़ के आसपास आ गई है। आर्थिक विकास के मामले में चीन से हमारा मुकाबला है । लेकिन उसने एक तरफ तो अपनी जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया वहीं दूसरी तरफ विशाल आबादी को निठल्ला बैठे रहने के बजाय उत्पादकता से जोड़ा जिसका नतीजा ये हुआ कि अफीमचियों के देश के तौर पर कुख्यात चीन ने अमेरिका को टक्कर दे डाली। साम्यवादी सत्ता के बाद भी उसने उदारीकरण की पश्चिमी अवधारणा को अपने अनुरूप बनाया उसी का परिणाम रहा कि दुनिया की लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन में अपनी उत्पादन इकाईयां लगाई। दूसरी तरफ भारत में साठ और सत्तर के दशक तक परिवार नियोजन का जो अभियान जोर - शोर से चलाया जाता था वह उपेक्षा का शिकार होकर रह गया। चुनावी राजनीति ने जिस मुफ्त संस्कृति का विकास किया उसकी वजह से आज भारत में करोड़ों लोग बिना हाथ - पैर चलाए सरकारी सहायता के बल पर अपना पेट भर रहे हैं। विरोधाभासी चित्र ये है कि  बेरोजगारी के आंकड़े तो सर्वकालीन उच्च स्तर पर हैं लेकिन खेती , उद्योग और छोटे कारोबारी तक  कामगारों की कमी से त्रस्त हैं। चीन ने जिस आबादी को संसाधन बनाया वही हमारे देश में बोझ बनकर रह गई। इसके लिए निश्चित रूप से हमारे देश की राजनीति उत्तरदायी है जिसने  कामचोरी को बढ़ावा  दिया। किसी को हजार -  दो हजार बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय यदि उससे रोजाना घंटे - दो घंटे भी काम करवाया जाए तो उसे श्रम का महत्व समझ आएगा । इसी तरह महिलाओं के खातों में  पांच सौ - हजार जमा करने से उनका सशक्तीकरण हो जायेगा , ये सोचना मूर्खों के  स्वर्ग में रहने जैसा है। ये सच है कि चीन में चुनाव महज दिखावा है इसलिए वहां रेवड़ियां नहीं बांटी जाती और काम करने में सक्षम प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादकता से जोड़ा गया है। इसके विपरीत हमारे देश में तो चुनाव कभी न खत्म होने वाला महोत्सव है जिसके दौरान जो मांगोगे वहीं मिलेगा वाली दरियादिली दिखाई जाती है। और तो और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने  में भी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसी बातें आड़े आने लगती हैं। ये देखते हुए समय आ गया है देश को अपनी विदेश , रक्षा , वित्तीय और शिक्षा नीति की तरह ही जनसंख्या नीति भी बनानी  चाहिए। दुनिया का उत्पादन केंद्र बनने की उम्मीद और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की  महत्वाकांक्षा में जनसंख्या का बोझ बड़ी बाधा बन सकती है। जनसंख्या दिवस के  अवसर पर इस दिशा में त्वरित निर्णय करने पर विचार होना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 10 July 2023

वरना कांग्रेस और वामपंथी बंगाल में दोबारा पैर नहीं जमा सकेंगे



प.बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान बीते एक माह के भीतर 35 लोगों के मारे जाने का जो आंकड़ा आया वह सरकारी है। माना जा रहा है चुनावी हिंसा में और भी ज्यादा लोगों ने जान गंवाई। अकेले मतदान के ही दिन 15 लोग मौत का शिकार हुए। हालांकि इस राज्य के लिए ये नई बात नहीं है। लगभग हर चुनाव में वहां लोगों की बलि चढ़ती रही है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच खूनी झड़प के अलावा असामाजिक तत्व भी चुनाव के बहाने अपने प्रतिद्वंदी को कमजोर करने के लिए खून - खराबा करने से बाज नहीं आते। जब बंगाल में मार्क्सवादी सरकार थी तब इस तरह की हिंसा