Tuesday, 15 August 2023

देश हमें देता है सब कुछ , हम भी तो कुछ देना सीखें



आज देश स्वाधीनता की वर्षगांठ मना रहा है। राजधानी दिल्ली से लेकर सुदूर क्षेत्रों तक में उत्सव का माहौल है। सब्जी के ठेले और रिक्शे तक पर लगे तिरंगे को देखकर देशवासियों के मन में इस राष्ट्रीय पर्व के प्रति लगाव परिलक्षित होता है। इसमें दो मत नहीं है कि बीते 76 वर्ष के कालखंड में अनेकानेक समस्याओं से जूझते हुए भी देश आगे बढ़ा है। हालांकि ये भी उतना ही सच है कि इस दौरान जितना हमें हासिल कर लेना चाहिए था उतना नहीं हो सका , जिसका प्रमुख कारण हमारी राजनीतिक व्यवस्था का सत्ता केंद्रित होकर रह जाना है । यद्यपि राजनीति के क्षेत्र में कार्य करने वाला छोटा कार्यकर्ता  हो या नेता , सभी की इच्छा सत्ता सुख प्राप्त करने की होती है । जो राजनीतिक दल वैचारिक आधार पर राजनीति करते हैं वे भी किसी न किसी तरह सत्ता प्राप्ति में लगे रहते हैं । लेकिन इस सोच का दुष्परिणाम ये हुआ कि राजनीतिक दलों की पूरी कार्यप्रणाली देश हित की बजाय किसी न किसी तरह से सरकार बना लेने पर आकर केंद्रित हो गई। आजादी के बाद जब कांग्रेस को देश की बागडोर मिली तब उसके लिए चुनौतीविहीन  स्थिति थी। पंडित  नेहरू का कद आसमान छूता था। उनकी गलतियों को जनता नजरंदाज कर देती थी। आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने की जो पुण्यायी कांग्रेस के पास थी उसकी बदौलत वह पहला , दूसरा और तीसरा आम चुनाव आसानी से जीत गई। उस दौरान देश का विकास भी हुआ । लेकिन नेहरू जी स्वप्नदृष्टा तो बहुत अच्छे थे किंतु सपनों को साकार करने की उनकी प्रतिबद्धता उस लिहाज से कमतर होने से वे अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सके। देश को पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए विकास की राह पर ले जाने में उनका योगदान निश्चित तौर पर यादगार है किंतु पहले पाकिस्तान द्वारा कश्मीर का बड़ा हिस्सा हड़प लेने और फिर चीन द्वारा 1962 में हजारों वर्ग किमी भूमि पर कब्जा कर लेने के कारण वे एक कमजोर प्रधानमंत्री साबित होने लगे। ये कहना गलत न होगा कि 1964 में उनकी मृत्यु न हुई होती तो 1967 में वे कांग्रेस को चुनाव न जिता पाते। यद्यपि उन्होंने भारत को विश्व बिरादरी में पहिचान तो दिलाई किंतु उनका जरूरत से ज्यादा आदर्शवाद देश के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। और फिर  लोकतांत्रिक छवि के बावजूद वे अपनी पारिवारिक श्रेष्ठता का मोह न छोड़ सके और बेटी इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने के बाद उनकी जिद पर केरल की नंबूदरीपाद सरकार को बेवजह भंग करवा दिया , जो कि दुनिया की पहली चुनी हुई साम्यवादी सरकार थी। बावजूद इसके कि नेहरू जी सोवियत संघ और चीन की  साम्यवादी शासन व्यवस्था से बेहद प्रेरित और प्रभावित थे। इंदिरा जी को कांग्रेस में स्थापित करने का जो कार्य उन्होंने किया उसने देश में परिवारवाद की नींव रख दी जो कालांतर में बढ़ते - बढ़ते भारतीय राजनीति की पहिचान बन गया । और यही कारण है कि राजनेताओं का पूरा चिंतन सामंतवादी होकर रह गया । देश और जनता की बेहतरी के बजाय अपने परिवार के उत्थान की चिंता ने राजनीति को ऐसे  रास्ते पर धकेल दिया जो केवल और केवल स्वार्थ सिद्धि की ओर ले जाता है। आज स्वाधीनता दिवस पर देश की मौजूदा स्थिति पर नजर डालने पर ये महसूस होता है कि राजनीति के क्षेत्र में जिस तरह से सामंतवाद अपने पैर जमाता दिख रहा है उसके कारण अब बात देश और जनता की बजाय उन चंद नेताओं के मान - अपमान पर आकर सिमट जाती है जो खुद को इस देश का मालिक समझ बैठे हैं। इनको न कानून का ख्याल है और न ही लोकतांत्रिक मर्यादाओं का । आजादी के बाद देश में मौजूद 500 से अधिक रियासतों का भले विलय हो गया किंतु राजनीतिक दलों के जरिए जिस नव सामंतवाद ने समूचे परिदृश्य पर आधिपत्य कर लिया वह ज्यादा खतरनाक है। कुछ महीनों के बाद देश में लोकसभा चुनाव होंगे। विभिन्न राजनीतिक दल उसके लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं। मोर्चेबंदी के तहत गठबंधनों को शक्ल दी जा रही है । लेकिन दुर्भाग्य इस बात का है कि चुनाव जीतने के लिए देश की छवि धूमिल करने का प्रयास संसद से सड़क तक किया जा रहा है। 21 वीं सदी के प्रारंभिक दो दशकों में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है । इसके लिए किसी एक नेता या राजनीतिक दल को श्रेय भले न दें किंतु देश ने जो हासिल किया है उस पर गौरव करना तो अपेक्षित है ही। देश में रहकर अच्छी शिक्षा हासिल करने के बाद ये कहकर विदेश चले जाना कि यहां रखा ही क्या है , एक तरह की एहसान फरामोशी ही है। इसी तरह जब  दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत में कारोबार करने आकर्षित हो रही हों तब कुछ धनकुबेरों के देश छोड़कर अन्यत्र बस जाने पर भविष्य का  निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करना भी बेहद गैर जिम्मेदाराना कृत्य है। आजादी की वर्षगांठ पर सोशल मीडिया के करिए केवल शुभकामनाएं और बधाई देने - लेने के कर्मकांड से ऊपर उठकर हमें देश के बारे में सकारात्मक सोच का प्रसार करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होना चाहिए ।  जब हम भारत को मां मानते हैं तब  उसी रूप में उसे सम्मान भी देना चाहिए। आज का अवसर केवल उत्सव तक सीमित नहीं है। देश जिस मोड़ पर है उसमें हर नागरिक को अपने दायित्व के प्रति गंभीर होना पड़ेगा। यदि विकास की दौड़ में हम किसी भी क्षेत्र में पीछे हैं तो इसके लिए कुछ जिम्मेदारी हमारी भी है।  अधिकारों के प्रति जागरूकता अच्छी बात है किंतु कर्तव्य बोध उससे अधिक महत्वपूर्ण है। आज चुनाव जीतने के लिए जिस प्रकार खैरात बांटी जाती है उसके लिए बतौर मतदाता हमारी लालची प्रवृत्ति ही जिम्मेदार है। यदि सब कुछ ठीक  - ठाक चला तब कुछ दिनों के बाद ही हमारा यान चंद्रमा पर उतर जावेगा। ये भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी दक्षता का प्रमाण होगा । इसके अलावा भी देश में ऐसा बहुत कुछ है जिससे हमारा हौसला बुलंद होता है। आज के दिन ये संकल्प लें कि हम देश के प्रति नकारात्मक सोच को पूर्णतः तिलांजलि दे देंगे। और अपनी संतानों को भी ऐसी ही सोच रखने के लिए प्रेरित करेंगे। देश की उपलब्धियों पर हम सबका हक है तो उसकी कमियों को दूर करने की  जिम्मेदारी भी हमें उठाना होगी , इस भाव के साथ कि :-
देश हमें देता है सब कुछ , हम भी तो कुछ देना सीखें।

स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक बधाई।

- रवीन्द्र वाजपेयी 



Monday, 14 August 2023

दलबदल ने नेताओं की सैद्धांतिक पहिचान खत्म कर दी




दल बदलने की परंपरा कब शुरू हुई ये  कहना मुश्किल है । आजादी के पूर्व कांग्रेस ही प्रमुख थी किंतु स्वाधीनता के बाद अनेक  नेता  उससे अलग हो गए । कुछ ने नई पार्टी बनाई तो जयप्रकाश नारायण जैसे  राजनीति छोड़कर सर्वोदयी बन गए। समाजवादियों की बड़ी संख्या कांग्रेस छोड़ने के बाद प्रजा सोशलिस्ट  पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले जमा हुई। साम्यवादी पार्टी ,  मुस्लिम लीग और हिंदू  महासभा तो पहले से ही अस्तित्व में थीं। पहले आम चुनाव के पूर्व भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ। धीरे - धीरे समाजवादी नेताओं में भी मतभेद उभरे । कुछ  कांग्रेस में लौट गए और कुछ  पार्टियां तोड़ने - बनाने के खेल में रम गए। 1962 में चीन के आक्रमण के बाद साम्यवादी दल  सीपीआई और सीपीएम के तौर पर बंट गए। 1967 में डा.राममनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के नारे से प्रेरित संविद सरकारों के रूप में  हुआ  प्रयोग  हालांकि जल्द ही विफल हो गया परंतु  उसने दल बदल नामक बीमारी को जन्म दिया । आया राम - गया राम का दौर भी चला जब एक ही दिन में कई बार पार्टी बदली गई। भजनलाल नामक मुख्यमंत्री तो  पूरे मंत्रीमंडल सहित दल बदल  कर गए। इस प्रवृत्ति का सर्वाधिक शिकार समाजवादी आंदोलन हुआ जिसके नेताओं में पार्टियां तोड़ने की प्रतिस्पर्धा  आज तक जारी है। अनेक नेताओं ने अपनी पारिवारिक पार्टियां भी बना लीं। दक्षिण में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम से टूटकर अद्रमुक बन गई। एम.जी रामचंद्रन की देखासीखी दक्षिण के अनेक अभिनेताओं ने दल बनाए। एन. टी.रामाराव तो मुख्यमंत्री भी बने किंतु उनके दामाद चंद्राबाबू नायडू ने बगावत कर डाली। महाराष्ट्र में शिवसेना बनी तो तो उड़ीसा में बीजू जनता दल। कर्नाटक में देवगौड़ा परिवार ने जनता दल  सेकुलर का गठन किया। प.बंगाल में ममता बैनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई वहीं लालू यादव , मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान ने भी अपनी घरेलू पार्टियां बना लीं। 1977 में बनी जनता  पार्टी सरकार के पतन  के बाद जनसंघ से जुड़े रहे नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की।  इस सबके बीच कांग्रेस लगातार टूटती गई और नई पार्टियां बनती गईं। लेकिन  गाजर घास की तरह से उगी इन पार्टियों के कारण  राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता और पहिचान लुप्त होती चली गई।  पहले किसी नेता का नाम लेते ही उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि सामने आ जाती थी किंतु अब ऐसा नहीं है। आगामी साल लोकसभा चुनाव होंगे। इसीलिए एक पार्टी छोड़कर दूसरे में जाने का दौर जारी है । गठबंधन की जो प्रक्रियाएं चल रही हैं उनमें भी सैद्धांतिकता नजर नहीं आती। परिवार की निजी संपत्ति बने दलों की प्राथमिकता  सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े रहना है  जिसके  लिए वे कुछ भी करने में शर्माते नहीं हैं। जनता पार्टी की सरकार रास्वसंघ के साथ जनसंघ के लोगों के संबंध पर एतराज करने के नाम पर गिरी थी। बाद में जब भाजपा बनी तब दोहरी सदस्यता पर बवाल करने वाले जॉर्ज  फर्नांडीज , शरद यादव , रामविलास पासवान उसके साथ सत्ता में भागीदार बन बैठे। नीतीश कुमार ने तो लंबे समय तक भाजपा के साथ बिहार पर राज किया। जिन स्व.पासवान ने गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को दोषी मानकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार  छोड़ी वे 2014 में श्री मोदी के साथ आ गए । नीतीश खुद बीते दस साल में दो बार भाजपा के साथ मिलने और अलग होने का दांव चल चुके हैं । भ्रष्टाचार के मूर्तमान प्रतीक कहे जाने वाले अजीत पवार   दिन - दहाड़े भाजपा के साथ सत्ता  सुख लूटने  आ गए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक दलबदल भारतीय राजनीति की पहिचान बन चुका है। किसी को किसी से परहेज नहीं रहा। जातिगत छुआछूत तो आज तक नहीं मिट सकी लेकिन राजनीतिक छुआछूत अवश्य अपनी मौत मर चुकी है। आज जो भ्रष्ट है वह साथ आते ही ईमानदारी का प्रतीक हो जाता है और कट्टर सांप्रदायिक नेता को पलक झपकते धर्म निरपेक्षता का प्रमाण पत्र मिल जाता है। अपनी पार्टी के निष्ठावान चने चबाते रह जाते हैं और दलबदलू आकर कुर्सी पा जाते हैं। देश में अनेक ऐसे मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री हैं जो कुछ समय पहले ही पार्टी में आए और देखते - देखते सबके सिर पर सवार हो गए। आजादी के 76 साल पूरे होने के अवसर पर भारतीय राजनीति का मौजूदा परिदृश्य निराश करने वाला है। गठबंधन यदि देश हित में हो तो उसका स्वागत होना चाहिए। चुनाव के बाद  योग्य सांसदों - विधायकों को मंत्री बनाए जाने की भी  हर कोई तारीफ करेगा किंतु महज सत्ता के लिए दूसरे दल से आए नेता को उपकृत करने से एक तो पार्टी के कार्यकर्ता आत्मग्लानि का अनुभव करते हैं वहीं जनता को भी ये लगता है कि राजनीति पूरी तरह बाजार बनती जा रही है। दुख की बात ये है कि लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां दल बदल को प्रोत्साहित करने के खेल में शामिल हैं। सांसदों और विधायकों के दल बदल को रोकने का तो एक कानून भी है किंतु बाकी को खुली छूट  है। हालांकि वह कानून भी तकनीकी पेच में फंसकर मजाक बन जाता है। ऐसे में ये जरूरी लगता है कि दल बदल करने वाले नेता यदि अपने निर्णय का समुचित कारण नहीं बता पाएं तो जनता को उनका तिरस्कार करना चाहिए । राजनीतिक दल भी ताजा - ताजा पार्टी में आए नेता को टिकिट देने से मना करें तो इस प्रवृत्ति पर नियंत्रण लग सकता है। लेकिन आज की स्थिति में किसी से उम्मीद करना व्यर्थ है क्योंकि  पूरे कुएं में भांग घुली हुई है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 




Friday, 11 August 2023

अंग्रेजों द्वारा बनाई दंड व्यवस्था और न्याय प्रणाली में सुधार जरूरी


गृह मंत्री अमित शाह ने गत दिवस लोकसभा में अंगेजी राज में बनाए गए अनेक कानून खत्म करने के साथ ही कुछ का स्वरूप बदलने संबंधी जो विधेयक किए वे निश्चित रूप से समय की मांग हैं। देश में कानून को लागू करने के अलावा न्यायालयीन प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति बेहद निराशाजनक है। मसलन किसी को गिरफ्तार करने के बाद अपराधिक प्रकरण का निराकरण कितने समय के भीतर किया जाएगा इसकी कोई सीमा नहीं है। गृह मंत्री द्वारा प्रस्तुत विधेयक के मुताबिक ट्रायल कोर्ट को तीन साल के भीतर हर फैसला करना होगा। राजद्रोह अब देशद्रोह होगा । भारतीय दंड संहिता में 511 से कम होकर 356 धाराएं बचेंगी और सैकड़ों बदली जायेंगी । कुछ को समाप्त करने के साथ ही कुछ नई शामिल होंगी। छोटे अपराधों के लिए जेल भेजने के बजाय दंड स्वरूप सामुदायिक सेवा का प्रावधान रचनात्मक सोच है। इसी तरह मॉब लिंचिंग , लव जिहाद जैसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान भी अपेक्षित कदम है। देश में कहीं भी प्राथमिकी दर्ज करवाने के अलावा अन्य कुछ प्रस्ताव उक्त विधेयकों में हैं जिनके पारित होने के बाद अदालतों में लंबित प्रकरणों का बोझ कम तो होगा ही आरोपित व्यक्ति को भी अनिश्चितता से राहत मिलेगी। बकौल गृहमंत्री ये विधेयक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से गुलामी की निशानियों को खत्म करने सम्बन्धी घोषणा के परिप्रेक्ष्य में पेश किए गए। चूंकि संसद का सत्र समाप्त होने के चार दिन बाद ही स्वाधीनता दिवस है इसलिए सरकार को जल्दबाजी में ये काम करना पड़ा। हालांकि यदि गृह मंत्री सत्र की शुरुआत में इसे पेश कर देते तब वह लोकसभा से पारित होने के बाद राज्यसभा द्वारा भी स्वीकृत कर दिया गया होता। अब इसके लिए शीतकालीन सत्र तक इंतजार करना होगा। बहरहाल देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए । आजदी के बाद अंग्रेजों द्वारा लागू किए ज्यादातर दीवानी और फौजदारी कानूनों को यथावत स्वीकार कर लिया गया। यद्यपि समय - समय पर उनमें कुछ सुधार और संशोधन भी किए जाते रहे किंतु उनका मूल ढांचा ब्रिटिश राज की यादें दिलाता रहा। न्यायालयीन कार्यप्रणाली पर भी औपनिवेशिक काल की छाप साफ नजर आती है। पेशी दर पेशी की संस्कृति ने न्यायपालिका की जो नकारात्मक छवि बनाई उसके कारण लोकतंत्र की सार्थकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगते हैं। राजद्रोह शब्द अपने आप में राजतंत्र का एहसास करवाने वाला है। किसी अपराधिक मामले पर अंतिम फैसला होते - होते कुछ लोगों की जिंदगी का लंबा समय गुजर जाता है। ये धारणा भी काफी मजबूती के साथ उभरी है कि निर्दोष व्यक्ति व्यवस्था में खामियों के चलते जेल में सड़ता रहता है वहीं अपराधी प्रवृत्ति के लोग छुट्टा घूमते हैं। न्याय को सस्ता और सुलभ बनाने के तमाम दावे भी हवा - हवाई होकर रह गए हैं। एक जैसे मामले में किसी को तो तत्काल जमानत दे दी जाती है वहीं दूसरा महज इसलिए उससे वंचित रह जाता है क्योंकि उसके पास महंगे वकील की फीस चुकाने की हैसियत नहीं है। कुछ समय पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के सामने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और तत्कालीन कानून मंत्री किरण रिजुजू ने कहा कि न्यायाधीश वकील का चेहरा देखकर फैसला करते हैं । लेकिन मी लॉर्ड सफाई में कुछ नहीं बोल सके। ऐसे में ये जरूरी हो गया है कि दंड प्रक्रिया के साथ ही अदालती व्यवस्था में भी आमूल परिवर्तन हो। अनुपयोगी पड़े कालातीत हो चुके कानूनों को अंतिम विदाई देकर उनके दुरुपयोग को रोका जा सकेगा । इसके अलावा अभियोजन पक्ष भी कानूनों की भीड़ में भटकने से बचेगा। न्यायालयों द्वारा समय सीमा में प्रकरण का निपटारा करने की व्यवस्था इन विधेयकों में सबसे अच्छी बात है। अन्यथा सजा का फैसला होने तक आरोपी बरसों - बरस जेल में रहने मजबूर रहता है। कुल मिलाकर जो विधेयक गत दिवस लोकसभा में पेश हुए इनके बारे में राजनीतिक दलों को संसद के अगले सत्र के पूर्व ही अपनी राय बना लेनी चाहिए जिससे इनको पारित करने में अनावश्यक विलंब न हो। इस बारे में ये बात सोचने वाली है कि न्याय को सस्ता करना है तो प्रकरण के निपटारे में देर को खत्म करना होगा क्योंकि वह जितना लंबा खींचता है वकील और अन्य खर्चे बढ़ते ही जाते हैं। अदालतों को नामी - गिरामी वकीलों की बजाय पक्षकार की सहूलियत पर भी ध्यान देना चाहिए। वैसे अभी इस क्षेत्र में और भी सुधारों की जरूरत है किंतु याद रखने वाली बात है कि किसी भी बड़े सफर की शुरुआत छोटे से कदम से ही होती है। गृह मंत्री श्री शाह द्वारा गत दिवस लोकसभा में पेश किए गए विधेयक भी व्यवस्था परिवर्तन की राह पर बढ़ाये कदम हैं जो आशान्वित करते हैं। ऐसे मामलों में राजनीति न हो तो ये देश हित में होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

अपने ही प्रस्ताव के प्रति गंभीर नहीं रहा विपक्ष



लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं होगा ये तो उसे पेश करने वाले भी जानते थे। लेकिन इसका उद्देश्य सरकार को उसकी कमियां बनाते हुए विपक्ष का दृष्टिकोण देश के सामने रखना होता है। संसदीय परंपरा के अनुसार बहस के बाद सरकार का मुखिया उसका जवाब देता है और उसके बाद बहस की शुरुआत करने वाले विपक्ष के नेता द्वारा सरकार के जवाब से संतुष्ट न होते हुए एक बार फिर अपनी बात रखने के बाद मत विभाजन की मांग की जाती है। इसके जरिए विपक्ष ये स्पष्ट करने का प्रयास भी करता है कि सदन में कौन सा दल किसके साथ है। लेकिन गत दिवस प्रधानमंत्री जब सरकार की तरफ से अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस का उत्तर दे रहे थे तब उनका भाषण पूरा होने के पूर्व ही विपक्ष उठकर चला गया जिसके बाद प्रस्ताव ध्वनि मत से ही धराशायी हो गया। दो दिन पहले राज्यसभा में जब दिल्ली में अधिकारियों की नियुक्ति संबंधी अध्यादेश  पर मतदान हुआ तब विपक्ष ने पूरी तरह लामबंदी की थी। हालांकि कुछ विपक्षी दलों के सरकार के साथ आ जाने से उसकी उम्मीद पूरी नहीं हो सकी किंतु भविष्य की व्यूह रचना का आभास तो हो ही गया। उस लिहाज से गत दिवस लोकसभा में विपक्ष की रणनीति  बुरी तरह विफल साबित हो गई। ऐसा लगता है राज्यसभा में सरकार ने अल्पमत के बावजूद जिस तरह  से  दिल्ली संबंधी अध्यादेश पारित करवा लिया उससे कांग्रेस में हताशा आ गई । ये भी चर्चा रही कि विपक्ष के नए - नवेले गठबंधन के कुछ घटक दल अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान में तटस्थ रहने वाले थे। ऐसा होने पर इंडिया नामक प्रयोग की सफलता को लेकर आशंका बढ़ने लगती। शायद यही सोचकर कांग्रेस ने बजाय मतदान करवाने के  सदन से उठकर चले जाने की नीति अपनाई किंतु ऐसा करके उसने अपने ही प्रस्ताव की गंभीरता को नष्ट कर दिया। वैसे भी प्रस्ताव की वजनदारी उस समय ही कम हो गई थी जब प्रारंभ में ही ये कह दिया गया कि उसका उद्देश्य प्रधानमंत्री को सदन में बोलने के लिए बाध्य करना था ।  ऐसे में बेहतर होता  विपक्ष उन्हें पूरे समय तक सुनता और फिर मतदान की मांग कर ये स्पष्ट करता कि वह किस हद तक एकजुट है। इस अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से भले ही विपक्ष ने अपनी जिद पूरी कर ली किंतु पूरे सत्र में वह सरकार को जिस तरह घेर सकता था , उसमें चूक गया। प्रधानमंत्री ने अपने उत्तर में  इस सत्र के दौरान पारित हुए विधेयकों का उल्लेख करते हुए विपक्ष पर आरोप लगाया कि उसने जनहित से जुड़े मुद्दों पर बहस से दूर रहकर अपने गैर जिम्मेदार होने का प्रमाण दिया। उनकी बात सही भी है क्योंकि उनके पारित होते समय यदि विपक्षी सांसद अपनी बात रखते तो वह संसद के रिकार्ड में सुरक्षित हो जाती। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि विपक्ष संसद के सत्रों का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पा रहा। भले ही उसके पास बहुमत न हो लेकिन हर विषय पर  उसे बोलने का समय तो मिलता ही है। यदि इसी  का उपयोग किया जाए तो वह सरकार को घेरने में सफल हो सकता है। लेकिन कांग्रेस की जिद के चलते बाकी विपक्षी दल भी सदन में अपनी बात सही तरीके से दर्ज नहीं करा सके। इस बारे में एक बात ध्यान रखने वाली है कि हर सांसद  सदन में अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं और आवश्यकताओं के बारे में बोलने के लिए लालायित रहता है किंतु पार्टी द्वारा बहिर्गमन किए जाने के कारण उसका वह अवसर छिन जाता है। अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए कांग्रेस ने असम के सांसद गौरव गोगोई को अवसर देकर सही कदम उठाया था क्योंकि वे पूर्वोत्तर का प्रतिनिधित्व करते हैं ।  प्रधानमंत्री के भाषण के बाद श्री गोगोई उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों का समुचित जवाब दे सकते थे । लेकिन उनको पूरा सुने बिना ही विपक्ष उठकर चला गया। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि अविश्वास प्रस्ताव का सही लाभ विपक्ष नहीं ले सका। यदि वह सत्र के दौरान सदन को चलने देता तो उसे अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलता ,  जो वह गंवा बैठा।  इस लोकसभा के दो सत्र ही बाकी हैं। विपक्ष को चाहिए इनका पूरा - पूरा उपयोग करते हुए सरकार को घेरने की पुख्ता रणनीति बनाए। लोकसभा में उसका बहुमत भले न हो किंतु राज्यसभा में तो वह सत्ता पक्ष को झुका सकता है किंतु सही रणनीति के अभाव में यदि वह ऐसा नहीं कर पा रहा तो इसके लिए वही कसूरवार है। पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान से पूर्व ही सदन छोड़ देने के लिए विपक्ष की जो आलोचना की वह पूरी तरह सही है क्योंकि प्रस्ताव उसके द्वारा लाया गया था तब उसे आखिर तक सदन में रुकना था।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 10 August 2023

सिब्बल द्वारा कश्मीर में जनमत संग्रह जैसी दलील देशहित के विरुद्ध




कपिल सिब्बल देश के जाने माने वकील हैं। केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं । कांग्रेस में राहुल गांधी के नेतृत्व के विरुद्ध बने जी -23 नामक गुट में शामिल रहने के बाद पार्टी छोड़कर सपा के समर्थन से राज्य सभा में आ गए।  अयोध्या विवाद में वे मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता थे । कांग्रेस छोड़ने के बाद भी वे परोक्ष तौर पर ही सही किंतु उसकी मदद के लिए खड़े नजर आते हैं। हालांकि इन दिनों वे जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में   हो रही बहस के कारण चर्चा में हैं। हालांकि उनके द्वारा दी जा रही दलीलें उनके  पक्षकार की बात मानी जाएंगी  किंतु बतौर वरिष्ट राजनेता उनसे ये अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि ऐसी कोई बात न कहें जिससे देश के  हितों पर बुरा असर पड़ता हो।  श्री सिब्बल इस बात पर जोर दे रहे हैं कि धारा 370 को हटाना तो दूर रहा उसमें किसी भी प्रकार का संशोधन केवल संविधान सभा कर सकती है जो वर्तमान में अस्तित्वहीन है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली  संविधान पीठ में  शामिल कुछ न्यायाधीशों ने उक्त तर्क से असहमति व्यक्त कर दी किंतु गत दिवस श्री सिब्बल ने धारा 370 हटाए जाने के बारे में जब ब्रिटेन में यूरोपीय यूनियन से अलग होने के मुद्दे पर करवाए गए जनमत संग्रह (ब्रेक्जिट) जैसा तरीका अपनाए जाने की बात कही तब मुख्य न्यायाधीश डी. वाय.चंद्रचूड़ ने स्पष्ट शब्दों में इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि भारत में जनता की राय निर्धारित माध्यमों से जानने की प्रणाली स्थापित है। लेकिन इस दलील के जरिए श्री सिब्बल ने भारत की घोषित विदेश नीति के विरुद्ध बात कहने की वह गलती की जो आज तक किसी भी केंद्र सरकार या राजनीतिक दल द्वारा नहीं की गई। उल्लेखनीय है आजादी के बाद जब जम्मू कश्मीर का भारत में विलय हो गया तब पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी पर आक्रमण कर उसके एक हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया। बाद में विवाद संरासंघ पहुंचा जहां तत्कालीन नेहरू सरकार  इस बात पर सहमत हो गई कि जम्मू कश्मीर किसके साथ रहेगा इसका फैसला वहां की जनता की राय पूछकर किया जावेगा। शर्त ये रखी गई  कि पहले पाकिस्तान उसके कब्जे वाले हिस्से को खाली करे।  चूंकि उसने कब्जे वाला क्षेत्र खाली नहीं किया लिहाजा जनमत संग्रह की स्थिति  उत्पन्न नहीं हुई । बाद में संरासंघ ने  इस मामले को भारत - पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला मानकर अपनी भूमिका समाप्त कर ली। लेकिन कश्मीर के  तमाम अलगाववादी संगठन  आज भी उसकी रट लगाते हैं। हुर्रियत नेता सैयद अली शाह जिलानी तो जब तक जिंदा रहे तब तक केंद्र सरकार के साथ बातचीत की किसी भी पेशकश में ये कहते हुए पेच फसाते रहे कि बिना पाकिस्तान को शरीक किए बातचीत का कोई मतलब नहीं । पाकिस्तान के साथ  घाटी के लगभग सभी नेता इस बात की जिद पकड़े रहे कि जम्मू कश्मीर के भविष्य का फैसला संरासंघ के निर्देशन में  जनमत संग्रह से करवाया जावे। एक जमाना था जब अमेरिका और ब्रिटेन भी पाकिस्तान की हां में हां मिलाया करते थे किंतु धीरे - धीरे वैश्विक परिस्थितियां बदलती गईं । शीतयुद्ध की जगह बाजारवाद ने ले ली जिससे कूटनीतिक परिदृश्य भी बदला  । आज की दुनिया में भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक शक्ति के साथ विशाल उपभोक्ता बाजार के कारण चीन को छोड़कर बाकी प्रमुख देशों का नजरिया हमारे प्रति नर्म हुआ है। यहां तक कि इक्का - दुक्का के अलावा अधिकांश मुस्लिम देश तक भारत से दोस्ती करने के प्रति आकर्षित हैं। ऐसे में  श्री सिब्बल ने धारा 370 हटाए जाने के लिए राज्य की जनता से उसकी राय पूछे जाने  की जो दलील सर्वोच्च न्यायालय में  दी वह अलगाववादी ताकतों के साथ ही हमारे शत्रु राष्ट्रों  के हाथ में हथियार देने जैसा है। श्री सिब्बल अपने पक्षकार के हक में पेशेवर योग्यता , अनुभव और क्षमता का परिचय दें इसमें किसी को एतराज नहीं होगा किंतु बतौर सांसद उन्होंने देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने की जो शपथ ली उसका पालन करना भी उनका कर्तव्य है। और इसके लिए जरूरी है वे ऐसी कोई बात किसी भी मंच पर न कहें जिससे देश का अहित हो। जम्मू कश्मीर देश का अविभाज्य अंग है इसे लेकर किसी के मन में कोई भी संशय हो तो उसे निकाल देना चाहिए। 2014 के बाद से घाटी में जिस तरह  अलगाववाद पर प्रहार किया गया उसका सुपरिणाम लगातार बढ़ रहे पर्यटन के रूप में देखा जा सकता है। हुर्रियत जैसे संगठन  उपद्रव करवाने की क्षमता खो बैठे हैं। पत्थरबाजी बंद है और आतंकवादी  मारे जा रहे हैं। इसका एक कारण 370 का हटना भी है । ऐसे में ये तर्क अलगाववादी ताकतों को ताकत देने जैसा है कि जम्मू कश्मीर अन्य राज्यों जैसा नहीं है जिसका विभाजन संसद कर सके और ऐसा करने के पहले वहां के लोगों की राय पूछी जानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रचूड़ ने श्री सिब्बल की उक्त दलील को तत्काल अस्वीकार कर उन सभी को संदेश दे दिया जो कश्मीर में अलगाववाद की वापसी की उम्मीद लगाए बैठे हैं। धारा 370 को हटाए जाने के लिए संविधान सभा को पुनर्जीवित करने जैसा विचार भी मूर्खतापूर्ण  है।  संसद के पास देश के बारे में निर्णय करने का  अधिकार और शक्ति  उसी संविधान के अन्तर्गत है जो संविधान सभा द्वारा लागू किया गया था। धारा 370 के अमरत्व को लेकर संविधान पीठ के न्यायधीशों की टिप्पणियां भले ही  सांकेतिक हों किंतु वे काफी कुछ कह रही हैं जिसे श्री सिब्बल को समझना चाहिए। अपने पेशे के प्रति ईमानदारी अच्छी बात है किंतु जब बात देश की हो तब बाकी बातें महत्वहीन हो जाती हैं । 370 का हटना देश की अखंडता के लिए कितना जरूरी था ये बात अब बताने की जरूरत नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 9 August 2023

रोहिंग्या के आधार कार्ड बनाने वालों पर भी कड़ी कार्रवाई की जाए




हरियाणा के नूंह में हिंदुओं की धार्मिक यात्रा पर दूसरे समुदाय के लोगों द्वारा किए गए पथराव के कारण  अड़ोस - पड़ोस के अनेक जिलों तक दंगों की आग फैल गई । इनमें कुछ जिले राजस्थान के भी हैं , वहीं एनसीआर का हिस्सा बन चुका गुरुग्राम अभी तक अशांत हैं । नूंह जिस मेवात अंचल का हिस्सा है  वहां लगभग 90 फीसदी आबादी मेव मुसलमानों की है। दंगों के बाद उपद्रवियों की पहिचान कर उनके विरुद्ध  कार्रवाई शुरू की गई। जिसके अंतर्गत अनेक इमारतें गिराने के साथ अवैध रूप से बनाई गई झुग्गियां हटाई गईं । इसी दौरान ये पता  लगा कि मुस्लिम बहुलता का लाभ लेकर म्यांमार से आए रोहिंग्या मुसलमानों के तकरीबन 2000 परिवार वहां बस गए जिनमें से काफी लोगों के पास आधार कार्ड भी हैं ।  अब प्रश्न ये है कि विदेश से आकर अवैध रूप से यहां बस जाने वाले रोहिंग्या मुसलमानों को आधार कार्ड जैसा दस्तावेज किस तरह हासिल हुआ ? और इसका सीधा - सीधा उत्तर है भ्रष्ट व्यवस्था की मदद से । 1971 में  तत्कालीन पूर्व पाकिस्तान में गृहयुद्ध के कारण सीमा पार से बड़ी संख्या में शरणार्थी  भारत में घुस आए। तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने मानवीय आधार पर उनके रहने की व्यवस्था शिविरों में की। बाद में बांग्ला देश नामक मुल्क का उदय हुआ। तब तक करोड़ों बांग्ला देशी बतौर शरणार्थी आ चुके थे । जब सीमावर्ती राज्यों में समस्या हुई तब देश के भीतरी हिस्सों में  शिविर बनाकर उनकी व्यवस्था की गई। उम्मीद थी कि स्थितियां सामान्य होते ही वे  वापस चले जायेंगे किंतु  लौटना तो दूर  उल्टे उनका आना आज तक  जारी है । इसकी वजह से न सिर्फ असम , प.बंगाल ,  बिहार और उड़ीसा अपितु पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में जनसंख्या असंतुलन उत्पन्न हो गया।  देश के ज्यादातर हिस्सों में बांग्ला देशी मुसलमान स्थायी तौर पर बस चुके हैं। यहां जन्म लेने के कारण उनके बच्चे तो भारत के वैधानिक नागरिक हो ही गए किंतु जो बतौर शरणार्थी आए थे उनके भी नागरिकता संबंधी दस्तावेज बन जाने से   यह समस्या लाइलाज बन गई। इसके लिए  प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के साथ राजनीतिक नेताओं  की भूमिका भी जिम्मेदार कही जायेगी । जो  पार्टियां मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटी रहती हैं उनके लिए  बांग्ला देशी शरणार्थी  वोट बैंक बन गए। परिणामस्वरूप अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में वे ही जीत - हार तय करने की स्थिति में हैं।  जब भारत सरकार ने नागरिक रजिस्टर बनाने की मुहिम शुरू की और नागरिकता संशोधन कानून लागू करना चाहा तब देश के ज्यादातर राजनीतिक दल उसके विरोध में खड़े हो गए। दिल्ली दंगा और शाहीन बाग जैसा प्रयोग उसी से जुड़ा हुआ था। समय बीतने के साथ बांग्ला देश से आए शरणार्थियों को वापस भेजने की बात तो दूर,  म्यांमार (बर्मा) से रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ शुरू हो गई जो  धीरे - धीरे देश के अन्य हिस्सों से होते हुए  जम्मू - कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य तक जा पहुंचे। अपराधिक गतिविधियों के कारण  जब इनका विरोध शुरू हुआ तब जो तबका बांग्ला देशी मुस्लिमों को गोद में बिठाए रखने की वकालत करता रहा वही रोहिंग्या की तरफदारी में खड़ा हो गया । गौरतलब है  रोहिंग्या  को  म्यांमार सरकार ने बांग्ला देशी मानकर अपने देश से निकाल फेंका ,  वहीं बांग्ला देश भी उनको स्वीकार करने राजी नहीं। अपराधिक मानसिकता  के कारण वे बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं । यहां तक जानकारी  मिलने लगी है कि उनके संबंध आतंकवादी संगठनों से हैं। नूंह के दंगों से  ये बात साबित भी हो गई कि उनकी मौजूदगी देश की आंतरिक शांति और सुरक्षा के लिए स्थायी खतरा है। ऐसे में पता लगाने  वाली बात ये है कि प्रशासन में बैठे वे कौन लोग हैं जो चंद रुपयों की लालच में देश हित का सौदा कर लेते हैं? इसलिए ये जरूरी है कि राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोपों से ऊपर उठकर  ऐसे मामलों में सख्ती बरती जाए। नूंह दंगों की जो जांच हो रही है उसमें इस बात को भी जोड़ा जाए कि मेव मुसलमानों के साथ बस गए विदेश से आए रोहिंग्या मुसलमान आधार कार्ड जैसा दस्तावेज बनवाने में किस तरह कामयाब हो गए। देश की राजधानी से बेहद निकट किसी इलाके में यदि घुसपैठियों को आबाद होने में इतनी छूट है तब बाकी क्षेत्रों के बारे में क्या कहा जाए ,  ये विचारणीय प्रश्न है। बिहार से भी ऐसी खबरें आने लगी हैं । देश में अवैध रूप से आए विदेशी नागरिकों को सरकारी दस्तावेज प्रदान कर नागरिक होने का प्रमाणपत्र देने वाली सरकारी मशीनरी पर भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 8 August 2023

सादगी का उपदेश देने वाले भी तो वीआईपी संस्कृति से दूर रहें




मुरारी बापू देश की अत्यंत सम्माननीय आध्यात्मिक विभूति हैं। उनके द्वारा की जाने वाली कथाओं को सुनने जनसैलाब उमड़ता है। बड़े ही सरल और सहज व्यक्ति होने से उनके संपर्कों का दायरा विश्वव्यापी है। श्रावण माह में वे दो विशेष रेलगाड़ी लेकर भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने निकले । उनके साथ सैकड़ों सेवक और भक्त भी रहे । इसी दौरान गत सप्ताह वे महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु उज्जैन आए थे। इस अवसर पर उन्होंने मंदिरों में वीआईपी संस्कृति खत्म करने की बात कहते हुए साधारण जनता को प्राथमिकता देने का सुझाव देकर जनभावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान की। निश्चित रूप से भगवान के दरबार कहे जाने वाले मंदिरों में अतिविशिष्ट लोगों के आने से वहां घंटों पहले से पंक्ति में खड़े आम श्रद्धालु परेशान होते हैं और उनको गुस्सा भी आता है। उस दृष्टि से बापू के विचार स्वागत योग्य भी हैं और अनुकरणीय भी। लेकिन जिस वीआईपी संस्कृति का जिक्र उन्होंने छेड़ा वह केवल नेताओं , नौकरशाहों और धनकुबेरों तक ही सीमित नहीं रही। अपितु धर्म और आध्यात्म से जुड़ी हस्तियां भी इसके आकर्षण से ग्रसित हैं । एक समय था जब धार्मिक आयोजन कम से कम खर्च में संपन्न होते थे । प्रवचन करने करने वाले भी धर्म प्रचार की भावना से सहज आमंत्रण पर आ जाया करते थे। उनके आने - जाने , रहने , भोजन इत्यादि पर भी बहुत व्यय नहीं होता था। आयोजन स्थल पर भी साधारण व्यवस्था ही पर्याप्त होती थी। लेकिन आजकल वह सब कल्पनातीत होता जा रहा है। इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि मंदिर ही नहीं अपितु जहां कहीं भी धार्मिक अनुष्ठान होता है वहां वीआईपी संस्कृति का बोलबाला होता है। आजकल जहां देखो कोई न कोई बड़ा धार्मिक आयोजन होता दिखता है, जिसके प्रचार - प्रसार पर ही लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं। पंडाल और मंच की साज - सज्जा भी इतनी भव्य होती है कि साधारण व्यक्ति तो वैसा करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। जो आध्यात्मिक विभूतियां इन आयोजनों में प्रवचन देने आती हैं उनमें से ज्यादातर के साथ किसी फिल्मी सितारे सरीखा तामझाम जुड़ा है। उनकी आवास व्यवस्था पर ही बेतहाशा खर्च होता है। और अब तो एक नया चलन शुरू हो गया है। जिस प्रवचन कर्ता को बुलाया जाता है उसकी अपनी पंडाल , मंच सज्जा और टीवी पर प्रसारण की व्यवस्था है । जिसके लिए भारी - भरकम अग्रिम भुगतान करना होता है। कुल मिलाकर दूसरों को सादगी और त्याग का उपदेश देने वाले जिस तरह के महंगे आयोजन को प्रोत्साहन देने लगे हैं उस वजह से साधारण व्यक्ति तो किसी कोने में जगह पा जाने पर खुद को धन्य समझता है क्योंकि आगे के स्थान तो वीआईपी से ही भरे होते हैं । और उनमें भी ज्यादातर वे लोग होते हैं जिन्हें प्रवचन से ज्यादा रुचि अपनी हैसियत और रुतबे के प्रदर्शन में होती है। खुद बापू की कथा का आयोजन भी सुपर वीआईपी हो चला है। गत दिवस समाप्त हुई उनकी उक्त यात्रा जिस रेलगाड़ी से हुई वह विशेष तौर पर रेलवे ने तैयार करवाई जिसमें पांच सितारा होटल जैसी सुविधाएं उपलब्ध रहीं। हालांकि बापू का खुद का रहन - सहन बेहद सादा है। आम जनों से वे सरलता से मिलते हैं किंतु जिस वीआईपी संस्कृति से मंदिरों को मुक्त करने की बात उन्होंने कही उससे धर्म और आध्यात्मिक क्षेत्र से जुड़े माननीय महानुभावों को दूर रखना भी समय की मांग है। कई बार ये लगने लगता है धर्म के क्षेत्र में भी बाजारवाद घुस चुका है। नव धनाढ्यों और राजनेताओं की निकटता ने साधु , सन्यासियों को भी प्रभावित कर लिया है। ऐसे में मंदिरों के भीतर वीआईपी संस्कृति समाप्त करने मात्र से काम नहीं चलने वाला। दर्शन हेतु टिकिट जैसी व्यवस्था भी कई बार अखरती है । हालांकि उसकी वजह से व्यवस्था में सहयोग भी मिलता है। लेकिन आध्यात्म के क्षेत्र में पनप रही व्यवसायिक प्रवृत्ति निश्चित रूप से मन को कचोटती है। ये कहना भी गलत न होगा कि धर्म के नाम पर होने वाली अवांछित गतिविधियों के पीछे भी आर्थिक चकाचौंध ही है । अच्छा हो बापू जैसे व्यक्ति इस बारे में आगे आकर धार्मिक आयोजनों को ईवेंट मैनेजमेंट का हिस्सा बनने से रोकने का अभियान चलाएं। इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि चार्टर्ड विमान और महंगी कारों में चलने वाले महात्मा जब सादा जीवन , उच्च विचार का उपदेश देते हैं तो श्रोताओं पर उनका अपेक्षित असर नहीं होता। चूंकि ये बेहद सम्वेदनशील विषय है इसलिए अच्छा तो यही होगा कि वरिष्ट संत - महात्मा , विशेष रूप से शंकराचार्य इस बारे में आचार संहिता बनाएं ।

- रवीन्द्र वाजपेयी