Saturday, 19 August 2023

चुनाव के समय ऐसे आरोप अर्थहीन : कमलनाथ अवसर का लाभ लेने में चूक गए



म.प्र में कांग्रेस द्वारा शिवराज सरकार के कथित घोटालों की जो सूची बड़े ही तामझाम के साथ जारी की उस पर भाजपा की जवाबी प्रतिक्रिया काफी जोरदार है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णुदत शर्मा ने भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ पर तीखे हमले करते हुए उन्हें करप्शन नाथ कहकर संबोधित किया । उल्लेखनीय है अपनी पिछली म.प्र यात्रा के दौरान इंदौर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी श्री नाथ के लिए उक्त संबोधन का उपयोग किया था। वैसे भी  आरोपों की प्रामाणिकता संदिग्ध है। और इसीलिए भाजपा ने बिना देर किए कमलनाथ पर सीधा निशाना साधते हुए 1984 के सिख विरोधी दंगों में उनकी भूमिका का उल्लेख कर दिया जो  उनके  साथ ही समूची कांग्रेस की दुखती रग  है । जहां तक बात घोटालों को उजागर करने की है तो ये विपक्ष का कर्तव्य है लेकिन कमलनाथ और उनकी टीम ने जो समय इसके लिए चुना उससे लग रहा है कि कांग्रेस केवल चुनावी लाभ लेने के लिए घोटालों का ढोल पीट रही है। यदि उसके पास वाकई ठोस प्रमाण हैं तब उसे लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान जैसी एजेंसियों के पास शिकायत दर्ज करवाना चाहिए थी। इसके साथ ही वह न्यायपालिका का सहारा भी ले सकती थी। 2003 में दिग्विजय सिंह की सत्ता को जनता ने  हटाया था जिन्हें मिस्टर बंटाधार के नाम से जाना जाता था। उनके दस वर्षीय शासनकाल में म.प्र में सड़कों की हालत बद से बदतर हो गई थी। पूरा प्रदेश बिजली संकट से जूझ रहा था। 2003 के बाद 2018 में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में आई थी किंतु अपनी आंतरिक कलह से उसके विधायक ही उसका साथ छोड़ गए जिससे मात्र 15 महीने में ही कमलनाथ की कुर्सी छिन गई । उस अल्पावधि में जिस व्यापक पैमाने पर तबादले किया गए उनमें भी जबरदस्त भ्रष्टाचार के आरोप लगे । और इसीलिए प्रदेश की जनता ने कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। कमलनाथ मामूली अंतर से विधानसभा उपचुनाव जीत सके वहीं लोकसभा  सीट पर  उनका बेटा नकुल नाथ भी फीकी जीत दर्ज कर पाया और वह भी इसलिए कि नरेंद्र मोदी की सभा छिंदवाड़ा में नहीं हो सकी थी। हवा का रुख समझकर ही कांग्रेस का एक धड़ा ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उससे अलग हो गया और वह सरकार धराशायी हो गई। उसके बाद से ही श्री नाथ दोबारा सत्ता में आने के लिए बेचैन हैं।  लंबे समय तक वे नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष दोनों बने रहे। जब पार्टी के भीतर ही उनका विरोध होने लगा तो अध्यक्ष का पद रखते हुए दिग्विजय सिंह के खासमखास डा.गोविंद सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनवा दिया। बावजूद इसके प्रदेश कांग्रेस में उनके नेतृत्व को लेकर असंतोष सतह पर उतराता रहता है। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने बिना पार्टी की सहमति लिए ही स्वयं को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश  कर दिया जिससे पार्टी के भीतर नाराजगी है। हाल ही में आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग भी उठाई गई जिसके पीछे श्री नाथ विरोधी गुट बताया जाता है। इस सबसे बचने के लिए ही उन्होंने प्रदेश सरकार के विरुद्ध आरोपों का पिटारा खोलने का दांव चला । लेकिन विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के बाद इस तरह के पैंतरे विश्वसनीय नहीं माने जाते। सही बात तो ये है कि महज 15 महीने छोड़कर म.प्र  में कांग्रेस बीते लगभग दो दशक से विपक्ष में है । लेकिन जैसा संसद में दिखाई देता है ठीक उसी तरह प्रदेश में भी वह विरोधी दल की भूमिका का निर्वहन ठीक तरह से नहीं कर सकी। विधानसभा के सत्रों में वह सरकार को घेर सकती थी किंतु हंगामा और बहिर्गमन उसकी आदत में शुमार हो जाने के कारण वह सदन का समुचित उपयोग नहीं कर पाई । इसका प्रमाण ये है कि बीते दो दशकों में  विधानसभा का शायद ही कोई सत्र पूरी अवधि तक चल पाया हो। कुछ तो हफ्ते भर भी नहीं चले। ऐसे में श्री नाथ द्वारा गत दिवस जो आरोप प्रदेश सरकार पर लगाए गए वे एक दो दिन तक अखबारी पन्नों में नजर आने के बाद भुला दिए जायेंगे ।  हालांकि ये मान लेना तो अतिशयोक्ति होगा कि  भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त हो चुका है। लेकिन उसको रोकने के लिए  संबंधित एजेंसियां जिस तरह से सक्रिय हैं वैसा कांग्रेस राज में कभी नहीं देखा गया। लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान द्वारा जिस बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचारियों को पकड़ा गया वह इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने का प्रयास सरकारी स्तर पर चल रहा है। कमलनाथ और उनकी पार्टी  विधानसभा चुनाव के ठीक पहले घोटालों की जो सूची लेकर आई उन पर मतदाताओं का ध्यान इसलिए नहीं जायेगा क्योंकि उसका उद्देश्य भ्रष्टाचार का विरोध न होकर चुनावी लाभ लेने की कोशिश ही है। वहीं भाजपा ने भी तत्काल ढेर सारे तीर छोड़कर आक्रमण ही सबसे अच्छी सुरक्षा की नीति अपना ली। दरअसल कमलनाथ को 15 महीने तक बतौर मुख्यमंत्री पार्टी की छवि सुधारने का जो अवसर मिला उसे उन्होंने गंवा दिया। इसी कारण न वे अपनी विश्वसनीयता बना सके और न ही कांग्रेस की।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 18 August 2023