के विरुद्ध कांग्रेस में रहते वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी बहादुरी के साथ संघर्ष किया करती थीं। अनेक बार तो उन पर व्यक्तिगत हमले हुए जिसमें उन्हें चोट भी आई। लेकिन जब केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार ने वामपंथी अत्याचार के विरुद्ध उनके संघर्ष को महत्व नहीं दिया तब उन्होंने तृणमूल कांग्रेस नामक पार्टी बनाकर अलग रास्ता पकड़ लिया और जी - तोड़ मेहनत करते हुए अंततः वामपंथियों के  मजबूत दुर्ग को जमींदोज कर ये स्थिति पैदा कर दी कि  वर्तमान विधानसभा में एक भी साम्यवादी सदस्य नहीं है।  इस प्रकार ममता ने वह पराक्रम कर दिखाया जो इंदिरा गांधी और अतलबिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गजों तक से न हो सका । इसमें दो राय नहीं हैं कि लगातार तीन विधानसभा चुनाव भारी बहुमत से जीतकर उन्होंने प.बंगाल में अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। और इसी के दम पर उनमें प्रधानमंत्री बनने की  महत्वाकांक्षा  उत्पन्न हुई । सादगी भरे रहन - सहन के लिए उनकी प्रशंसा हर कोई करता है। केंद्र में मंत्री रहने के दौरान भी वे साधारण जीवन शैली का परिचय देती रहीं। ऐसे में उनसे उम्मीद की जाती थी कि मुख्यमंत्री बन जाने के बाद वे प.बंगाल में वामपंथी सत्ता के दौर में बने भय के वातावरण से लोगों को मुक्ति दिलाएंगी किंतु कुर्सी पर विराजमान होने के बाद उन्होंने भी वही तौर - तरीके अपनाना शुरू कर दिया जिनसे ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुख्यमंत्री काल में जनता त्रस्त हो चुकी थी। राजनीतिक आतंकवाद का जो वीभत्स रूप वामपंथी सरकार के समय दिखाई देता था वही तृणमूल के नाम से पूरे राज्य में नजर आता है क्योंकि मार्क्सवादी पार्टी के साथ मिलकर गुंडागर्दी करने वाला तबका धीरे - धीरे तृणमूल में घुस आया। ऐसा नहीं है कि ममता इससे अनजान थीं किंतु  अपने  राजनीतिक लाभ  की वजह से वे चुप रहीं।  पंचायत चुनाव को लेकर शुरू से  हिंसा होने की आशंका थी । ऐसे में जब उच्च न्यायालय ने  केंद्रीय बल तैनात किए जाने का निर्देश दिया तब उसको रोकने के लिए जिस तरह राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय तक गई उससे  स्पष्ट हो गया कि हिंसा को रोकने में उसकी रुचि नहीं थी । इसीलिए ये कहा  जा रहा है कि मतदान के दिन हुई हिंसा में कहीं न कहीं उसकी भूमिका भी रही। केंद्रीय बल के उच्च अधिकारियों की ये शिकायत काबिले गौर है कि राज्य निर्वाचन आयोग और प्रशासन ने संवेदनशील मतदान केंद्रों की जानकारी उनको नहीं दी। सैकड़ों आपत्तियों के बाद ही लगभग 600 मतदान केंद्रों पर दोबारा मतदान कराया जा रहा है। इन चुनावों में कौन जीतेगा ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि ऐसे चुनाव का लाभ ही क्या जो राज्य सरकार के संरक्षित आतंक के साए में हुआ। लोकसभा चुनाव में चूंकि केंद्रीय चुनाव आयोग की भूमिका होती है और अन्य राज्यों के अधिकारी और पुलिस बल तैनात रहते हैं , इसलिए राज्य सरकार प्रशासन का दुरुपयोग नहीं कर पाती और गुंडागर्दी भी नियंत्रण में रहती है किंतु विधानसभा , स्थानीय निकाय और पंचायत  चुनाव में तो राज्य सरकार ही सर्वेसर्वा होती है। ऐसे में यदि हिंसा और हत्या तथा बूथ लूटने की घटनाएं हुईं  तब उसे जिम्मेदार ठहराना गलत न होगा। राज्यपाल इस बारे में अपनी जो रिपोर्ट केंद्र को सौंप रहे हैं उसका ये कहकर ममता विरोध करेंगी कि वे भाजपा द्वारा नियुक्त किए गए हैं ।   