Monday, 7 August 2023

ज्ञानवापी के इमाम ने ये सच्चाई पहले क्यों नहीं जाहिर की




वाराणसी में काशी विश्वनाथ परिसर से सटी ज्ञानवापी इमारत मस्जिद है या मंदिर ,  इसका  खुलासा तो एएसआई द्वारा किए जा रहे सर्वे से ही हो सकेगा । लेकिन जो प्रारंभिक जानकारी आ रही है यदि वह प्रामाणिक है तब ज्ञानवापी के हिन्दू मंदिर होने की बात साबित हो जाएगी । कहा जा रहा कि  हिंदू मंदिरों में अंकित किए जाने वाले प्रतीक चिन्ह सर्वे के दौरान जगह - जगह नजर आए ।  अच्छी बात ये है कि प्रारंभिक आनाकानी के बाद मुस्लिम पक्ष भी सर्वे टीम के साथ परिसर में उपस्थित है। तहखानों आदि के ताले भी खोल दिए गए क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सर्वे पर रोक लगाने से इंकार किए जाने के बाद  और कोई विकल्प रह नहीं गया था।  अपुष्ट सूत्रों के अनुसार अब तक हुए सर्वे में मूर्तियों के टुकड़े , त्रिशूल , कमल ,  पान के पत्ते की आकृतियां और गुंबद में हिन्दू वास्तु शैली के प्रमाण दिखे हैं। अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से जिस प्रकार की फोटोग्राफी हो रही है वह हकीकत  को सामने लाने में सक्षम है। और इसी को मुस्लिम पक्ष रोकना चाहता था । लेकिन उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय  के आदेश के बाद उसको  सहयोग करने मजबूर होना पड़ा।  एक बात और भी स्पष्ट है कि सर्वे के विरोध में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का समर्थन न मिलने से  मुस्लिम संगठनों का हौसला पस्त हुआ।  हालांकि ज्ञानवापी के विरोध का सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा था। ये बात भी सही है  कि अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद हिंदुओं में इस बात का आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ कि  समुचित जांच हो तो ज्ञानवापी के भीतर मंदिर के प्रमाण मिल सकते हैं। इस बारे में ज्ञानवापी के इमाम का ताजा बयान काबिले गौर है कि सर्वे के दौरान मिले  सनातनी प्रमाण  इस बात को इंगित करते हैं कि औरंगजेब ने हिंदुओं के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए वैसा किया था । उन्होंने ये सफाई भी दी कि औरंगजेब ने  मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई होगी ये बात नामुमकिन है। साथ ही  ये दावा भी किया कि उसने तो मंदिर बनवाने हेतु दान दिए जिसके प्रमाण वाराणसी में बने अनेक पुराने मंदिरों में उपलब्ध है। हालांकि इमाम ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया कि मुसलमान ज्ञानवापी हिंदुओं को सौंप दें। लेकिन उनके बयान में इस बात की स्वीकारोक्ति तो है ही कि उसके भीतर सनातनी प्रमाण हैं। लेकिन ये  सब इमाम की जानकारी में था तब ये बात उसी समय सार्वजनिक करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई गई जब हिंदुओं की तरफ से दावे किए जा रहे थे कि ज्ञानवापी में मंदिर के प्रमाण हैं। इमाम से पहले किसी मुस्लिम धर्मगुरु से ये सुनने नहीं मिला कि  ज्ञानवापी में साझा संस्कृति के तहत  हिन्दू मंदिरों जैसे प्रतीक चिन्ह भी  निर्माण के समय बनाए गए थे। उल्लेखनीय है  औरंगजेब कट्टर मुसलमान था जिसने हिंदुओं पर जजिया कर लगाने के अलावा अपने भाइयों  को मरवाकर पिता को कैद कर लिया ।  भले ही वामपंथी और ब्रिटिश इतिहासकार उसके बारे में अच्छी - अच्छी बातें लिखते रहे लेकिन  ये प्रचारित करना पूरी तरह असत्य और भ्रम उत्पन्न करने वाला है कि उसने ज्ञानवापी में सनातनी परंपरा को भी समाहित किया।  सांकेतिक प्रतीकों  के अलावा गुंबदों में हिन्दू मंदिरों जैसी निर्माण शैली के साथ ही यदि  मूर्तियों के अवशेष मिल रहे हैं तब बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता  है। वैसे भी जब इस्लाम  मूर्ति पूजा से परहेज करता है तब औरंगजेब जैसे  कट्टर मुस्लिम  ने  ज्ञानवापी में मूर्ति रखने की स्वीकृति दी होगी ये सोचना पागलपन ही है। इमाम की बातों से यह संकेत  भी मिल रहा है कि मुस्लिम पक्ष अब रक्षात्मक होने लगा है । उसे ये बात अच्छी समझ में आ रही है कि यदि सर्वे में  मंदिर होने की  पुष्टि हो गई तब  न्यायालय के साथ ही गैर भाजपाई राजनीतिक दलों का रुख भी उसी के पक्ष में हो सकता है।  ऐसे में मुस्लिम समाज के धर्मगुरुओं को समझदारी से काम लेना चाहिए। ज्ञानवापी के इमाम ने घुमा - फिराकर ही सही जिस हकीकत को स्वीकार किया है उसे सीधे - सपाट शब्दों में स्वीकार किया जाए तो इससे पूरे समुदाय का  भला होगा । हिंदुओं के लिए भी बेहतर रहेगा कि वे फिलहाल ज्यादा उतावलापन न दिखाएं क्योंकि एएसआई सर्वे की रिपोर्ट अंततः अदालत के समक्ष रखी  जायेगी और वही मंदिर या मस्जिद का फैसला करेगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Sunday, 6 August 2023

बागेश्वर महाराज की आरती उतारकर कमलनाथ ने कांग्रेसियों को असमंजस में डाल दियापार्टी के अनेक नेता बाबा के विरोधी हैं


 प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने गत दिवस यहां बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की जिस तरह अगवानी करते हुए आरती उतारी उसकी राजनीतिक जगत में काफी चर्चा है। वैसे भी  श्री नाथ काफी समय समय से अपने को भाजपा से भी बड़ा हिंदुत्ववादी साबित करने में जुटे हुए हैं। इसी सिलसिले में वे बागेश्वर धाम की यात्रा भी कर आए थे। भोपाल स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में हनुमान जी का कट आउट लगाने के साथ ही पंडितों और पुजारियों को बुलाकर उनका सम्मान करने जैसे कदमों के अलावा इन दिनों वे साधु - संतों के बारे में बोलने में सावधानी बरत रहे हैं। ये बात सर्वविदित है  कि कमलनाथ आगामी विधानसभा चुनाव किसी भी कीमत पर जीतना चाहते हैं । इसके लिए वे हिन्दू मतदाताओं को रिझाने के लिए भी हर कोशिश करने  तैयार हैं। ये जानते हुए भी कि बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण हिन्दू राष्ट्र की खुलेआम वकालत करते हैं , उनकी आरती उतारकर कमलनाथ ने  कांग्रेस के उन नेताओं के सामने असमंजस की स्थिति उत्पन्न कर दी जो बागेश्वर महाराज के नाम से  प्रसिद्ध श्री शास्त्री द्वारा हिन्दू राष्ट्र का मुद्दा उठाए जाने पर उनकी आलोचना करते आए हैं। वैसे भी ज्यादातर साधु - सन्यासी अयोध्या आंदोलन के बाद से भाजपा के करीबी माने जाते हैं। इसीलिए   छत्तीसगढ़  की कांग्रेस सरकार के एक मंत्री ने बागेश्वर महाराज  को ललकारते हुए हुए कहा कि  बस्तर में हुए धर्मांतरण के अपने  आरोप को साबित कर दें तो वे राजनीति छोड़ देंगे अन्यथा महाराज पंडिताई छोड़ें । ऐसी ही टकराहट श्री शास्त्री की अन्य राज्यों में भी कांग्रेस नेताओं से होती आई है। हाल ही में विवाहित हिन्दू महिला के मांग भरने संबंधी उनके बयान पर भी कांग्रेस की अनेक महिला नेत्रियों ने उनका जमकर।विरोध किया था। लेकिन श्री नाथ ने गत दिवस बागेश्वर महाराज की जिस तरह मिजाजपुर्सी की उसकी वजह से श्री शास्त्री के आलोचक रहे कांग्रेस आश्चर्यचकित हैं । दरअसल अब तक वे भाजपा पर तो राजनीति में धर्म को घसीटने  का आरोप लगाते रहे किंतु अब कमलनाथ भी उसी के नक्शे कदम पर चल रहे हैं तब उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि वे आगे से श्री शास्त्री के बारे में आलोचनात्मक बातें कैसे बोलेंगे ? स्मरणीय है कुछ माह पूर्व जब उत्तराखंड के जोशीमठ में धरती में दरारें आईं तब छत्तीसगढ़ के  मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने श्री शास्त्री पर कटाक्ष किया था कि वे उसे भरने का चमत्कार दिखाएं। ये भी गौर गलब है कि बागेश्वर महाराज जहां भी जाते हैं , हिन्दू राष्ट्र का का संकल्प दोहराते हुए उपस्थित लोगों से उसके समर्थन के अपील करते हैं। जाहिर है छिंदवाड़ा में भी वे ऐसा ही करेंगे और तब श्री नाथ उस पर क्या कहेंगे ये सवाल उठने लगा है। एक बात और जो इस बारे में चर्चित है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के जरूरत से ज्यादा हिन्दू प्रेम ने पार्टी के परंपरागत मुस्लिम मतदाताओं को चौकन्ना कर दिया है। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी तो पहले से ही मुस्लिम समुदाय कोअपने साथ लाने प्रयासरत हैं। दरअसल छिंदवाड़ा में बागेश्वर महाराज की आरती उतारना कमलनाथ की  मजबूरी थी क्योंकि 2019 की मोदी लहर में वे  विधानसभा और उनके बेटे नकुल नाथ लोकसभा का चुनाव बहुत कम अंतर से जीते थे। लोगों का मानना है कि नरेंद्र मोदी की सभा यदि छिंदवाड़ा में हो जाती तब बाप - बेटा दोनों  हार जाते। शायद उसी भय से श्री नाथ ने बागेश्वर महाराज की आरती उतारने का फैसला लिया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 5 August 2023

सर्वोच्च न्यायालय ने राहत के साथ नसीहत भी दी है




सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मानहानि मामले में गत दिवस दिए फैसले को लेकर राजनीतिक हलचल होना स्वाभाविक है। गुजरात की अदालत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दो वर्ष की जो सजा सुनाई उसके कारण उनकी संसद सदस्यता समाप्त कर  सरकारी आवास  खाली करवा लिया गया , जो सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन गांधी परिवार के साथ ऐसा कुछ होना अनोखा माना जाता है ,  इसलिए सवाल उठाया गया कि सदस्यता और आवास संबंधी फैसले इतनी शीघ्रता से क्यों लिए गए ? उच्च न्यायालय में भी जब श्री गांधी को सजा के विरुद्ध स्थगन न मिला तब वे सर्वोच्च न्यायालय गए जिसने गत दिवस उसको स्थगित करते हुए ये सवाल उठाया कि  दो वर्ष की सजा ही क्यों दी गई ? यदि वह  एक वर्ष 11 माह होती तब जेल जाने पर भी वे सांसद बने रहकर  आगामी चुनाव  लड़ सकते थे। सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी भी की कि  2 वर्ष की सजा देने से एक तरफ तो श्री गांधी सांसद रहने से वंचित हुए वहीं उनके निर्वाचन क्षेत्र वायनाड के मतदाता भी जन प्रतिनिधि विहीन हो गए। ये तो हुईं बौद्धिक बातें किंतु श्री गांधी की सजा स्थगित किए जाने को उनकी जीत बताने वाले इस बात को नजरंदाज कर रहे हैं कि जिस भाषण पर उन्हें सजा हुई उसे भी सर्वोच्च न्यायालय ने सही नहीं माना और नसीहत दी कि  सार्वजनिक रूप से भाषण देते समय अपनी जुबान पर नियंत्रण रखना चाहिए। वैसे भी सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश ही दिया है जिसमें   श्री गांधी की अपील पर अंतिम निर्णय होने तक सजा स्थगित तो की गई किंतु रद्द नहीं हुई। इसका मतलब साफ है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अभी उनको निर्दोष नहीं माना  अपितु अस्थायी  राहत दी है जिससे उनकी  सदस्यता बहाल होने के साथ ही  शासकीय आवास भी उन्हें वापस मिल जावेगा।  बहरहाल श्री गांधी और कांग्रेस ही नहीं बल्कि विपक्षी गठबंधन के लिए ये आदेश संजीवनी की तरह है क्योंकि संसद सत्र के दौरान इसके आने से  उनका हौसला बुलंद हुआ है। यदि अध्यक्ष ने तत्काल सदस्यता बहाल कर दी तब हो सकता है श्री गांधी अविश्वास प्रस्ताव पर होने वाली बहस में शरीक हो सकें। लेकिन इस निर्णय को अभूतपूर्व कहना अतिशयोक्ति होगी क्योंकि उनके पहले ऐसे ही मामले में एक लोकसभा सदस्य को 10 वर्ष की  सजा होने पर उसकी सदस्यता खत्म कर दी गई और चुनाव आयोग ने उपचुनाव की तैयारी भी कर ली किंतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सजा स्थगित कर देने  के बाद उक्त सांसद की सदस्यता बहाल हो गई। लेकिन राहुल चूंकि कांग्रेस के बड़े नेता हैं और अघोषित तौर पर प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी , इसलिए  उनकी सजा पर मिले स्थगन को पार्टी बड़ी जीत के तौर पर प्रचारित कर रही  है  । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी सजा की अवधि को भले ज्यादा माना हो किंतु जिस कारण से वह दी गई उसे पूरी तरह गलत नहीं बताया ।और उनको बोलते समय मर्यादा का ध्यान रखने की समझाइश भी दे डाली  । अन्यथा न्यायालय चाहता तो  उन्हें निर्दोष घोषित कर देता। इस प्रकार अभी भी ये प्रकरण पूरी तरह खुला हुआ है क्योंकि  केवल सजा पर स्थगन हुआ है जिसके कारण श्री गांधी सांसद बने रहेंगे और यदि जल्द फैसला न हुआ तब लोकसभा चुनाव भी लड़ सकेंगे । लेकिन यदि सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी मानकर उनकी सजा कम कर दी तब उनको जेल जाना पड़ सकता है। जहां रहकर वे चुनाव भले लड़ लें लेकिन मैदानी राजनीति नहीं कर सकेंगे। हालांकि राहुल और कांग्रेस के लिए सर्वोच्च न्यायालय का आदेश निःसंदेह राहत लेकर आया किंतु बात यहीं पर समाप्त नहीं होती क्योंकि  सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी तो कर ही दी कि संदर्भित भाषण में उनका लहजा अच्छा नहीं था। सवाल ये है कि क्या न्यायालय के  इस कथन को हमारे नेता गंभीरता से लेंगे कि सार्वजनिक जीवन में बोलने से पूर्व सावधानी की अपेक्षा की जाती है। इस दायरे में केवल श्री गांधी ही नहीं वरन सभी राजनीतिक दलों के वे  नेता आते हैं जिन्हें विवादित टिप्पणियां करने का शौक है और  दूसरों का अपमान कर वे खुश होते हैं। ऐसे नेताओं पर उनकी पार्टियां जब नियंत्रण नहीं लगातीं तब ये लगता है कि उन्हें ऐसा बोलने हेतु अधिकृत किया गया है। इस बारे में वामपंथियों की छवि कुछ बेहतर है जो  मुद्दों तक सीमित रहते हुए व्यक्तिगत कटाक्षों से परहेज करते हैं। भाजपा वैसे तो अपने अनुशासन के लिए प्रसिद्ध है किंतु उसके भी कुछ नेताओं के बयान शालीनता के विरुद्ध होते हैं। क्षेत्रीय दलों में तो विवादित बयानबाजी करने वाले ढेरों हैं। स्मरणीय है कुछ समय पहले तक श्री गांधी अपने भाषणों में स्वातंत्र्य वीर सावरकर के बारे में अनर्गल बोला करते थे जिस पर महाराष्ट्र में कांग्रेस की सहयोगी शिवसेना (उद्धव गुट) को भी आपत्ति होती थी। बाद में शरद  पवार के दबाव में आकर उन्होंने सावरकर जी के बारे में बोलने से परहेज किया किंतु जो बोल गए उस पर खेद न जताकर अपनी हठधर्मिता भी दिखाई। अभी श्री गांधी पर मानहानि के और भी मुकदमे लंबित हैं । ऐसे ही प्रकरण अन्य राजनीतिक नेताओं पर भी हैं। आजकल तो संसद के भीतर भी शब्दों की मर्यादा तार - तार करने का चलन है। इसके कारण राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा घट रही है किंतु ऐसा लगता है शालीनता की जगह उद्दंडता ने ले ली है। ये प्रवृत्ति किसी भी दृष्टि से अच्छी नहीं कही जा सकती। लोकतंत्र सभ्य समाज में ही फलता - फूलता है। उस दृष्टि से मौजूदा माहौल चिंता पैदा करने वाला है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 4 August 2023

ज्ञानवापी : होगा तो वही जो अदालत तय करेगी लेकिन .....



यदि सर्वोच्च न्यायालय ने रोक न लगाई तो अलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार एएसआई ( भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ) वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद का वैज्ञानिक सर्वे करेगा। उच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष द्वारा खुदाई से  ढांचे को होने वाले नुकसान की आशंका जताए जाने पर एएसआई को निर्देश दिया कि सर्वे के अत्याधुनिक तरीके अपनाए जाएं जिससे इमारत को किसी तरह की क्षति न पहुंचे। एएसआई ने भी अदालत को आश्वस्त किया है कि आजकल बिना फर्श खोदे या दीवारों की ऊपरी परत को खुरचे भी भीतरी जानकारी हासिल करना संभव है। उल्लेखनीय है अयोध्या में खुदाई इसलिए हुई थी क्योंकि विवादित स्थल पर कोई इमारत नहीं थी। उस दृष्टि से अलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रीतिंकर दिवाकर का निर्णय सच्चाई को जानने की  दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। उन्होंने कहा भी कि न्याय हित में यह जरूरी है।  सर्वोच्च न्यायालय भी संभवतः इस पर रोक नहीं लगाएगा क्योंकि उच्च न्यायालय ने ढांचे को नुकसान पहुंचाए बिना सर्वे के लिए कहा है। हालांकि अब तक जो भी तथ्य सामने आए हैं वे इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर का ही एक हिस्सा है जिस पर मुगल काल में जबरन कब्जा कर मस्जिद खड़ी कर दी गई। कुछ समय पहले जब वजू खाने में शिवलिंग होने की बात सामने आई तब भी दीवारों और स्तंभों पर हिंदू धार्मिक प्रतीकों की बात उजागर हुई थी। देश - विदेश के अनेक पुरातत्व विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने भी इस बात को माना है कि ज्ञानवापी ,  विश्वनाथ मंदिर के हिस्से में ही बनाई गई और ऐतिहासिक शिवलिंग भी इसके नीचे दबा हो सकता है। एक नंदी प्रतिमा भी है जो मस्जिद की तरफ मुंह करते हुए खड़ी है जिसके आधार पर हिंदू पक्ष का दावा है कि भीतर शिव लिंग है। बहरहाल चूंकि न्यायालय के आदेशानुसार सर्वे होगा और उसमें मस्जिद के ढांचे को क्षति न पहुंचे इसकी सावधानी रखी जाएगी तब एतराज करने की बजाय मुस्लिम पक्ष को  सहयोग करना चाहिए । ज्ञानवापी के अलावा मथुरा की शाही मस्जिद का मामला भी  ऐसा ही है। ये दोनों हिंदुओं की  आस्था के  बड़े केंद्र हैं। इनको लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बना रहे तो ये भावी पीढ़ियों के लिए भी तकलीफदेह होगा। होना तो ये चाहिए था कि स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद एक निश्चित समयावधि में ऐसे सभी मामलों को सुलझा लिया होता जिससे कि व्यर्थ के तनाव न पैदा होते। उस समय देश की बागडोर जिनके हाथों थी ,  उनकी बात को कोई नहीं टालता । लेकिन उन्होंने इसकी जरूरत नहीं समझी और दूसरी बातों में उलझे रहे। दरअसल अल्पसंख्यकों को खुश करने के फेर में तमाम ऐसे फैसले टाले जाते रहे जो देश के दूरगामी हितों के लिए आवश्यक थे। संदर्भित धर्मस्थलों के बारे में भी ऐसा ही हुआ। उल्लेखनीय है जिस अयोध्या विवाद के लिए भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद को कसूरवार ठहराया जाता है वह तो स्व .पं.जवाहरलाल नेहरू और स्व. पं. गोविंद वल्लभ पंत के रहते ही शुरू हो चुका था किंतु उसे साधारण मुकदमा मानकर अदालती दायरे में छोड़ दिया गया।   दशकों बाद जब  ये मुद्दा राजनीतिक बना तब जाकर लोगों की नींद खुली। यदि शुरू में ही मुस्लिम पक्ष को ये समझाइश सभी बड़े नेता देते कि वे इतिहास में हुई ज्यादतियों को स्वीकार कर भविष्य में शांति और सद्भाव का  वातावरण बनाने में सहयोग दें तो अब तक बहुत कुछ ठीक हो गया होता । लेकिन दुर्भाग्य ये रहा कि दूसरों पर राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाने वाले राजनीतिक नेता खुद वोटों के लालच में  फंस गए। किसी भी सुव्यवस्थित देश में अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा एक मानवीय जरूरत है।  भारत का संविधान इसकी गारंटी देता है। लेकिन क्या कारण था जो हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान की प्रस्तावना में धर्म निरपेक्ष (सेकुलर) शब्द नहीं जोड़ा और 1976 में जब पूरा विपक्ष जेल में था तब स्व. इंदिरा गांधी ने संविधान संशोधन करते हुए सेकुलर शब्द को प्रस्तावना का हिस्सा बनाया। इसका आशय ये लगाया जा  सकता है कि स्वाधीनता संग्राम में शामिल रहे  तमाम तत्कालीन नेताओं को सेकुलर होने का ढिंढोरा पीटने की जरूरत महसूस नहीं हुई । लेकिन इंदिरा जी का दौर आते - आते वैसा करना जरूरी हो गया और फिर ज्यादातर पार्टियों ने धर्म निरपेक्षता का लबादा ओढ़ लिया। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस को ही इसका सबसे ज्यादा नुकसान हुआ और मुस्लिम मतों पर उसका एकाधिकार धीरे - धीरे घटता चला गया । जिससे उ.प्र, बिहार और प. बंगाल जैसे राज्यों में उसकी दयनीय स्थिति  हो गई जहां मुस्लिम आबादी 20 से 30 फीसदी तक है। कहने का आशय ये है कि मुस्लिम तुष्टीकरण भी अब चुनाव जीतने का  औजार नहीं रह गया । ये कहना भी गलत न होगा कि  भाजपा को सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाने में इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों का ही योगदान है जो मुसलमानों के खैरख्वाह बने रहने का दिखावा करने के साथ ही हनुमान गढ़ी से प्रचार शुरू करते हैं और मंदिर मठों में जाकर मत्था टेकते हैं। मुसलमानों को चाहिए वे इस दोहरे रवैए से खुद को दूर करें। ज्ञानवापी का प्रकरण चूंकि अदालत की निगरानी में है इसलिए उसका फैसला तो अब वहीं से होना ठीक रहेगा किंतु मुस्लिम पक्ष को इस बारे में जय - पराजय के भाव से ऊपर उठकर आगे आना चहिए। आज के हालात में मुसलमान नेतृत्व विहीन हो गए हैं । केवल भाजपा को हराने के उद्देश्य से कभी इसके तो कभी उसके पीछे घूमते रहने से अपना महत्व खो बैठे हैं। यदि मुस्लिम कौम अपनी तरक्की चाहती है तो उसे शिक्षा जैसे क्षेत्र में आगे बढ़ने पर ध्यान देना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उनका राजनीतिक दोहन तो खूब हुआ किंतु सामाजिक और आर्थिक स्तर पर वह पिछड़ गई । ज्ञानवापी एक अवसर है उस पिछड़ेपन को दूर करने की दिशा में कदम उठाने का । वरना वही होगा जो अब तक उनके साथ होता आया है अर्थात वे वोट बैंक बने रहकर भी बदहाली में जीने मजबूर रहेंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 3 August 2023

मेवात में बढ़ते अपराधों का परिणाम है नूंह का दंगा



देश की राजधानी दिल्ली से कुछ घंटे की दूरी पर स्थित नूंह जिला हरियाणा के मेवात इलाके में स्थित है , जहां तीन चौथाई आबादी मेव मुसलमानों की है। कहा जाता है कि उनके पूर्वज राजपूत थे जिन्होंने मुस्लिम शासनकाल में  इस्लाम अपना लिया। इसीलिए लंबे समय तक वे हिंदू रीति - रिवाजों से जुड़े रहे। लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। हाल ही में वहां सांप्रदायिक दंगा होने के बाद  मेवात क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो गया । एक हिंदू संगठन द्वारा निकाली गई धार्मिक यात्रा पर पत्थर फेंके जाने के बाद उत्पन्न तनाव ने दंगे  का रूप ले लिया। और फिर वही सब हुआ जो ऐसे अवसरों पर होता है। मसलन गोलियां चलीं , घर , दुकानें और वाहन जलाए गए। लेकिन इस सबके बीच ये चौंकाने वाली बात हुई कि दंगाइयों की भीड़ अनेक थानों के सामने से निकलती हुई सायबर थाना पहुंची और उसे आग लगा दी । इसकी वजह ये बताई जा रही है कि उक्त थाने में इस इलाके के विभिन्न अपराधिक प्रकरणों के दस्तावेजी प्रमाण संरक्षित थे। इसलिए दंगे के बहाने उन प्रमाणों को नष्ट किए जाने का सुनियोजित प्रयास हुआ। इसमें दो मत नहीं है कि नूंह की घटना में प्रशासन और पुलिस की लापरवाही ने आग में घी का काम किया । वरना  छतों से पथराव होते ही पुलिस बल हरकत में आ जाता तब बात आगे न बढ़ती । कई घंटों तक दंगाई उत्पात मचाते रहे जिससे ये साबित हो गया कि पुलिस और प्रशासन दोनों अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे। लेकिन घूम - फिरकर बात वहीं  आ जाती है कि किसी को भी किसी और के धार्मिक आयोजन में व्यवधान डालने या उस पर हमला करने का अधिकार कौन देता है ? जिन लोगों की पत्थर फेंकते हुए तस्वीरें सार्वजनिक हुईं वे किस समुदाय के थे ये बताने की आवश्यकता नहीं रही क्योंकि कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने का जो चलन शुरू हुआ वह इस समुदाय विशेष की राष्ट्रव्यापी पहिचान बन गया। दिल्ली में हुए दंगों के दौरान भी ये देखने मिला था। उसके बाद से हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों पर पत्थर फेंके जाने जैसी घटनाएं देश के विभिन्न हिस्सों में होने लगीं। धर्म निरपेक्ष तबका ऐसे समय पर हिंदू संगठनों को तो कठघरे में खड़ा करता है किंतु क्या कभी किसी ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के पास जाकर ये समझाइश देने का साहस किया कि वे  छतों से पत्थर फेंकने जैसी हरकत बंद करवाने आगे आएं। वैसे अनेक मुस्लिम संगठन हैं जो ऐसे अवसरों पर संवेदनशील रवैया अपनाते हुए सर्वधर्म समभाव का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसी तरह ईद के दिन ईदगाहों के बाहर बधाई देने वालों में भी हिंदुओं की संख्या रहती है किंतु इसके पीछे राजनीतिक दिखावा ज्यादा होने से जिस गंगा -जमुनी संस्कृति की बात कही जाती है वह केवल भाषणों तक ही सीमित है। हरियाणा में मुस्लिम आबादी मुख्य रूप से मेवात अंचल तक ही है। लेकिन जिस तरह से नूंह में हुए दंगे की आग पड़ोसी राजस्थान और राष्ट्रीय राजधानी से सटे गुरुग्राम ,  फरीदाबाद, पलवल तक फैली उससे ये संदेह पैदा हो गया है कि उक्त धार्मिक यात्रा पर पथराव करना किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा था। ऐसे मौकों पर होने वाली राजनीति भी समाधान की बजाय समस्याओं को और बढ़ाती है । और ये भी कि सूचनातंत्र के फैलाव के कारण एक जगह की घटना पूरे देश में चर्चित हो जाती है। नूंह के साथ भी यही हुआ। संसद का सत्र चलने के कारण भी राजनीतिक सरगर्मी और तेज हो गई। लेकिन जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार मेवात अपराधों के लिए कुख्यात हो चला है। यहां गो तस्करी और गोकशी बढ़ती जा रही है जबकि एक समय ऐसा भी था जब मेव  गाय को पवित्र मानते थे। इसके अलावा यहां सट्टे का कारोबार भी जोरों पर है। सायबर अपराधों के मामले  में तो नूंह काफी  आगे है और इसीलिए ये माना जा रहा है कि दंगे की आड़  में सायबर थाना फूंकने जैसा काम किया गया। कुल मिलाकर ये देखने में आया है कि लगभग 80 फीसदी मुस्लिम आबादी वाला यह इलाका कानून - व्यवस्था के लिए बड़ी समस्या बनता जा रहा है। वहां हुई घटना इस बात का प्रमाण है कि घनी मुस्लिम आबादी वाले इलाके अपराधियों की शरणस्थली बनते जा रहे हैं। लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो देश की राजधानी के इतने करीब इस तरह की घटना होना गंभीर स्थिति का संकेत  है। शाहीन बाग वाली ताकतें केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहीं अपितु पूरे देश में उनका विस्तार हो चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस ये तो कह दिया कि  धार्मिक रैलियों में दिए जाने वाले भाषणों की वीडियो रिकॉर्डिंग करवाई जाए किंतु जो भाषण चहारदीवारी के भीतर होते हैं उनकी रिकॉर्डिंग संभव नहीं है। ऐसे में जरूरी हो गया है कि दंगाइयों की पहिचान कर उन्हें इतनी कड़ी सजा मिले जिससे भविष्य में ऐसा करने से लोग बचें। आगामी वर्ष देश में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं । हरियाणा के पड़ोसी राजस्थान में तो कुछ माह बाद विधानसभा चुनाव भी हैं। वहां भी सांप्रदायिक माहौल खराब  करने के प्रयास होते रहे हैं। केंद्र और राज्य दोनों की सरकार के लिए ये समय बेहद चुनौती भरा है क्योंकि दंगे देश की प्रगति और छवि दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 2 August 2023

लोकतंत्र का तकाजा : वैचारिक विभिन्नता व्यक्तिगत शत्रुता में न बदले




गत दिवस पुणे  में लोकमान्य तिलक की पुण्य तिथि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार तिलक  स्मारक मंदिर ट्रस्ट द्वारा  दिया जाता है। प्रधानमंत्री इस पुरस्कार से सम्मानित होने वाले 41वें व्यक्ति हैं। इससे पहले यह  डॉ. शंकर दयाल शर्मा ,  प्रणब मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी, इंदिरा गांधी , मनमोहन सिंह, मशहूर व्यवसायी एन आर नारायणमूर्ति तथा ‘मेट्रो मैन' ई श्रीधरन को भी प्रदान किया जा चुका है। उक्त न्यास का संचालन लोकमान्य तिलक के परिवार द्वारा किया जाता है। इसको लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। हालांकि विवाद तो श्री मोदी को पुरस्कृत करने पर भी नहीं था।  लेकिन हाल ही में एनसीपी नेता शरद पवार  के भतीजे अजीत  अनेक विधायकों सहित भाजपा से हाथ मिलाकर महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री बन बैठे। ऐसे में जब ये बात सामने आई कि श्री पवार उक्त आयोजन के मुख्य अतिथि होंगे तब उनकी अपनी पार्टी के अलावा कांग्रेस और शिवसेना ने भी मांग की कि उनको प्रधानमंत्री के साथ एक ही मंच पर नहीं बैठना चाहिए। श्री पवार ने इस बारे में अंत तक चुप्पी साधे रखी किंतु आखिर में वे  शामिल हुए ।   विपक्षी नेताओं ने  समारोह में नहीं जाने का अनुरोध करने हेतु उनसे मिलना चाहा किंतु उन्हें समय नहीं दिया गया ।  श्री पवार के धड़े वाली एनसीपी भी गत दिवस पुणे में प्रधानमंत्री के विरोध में हुए प्रदर्शन में शरीक रही। लेकिन इस सबको नजरंदाज करते हुए उन्होंने  उक्त समारोह का मुख्य आतिथ्य स्वीकार किया । इन दिनों  संसद के भीतर मोदी सरकार और विपक्ष में तनातनी  से सदन चल नहीं पा रहा।  इसी परिप्रेक्ष्य में भाजपा विरोधी अनेक नेताओं का मानना रहा कि श्री पवार द्वारा प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा किए जाने से विपक्षी एकता के प्रयासों को धक्का पहुंचेगा । दरअसल महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी नामक गठबंधन में कांग्रेस , शिवसेना और एनसीपी प्रमुख घटक हैं। शिवसेना में विभाजन के बाद अघाड़ी पहले ही कमजोर हो गई थी। एनसीपी के टूटने के बाद तो उसकी ताकत और भी कम हो गई। ऐसे में शिवसेना और कांग्रेस को ये डर सता रहा है  कि कहीं श्री पवार भी  भाजपा के करीब न चले जाएं। हालांकि वे मोदी सरकार की नीतियों की  आलोचना करते रहते हैं किंतु उसके बाद भी विपक्षी गठबंधन के साथियों के दबाव को नकारते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को सम्मानित किए जाने वाले आयोजन में  शामिल होकर प्रमाणित कर दिया कि वे कितने सुलझे हुए राजनेता हैं। वैसे भी श्री पवार देश के उन बचे -  खुचे नेताओं में से हैं जिनके निजी संबंध लगभग प्रत्येक पार्टी और उसके नेताओं से है। उनके जन्मदिन पर आयोजित समारोह में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के साथ ही स्व.चंद्रशेखर भी एक साथ शामिल हुए थे। अनेक अवसरों पर श्री मोदी के साथ भी  उन्होंने मंच साझा किया। ऐसे में गत दिवस का कार्यक्रम कोई अनोखा नहीं था। लेकिन  जिस तरह उसमें जाने से श्री पवार को रोका गया वह राजनीति में घटती सौजन्यता का प्रमाण है। इंडिया नामक  गठबंधन में ऐसे अनेक दल हैं जो एक दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाते। आम आदमी पार्टी और  तृणमूल कांग्रेस पार्टी का कांग्रेस से छत्तीस का आंकड़ा है किंतु फिर भी वे एक दूसरे के साथ बैठ रहे हैं। किसी नेता के यहां विवाह या शोक के अवसर पर भी  वैचारिक विरोधी नेतागण निःसंकोच पहुंचते हैं। एक दूसरे की निजी परेशानियों में भी संवेदनशीलता दिखाई जाती है। तिलक सम्मान  समारोह तो वैसे भी  एक महापुरुष की स्मृति में आयोजित होता है। ऐसे में श्री पवार को उसमें जाने  से महज इस कारण से रोकना  कि उसमें श्री मोदी  को पुरस्कृत किया जाना था , छोटी सोच है। स्मरणीय है मोदी सरकार द्वारा  स्व. मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण से अलंकृत किए जाने के बाद उनके पुत्र अखिलेश यादव ने राष्ट्रपति भवन में उक्त सम्मान ग्रहण किया। जबकि वे भाजपा के घोर विरोधी हैं। ऐसा ही तब हुआ था जब स्व. पी.वी.नरसिम्हा राव की सरकार ने भी स्व. अटल जी को पद्म विभूषण प्रदान किया था।  प्रजातंत्र की खूबसूरती भी यही है कि वैचारिक विभिन्नता व्यक्तिगत शत्रुता में न बदले। उस दृष्टि से श्री पवार द्वारा  अच्छा उदाहरण पेश किया गया।  देखने में आता है कि किसी नेता की मृत्यु होने के बाद घोर विरोधी रहे नेता भी उसकी तारीफों के पुल बांधते हैं । ऐसे में जीवित अवस्था में घृणा और द्वेष रखना अटपटा लगता है। विपक्ष का प्रधानमंत्री से विरोध स्वाभाविक है। लेकिन  किसी गैर राजनीतिक आयोजन में उनके साथ मंच  साझा नहीं करने की बात नासमझी है।  देश में जबसे कांग्रेस का एकाधिकार खत्म हुआ तभी से राजनीतिक छुआछूत भी मिटती चली गई। लेकिन अब भी कुछ दलों के भीतर ये भावना विद्यमान है।  जिन लोगों ने श्री पवार को कल के आयोजन में जाने से रोका वे उसी मानसिकता से ग्रसित हैं । ऐसे में श्री पवार की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने अपने साथियों की मांग के विरुद्ध जाकर  खुद को लोकमान्य के अपमान के आरोप से बचा लिया। ऐसा ही तब भी हुआ था जब कांग्रेस के न चाहते हुए भी पूर्व राष्ट्रपति स्व.प्रणब मुखर्जी नागपुर में रास्वसंघ के विजयादशमी उत्सव में शामिल हुए थे। जबकि उनकी बेटी तक उनके विरोध में थी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 



Tuesday, 1 August 2023

संसद को बाधित कर अपना नुकसान कर रहा विपक्ष




संसद में काम नहीं हो रहा। हंगामे के कारण कार्रवाई लगातार स्थगित हो रही है। विपक्ष मणिपुर पर चर्चा चाहता है किंतु चर्चा किस नियम के अंतर्गत हो इस पर विवाद  है।  विपक्ष का आरोप है कि सरकार चर्चा से भाग रही है , वहीं सत्ता पक्ष का कहना  है कि उसकी रुचि चर्चा में नहीं अपितु हंगामा  करने के बहाने खोजना है। जैसा कि होता आया है दोनों पक्ष अपनी - अपनी बात पर अड़े हुए हैं । परिणाम स्वरूप प्रश्नकाल पूरा होते ही शोर -  शराबा शुरू  होने पर अध्यक्ष कार्रवाई स्थगित करने बाध्य हो जाते हैं। हालांकि ये कोई नई बात नहीं है। पिछले सत्रों में भी ऐसा होता आया है। यहां तक कि बजट जैसा महत्वपूर्ण सत्र भी ढंग से नहीं चला। राज्यों की विधानसभाओं में भी ऐसे  दृश्य आम हो चले हैं। हर सत्र के पहले सदन के पीठासीन अधिकारी सर्वदलीय बैठक आमंत्रित करते हैं। उसमें पूरे सत्र की कार्यसूची पर विमर्श होता है और सरकार के साथ ही विपक्षी दल भी सदन सुचारू रूप से चलाने पर सहमति दिखाते हैं । लेकिन  सत्र शुरू होते ही विवाद प्रारंभ हो जाता है। विपक्ष किसी न किसी मुद्दे पर सरकार को घेरना चाहता है वहीं  सरकार उसके हमले से  बचाव में लग जाती है। इस दौरान दोनों को इस बात की फिक्र नहीं रहती कि करोड़ों रुपए खर्च कर आयोजित किए जाने वाले सत्र का बहुमूल्य समय नष्ट हो रहा है। इस स्थिति के लिए दोनों ही पक्ष बराबर के दोषी हैं क्योंकि संसद में आज का सत्तापक्ष जब विरोध में हुआ करता था तब उसने भी अनेक सत्र हंगामे की बलि चढ़वाए थे। स्व. अरुण जेटली ने कहा भी था कि सदन को न चलने देना भी विरोध का तरीका है। जहां तक बात सत्ता पक्ष की है तो उसके लिए तो यही अच्छा है कि सदन में बहस  हो ही नहीं और वह हंगामे के दौरान ही  विधेयक वगैरह पारित करवाने के बाद मौका मिलते ही सत्रावसान की घोषणा करवा दे । लेकिन इससे विपक्ष को बहुत नुकसान होता है। वह जब किसी चीज की जिद लेकर बैठ जाता है तो सदन की कार्यवाही ठप्प हो जाती है जो सरकार के लिए तो  राहत भरा होता है। लेकिन सदन के जरिए जनता तक अपने विचार पहुंचाने का  अवसर  वह गंवा बैठता है। और यही गलती संसद के मौजूदा सत्र में भी उसके द्वारा दोहराई गई। मणिपुर पर चर्चा से सरकार ने इंकार तो किया नहीं परंतु प्रधानमंत्री के बयान पर अड़े रहने से चर्चा झमेले में फंसकर रह गई। रही बात किस नियम के अंतर्गत चर्चा हो , तो निश्चित तौर पर ये तय करना बहुमत प्राप्त सत्ता पक्ष के ही अधिकार में होता है । कांग्रेस जब सत्ता में रही तब उसने भी विपक्ष की हर मांग मान ली हो ऐसा नहीं था।  आज जब वह विपक्ष में है और वह भी बेहद दयनीय हालत में , तब उसके लिए सरकार को झुका पाना संभव नहीं रहा । और ऐसी स्थिति में उसके लिए फायदेमंद रहता यदि वह  सरकार की पसंद के नियमानुसार चर्चा पर पूरे विपक्ष को राजी कर लेती । ऐसे में वह सरकार को घेरकर अपनी बात रख सकती थी किंतु बीच में उसने ये कहते हुए अविश्वास प्रस्ताव  पेश कर दिया कि इसी बहाने वह प्रधानमंत्री को सदन में बोलने के लिए बाध्य कर सकेगी। अभी तक तो उसका ये दांव भी कारगर नहीं रहा क्योंकि मणिपुर को लेकर विपक्ष जो कहता आया है और सदन में भी कहेगा , वह सब सर्वोच्च न्यायालय में कहा और सुना जा रहा है। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में भी वही सब बातें उठेंगी जो सर्वोच्च न्यायालय में सरकार और याचिकाकर्ता द्वारा कही जा रही हैं । संसद में भी सत्ता पक्ष ये कहते हुए अनेक बातों को खुलासा करने से बचेगा कि मामला न्यायालय के विचाराधीन है। ये सब देखते हुए कहना गलत न होगा कि विपक्ष जोश में होश खोकर अपना नुकसान कर बैठा। उसे ये समझना चाहिए कि सरकार के पास लोकसभा में अच्छा - खासा बहुमत होने से उसे अविश्वास प्रस्ताव को लेकर कोई चिंता नहीं है। और कांग्रेस के सहयोगी तक इस बात से नाराज हो उठे कि प्रस्ताव पर उनसे सहमति नहीं ली गई । दिल्ली अध्यादेश पर भी विपक्ष में एक राय नहीं बन सकी। मणिपुर पर  चर्चा तो सत्र के पहले दिन ही हो सकती थी किंतु विपक्ष अपने ही बनाए जाल में फंसकर रह गया जिससे धीरे - धीरे मुद्दा ठंडा पड़ता जा रहा है। आगामी वर्ष लोकसभा चुनाव होने वाले हैं । इस सत्र के बाद संसद का एक शीतकालीन सत्र होगा और उसके बाद का बजट सत्र महज औपचारिकताओं और विदाई में बीत जायेगा । बजट भी अंतरिम ही पेश होगा जिस पर सरकार को घेरने की गुंजाइश ही नहीं रहेगी। ऐसे में विपक्ष को चाहिए,   इस सत्र के जितने भी दिन शेष हैं उनका समुचित उपयोग कर ले । वरना हो - हल्ले में ही पूरा समय बीत जाने के बाद  उसके हाथ कुछ नहीं लगेगा। रही बात अविश्वास प्रस्ताव की तो उसका हश्र चूंकि सबको पता है इसलिए उसके बारे लोगों  की ज्यादा रुचि रह भी नहीं गई है।

-रवीन्द्र वाजपेयी