गुलाम नबी को अब समझ में आया कि मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू थे




हालांकि वे पहले भी कह चुके हैं कि 600 वर्ष पूर्व इस देश में सभी हिन्दू थे। लेकिन जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री के अलावा केंद्र सरकार में लंबे  समय तक मंत्री रहे गुलाम नबी आजाद द्वारा वर्तमान हालातों में अपनी उक्त बात दोहराया जाना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने ये भी कहा कि कश्मीर में जितने मुसलमान हैं वे सैकड़ों वर्ष पहले पंडित ही थे। हाल ही में डोडा में दिए उनके भाषण का जो वीडियो सामने आया उसमें उन्हें ये कहते सुना जा रहा है कि हिन्दू धर्म इस्लाम से बहुत पुराना है। भारत में रहने वाले मुसलमान  इसी देश में जन्मे हैं। 1500 साल पहले इस्लाम के आने तक कोई मुसलमान था ही नहीं। इसी आशय का बयान नेशनल कांफ्रेंस के नेता डा.फारुख अब्दुल्ला भी  देते रहे हैं जिनके मुख्यमंत्री काल में  कश्मीर घाटी के हिंदू कश्मीरी पंडितों के साथ वही सब हुआ जो देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान से जान बचाकर आए सिंधी और पंजाबी हिंदुओं के साथ घटा था। आज फारुख कहते हैं कि बिना पंडितों के कश्मीर अधूरा है । यद्यपि  उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला भी मुख्यमंत्री बने किंतु दोनों ने  पंडितों की वापसी के लिए सिवाय घड़ियाली आंसू बहाने कुछ नहीं किया।  श्री आजाद भी राज्य और केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे किंतु तब उनके श्रीमुख से ऐसे  वचन शायद ही किसी ने सुने हों। जाहिर है ये सब निकट भविष्य में होने वाले   विधानसभा  चुनाव को देखते हुए कहा जा रहा है।  गुलाम नबी जम्मू क्षेत्र के रहने वाले हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद वहीं से विधायक बने । महाराष्ट्र से कांग्रेस ने उन्हें एक -  दो बार जितवाया और बाकी समय  राज्यसभा में रहे। दो साल पहले जब वह रास्ता बंद हुआ तो पार्टी छोड़ अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाकर बैठ गए। कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं तो कभी विरोध। हाल ही में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के पहले विपक्ष के बहिर्गमन की तो उन्होंने आलोचना की किंतु अगले ही दिन धारा 370 हटाए जाने को भी गलत ठहरा दिया। दरअसल श्री आजाद और उनकी तरह ही  डा.अब्दुल्ला भी अपने पूर्वजों के हिन्दू होने की बात कहकर जम्मू अंचल में भावनात्मक दृष्टि से असर जमाना चाहते हैं क्योंकि नये  परिसीमन के बाद  घाटी का  वर्चस्व पहले जैसा नहीं रह सकेगा। लेकिन वे  धारा 370 को हटाए जाने का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उसके रहते जम्मू - कश्मीर की मुस्लिम पहिचान बनी हुई थी और हिन्दू समुदाय की स्थिति दांतों के बीच जीभ के समान थी। 370 हटने के बाद घाटी में जुमे की नमाज के बाद पाकिस्तान का झंडा लहराते हुए जुलूस बंद हो गया।   बीते 4 सालों में घाटी में पर्यटकों की रिकॉर्ड आवाजाही के अलावा भी अन्य बातें हैं जो 370  के खात्मे को सही साबित करती  हैं। ऐसे में यदि श्री आजाद जब कश्मीर  के सभी मुसलमानों को मूलतः हिन्दू बताते हैं तब उन्हें धारा 370 हटाए जाने का विरोध बंद करने के साथ ही इस्लाम के नाम पर जो कट्टरता है उसके विरुद्ध उसी तरह मुखर होना चाहिए जिस तरह केरल के राज्यपाल आरिफ मो.खान हैं। यदि वे दिल  से ये बात स्वीकार कर रहे हैं कि हिन्दू धर्म इस्लाम से बहुत पुराना है और देश में रह रहे सभी मुसलमान सैकड़ों वर्ष पहले उनके हिन्दू पूर्वजों द्वारा इस्लाम स्वीकार किए जाने के कारण मुस्लिम बने , तब उन्हें यही बातें कश्मीर से बाहर निकलकर मुस्लिम संगठनों पर काबिज मौलवियों को समझाने के साथ ही समान नागरिक संहिता ,   नागरिकता संशोधन कानून , राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे मसलों पर भी रचनात्मक विचारों के  साथ आगे आना चाहिए । वर्तमान में वाराणसी में ज्ञानवापी का जो विवाद चर्चाओं में है उसके संदर्भ में भी यदि वे  मुस्लिम पक्ष को ये समझाएं कि उन्हें हिंदुओं की आस्था के प्राचीन केंद्रों पर मुगल काल में किए गए अवैध कब्जे  से हट जाना चाहिए , तब उनके संदर्भित बयान में ईमानदारी समझी जा सकती है । वे चाहें तो डा.अब्दुल्ला के साथ पूरे देश में घूम -घूमकर मुस्लिम समुदाय को ये समझा सकते हैं कि  वे  इंडोनेशिया से प्रेरणा लें जो पूरी तरह इस्लामिक देश होने के बाद भी अपने पूर्वजों की हिन्दू संस्कृति और उसकी परंपराओं को सहेजे हुए है।  दरअसल श्री आजाद का उनके अपने राज्य में कोई जनाधार नहीं है। वहीं अब्दुल्ला खानदान का प्रभाव भी ढलान पर है। ऐसे में इनका ये कहना कि हमारी जड़ें हिन्दू धर्म के साथ जुड़ी हुई हैं , महज दिखावा है। वरना ये धारा 370 को हटाए जाने का स्वागत करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे संगठनों को भी  समझाते कि समान नागरिक संहिता और नागरिकता संशोधन विधेयक मुसलमानों के मुख्यधारा में शामिल होने का शानदार जरिया हो सकते हैं ।  हालांकि वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि जिस तरह धर्मनिरपेक्षता का ढोंग रचने वाले दलों का मुस्लिम प्रेम भी स्वार्थों पर आधारित है ठीक उसी तरह गुलाम नबी द्वारा भारतीय मुसलमानों के पुरखों के हिन्दू होने जैसी बात  कहा जाना भी शुद्ध अवसरवाद है। सवाल ये है कि जिंदगी का बड़ा हिस्सा गांधी परिवार के दरबारी बनकर गुजारने के बाद  उनके ज्ञान चक्षु क्यों खुल गए ? यहां तक कि जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने कभी ये कहने का साहस नहीं दिखाया कि कश्मीर के सभी मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे। उल्लेखनीय है कि जब यही बात रास्वसंघ के सरसंघचालक डा.मोहन भागवत और डा. सुब्रमण्यम स्वामी कहते थे तो धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार आसमान सिर पर उठा लिया करते थे।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 17 August 2023