ऐसे में इस चुनाव को लेकर कांग्रेस का क्या रुख है ये देखने वाली बात होगी क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर तो वह भाजपा विरोधी विपक्ष का गठबंधन बनाने प्रयासरत है वहीं प.बंगाल में वामपंथी दलों के साथ मिलकर ममता के विरुद्ध मैदान में है।   बहरहाल , पंचायत चुनाव में जो कुछ हुआ उसके बाद ये कहना गलत न होगा कि ममता भी अपनी पूर्ववर्ती मार्क्सवादी सरकार के तरह ही निरंकुश हैं और विरोध को किसी भी कीमत पर कुचलने में संकोच नहीं करती। ऐसे में कांग्रेस और वामपंथी मिलकर  इन चुनावों में हुई धांधली , हिंसा और हत्याओं को मुद्दा बनाकर विरोध में आगे नहीं आते तब फिर उन्हें इस राज्य में अपने पैर दोबारा जमाने की उम्मीद छोड़ देना चाहिए ।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 8 July 2023

हिंसा , हत्या और प.बंगाल समानार्थी हो चले चुनाव आयोग का असहाय बना रहना चिंता का विषय




कल प.बंगाल में पंचायत चुनाव हेतु मतदान के दौरान हुई हिंसा में 15 लोगों की मृत्यु हो गई। मतदान केंद्र के निकट बम धमाके , गोलियां दागने और ईवीएम लेकर भागने के चित्र भी प्रसारित हुए। यद्यपि ये पहला अवसर नहीं है जब इस राज्य में ऐसा हुआ हो। मतदान के पहले  से ही राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच खूनी संघर्ष की खबरें आने लगी थीं। बीते 30 दिनों में लगभग 40 लोग मारे गए। 
हालात इस कदर बिगड़ गए कि उच्च न्यायालय ने केंद्रीय बलों की तैनाती का आदेश दे दिया जिसके विरुद्ध ममता बैनर्जी की सरकार सर्वोच्च न्यायालय जा पहुंची किंतु  वहां भी उसे निराशा हाथ लगी । 
इस राज्य में चुनावी हिंसा और राजनीतिक हत्याओं का दौर तबसे शुरू हुआ जब वामपंथी मोर्चे की  सरकार सत्ता में आई। जिसके बाद लगभग चार दशक तक  प.बंगाल में साम्यवादी विचारधारा का नंगा नाच देखने मिलता रहा। विरोधियों से वैचारिक असहमति का अंजाम उसे रास्ते से हटा दिए जाने के तौर पर देखने मिलने लगा। उस दौर में कांग्रेस ही मुख्य वाममोर्चे की प्रतिद्वंदी होती थी किंतु उसी पार्टी की केंद्रीय सत्ता ने अपने स्वार्थवश ज्योति बसु के अत्याचार के विरुद्ध मौन साधे रखा । 
उसी से नाराज होकर ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को मार्क्सवादियों की बी टीम बताते हुए तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की । उनको इस बात की पीड़ा रही कि वामपंथियों की खूनी राजनीति के विरुद्ध लड़ते हुए वे भी हिंसा का शिकार हुईं किंतु कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उनको समुचित संरक्षण और समर्थन नहीं दिया। 
जब बंगाल की शेरनी की छवि के साथ ममता ने ज्योति बाबू के उत्तराधिकारी  बुद्धदेव भट्टाचार्य की सत्ता को उखाड़ फेंका तब वह परिवर्तन  1977 में जनता पार्टी के हाथों इंदिरा गांधी की तानाशाही के पराभव से कम नहीं था। इसीलिए आम जनता को आशा थी कि तृणमूल कांग्रेस की सरकार प.बंगाल के गौरवशाली अतीत को पुनर्स्थापित करने में सफल रहेंगी किंतु जल्द ही देखने मिलने लगा  कि जितने भी असामाजिक तत्व वामपंथी दलों के दमनचक्र में सहयोगी थे ,  वे सब तृणमूल में घुस आए और सत्ता बदलने के बाद भी यह राज्य व्यवस्था परिवर्तन से वंचित रहा। 

ममता बैनर्जी की वामपंथियों से घृणा तो समझ में आती है क्योंकि  साम्यवादी सरकार ने उन्हें मानसिक और शारीरिक दोनों ही दृष्टियों से प्रताड़ित करने में कसर नहीं छोड़ी थी । लेकिन समूचे विपक्ष को हिंसा के बल पर आतंकित करने की उसी नीति को अपनाने से  उनकी अपनी छवि को तो बट्टा लगा ही ,  इस राज्य को भी अराजक स्थिति में ला खड़ा किया। पिछले विधानसभा चुनाव में भी ऐसी ही स्थितियां देखने मिलीं। 
लेकिन सबसे बड़ी चिंता का  विषय ये है कि प.बंगाल में राजनीतिक हत्याएं रोजमर्रे की बात हो चली हैं। अपराधिक तत्व तृणमूल के झंडे तले पूरे समाज में भय का वातावरण बनाए रखते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति बहुत ही खराब है। गत दिवस पंचायत चुनाव के दौरान मारे गए लोगों में चूंकि कोई बड़ा नेता नहीं था लिहाजा दिल्ली तक हलचल नहीं मची। मरने वाले या तो पार्टियों के कार्यकर्ता रहे या चुनाव में गड़बड़ी करने किराए पर लाए गए अपराधी । ऐसे में मृतकों के परिवारजनों को किसी प्रकार के  मुआवजे की उम्मीद तो की नहीं जा सकती किंतु ये सवाल तो उठता ही रहेगा कि आखिर इस राज्य में  चुनावी हिंसा और राजनीतिक हत्याओं का ये चलन कब तक जारी रहेगा ? 
इस बारे में रोचक बात ये भी है कि ममता     वैसे तो कांग्रेस से इस बात को लेकर बेहद नाराज हैं कि उसने उस वामपंथी मोर्चे से गठबंधन कर लिया है जिससे उनकी जन्मजात दुश्मनी है। लेकिन उसी कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा के विरुद्ध गठबंधन बनाने विपक्षी बैठक में भी शिरकत करती हैं। गौरतलब है पंचायत चुनाव में केंद्रीय बलों की तैनाती हेतु कांग्रेस ने भी अदालत के दरवाजे खटखटाए थे और उसके कार्यकर्ता   हिंसा के शिकार भी हुए।
जहां तक वाम मोर्चे का सवाल है तो प.बंगाल को साम्यवाद का अभेद्य गढ़ बनाने की कोशिश में उसने विरोधियों को मौत के घाट उतारने की  जिस माओवादी शैली को प्रोत्साहित किया और आज वही उनके लिए भी जानलेवा बन गई। 

 अब इस बात का डर  है कि प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा में डूबी ममता आगामी लोकसभा चुनाव के पहले से ही राज्य में विपक्ष का दमन शुरू कर दें तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि विधानसभा चुनाव में भारी - भरकम जीत के बावजूद भी पिछले लोकसभा चुनाव में वे भाजपा के बढ़ते कदमों को नहीं रोक सकीं। उसी के बाद भाजपा गत विधानसभा चुनाव में 3 से बढ़कर 73 पर जा पहुंची। 
पंचायत चुनाव में एक बार फिर सुश्री बैनर्जी ने साबित कर दिखाया कि वामपंथी मोर्चे और उनकी सरकार में सिर्फ नाम का अंतर है । वह नागनाथ थी  तो ये सांपनाथ । प.बंगाल की जनता हर चुनाव में बढ़ - चढ़कर मतदान करती है । वहां राजनीतिक जागरूकता भी है किंतु उसे बदले में वही मिलता है जिसका नजारा गत दिवस देखने मिला। 
सोचने वाली बात ये है कि चुनाव आयोग ऐसे मामलों में असहाय होकर रह जाता है। और ये भी कि चुनावी हिंसा में मारे जाने वाले  साधारण लोग होते हैं । जिन राजनीतिक  पार्टियों के इशारे या बहकावे पर वे अपनी जान पर खेल जाते हैं वे भी उनके परिवारजनों के लिए कुछ करती हैं ,  ये भी शोध का विषय है क्योंकि मूर्तियां और स्मारक नेताओं के ही बनते हैं  , कार्यकर्ता तो बेगारी करने बना है।

आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी 

क्षेत्रीय पार्टियां अपनी विश्वसनीयता खोती जा रहीं


महाराष्ट्र में हुई राजनीतिक उठापटक के बाद ये सवाल उठने लगा है कि क्या एक  परिवार द्वारा नियंत्रित होने वाली क्षेत्रीय पार्टियों का भविष्य अंधकारमय है। जिस तरह से एनसीपी में टूटन हुई उसके पीछे सीधा - सीधा कारण यही समझ में आया कि शरद पवार ने अपने  उत्तराधिकार का निर्णय करते समय राजनीतिक दृष्टि से विचार करने के बजाय अपनी संतान को ज्यादा महत्व दिया । बीते अनेक दशकों से ये माना जाता रहा था कि उनके भतीजे अजीत पवार ही इस पार्टी का भविष्य होंगे किंतु जब इस बारे में अंतिम फैसला करने का समय आया तो श्री पवार ने बेटी सुप्रिया सुले को बागडोर सौंप दी। इसके बाद वही हुआ जो होना था। अजीत ने कई महीनों से चली आ रही अटकलों को सही साबित करते हुए बगावत कर दी और भाजपा के संरक्षण में चल रही महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए। उनके साथ प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल जैसे श्री पवार के अति विश्वस्त भी बगावत में शामिल हो गए । इसका कारण भी यही माना जा रहा है कि उन दोनों को सुप्रिया के मातहत काम करने में अपनी तौहीन लग रही थी। श्री पटेल को तो एनसीपी का दूसरा कार्यकारी अध्यक्ष तक बना दिया गया था। हालांकि पार्टी पर किसका कब्जा रहेगा इसे लेकर  फिलहाल कानूनी पेंच फंसा हुआ है किंतु एक बात तो तय है पवार परिवार में आई इस दरार की वजह से एनसीपी की ताकत अब पहले जैसी नहीं रहेगी। ऐसा ही कुछ शिवसेना के साथ भी हुआ। स्व.बाल ठाकरे ने शुरुआत में शिवसेना में अपने भतीजे राज ठाकरे को आगे बढ़ाया जो बेहद तेज तर्रार युवा नेता के रूप में महाराष्ट्र की राजनीति में स्थापित होने लगे थे। जबकि उनके  पुत्र  उद्धव उन दिनों अपने फोटोग्राफी के शौक में डूबे हुए थे। लेकिन कालांतर में जब पार्टी की विरासत सौंपने का समय आया तब उन्होंने भी सक्रिय भतीजे के स्थान पर निष्क्रिय बेटे पर भरोसा किया जिसकी वजह से वे मनसे ( महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) नामक नई पार्टी बनाकर अलग जा बैठे। उसके बाद की कहानी सब जानते हैं। जो भाजपा कभी शिवसेना के पीछे चला करती थी वह उससे बड़ी ताकत बन गई। ये उदाहरण अन्य राज्यों में भी दोहराया जाता रहा। उ.प्र में स्व.मुलायम सिंह यादव के पुत्र प्रेम के कारण सपा में विभाजन हुआ और अनेक पुराने समाजवादी यहां - वहां बिखर गए। बिहार में लालू यादव का कुनबा प्रेम भी जगजाहिर है। झारखंड में शिबू सोरेन की विरासत बेटे हेमंत के पास है तो हरियाणा में देवीलाल परिवार भी आखिर बिखरकर रह गया। जम्मू कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के वर्चस्व के कारण पार्टी के अनेक वरिष्ट नेता उसे छोड़ गए। तेलुगु देशम भी इसी का शिकार हो गई। बसपा सुप्रीमो मायावती भी भतीजे प्रेम के कारण नुकसान उठा रही हैं ।अकाली दल में हुई टूटन भी स्व.प्रकाश सिंह बादल के पुत्र मोह के कारण देखने मिली । महाराष्ट्र के ताजा घटनाक्रम ने क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर तो प्रश्नचिन्ह लगाया ही ये बात भी सामने आने लगी है कि राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती रुचि अंततः उनके कमजोर होने के रूप में सामने आती है क्योंकि  किसी राष्ट्रीय दल के साथ जुड़ने की वजह से उनकी अपनी वैचारिक पहिचान नष्ट होने लगती है। और धीरे - धीरे वे अपने ही प्रभावक्षेत्र में कमजोर होते जाते हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जितने भी क्षेत्रीय दल भाजपा विरोधी गठबंधन में शामिल होने सक्रिय हैं वे सब कांग्रेस के इर्द - गिर्द घूम रहे हैं। अतीत में जो छोटे - छोटे दल मिलकर तीसरे मोर्चे की शक्ल में सौदेबाजी करने में सफल रहे वे भी आज कांग्रेस अथवा भाजपा की परिक्रमा कर रहे हैं। यद्यपि आज भी ममता बैनर्जी और स्टालिन जैसे क्षेत्रीय छत्रप हैं किंतु उनके पार्टी में भी परिवार का कब्जा बनाए रखने की कोशिश अंतर्कलह का कारण बन रही है। स्टालिन के भाई और बहिनें भी सत्ता में बंटवारे के लिए दबाव बनाया करते हैं तो ममता द्वारा भतीजे को महत्व दिए जाने से पुराने साथी छिटक रहे हैं। तेलंगाना में  के.सी.राव की बेटी उत्तराधिकारी बनती दिख रही हैं। हालांकि इन सबने कांग्रेस से ही ये सीखा है  कि पार्टी को परिवार की निजी जागीर बनाकर रखा जाए। उ.प्र में चौधरी चरणसिंह की पार्टी बेटे के बाद पोता चला रहा है। इस सबसे ये  निष्कर्ष निकाला जा सकता है क्षेत्रीय पार्टियां अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही हैं। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों यदि थोड़ा सा धैर्य रखें तो छोटे दलों पर उनकी निर्भरता कम हो सकती है। कर्नाटक में जीत के बाद कांग्रेस का आत्मविश्वास जिस तरह बढ़ा उसे कायम रखना उसके लिए हितकारी रहेगा। इसी तरह भाजपा को भी  छोटी पार्टियों को साथ लाने की बजाय अपने कैडर को मजबूत करना चाहिए। छोटे दलों द्वारा  अनुचित दबाव और सौदेबाजी की नीति देश के लिए कितनी नुकसानदेह हो रही है ये सर्वविदित है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 7 July 2023

ऐसा कुकृत्य मनुष्य तो क्या पशु के साथ भी नहीं होना चाहिए



 म.प्र के सीधी जिले में एक सवर्ण युवक द्वारा अनु. जनजाति के  एक व्यक्ति पर पेशाब करने का वीडियो सामने आने से राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप का चिर  - परिचित दौर चल पड़ा है। इस प्रकरण की गूंज दिल्ली सहित और राज्यों में भी सुनाई दे रही है। एक आदिवासी के साथ घिनौनी हरकत करने वाला व्यक्ति भाजपा विधायक से जुड़ा बताया जाने से बवाल कुछ ज्यादा ही है। वैसे  विधायक  इसका खंडन कर रहे हैं। हालांकि विधानसभा चुनाव नजदीक होने से भाजपा ने  रक्षात्मक होना बेहतर समझा। आरोपी पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम लगाते हुए उसके घर पर बुलडोजर चलवाने की कार्रवाई भी अविलंब की गई। कांग्रेस के लिए तो ये बिन मांगी मुराद थी इसलिए उसने भाजपा पर आदिवासी विरोधी होने की तोहमत लगा दी। राहुल गांधी से मायावती तक ने ट्विटर पर प्रदेश सरकार और भाजपा  पर दनादन मिसाइलें दाग दीं।  निश्चित रूप से उक्त घटना बेहद अमानवीय थी। आदिवासी या दलित इंसान तो क्या पशु के ऊपर भी पेशाब करने जैसा कृत्य या तो मानसिक तौर पर विक्षिप्त व्यक्ति ही कर सकता है या जिसकी राक्षसी प्रवृत्ति हो। राजनीति के अपने तौर - तरीके होते हैं और उस दृष्टि से कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों के नेताओं की बयानबाजी से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। यदि भाजपा सत्ता में न होती तब वह भी ऐसा ही करती। लेकिन इस घटना के सामने आते ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस तत्परता से पीड़ित आदिवासी को भोपाल  बुलवाकर मुख्यमंत्री निवास में उसके चरण धोकर उससे क्षमा मांगी वह आग को भड़कने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका था। भले ही इसे नाटकबाजी कहा जाए किंतु उन्होंने सही समय पर सही कदम उठाया। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने भी जांच समिति गठित कर अच्छी पहल की। देर सवेर जनजाति आयोग वगैरह भी इस मामले की जांच करने आ सकते हैं। कुछ एनजीओ तो ऐसे अवसर की तलाश ही करते रहते हैं। हो सकता है इस मुद्दे को विधानसभा चुनाव तक जिंदा रखने की कोशिश भी होती रहे। बहरहाल , जो हुआ उसकी जितनी निंदा की जाए कम है।  आरोपी को भी कड़े से कड़ा दंड  मिलना चहिए। लेकिन ऐसे मामलों में  राजनीति से ऊपर उठकर जब तक विचार नहीं होता तब तक इनकी पुनरावृत्ति होती रहेगी। अनु. जाति या जनजाति के किसी व्यक्ति के साथ होने वाला अत्याचार उच्च जाति वाले करें या उनके अपने कुनबे का कोई व्यक्ति , दोनों का अपराध एक जैसा होगा क्योंकि यहां सवाल जाति का नहीं इंसानियत का है। हमारे ही समाज में विक्षिप्त मानसिकता के कुछ लोग कभी - कभार पशुओं के साथ दुराचार जैसा कुकृत्य कर डालते हैं।उसके लिए भी दंड का प्रावधान है। इसी तरह यदि किसी सवर्ण के ऊपर कोई व्यक्ति चाहे उसकी जाति कोई भी हो ,  पेशाब करने जैसी गंदी हरकत करे तो उसकी  निंदा और सजा भी उतनी ही कड़ी होनी चाहिए । स्मरणीय है मनुष्य को ईश्वर ने बनाया है जबकि जाति नामक व्यवस्था मनुष्य द्वारा बनाई गई है। आजादी की लड़ाई के दौरान ही महात्मा गांधी ने इस बात को भांप लिया था कि जातियों में बिखरा समाज एकता के सूत्र में बंधकर नहीं रह सकेगा । ब्रिटिश सत्ता कायम होने के पहले भी समाज में वर्ण व्यवस्था थी जिसे धीरे - धीरे जातिगत पहिचान दी गई। अछूतोद्धार का अनुष्ठान उसी पहिचान को नष्ट करने हेतु प्रारंभ किया गया था। लेकिन स्वाधीन भारत में इसे चुनाव जीतने के नुस्खे में बदल दिया गया और धीरे - धीरे हालात यहां तक आ पहुंचे कि दलितों में भी अति दलित और पिछड़ों में  अति पिछड़े सामने आने लगे। सबसे अधिक चिंता का विषय ये है कि आरक्षण की खींचतान ने दलितों और पिछड़ों के बीच भी वैमनस्यता का भाव उत्पन्न कर दिया । ये समस्या अब लाइलाज बीमारी की तरह सामने आ चुकी है जिसके चलते किसी नेता की पहिचान उसके व्यक्तित्व की बजाय उसकी जाति से होने लगी है। हमारे देश में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि जात न पूछो साधु की , किंतु इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि संसद और विधानसभा में चुनकर आए अनेक साधु - सन्यासी भी अपनी जाति को लेकर बेहद मुखर रहते हैं। महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करने वालों में म.प्र की पूर्व मुख्यमंत्री उमाश्री भारती भी रही हैं जिनकी जाति के बारे में ज्यादातर लोग तभी जान सके जब वे खुलकर राजनीति में आईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपनी पिछड़ी जाति का खुलासा करना पड़ा । वहीं राहुल गांधी अपने ब्राह्मण होने का ऐलान करते घूमने लगे। लालू यादव और मुलायम सिंह यादव के बेटों ने विवाह तो अंतर्जातीय किए किंतु वोटों की खातिर वे पिछड़ी जाति का मुखौटा उतारने तैयार नहीं हैं। ऐसे और भी उदाहरण हैं । यही वजह है कि आजादी के अमृत महोत्सव तक पहुँचने के बाद भी जाति हमारी राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बनी हुई है। म.प्र की उक्त घटना केवल किसी पार्टी अथवा नेता के लिए ही नहीं अपितु पूरे समाज के लिए चिंता और चिंतन का विषय है । 21वीं सदी में भी जाति को किसी मनुष्य की सामाजिक हैसियत का मापदंड माना जाना चौंकाता है। जिन राजनेताओं से ये उम्मीद थी कि वे इस बुराई को समाप्त करेंगे वे ही इसे बढ़ावा देने के लिए दोषी हैं किंतु दुर्भाग्य ये है कि उनके लिए कोई सजा नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी