Friday, 11 August 2023

अपने ही प्रस्ताव के प्रति गंभीर नहीं रहा विपक्ष



लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं होगा ये तो उसे पेश करने वाले भी जानते थे। लेकिन इसका उद्देश्य सरकार को उसकी कमियां बनाते हुए विपक्ष का दृष्टिकोण देश के सामने रखना होता है। संसदीय परंपरा के अनुसार बहस के बाद सरकार का मुखिया उसका जवाब देता है और उसके बाद बहस की शुरुआत करने वाले विपक्ष के नेता द्वारा सरकार के जवाब से संतुष्ट न होते हुए एक बार फिर अपनी बात रखने के बाद मत विभाजन की मांग की जाती है। इसके जरिए विपक्ष ये स्पष्ट करने का प्रयास भी करता है कि सदन में कौन सा दल किसके साथ है। लेकिन गत दिवस प्रधानमंत्री जब सरकार की तरफ से अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस का उत्तर दे रहे थे तब उनका भाषण पूरा होने के पूर्व ही विपक्ष उठकर चला गया जिसके बाद प्रस्ताव ध्वनि मत से ही धराशायी हो गया। दो दिन पहले राज्यसभा में जब दिल्ली में अधिकारियों की नियुक्ति संबंधी अध्यादेश  पर मतदान हुआ तब विपक्ष ने पूरी तरह लामबंदी की थी। हालांकि कुछ विपक्षी दलों के सरकार के साथ आ जाने से उसकी उम्मीद पूरी नहीं हो सकी किंतु भविष्य की व्यूह रचना का आभास तो हो ही गया। उस लिहाज से गत दिवस लोकसभा में विपक्ष की रणनीति  बुरी तरह विफल साबित हो गई। ऐसा लगता है राज्यसभा में सरकार ने अल्पमत के बावजूद जिस तरह  से  दिल्ली संबंधी अध्यादेश पारित करवा लिया उससे कांग्रेस में हताशा आ गई । ये भी चर्चा रही कि विपक्ष के नए - नवेले गठबंधन के कुछ घटक दल अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान में तटस्थ रहने वाले थे। ऐसा होने पर इंडिया नामक प्रयोग की सफलता को लेकर आशंका बढ़ने लगती। शायद यही सोचकर कांग्रेस ने बजाय मतदान करवाने के  सदन से उठकर चले जाने की नीति अपनाई किंतु ऐसा करके उसने अपने ही प्रस्ताव की गंभीरता को नष्ट कर दिया। वैसे भी प्रस्ताव की वजनदारी उस समय ही कम हो गई थी जब प्रारंभ में ही ये कह दिया गया कि उसका उद्देश्य प्रधानमंत्री को सदन में बोलने के लिए बाध्य करना था ।  ऐसे में बेहतर होता  विपक्ष उन्हें पूरे समय तक सुनता और फिर मतदान की मांग कर ये स्पष्ट करता कि वह किस हद तक एकजुट है। इस अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से भले ही विपक्ष ने अपनी जिद पूरी कर ली किंतु पूरे सत्र में वह सरकार को जिस तरह घेर सकता था , उसमें चूक गया। प्रधानमंत्री ने अपने उत्तर में  इस सत्र के दौरान पारित हुए विधेयकों का उल्लेख करते हुए विपक्ष पर आरोप लगाया कि उसने जनहित से जुड़े मुद्दों पर बहस से दूर रहकर अपने गैर जिम्मेदार होने का प्रमाण दिया। उनकी बात सही भी है क्योंकि उनके पारित होते समय यदि विपक्षी सांसद अपनी बात रखते तो वह संसद के रिकार्ड में सुरक्षित हो जाती। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि विपक्ष संसद के सत्रों का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पा रहा। भले ही उसके पास बहुमत न हो लेकिन हर विषय पर  उसे बोलने का समय तो मिलता ही है। यदि इसी  का उपयोग किया जाए तो वह सरकार को घेरने में सफल हो सकता है। लेकिन कांग्रेस की जिद के चलते बाकी विपक्षी दल भी सदन में अपनी बात सही तरीके से दर्ज नहीं करा सके। इस बारे में एक बात ध्यान रखने वाली है कि हर सांसद  सदन में अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं और आवश्यकताओं के बारे में बोलने के लिए लालायित रहता है किंतु पार्टी द्वारा बहिर्गमन किए जाने के कारण उसका वह अवसर छिन जाता है। अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए कांग्रेस ने असम के सांसद गौरव गोगोई को अवसर देकर सही कदम उठाया था क्योंकि वे पूर्वोत्तर का प्रतिनिधित्व करते हैं ।  प्रधानमंत्री के भाषण के बाद श्री गोगोई उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों का समुचित जवाब दे सकते थे । लेकिन उनको पूरा सुने बिना ही विपक्ष उठकर चला गया। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि अविश्वास प्रस्ताव का सही लाभ विपक्ष नहीं ले सका। यदि वह सत्र के दौरान सदन को चलने देता तो उसे अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलता ,  जो वह गंवा बैठा।  इस लोकसभा के दो सत्र ही बाकी हैं। विपक्ष को चाहिए इनका पूरा - पूरा उपयोग करते हुए सरकार को घेरने की पुख्ता रणनीति बनाए। लोकसभा में उसका बहुमत भले न हो किंतु राज्यसभा में तो वह सत्ता पक्ष को झुका सकता है किंतु सही रणनीति के अभाव में यदि वह ऐसा नहीं कर पा रहा तो इसके लिए वही कसूरवार है। पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान से पूर्व ही सदन छोड़ देने के लिए विपक्ष की जो आलोचना की वह पूरी तरह सही है क्योंकि प्रस्ताव उसके द्वारा लाया गया था तब उसे आखिर तक सदन में रुकना था।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 10 August 2023

सिब्बल द्वारा कश्मीर में जनमत संग्रह जैसी दलील देशहित के विरुद्ध




कपिल सिब्बल देश के जाने माने वकील हैं। केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं । कांग्रेस में राहुल गांधी के नेतृत्व के विरुद्ध बने जी -23 नामक गुट में शामिल रहने के बाद पार्टी छोड़कर सपा के समर्थन से राज्य सभा में आ गए।  अयोध्या विवाद में वे मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता थे । कांग्रेस छोड़ने के बाद भी वे परोक्ष तौर पर ही सही किंतु उसकी मदद के लिए खड़े नजर आते हैं। हालांकि इन दिनों वे जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में   हो रही बहस के कारण चर्चा में हैं। हालांकि उनके द्वारा दी जा रही दलीलें उनके  पक्षकार की बात मानी जाएंगी  किंतु बतौर वरिष्ट राजनेता उनसे ये अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि ऐसी कोई बात न कहें जिससे देश के  हितों पर बुरा असर पड़ता हो।  श्री सिब्बल इस बात पर जोर दे रहे हैं कि धारा 370 को हटाना तो दूर रहा उसमें किसी भी प्रकार का संशोधन केवल संविधान सभा कर सकती है जो वर्तमान में अस्तित्वहीन है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली  संविधान पीठ में  शामिल कुछ न्यायाधीशों ने उक्त तर्क से असहमति व्यक्त कर दी किंतु गत दिवस श्री सिब्बल ने धारा 370 हटाए जाने के बारे में जब ब्रिटेन में यूरोपीय यूनियन से अलग होने के मुद्दे पर करवाए गए जनमत संग्रह (ब्रेक्जिट) जैसा तरीका अपनाए जाने की बात कही तब मुख्य न्यायाधीश डी. वाय.चंद्रचूड़ ने स्पष्ट शब्दों में इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि भारत में जनता की राय निर्धारित माध्यमों से जानने की प्रणाली स्थापित है। लेकिन इस दलील के जरिए श्री सिब्बल ने भारत की घोषित विदेश नीति के विरुद्ध बात कहने की वह गलती की जो आज तक किसी भी केंद्र सरकार या राजनीतिक दल द्वारा नहीं की गई। उल्लेखनीय है आजादी के बाद जब जम्मू कश्मीर का भारत में विलय हो गया तब पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी पर आक्रमण कर उसके एक हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया। बाद में विवाद संरासंघ पहुंचा जहां तत्कालीन नेहरू सरकार  इस बात पर सहमत हो गई कि जम्मू कश्मीर किसके साथ रहेगा इसका फैसला वहां की जनता की राय पूछकर किया जावेगा। शर्त ये रखी गई  कि पहले पाकिस्तान उसके कब्जे वाले हिस्से को खाली करे।  चूंकि उसने कब्जे वाला क्षेत्र खाली नहीं किया लिहाजा जनमत संग्रह की स्थिति  उत्पन्न नहीं हुई । बाद में संरासंघ ने  इस मामले को भारत - पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला मानकर अपनी भूमिका समाप्त कर ली। लेकिन कश्मीर के  तमाम अलगाववादी संगठन  आज भी उसकी रट लगाते हैं। हुर्रियत नेता सैयद अली शाह जिलानी तो जब तक जिंदा रहे तब तक केंद्र सरकार के साथ बातचीत की किसी भी पेशकश में ये कहते हुए पेच फसाते रहे कि बिना पाकिस्तान को शरीक किए बातचीत का कोई मतलब नहीं । पाकिस्तान के साथ  घाटी के लगभग सभी नेता इस बात की जिद पकड़े रहे कि जम्मू कश्मीर के भविष्य का फैसला संरासंघ के निर्देशन में  जनमत संग्रह से करवाया जावे। एक जमाना था जब अमेरिका और ब्रिटेन भी पाकिस्तान की हां में हां मिलाया करते थे किंतु धीरे - धीरे वैश्विक परिस्थितियां बदलती गईं । शीतयुद्ध की जगह बाजारवाद ने ले ली जिससे कूटनीतिक परिदृश्य भी बदला  । आज की दुनिया में भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक शक्ति के साथ विशाल उपभोक्ता बाजार के कारण चीन को छोड़कर बाकी प्रमुख देशों का नजरिया हमारे प्रति नर्म हुआ है। यहां तक कि इक्का - दुक्का के अलावा अधिकांश मुस्लिम देश तक भारत से दोस्ती करने के प्रति आकर्षित हैं। ऐसे में  श्री सिब्बल ने धारा 370 हटाए जाने के लिए राज्य की जनता से उसकी राय पूछे जाने  की जो दलील सर्वोच्च न्यायालय में  दी वह अलगाववादी ताकतों के साथ ही हमारे शत्रु राष्ट्रों  के हाथ में हथियार देने जैसा है। श्री सिब्बल अपने पक्षकार के हक में पेशेवर योग्यता , अनुभव और क्षमता का परिचय दें इसमें किसी को एतराज नहीं होगा किंतु बतौर सांसद उन्होंने देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने की जो शपथ ली उसका पालन करना भी उनका कर्तव्य है। और इसके लिए जरूरी है वे ऐसी कोई बात किसी भी मंच पर न कहें जिससे देश का अहित हो। जम्मू कश्मीर देश का अविभाज्य अंग है इसे लेकर किसी के मन में कोई भी संशय हो तो उसे निकाल देना चाहिए। 2014 के बाद से घाटी में जिस तरह  अलगाववाद पर प्रहार किया गया उसका सुपरिणाम लगातार बढ़ रहे पर्यटन के रूप में देखा जा सकता है। हुर्रियत जैसे संगठन  उपद्रव करवाने की क्षमता खो बैठे हैं। पत्थरबाजी बंद है और आतंकवादी  मारे जा रहे हैं। इसका एक कारण 370 का हटना भी है । ऐसे में ये तर्क अलगाववादी ताकतों को ताकत देने जैसा है कि जम्मू कश्मीर अन्य राज्यों जैसा नहीं है जिसका विभाजन संसद कर सके और ऐसा करने के पहले वहां के लोगों की राय पूछी जानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रचूड़ ने श्री सिब्बल की उक्त दलील को तत्काल अस्वीकार कर उन सभी को संदेश दे दिया जो कश्मीर में अलगाववाद की वापसी की उम्मीद लगाए बैठे हैं। धारा 370 को हटाए जाने के लिए संविधान सभा को पुनर्जीवित करने जैसा विचार भी मूर्खतापूर्ण  है।  संसद के पास देश के बारे में निर्णय करने का  अधिकार और शक्ति  उसी संविधान के अन्तर्गत है जो संविधान सभा द्वारा लागू किया गया था। धारा 370 के अमरत्व को लेकर संविधान पीठ के न्यायधीशों की टिप्पणियां भले ही  सांकेतिक हों किंतु वे काफी कुछ कह रही हैं जिसे श्री सिब्बल को समझना चाहिए। अपने पेशे के प्रति ईमानदारी अच्छी बात है किंतु जब बात देश की हो तब बाकी बातें महत्वहीन हो जाती हैं । 370 का हटना देश की अखंडता के लिए कितना जरूरी था ये बात अब बताने की जरूरत नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 9 August 2023

रोहिंग्या के आधार कार्ड बनाने वालों पर भी कड़ी कार्रवाई की जाए




हरियाणा के नूंह में हिंदुओं की धार्मिक यात्रा पर दूसरे समुदाय के लोगों द्वारा किए गए पथराव के कारण  अड़ोस - पड़ोस के अनेक जिलों तक दंगों की आग फैल गई । इनमें कुछ जिले राजस्थान के भी हैं , वहीं एनसीआर का हिस्सा बन चुका गुरुग्राम अभी तक अशांत हैं । नूंह जिस मेवात अंचल का हिस्सा है  वहां लगभग 90 फीसदी आबादी मेव मुसलमानों की है। दंगों के बाद उपद्रवियों की पहिचान कर उनके विरुद्ध  कार्रवाई शुरू की गई। जिसके अंतर्गत अनेक इमारतें गिराने के साथ अवैध रूप से बनाई गई झुग्गियां हटाई गईं । इसी दौरान ये पता  लगा कि मुस्लिम बहुलता का लाभ लेकर म्यांमार से आए रोहिंग्या मुसलमानों के तकरीबन 2000 परिवार वहां बस गए जिनमें से काफी लोगों के पास आधार कार्ड भी हैं ।  अब प्रश्न ये है कि विदेश से आकर अवैध रूप से यहां बस जाने वाले रोहिंग्या मुसलमानों को आधार कार्ड जैसा दस्तावेज किस तरह हासिल हुआ ? और इसका सीधा - सीधा उत्तर है भ्रष्ट व्यवस्था की मदद से । 1971 में  तत्कालीन पूर्व पाकिस्तान में गृहयुद्ध के कारण सीमा पार से बड़ी संख्या में शरणार्थी  भारत में घुस आए। तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने मानवीय आधार पर उनके रहने की व्यवस्था शिविरों में की। बाद में बांग्ला देश नामक मुल्क का उदय हुआ। तब तक करोड़ों बांग्ला देशी बतौर शरणार्थी आ चुके थे । जब सीमावर्ती राज्यों में समस्या हुई तब देश के भीतरी हिस्सों में  शिविर बनाकर उनकी व्यवस्था की गई। उम्मीद थी कि स्थितियां सामान्य होते ही वे  वापस चले जायेंगे किंतु  लौटना तो दूर  उल्टे उनका आना आज तक  जारी है । इसकी वजह से न सिर्फ असम , प.बंगाल ,  बिहार और उड़ीसा अपितु पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में जनसंख्या असंतुलन उत्पन्न हो गया।  देश के ज्यादातर हिस्सों में बांग्ला देशी मुसलमान स्थायी तौर पर बस चुके हैं। यहां जन्म लेने के कारण उनके बच्चे तो भारत के वैधानिक नागरिक हो ही गए किंतु जो बतौर शरणार्थी आए थे उनके भी नागरिकता संबंधी दस्तावेज बन जाने से   यह समस्या लाइलाज बन गई। इसके लिए  प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के साथ राजनीतिक नेताओं  की भूमिका भी जिम्मेदार कही जायेगी । जो  पार्टियां मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटी रहती हैं उनके लिए  बांग्ला देशी शरणार्थी  वोट बैंक बन गए। परिणामस्वरूप अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में वे ही जीत - हार तय करने की स्थिति में हैं।  जब भारत सरकार ने नागरिक रजिस्टर बनाने की मुहिम शुरू की और नागरिकता संशोधन कानून लागू करना चाहा तब देश के ज्यादातर राजनीतिक दल उसके विरोध में खड़े हो गए। दिल्ली दंगा और शाहीन बाग जैसा प्रयोग उसी से जुड़ा हुआ था। समय बीतने के साथ बांग्ला देश से आए शरणार्थियों को वापस भेजने की बात तो दूर,  म्यांमार (बर्मा) से रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ शुरू हो गई जो  धीरे - धीरे देश के अन्य हिस्सों से होते हुए  जम्मू - कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य तक जा पहुंचे। अपराधिक गतिविधियों के कारण  जब इनका विरोध शुरू हुआ तब जो तबका बांग्ला देशी मुस्लिमों को गोद में बिठाए रखने की वकालत करता रहा वही रोहिंग्या की तरफदारी में खड़ा हो गया । गौरतलब है  रोहिंग्या  को  म्यांमार सरकार ने बांग्ला देशी मानकर अपने देश से निकाल फेंका ,  वहीं बांग्ला देश भी उनको स्वीकार करने राजी नहीं। अपराधिक मानसिकता  के कारण वे बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं । यहां तक जानकारी  मिलने लगी है कि उनके संबंध आतंकवादी संगठनों से हैं। नूंह के दंगों से  ये बात साबित भी हो गई कि उनकी मौजूदगी देश की आंतरिक शांति और सुरक्षा के लिए स्थायी खतरा है। ऐसे में पता लगाने  वाली बात ये है कि प्रशासन में बैठे वे कौन लोग हैं जो चंद रुपयों की लालच में देश हित का सौदा कर लेते हैं? इसलिए ये जरूरी है कि राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोपों से ऊपर उठकर  ऐसे मामलों में सख्ती बरती जाए। नूंह दंगों की जो जांच हो रही है उसमें इस बात को भी जोड़ा जाए कि मेव मुसलमानों के साथ बस गए विदेश से आए रोहिंग्या मुसलमान आधार कार्ड जैसा दस्तावेज बनवाने में किस तरह कामयाब हो गए। देश की राजधानी से बेहद निकट किसी इलाके में यदि घुसपैठियों को आबाद होने में इतनी छूट है तब बाकी क्षेत्रों के बारे में क्या कहा जाए ,  ये विचारणीय प्रश्न है। बिहार से भी ऐसी खबरें आने लगी हैं । देश में अवैध रूप से आए विदेशी नागरिकों को सरकारी दस्तावेज प्रदान कर नागरिक होने का प्रमाणपत्र देने वाली सरकारी मशीनरी पर भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 8 August 2023

सादगी का उपदेश देने वाले भी तो वीआईपी संस्कृति से दूर रहें




मुरारी बापू देश की अत्यंत सम्माननीय आध्यात्मिक विभूति हैं। उनके द्वारा की जाने वाली कथाओं को सुनने जनसैलाब उमड़ता है। बड़े ही सरल और सहज व्यक्ति होने से उनके संपर्कों का दायरा विश्वव्यापी है। श्रावण माह में वे दो विशेष रेलगाड़ी लेकर भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने निकले । उनके साथ सैकड़ों सेवक और भक्त भी रहे । इसी दौरान गत सप्ताह वे महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु उज्जैन आए थे। इस अवसर पर उन्होंने मंदिरों में वीआईपी संस्कृति खत्म करने की बात कहते हुए साधारण जनता को प्राथमिकता देने का सुझाव देकर जनभावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान की। निश्चित रूप से भगवान के दरबार कहे जाने वाले मंदिरों में अतिविशिष्ट लोगों के आने से वहां घंटों पहले से पंक्ति में खड़े आम श्रद्धालु परेशान होते हैं और उनको गुस्सा भी आता है। उस दृष्टि से बापू के विचार स्वागत योग्य भी हैं और अनुकरणीय भी। लेकिन जिस वीआईपी संस्कृति का जिक्र उन्होंने छेड़ा वह केवल नेताओं , नौकरशाहों और धनकुबेरों तक ही सीमित नहीं रही। अपितु धर्म और आध्यात्म से जुड़ी हस्तियां भी इसके आकर्षण से ग्रसित हैं । एक समय था जब धार्मिक आयोजन कम से कम खर्च में संपन्न होते थे । प्रवचन करने करने वाले भी धर्म प्रचार की भावना से सहज आमंत्रण पर आ जाया करते थे। उनके आने - जाने , रहने , भोजन इत्यादि पर भी बहुत व्यय नहीं होता था। आयोजन स्थल पर भी साधारण व्यवस्था ही पर्याप्त होती थी। लेकिन आजकल वह सब कल्पनातीत होता जा रहा है। इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि मंदिर ही नहीं अपितु जहां कहीं भी धार्मिक अनुष्ठान होता है वहां वीआईपी संस्कृति का बोलबाला होता है। आजकल जहां देखो कोई न कोई बड़ा धार्मिक आयोजन होता दिखता है, जिसके प्रचार - प्रसार पर ही लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं। पंडाल और मंच की साज - सज्जा भी इतनी भव्य होती है कि साधारण व्यक्ति तो वैसा करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। जो आध्यात्मिक विभूतियां इन आयोजनों में प्रवचन देने आती हैं उनमें से ज्यादातर के साथ किसी फिल्मी सितारे सरीखा तामझाम जुड़ा है। उनकी आवास व्यवस्था पर ही बेतहाशा खर्च होता है। और अब तो एक नया चलन शुरू हो गया है। जिस प्रवचन कर्ता को बुलाया जाता है उसकी अपनी पंडाल , मंच सज्जा और टीवी पर प्रसारण की व्यवस्था है । जिसके लिए भारी - भरकम अग्रिम भुगतान करना होता है। कुल मिलाकर दूसरों को सादगी और त्याग का उपदेश देने वाले जिस तरह के महंगे आयोजन को प्रोत्साहन देने लगे हैं उस वजह से साधारण व्यक्ति तो किसी कोने में जगह पा जाने पर खुद को धन्य समझता है क्योंकि आगे के स्थान तो वीआईपी से ही भरे होते हैं । और उनमें भी ज्यादातर वे लोग होते हैं जिन्हें प्रवचन से ज्यादा रुचि अपनी हैसियत और रुतबे के प्रदर्शन में होती है। खुद बापू की कथा का आयोजन भी सुपर वीआईपी हो चला है। गत दिवस समाप्त हुई उनकी उक्त यात्रा जिस रेलगाड़ी से हुई वह विशेष तौर पर रेलवे ने तैयार करवाई जिसमें पांच सितारा होटल जैसी सुविधाएं उपलब्ध रहीं। हालांकि बापू का खुद का रहन - सहन बेहद सादा है। आम जनों से वे सरलता से मिलते हैं किंतु जिस वीआईपी संस्कृति से मंदिरों को मुक्त करने की बात उन्होंने कही उससे धर्म और आध्यात्मिक क्षेत्र से जुड़े माननीय महानुभावों को दूर रखना भी समय की मांग है। कई बार ये लगने लगता है धर्म के क्षेत्र में भी बाजारवाद घुस चुका है। नव धनाढ्यों और राजनेताओं की निकटता ने साधु , सन्यासियों को भी प्रभावित कर लिया है। ऐसे में मंदिरों के भीतर वीआईपी संस्कृति समाप्त करने मात्र से काम नहीं चलने वाला। दर्शन हेतु टिकिट जैसी व्यवस्था भी कई बार अखरती है । हालांकि उसकी वजह से व्यवस्था में सहयोग भी मिलता है। लेकिन आध्यात्म के क्षेत्र में पनप रही व्यवसायिक प्रवृत्ति निश्चित रूप से मन को कचोटती है। ये कहना भी गलत न होगा कि धर्म के नाम पर होने वाली अवांछित गतिविधियों के पीछे भी आर्थिक चकाचौंध ही है । अच्छा हो बापू जैसे व्यक्ति इस बारे में आगे आकर धार्मिक आयोजनों को ईवेंट मैनेजमेंट का हिस्सा बनने से रोकने का अभियान चलाएं। इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि चार्टर्ड विमान और महंगी कारों में चलने वाले महात्मा जब सादा जीवन , उच्च विचार का उपदेश देते हैं तो श्रोताओं पर उनका अपेक्षित असर नहीं होता। चूंकि ये बेहद सम्वेदनशील विषय है इसलिए अच्छा तो यही होगा कि वरिष्ट संत - महात्मा , विशेष रूप से शंकराचार्य इस बारे में आचार संहिता बनाएं ।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 7 August 2023

ज्ञानवापी के इमाम ने ये सच्चाई पहले क्यों नहीं जाहिर की




वाराणसी में काशी विश्वनाथ परिसर से सटी ज्ञानवापी इमारत मस्जिद है या मंदिर ,  इसका  खुलासा तो एएसआई द्वारा किए जा रहे सर्वे से ही हो सकेगा । लेकिन जो प्रारंभिक जानकारी आ रही है यदि वह प्रामाणिक है तब ज्ञानवापी के हिन्दू मंदिर होने की बात साबित हो जाएगी । कहा जा रहा कि  हिंदू मंदिरों में अंकित किए जाने वाले प्रतीक चिन्ह सर्वे के दौरान जगह - जगह नजर आए ।  अच्छी बात ये है कि प्रारंभिक आनाकानी के बाद मुस्लिम पक्ष भी सर्वे टीम के साथ परिसर में उपस्थित है। तहखानों आदि के ताले भी खोल दिए गए क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सर्वे पर रोक लगाने से इंकार किए जाने के बाद  और कोई विकल्प रह नहीं गया था।  अपुष्ट सूत्रों के अनुसार अब तक हुए सर्वे में मूर्तियों के टुकड़े , त्रिशूल , कमल ,  पान के पत्ते की आकृतियां और गुंबद में हिन्दू वास्तु शैली के प्रमाण दिखे हैं। अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से जिस प्रकार की फोटोग्राफी हो रही है वह हकीकत  को सामने लाने में सक्षम है। और इसी को मुस्लिम पक्ष रोकना चाहता था । लेकिन उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय  के आदेश के बाद उसको  सहयोग करने मजबूर होना पड़ा।  एक बात और भी स्पष्ट है कि सर्वे के विरोध में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का समर्थन न मिलने से  मुस्लिम संगठनों का हौसला पस्त हुआ।  हालांकि ज्ञानवापी के विरोध का सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा था। ये बात भी सही है  कि अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद हिंदुओं में इस बात का आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ कि  समुचित जांच हो तो ज्ञानवापी के भीतर मंदिर के प्रमाण मिल सकते हैं। इस बारे में ज्ञानवापी के इमाम का ताजा बयान काबिले गौर है कि सर्वे के दौरान मिले  सनातनी प्रमाण  इस बात को इंगित करते हैं कि औरंगजेब ने हिंदुओं के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए वैसा किया था । उन्होंने ये सफाई भी दी कि औरंगजेब ने  मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई होगी ये बात नामुमकिन है। साथ ही  ये दावा भी किया कि उसने तो मंदिर बनवाने हेतु दान दिए जिसके प्रमाण वाराणसी में बने अनेक पुराने मंदिरों में उपलब्ध है। हालांकि इमाम ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया कि मुसलमान ज्ञानवापी हिंदुओं को सौंप दें। लेकिन उनके बयान में इस बात की स्वीकारोक्ति तो है ही कि उसके भीतर सनातनी प्रमाण हैं। लेकिन ये  सब इमाम की जानकारी में था तब ये बात उसी समय सार्वजनिक करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई गई जब हिंदुओं की तरफ से दावे किए जा रहे थे कि ज्ञानवापी में मंदिर के प्रमाण हैं। इमाम से पहले किसी मुस्लिम धर्मगुरु से ये सुनने नहीं मिला कि  ज्ञानवापी में साझा संस्कृति के तहत  हिन्दू मंदिरों जैसे प्रतीक चिन्ह भी  निर्माण के समय बनाए गए थे। उल्लेखनीय है  औरंगजेब कट्टर मुसलमान था जिसने हिंदुओं पर जजिया कर लगाने के अलावा अपने भाइयों  को मरवाकर पिता को कैद कर लिया ।  भले ही वामपंथी और ब्रिटिश इतिहासकार उसके बारे में अच्छी - अच्छी बातें लिखते रहे लेकिन  ये प्रचारित करना पूरी तरह असत्य और भ्रम उत्पन्न करने वाला है कि उसने ज्ञानवापी में सनातनी परंपरा को भी समाहित किया।  सांकेतिक प्रतीकों  के अलावा गुंबदों में हिन्दू मंदिरों जैसी निर्माण शैली के साथ ही यदि  मूर्तियों के अवशेष मिल रहे हैं तब बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता  है। वैसे भी जब इस्लाम  मूर्ति पूजा से परहेज करता है तब औरंगजेब जैसे  कट्टर मुस्लिम  ने  ज्ञानवापी में मूर्ति रखने की स्वीकृति दी होगी ये सोचना पागलपन ही है। इमाम की बातों से यह संकेत  भी मिल रहा है कि मुस्लिम पक्ष अब रक्षात्मक होने लगा है । उसे ये बात अच्छी समझ में आ रही है कि यदि सर्वे में  मंदिर होने की  पुष्टि हो गई तब  न्यायालय के साथ ही गैर भाजपाई राजनीतिक दलों का रुख भी उसी के पक्ष में हो सकता है।  ऐसे में मुस्लिम समाज के धर्मगुरुओं को समझदारी से काम लेना चाहिए। ज्ञानवापी के इमाम ने घुमा - फिराकर ही सही जिस हकीकत को स्वीकार किया है उसे सीधे - सपाट शब्दों में स्वीकार किया जाए तो इससे पूरे समुदाय का  भला होगा । हिंदुओं के लिए भी बेहतर रहेगा कि वे फिलहाल ज्यादा उतावलापन न दिखाएं क्योंकि एएसआई सर्वे की रिपोर्ट अंततः अदालत के समक्ष रखी  जायेगी और वही मंदिर या मस्जिद का फैसला करेगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Sunday, 6 August 2023

बागेश्वर महाराज की आरती उतारकर कमलनाथ ने कांग्रेसियों को असमंजस में डाल दियापार्टी के अनेक नेता बाबा के विरोधी हैं


 प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने गत दिवस यहां बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की जिस तरह अगवानी करते हुए आरती उतारी उसकी राजनीतिक जगत में काफी चर्चा है। वैसे भी  श्री नाथ काफी समय समय से अपने को भाजपा से भी बड़ा हिंदुत्ववादी साबित करने में जुटे हुए हैं। इसी सिलसिले में वे बागेश्वर धाम की यात्रा भी कर आए थे। भोपाल स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में हनुमान जी का कट आउट लगाने के साथ ही पंडितों और पुजारियों को बुलाकर उनका सम्मान करने जैसे कदमों के अलावा इन दिनों वे साधु - संतों के बारे में बोलने में सावधानी बरत रहे हैं। ये बात सर्वविदित है  कि कमलनाथ आगामी विधानसभा चुनाव किसी भी कीमत पर जीतना चाहते हैं । इसके लिए वे हिन्दू मतदाताओं को रिझाने के लिए भी हर कोशिश करने  तैयार हैं। ये जानते हुए भी कि बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण हिन्दू राष्ट्र की खुलेआम वकालत करते हैं , उनकी आरती उतारकर कमलनाथ ने  कांग्रेस के उन नेताओं के सामने असमंजस की स्थिति उत्पन्न कर दी जो बागेश्वर महाराज के नाम से  प्रसिद्ध श्री शास्त्री द्वारा हिन्दू राष्ट्र का मुद्दा उठाए जाने पर उनकी आलोचना करते आए हैं। वैसे भी ज्यादातर साधु - सन्यासी अयोध्या आंदोलन के बाद से भाजपा के करीबी माने जाते हैं। इसीलिए   छत्तीसगढ़  की कांग्रेस सरकार के एक मंत्री ने बागेश्वर महाराज  को ललकारते हुए हुए कहा कि  बस्तर में हुए धर्मांतरण के अपने  आरोप को साबित कर दें तो वे राजनीति छोड़ देंगे अन्यथा महाराज पंडिताई छोड़ें । ऐसी ही टकराहट श्री शास्त्री की अन्य राज्यों में भी कांग्रेस नेताओं से होती आई है। हाल ही में विवाहित हिन्दू महिला के मांग भरने संबंधी उनके बयान पर भी कांग्रेस की अनेक महिला नेत्रियों ने उनका जमकर।विरोध किया था। लेकिन श्री नाथ ने गत दिवस बागेश्वर महाराज की जिस तरह मिजाजपुर्सी की उसकी वजह से श्री शास्त्री के आलोचक रहे कांग्रेस आश्चर्यचकित हैं । दरअसल अब तक वे भाजपा पर तो राजनीति में धर्म को घसीटने  का आरोप लगाते रहे किंतु अब कमलनाथ भी उसी के नक्शे कदम पर चल रहे हैं तब उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि वे आगे से श्री शास्त्री के बारे में आलोचनात्मक बातें कैसे बोलेंगे ? स्मरणीय है कुछ माह पूर्व जब उत्तराखंड के जोशीमठ में धरती में दरारें आईं तब छत्तीसगढ़ के  मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने श्री शास्त्री पर कटाक्ष किया था कि वे उसे भरने का चमत्कार दिखाएं। ये भी गौर गलब है कि बागेश्वर महाराज जहां भी जाते हैं , हिन्दू राष्ट्र का का संकल्प दोहराते हुए उपस्थित लोगों से उसके समर्थन के अपील करते हैं। जाहिर है छिंदवाड़ा में भी वे ऐसा ही करेंगे और तब श्री नाथ उस पर क्या कहेंगे ये सवाल उठने लगा है। एक बात और जो इस बारे में चर्चित है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के जरूरत से ज्यादा हिन्दू प्रेम ने पार्टी के परंपरागत मुस्लिम मतदाताओं को चौकन्ना कर दिया है। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी तो पहले से ही मुस्लिम समुदाय कोअपने साथ लाने प्रयासरत हैं। दरअसल छिंदवाड़ा में बागेश्वर महाराज की आरती उतारना कमलनाथ की  मजबूरी थी क्योंकि 2019 की मोदी लहर में वे  विधानसभा और उनके बेटे नकुल नाथ लोकसभा का चुनाव बहुत कम अंतर से जीते थे। लोगों का मानना है कि नरेंद्र मोदी की सभा यदि छिंदवाड़ा में हो जाती तब बाप - बेटा दोनों  हार जाते। शायद उसी भय से श्री नाथ ने बागेश्वर महाराज की आरती उतारने का फैसला लिया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 5 August 2023

सर्वोच्च न्यायालय ने राहत के साथ नसीहत भी दी है




सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मानहानि मामले में गत दिवस दिए फैसले को लेकर राजनीतिक हलचल होना स्वाभाविक है। गुजरात की अदालत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दो वर्ष की जो सजा सुनाई उसके कारण उनकी संसद सदस्यता समाप्त कर  सरकारी आवास  खाली करवा लिया गया , जो सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन गांधी परिवार के साथ ऐसा कुछ होना अनोखा माना जाता है ,  इसलिए सवाल उठाया गया कि सदस्यता और आवास संबंधी फैसले इतनी शीघ्रता से क्यों लिए गए ? उच्च न्यायालय में भी जब श्री गांधी को सजा के विरुद्ध स्थगन न मिला तब वे सर्वोच्च न्यायालय गए जिसने गत दिवस उसको स्थगित करते हुए ये सवाल उठाया कि  दो वर्ष की सजा ही क्यों दी गई ? यदि वह  एक वर्ष 11 माह होती तब जेल जाने पर भी वे सांसद बने रहकर  आगामी चुनाव  लड़ सकते थे। सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी भी की कि  2 वर्ष की सजा देने से एक तरफ तो श्री गांधी सांसद रहने से वंचित हुए वहीं उनके निर्वाचन क्षेत्र वायनाड के मतदाता भी जन प्रतिनिधि विहीन हो गए। ये तो हुईं बौद्धिक बातें किंतु श्री गांधी की सजा स्थगित किए जाने को उनकी जीत बताने वाले इस बात को नजरंदाज कर रहे हैं कि जिस भाषण पर उन्हें सजा हुई उसे भी सर्वोच्च न्यायालय ने सही नहीं माना और नसीहत दी कि  सार्वजनिक रूप से भाषण देते समय अपनी जुबान पर नियंत्रण रखना चाहिए। वैसे भी सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश ही दिया है जिसमें   श्री गांधी की अपील पर अंतिम निर्णय होने तक सजा स्थगित तो की गई किंतु रद्द नहीं हुई। इसका मतलब साफ है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अभी उनको निर्दोष नहीं माना  अपितु अस्थायी  राहत दी है जिससे उनकी  सदस्यता बहाल होने के साथ ही  शासकीय आवास भी उन्हें वापस मिल जावेगा।  बहरहाल श्री गांधी और कांग्रेस ही नहीं बल्कि विपक्षी गठबंधन के लिए ये आदेश संजीवनी की तरह है क्योंकि संसद सत्र के दौरान इसके आने से  उनका हौसला बुलंद हुआ है। यदि अध्यक्ष ने तत्काल सदस्यता बहाल कर दी तब हो सकता है श्री गांधी अविश्वास प्रस्ताव पर होने वाली बहस में शरीक हो सकें। लेकिन इस निर्णय को अभूतपूर्व कहना अतिशयोक्ति होगी क्योंकि उनके पहले ऐसे ही मामले में एक लोकसभा सदस्य को 10 वर्ष की  सजा होने पर उसकी सदस्यता खत्म कर दी गई और चुनाव आयोग ने उपचुनाव की तैयारी भी कर ली किंतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सजा स्थगित कर देने  के बाद उक्त सांसद की सदस्यता बहाल हो गई। लेकिन राहुल चूंकि कांग्रेस के बड़े नेता हैं और अघोषित तौर पर प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी , इसलिए  उनकी सजा पर मिले स्थगन को पार्टी बड़ी जीत के तौर पर प्रचारित कर रही  है  । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी सजा की अवधि को भले ज्यादा माना हो किंतु जिस कारण से वह दी गई उसे पूरी तरह गलत नहीं बताया ।और उनको बोलते समय मर्यादा का ध्यान रखने की समझाइश भी दे डाली  । अन्यथा न्यायालय चाहता तो  उन्हें निर्दोष घोषित कर देता। इस प्रकार अभी भी ये प्रकरण पूरी तरह खुला हुआ है क्योंकि  केवल सजा पर स्थगन हुआ है जिसके कारण श्री गांधी सांसद बने रहेंगे और यदि जल्द फैसला न हुआ तब लोकसभा चुनाव भी लड़ सकेंगे । लेकिन यदि सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी मानकर उनकी सजा कम कर दी तब उनको जेल जाना पड़ सकता है। जहां रहकर वे चुनाव भले लड़ लें लेकिन मैदानी राजनीति नहीं कर सकेंगे। हालांकि राहुल और कांग्रेस के लिए सर्वोच्च न्यायालय का आदेश निःसंदेह राहत लेकर आया किंतु बात यहीं पर समाप्त नहीं होती क्योंकि  सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी तो कर ही दी कि संदर्भित भाषण में उनका लहजा अच्छा नहीं था। सवाल ये है कि क्या न्यायालय के  इस कथन को हमारे नेता गंभीरता से लेंगे कि सार्वजनिक जीवन में बोलने से पूर्व सावधानी की अपेक्षा की जाती है। इस दायरे में केवल श्री गांधी ही नहीं वरन सभी राजनीतिक दलों के वे  नेता आते हैं जिन्हें विवादित टिप्पणियां करने का शौक है और  दूसरों का अपमान कर वे खुश होते हैं। ऐसे नेताओं पर उनकी पार्टियां जब नियंत्रण नहीं लगातीं तब ये लगता है कि उन्हें ऐसा बोलने हेतु अधिकृत किया गया है। इस बारे में वामपंथियों की छवि कुछ बेहतर है जो  मुद्दों तक सीमित रहते हुए व्यक्तिगत कटाक्षों से परहेज करते हैं। भाजपा वैसे तो अपने अनुशासन के लिए प्रसिद्ध है किंतु उसके भी कुछ नेताओं के बयान शालीनता के विरुद्ध होते हैं। क्षेत्रीय दलों में तो विवादित बयानबाजी करने वाले ढेरों हैं। स्मरणीय है कुछ समय पहले तक श्री गांधी अपने भाषणों में स्वातंत्र्य वीर सावरकर के बारे में अनर्गल बोला करते थे जिस पर महाराष्ट्र में कांग्रेस की सहयोगी शिवसेना (उद्धव गुट) को भी आपत्ति होती थी। बाद में शरद  पवार के दबाव में आकर उन्होंने सावरकर जी के बारे में बोलने से परहेज किया किंतु जो बोल गए उस पर खेद न जताकर अपनी हठधर्मिता भी दिखाई। अभी श्री गांधी पर मानहानि के और भी मुकदमे लंबित हैं । ऐसे ही प्रकरण अन्य राजनीतिक नेताओं पर भी हैं। आजकल तो संसद के भीतर भी शब्दों की मर्यादा तार - तार करने का चलन है। इसके कारण राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा घट रही है किंतु ऐसा लगता है शालीनता की जगह उद्दंडता ने ले ली है। ये प्रवृत्ति किसी भी दृष्टि से अच्छी नहीं कही जा सकती। लोकतंत्र सभ्य समाज में ही फलता - फूलता है। उस दृष्टि से मौजूदा माहौल चिंता पैदा करने वाला है।

- रवीन्द्र वाजपेयी