पहाड़ों को भी शांति और आराम की जरूरत है




पहाड़ों को हौसलों का प्रतीक कहा जाता है। उनकी चोटी तक पहुंचने की इच्छा पर्वतारोहियों के अलावा रोमांच प्रेमी पर्यटकों में भी देखी जाती है। अनेक धार्मिक स्थल पहाड़ों में स्थित होने से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। ग्रीष्म काल में मैदानी इलाके के तापमान से बचने पहाड़ों पर बसे हिल स्टेशनों में भी सैलानियों की भीड़ नजर आती है। प्रकृति प्रेमियों , साहित्यकारों , कलाकारों और छायाकारों में  भी पहाड़ों के प्रति दीवानगी होती है। कोलाहल से दूर किसी पर्वतीय स्थल पर कुछ दिन व्यतीत करना  मानसिक शांति के साथ - साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक माना जाता है। एक समय था जब पहाड़ों में ऋषि - मुनि तपस्या करने जाते थे। जड़ी - बूटियों के खजाने भी पर्वतीय क्षेत्रों में होते थे। और फिर हिमालय से सदा नीरा बड़ी - बड़ी नदियां निकलती हैं। कश्मीर घाटी में बसे श्रीनगर में मुगल बादशाहों द्वारा विकसित उद्यान पर्यटकों से भरे रहते हैं। लद्दाख और अरुणाचल  के भव्य बौद्ध मठ भी पर्वतों के धार्मिक महत्व को साबित करते हैं। ब्रिटिश राज में देश भर में हिल स्टेशन के रूप में पर्वतीय क्षेत्रों का विकास हुआ । वहां तक जाने के लिए  सड़कें और रेल मार्ग भी बने। शिमला को तो अंग्रेजों ने देश के ग्रीष्मकालीन राजधानी बना रखा था। हालांकि आजादी के बाद भी पर्यटन केंद्रों के रूप में तीर्थस्थलों के अलावा अन्य पर्वतीय स्थानों को विकसित किया गया। गौरतलब है बीते कुछ दशकों में मध्यमवर्गीय पर्यटक बढ़ने से पर्वतीय क्षेत्रों में बेतहाशा भीड़ होने लगी है। विकास के तौर पर  सड़कों और पुलों आदि का निर्माण भी बड़ी मात्रा हुआ जिनके  लिए वृक्षों की कटाई और पहाड़ों की छटाई भी व्यापक तौर पर की गई । उत्तराखंड में टिहरी बांध जैसी परियोजना भी बनी । पनबिजली संयंत्रों के लिए नदियों के पानी को घुमाने सुरंगें बनाई गईं। इन सबका दुष्परिणाम धीरे - धीरे आने लगा । भूस्खलन , भूकंप , ग्लेशियरों का सिकुड़ना  आदि लक्षणों के जरिए प्रकृति ने चेतावनी देने का क्रम जारी रखा किंतु विवेकहीन विकास के साथ ही आमोद - प्रमोद के उद्देश्य से किए जाने वाले पर्यटन ने उन संकेतों के प्रति उपेक्षाभाव प्रदर्शित किया । यही कारण है कि  उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जिन क्षेत्रों में मानवीय आवाजाही ज्यादा होती  हैं वहां पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया । पर्वतों  को क्षति पहुंचाए जाने से उनकी आधारभूत संरचना को जो नुकसान हुआ उसकी वजह से  प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं। ताजा उदाहरण हिमाचल का है जहां कुछ दिनों के भीतर ही सैकड़ों लोग  जान गंवा बैठे। उत्तराखंड में भी पहाड़ों के धसकने की घटनाएं लगातार सुनाई दे रही हैं। यद्यपि इस साल अति वृष्टि को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।लेकिन  ये बात भी स्वीकार करनी होगी कि पहाड़ों को भीतर से कमजोर कर दिए जाने के कारण ही अब वे अति वृष्टि अथवा भूकंप के मामूली झटके झेलने में असमर्थ होते जा रहे हैं। ये देखते हुए हिमाचल की मौजूदा स्थिति को तात्कालिक संकट मान लेना बड़ी भूल होगी। यही स्थिति उत्तराखंड की है। वहां भी चार धाम यात्रा में जिस तरह रुकावट आती रही वह इस बात को इंगित करती है कि पहाड़ पर मानवीय गतिविधियों का बोझ कम किया जाना चाहिए। वाहनों की आवाजाही सुलभ करने के लिए बनाई गई  बारहमासी सड़कें भी भूस्खलन के कारण बार - बार अवरुद्ध हो जाती हैं। इन्हें बनाने में भले ही कितनी  भी तकनीकी कुशलता दिखाई गई किंतु ये भूल जाना निरी मूर्खता है कि प्रकृति को बांधकर रखा जा सकता है। बीते वर्ष अमरनाथ में जल सैलाब आया था। केदारनाथ में हो चुकी त्रासदी के दंश तो आज तलक ताजा हैं। दुख इस बात का है कि हर दुर्घटना के बाद प्रकृति और पर्यावरण  सुरक्षा की बातें तो बहुत होती हैं लेकिन जो सुधार होना चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता । सही बात तो ये है कि पहाड़ों को भी शांति के साथ आराम चाहिए। हम अपने आनंद के लिए उनके निकट जाते हैं किंतु अपने गैर जिम्मेदाराना आचरण के चलते उन्हें दुखी कर आते हैं। इसी कारण  उनकी सहनशक्ति जवाब देने लगी है। कभी - कभी तो लगता है कोरोना काल के दौरान देश भर में लगाए गए लॉक डाउन की तरह साल में कुछ समय तक वहां भी आवाजाही पर नियंत्रण लगाया जावे। उत्तराखंड में स्थित तीर्थस्थलों के साथ हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के पर्यटन स्थलों में भी  तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या सीमित करना जरूरी हो गया है। उल्लेखनीय है लद्दाख में बीते कुछ दशकों के भीतर जिस तरह से  पर्यटकों की भीड़ उमड़ रही है और लेह से आगे जाकर नुब्रा घाटी जैसे इलाकों तक सैलानी जाने लगे हैं उसकी वजह से वहां के जिम्मेदार लोग चिंतित हैं। उत्तराखंड की स्थिति तो ये है कि पहाड़ों के बदलते मौसम और बिगड़ते मिजाज  के चलते बड़ी संख्या में गांव खाली होते जा रहे हैं। स्थिति और न बिगड़े इस हेतु गंभीर चिंतन आवश्यक है। बेहतर हो बिना समय गंवाए  पहाड़ों के क्रोध को शांत करने का उपाय तलाश लिया जाए वरना जिन मुसीबतों से हिमाचल प्रदेश इन दिनों जूझ रहा है वैसी ही समूचे हिमालय क्षेत्र में नजर आएगी जिससे होने वाली तबाही की कल्पना ही भयभीत कर देती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 15 August 2023

अटल जी जैसा निर्विवाद और निष्कलंक नेता दुर्लभ



आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की  पुण्य तिथि है | आजाद भारत में एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र  थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल हुई |  नेहरू जी और इंदिरा जी तो सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनका सम्मान प्रधानमन्त्री से कम नहीं था | इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीति थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें उनसे पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही सादगी से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | 

विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुआ लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि दी वह आज भी उद्धृत की जाती  है | नेहरू जी ने उनकी तेजस्विता को भांपते हुए ही भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | 

हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में उनके  विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी  वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान अर्जित करने का उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि  व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह लिया करती थीं  |

आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - 
बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने , 
तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - 
कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  
खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें ,
कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | 

और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चूका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

उन्हें गये पांच वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |

चित्र:-1996 में जबलपुर के पत्रकारों के साथ अटल जी का यादगार चित्र।

 - आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी


देश हमें देता है सब कुछ , हम भी तो कुछ देना सीखें



आज देश स्वाधीनता की वर्षगांठ मना रहा है। राजधानी दिल्ली से लेकर सुदूर क्षेत्रों तक में उत्सव का माहौल है। सब्जी के ठेले और रिक्शे तक पर लगे तिरंगे को देखकर देशवासियों के मन में इस राष्ट्रीय पर्व के प्रति लगाव परिलक्षित होता है। इसमें दो मत नहीं है कि बीते 76 वर्ष के कालखंड में अनेकानेक समस्याओं से जूझते हुए भी देश आगे बढ़ा है। हालांकि ये भी उतना ही सच है कि इस दौरान जितना हमें हासिल कर लेना चाहिए था उतना नहीं हो सका , जिसका प्रमुख कारण हमारी राजनीतिक व्यवस्था का सत्ता केंद्रित होकर रह जाना है । यद्यपि राजनीति के क्षेत्र में कार्य करने वाला छोटा कार्यकर्ता  हो या नेता , सभी की इच्छा सत्ता सुख प्राप्त करने की होती है । जो राजनीतिक दल वैचारिक आधार पर राजनीति करते हैं वे भी किसी न किसी तरह सत्ता प्राप्ति में लगे रहते हैं । लेकिन इस सोच का दुष्परिणाम ये हुआ कि राजनीतिक दलों की पूरी कार्यप्रणाली देश हित की बजाय किसी न किसी तरह से सरकार बना लेने पर आकर केंद्रित हो गई। आजादी के बाद जब कांग्रेस को देश की बागडोर मिली तब उसके लिए चुनौतीविहीन  स्थिति थी। पंडित  नेहरू का कद आसमान छूता था। उनकी गलतियों को जनता नजरंदाज कर देती थी। आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने की जो पुण्यायी कांग्रेस के पास थी उसकी बदौलत वह पहला , दूसरा और तीसरा आम चुनाव आसानी से जीत गई। उस दौरान देश का विकास भी हुआ । लेकिन नेहरू जी स्वप्नदृष्टा तो बहुत अच्छे थे किंतु सपनों को साकार करने की उनकी प्रतिबद्धता उस लिहाज से कमतर होने से वे अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सके। देश को पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए विकास की राह पर ले जाने में उनका योगदान निश्चित तौर पर यादगार है किंतु पहले पाकिस्तान द्वारा कश्मीर का बड़ा हिस्सा हड़प लेने और फिर चीन द्वारा 1962 में हजारों वर्ग किमी भूमि पर कब्जा कर लेने के कारण वे एक कमजोर प्रधानमंत्री साबित होने लगे। ये कहना गलत न होगा कि 1964 में उनकी मृत्यु न हुई होती तो 1967 में वे कांग्रेस को चुनाव न जिता पाते। यद्यपि उन्होंने भारत को विश्व बिरादरी में पहिचान तो दिलाई किंतु उनका जरूरत से ज्यादा आदर्शवाद देश के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। और फिर  लोकतांत्रिक छवि के बावजूद वे अपनी पारिवारिक श्रेष्ठता का मोह न छोड़ सके और बेटी इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने के बाद उनकी जिद पर केरल की नंबूदरीपाद सरकार को बेवजह भंग करवा दिया , जो कि दुनिया की पहली चुनी हुई साम्यवादी सरकार थी। बावजूद इसके कि नेहरू जी सोवियत संघ और चीन की  साम्यवादी शासन व्यवस्था से बेहद प्रेरित और प्रभावित थे। इंदिरा जी को कांग्रेस में स्थापित करने का जो कार्य उन्होंने किया उसने देश में परिवारवाद की नींव रख दी जो कालांतर में बढ़ते - बढ़ते भारतीय राजनीति की पहिचान बन गया । और यही कारण है कि राजनेताओं का पूरा चिंतन सामंतवादी होकर रह गया । देश और जनता की बेहतरी के बजाय अपने परिवार के उत्थान की चिंता ने राजनीति को ऐसे  रास्ते पर धकेल दिया जो केवल और केवल स्वार्थ सिद्धि की ओर ले जाता है। आज स्वाधीनता दिवस पर देश की मौजूदा स्थिति पर नजर डालने पर ये महसूस होता है कि राजनीति के क्षेत्र में जिस तरह से सामंतवाद अपने पैर जमाता दिख रहा है उसके कारण अब बात देश और जनता की बजाय उन चंद नेताओं के मान - अपमान पर आकर सिमट जाती है जो खुद को इस देश का मालिक समझ बैठे हैं। इनको न कानून का ख्याल है और न ही लोकतांत्रिक मर्यादाओं का । आजादी के बाद देश में मौजूद 500 से अधिक रियासतों का भले विलय हो गया किंतु राजनीतिक दलों के जरिए जिस नव सामंतवाद ने समूचे परिदृश्य पर आधिपत्य कर लिया वह ज्यादा खतरनाक है। कुछ महीनों के बाद देश में लोकसभा चुनाव होंगे। विभिन्न राजनीतिक दल उसके लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं। मोर्चेबंदी के तहत गठबंधनों को शक्ल दी जा रही है । लेकिन दुर्भाग्य इस बात का है कि चुनाव जीतने के लिए देश की छवि धूमिल करने का प्रयास संसद से सड़क तक किया जा रहा है। 21 वीं सदी के प्रारंभिक दो दशकों में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है । इसके लिए किसी एक नेता या राजनीतिक दल को श्रेय भले न दें किंतु देश ने जो हासिल किया है उस पर गौरव करना तो अपेक्षित है ही। देश में रहकर अच्छी शिक्षा हासिल करने के बाद ये कहकर विदेश चले जाना कि यहां रखा ही क्या है , एक तरह की एहसान फरामोशी ही है। इसी तरह जब  दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत में कारोबार करने आकर्षित हो रही हों तब कुछ धनकुबेरों के देश छोड़कर अन्यत्र बस जाने पर भविष्य का  निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करना भी बेहद गैर जिम्मेदाराना कृत्य है। आजादी की वर्षगांठ पर सोशल मीडिया के करिए केवल शुभकामनाएं और बधाई देने - लेने के कर्मकांड से ऊपर उठकर हमें देश के बारे में सकारात्मक सोच का प्रसार करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होना चाहिए ।  जब हम भारत को मां मानते हैं तब  उसी रूप में उसे सम्मान भी देना चाहिए। आज का अवसर केवल उत्सव तक सीमित नहीं है। देश जिस मोड़ पर है उसमें हर नागरिक को अपने दायित्व के प्रति गंभीर होना पड़ेगा। यदि विकास की दौड़ में हम किसी भी क्षेत्र में पीछे हैं तो इसके लिए कुछ जिम्मेदारी हमारी भी है।  अधिकारों के प्रति जागरूकता अच्छी बात है किंतु कर्तव्य बोध उससे अधिक महत्वपूर्ण है। आज चुनाव जीतने के लिए जिस प्रकार खैरात बांटी जाती है उसके लिए बतौर मतदाता हमारी लालची प्रवृत्ति ही जिम्मेदार है। यदि सब कुछ ठीक  - ठाक चला तब कुछ दिनों के बाद ही हमारा यान चंद्रमा पर उतर जावेगा। ये भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी दक्षता का प्रमाण होगा । इसके अलावा भी देश में ऐसा बहुत कुछ है जिससे हमारा हौसला बुलंद होता है। आज के दिन ये संकल्प लें कि हम देश के प्रति नकारात्मक सोच को पूर्णतः तिलांजलि दे देंगे। और अपनी संतानों को भी ऐसी ही सोच रखने के लिए प्रेरित करेंगे। देश की उपलब्धियों पर हम सबका हक है तो उसकी कमियों को दूर करने की  जिम्मेदारी भी हमें उठाना होगी , इस भाव के साथ कि :-
देश हमें देता है सब कुछ , हम भी तो कुछ देना सीखें।

स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक बधाई।

- रवीन्द्र वाजपेयी 



Monday, 14 August 2023

दलबदल ने नेताओं की सैद्धांतिक पहिचान खत्म कर दी




दल बदलने की परंपरा कब शुरू हुई ये  कहना मुश्किल है । आजादी के पूर्व कांग्रेस ही प्रमुख थी किंतु स्वाधीनता के बाद अनेक  नेता  उससे अलग हो गए । कुछ ने नई पार्टी बनाई तो जयप्रकाश नारायण जैसे  राजनीति छोड़कर सर्वोदयी बन गए। समाजवादियों की बड़ी संख्या कांग्रेस छोड़ने के बाद प्रजा सोशलिस्ट  पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले जमा हुई। साम्यवादी पार्टी ,  मुस्लिम लीग और हिंदू  महासभा तो पहले से ही अस्तित्व में थीं। पहले आम चुनाव के पूर्व भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ। धीरे - धीरे समाजवादी नेताओं में भी मतभेद उभरे । कुछ  कांग्रेस में लौट गए और कुछ  पार्टियां तोड़ने - बनाने के खेल में रम गए। 1962 में चीन के आक्रमण के बाद साम्यवादी दल  सीपीआई और सीपीएम के तौर पर बंट गए। 1967 में डा.राममनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के नारे से प्रेरित संविद सरकारों के रूप में  हुआ  प्रयोग  हालांकि जल्द ही विफल हो गया परंतु  उसने दल बदल नामक बीमारी को जन्म दिया । आया राम - गया राम का दौर भी चला जब एक ही दिन में कई बार पार्टी बदली गई। भजनलाल नामक मुख्यमंत्री तो  पूरे मंत्रीमंडल सहित दल बदल  कर गए। इस प्रवृत्ति का सर्वाधिक शिकार समाजवादी आंदोलन हुआ जिसके नेताओं में पार्टियां तोड़ने की प्रतिस्पर्धा  आज तक जारी है। अनेक नेताओं ने अपनी पारिवारिक पार्टियां भी बना लीं। दक्षिण में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम से टूटकर अद्रमुक बन गई। एम.जी रामचंद्रन की देखासीखी दक्षिण के अनेक अभिनेताओं ने दल बनाए। एन. टी.रामाराव तो मुख्यमंत्री भी बने किंतु उनके दामाद चंद्राबाबू नायडू ने बगावत कर डाली। महाराष्ट्र में शिवसेना बनी तो तो उड़ीसा में बीजू जनता दल। कर्नाटक में देवगौड़ा परिवार ने जनता दल  सेकुलर का गठन किया। प.बंगाल में ममता बैनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई वहीं लालू यादव , मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान ने भी अपनी घरेलू पार्टियां बना लीं। 1977 में बनी जनता  पार्टी सरकार के पतन  के बाद जनसंघ से जुड़े रहे नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की।  इस सबके बीच कांग्रेस लगातार टूटती गई और नई पार्टियां बनती गईं। लेकिन  गाजर घास की तरह से उगी इन पार्टियों के कारण  राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता और पहिचान लुप्त होती चली गई।  पहले किसी नेता का नाम लेते ही उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि सामने आ जाती थी किंतु अब ऐसा नहीं है। आगामी साल लोकसभा चुनाव होंगे। इसीलिए एक पार्टी छोड़कर दूसरे में जाने का दौर जारी है । गठबंधन की जो प्रक्रियाएं चल रही हैं उनमें भी सैद्धांतिकता नजर नहीं आती। परिवार की निजी संपत्ति बने दलों की प्राथमिकता  सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े रहना है  जिसके  लिए वे कुछ भी करने में शर्माते नहीं हैं। जनता पार्टी की सरकार रास्वसंघ के साथ जनसंघ के लोगों के संबंध पर एतराज करने के नाम पर गिरी थी। बाद में जब भाजपा बनी तब दोहरी सदस्यता पर बवाल करने वाले जॉर्ज  फर्नांडीज , शरद यादव , रामविलास पासवान उसके साथ सत्ता में भागीदार बन बैठे। नीतीश कुमार ने तो लंबे समय तक भाजपा के साथ बिहार पर राज किया। जिन स्व.पासवान ने गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को दोषी मानकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार  छोड़ी वे 2014 में श्री मोदी के साथ आ गए । नीतीश खुद बीते दस साल में दो बार भाजपा के साथ मिलने और अलग होने का दांव चल चुके हैं । भ्रष्टाचार के मूर्तमान प्रतीक कहे जाने वाले अजीत पवार   दिन - दहाड़े भाजपा के साथ सत्ता  सुख लूटने  आ गए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक दलबदल भारतीय राजनीति की पहिचान बन चुका है। किसी को किसी से परहेज नहीं रहा। जातिगत छुआछूत तो आज तक नहीं मिट सकी लेकिन राजनीतिक छुआछूत अवश्य अपनी मौत मर चुकी है। आज जो भ्रष्ट है वह साथ आते ही ईमानदारी का प्रतीक हो जाता है और कट्टर सांप्रदायिक नेता को पलक झपकते धर्म निरपेक्षता का प्रमाण पत्र मिल जाता है। अपनी पार्टी के निष्ठावान चने चबाते रह जाते हैं और दलबदलू आकर कुर्सी पा जाते हैं। देश में अनेक ऐसे मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री हैं जो कुछ समय पहले ही पार्टी में आए और देखते - देखते सबके सिर पर सवार हो गए। आजादी के 76 साल पूरे होने के अवसर पर भारतीय राजनीति का मौजूदा परिदृश्य निराश करने वाला है। गठबंधन यदि देश हित में हो तो उसका स्वागत होना चाहिए। चुनाव के बाद  योग्य सांसदों - विधायकों को मंत्री बनाए जाने की भी  हर कोई तारीफ करेगा किंतु महज सत्ता के लिए दूसरे दल से आए नेता को उपकृत करने से एक तो पार्टी के कार्यकर्ता आत्मग्लानि का अनुभव करते हैं वहीं जनता को भी ये लगता है कि राजनीति पूरी तरह बाजार बनती जा रही है। दुख की बात ये है कि लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां दल बदल को प्रोत्साहित करने के खेल में शामिल हैं। सांसदों और विधायकों के दल बदल को रोकने का तो एक कानून भी है किंतु बाकी को खुली छूट  है। हालांकि वह कानून भी तकनीकी पेच में फंसकर मजाक बन जाता है। ऐसे में ये जरूरी लगता है कि दल बदल करने वाले नेता यदि अपने निर्णय का समुचित कारण नहीं बता पाएं तो जनता को उनका तिरस्कार करना चाहिए । राजनीतिक दल भी ताजा - ताजा पार्टी में आए नेता को टिकिट देने से मना करें तो इस प्रवृत्ति पर नियंत्रण लग सकता है। लेकिन आज की स्थिति में किसी से उम्मीद करना व्यर्थ है क्योंकि  पूरे कुएं में भांग घुली हुई है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 




Friday, 11 August 2023

अंग्रेजों द्वारा बनाई दंड व्यवस्था और न्याय प्रणाली में सुधार जरूरी


गृह मंत्री अमित शाह ने गत दिवस लोकसभा में अंगेजी राज में बनाए गए अनेक कानून खत्म करने के साथ ही कुछ का स्वरूप बदलने संबंधी जो विधेयक किए वे निश्चित रूप से समय की मांग हैं। देश में कानून को लागू करने के अलावा न्यायालयीन प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति बेहद निराशाजनक है। मसलन किसी को गिरफ्तार करने के बाद अपराधिक प्रकरण का निराकरण कितने समय के भीतर किया जाएगा इसकी कोई सीमा नहीं है। गृह मंत्री द्वारा प्रस्तुत विधेयक के मुताबिक ट्रायल कोर्ट को तीन साल के भीतर हर फैसला करना होगा। राजद्रोह अब देशद्रोह होगा । भारतीय दंड संहिता में 511 से कम होकर 356 धाराएं बचेंगी और सैकड़ों बदली जायेंगी । कुछ को समाप्त करने के साथ ही कुछ नई शामिल होंगी। छोटे अपराधों के लिए जेल भेजने के बजाय दंड स्वरूप सामुदायिक सेवा का प्रावधान रचनात्मक सोच है। इसी तरह मॉब लिंचिंग , लव जिहाद जैसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान भी अपेक्षित कदम है। देश में कहीं भी प्राथमिकी दर्ज करवाने के अलावा अन्य कुछ प्रस्ताव उक्त विधेयकों में हैं जिनके पारित होने के बाद अदालतों में लंबित प्रकरणों का बोझ कम तो होगा ही आरोपित व्यक्ति को भी अनिश्चितता से राहत मिलेगी। बकौल गृहमंत्री ये विधेयक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से गुलामी की निशानियों को खत्म करने सम्बन्धी घोषणा के परिप्रेक्ष्य में पेश किए गए। चूंकि संसद का सत्र समाप्त होने के चार दिन बाद ही स्वाधीनता दिवस है इसलिए सरकार को जल्दबाजी में ये काम करना पड़ा। हालांकि यदि गृह मंत्री सत्र की शुरुआत में इसे पेश कर देते तब वह लोकसभा से पारित होने के बाद राज्यसभा द्वारा भी स्वीकृत कर दिया गया होता। अब इसके लिए शीतकालीन सत्र तक इंतजार करना होगा। बहरहाल देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए । आजदी के बाद अंग्रेजों द्वारा लागू किए ज्यादातर दीवानी और फौजदारी कानूनों को यथावत स्वीकार कर लिया गया। यद्यपि समय - समय पर उनमें कुछ सुधार और संशोधन भी किए जाते रहे किंतु उनका मूल ढांचा ब्रिटिश राज की यादें दिलाता रहा। न्यायालयीन कार्यप्रणाली पर भी औपनिवेशिक काल की छाप साफ नजर आती है। पेशी दर पेशी की संस्कृति ने न्यायपालिका की जो नकारात्मक छवि बनाई उसके कारण लोकतंत्र की सार्थकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगते हैं। राजद्रोह शब्द अपने आप में राजतंत्र का एहसास करवाने वाला है। किसी अपराधिक मामले पर अंतिम फैसला होते - होते कुछ लोगों की जिंदगी का लंबा समय गुजर जाता है। ये धारणा भी काफी मजबूती के साथ उभरी है कि निर्दोष व्यक्ति व्यवस्था में खामियों के चलते जेल में सड़ता रहता है वहीं अपराधी प्रवृत्ति के लोग छुट्टा घूमते हैं। न्याय को सस्ता और सुलभ बनाने के तमाम दावे भी हवा - हवाई होकर रह गए हैं। एक जैसे मामले में किसी को तो तत्काल जमानत दे दी जाती है वहीं दूसरा महज इसलिए उससे वंचित रह जाता है क्योंकि उसके पास महंगे वकील की फीस चुकाने की हैसियत नहीं है। कुछ समय पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के सामने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और तत्कालीन कानून मंत्री किरण रिजुजू ने कहा कि न्यायाधीश वकील का चेहरा देखकर फैसला करते हैं । लेकिन मी लॉर्ड सफाई में कुछ नहीं बोल सके। ऐसे में ये जरूरी हो गया है कि दंड प्रक्रिया के साथ ही अदालती व्यवस्था में भी आमूल परिवर्तन हो। अनुपयोगी पड़े कालातीत हो चुके कानूनों को अंतिम विदाई देकर उनके दुरुपयोग को रोका जा सकेगा । इसके अलावा अभियोजन पक्ष भी कानूनों की भीड़ में भटकने से बचेगा। न्यायालयों द्वारा समय सीमा में प्रकरण का निपटारा करने की व्यवस्था इन विधेयकों में सबसे अच्छी बात है। अन्यथा सजा का फैसला होने तक आरोपी बरसों - बरस जेल में रहने मजबूर रहता है। कुल मिलाकर जो विधेयक गत दिवस लोकसभा में पेश हुए इनके बारे में राजनीतिक दलों को संसद के अगले सत्र के पूर्व ही अपनी राय बना लेनी चाहिए जिससे इनको पारित करने में अनावश्यक विलंब न हो। इस बारे में ये बात सोचने वाली है कि न्याय को सस्ता करना है तो प्रकरण के निपटारे में देर को खत्म करना होगा क्योंकि वह जितना लंबा खींचता है वकील और अन्य खर्चे बढ़ते ही जाते हैं। अदालतों को नामी - गिरामी वकीलों की बजाय पक्षकार की सहूलियत पर भी ध्यान देना चाहिए। वैसे अभी इस क्षेत्र में और भी सुधारों की जरूरत है किंतु याद रखने वाली बात है कि किसी भी बड़े सफर की शुरुआत छोटे से कदम से ही होती है। गृह मंत्री श्री शाह द्वारा गत दिवस लोकसभा में पेश किए गए विधेयक भी व्यवस्था परिवर्तन की राह पर बढ़ाये कदम हैं जो आशान्वित करते हैं। ऐसे मामलों में राजनीति न हो तो ये देश हित में होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी